परिचय
मुगल कला 1526 से अठारहवीं शताब्दी तक मुगल बादशाहों के संरक्षण में बने स्थापत्य, चित्रकला, सुलेखन और अन्य कलाओं का नाम है। इसने तैमूरियों की फ़ारसी और मध्य एशियाई परंपरा, दिल्ली सल्तनत के इंडो-इस्लामिक भवन-निर्माण और पुरानी भारतीय परंपराओं को जोड़ा; इसका स्थापत्य शाहजहाँ के काल में ताजमहल के साथ और चित्रकला जहाँगीर के काल में शिखर पर पहुँची।
मुगल कला और स्थापत्य: अर्थ, स्रोत और संरक्षक
मुगल कला क्या है: फ़ारसी, इंडो-इस्लामिक और भारतीय परंपराओं का संगम
सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक मुगल साम्राज्य में विकसित भवन-निर्माण की शैली को मुगल स्थापत्य (Mughal architecture) कहते हैं। इसने गुंबद, मेहराब और बाग की योजना ईरान और मध्य एशिया से, विशेषकर बाबर के पूर्वजों की तैमूरी इमारतों से ली, और टोड़े, झरोखे तथा स्तंभों वाले कक्ष भारतीय और राजपूत भवन-परंपरा से। बड़े कंदाकार (बल्बनुमा) गुंबद, कोनों पर पतली मीनारें, ऊँचे मेहराबदार प्रवेशद्वार और बारीक अलंकरण पूरे साम्राज्य की इमारतों को एक जैसा रूप देते हैं।
मुगल बादशाहों ने अपनी उपस्थिति और शक्ति दिखाने के लिए भवन बनवाए, और उनकी संपदा अपने समय के ऑटोमन और सफ़ावी साम्राज्यों से भी अधिक थी। उपमहाद्वीप में किसी और काल की तुलना में मुगल काल के स्मारक सबसे अधिक बचे हैं: मस्जिदें, मकबरे, महल, बाग और किले। बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर और विशेषकर शाहजहाँ ने साहित्य, कला और स्थापत्य में व्यक्तिगत रुचि ली, और हर शासनकाल ने अपनी अलग छाप छोड़ी, जैसा चित्र 1 में दिखता है।
इंडो-इस्लामिक शैलियों में मुगल शैली: शाही, प्रांतीय और दक्कनी
मुगल शैली इंडो-इस्लामिक स्थापत्य की एक शाखा है। विद्वान इंडो-इस्लामिक भवन-निर्माण को परंपरागत रूप से चार शैलियों में बाँटते हैं, और यह विभाजन किसी स्मारक को जल्दी पहचानने में मदद करता है।
| शैली | क्षेत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| शाही शैली | दिल्ली सल्तनत | कुतुब मीनार, तेरहवीं शताब्दी |
| प्रांतीय शैली | मांडू, गुजरात, बंगाल, जौनपुर | मांडू का जहाज़ महल और होशंगशाह का मकबरा |
| मुगल शैली | दिल्ली, आगरा, लाहौर | हुमायूँ का मकबरा, फ़तेहपुर सीकरी, ताजमहल |
| दक्कनी शैली | बीजापुर, गोलकुंडा | बीजापुर का गोल गुंबद |
ये शैलियाँ एक-दूसरे में घुली-मिली थीं। गुजरात में सरखेज की पंद्रहवीं शताब्दी की सफ़ेद संगमरमर की शेख अहमद खट्टू की दरगाह, जो प्रांतीय शैली की इमारत है, ने मुगल मकबरों के रूप और अलंकरण को गहराई से प्रभावित किया, और मुगलों ने बंगाल की "बांग्ला" छत को अपनी इमारतों में अपनाया। दक्कनी शैली पर अलग लेख है: दक्कन सल्तनतों का स्थापत्य; पहले के चरण के लिए देखें दिल्ली सल्तनत का इंडो-इस्लामिक स्थापत्य (अंग्रेज़ी में)।
आरंभिक मुगल स्थापत्य: बाबर के बाग और हुमायूँ का मकबरा
बाबर और चारबाग उद्यान
बाबर का भवन-निर्माण मुख्यतः उसके बागों के लिए जाना जाता है। अपनी आत्मकथा में उसने दीवारों से घिरे औपचारिक बाग बनवाने की रुचि का वर्णन किया है, जिन्हें कृत्रिम नहरों से चार भागों में बाँटा जाता था। चार बराबर भागों में बँटे होने के कारण इन्हें चारबाग (chahar bagh) कहा गया। यह योजना तैमूरी नमूनों पर आधारित थी, यद्यपि नहरों को विभाजक रेखा के रूप में उपयोग करना शायद मुगलों की अपनी देन थी।
- बाग: आगरा का आराम बाग दक्षिण एशिया का पहला चारबाग माना जाता है; बाबर ने धौलपुर और लाहौर में भी बाग बनवाए।
- मस्जिद: पानीपत की उसकी मस्जिद तैमूरी नमूने पर बनी थी, जिसमें ऊँचा केंद्रीय प्रवेश-द्वार (पिश्ताक), आँगन और एक बड़े केंद्रीय गुंबद के नीचे नमाज़ का कक्ष है।
- दफ़न: बाबर को पहले आगरा में दफ़नाया गया; 1644 में उसकी कब्र काबुल के उसके एक प्रिय बाग में ले जाई गई।
हुमायूँ का मकबरा: पहला परिपक्व मुगल बाग-मकबरा
हुमायूँ की मृत्यु 1556 में हुई, और उसकी विधवा हमीदा बानो बेगम, जिन्हें हाजी बेगम भी कहा जाता है, ने उसकी मृत्यु के चौदह वर्ष बाद, 1569 में, दिल्ली में उसका मकबरा बनवाना आरंभ किया। इसका वास्तुकार मीरक मिर्ज़ा ग़ियास नाम का एक फ़ारसी था। फ़ारसी स्थापत्य से प्रेरित यह मकबरा सच्ची मुगल शैली का पहला स्पष्ट उदाहरण है, और इस पर 15 लाख रुपये खर्च हुए।
- बाग: मकबरा एक वर्गाकार चारबाग के बीच में है, जिसे पत्थर के रास्ते और उनके बीच बहती उथली नहरें चार भागों में बाँटती हैं।
- योजना: केंद्रीय कक्ष के चारों ओर आठ कमरे हैं, जिसे हश्त बिहिश्त (hasht bihisht), अर्थात् आठ स्वर्ग, कहते हैं। अष्टभुजी केंद्रीय कक्ष में स्मारक-कब्र है; कोनों के कक्षों में राजपरिवार के अन्य सदस्यों की कब्रें हैं।
- सामग्री: लाल बलुआ पत्थर, जिसके किनारों और फलकों में सफ़ेद संगमरमर लगा है; यह लगभग 7 मीटर ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है।
- गुंबद: संगमरमर का ऊँचा दोहरा गुंबद, लगभग 42.5 मीटर, जिसके चारों ओर स्तंभों वाली छतरियाँ हैं।
- मेल: मेहराबदार ताख, गलियारे और दोहरा गुंबद फ़ारसी हैं; छतरियाँ, जो दूर से इमारत को पिरामिड जैसा रूप देती हैं, भारतीय हैं।
भारत में पहला बाग-मकबरा सिकंदर लोदी का था, पर हुमायूँ के मकबरे ने वह परंपरा शुरू की जो ताजमहल पर जाकर पूरी हुई। यहाँ कई मुगल शासक दफ़न हैं, और 1857 में बहादुर शाह ज़फ़र ने तीन शहज़ादों के साथ यहीं शरण ली थी। 1993 में यह विश्व धरोहर स्थल बना। हुमायूँ के शासन के लिए देखें हुमायूँ और गद्दी के लिए संघर्ष (अंग्रेज़ी में)।
अकबर का स्थापत्य: लाल बलुआ पत्थर, आगरा का किला और फ़तेहपुर सीकरी
आगरा का किला: यमुना तट पर अकबर का लाल पत्थर का गढ़
अकबर के शासनकाल में भारतीय स्थापत्य के तत्त्वों का प्रयोग किसी भी अन्य मुगल शासनकाल से अधिक खुलकर हुआ। उसके वास्तुकारों ने लाल बलुआ पत्थर में काम किया और राजपूत योजना तथा गुजरात और मालवा की भवन-परंपराओं से खुलकर तत्त्व लिए। यमुना के दाहिने किनारे पर स्थित आगरा का किला बादलगढ़ नामक पुराने स्थल के अवशेषों पर बना, जिसका उपयोग सिकंदर लोदी ने दिल्ली से आगरा राजधानी ले जाने पर किया था।
- निर्माण: अकबर ने किले को लाल बलुआ पत्थर से नया बनवाने का आदेश दिया; लगभग 4,000 कारीगरों ने रोज़ काम किया और आठ वर्षों में, 1565 से 1573 तक, यह पूरा हुआ।
- योजना: अर्धवृत्ताकार, 21.4 मीटर ऊँची दोहरी प्राचीर से घिरा, चार द्वारों वाला, लगभग 94 एकड़ में फैला।
- भवन: अकबर के इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने यहाँ बंगाली और गुजराती शैली के 5,000 भवन गिनाए; दिल्ली दरवाज़ा, अकबरी दरवाज़ा और बंगाली महल अकबर के समय के बचे हैं।
- बाद के जोड़: शाहजहाँ ने सफ़ेद संगमरमर के महलों के लिए अकबर की कुछ इमारतें गिरवाईं और संगमरमर की तीन मस्जिदें बनवाईं: मोती मस्जिद, नगीना मस्जिद और मीना मस्जिद। औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को यहीं 1666 में उसकी मृत्यु तक कैद रखा।
इसके श्रम का भी हिसाब मिलता है: आगरा के किले के लिए 2,000 पत्थर काटने वाले, चूना और गारा बनाने वाले 2,000 कारीगर और 8,000 मज़दूर लगे। आगरा का किला 1983 में विश्व धरोहर स्थल बना।
फ़तेहपुर सीकरी: मुगलों का पहला नियोजित नगर
अकबर ने सूफ़ी संत शेख सलीम चिश्ती के सम्मान में 1572 से 1585 तक, 13 वर्षों के लिए, अपना निवास और दरबार आगरा से सीकरी में रखा; संत के आशीर्वाद से उसे पुत्र हुआ था, जिसका नाम 1569 में सलीम रखा गया। सीकरी मुगलों का पहला नियोजित नगर था। ढलान वाली ज़मीन को अलग-अलग परिसरों के लिए सीढ़ीदार चबूतरों में काटा गया, और जल-निकासी तथा जल-आपूर्ति की कुशल व्यवस्था बनाई गई।
- धार्मिक परिसर: जामा मस्जिद, बुलंद दरवाज़ा और शेख सलीम चिश्ती का मकबरा।
- महल परिसर: ख़ास महल, पंच महल, ख़्वाबगाह, दीवान-ए-ख़ास, अनूप तालाब, चौपड़ और दीवान-ए-आम, साथ में शाही बाज़ार और मीना बाज़ार।
- संस्थाएँ: इबादतख़ाना, दीन-ए-इलाही, सुलह-ए-कुल का सिद्धांत और झरोखा दर्शन यहीं से शुरू हुए; अनेक दस्तकारियों की कार्यशालाएँ भी यहीं बनीं।
महल लाल बलुआ पत्थर में धरन-और-स्तंभ (ट्रैबिएट) पद्धति से बने, जिनमें स्तंभ, सजावटी मेहराबें, टोड़े और छज्जे, झरोखे और छतरियाँ हैं; गुंबदों का प्रयोग कम हुआ। कई इमारतों में गुजरात और मालवा की शैली दिखती है, जैसे जोधाबाई महल के नक्काशीदार स्तंभ और टेक। इबादतख़ाने की बहसों समेत सीकरी दरबार के विचारों के लिए देखें अकबर की धार्मिक नीति और दीन-ए-इलाही (अंग्रेज़ी में)।
- बुलंद दरवाज़ा: जामा मस्जिद का विशाल द्वार, जिसका निर्माण 1573 में गुजरात विजय की स्मृति में शुरू हुआ; लाल और पीले-भूरे बलुआ पत्थर का बना, जिसमें सफ़ेद और काले संगमरमर की जड़ाई है; ज़मीन से लगभग 54 मीटर ऊँचा।
- शेख सलीम चिश्ती का मकबरा: उसी मस्जिद के आँगन में बरामदे वाला वर्गाकार संगमरमरी कक्ष, जो चारों ओर संगमरमर की बारीक जालियों से घिरा है।
अकबर की इमारतों में भारतीय तत्त्व: झरोखा, छतरी, छज्जा और ट्रैबिएट पद्धति
अकबर के वास्तुकारों ने भवन-निर्माण की दो पद्धतियाँ मिलाईं। ट्रैबिएट (trabeate) पद्धति में दो खड़े स्तंभों पर एक आड़ी धरन रखी जाती है; मेहराबी (arcuate) पद्धति में दरवाज़े या खिड़की के ऊपर का भार एक मेहराब उठाती है, जिसके शीर्ष पर डाट का पत्थर होता है। भारतीय कारीगर पहली पद्धति लंबे समय से अपनाते थे; मेहराब और गुंबद तुर्क सुल्तानों के साथ आए। अकबर ने दोनों का प्रयोग किया और स्थानीय हिंदू तथा राजपूत भवन-परंपरा से कई तत्त्व लिए।
| तत्त्व | क्या है | स्रोत |
|---|---|---|
| झरोखा | बाहर निकली हुई बालकनी | स्थानीय भारतीय परंपरा |
| छतरी | स्तंभों पर टिकी छोटी गुंबददार मंडपिका | स्थानीय भारतीय परंपरा |
| छज्जा | पत्थर की चौड़ी ओलती | स्थानीय भारतीय परंपरा |
| ईवान और पिश्ताक | एक ओर खुला मेहराबदार कक्ष; ऊँचा प्रवेश-द्वार | फ़ारसी और तैमूरी परंपरा |
| चारबाग | नहरों से चार भागों में बँटा बाग | फ़ारसी और तैमूरी बाग |
| बांग्ला छत | झोंपड़ी जैसी घुमावदार छत | बंगाल |
विचार दूसरी दिशा में भी गए। मथुरा के पास वृंदावन में मंदिर फ़तेहपुर सीकरी के महलों जैसी शैली में बने: 1590 का लाल बलुआ पत्थर का गोविंद देव मंदिर उत्तर-पश्चिमी ईरान (खुरासान) की उन परस्पर काटती मेहराबों का प्रयोग करता है, जो सीकरी में भी प्रयुक्त हुईं। अकबर के सर्वोच्च अधिकारियों में गैर-मुस्लिम भी थे, और उनमें सबसे प्रसिद्ध राजा मान सिंह ने हिंदू मंदिर और मस्जिदें दोनों बनवाईं।
जहाँगीर का काल: अकबर का मकबरा, एतमादुद्दौला और संगमरमर की ओर
सिकंदरा में अकबर का मकबरा और एतमादुद्दौला का मकबरा
जहाँगीर ने अपने पिता से कम भवन बनवाए, पर उसके काल के दो मकबरे लाल बलुआ पत्थर से सफ़ेद संगमरमर की ओर बदलाव दिखाते हैं। आगरा के पास सिकंदरा में उसके पिता का मकबरा 1605 से 1613 के बीच 119 एकड़ ज़मीन पर बना।
- सिकंदरा में अकबर का मकबरा: गहरे लाल बलुआ पत्थर का चार तलों वाला पिरामिडनुमा भवन, जिसमें सफ़ेद संगमरमर के तत्त्व हैं; सबसे ऊपर संगमरमर के मंडप में प्रतीक-कब्र है, असली कब्र तहखाने में है। इसके दक्षिणी द्वार की सफ़ेद संगमरमर की चार मीनारें ताजमहल की मीनारों से पहले की हैं।
- आगरा में एतमादुद्दौला का मकबरा: 1622 से 1628 के बीच महारानी नूरजहाँ ने अपने पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग के लिए बनवाया, जिन्हें एतमादुद्दौला अर्थात् “राज्य का स्तंभ” की उपाधि मिली थी। चारबाग के बीच सफ़ेद संगमरमर का मकबरा, कोनों पर अष्टभुजी बुर्ज, कोई केंद्रीय गुंबद नहीं, संगमरमर की जालियाँ और पच्चीकारी की जड़ाई।
एतमादुद्दौला के मकबरे को उसके अलंकरण के कारण "रत्न-मंजूषा" (jewel box) और कभी-कभी "बेबी ताज" कहा जाता है, क्योंकि इसकी जड़ाई ताजमहल की जड़ाई की पूर्ववर्ती है। यह हुमायूँ और अकबर के मकबरों के लाल पत्थर और संगमरमर की किनारी से पूरे संगमरमर के ताज तक का बीच का कदम है। दरबार में नूरजहाँ की भूमिका के लिए देखें जहाँगीर और नूरजहाँ (अंग्रेज़ी में)।
कश्मीर के मुगल बाग: शालीमार बाग और निशात बाग
जहाँगीर की अपनी रुचि बागों में थी। उसे फूलों से प्रेम था, और कश्मीर की उसकी यात्राओं से प्राकृतिक और भरपूर फूलों वाली सज्जा का चलन शुरू हुआ। श्रीनगर में डल झील के उत्तर-पूर्व में शालीमार बाग जहाँगीर ने 1619 में बनवाया, जिसे मुगल उद्यान-कला का शिखर माना जाता है। 1630 में शाहजहाँ के कश्मीर के सूबेदार ज़फ़र ख़ान ने इसका विस्तार किया।
जहाँगीर और नूरजहाँ कम से कम 13 बार गर्मियों में पूरे दरबार के साथ श्रीनगर गए, पीर पंजाल के दर्रे हाथियों पर पार करके, और शालीमार बाग उनका ग्रीष्मकालीन निवास और दरबार था। जम्मू और कश्मीर के छह मुगल बाग, परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मे शाही, वेरीनाग और अछाबल, विश्व धरोहर की संभावित (टेंटेटिव) सूची में हैं।
शाहजहाँ: सफ़ेद संगमरमर में मुगल स्थापत्य का चरमोत्कर्ष
ताजमहल: योजना, मकराना संगमरमर और अलंकरण
शाहजहाँ के काल में मुगल स्थापत्य अपने शिखर पर पहुँचा। उसने अपने पूर्ववर्तियों की विशालता के स्थान पर सफ़ेद संगमरमर और बारीक सुघड़ता को चुना, और उसके शासन में मुगल भवन-निर्माण के अलग-अलग तत्त्व एक सामंजस्यपूर्ण शैली में घुल गए। आगरा का ताजमहल, उसकी बेगम मुमताज़ महल का मकबरा, जिनकी मृत्यु 1631 में हुई, इस शैली का शिखर है; इसके मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे।
निर्माण 1632 में शुरू हुआ। NCERT के अनुसार ताजमहल 1643 में पूरा हुआ; अन्य विवरण पूरे परिसर के लिए सत्रह वर्ष के काम के बाद 1648 का वर्ष बताते हैं। राजमिस्त्री, पत्थर काटने वाले, जड़ाई करने वाले, सुलेखक और गुंबद बनाने वाले पूरे साम्राज्य से और मध्य एशिया तथा ईरान से बुलाए गए; सफ़ेद संगमरमर राजस्थान के मकराना से, लाल बलुआ पत्थर सीकरी और धौलपुर से, और जड़ाई के कीमती पत्थर भारत, श्रीलंका और अफ़ग़ानिस्तान से आए।
- विन्यास: लाल बलुआ पत्थर का विशाल द्वार रास्तों और नहरों से बँटे चारबाग में खुलता है; मकबरा बाग के बीच में नहीं, उत्तरी किनारे पर नदी तट पर है।
- संतुलन: पश्चिम में लाल बलुआ पत्थर की मस्जिद है और पूर्व में वैसी ही इमारत, मेहमानख़ाना।
- योजना: कटे कोनों वाला वर्ग, जिससे आठ भुजाएँ बनती हैं; नीचे तलघर और ऊपर अष्टभुजी मकबरा-कक्ष, हर कोण पर एक कमरा, और जाली-झरोखों से आता प्रकाश।
- ऊँचाई: चबूतरे के कोनों पर चार अलग खड़ी मीनारें, 132 फुट ऊँची; दोहरे गुंबद से भीतरी छत और बाहरी गुंबद के बीच खाली जगह छूटती है।
भीतर और बाहर चार तरह का अलंकरण है: पत्थर पर ऊँची और नीची उभारदार नक्काशी; संगमरमर में बारीक जालियाँ और कुंडलित आकृतियाँ; पच्चीकारी (pietra dura) से बने बेल-बूटे, अर्थात् पीले संगमरमर, जेड और जैस्पर जैसे रंगीन पत्थरों को काटकर संगमरमर में जड़ना, साथ में ज्यामितीय पच्चीकारी; और सफ़ेद संगमरमर में जैस्पर जड़कर लिखी कुरान की आयतें। ताजमहल 1983 में विश्व धरोहर स्थल बना।
नदी-तट का बाग: ताज किनारे पर क्यों है
शाहजहाँ के शासन के आरंभिक वर्षों में आगरा के अमीरों ने यमुना के किनारे चारबागों के बीच अपने घर बनाए। इतिहासकार इस रूप को नदी-तट का बाग कहते हैं: निवास बाग के बीच में नहीं, नदी के पास उसके किनारे पर होता था। शाहजहाँ ने ताजमहल में यही योजना अपनाई और सफ़ेद संगमरमर के मकबरे को नदी किनारे एक चबूतरे पर रखा, बाग उसके दक्षिण में।
यह योजना नदी-तट पर नियंत्रण का साधन भी थी। उसके नए नगर शाहजहाँनाबाद में शाही महल नदी-तट पर था, और केवल विशेष कृपापात्र अमीरों, जैसे उसके बड़े बेटे दारा शुकोह, को नदी तक पहुँच मिली; बाकी सबने यमुना से दूर घर बनाए।
शाहजहाँनाबाद: दिल्ली का लाल किला और जामा मस्जिद
शाहजहाँ ने 1638 में अपनी राजधानी औपचारिक रूप से दिल्ली स्थानांतरित की और शाहजहाँनाबाद नाम का नया परकोटे वाला नगर बसाया। इसका गढ़, लाल किला, 1639 में शुरू होकर नौ वर्ष में पूरा हुआ। यह एक अनियमित अष्टभुज है, जिसके दो मुख्य द्वार हैं, लाहौरी दरवाज़ा और दिल्ली दरवाज़ा; दीवारें और द्वार लाल बलुआ पत्थर के हैं, जबकि महलों में अधिकतर संगमरमर लगा है।
- दीवान-ए-आम: आम दरबार का कक्ष, जिसके सामने नौ मेहराबें हैं; सिंहासन के पीछे पच्चीकारी के फलकों में वीणा बजाते ऑर्फ़ियस का चित्र है।
- दीवान-ए-ख़ास: ख़ास दरबार का कक्ष, जिसके स्तंभों पर फूलों की पच्चीकारी है; कहा जाता है कि इसके चबूतरे पर वह मयूर सिंहासन था, जिसे नादिर शाह ले गया।
- रंग महल: रंगीन सजावट वाला महल, जिसके बीच से नहर-ए-बहिश्त, अर्थात् स्वर्ग की धारा, बहती थी।
- मोती मस्जिद: बाद में औरंगज़ेब द्वारा जोड़ी गई।
इन कक्षों का एक संदेश था। शाहजहाँ के दरबार-कक्ष, बड़े आँगनों में बने चालीस स्तंभों वाले कक्ष (चहल सुतून), मस्जिद जैसे बनाए गए थे, और सिंहासन के चबूतरे को किबला कहा जाता था, अर्थात् वह दिशा जिधर नमाज़ में मुँह किया जाता है। ऑर्फ़ियस के फलक, जिसके संगीत से हिंसक पशु भी शांत हो जाते थे, यह बताते थे कि बादशाह का न्याय ऊँच और नीच को बराबर मानता है। दीवान-ए-ख़ास के एक अभिलेख में लिखा है: "अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।"
1644 में शाहजहाँ ने दिल्ली की जामा मस्जिद बनवानी शुरू की, जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है और 1650 में पूरी हुई। यह ऊँचे चबूतरे पर खड़ी है, जिसके तीन द्वारों तक लंबी सीढ़ियाँ जाती हैं; इसके नमाज़-कक्ष के सामने ग्यारह मेहराबें हैं, दोनों छोरों पर चार मंज़िला मीनारें हैं, और काले-सफ़ेद संगमरमर की धारियों वाले तीन बड़े गुंबद हैं। लाल किला परिसर 2007 में विश्व धरोहर स्थल बना। पूरे शासनकाल के लिए देखें शाहजहाँ और मुगल वैभव का शिखर (अंग्रेज़ी में)।
औरंगज़ेब और उत्तर मुगल: बादशाही मस्जिद, बीबी का मकबरा और ईंट
औरंगज़ेब की इमारतें और मुगल स्थापत्य का पतन
औरंगज़ेब (1658 से 1707) के काल में तराशे पत्थर और संगमरमर की जगह ईंट या पत्थर के टुकड़ों और चूने के पलस्तर की सजावट ने ले ली। फिर भी वह बड़े मुगल संरक्षकों में अंतिम था। लाहौर की बादशाही मस्जिद, 1673 और 1674 में बनी, सबसे बड़ी मुगल मस्जिद और अंतिम शाही मस्जिद है; इसकी योजना दिल्ली की जामा मस्जिद जैसी है पर कहीं बड़ी, दीवारें लाल बलुआ पत्थर की और गुंबद सफ़ेद संगमरमर के।
औरंगाबाद में बीबी का मकबरा, औरंगज़ेब की पहली पत्नी दिलरस बानो बेगम का मकबरा, ताजमहल की निकट प्रतिकृति है और "दक्कन का ताज" कहलाता है। इसके वास्तुकार अताउल्लाह ताज के प्रमुख वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी के पुत्र थे। लाल किले की मोती मस्जिद भी औरंगज़ेब की है।
औरंगज़ेब के बाद यह शैली ढलान पर गई, पर क्षेत्रीय शासक अपना राज्य बनाते समय इसे अपनाते रहे। दिल्ली में सफ़दरजंग का मकबरा, जो 1754 में पूरा हुआ, अंतिम मुगल इमारतों में है। अवध में नवाबों ने लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा (1784) और रूमी दरवाज़ा (1784) बनवाए; रूमी दरवाज़ा पतली पकी ईंटों (लखौरी) और चूने के गारे से बना है, पत्थर से नहीं। मुगल रूपों ने राजपूत और सिख स्थापत्य को, और बाद में अंग्रेज़ी काल की इंडो-सारसेनिक शैली को भी आकार दिया। औरंगज़ेब के शासन के लिए देखें औरंगज़ेब और मुगल साम्राज्य (अंग्रेज़ी में)।
मुगल स्थापत्य की विशेषताएँ: गुंबद, द्वार, बाग और अलंकरण
सभी शासनकालों में मुगल इमारतों की साझी पहचान
सभी शासनकालों में मुगल इमारतों की कुछ साझी विशेषताएँ हैं, जिनसे विद्यार्थी उन्हें तुरंत पहचान सकता है। पहले की इंडो-इस्लामिक इमारतों की तुलना में स्थान और सतह के सधे हुए रेखीय विभाजन को अधिक महत्त्व मिला, और रंग संयम से बरता गया; उसकी जगह चिकनी, उत्तम सामग्री ने ली।
- गुंबद और मेहराब: बड़े कंदाकार गुंबद, अक्सर दोहरे, और नुकीली या कई पत्तियों वाली (बहुदलीय) मेहराबें।
- द्वार: ऊँची केंद्रीय मेहराब वाले विशाल प्रवेश-द्वार, बुलंद दरवाज़े से ताज के द्वार तक।
- मीनारें और छतरियाँ: कोनों पर पतली मीनारें, छत पर छतरियाँ, दीवारों पर झरोखे और छज्जे।
- सामग्री: पहले लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर की किनारी, फिर पूरी इमारतों पर सफ़ेद संगमरमर; औरंगज़ेब के समय ईंट और पलस्तर।
- अलंकरण: जालियाँ, उभारदार नक्काशी, पच्चीकारी, टाइलों का काम, और कुरान तथा फ़ारसी पद्यों का सुलेखन।
- विन्यास: चारबाग के भीतर चबूतरे पर मकबरा, और बागों तथा मंडपों के साथ बसा महल।
भवनों का रूप उनके उद्देश्य से तय होता था। आगरा और लाल किले जैसे किले अर्धवृत्ताकार बुर्जों वाली विशाल दीवारों से घिरे थे। मस्जिदों में तीन ओर दालानों से घिरा बड़ा आँगन और चौथी ओर नमाज़ का कक्ष होता था। शाही मकबरे सबसे भव्य थे: सीढ़ीदार चबूतरे पर केंद्रीय गुंबद वाला अष्टभुजी या वर्गाकार भवन। सड़कें, कोस मीनार, सराय और पुल साम्राज्य के यात्रियों के काम आते थे।
चारबाग: स्वर्ग की छवि के रूप में मुगल बाग
मुगल बाग चारबाग था: दीवारों से घिरा वर्ग, जिसे रास्ते या बहता पानी चार छोटे भागों में बाँटता था, और जिसमें तालाब, फ़व्वारे और नहरें होती थीं। यह विन्यास कुरान में वर्णित स्वर्ग के चार बागों पर आधारित था और प्रकृति के साथ सामंजस्य वाली धरती पर स्वर्ग की छवि बनाने के लिए था। बाबर ने ऐसे बाग आगरा, धौलपुर और लाहौर में बनवाए; अकबर ने नदी-तट के बाग पसंद किए; मुगल उद्यान-कला का शिखर शाहजहाँ के काल में आया।
- मकबरे के बाग: हुमायूँ के मकबरे में मकबरा बीच में; ताजमहल में नदी के किनारे पर।
- महल और आमोद के बाग: श्रीनगर का शालीमार बाग (1619); लाहौर के शालीमार बाग, 1641 और 1642 में बने, 1981 से विश्व धरोहर; ताज के सामने यमुना पार का महताब बाग, चाँदनी का बाग।
- अन्य बाग: हरियाणा के पिंजौर बाग और इलाहाबाद का ख़ुसरो बाग।
बाग में बना मकबरा एक आस्था भी व्यक्त करता था। मकबरे के पीछे यह विचार था कि क़यामत के दिन सच्चे आस्थावान को अनंत स्वर्ग मिलेगा, इसलिए मकबरे को स्वर्ग के तत्त्वों, बाग, पानी या दोनों, के बीच रखा गया, जैसे ताजमहल में। इतने विशाल परिसर दफ़नाए गए व्यक्ति की शान भी दिखाते थे।
मुगल चित्रकला: मुगल लघु चित्रकला शैली
मुगल चित्रकला का आरंभ: हुमायूँ, मीर सैयद अली और अब्दुस्समद
उत्तर भारत में सोलहवीं शताब्दी से विकसित होकर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक चली लघु चित्रकला शैली को मुगल चित्रकला (Mughal painting) कहते हैं। इसके चित्र पांडुलिपियों और एल्बमों के लिए बनते थे, मुख्यतः राजपरिवार के देखने के लिए, और इनमें घटनाओं, व्यक्तियों तथा बादशाहों की रुचियों का अंकन होता था। इसमें भारतीय और फ़ारसी, और बाद में यूरोपीय, विषयों तथा शैलियों का मेल था।
इस शैली की शुरुआत निर्वासन में हुई। शेरशाह द्वारा गद्दी से हटाए जाने पर हुमायूँ ने फ़ारस के सफ़ावी शासक शाह तहमास्प के दरबार में शरण ली और वहाँ के चित्रकारों को काम करते देखा। तहमास्प की सहायता से उसने 1545 में काबुल में अपना दरबार स्थापित किया, और भारत लौटने पर दो फ़ारसी उस्तादों, मीर सैयद अली और अब्दुस्समद, को, जो छवि चित्रण के लिए प्रसिद्ध थे, चित्रशाला बनाने के लिए बुलाया। उसने अपने पुस्तकालय के हिस्से के रूप में चित्रशाला (निगार ख़ाना) स्थापित की और हम्ज़ानामा का चित्रण शुरू करवाया।
रुचि की नींव बाबर ने रखी थी। वह पांडुलिपियों और बागों का उत्साही संरक्षक था, और उसके संस्मरण बाबरनामा में हेरात के फ़ारसी उस्ताद बिहज़ाद का उल्लेख है। प्रिंसेज़ ऑफ़ द हाउस ऑफ़ तैमूर (1545 से 1550), जिसे संभवतः अब्दुस्समद ने बनाया, आरंभिक चरण दिखाता है: इसका प्रारूप, आकृतियाँ और रंग अभी फ़ारसी हैं।
अकबर की चित्रशाला: हम्ज़ानामा, रज़मनामा और सामूहिक चित्रण
अकबर (1556 से 1605) ने चित्रकला को साम्राज्य की परियोजना बना दिया। अबुल फ़ज़ल लिखता है कि शाही चित्रशाला में सौ से अधिक चित्रकार काम करते थे, अपने समय के सबसे कुशल फ़ारसी और भारतीय चित्रकार, और अकबर स्वयं उनके काम की देखरेख और परख करता था। दोनों समूहों के मेल से नई शैली बनी, और लगभग 1580 तक चित्रशाला की एक एकीकृत मुगल शैली उभर आई।
- हम्ज़ानामा: पैगंबर के चाचा हम्ज़ा के वीर कार्यों की सचित्र कथा; 14 खंड और 1,400 चित्र, कपड़े पर बने, जिनके पीछे कागज़ लगा था, लगभग 15 वर्षों (1567 से 1582) में, मीर सैयद अली और अब्दुस्समद की देखरेख में। बड़े आकार के कारण चित्र उठाकर दिखाए जाते थे, जबकि कथावाचक कथा पढ़ता था।
- रज़मनामा: महाभारत का फ़ारसी अनुवाद, जिसके प्रमुख चित्रकारों में दसवंत थे; रामायण, हरिवंश और अन्य संस्कृत ग्रंथों का भी अनुवाद और चित्रण हुआ।
- इतिहास-ग्रंथ: अकबर के शासन का विवरण अकबरनामा, और बाबरनामा की सचित्र प्रतियाँ।
- चित्रकार: पालकी उठाने वाले के पुत्र दसवंत; छवि चित्रण और यूरोपीय छापों से सीखे प्रकाश-छाया के लिए प्रसिद्ध बसावन; दरबार के दृश्यों के लिए प्रसिद्ध मिस्किन और गोवर्धन।
काम टोली में बँटा होता था। पहले पन्नों पर रेखाएँ खींचकर पाठ लिखा जाता और चित्र के लिए जगह छोड़ी जाती; एक कलाकार खाका बनाता, दूसरा चेहरे और तीसरा रंग भरता, और अभिलेखों से पता चलता है कि कलाकारों को उनके काम के अनुसार वेतन-वृद्धि मिलती थी। जेसुइट मिशनरियों द्वारा दरबार में लाई गई यूरोपीय छापों से बसावन की मेडोना एंड चाइल्ड जैसी कृतियाँ बनीं।
जहाँगीर: छवि चित्र, एल्बम और पशु-पक्षियों के अध्ययन
जहाँगीर (1605 से 1627) के काल में मुगल चित्रकला नई ऊँचाइयों पर पहुँची। अकबर की चित्रशाला जहाँ टोलियों से बड़ी सचित्र पांडुलिपियाँ बनवाती थी, वहीं जहाँगीर कम पर उत्कृष्ट कृतियाँ चाहता था, हर एक किसी एक उस्ताद की। उसने ज़ोर सचित्र पांडुलिपियों से हटाकर मुरक्का (muraqqa) पर डाला, अर्थात् एकल चित्रों का एल्बम, जिनके हाशिये अक्सर सुनहरे रंग से सजे होते थे, और व्यक्तिगत छवि चित्र पर।
- प्रकृति का यथार्थ: उसके संस्मरण तुज़ुक-ए-जहाँगीरी से पता चलता है कि वह फूलों, पक्षियों और पशुओं का वैज्ञानिक सटीकता से चित्रण चाहता था।
- उस्ताद मंसूर: “नादिर-उल-अस्र”, अर्थात् युग का आश्चर्य, की उपाधि मिली; उन्होंने फ़ारस के शाह अब्बास का भेजा बाज़, मार्च 1621 में नौरोज़ पर भेंट किया गया इथियोपिया का ज़ेबरा, और डोडो का सबसे पहला रंगीन चित्र बनाया।
- अबुल हसन: “नादिर-उज़-ज़मान” की उपाधि मिली; उनके चित्र जहाँगीर का स्वप्न (1618 से 1622) में जहाँगीर शाह अब्बास को गले लगा रहा है, और दोनों बादशाह एक शेर और एक भेड़ पर खड़े हैं।
- बिचित्र: उनके चित्र रेत-घड़ी पर सिंहासनारूढ़ जहाँगीर (1625) में जहाँगीर बादशाहों की जगह एक सूफ़ी शेख को महत्त्व देता है।
- यूरोपीय प्रभाव: इंग्लैंड के दरबार से आए छवि चित्रों समेत यूरोपीय चित्रों के उपहारों से मुगल चित्रों में गहराई, प्रभामंडल और पंखों वाले देवदूत आए।
शाहजहाँ, औरंगज़ेब और क्षेत्रीय दरबारों में मुगल शैली का प्रसार
शाहजहाँ के काल में चित्रकला प्राकृतिक न रहकर आदर्शीकृत और शैलीबद्ध हो गई: रत्नों जैसे रंग, निर्दोष परिष्कार और बारीक रेखाएँ एक वैभवशाली बादशाह की छवि गढ़ती थीं। उसके शासन का सचित्र इतिहास पादशाहनामा इसकी सबसे भव्य परियोजना है। यूरोपीय चित्रकार रेम्ब्रां ने इस शैली की बारीक रेखाएँ सीखने के लिए भारतीय चित्रों का अध्ययन किया।
औरंगज़ेब ने चित्रशाला को कम संरक्षण दिया, पर वह तुरंत बंद नहीं हुई। शाही संरक्षण घटने पर कुशल चित्रकार प्रांतीय दरबारों में चले गए, जिनके शासक अपने दरबारों का मुगल ढंग से चित्रण चाहते थे। मुहम्मद शाह रंगीला, शाह आलम द्वितीय और बहादुर शाह ज़फ़र के काल में भी कुछ अच्छे चित्र बने, जिनमें ज़फ़र का 1838 का चित्र है; फिर यह शैली प्रांतीय और कंपनी शैलियों में घुल गई।
मुगल शैली ने साम्राज्य से बहुत आगे तक भारतीय चित्रकला को आकार दिया। यह हिंदू, मुस्लिम और बाद में सिख दरबारों तक, अधिकतर उत्तर भारत में, फैली। राजस्थान में बीकानेर की चित्रकला ने मुगल लालित्य और सधे रंग अपनाए, और आमेर के दरबार की रुचि पर मुगल बादशाहों का गहरा प्रभाव पड़ा; पहाड़ों में पहाड़ी राज्यों तक पहुँचे मुगल चित्रों ने स्थानीय शैलियाँ बदलीं, और उनकी स्वाभाविकता ने कांगड़ा शैली गढ़ने वाले चित्रकारों को आकर्षित किया। कोलकाता की कालीघाट चित्रकला अलग है: यह उन्नीसवीं शताब्दी में कालीघाट काली मंदिर के पास पटुआ कहलाने वाले पट-चित्रकारों में, मोटी रेखाओं और चटख रंगों के साथ, विकसित हुई।
मुगल लघु चित्र कैसे बनता था: कागज़, रंग और चरण
मुगल लघु चित्र इसी काम के लिए तैयार किए गए हस्तनिर्मित कागज़ पर, प्राकृतिक स्रोतों से पीसे गए अपारदर्शी रंगों में बनता था। तूलिका गिलहरी या बिल्ली के बच्चों के बालों से बनती थी। चित्रकार तीन चरणों में काम करता था, जैसा चित्र 3 में दिखाया गया है, और पूरे चित्र को एगेट (सुलेमानी) पत्थर से घिसकर रंग पक्के किए जाते और उनमें चमक लाई जाती थी।
- खाका (तरह): रचना, दृश्य का पहला रेखांकन।
- चिहारनामा: छवि, अर्थात् आकृतियों के चेहरे।
- रंगमिज़ी: रंग भरना, अंतिम चरण।
| रंग | किससे बनता था |
|---|---|
| सिंदूरी | हिंगुल |
| नीला (अल्ट्रामरीन) | लाजवर्त |
| चमकीला पीला | हरताल |
| सफ़ेद | पिसी हुई सीप |
| काला | कोयले से बनी कालिख |
| सुनहरा और रुपहला | सोने और चाँदी का चूर्ण |
मुगल दरबार में सुलेखन और संगीत: नस्तालीक़ और तानसेन
नस्तालीक़ सुलेखन और मुगल इमारतों के अभिलेख
मुगल चित्रशाला में सुलेखक, चित्रकार, सोने का काम करने वाले और जिल्दसाज़ होते थे, और हर मुगल उत्तराधिकारी ने सुलेखन की प्रतिष्ठा बढ़ाई। नस्तालीक़ (Nastaliq) मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त फ़ारसी लिपि की सुलेख शैली है; इसका नाम "नस्ख़-ए-तालीक़", अर्थात् लटकती हुई नस्ख़, का संक्षिप्त रूप है। यह तेरहवीं शताब्दी से ईरान में विकसित होने लगी और आज भी फ़ारसी और उर्दू के लिए प्रयुक्त होती है।
सुलेखन इमारतों का भी हिस्सा था। बुलंद दरवाज़े के ऊपरी भाग पर नस्ख़ शैली में कुरान की आयतें हैं, जिन्हें शेख सलीम चिश्ती के शिष्य ख़्वाजा हुसैन चिश्ती ने लिखा। इसकी मेहराब पर फ़ारसी अभिलेख में ईसा से जोड़े गए शब्द हैं: "दुनिया एक पुल है, इसे पार करो, पर इस पर घर मत बनाओ।" शीराज़ के सुलेखक अब्दुल हक़, जिन्हें बाद में अमानत ख़ान की उपाधि मिली, ने अकबर के मकबरे का प्रशस्ति-लेख और ताजमहल के अभिलेख लिखे, जहाँ अक्षर सफ़ेद संगमरमर में जड़े जैस्पर के हैं।
अकबर के दरबार में संगीत: तानसेन और ध्रुपद
मुगल दरबार में संगीत को सम्मानित स्थान मिला, और इसके सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति तानसेन हैं। ग्वालियर के एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में जन्मे तानसेन ने अपना जीवन ग्वालियर के दरबार से शुरू किया, जहाँ के शासक ने उन्हें "तानसेन" की उपाधि दी, और अधिकांश जीवन रीवा के राजा रामचंद्र सिंह के दरबार में बिताया। 1562 में, लगभग साठ वर्ष की आयु में, वे अकबर के दरबार में आए, उसके नवरत्नों में गिने गए और अकबर से "मियाँ" की सम्मानसूचक उपाधि पाई।
- शैली: ध्रुपद शैली की रचनाएँ, जिनमें से अनेक पुराणों पर आधारित और ब्रजभाषा में हैं, गणेश, सरस्वती, सूर्य, शिव और विष्णु की स्तुति में।
- संरक्षक: उन्होंने राजाओं और अकबर की प्रशंसा में भी गीत रचे।
- राग: उन्होंने कई नए रागों की रचना की; राग मेघ मल्हार और राग दीपक से उनकी किंवदंतियाँ जुड़ी हैं।
- विरासत: उत्तर भारत के अनेक घराने उन्हें अपनी परंपरा का संस्थापक मानते हैं; वे ग्वालियर में अपने सूफ़ी गुरु शेख मुहम्मद ग़ौस के मकबरा-परिसर में दफ़न हैं, जहाँ हर दिसंबर तानसेन समारोह होता है।
फ़तेहपुर सीकरी में दीवान-ए-आम के पास अनूप तालाब, जिसके बीच के चबूतरे तक चार पुल जाते हैं, बादशाह के सामने उनके गायन से जोड़ा जाता है।
भारतीय संस्कृति और धरोहर के लिए मुगल कला का महत्त्व
मुगल कला की विरासत: समन्वय, विश्व धरोहर और प्रभाव
मुगल कला इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह एक मिली-जुली संस्कृति को काम करते हुए दिखाती है। इसकी इमारतों और चित्रों में फ़ारसी, मध्य एशियाई, इस्लामी और भारतीय रूप इतने घुले-मिले हैं कि एक ही द्वार या एक ही पन्ने में सब दिखते हैं, और इसके संरक्षकों ने हिंदू और मुस्लिम कलाकारों, राजपूत महलों और फ़ारसी उस्तादों, सबसे सीखा।
- विश्व धरोहर: आगरा का किला और ताजमहल (1983), फ़तेहपुर सीकरी (1986), हुमायूँ का मकबरा (1993) और लाल किला परिसर (2007)।
- स्थापत्य पर प्रभाव: राजपूत और सिख महलों, लखनऊ की नवाबी इमारतों और अंग्रेज़ी काल की इंडो-सारसेनिक शैली ने मुगल गुंबद, मेहराब और छतरियाँ अपनाईं।
- चित्रकला पर प्रभाव: राजस्थानी और पहाड़ी शैलियों ने मुगल चित्रकला से बहुत कुछ लिया, और इसकी स्वाभाविकता तथा छवि चित्रण ने दो सदियों तक भारतीय चित्रकला को आकार दिया।
मुगल स्मारकों का संरक्षण: प्रदूषण, जीर्णोद्धार और ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन
मुगल स्मारकों ने युद्ध, उपेक्षा और पिछली आधी सदी में प्रदूषण झेला है। क्षति जल्दी शुरू हुई: 1688 में जाट विद्रोहियों ने सिकंदरा में अकबर का मकबरा लूटा, अंग्रेज़ी शासन में आगरा के किले के भीतर अकबर की अधिकांश इमारतें बैरकें बनाने के लिए गिरा दी गईं, और एतमादुद्दौला के बाग की मुगल ढंग की बागवानी की जगह अंग्रेज़ी लॉन आ गए। बीसवीं सदी के अंत से आगरा और मथुरा के उद्योगों से उठे प्रदूषण और अम्लीय वर्षा ने स्वयं ताजमहल को पीला-भूरा कर दिया है।
- औपनिवेशिक मरम्मत: वायसराय कर्ज़न ने 1905 तक अकबर के मकबरे की मरम्मत करवाई और 1903 से 1909 के बीच हुमायूँ के मकबरे के बाग पुनर्स्थापित करवाए; साथ ही 1904 का प्राचीन स्मारक परिरक्षण अधिनियम आया।
- न्यायालय का संरक्षण: एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (30 दिसंबर 1996) में सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह तथ्य आया कि मथुरा रिफ़ाइनरी और आगरा के आसपास के ढलाईघरों तथा रासायनिक उद्योगों से निकली सल्फ़र डाइऑक्साइड अम्लीय वर्षा बनकर संगमरमर को गला रही थी। न्यायालय ने ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन के उद्योगों को कोक और कोयले की जगह प्राकृतिक गैस अपनाने या वहाँ से हटने का आदेश दिया, एहतियाती सिद्धांत और सतत विकास के आधार पर; यह ज़ोन स्मारक के चारों ओर लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर में है।
- निरंतर निगरानी: न्यायालय अब भी इस ज़ोन की निगरानी करता है; सितंबर 2024 में उसने राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) से इस ज़ोन के लिए “गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों” की परिभाषा तय करने को कहा, और प्रतिपूरक वनीकरण शुरू होने तक पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी।
- जीर्णोद्धार की साझेदारी: 1993 में हुमायूँ के मकबरे के विश्व धरोहर बनने के बाद आग़ा ख़ान ट्रस्ट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उसका जीर्णोद्धार शुरू किया; 2010 के दशक में सर्वेक्षण और वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फ़ंड ने एतमादुद्दौला का ऐतिहासिक चारबाग पुनर्स्थापित किया।
न्यायालय का तर्क बताता है कि धरोहर को सक्रिय देखभाल क्यों चाहिए: उसने कहा कि ताज केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, अपने आप में एक उद्योग है, जिसे 1990 के दशक में हर वर्ष बीस लाख से अधिक पर्यटक देखने आते थे, और विकास तथा पारिस्थितिकी साथ चलने चाहिए। विकास और स्मारक की रक्षा के बीच यही संतुलन भारत की कला धरोहर के संरक्षण की हर बहस में दिखता है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2018भारत के सांस्कृतिक इतिहास के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- फतेहपुर सीकरी स्थित बुलंद दरवाजा तथा खानकाह के निर्माण में सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग हुआ था।
- लखनऊ स्थित बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाजा के निर्माण में लाल-बलुआ पत्थर और संगमरमर का प्रयोग हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1। बुलंद दरवाज़ा लाल और पीले-भूरे बलुआ पत्थर का है, सफ़ेद और काला संगमरमर केवल जड़ाई में है; यह सफ़ेद संगमरमर की इमारत नहीं, इसलिए कथन गलत है। चरण 2: कथन 2। लखनऊ का रूमी दरवाज़ा (1784) पतली पकी ईंटों (लखौरी) और चूने के गारे से बना है, और यूपीएससी का उत्तर लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर वाले कथन को गलत मानता है। चरण 3: कोई भी कथन सही नहीं है।
इस भ्रम से बचें: सफ़ेद संगमरमर का सलीम चिश्ती का मकबरा बुलंद दरवाज़े के ही आँगन में है; उसकी सामग्री द्वार पर न लगाएँ।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। बुलंद दरवाज़ा लाल और पीले-भूरे बलुआ पत्थर का है; संगमरमर केवल जड़ाई में है।
- (b) केवल 2: गलत। लखनऊ की नवाबी इमारतें ईंट और चूने की हैं, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर की नहीं।
- (c) 1 और 2 दोनों: गलत। दोनों में से कोई भी सामग्री वाला कथन सही नहीं है।
- (d) न तो 1, न ही 2: सही। फ़तेहपुर सीकरी में बलुआ पत्थर, लखनऊ में ईंट और चूना।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: कोई भी कथन सही नहीं है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019इनमें से किस मुग़ल सम्राट ने सचित्र पांडुलिपियों से ध्यान हटाकर चित्राधार (एलबम) और वैयक्तिक रूपचित्रों पर अधिक जोर दिया?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: अकबर के समय चित्रशाला टोलियों से सचित्र पांडुलिपियाँ बनाती थी: हम्ज़ानामा, रज़मनामा, अकबरनामा। चरण 2: जहाँगीर एक उस्ताद की एकल कृतियाँ चाहता था, जो एल्बम (मुरक्का) में लगती थीं, और छवि चित्र तथा प्रकृति के अध्ययन। चरण 3: यह बदलाव जहाँगीर का है।
इस भ्रम से बचें: शाहजहाँ के समय भी छवि चित्र बने, पर सचित्र पांडुलिपि से एल्बम की ओर बदलाव जहाँगीर के समय शुरू हुआ।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हुमायूँ: गलत। उसने चित्रशाला की नींव रखी और मीर सैयद अली तथा अब्दुस्समद को बुलाया; हम्ज़ानामा उसके समय शुरू हुआ।
- (b) अकबर: गलत। उसकी चित्रशाला टोलियों द्वारा बनी बड़ी सचित्र पांडुलिपियों का युग थी।
- (c) जहाँगीर: सही। उसने एकल चित्रों के एल्बम और व्यक्तिगत छवि चित्रों को प्राथमिकता दी।
- (d) शाहजहाँ: गलत। उसके समय चित्रकला आदर्शीकृत और शैलीबद्ध हुई; एल्बम तब तक स्थापित हो चुका था।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर किसके शासनकाल में पहुँची?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: हुमायूँ ने शैली शुरू की और अकबर ने बड़ी चित्रशाला बनाई। चरण 2: जहाँगीर के समय मुगल शैली छवि चित्रों और उस्ताद मंसूर के प्रकृति-अध्ययनों में सबसे अधिक स्वाभाविक हुई। चरण 3: शाहजहाँ के समय चित्रकला अधिक शैलीबद्ध हुई। चरम जहाँगीर का काल है।
इस भ्रम से बचें: स्थापत्य के चरम (शाहजहाँ) और चित्रकला के चरम (जहाँगीर) में भ्रम न करें।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हुमायूँ: गलत। उसके समय दो फ़ारसी उस्तादों के साथ शैली केवल शुरू हुई।
- (b) अकबर: गलत। उसने शैली को औपचारिक रूप दिया; जहाँगीर उसे नई ऊँचाइयों पर ले गया।
- (c) जहाँगीर: सही। छवि चित्र, एल्बम और प्रकृति के अध्ययन अपने सर्वोत्तम रूप में पहुँचे।
- (d) शाहजहाँ: गलत। उसके समय चित्रकला नहीं, स्थापत्य अपने शिखर पर पहुँचा।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)मुगल चित्रकला शैली भारतीय लघु चित्रकला की विभिन्न शैलियों की रीढ़ बनी। निम्नलिखित में से कौन-सी चित्रकला शैली मुगल चित्रकला से प्रभावित नहीं हुई?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: मुगल चित्रकला राजपूत और पहाड़ी दरबारों तक फैली। चरण 2: बीकानेर और आमेर की राजस्थानी चित्रकला तथा कांगड़ा समेत पहाड़ी शैलियों ने मुगल लालित्य और स्वाभाविकता अपनाई। चरण 3: कालीघाट चित्रकला कोलकाता में कालीघाट मंदिर के पट-चित्रकारों की उन्नीसवीं शताब्दी की परंपरा है, इसलिए यही अप्रभावित शैली है।
इस भ्रम से बचें: कांगड़ा एक पहाड़ी शैली है; यदि पहाड़ी प्रभावित है, तो कांगड़ा उत्तर नहीं हो सकता।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) पहाड़ी: गलत। पहाड़ी राज्यों तक पहुँचे मुगल चित्रों ने पहाड़ी शैलियाँ बदलीं।
- (b) राजस्थानी: गलत। बीकानेर और आमेर ने मुगल लालित्य और रुचि अपनाई।
- (c) कांगड़ा: गलत। कांगड़ा एक पहाड़ी शैली है, जिसे मुगल चित्रों की स्वाभाविकता ने आकार दिया।
- (d) कालीघाट: सही। कालीघाट चित्रकला उन्नीसवीं शताब्दी में कोलकाता के पट-चित्रकारों से विकसित हुई।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: कालीघाट।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)नस्तालीक़ था
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: नस्तालीक़ "नस्ख़-ए-तालीक़", अर्थात् लटकती नस्ख़, का संक्षिप्त रूप है। चरण 2: यह मुगलों की दरबारी भाषा फ़ारसी की मुख्य सुलेख शैली है। चरण 3: यह एक लिपि-शैली है।
इस भ्रम से बचें: विकल्पों में एक लिपि के साथ राग, कर और आचार-संहिता रखे गए हैं; केवल पहला लेखन का रूप है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त एक फ़ारसी लिपि: सही। नस्तालीक़ फ़ारसी लिपि की लटकती सुलेख शैली है।
- (b) तानसेन द्वारा रचित एक राग: गलत। तानसेन की किंवदंतियाँ मेघ मल्हार और दीपक जैसे रागों से जुड़ी हैं।
- (c) मुगल शासकों द्वारा लगाया गया एक उपकर: गलत। नस्तालीक़ सुलेखन है, कर नहीं।
- (d) उलेमाओं के लिए आचार-संहिता की एक पुस्तिका: गलत। यह लेखन की शैली है, कोई ग्रंथ नहीं।
उत्तर: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर: मध्यकालीन भारत में प्रयुक्त एक फ़ारसी लिपि।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019मियाँ तानसेन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: "तानसेन" की उपाधि अकबर के दरबार में आने से पहले ग्वालियर के शासक ने दी थी; अकबर ने "मियाँ" की उपाधि दी। इसलिए कथन (a) सही नहीं है। चरण 2: (b), (c) और (d) सही हैं: उन्होंने गणेश, शिव, विष्णु और अन्य देवताओं पर ध्रुपद, अपने संरक्षकों की प्रशंसा में गीत और कई नए राग रचे।
इस भ्रम से बचें: मियाँ तानसेन एक नाम में दो संरक्षकों की दो उपाधियाँ हैं; प्रश्न परखता है कि अकबर से कौन-सी मिली।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) सम्राट अकबर द्वारा इन्हें दी गई उपाधि तानसेन थी: सही नहीं, इसलिए यही उत्तर है। "तानसेन" की उपाधि ग्वालियर के शासक ने दी; अकबर ने "मियाँ" दी।
- (b) तानसेन ने हिन्दू देवी-देवताओं से संबंधित ध्रुपदों की रचना की: सही। उनके ध्रुपद गणेश, सरस्वती, सूर्य, शिव और विष्णु की स्तुति में हैं।
- (c) तानसेन ने अपने संरक्षकों से संबंधित गानों की रचना की: सही। उन्होंने राजाओं और अकबर की प्रशंसा में गीत रचे।
- (d) तानसेन ने अनेक रागों की मौलिक रचना की: सही। उन्हें कई नए रागों का रचयिता माना जाता है।
उत्तर: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर: "तानसेन" की उपाधि अकबर से नहीं मिली।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-Iभारतीय कला विरासत का संरक्षण वर्तमान समय की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भारत की कला धरोहर को उसकी मिली-जुली संस्कृति का जीवित अभिलेख बताएँ, और मुगल स्मारकों को, जिनमें से पाँच भारत में विश्व धरोहर स्थल हैं, दाँव पर लगी विरासत के उदाहरण के रूप में रखें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- क्यों महत्त्वपूर्ण: पहचान और मिली-जुली संस्कृति (फ़तेहपुर सीकरी और ताजमहल में फ़ारसी और भारतीय रूपों का मेल); पर्यटन और आजीविका (न्यायालय ने ताज को अपने आप में एक उद्योग कहा)।
- खतरे: प्रदूषण और अम्लीय वर्षा (ताज का पीला-भूरा होना; मथुरा रिफ़ाइनरी, ढलाईघर और रासायनिक उद्योग); पुरानी लूट और बदलाव (1688 में अकबर का मकबरा; आगरा के किले में बैरकें; एतमादुद्दौला में अंग्रेज़ी लॉन); स्मारकों के आसपास विकास का दबाव।
- उपाय: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का संरक्षण; 1904 का प्राचीन स्मारक परिरक्षण अधिनियम; विश्व धरोहर सूची; ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन (1996) और न्यायालय की निरंतर निगरानी; आग़ा ख़ान ट्रस्ट और वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फ़ंड के साथ जीर्णोद्धार।
- आगे की राह: ऐसा विकास जो पारिस्थितिकी के साथ चले (न्यायालय की कसौटी), स्मारकों के पास उद्योगों के लिए स्वच्छ ईंधन, जीर्णोद्धार की साझेदारी और न्यायालय तथा सर्वेक्षण की सतत निगरानी।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि कला धरोहर की रक्षा इसलिए तात्कालिक है कि प्रदूषण और विकास का दबाव स्मारकों को समय से अधिक तेज़ी से क्षति पहुँचाते हैं, और ताज का मामला दिखाता है कि संरक्षण और विकास साथ चल सकते हैं।
स्रोत
- NCERT: भारतीय कला का परिचय, भाग 1 (कक्षा 11), इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के कुछ कलात्मक पहलू
- NCERT: भारतीय कला का परिचय, भाग 2 (कक्षा 12), मुगलकालीन लघु चित्रकला
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part I (Class XI), Some Aspects of Indo-Islamic Architecture
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part II (Class XII), The Mughal School of Miniature Painting
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part II (Class XII), The Rajasthani and the Pahari Schools of Painting
- NCERT: Our Pasts II (Class VII), Rulers and Buildings
- Archaeological Survey of India: Humayun's Tomb, Delhi (World Heritage)
- Archaeological Survey of India: Agra Fort (World Heritage)
- Archaeological Survey of India: Fatehpur Sikri (World Heritage)
- Archaeological Survey of India: Taj Mahal, Agra (World Heritage)
- Archaeological Survey of India: Red Fort Complex and Jama Masjid, Delhi (World Heritage)
- Supreme Court of India: M.C. Mehta v. Union of India and Ors., judgment of 30 December 1996 (Taj Trapezium)
- The Hindu (Delhi), 20 July 2026: the legal tussle surrounding the Taj Mahal
- Supreme Court of India: M.C. Mehta v. Union of India, In re Taj Trapezium Zone, record of proceedings, 6 September 2024
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- Wikipedia: Kalighat painting
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
इमारतों की तिथियाँ NCERT और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार हैं; जहाँ वे भिन्न हैं, वहाँ पृष्ठ यह बताता है। यह लेख इस पृष्ठ पर दिए गए स्रोतों पर आधारित है।
