परिचय
जहाँगीर (1569 से 1627), जिनका जन्म का नाम शहज़ादा सलीम था, चौथे मुग़ल सम्राट थे और 1605 से 1627 तक शासन किया। उनका शासन न्याय की ज़ंजीर, साम्राज्ञी नूरजहाँ की शक्ति, मेवाड़ की अधीनता और कंधार के हाथ से जाने, अंग्रेज़ों की पहली कोठियों और मुग़ल चित्रकला के चरम के लिए याद किया जाता है।
जहाँगीर: शहज़ादा सलीम का आरंभिक जीवन और राज्यारोहण
जहाँगीर का आरंभिक जीवन: पिता, माता और शहज़ादा सलीम की शिक्षा
सलीम का जन्म 31 अगस्त 1569 को फ़तेहपुर सीकरी में हुआ। उनकी माता मरियम-उज़-ज़मानी आमेर के राजपूत शासक की पुत्री, कछवाहा राजकुमारी थीं। दो बड़े भाई बचपन में ही चल बसे थे, इसलिए अकबर ने पुत्र के लिए सीकरी के सूफ़ी संत शेख़ सलीम चिश्ती का आशीर्वाद माँगा था; बालक का नाम इन्हीं संत के नाम पर रखा गया।
पाँच वर्ष की आयु में उनकी शिक्षा शुरू हुई। शिक्षकों ने उन्हें फ़ारसी, अरबी, तुर्की, हिंदी, अंकगणित, इतिहास, भूगोल और विज्ञान पढ़ाए, और अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ भी उनके शिक्षकों में थे। वे फ़ारसी और हिंदुस्तानी धाराप्रवाह बोलते थे।
- ओरछा, 1594: अकबर ने शहज़ादे को विद्रोही बुंदेला सरदार वीर सिंह देव के विरुद्ध भेजा, और उसने उसे अधीन किया; बाद में ओरछा का जहाँगीर महल उन्हीं के सम्मान में बना।
- विवाह: उनकी पहली पत्नी आमेर की कछवाहा राजकुमारी थीं, जो ख़ुसरो की माता बनीं; मारवाड़ की राठौर राजकुमारी जगत गोसाईं शाहजहाँ की माता थीं।
अकबर के विरुद्ध शहज़ादा सलीम का विद्रोह और 1605 में राज्यारोहण
शहज़ादे ने गद्दी के लिए चुपचाप प्रतीक्षा नहीं की। 1599 में, जब अकबर दक्कन के अभियानों में थे, सलीम ने इलाहाबाद में स्वयं को सम्राट घोषित किया, अपने नाम के सिक्के चलाए और अलग दरबार लगाया। अकबर ने दंड के बजाय सुलह का रास्ता चुना, और 1604 तक पिता-पुत्र में फिर से मेल हो गया।
अक्टूबर 1605 में अकबर की मृत्यु हुई, और आठ दिन बाद, 3 नवंबर 1605 को, सलीम गद्दी पर बैठे और जहाँगीर की उपाधि ली, अर्थात् विश्व-विजेता। मुग़ल सम्राट ऐसी उपाधियाँ अपना दावा जताने के लिए चुनते थे: शाहजहाँ का अर्थ है दुनिया का बादशाह, और दरबारी इतिहासकार इन उपाधियों से सम्राट की निर्विवाद सत्ता पर ज़ोर देते थे।
1606 में ख़ुसरो का विद्रोह और गुरु अर्जन देव को मृत्युदंड
नया शासन सम्राट के सबसे बड़े पुत्र के विद्रोह से शुरू हुआ। अप्रैल 1606 में ख़ुसरो ने अकबर की इच्छा के आधार पर गद्दी का दावा करते हुए आगरा छोड़ा और लाहौर को घेर लिया। जहाँगीर ने नगर को घेरे से छुड़ाया, भैरोवाल में उसे हराया, और चिनाब पार करते समय शहज़ादा पकड़ा गया। बाद के एक षड्यंत्र के बाद उसे अंधा कर क़ैद रखा गया; 1622 में बुरहानपुर में उसकी मृत्यु हुई, भाई ख़ुर्रम के आदेश पर उसे मारा गया।
इस विद्रोह में सिख गुरु भी घसीटे गए। जहाँगीर ने पाँचवें सिख गुरु और आदि ग्रंथ के संकलनकर्ता गुरु अर्जन देव पर ख़ुसरो का साथ देने का आरोप लगाया और 1606 में उन्हें मृत्युदंड दिया। रामदासपुर में हरमंदर साहिब के चारों ओर बढ़ते सिख समुदाय को जहाँगीर पहले से ही संभावित ख़तरा मानता था; अगले गुरु, हरगोबिंद, कुछ समय ग्वालियर में क़ैद रहे और बाद में छोड़े गए।
जहाँगीर का प्रशासन: न्याय, धार्मिक नीति और संस्मरण
न्याय की ज़ंजीर और जहाँगीर के बारह आदेश
जहाँगीर सबसे बढ़कर एक न्यायप्रिय राजा के रूप में दिखना चाहता था। न्याय की ज़ंजीर घंटियों वाली सोने की ज़ंजीर थी: अपने संस्मरण में उसने लिखा कि राज्यारोहण के बाद उसका पहला आदेश इसे लगवाने का था, ताकि अधिकारियों से न्याय न पाने वाला कोई भी व्यक्ति इसे हिलाकर सम्राट का ध्यान खींच सके। उसने इसकी लंबाई 30 गज़ और घंटियाँ 60 बताईं।
- बारह आदेश: राज्यारोहण पर जारी; एक ने चावल की शराब और नशीले पदार्थों के बनाने और बेचने पर रोक लगाई, और दूसरे ने साम्राज्य के नगरों में चिकित्सकों सहित मुफ़्त अस्पताल खोले।
- झरोखा दर्शन: हर सुबह सम्राट पूर्व की ओर खुलने वाले छज्जे पर आता, जहाँ सैनिक, व्यापारी, शिल्पकार, किसान और बीमार बच्चों वाली स्त्रियाँ उसके दर्शन के लिए प्रतीक्षा करते; यह प्रथा अकबर के समय शुरू हुई थी।
- तंबाकू पर रोक: 1604 के बाद धूम्रपान तेज़ी से फैला, और जहाँगीर ने इस पर रोक लगाई; रोक बेअसर रही, और सदी के अंत तक तंबाकू पूरे भारत में उगाया और बेचा जाने लगा।
दरबारी चित्रकला ने इस विचार को चित्र का रूप दिया। अबुल हसन के एक चित्र में जहाँगीर निर्धनता की आकृति पर तीर चला रहा है और न्याय की ज़ंजीर आकाश से उतर रही है; चित्रकार ने निशाने को काले बादल में लपेटा है, यह दिखाने के लिए कि वह किसी विचार का प्रतीक है; इस शैली को रूपक (allegory) कहते हैं।
जहाँगीर की धार्मिक नीति: सुलह-ए-कुल और उसकी सीमाएँ
जहाँगीर ने अपने पिता का सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति) का सिद्धांत बनाए रखा, जो प्रजा को धर्म से नहीं, ईमानदारी, न्याय और शांति की साझा नैतिकता से परखता था। उसने अकबर की इस नीति का वर्णन अपने शब्दों में किया, और शाहजहाँ ने भी इसी सिद्धांत का पालन किया।
- संरक्षण: वृंदावन में चैतन्य संप्रदाय के मंदिरों को अनुदान, और हिंदुओं के लिए अलग क़ाज़ी, कश्मीर के श्रीकांत, ताकि उनका अपना न्यायिक अधिकारी हो।
- प्रतिबंध: अकबर की तरह गोवध पर, और सप्ताह के कुछ दिनों में पशु-वध पर रोक।
- रूढ़िवादी दबाव: शेख़ अहमद सरहिंदी के निकट के अमीरों ने अकबर की नीति के कुछ अंश पलटने का दबाव डाला, और कांगड़ा की विजय पर इस्लामी रस्में की गईं।
रिकॉर्ड मिला-जुला है, और उसका संस्मरण निष्पक्ष गवाह नहीं है। गुरु अर्जन देव का मृत्युदंड और जैन मुनियों के विरुद्ध एक आदेश, जो जल्द वापस ले लिया गया, मंदिरों को अनुदान और जैन आचार्यों से अच्छे संबंधों के साथ-साथ दिखते हैं। इतिहासकार एम. अतहर अली के अनुसार जहाँगीर ने फ़ारसी पढ़ने वाले मुसलमान पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा और तथ्यों को ढाला; उनके मत में जहाँगीर ने कुल मिलाकर अपने पिता की धार्मिक नीति ही जारी रखी।
तुज़ुक-ए-जहाँगीरी: जहाँगीर का संस्मरण, जहाँगीरनामा
अपने परदादा बाबर की तरह जहाँगीर ने भी अपना संस्मरण स्वयं लिखा। तुज़ुक-ए-जहाँगीरी, जिसे जहाँगीरनामा भी कहते हैं, फ़ारसी में है और 1605 से उसके शासन का वर्णन करता है; उसने इसे 1622 तक लिखा, जिसके बाद मुतमिद ख़ाँ और फिर मुहम्मद हादी ने इसे उसकी मृत्यु (1627) तक आगे बढ़ाया।
- प्रकृति का वर्णन: पक्षियों, पशुओं और पौधों के लंबे विवरण, साथ में बनवाए गए चित्र; 1619 में ईरान के शासक द्वारा भेजे गए बाज़ का चित्र उस्ताद मंसूर ने बनाया।
- अर्थव्यवस्था: जैसे बंजारों का बैलों पर अनाज लादकर नगरों में बेचना।
- दरबार और परिवार: शहज़ादा ख़ुर्रम को बहुमूल्य धातुओं से तौलने जैसे समारोह, जश्न-ए-वज़्न या तुलादान।
- प्रयोग: मुर्ग़ी की टूटी हड्डी पर बिटुमेन आज़माया, और अहमदाबाद तथा महमूदाबाद की हवा की तुलना की।
यह संस्मरण फ़ारसी लेखन की एक बड़ी परंपरा का हिस्सा है। अकबर ने फ़ारसी को दरबार की प्रमुख भाषा बनाया, और यह हर स्तर पर प्रशासन की भाषा बनी; मुग़ल इतिहास-ग्रंथ, अकबरनामा, जहाँगीरनामा और बादशाहनामा, इसी भाषा में दरबारियों ने लिखे, जिनका केंद्र सम्राट, उसका परिवार, दरबार, युद्ध और प्रशासन था। सावधानी से पढ़ें, तो ये ग्रंथ उस युग का बोध कराते हैं: न्यायप्रिय राजा का आदर्श, दरबार का शिष्टाचार, प्रकृति के प्रति जिज्ञासा और सुलह-ए-कुल की नीति।
नूरजहाँ: जहाँगीर की पत्नी और गद्दी के पीछे की शक्ति
नूरजहाँ का आरंभिक जीवन: मेहरुन्निसा से पादशाह बेगम तक
नूरजहाँ का जन्म मेहरुन्निसा के रूप में 1577 में कंधार में हुआ, जब उनका परिवार अकबर की सेवा पाने के लिए ईरान से भारत आ रहा था। उनके पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग मुग़ल सेवा में आगे बढ़े और उन्हें एत्मादुद्दौला (राज्य का स्तंभ) की उपाधि मिली; नूरजहाँ ने अरबी और फ़ारसी, साहित्य, कला और संगीत की शिक्षा पाई।
- पहला विवाह, 1594: अली क़ुली इस्तजलू से, एक ईरानी अधिकारी जिसे शेर अफ़गन की उपाधि मिली; उनकी पुत्री लाडली बेगम का जन्म 1605 में हुआ। 1607 में बंगाल के सूबेदार से टकराव में शेर अफ़गन मारा गया।
- जहाँगीर से विवाह, 1611: चार वर्ष दरबार में रुक़ैया सुल्तान बेगम की सहचरी रहने के बाद 25 मई 1611 को उन्होंने जहाँगीर से विवाह किया; वे उसकी अंतिम पत्नी थीं।
- उपाधियाँ: पहले नूर महल (महल का प्रकाश), फिर नूरजहाँ (विश्व का प्रकाश); 1620 से उन्हें पादशाह बेगम, अर्थात् मुख्य रानी, का पद मिला।
नूरजहाँ की शक्ति: सिक्के, फ़रमान और नूरजहाँ गुट
किसी भी मुग़ल साम्राज्ञी के पास, न पहले न बाद में, इतनी शक्ति रही। जहाँगीर ने चाँदी के ऐसे सिक्के चलाए जिनके एक ओर उसकी अपनी उपाधियाँ थीं और दूसरी ओर लिखा था कि ये मलिका बेगम नूरजहाँ के नाम पर ढाले गए; नूरजहाँ अपने फ़रमान (शाही आदेश) भी जारी करती थीं, जिन पर उनकी मुहर में उन्हें नूरजहाँ पादशाह बेगम कहा गया। जहाँगीर का स्वास्थ्य गिरने के साथ राज्य के कई मामले वे स्वयं तय करने लगीं।
उनका परिवार उनके साथ ऊपर उठा। उनके पिता प्रधानमंत्री बने और भाई आसफ़ ख़ाँ बड़े वज़ीर, और इतिहासकार ऊँचे पदों पर बैठे इन संबंधियों के समूह को नूरजहाँ गुट (junta) कहते हैं। जहाँगीर के काल में ईरानियों को ऊँचे पद मिले, और नूरजहाँ के बाद मुग़ल रानियाँ और शहज़ादियाँ अपने बड़े आर्थिक संसाधन रखने लगीं।
इसी परिवार ने उत्तराधिकार को जोड़ा भी और बाँटा भी। आसफ़ ख़ाँ की पुत्री मुमताज़ महल का विवाह 1612 में शहज़ादा ख़ुर्रम से हुआ, और 1621 में नूरजहाँ ने अपनी पुत्री लाडली बेगम का विवाह सबसे छोटे शहज़ादे शहरयार से किया। दोनों विवाहों ने उनके परिवार को दोनों प्रतिद्वंद्वी शहज़ादों से जोड़ दिया, और 1627 में भाई-बहन ने अलग-अलग दामादों का साथ दिया।
नूरजहाँ का संरक्षण: एत्मादुद्दौला का मकबरा और उनकी इमारतें
नूरजहाँ ने बड़े पैमाने पर निर्माण कराया। 1622 में पिता की मृत्यु पर उन्होंने आगरा में यमुना के पूर्वी तट पर पिता और माता के लिए मकबरा बनवाया, जो 1628 में पूरा हुआ; डच व्यापारी पेल्सर्ट ने लिखा कि वे हर दिशा में यात्रियों के लिए सराय, बाग़ और महल बनवाती थीं।
- एत्मादुद्दौला का मकबरा: लाल बलुआ पत्थर के बजाय सफ़ेद संगमरमर में बनी पहली मुग़ल इमारतों में से एक, जालियों और पित्रा दूरा (pietra dura) के साथ, अर्थात् संगमरमर में जड़े गोमेद (कार्नेलियन), सूर्यकांत (जैस्पर), लाजवर्द, सुलेमानी पत्थर (ओनिक्स) और पुखराज; यह भारत में इस तकनीक के आरंभिक सच्चे उदाहरणों में है और इसे बेबी ताज कहते हैं।
- शैली में मोड़: यह हुमायूँ और अकबर के मकबरों के लाल बलुआ पत्थर से ताजमहल के सफ़ेद संगमरमर और जड़ाऊ काम की ओर बदलाव का चिह्न है।
- अन्य निर्माण: श्रीनगर की पत्थर मस्जिद, जालंधर ज़िले में एक बड़ी सराय (1620), और लाहौर के पास शाहदरा में उनका अपना मकबरा।
जहाँगीर की मृत्यु के बाद वे शाहजहाँ से मिलने वाले भत्ते पर अपनी विधवा पुत्री के साथ लाहौर में चुपचाप रहीं और 1645 में उनकी मृत्यु हुई। उन्हें लाहौर के पास शाहदरा में उनके अपने बनवाए मकबरे में दफ़नाया गया, और पास ही उनके भाई आसफ़ ख़ाँ का मकबरा है।
जहाँगीर के युद्ध, सीमाएँ और विद्रोह
जहाँगीर के अभियान: 1615 में मेवाड़ की अधीनता, बंगाल और कांगड़ा
जहाँगीर ने मेवाड़ के सिसोदिया घराने से सौ वर्ष पुराना संघर्ष समाप्त किया। महाराणा प्रताप के पुत्र राणा अमर सिंह ने पहाड़ों से अपने पिता का प्रतिरोध जारी रखा, और 1606 तथा 1608 में भेजी गई सेनाएँ आगे नहीं बढ़ सकीं। 1613 में जहाँगीर स्वयं राजपूताना आया, और शहज़ादा ख़ुर्रम ने अभियान तब तक चलाया जब तक 1614 में मेवाड़ के भीतर मुग़ल चौकियाँ नहीं बन गईं।
1615 में अमर सिंह ख़ुर्रम से मिलने को राज़ी हुए, और सिसोदिया शासक ने मुग़ल सेवा स्वीकार की। इस समझौते से सबसे लंबा प्रतिरोध करने वाला राजपूत घराना मुग़ल सेवा में आया। दूसरे राजपूत घरानों की तरह शर्तें उदार थीं: शासकों ने मुग़ल सर्वोच्चता मानी, पर अपने प्रदेश रखे और अभिजात वर्ग में ऊँचे पद पाए।
जहाँगीर के दूसरे अभियानों ने नए सूबे जोड़ने के बजाय साम्राज्य के किनारे भरे। अकबर के शुरू किए अभियान चलते रहे, जबकि सिखों, अहोमों और अहमदनगर के विरुद्ध अभियान कम सफल रहे।
- बंगाल: 1608 से इस्लाम ख़ाँ ने बारो-भुइयाँ सरदारों के नेता मूसा ख़ाँ को दबाया, और कूचबिहार के राजा ने मुग़ल अधिराज्य माना।
- कांगड़ा: पहाड़ी किले को घेरकर 1620 में जीता गया, और चंबा के राजा ने अधीनता मानी; उसी वर्ष कश्मीर में किश्तवाड़ जीता गया।
- अहोम: असम के अहोम राज्य के विरुद्ध अभियान आगे नहीं बढ़ सके।
जहाँगीर की दक्कन नीति: अहमदनगर और मलिक अंबर
दक्कन में जहाँगीर ने अकबर के अभियान जारी रखे, पर कम सफलता के साथ। इथियोपिया में जन्मे और दास के रूप में बेचे गए मलिक अंबर अहमदनगर के पेशवा, अर्थात् मुख्यमंत्री, और 1600 से 1626 में अपनी मृत्यु तक उसके वास्तविक शासक बने। 1610 तक उनकी सेना में 10,000 हब्शी और 40,000 दक्कनी थे, और छापामार युद्ध से उन्होंने एक दशक तक राज्य पर मुग़लों के प्रयास विफल किए।
- मलिक अंबर का काम: दक्कन के बड़े भाग का राजस्व-बंदोबस्त, जिस पर बाद के बंदोबस्त आधारित रहे, और उस नगर की स्थापना जो बाद में औरंगाबाद कहलाया।
- दक्कन में ख़ुर्रम: 1616 में जहाँगीर ने शहज़ादा ख़ुर्रम को अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा के विरुद्ध भेजा; वह सम्राट का प्रिय पुत्र था।
- जहाँगीर का क्रोध: संस्मरण मलिक अंबर का नाम कभी बिना अपशब्दों के नहीं लेता, और अबुल हसन ने जहाँगीर को मलिक अंबर के कटे सिर पर तीर चलाते चित्रित किया, जो दृश्य कभी घटा ही नहीं।
1622 में कंधार का हाथ से जाना: जहाँगीर और सफ़वी
कंधार का महत्त्व उसकी स्थिति में था। उत्तर भारत पर हर आक्रमणकारी को हिंदुकुश पार करना पड़ता था, इसलिए मुग़ल नीति रास्ते की सामरिक चौकियों, काबुल और कंधार, पर पकड़ रखना चाहती थी; यह क़िलेबंद नगर मुग़लों और ईरान के सफ़वियों के बीच विवाद की जड़ था, और अकबर ने इसे 1595 में फिर से जीता था।
जहाँगीर ने पहले कूटनीति आज़माई। 1613 में उसने मुग़ल पक्ष रखने के लिए शाह अब्बास के पास दूत भेजा, जो विफल रहा, और 1622 की सर्दियों में एक ईरानी सेना ने कंधार घेर लिया; तैयारी-विहीन मुग़ल रक्षक सेना ने क़िला और नगर सौंप दिए। शहज़ादा ख़ुर्रम को राहत के लिए कूच करने का आदेश मिला, पर उसने इनकार कर दिया और विद्रोह कर बैठा।
जहाँगीर के पुत्रों में संघर्ष: शाहजहाँ का विद्रोह और महाबत ख़ाँ का तख़्तापलट
शासन के अंतिम वर्ष उत्तराधिकार की लड़ाई से तय हुए। सम्राट के प्रिय ख़ुर्रम ने 1621 में लाडली बेगम के शहरयार से विवाह को इस बात का संकेत माना कि नूरजहाँ शहरयार को उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं; दूसरा पुत्र परवेज़ कमज़ोर और शराब का आदी था, इसलिए मुक़ाबला इन्हीं दोनों में था। 1622 में ख़ुर्रम ने विद्रोह किया, पहले अपने अंधे भाई ख़ुसरो को मरवाकर; सेनापति महाबत ख़ाँ ने उसे हराया, और 1625 में गृहयुद्ध समाप्त हुआ।
फिर विजेता ही ख़तरा बन गया। महाबत ख़ाँ की नई प्रतिष्ठा से सावधान नूरजहाँ ने उसे बंगाल भेजा और आरोपों का उत्तर देने के लिए बुलाया। 1626 में उसने पहले वार किया: राजपूत सैनिकों की टुकड़ी के साथ उसने झेलम के तट पर डेरे में सम्राट को बंदी बना लिया। नूरजहाँ ने पति को छुड़ाने का प्रयास किया, फिर उनके साथ बंदी बनीं और उनके भागने की व्यवस्था की, और तख़्तापलट जल्द ही विफल हो गया।
जहाँगीर और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी
विलियम हॉकिंस और मसुलीपट्टनम तथा सूरत की पहली अंग्रेज़ी कोठियाँ
अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी जहाँगीर के शासन में मुग़ल साम्राज्य पहुँची। कंपनी के जहाज़ 1608 में मुग़लों के प्रमुख बंदरगाह सूरत आए, और हेक्टर जहाज़ का कप्तान विलियम हॉकिंस आगे जहाँगीर के दरबार तक गया, जहाँ वह 1609 में पहुँचा।
- मसुलीपट्टनम, 1611: कंपनी ने आंध्र तट पर बस्ती बसाई, जो 1640 के बाद मद्रास की ओर जाने तक पूर्वी तट पर उसका मुख्य ठिकाना रही।
- स्वाली का युद्ध, 1612: कप्तान टॉमस बेस्ट के चार जहाज़ों ने सूरत के पास सुवाली के तट पर पुर्तगाली बेड़े को हराया; बातचीत के दौरान सूबेदार ने सम्राट की स्वीकृति की शर्त पर व्यापार के अधिकार दिए।
- सूरत, 1613: कंपनी ने मुग़ल अनुमति से सूरत में भारत में अपनी पहली स्थायी कोठी खोली।
यहाँ कोठी (factory) का अर्थ कारखाना नहीं, व्यापारिक चौकी है। इन समुद्रों में पहले से मौजूद पुर्तगालियों ने मुग़लों को उनसे सावधान कर दिया: 1613 में उन्होंने जहाँगीर की माता का बड़ा हज-जहाज़ रहीमी पकड़ लिया, और जहाँगीर ने दमन पर क़ब्ज़े और साम्राज्य में पुर्तगालियों की गिरफ़्तारी का आदेश दिया। डच भी अंग्रेज़ों के ठीक पीछे थे; 1618 में जहाँगीर ने गुजरात में डच कंपनी को मुग़ल बंदरगाहों पर व्यापार की अनुमति वाला फ़रमान दिया।
जहाँगीर के दरबार में टॉमस रो, 1615 से 1619
जहाँगीर के दरबार में इंग्लैंड का राजदूत सर टॉमस रो था, जिसे कंपनी के अनुरोध पर राजा जेम्स प्रथम ने भेजा। वह 1615 में आया और 1619 तक रहा, और उसकी डायरियाँ इस शासनकाल के सबसे अच्छे स्रोतों में हैं।
- शिष्टाचार: राजदूतों से झुककर या ज़मीन चूमकर अभिवादन की अपेक्षा थी; रो ने यूरोपीय ढंग से केवल सिर झुकाया और कुर्सी माँगकर दरबार को चौंका दिया।
- उपहार: उपहार सम्मान का चिह्न थे, और रो तब निराश हुआ जब आसफ़ ख़ाँ ने उसकी दी अँगूठी केवल 400 रुपये की होने के कारण लौटा दी।
- परिणाम: सूरत की कंपनी-कोठी के लिए अनुमति और संरक्षण, पर कोई बड़े व्यापारिक विशेषाधिकार नहीं।
- चित्रकारों की परीक्षा: जहाँगीर ने एक यूरोपीय लघुचित्र की कई नक़लें बनवाईं और रो को मूल पहचानने की चुनौती दी; रो नहीं पहचान सका।
जहाँगीर के काल में कला और स्थापत्य
जहाँगीर के काल में मुग़ल चित्रकला: रूपचित्र, चित्राधार और प्रकृति-चित्रण
मुग़ल चित्रकला जहाँगीर के काल में सबसे आगे बढ़ी, और उसका स्वरूप बदल गया। अकबर की चित्रशाला मुख्यतः सचित्र पुस्तकों पर काम करती थी, जिनमें एक पांडुलिपि पर कई चित्रकार मिलकर काम करते थे; जहाँगीर ने चित्राधार (एलबम) या मुरक़्क़ा में संकलित एकल चित्रों, वैयक्तिक रूपचित्रों, पक्षियों, पशुओं और फूलों के अध्ययन और अपने जीवन के दृश्यों को प्राथमिकता दी।
- उस्ताद मंसूर: प्रकृति-चित्रण के उस्ताद, जिन्हें नादिर-उल-अस्र (युग में अद्वितीय) की उपाधि मिली; उन्होंने डोडो का सबसे पहला रंगीन चित्र और साइबेरियाई सारस का पहला चित्र बनाया।
- अबुल हसन: रूपक-चित्रों के चित्रकार, जैसे निर्धनता पर तीर चलाता जहाँगीर, और जहाँगीर का स्वप्न, जिसमें सम्राट ईरान के शाह अब्बास को गले लगाता है।
- बिशनदास: 1613 में ईरान गए दूतमंडल के साथ गए और शाह अब्बास के चित्र बनाए।
- यूरोपीय प्रभाव: इंग्लैंड से भेजे गए रूपचित्र और चित्र, और एक-बिंदु परिप्रेक्ष्य, जिन्हें चित्रशाला ने अपनाया।
जहाँगीर चित्रों को बारीकी से परखता था। उसका दावा था कि वह किसी भी चित्र को देखते ही उसके चित्रकार का नाम बता सकता है, यहाँ तक कि कई हाथों से बने चेहरे में आँखें और भौंहें किसने बनाईं; उसके काल के चित्र सूचीबद्ध, तिथियुक्त और प्रायः हस्ताक्षरित हैं, इसलिए इतिहासकार उन्हें काफ़ी सटीकता से रख पाते हैं।
शालीमार बाग, जहाँगीर महल और जहाँगीर का मकबरा
बाग़ जहाँगीर के प्रिय निर्माण थे। मुग़ल चारबाग बनाते थे, अर्थात् जल-नालियों से चार भागों में बँटा चारदीवारी वाला बाग़, और सबसे सुंदर चारबागों में से कुछ जहाँगीर और शाहजहाँ ने कश्मीर, आगरा और दिल्ली में बनवाए।
- शालीमार बाग, श्रीनगर: जहाँगीर ने 1619 में डल झील के किनारे बनवाया और फ़रह बख़्श नाम दिया; यह दरबार का ग्रीष्मकालीन निवास था, जो कई बार कश्मीर गया। कश्मीर के मुग़ल बाग़ 2010 से यूनेस्को विश्व धरोहर की भारत की संभावित सूची में हैं।
- जहाँगीर महल, ओरछा: वीर सिंह देव बुंदेला द्वारा जहाँगीर के सम्मान में बनवाया गया महल।
- जहाँगीर का मकबरा: 1637 में शाहजहाँ के काल में लाहौर के सामने रावी पार शाहदरा के दिलकुशा बाग़ में बना, भीतर भित्ति-चित्रों और संगमरमर के साथ।
पूरे वंश की चित्रकला और स्थापत्य की कहानी मुग़ल कला और स्थापत्य वाले लेख में है, जहाँ एत्मादुद्दौला के मकबरे से ताजमहल तक की रेखा पूरी तरह बताई गई है।
जहाँगीर की मृत्यु और उसके शासन का मूल्यांकन
जहाँगीर की मृत्यु कैसे हुई: 1627 और उत्तराधिकार का युद्ध
जहाँगीर की मृत्यु अक्टूबर 1627 में भिंबर के पास हुई, जब वह कश्मीर से लाहौर लौट रहा था। जीवन भर अफ़ीम और शराब के सेवन से वह 1620 के दशक में अक्सर बीमार रहता था, और स्वास्थ्य सुधारने के लिए कश्मीर और काबुल गया था; उसे लाहौर के पास शाहदरा में दफ़नाया गया।
- शहरयार: नूरजहाँ के दामाद ने उनके सहारे नवंबर 1627 से जनवरी 1628 तक लाहौर में सत्ता सँभाली।
- आसफ़ ख़ाँ: नूरजहाँ के भाई ने अपने दामाद ख़ुर्रम का साथ दिया, बीच में दावर बख़्श को कठपुतली शासक बनाया और नूरजहाँ को नज़रबंद किया।
- शाहजहाँ: फ़रवरी 1628 में ख़ुर्रम आगरा पहुँचा, शहरयार और दावर बख़्श को मरवाया, और शाहजहाँ के नाम से सम्राट बना।
उत्तराधिकार का युद्ध मुग़ल ढर्रे पर चला: गद्दी उसी शहज़ादे को मिली जिसने उसे जीता। कहानी शाहजहाँ और मुग़ल वैभव का चरम (अंग्रेज़ी में) में आगे बढ़ती है।
जहाँगीर के शासन का मूल्यांकन: उपलब्धियाँ और विफलताएँ
इतिहासकारों ने जहाँगीर का आकलन अलग-अलग ढंग से किया है। उसके संस्मरण के संपादक हेनरी बेवरिज ने उसे कमज़ोर शासक कहा, जो किसी प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय का प्रमुख होकर अधिक सुखी रहता, और शाहजहाँ से झगड़े का दोष नूरजहाँ पर उसकी निर्भरता को दिया; दूसरे इतिहासकार इस पर ज़ोर देते हैं कि उसके पिता के साम्राज्य की संस्थाएँ उसके काल में मज़बूत रहीं। विस्तार धीमा हुआ, पर रुका नहीं: अकबर के तीन काफ़ी योग्य उत्तराधिकारी हुए, और उनके काल में क्षेत्रीय विस्तार बहुत धीमी गति से चलता रहा, जबकि शासन के साधन बनाए रखे और सुदृढ़ किए गए।
| क्षेत्र | लाभ | झटके |
|---|---|---|
| सीमाएँ | मेवाड़ की अधीनता (1615); कांगड़ा विजय (1620) | कंधार हाथ से गया (1622); अहमदनगर अजेय रहा |
| दरबार | न्याय की ज़ंजीर; सुलह-ए-कुल जारी | ख़ुसरो (1606) और ख़ुर्रम (1622) के विद्रोह |
| सत्ता | प्रशासन और मनसब बने रहे | नूरजहाँ गुट का उदय; महाबत ख़ाँ का तख़्तापलट (1626) |
| संस्कृति | मुग़ल चित्रकला का चरम; बाग़; संस्मरण | गुरु अर्जन देव को मृत्युदंड (1606) |
| व्यापार | मसुलीपट्टनम और सूरत में अंग्रेज़ी कोठियाँ | पुर्तगालियों द्वारा रहीमी जहाज़ की ज़ब्ती (1613) |
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2020, सामान्य अध्ययन-Iमध्यकालीन भारत के फ़ारसी साहित्यिक स्रोत उस काल के युगबोध का प्रतिबिंब हैं। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: मुग़लों के काल में फ़ारसी को दरबार और प्रशासन की भाषा, और उसमें लिखे इतिहास-ग्रंथों तथा संस्मरणों को उस काल का मुख्य साहित्यिक अभिलेख बताते हुए शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- वे क्या दर्शाते हैं: न्यायप्रिय राजा का आदर्श (जहाँगीर की न्याय की ज़ंजीर), दरबारी शिष्टाचार (झरोखा, तुलादान), शासन के सिद्धांत के रूप में सुलह-ए-कुल।
- जिज्ञासा और संस्कृति: पक्षियों, पशुओं और पौधों पर जहाँगीर की टिप्पणियाँ, जिनके चित्र उस्ताद मंसूर ने बनाए; बंजारे और अनाज का व्यापार; तंबाकू पर रोक।
- नामित ग्रंथ: बाबरनामा, अकबरनामा, जहाँगीरनामा, बादशाहनामा; ऐसे शीर्षक जो साम्राज्य के इतिहास को सम्राट के इतिहास के बराबर रखते हैं।
- सीमाएँ: दरबारियों या स्वयं शासक का लेखन; चुप्पियाँ, जैसे संस्मरण में रो का न होना, और धर्म पर ढाले गए तथ्य; इन्हें विदेशी विवरणों और चित्रों के साथ पढ़ना होगा।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि फ़ारसी स्रोत युगबोध को दर्शाते हैं, पर वह युग जैसा दरबार ने देखा, और उन्हें दूसरे प्रमाणों के साथ पढ़ना चाहिए।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019इनमें से किस मुग़ल सम्राट ने सचित्र पांडुलिपियों से ध्यान हटाकर चित्राधार (एलबम) और वैयक्तिक रूपचित्रों पर अधिक जोर दिया?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: हर सम्राट को मुग़ल चित्रशाला के इतिहास में रखें। चरण 2: हुमायूँ फ़ारसी चित्रकार लाए, पर उनकी अपनी बड़ी चित्रशाला नहीं थी। चरण 3: अकबर की चित्रशाला ने हम्ज़ानामा और अकबरनामा जैसी सचित्र पुस्तकें बनाईं। चरण 4: जहाँगीर ने चित्राधारों में एकल चित्र, रूपचित्र और प्रकृति के अध्ययन को प्राथमिकता दी। चरण 5: शाहजहाँ के काल में रूपचित्र जारी रहे, पर ऐसा कोई बदलाव नहीं आया। जहाँगीर।
इस भ्रम से बचें: अकबर चित्रशाला के महान संरक्षक थे, पर उनकी चित्रशाला मुख्यतः सचित्र पांडुलिपियों पर काम करती थी।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हुमायूँ: गलत। वे ईरान से अब्दुस्समद और मीर सैयद अली को लाए, पर चित्रशाला का काम बाद में हुआ।
- (b) अकबर: गलत। उनकी चित्रशाला ने सचित्र पांडुलिपियाँ बनाईं, बदलाव उन्हीं से दूर हुआ।
- (c) जहाँगीर: सही। उन्होंने एकल चित्रों के चित्राधार, रूपचित्र और प्रकृति-चित्रण को प्राथमिकता दी।
- (d) शाहजहाँ: गलत। उनके काल में रूपचित्र जारी रहे, पर बदलाव पहले ही हो चुका था।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर ने सचित्र पुस्तक से चित्राधार और रूपचित्र की ओर ज़ोर बदला।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर किसके शासनकाल में पहुँची?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: मुग़ल चित्रकला अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में बढ़ी। चरण 2: जहाँगीर के काल में तूलिका-कार्य सबसे महीन हुआ, प्रकृति-चित्रण और रूपचित्र फले-फूले, और सम्राट स्वयं हर चित्र परखता था। चरण 3: इसलिए चरम उसके शासन में रखा जाता है। जहाँगीर।
इस भ्रम से बचें: शाहजहाँ का शासन मुग़ल स्थापत्य का चरम है, चित्रकला का नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हुमायूँ: गलत। उसके दरबार में फ़ारसी उस्तादों के साथ चित्रकला की शुरुआत ही हुई।
- (b) अकबर: गलत। उसकी चित्रशाला ने सचित्र पुस्तकों से नींव रखी।
- (c) जहाँगीर: सही। मुग़ल चित्रकला उसके काल में चरम पर पहुँची।
- (d) शाहजहाँ: गलत। उसका शासन मुख्यतः इमारतों के लिए याद किया जाता है; चित्रकला का चरम उससे पहले आ चुका था।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2008 (हिंदी रूपांतर)किस मुग़ल सम्राट के समय में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी पहली कोठी स्थापित की?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: पहली कोठियों की तिथियाँ: मसुलीपट्टनम 1611 और सूरत 1613। चरण 2: तिथियों को शासनकालों से मिलाएँ: अकबर 1605 तक, जहाँगीर 1605 से 1627, शाहजहाँ 1628 से 1658, औरंगज़ेब 1658 से 1707। चरण 3: दोनों तिथियाँ जहाँगीर के शासन में आती हैं। जहाँगीर।
इस भ्रम से बचें: कंपनी 1600 में, अकबर के काल में, बनी, पर उसकी पहली कोठी जहाँगीर के काल में खुली।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अकबर: गलत। 1605 में उनकी मृत्यु हुई, कंपनी के जहाज़ 1608 में सूरत पहुँचे।
- (b) जहाँगीर: सही। मसुलीपट्टनम (1611) और सूरत (1613), दोनों उसके शासन के हैं।
- (c) शाहजहाँ: गलत। उसका शासन 1628 में, पहली कोठियों के बाद, शुरू हुआ।
- (d) औरंगज़ेब: गलत। उसका शासन 1658 में शुरू हुआ।
उत्तर: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2009 (हिंदी रूपांतर)अंग्रेज़ों ने सूरत में अपनी पहली कोठी किसकी अनुमति से स्थापित की?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: सूरत की पहली अंग्रेज़ी कोठी 1613 की है। चरण 2: 1613 में सम्राट जहाँगीर था। चरण 3: 1615 से 1619 के रो के दूतावास ने उसी सम्राट से उसके लिए अनुमति और संरक्षण पाया। जहाँगीर।
इस भ्रम से बचें: बाद के अनुदानों के कारण शाहजहाँ को अक्सर अंग्रेज़ों से जोड़ा जाता है; सूरत उससे पहले की बात है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अकबर: गलत। 1605 में उनकी मृत्यु हुई; अंग्रेज़ी जहाज़ 1608 में ही सूरत पहुँचे।
- (b) जहाँगीर: सही। 1613 की सूरत कोठी और रो का मिशन उसके शासन में आते हैं।
- (c) शाहजहाँ: गलत। वह 1628 में गद्दी पर बैठा।
- (d) औरंगज़ेब: गलत। वह 1658 में गद्दी पर बैठा।
उत्तर: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर: जहाँगीर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)कंधार का हाथ से जाना मुग़ल साम्राज्य के लिए किस दृष्टि से बड़ा आघात था?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: याद करें कि मुग़ल कंधार क्यों रखते थे: उत्तर भारत का हर आक्रमणकारी हिंदुकुश पार करता था, और काबुल तथा कंधार उस मार्ग की रक्षा करने वाली सामरिक चौकियाँ थीं। चरण 2: विकल्पों को इससे परखें: क़िले का मूल्य सैनिक स्थिति के रूप में था, संसाधन, बफ़र राज्य या संचार-मार्ग के रूप में नहीं। सामरिक गढ़।
इस भ्रम से बचें: बफ़र क्षेत्र सही लगता है, पर कंधार मुग़लों का अपना क़िला था, दो साम्राज्यों के बीच का तटस्थ क्षेत्र नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) प्राकृतिक संसाधन: गलत। कंधार का मूल्य संसाधनों के लिए नहीं था।
- (b) बफ़र क्षेत्र: गलत। यह एक पक्ष के हाथ का क़िला और विवाद की जड़ था, तटस्थ बफ़र नहीं।
- (c) संचार: गलत। यह एक मार्ग पर था, पर उसका मूल्य उस मार्ग पर सैनिक नियंत्रण था।
- (d) सामरिक गढ़: सही। काबुल और कंधार मुग़ल नीति की सामरिक चौकियाँ थीं।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: कंधार एक सामरिक गढ़ था।
स्रोत
- NCERT: Our Pasts II (Class VII), The Mughal Empire
- NCERT: Themes in Indian History, Part II (Class XII), Kings and Chronicles
- INCOIS (Ministry of Earth Sciences): Science, civilisation and society, Jahangir
- Incredible India (Ministry of Tourism): Itimad-ud-Daulah's Tomb, Agra
- PIB: India, properties on the UNESCO Tentative List (2023)
- Wikipedia: Jahangir
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- Wikipedia: East India Company
- Wikipedia: Machilipatnam
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
