परिचय
हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) समुद्री सतह के तापमान का एक अनियमित उतार-चढ़ाव है, जिसमें पश्चिमी हिंद महासागर बारी-बारी से पूर्वी भाग से अधिक गर्म (धनात्मक प्रावस्था) और अधिक ठंडा (ऋणात्मक प्रावस्था) होता है। प्रशांत के एल नीनो और ला नीना के साथ यह उन महासागरीय संकेतों में है जो तय करते हैं कि भारतीय मानसून कितनी वर्षा लाएगा, जबकि महासागरीय लवणता यह लेखा रखती है कि जल कहाँ वाष्पित होता है और वर्षा कहाँ गिरती है।
महासागर जलवायु को कैसे गढ़ता है: ऊष्मा भंडार और लवणता
ऊष्मा के भंडार के रूप में महासागर: सागर जलवायु को क्यों चलाता है
महासागर जलवायु को गढ़ता है, क्योंकि वह वायु से कहीं अधिक ऊष्मा रखता है। समुद्री जल की विशिष्ट ऊष्मा वायु से बहुत अधिक है, इसलिए महासागर के ऊपरी 2.5 मीटर में उतनी ही ऊष्मा है जितनी उसके ऊपर के पूरे वायुमंडल में। महासागर की मिश्रित परत में संचित ऊष्मा उन ऊष्मा-स्रोतों में है जो एल नीनो जैसे वैश्विक उतार-चढ़ाव चलाते हैं। समुद्री सतह का तापमान कैसे वितरित है और कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, यह महासागरीय जल का तापमान और जल राशियाँ लेख में है।
- एक वैश्विक सोख्ता: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत महासागर सोख लेता है।
- बढ़ता तापमान: 1850-1900 से 2011-2020 के बीच वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान बहुत संभवतः 0.88 °C बढ़ा, जिसमें 0.60 °C 1980 से 2020 के बीच।
- इसका महत्त्व: समुद्री सतह का तापमान तट के निकट की वायुराशियों को बदलता है, और गर्म सतह चक्रवातों को बनने और प्रबल होने में मदद करती है।
- भारत के लिए संकेत: भारतीय मानसून को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले दो महासागरीय उतार-चढ़ाव, प्रशांत का एल नीनो और हिंद महासागर द्विध्रुव, दोनों समुद्री सतह के तापमान के ही प्रतिरूप हैं।
समुद्र का वर्षामापी: लवणता, वाष्पन और वर्षण
लवण वाष्पित नहीं होता, इसलिए सतह की लवणता जल-चक्र का लेखा रखती है। जहाँ वाष्पन प्रबल है, वहाँ सागर अधिक लवणीय होता है; जहाँ वर्षण या नदियों का जल जुड़ता है, वहाँ कम लवणीय। इसीलिए वर्षा और वाष्पन में होने वाले परिवर्तन सतह की लवणता में स्पष्ट दिखते हैं।
- वाष्पन और वर्षण: सतही परत की लवणता मुख्यतः इन्हीं दोनों पर निर्भर करती है।
- नदियाँ और बर्फ़: तटीय क्षेत्रों में नदियों का मीठा जल, और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ़ का जमना-पिघलना, सतह की लवणता बदलते हैं।
- पवन और धाराएँ: पवन जल को एक क्षेत्र से दूसरे में ले जाती है, और धाराएँ अपने साथ लवणता ले जाती हैं।
- वैश्विक परास: समुद्री सतह की औसत लवणता लगभग 35 PSS, अर्थात् 3.5 प्रतिशत लवण, है और यह 32 से 37 PSS के बीच बदलती है।
अब लवणता अंतरिक्ष से भी मापी जाती है। नासा का Aquarius उपकरण, अर्जेंटीना के SAC-D अंतरिक्षयान पर, समुद्र के सूक्ष्मतरंग उत्सर्जन में छोटे परिवर्तनों को पकड़ने वाले रेडियोमीटरों से समुद्री सतह की लवणता का मानचित्रण करता था; अंतरिक्ष से लवणता के पहले मानचित्र नवंबर 2009 में प्रक्षेपित यूरोपीय उपग्रह SMOS से आए। महासागरों में लवणता का वितरण महासागरीय लवणता: परिभाषा और वितरण (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
हिंद महासागर द्विध्रुव: अर्थ, प्रावस्थाएँ और मानसून पर प्रभाव
हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) क्या है
उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी भागों के समुद्री सतह तापमानों के अंतर में होने वाले स्थायी परिवर्तन को हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole, IOD) कहते हैं। इसकी तीन प्रावस्थाएँ हैं, उदासीन, धनात्मक और ऋणात्मक, और इसकी पहचान पहली बार 1999 में भारतीय विज्ञान संस्थान के भारतीय जलवायु शोधकर्ताओं ने की।
- मापन: IOD को द्विध्रुव मोड सूचकांक (Dipole Mode Index, DMI) से मापा जाता है: एक पश्चिमी खंड (50 से 70 डिग्री पूर्व, 10 डिग्री दक्षिण से 10 डिग्री उत्तर) और एक पूर्वी खंड (90 से 110 डिग्री पूर्व, 10 डिग्री दक्षिण से विषुवत् वृत्त तक) की समुद्री सतह तापमान विसंगतियों का अंतर।
- समय: घटनाएँ प्रायः मई या जून के आसपास शुरू होती हैं, अगस्त से अक्टूबर के बीच चरम पर पहुँचती हैं और दक्षिणी गोलार्ध में वसंत के अंत में मानसून आने पर जल्दी क्षीण हो जाती हैं।
- आवृत्ति: औसतन 30 वर्षों में लगभग चार धनात्मक और चार ऋणात्मक घटनाएँ होती हैं, हर एक लगभग छह महीने चलती है; पर 1980 से 2009 के बीच 12 धनात्मक IOD हुए।
- भारत में निगरानी: भारत मौसम विज्ञान विभाग एल नीनो और IOD पर बुलेटिन जारी करता है, द्विध्रुव मोड सूचकांक पर नज़र रखता है और अपने मानसून मिशन युग्मित मॉडल से दोनों का पूर्वानुमान करता है।
धनात्मक IOD और ऋणात्मक IOD: पवनें, वर्षा और प्रभाव
दोनों प्रावस्थाएँ विषुवत् वृत्त के साथ चलने वाली पवनों से चलती हैं। उदासीन प्रावस्था में इंडोनेशिया के द्वीपों के बीच से बहता प्रशांत का जल ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पश्चिम के सागर को गर्म रखता है, और विषुवत् वृत्त के साथ पश्चिमी पवनें चलती हैं। इन पवनों में परिवर्तन महासागर को किसी एक ओर झुका देता है।
| विशेषता | धनात्मक IOD | ऋणात्मक IOD |
|---|---|---|
| विषुवतीय पश्चिमी पवनें | कमज़ोर होती हैं | प्रबल होती हैं |
| गर्म जल | पश्चिम में, अफ़्रीका की ओर | पूर्व में, ऑस्ट्रेलिया के पास |
| ठंडा जल | पूर्व में, जहाँ ठंडा जल ऊपर आता है | पश्चिम में |
| वर्षा | पश्चिमी हिंद महासागर में अधिक | पूर्वी हिंद महासागर में अधिक |
| शुष्क क्षेत्र | इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया | पश्चिमी हिंद महासागर |
- पूर्वी अफ़्रीका: धनात्मक IOD अक्टूबर से दिसंबर की छोटी वर्षा ऋतु में अधिक वर्षा लाता है; 2019 के उत्तरार्ध के प्रबल धनात्मक IOD में पूर्वी अफ़्रीका को सामान्य की 300 प्रतिशत वर्षा मिली।
- ऑस्ट्रेलिया: 1889 से दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया का हर बड़ा सूखा धनात्मक या उदासीन IOD प्रावस्था के साथ आया है, जबकि ऋणात्मक IOD दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों में शीत और वसंत की वर्षा बढ़ाता है।
- दुर्लभ संयोग: अक्टूबर 2010 के प्रबल ऋणात्मक IOD ने प्रबल ला नीना के साथ मिलकर 2010-2011 की क्वींसलैंड बाढ़ को जन्म दिया।
IOD, एल नीनो का संतुलन और मानसून वर्षा
IOD भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह मानसून को प्रबल या कमज़ोर कर सकता है। धनात्मक IOD में हिंद महासागर के ऊपर पवनें पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं, महासागर का अरब सागर वाला भाग अधिक गर्म और इंडोनेशिया के आसपास का क्षेत्र अधिक ठंडा और शुष्क होता है; ऋणात्मक वर्षों में इसका उलटा होता है। धनात्मक IOD प्रायः एल नीनो के प्रभाव को निष्प्रभावी कर देता है।
- प्रमाण: 1983, 1994 और 1997 में धनात्मक IOD ने मानसून वर्षा बढ़ाई।
- 1997 का उदाहरण: 1997 के प्रबल एल नीनो से भारत में सूखा नहीं पड़ा; दो वर्ष बाद खोजे गए IOD ने इसका कारण समझाने में मदद की।
- दो ध्रुव: इंडोनेशिया के आसपास का पूर्वी ध्रुव और अफ़्रीकी तट के पास का पश्चिमी ध्रुव मानसून वर्षा को अलग-अलग भी और मिलकर भी प्रभावित करते हैं।
IOD और मानसून के दूसरे कारकों पर अधिक जानकारी वायुदाब, पवनें, जेट धाराएँ, ENSO और IOD (अंग्रेज़ी में) तथा भारतीय मानसून की क्रियाविधि (अंग्रेज़ी में) लेखों में है।
एल नीनो, ला नीना और वॉकर परिसंचरण
वॉकर परिसंचरण और दक्षिणी दोलन
विषुवतीय प्रशांत के ऊपर वायु के पूर्व-पश्चिम चक्र को वॉकर परिसंचरण (Walker circulation) कहते हैं। वायु इंडोनेशिया के पास गर्म पश्चिमी प्रशांत के ऊपर उठती है, जहाँ वायुदाब कम है, ऊपर-ऊपर पूर्व की ओर बहती है, ठंडे पूर्वी प्रशांत के ऊपर नीचे बैठती है, जहाँ वायुदाब अधिक है, और सतह के पास व्यापारिक पवनों के रूप में पश्चिम की ओर लौटती है।
- गिल्बर्ट वॉकर: वे 1904 में भारत में वेधशालाओं के महानिदेशक बने और मानसून का अध्ययन किया, जिसकी विफलता ने 1899 में भीषण अकाल लाया था। उन्होंने हिंद और प्रशांत महासागरों के बीच वायुदाब के एक बड़े झूले का वर्णन किया और 1924 में दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) शब्द गढ़ा।
- दक्षिणी दोलन सूचकांक: इसे फ़्रेंच पोलिनेशिया के ताहिती और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के पोर्ट डार्विन के वायुदाब के अंतर से मापा जाता है। एल नीनो की घटनाओं में सूचकांक ऋणात्मक होता है: ताहिती पर कम और डार्विन पर अधिक वायुदाब।
- शब्द का प्रयोग: मौसम विज्ञानी जैकब बजर्कनेस ने 1969 में पहली बार वॉकर परिसंचरण शब्द का प्रयोग किया।
- प्रबलता: एल नीनो में वॉकर परिसंचरण कमज़ोर और ला नीना में प्रबल होता है।
एल नीनो और ला नीना: प्रशांत में क्या होता है
पेरू के तट के पास गर्म जल के प्रकट होने को एल नीनो कहते हैं। मध्य प्रशांत का गर्म जल दक्षिण अमेरिकी तट की ओर बहकर पेरू की ठंडी धारा की जगह ले लेता है। यह हर तीन से सात वर्ष में आता है और पेरू के तट पर जल का तापमान 10 °C बढ़ा देता है।
| विशेषता | एल नीनो | ला नीना |
|---|---|---|
| व्यापारिक पवनें | सामान्य से कमज़ोर | सामान्य से प्रबल |
| मध्य और पूर्वी प्रशांत | औसत से गर्म | औसत से ठंडा |
| इंडोनेशिया | औसत से कम वर्षा | अधिक वर्षा |
| वॉकर परिसंचरण | कमज़ोर | प्रबल |
| भारतीय मानसून | कमज़ोर, सूखे के साथ | प्रबल |
- नाम: एल नीनो का अर्थ है बालक ईसा, क्योंकि यह धारा क्रिसमस के आसपास प्रकट होती है, जो पेरू में ग्रीष्म का महीना है।
- मछलियाँ: गर्म जल प्लवक घटा देता है, जिससे सागर में मछलियों की संख्या घटती है।
- विश्व पर प्रभाव: प्रबल ENSO वर्षों में दक्षिण अमेरिका के शुष्क पश्चिमी तट पर भारी वर्षा होती है, ऑस्ट्रेलिया और कभी-कभी भारत में सूखा पड़ता है, और चीन में बाढ़ आती है।
ला नीना इसकी उलटी दशा है। उष्णकटिबंधीय प्रशांत की व्यापारिक पवनें बहुत प्रबल हो जाती हैं और मध्य तथा पूर्वी प्रशांत में ठंडा जल असामान्य रूप से जमा हो जाता है। पूरी क्रियाविधि ENSO की क्रियाविधि (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
एल नीनो मोडोकी: मध्य प्रशांत का एल नीनो
हर एल नीनो प्रशांत के एक ही भाग को गर्म नहीं करता। जिस प्रतिरूप को पहले पहचाना गया, वह पूर्वी प्रशांत को गर्म करता है। 1990 और 2000 के दशकों में एक अलग प्रतिरूप देखा गया, जिसमें गर्मी मध्य प्रशांत में तिथि रेखा के पास उत्पन्न होती है; इसे मध्य प्रशांत ENSO या ENSO मोडोकी कहते हैं, जो एक जापानी शब्द से है जिसका अर्थ है समान, पर भिन्न।
- तूफ़ान: सामान्य एल नीनो अटलांटिक में कम तूफ़ान लाता है, जबकि एल नीनो मोडोकी अटलांटिक में अधिक तूफ़ानों से जुड़ा है, जो अधिक बार तट से टकराते हैं।
- बंगाल की खाड़ी: ला नीना मोडोकी बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती तूफ़ानों की आवृत्ति बढ़ाता है, जबकि पूरे हिंद महासागर में गंभीर तूफ़ान घटाता है।
- पहली दर्ज घटना: मध्य प्रशांत में शुरू होकर पूर्व की ओर बढ़ने वाला पहला दर्ज एल नीनो 1986 में था।
एल नीनो, ला नीना और भारतीय मानसून
ENSO का दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर स्पष्ट प्रभाव है। एल नीनो वर्षों में मानसून प्रायः कमज़ोर रहता है और सूखा लाता है; ला नीना वर्षों में विशेष रूप से प्रबल मानसून आता है। स्वयं वॉकर ने देखा था कि जिन वर्षों में डार्विन पर वायुदाब अधिक और ताहिती पर कम होता था, उनमें मानसून वर्षा प्रायः बहुत कम रहती थी।
- पूर्वानुमान: भारत में दीर्घावधि मानसून वर्षा के पूर्वानुमान के लिए एल नीनो का उपयोग होता है, और भारत मौसम विज्ञान विभाग ENSO का आकलन IOD के साथ करता है।
- विलंबित आगमन: 1990-1991 के एल नीनो में देश के अधिकांश भाग में दक्षिण-पश्चिमी मानसून का आगमन पाँच से बारह दिन विलंबित हुआ।
- कमज़ोर होता संबंध: हाल के दशकों में मानसून पर ENSO का प्रभाव कमज़ोर पड़ता दिखा है, आंशिक रूप से इस कारण कि IOD उसे संतुलित कर सकता है।
IOD और ENSO एक-दूसरे पर भी असर डालते हैं। धनात्मक IOD सुदूर पूर्वी प्रशांत में एल नीनो जैसी गर्मी पैदा कर सकता है, और दोनों की परस्पर क्रिया को सबसे प्रबल सुपर एल नीनो की कुंजी माना जाता है। IOD का वायुमंडलीय भाग, विषुवतीय हिंद महासागर दोलन (EQUINOO), 2002 के भीषण सूखे जैसे विफल पूर्वानुमानों को समझाने में मदद करता है। एल नीनो भारत की खेती और अर्थव्यवस्था पर कैसे असर डालता है, यह भारत पर ENSO के प्रभाव (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
महासागरीय लवणता, अवरोधक परत और मानसून पूर्वानुमान
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर: कम लवणीय बनाम अधिक लवणीय
भारत के पास के दोनों सागरों की लवणता उलटी है। गंगा द्वारा लाए नदी-जल के कारण बंगाल की खाड़ी कम लवणीय है; अधिक वाष्पन और मीठे जल के कम आगम के कारण अरब सागर अधिक लवणीय है। हिंद महासागर की औसत लवणता 35 प्रति हज़ार है।
खारे जल के ऊपर मीठा जल एक अवरोधक परत (barrier layer) बनाता है: वह परत जो अच्छी तरह मिश्रित सतही परत को ताप प्रवणता से अलग करती है। यह वहाँ बनती है जहाँ जल-स्तंभ के ऊपर मीठे जल का लेंस बैठा हो, जैसे उत्तरी हिंद महासागर में मानसूनी नदी-अपवाह से, और विषुवतीय क्षेत्रों में यह 50 मीटर तक मोटी हो सकती है। भारत के सागरों की लवणता विस्तार से हिंद महासागर की धाराएँ और लवणता लेख में है।
अवरोधक परत और बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों का तीव्र होना
लवणता की परतबंदी चक्रवातों को बढ़ने में मदद करती है। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को गर्म समुद्री सतह चाहिए, प्रायः 26 से 27 °C या उससे अधिक। गुज़रता चक्रवात प्रायः नीचे से ठंडा जल ऊपर मथकर ऊपरी महासागर को ठंडा कर देता है, जिससे वह कमज़ोर पड़ सकता है। जहाँ अवरोधक परत उस ठंडे जल को नीचे रोके रखती है, वहाँ तूफ़ान का ईंधन बना रहता है।
- नरगिस, अप्रैल 2008: बंगाल की खाड़ी में समुद्री सतह का तापमान 29 से 30 °C था, और आरंभ में कम पवन-गति और 33 से कम सतही लवणता ने ताप प्रवणता के ठंडे जल को ऊपर मिलने से रोके रखा।
- तट से टकराना: नरगिस 2 मई 2008 को लगभग 210 किमी प्रति घंटे की पवनों के साथ म्यांमार से टकराया, और इरावदी डेल्टा में 3 से 4 मीटर की तूफ़ानी लहर उठी; लगभग 1,30,000 लोग मारे गए या लापता हुए।
- ऊष्मा क्षमता: पूर्वानुमानकर्ता केवल सतह के तापमान पर नहीं, 26 °C समताप रेखा के ऊपर संचित ऊष्मा पर भी नज़र रखते हैं; अधिक महासागरीय ऊष्मा-मात्रा तूफ़ानों को अधिक तीव्रता तक पहुँचने देती है।
- तीव्र प्रबलन: इसके लिए लगभग 30 °C या उससे अधिक तापमान का जल चाहिए, इतना गहरा कि लहरें ठंडे जल को सतह पर न ला सकें।
- सीमाएँ: ठंडे जल के ऊपर पहुँचने, शुष्क वायु मिलने या ऊर्ध्वाधर पवन-अपरूपण से चक्रवात फिर भी कमज़ोर होता है।
चक्रवातों का निर्माण पूरा उष्णकटिबंधीय चक्रवात कैसे बनते हैं (अंग्रेज़ी में) लेख में, और गर्म होते सागरों का प्रभाव गर्म होती जलवायु में चक्रवात (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
महासागर औसत तापमान और मानसून पूर्वानुमान
समुद्री सतह का तापमान महासागर की केवल एक पतली परत बताता है, जबकि मानसून और चक्रवातों को पोषित करने वाली ऊष्मा ऊपरी महासागर से आती है। सतह से 26 °C समताप रेखा की गहराई तक के जल के औसत तापमान को महासागर औसत तापमान (Ocean Mean Temperature, OMT) कहते हैं, और यही उस गहरी ऊष्मा को मापता है।
- कहाँ और कब: जनवरी से मार्च में दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर का OMT भारतीय ग्रीष्म मानसून का समुद्री सतह के तापमान से बेहतर गुणात्मक संकेतक है।
- सफलता दर: इसने औसत से अधिक या कम मानसून वर्षा का 80 प्रतिशत बार सही अनुमान लगाया, जबकि समुद्री सतह के तापमान ने 60 प्रतिशत, और जनवरी से मार्च के एल नीनो, IOD और मोडोकी सूचकांकों (52, 48 और 56 प्रतिशत) से भी बेहतर रहा।
- गहराई: उस क्षेत्र में जनवरी से मार्च में 26 °C समताप रेखा की औसत गहराई 59 मीटर है।
- यह क्यों कारगर है: OMT महासागर में संचित ऊष्मा को दर्शाता है, जिसे सतह के तेज़ी से गर्म या ठंडा होने पर समुद्री सतह का तापमान छिपा सकता है।
महासागरीय लवणता, जलवायु परिवर्तन और मानसून
तीव्र होता जल-चक्र: लवणीय सागर और लवणीय, कम लवणीय सागर और कम लवणीय
तापवृद्धि जल-चक्र को तेज़ कर रही है, और लवणता इसे दिखाती है। दीर्घकालीन अभिलेख बताते हैं कि वैश्विक लवणता का प्रतिरूप और गहरा हो रहा है: वाष्पन-प्रधान अधिक लवणता वाले क्षेत्र और लवणीय हुए हैं, और वर्षा-प्रधान कम लवणता वाले क्षेत्र और कम लवणीय। IPCC के अनुसार यह अत्यंत संभावित है कि सतह के निकट की महासागरीय लवणता में इस परिवर्तन में मानवीय प्रभाव का योगदान है।
- अधिक तीव्र चक्र: निरंतर तापवृद्धि से वैश्विक जल-चक्र के तीव्र होने का अनुमान है, जिसमें उसकी परिवर्तनशीलता, वैश्विक मानसून वर्षा और नम तथा शुष्क घटनाओं की गंभीरता शामिल है।
- मानसून वर्षा: मध्यम से दीर्घ अवधि में मानसून वर्षा के बढ़ने का अनुमान है, विशेषकर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में।
- ENSO के उतार-चढ़ाव: मध्यम और उच्च उत्सर्जन में 21वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एल नीनो से जुड़ी वर्षा की परिवर्तनशीलता के बहुत संभवतः बढ़ने का अनुमान है।
गर्म होता हिंद महासागर, मानवीय प्रभाव और बदलता मानसून
हिंद महासागर विश्व का सबसे गर्म महासागर है और यह तेज़ी से गर्म हो रहा है। 1901 से 2012 के अभिलेख हिंद-प्रशांत उष्ण जल कुंड के लगभग 1.2 °C गर्म होने को दिखाते हैं; 1950 से 2020 के बीच यह महासागर 1.2 °C प्रति शताब्दी की दर से गर्म हुआ, और मॉडल 2020 से 2100 के बीच 1.7 से 3.8 °C प्रति शताब्दी का अनुमान देते हैं। मानवजनित ग्रीनहाउस तापवृद्धि और एल नीनो तथा IOD में परिवर्तन इस तापवृद्धि को चलाते हैं, और गर्म हिंद महासागर ने एशियाई मानसून को कमज़ोर किया है।
- ऐरोसॉल बनाम ग्रीनहाउस गैसें: 20वीं शताब्दी में दक्षिण एशिया पर ग्रीनहाउस गैसों से हुई तापवृद्धि मानसून वर्षा बढ़ाने की ओर थी, पर मानवजनित ऐरोसॉल की शीतलता ने उसे घटाया।
- नगरीय वर्षा: नगरीकरण नगरों के ऊपर और उनकी पवन-दिशा में आगे औसत और भारी वर्षा बढ़ाता है।
- भू-सतह: भूमि-उपयोग और सिंचाई में परिवर्तन यह बदलते हैं कि भूमि कितना सूर्य-प्रकाश परावर्तित करती है, जो ऐरोसॉल के साथ एक शीतलकारी प्रभाव है।
- अटलांटिक से संबंध: यदि अटलांटिक का व्युत्क्रमण परिसंचरण कभी ढह जाए, तो IPCC कमज़ोर अफ़्रीकी और एशियाई मानसून की अपेक्षा करता है; वह परिसंचरण तापलवणीय परिसंचरण (अंग्रेज़ी में) लेख में समझाया गया है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017 (हिंदी रूपांतर)'हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD)', जिसका भारतीय मानसून के पूर्वानुमान के समय प्रायः समाचारों में उल्लेख होता है, के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- IOD परिघटना उष्णकटिबंधीय पश्चिमी हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्री सतह तापमान के अंतर से अभिलक्षित होती है।
- IOD परिघटना मानसून पर एल नीनो के प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले देखें कि IOD के दोनों ध्रुव कहाँ हैं, फिर IOD और एल नीनो का संबंध याद करें।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 पूर्वी ध्रुव को प्रशांत में ले जाता है; दोनों ध्रुव हिंद महासागर में हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: ग़लत। कथन 1 पूर्वी ध्रुव को प्रशांत में रखता है; द्विध्रुव के दोनों ध्रुव हिंद महासागर में हैं।
- (b) केवल 2: सही। IOD मानसून पर एल नीनो के प्रभाव को संतुलित कर सकता है, जैसा 1997 के धनात्मक IOD ने किया।
- (c) 1 और 2 दोनों: ग़लत। कथन 1 ग़लत है।
- (d) न तो 1, न ही 2: ग़लत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल 2: विकल्प (b)।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)माना जाता है कि ऑस्ट्रेलिया में हाल की बाढ़ ला नीना के कारण आई। ला नीना एल नीनो से कैसे भिन्न है?
- ला नीना विषुवतीय हिंद महासागर में असामान्य रूप से ठंडे महासागरीय तापमान से अभिलक्षित होता है, जबकि एल नीनो विषुवतीय प्रशांत महासागर में असामान्य रूप से गर्म महासागरीय तापमान से।
- एल नीनो का भारत के दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, पर ला नीना का मानसूनी जलवायु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1 में बताए महासागर और कथन 2 के मानसून-दावे को परखें।
इस भ्रम से बचें: ला नीना प्रशांत की ठंडी प्रावस्था है, हिंद महासागर की नहीं, और यह मानसून को प्रभावित करता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: ग़लत। ला नीना का ठंडा जल मध्य और पूर्वी प्रशांत में जमा होता है, हिंद महासागर में नहीं।
- (b) केवल 2: ग़लत। ला नीना मानसून को प्रभावित करता है; ला नीना वर्षों में प्रबल मानसून आता है।
- (c) 1 और 2 दोनों: ग़लत। दोनों कथन असत्य हैं।
- (d) न तो 1, न ही 2: सही। कोई भी कथन ला नीना का सही वर्णन नहीं करता।
उत्तर: न तो 1, न ही 2: विकल्प (d)।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2010 (हिंदी रूपांतर)एल नीनो मोडोकी नामक एक नए प्रकार का एल नीनो समाचारों में था। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सामान्य एल नीनो मध्य प्रशांत महासागर में बनता है, जबकि एल नीनो मोडोकी पूर्वी प्रशांत महासागर में।
- सामान्य एल नीनो से अटलांटिक महासागर में तूफ़ान घटते हैं, पर एल नीनो मोडोकी से अधिक संख्या में और अधिक आवृत्ति से तूफ़ान आते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: याद रखें कि कौन-सा एल नीनो मध्य प्रशांत में और कौन-सा पूर्वी प्रशांत में बनता है।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 दोनों स्थानों को उलट देता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: ग़लत। कथन 1 उलटा है: पहले पहचाना गया एल नीनो पूर्वी प्रशांत को गर्म करता है, मोडोकी मध्य प्रशांत को।
- (b) केवल 2: सही। सामान्य एल नीनो अटलांटिक में कम तूफ़ान लाता है, जबकि एल नीनो मोडोकी अधिक, जो अधिक बार तट से टकराते हैं।
- (c) 1 और 2 दोनों: ग़लत। कथन 1 ग़लत है।
- (d) न तो 1, न ही 2: ग़लत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल 2: विकल्प (b)।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2002 (हिंदी रूपांतर)अल्पकालिक जलवायु पूर्वानुमान के लिए, पिछले दशक में पहचानी गई निम्नलिखित में से कौन-सी घटना भारतीय उपमहाद्वीप में कभी-कभार की कमज़ोर मानसून वर्षा से जुड़ी है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: वह घटना चुनें जो कमज़ोर मानसून वर्षा से जुड़ी है और पूर्वानुमान में प्रयुक्त होती है।
इस भ्रम से बचें: ला नीना प्रबल मानसून से जुड़ा है, कमज़ोर से नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) ला नीना: ग़लत। ला नीना वर्षों में प्रबल मानसून आता है, कमज़ोर नहीं।
- (b) जेट धाराओं की गति: ग़लत। यह मानसून वर्षा के पूर्वानुमान में प्रयुक्त महासागर-वायुमंडल घटना नहीं है।
- (c) एल नीनो और दक्षिणी दोलन: सही। एल नीनो वर्षों में मानसून प्रायः कमज़ोर रहता है, और ENSO का उपयोग मानसून वर्षा के पूर्वानुमान में होता है।
- (d) वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस प्रभाव: ग़लत। वैश्विक तापवृद्धि दीर्घकालीन प्रवृत्ति है, कमज़ोर वर्षों से जुड़ी कभी-कभार की घटना नहीं।
उत्तर: एल नीनो और दक्षिणी दोलन: विकल्प (c)।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2020महासागर औसत तापमान (Ocean Mean Temperature/OMT) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- OMT को 26°C समताप रेखा की गहराई तक मापा जाता है जो जनवरी-मार्च में हिन्द महासागर के दक्षिण-पश्चिम में 129 मीटर पर होती है।
- OMT, जो जनवरी-मार्च में एकत्रित किया जाता है उसे यह निर्धारित करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है कि मानसून में वर्षा की मात्रा एक निश्चित दीर्घकालीन औसत वर्षा से कम होगी या अधिक।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1 में दी गई गहराई और कथन 2 में बताए पूर्वानुमान-उपयोग को परखें।
इस भ्रम से बचें: जनवरी से मार्च में उस क्षेत्र में 26 °C समताप रेखा लगभग 59 मीटर पर होती है, 129 मीटर पर नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: ग़लत। जनवरी से मार्च में वहाँ 26 °C समताप रेखा लगभग 59 मीटर पर है, 129 मीटर पर नहीं।
- (b) केवल 2: सही। जनवरी से मार्च का OMT औसत से अधिक या कम मानसून वर्षा का 80 प्रतिशत बार सही अनुमान देता है।
- (c) 1 और 2 दोनों: ग़लत। कथन 1 ग़लत गहराई देता है।
- (d) न तो 1, न ही 2: ग़लत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल 2: विकल्प (b)।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-Iआप कहाँ तक सहमत हैं कि मानवीकारी दृश्यभूमियों के कारण भारतीय मानसून के आचरण में परिवर्तन होता रहा है? चर्चा कीजिये।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भारत की अधिकांश वर्षा मानसून से आती है; उसका आचरण अब स्थल, वायु और सागर में मानवीय परिवर्तनों और प्राकृतिक महासागरीय उतार-चढ़ावों, दोनों को दर्शाता है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- ऐरोसॉल: इन्होंने क्षेत्र को ठंडा कर मानसून वर्षा घटाई और 20वीं शताब्दी में ग्रीनहाउस तापवृद्धि को संतुलित किया।
- नगर: नगरीकरण नगरों के ऊपर और उनकी पवन-दिशा में औसत और भारी वर्षा बढ़ाता है।
- भूमि-उपयोग और सिंचाई: ये बदलते हैं कि भूमि कितना सूर्य-प्रकाश परावर्तित करती है।
- गर्म होता हिंद महासागर: तेज़ तापवृद्धि ने एशियाई मानसून को कमज़ोर किया है।
- प्राकृतिक कारक: एल नीनो, ला नीना और IOD अब भी अच्छे और बुरे वर्ष तय करते हैं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि मानवीकारी दृश्यभूमि मानसून को बदल रही है, पर महासागर के माध्यम से और उसके साथ; पूर्वानुमान और अनुकूलन दोनों पर नज़र रखें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2024, सामान्य अध्ययन-Iसमुद्री सतह के तापमान में वृद्धि क्या है? यह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: समुद्री सतह का तापमान महासागर की सतह के निकट के जल का तापमान है; 1850-1900 से 2011-2020 के बीच वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान बहुत संभवतः 0.88 °C बढ़ा।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- सीमा: चक्रवातों को लगभग 26 से 27 °C या अधिक तापमान का सतही जल चाहिए।
- तीव्रता: अधिक तापमान और महासागरीय ऊष्मा-मात्रा तेज़ और तीव्र प्रबलन देती है।
- अवरोधक परत: कम लवणीय सतही जल तूफ़ान को अपना ईंधन ठंडा करने से रोकता है, जैसे 2008 में नरगिस में।
- सीमाएँ: पवन-अपरूपण और शुष्क वायु फिर भी तूफ़ान को रोक सकते हैं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि गर्म सागर प्रबल चक्रवातों की संभावना बढ़ाते हैं, इसलिए पूर्व चेतावनी और तटीय तैयारी का महत्त्व बढ़ जाता है।
स्रोत
- NCERT: भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत (कक्षा 11) और भारत: भौतिक पर्यावरण (कक्षा 11)
- NCERT: Fundamentals of Physical Geography (Class XI), Atmospheric Circulation and Water (Oceans)
- NCERT: India Physical Environment (Class XI), Climate
- India Meteorological Department: ENSO and IOD bulletin, February 2026
- Australian Bureau of Meteorology: Indian Ocean Dipole
- NOAA Climate.gov: El Nino and La Nina frequently asked questions
- NOAA GFDL: Ocean-atmosphere interactions during Cyclone Nargis (Eos, 2009)
- NOAA AOML: South-western Indian Ocean heat content and monsoon rainfall (Scientific Reports, 2018)
- IPCC AR6 Working Group I: Summary for Policymakers
- Wikipedia: Indian Ocean Dipole
- Wikipedia: El Nino-Southern Oscillation
- Wikipedia: Walker circulation
- Wikipedia: Monsoon of South Asia
- Wikipedia: Barrier layer (oceanography)
- Wikipedia: Tropical cyclone
- Wikipedia: Sea surface temperature
- Wikipedia: Effects of climate change on oceans
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की भूगोल पाठ्यपुस्तकों, भारत मौसम विज्ञान विभाग, ऑस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञान ब्यूरो, NOAA, IPCC और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है। हिंद महासागर पर जलवायु शोध सक्रिय है, और कुछ आँकड़े स्रोतों के बीच भिन्न हैं।
