परिचय

हिंद महासागर की धाराएँ दूसरे महासागरों से इसलिए अलग हैं कि एशिया इस महासागर को उत्तर में बंद करता है। विषुवत् वृत्त के उत्तर में वे मानसून के साथ पलटती हैं, जिसे मानसून वाह कहते हैं: जनवरी से मार्च तक पश्चिम और अप्रैल से नवंबर तक पूर्व की ओर। दक्षिण में दक्षिण विषुवतीय, अगुलहास और पश्चिम ऑस्ट्रेलिया धाराओं का वामावर्त वलय घूमता है। वाष्पन अरब सागर की लवणता 36 PSU से ऊपर रखता है, जबकि नदियाँ और वर्षा बंगाल की खाड़ी को लगभग 33 पर रखती हैं।

हिंद महासागर: उत्तर में बंद एक महासागर

हिंद महासागर का विस्तार, गहराई और उष्ण जल कुंड

हिंद महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसका क्षेत्रफल लगभग 7.056 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, जो पृथ्वी की सतह के जल-क्षेत्र का लगभग 20 प्रतिशत है। इसके उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ़्रीका और पूर्व में ऑस्ट्रेलिया है, और अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर तथा लक्षद्वीप सागर इसके सीमांत सागर हैं। भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह सबसे नया महासागर है, जो टेथिस सागर के टूटने से बना, और इसकी औसत गहराई 3,741 मीटर है।

यह सबसे गर्म महासागर भी है और उष्णकटिबंधीय उष्ण जल कुंड (Tropical Warm Pool) का केंद्र है, जिसका वायुमंडल से ऊष्मा का आदान-प्रदान क्षेत्रीय और वैश्विक जलवायु को प्रभावित करता है। इसका कारण इसकी आकृति में है। उत्तर में एशिया इस महासागर को बंद कर देता है, जिससे ऊष्मा का निर्यात रुकता है और हिंद महासागर की ताप प्रवणता का संवातन नहीं हो पाता। एशिया ही पृथ्वी के सबसे प्रबल मानसून को भी चलाता है, और यही मानसून आगे बताई गई धाराओं का प्रतिरूप तय करता है।

महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक और गर्म तथा ठंडी जलधाराएँ

महासागरीय धाराओं को प्रभावित करने वाले कारक: ऊष्मा, पवन, गुरुत्वाकर्षण और कोरियोलिस बल

महासागरीय धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के समान हैं: निश्चित मार्ग और दिशा में जल का नियमित प्रवाह। इन पर दो प्रकार के बल काम करते हैं। प्राथमिक बल जल की गति आरंभ करते हैं, और द्वितीयक बल धाराओं के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

  1. सौर ऊर्जा से जल का गर्म होना: गर्म होकर जल फैलता है, इसलिए विषुवत् वृत्त के पास महासागरीय जल का स्तर मध्य अक्षांशों की अपेक्षा लगभग 8 सेमी ऊँचा होता है। इस बहुत हल्के ढाल पर जल नीचे की ओर बहता है।
  2. पवन: सतह पर बहने वाली पवन जल को धकेलती है, और पवन तथा जल की सतह के बीच का घर्षण इस गति को आगे बढ़ाता है।
  3. गुरुत्वाकर्षण: गुरुत्वाकर्षण इकट्ठे हुए जल को ढाल पर नीचे खींचता है और जल-स्तर में अंतर पैदा करता है।
  4. कोरियोलिस बल: पृथ्वी के घूर्णन के कारण गतिशील जल उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाता है। इसी से हर महासागरीय बेसिन में बड़ी वृत्ताकार धाराएँ, वलय (gyres), बनती हैं।

ऊर्ध्वाधर गति घनत्व के अंतर से तय होती है। अधिक लवणीय या अधिक ठंडा जल अधिक सघन होता है और नीचे बैठता है, जबकि हल्का जल ऊपर उठता है; ध्रुवों के पास नीचे बैठा ठंडा जल धीरे-धीरे विषुवत् वृत्त की ओर बढ़ता है, और गर्म सतही जल उसकी जगह लेने विषुवत् वृत्त से बाहर की ओर बहता है। ऊपरी या सतही जलधाराएँ महासागरीय जल का लगभग 10 प्रतिशत हैं और 400 मीटर की गहराई तक रहती हैं; शेष 90 प्रतिशत गहरी जलधाराओं के रूप में है। धाराएँ सतह के पास सबसे तेज़ होती हैं, जहाँ उनकी गति 5 नॉट से अधिक हो सकती है, और गहराई में प्रायः 0.5 नॉट से भी कम।

गर्म और ठंडी जलधाराएँ और प्रादेशिक जलवायु पर उनका प्रभाव

तापमान के आधार पर भी धाराओं का वर्गीकरण होता है। ठंडी जलधारा ठंडा जल गर्म जल क्षेत्रों में लाती है और प्रायः दोनों गोलार्धों के निम्न और मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती है। गर्म जलधारा गर्म जल को ठंडे जल क्षेत्रों में पहुँचाती है और प्रायः निम्न और मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती है। ये धाराएँ अपने पास के तटों की जलवायु तय करती हैं।

  • ठंडे जल वाले पश्चिमी तट: उष्ण और उपोष्ण कटिबंध में, विषुवतीय क्षेत्रों को छोड़कर, इन तटों का औसत तापमान अपेक्षाकृत कम और दैनिक तथा वार्षिक तापांतर भी कम होता है। यहाँ कोहरा छाया रहता है, फिर भी ये क्षेत्र प्रायः शुष्क हैं।
  • गर्म जल वाले पश्चिमी तट: मध्य और उच्च अक्षांशों में गर्म जल एक अलग समुद्री जलवायु देता है, जिसमें ग्रीष्मऋतु अपेक्षाकृत कम गर्म और शीतऋतु अपेक्षाकृत मृदु होती है।
  • गर्म धाराओं वाले पूर्वी तट: उष्ण और उपोष्ण कटिबंध में यहाँ की जलवायु गर्म और आर्द्र होती है।
तालिका 1. हिंद महासागर की गर्म और ठंडी जलधाराएँ।
धारा कहाँ बहती है प्रकार
सोमाली धारा ग्रीष्म में सोमालिया और ओमान के साथ उत्तर की ओर, शीत में दक्षिण की ओर ठंडी सीमांत धारा
अगुलहास धारा अफ़्रीका के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर, 27° द से 40° द गर्म (निम्न और मध्य अक्षांशों का पूर्वी तट)
मोज़ाम्बिक धारा मोज़ाम्बिक चैनल से दक्षिण की ओर गर्म
लूविन धारा ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के पास दक्षिण की ओर गर्म
पश्चिम ऑस्ट्रेलिया धारा पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पास उत्तर की ओर ठंडी
दक्षिण विषुवतीय धारा विषुवत् वृत्त और लगभग 20° द के बीच पश्चिम की ओर वलय का पश्चिमगामी भाग
पश्चिमी पवन वाह अंटार्कटिका के चारों ओर पूर्व की ओर परिध्रुवीय वाह

मानसून वाह: ऋतु के साथ दिशा बदलती हिंद महासागर की धाराएँ

उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ दिशा क्यों बदलती हैं: स्थलखंड और मानसून पवनें

उष्णकटिबंधीय अटलांटिक और प्रशांत में विषुवत् वृत्त के उत्तर की सतही पवनें वर्ष भर उत्तर-पूर्व से चलती हैं, और उनके नीचे की धाराएँ वर्ष भर पश्चिम की ओर बहती हैं। हिंद महासागर इसलिए अलग है कि निम्न अक्षांशों पर एक महाद्वीपीय स्थलखंड इसकी पूरी उत्तरी सीमा बनाता है। स्थल जल की अपेक्षा जल्दी गर्म होता है, इसलिए एशिया पर वायुदाब ऋतु के साथ बदलता है, और उसके साथ महासागर पर चलने वाली पवनें भी।

  • शीत ऋतु: ठंडे एशियाई स्थलखंड पर उच्च दाब का विस्तृत क्षेत्र बनता है, जबकि गर्म महासागर पर दाब कम रहता है। इससे उत्तर-पूर्वी पवनें प्रबल होती हैं, जो अक्टूबर से अप्रैल तक चलती हैं।
  • ग्रीष्म ऋतु: भारतीय उपमहाद्वीप बहुत गर्म होकर उत्तर में निम्न दाब बनाता है। तब अरब सागर पर और सोमाली तट के साथ दक्षिण-पश्चिम से प्रबल पवनें चलती हैं, और मई से अक्टूबर तक दक्षिणी और पश्चिमी पवनें प्रबल रहती हैं।

जल ठीक पवन की दिशा में नहीं बहता। कोरियोलिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्ध में सतही प्रवाह पवन की दिशा से दाईं ओर मुड़ता है, इसलिए दक्षिण-पश्चिमी पवनें पूर्वगामी धाराएँ और उत्तर-पूर्वी पवनें पश्चिमगामी धाराएँ बनाती हैं। धाराओं के इस ऋतुवार पलटाव को मानसून वाह (monsoon drift) कहते हैं। विषुवत् वृत्त पर भी यहाँ प्रतिरूप अलग है: निरंतर विषुवतीय पूर्वी पवनें नहीं चलतीं, और चूँकि विषुवत् वृत्त पर पवनें वर्ष में दो बार दिशा बदलती हैं, वहाँ की सतही धारा पूर्व या पश्चिम, किसी भी ओर बह सकती है।

दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मानसून धाराएँ: मार्ग और समय

भारत के दक्षिण से गुज़रने वाली इन ऋतुवार पलटती धाराओं को शीत मानसून धारा और ग्रीष्म मानसून धारा, या उत्तर-पूर्वी मानसून धारा और दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा, कहते हैं। नाविक लगभग एक हज़ार वर्ष से इन्हें जानते थे, पर इनकी विस्तृत समझ 1960 के दशक के अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान के बाद ही बनी।

महीनेवार कैलेंडर। जनवरी से मार्च तक उत्तर-पूर्वी मानसून धारा पश्चिम की ओर बहती है, फ़रवरी में सबसे तेज़, लगभग 50 सेमी प्रति सेकंड, और 7 से 14 Sv जल ले जाती है; इसका मार्ग बंगाल की खाड़ी से भारत और श्रीलंका का चक्कर लगाकर लगभग 8° उत्तर पर है। अप्रैल से नवंबर तक दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा पूर्व की ओर बहती है, ग्रीष्म में लगभग 30 सेमी प्रति सेकंड, अरब सागर में 10° से 15° उत्तर के बीच से बंगाल की खाड़ी तक; सितंबर के मध्य में सोमाली धारा 37 Sv जल ले जा रही थी।
  • उत्तर-पूर्वी मानसून धारा: यह बंगाल की खाड़ी से भारत और श्रीलंका का चक्कर लगाकर लगभग 8° उत्तर पर अरब सागर को पार करती है, फिर सोमाली तट के साथ दक्षिण-पश्चिम की ओर विषुवत् वृत्त तक जाती है। यह केवल जनवरी से मार्च तक पश्चिम की ओर बहती है, फ़रवरी में लगभग 50 सेमी प्रति सेकंड के साथ सबसे तेज़ होती है, और अनुमानतः 7 से 14 Sv जल ले जाती है।
  • दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा: यह अरब सागर में 10° और 15° उत्तर के बीच रहती है, भारत और श्रीलंका का चक्कर लगाकर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है। यह अप्रैल से नवंबर तक पूर्व की ओर बहती है और ग्रीष्म में लगभग 30 सेमी प्रति सेकंड की चरम गति पाती है।
  • ग्रेट व्हर्ल: अफ़्रीका के सींग के पास, लगभग 10° उत्तर और 55° पूर्व पर एक वलय, जो केवल ग्रीष्म ऋतु में रहता है।

विषुवत् वृत्त के दक्षिण में चित्र अधिक स्थिर है। हिंद महासागर में पश्चिमगामी दक्षिण विषुवतीय धारा केवल विषुवत् वृत्त के दक्षिण में पूरी तरह विकसित होती है, और पूर्वगामी विषुवतीय प्रतिधारा, जो अटलांटिक और प्रशांत में लगभग 3° से 10° उत्तर पर बहती है, इस बेसिन में ऋतु के साथ गोलार्ध बदलने लगती है।

सोमाली धारा: पश्चिमी सीमांत धारा और उत्प्रवाह

सोमाली धारा सोमालिया और ओमान के तटों के साथ बहने वाली एक ठंडी सीमांत धारा है, जिसकी तुलना प्रायः अटलांटिक की गल्फ स्ट्रीम से की जाती है। यह किसी महासागर की पश्चिमी सीमा पर मिलने वाला एकमात्र बड़ा उत्प्रवाह तंत्र है, और मानसून ही इसे चलाता है। मई के मध्य से दक्षिण-पश्चिमी मानसून इसे लगभग 2.0 मीटर प्रति सेकंड की गति से उत्तर-पूर्व की ओर ले जाता है, जो जून में 3.5 मीटर प्रति सेकंड या उससे अधिक हो जाती है। लगभग 1,500 किमी चलकर, 6° से 10° उत्तर पर केप गार्डाफुई के पास, यह पूर्व की ओर मुड़कर मानसून धारा से मिल जाती है। सितंबर 1995 के मध्य में इसे 37 Sv जल ले जाते मापा गया।

इस तट का उत्प्रवाह पवन से उत्पन्न होता है। एक सँकरी, निचली पवन-धारा, सोमाली या फ़िंडलेटर जेट, सोमालिया और ओमान के तटों के समानांतर महासागर पर चलती है। जल पवन की दाईं ओर, तट से दूर धकेला जाता है, और उसकी जगह नीचे से ठंडा जल ऊपर आता है। जेट के नीचे खुले सागर का उत्प्रवाह तटीय उत्प्रवाह में जुड़ जाता है, और अगस्त-सितंबर तक उत्तरी सोमाली तट के पास ऊपर आया जल 17 °C से भी ठंडा हो सकता है।

शरद ऋतु में धारा कमज़ोर पड़ती है। दिसंबर के आरंभ में यह दिशा पलटती है, पहले 5° उत्तर के दक्षिण में और जनवरी तक 10° उत्तर तक, और उत्तरी गोलार्ध की शीत ऋतु भर 0.7 से 1.0 मीटर प्रति सेकंड की गति से दक्षिण की ओर बहती है।

दक्षिणी हिंद महासागर का वलय और अन्य महासागरों से संबंध

दक्षिणी वलय की दक्षिण विषुवतीय, अगुलहास और पश्चिम ऑस्ट्रेलिया धाराएँ

हिंद महासागर के प्रवाह पर दो बड़े वलयों का प्रभुत्व है: विषुवत् वृत्त के उत्तर में एक दक्षिणावर्त और उसके दक्षिण में एक वामावर्त। दक्षिणी वलय उपोष्णकटिबंधीय प्रतिचक्रवाती वलय (Subtropical Anticyclonic Gyre) है।

ग्रीष्म मानसून में हिंद महासागर की सतही धाराओं का मानचित्र। 1 ठंडी सोमाली धारा अफ़्रीका के सींग के साथ उत्तर की ओर बहती है; 2 ग्रीष्म मानसून धारा अरब सागर के आर-पार पूर्व की ओर, भारत और श्रीलंका का चक्कर लगाकर बंगाल की खाड़ी में जाती है; 11 ग्रेट व्हर्ल सोमालिया के पास घूमता है। विषुवत् वृत्त के दक्षिण में 3 दक्षिण विषुवतीय धारा पश्चिम की ओर बहती है, 4 पूर्वी मेडागास्कर धारा और 5 गर्म मोज़ाम्बिक धारा दक्षिण की ओर बहकर 6 गर्म अगुलहास धारा में मिलती हैं, 7 पश्चिमी पवन वाह पूर्व की ओर बहता है, 8 ठंडी पश्चिम ऑस्ट्रेलिया धारा उत्तर की ओर, 9 गर्म लूविन धारा पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है, और 10 इंडोनेशियाई प्रवाह प्रशांत महासागर से भीतर आता है।
  • दक्षिण विषुवतीय धारा: विषुवत् वृत्त और लगभग 20° दक्षिण के बीच पश्चिम की ओर बहती है। यह व्यापारिक पवनों से चलने वाला वलय का पश्चिमगामी भाग है।
  • पूर्वी मेडागास्कर और मोज़ाम्बिक धाराएँ: पूर्वी मेडागास्कर धारा 20° दक्षिण से मेडागास्कर के पूर्वी ओर दक्षिण की ओर बहती है, और मोज़ाम्बिक चैनल से गर्म सतही जल दक्षिण की ओर बहता है, प्रायः स्थिर धारा के बजाय बड़े भँवरों की शृंखला के रूप में। दोनों अगुलहास धारा को जल देती हैं।
  • अगुलहास धारा: दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर की पश्चिमी सीमांत धारा, जो अफ़्रीका के पूर्वी तट के साथ 27° से 40° दक्षिण तक दक्षिण की ओर बहती है। यह सँकरी, तीव्र और प्रबल है; लगभग 70 Sv के अनुमानित प्रवाह के साथ यह संभवतः विश्व की सबसे बड़ी पश्चिमी सीमांत धारा है, जबकि गल्फ स्ट्रीम का प्रवाह 34 Sv है।
  • पश्चिमी पवन वाह: अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा, जो वलय के दक्षिण में अंटार्कटिका के चारों ओर पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।
  • पश्चिम ऑस्ट्रेलिया और लूविन धाराएँ: ठंडी पश्चिम ऑस्ट्रेलिया धारा पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पास उत्तर की ओर बहती है, जबकि गर्म लूविन धारा उसी तट के पास दक्षिण की ओर, अर्थात् एक ही तट पर विपरीत दिशाओं में बहती धाराओं की असामान्य जोड़ी।

प्रशांत महासागर से हिंद महासागर का विषुवतीय संबंध अनूठा है। इंडोनेशियाई प्रवाह (Indonesian Throughflow) के माध्यम से गर्म और अपेक्षाकृत कम लवणीय जल प्रशांत से हिंद महासागर में आता है; यह वैश्विक ऊष्मा और लवण की कन्वेयर बेल्ट की एक मुख्य ऊपरी शाखा है। सुदूर पश्चिमी प्रशांत की समुद्री सतह औसतन पास के हिंद महासागर से ऊँची रहती है, और यही अंतर जल को मकास्सर जलसंधि से ढाल पर नीचे की ओर बहाता है। लगभग 15 प्रतिशत जल 300 मीटर गहरी और लगभग 35 किमी चौड़ी सँकरी लोम्बोक जलसंधि से, और लगभग 85 प्रतिशत तिमोर तथा ओम्बाई मार्गों से निकलता है।

जल अन्य मार्गों से भी आता-जाता है। जहाँ अगुलहास धारा अपने ऊपर मुड़ती है, वहाँ से 15 Sv तक हिंद महासागर का जल अफ़्रीका के सिरे के पार दक्षिण अटलांटिक में रिस जाता है। गहराई में लगभग 11 Sv गहरा जल भीतर आता है, जिसका अधिकांश परिध्रुवीय गहन जल है; उत्तरी अटलांटिक गहन जल अफ़्रीका के दक्षिण में 2,000 से 3,000 मीटर की गहराई पर पहुँचता है, और अंटार्कटिक तली जल उससे भी नीचे है। ये गहरी जल राशियाँ कैसे बनती हैं, यह महासागरीय जल का तापमान और जल राशियाँ लेख में समझाया गया है।

हिंद महासागर की लवणता: अरब सागर की लवणता और बंगाल की खाड़ी

अरब सागर बंगाल की खाड़ी से अधिक लवणीय क्यों है

भारत के दोनों सागर समान अक्षांशों पर हैं, फिर भी अरब सागर की लवणता बंगाल की खाड़ी से कहीं अधिक है। सतही लवणता अरब सागर में सबसे अधिक, 36 PSU से ऊपर है, क्योंकि वहाँ वाष्पन वर्षण से अधिक होता है। बंगाल की खाड़ी में यह सबसे कम, लगभग 33 PSU है, क्योंकि वहाँ नदियों का अपवाह और वर्षा अधिक है। इनके बीच, दक्षिण-पूर्वी अरब सागर में लवणता 34 से नीचे आ जाती है, और सुमात्रा के पश्चिमी तट पर इंडोनेशियाई प्रवाह तथा वर्षा इसे लगभग 34 पर रखते हैं।

सतही लवणता का क्षैतिज दंड-आरेख, अक्ष 30 से 37 PSU: अरब सागर 36 से अधिक, दक्षिण-पूर्वी अरब सागर 34 से कम, सुमात्रा का पश्चिमी तट लगभग 34, बंगाल की खाड़ी लगभग 33।

अंतर का कारण नदियाँ हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी, सभी बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, जो हिंद महासागर में पहुँचने वाले अपवाह जल का आधे से अधिक, लगभग 2,950 घन किलोमीटर प्रति वर्ष, देती है। अरब सागर को कम मीठा जल मिलता है और वाष्पन से वह अधिक जल खोता है, इसलिए वह लवणीय बना रहता है। इन आँकड़ों के पीछे का वैश्विक लवणता प्रतिरूप महासागरीय लवणता: परिभाषा और वितरण (अंग्रेज़ी में) लेख में है।

मानसून धाराएँ दोनों सागरों को अलग नहीं रहने देतीं। जून से सितंबर तक पूर्वगामी ग्रीष्म धारा अरब सागर का अधिक लवणीय जल बंगाल की खाड़ी में ले जाती है। जनवरी से अप्रैल तक प्रवाह पलट जाता है, और पूर्वी भारत तटीय धारा खाड़ी का जल पश्चिम की ओर अरब सागर में ले जाती है। खाड़ी का मीठा अपवाह विषुवत् वृत्त पार करके दक्षिण की ओर भी जाता है, इंडोनेशियाई प्रवाह के कम लवणीय जल से मिलता है, और दक्षिणी उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में दक्षिण विषुवतीय धारा में जुड़ जाता है।

इसलिए उत्तरी हिंद महासागर की लवणता स्थान के साथ-साथ ऋतु के साथ भी बदलती है। इन सागरों की लवणता का मानसून, एल नीनो और हिंद महासागर द्विध्रुव से संबंध हिंद महासागर द्विध्रुव और मानसून (अंग्रेज़ी में) लेख में है, और विश्व के सबसे अधिक लवणता वाले सागर पर सबसे अधिक लवणता वाला सागर लेख है।

हिंद महासागर की धाराएँ, मत्स्य-उद्योग और नौचालन

उत्प्रवाह, पादप प्लवक और हिंद महासागर के मत्स्य क्षेत्र

मछलियाँ कहाँ मिलेंगी, इसमें धाराओं की बड़ी भूमिका है। जहाँ गर्म और ठंडी जलधाराएँ मिलती हैं, वहाँ ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है और प्लैंकटन बढ़ते हैं, जो मछलियों का प्रमुख भोजन हैं; संसार के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र इन्हीं मिश्रण क्षेत्रों में पाए जाते हैं। हिंद महासागर में मानसून उत्प्रवाह इसमें और जोड़ता है। प्रबल मानसून पवनें तटीय और खुले सागर में उत्प्रवाह कराती हैं, जो पोषक तत्वों को प्रकाश वाली ऊपरी परत तक लाता है, और ग्रीष्म में पश्चिमी हिंद महासागर उष्णकटिबंधीय महासागरों में पादप प्लवक प्रस्फुटन के सबसे बड़े केंद्रों में से एक बन जाता है।

  • उत्प्रवाह कहाँ होता है: उत्तरी गोलार्ध में अफ़्रीका के सींग और अरब प्रायद्वीप के पास, और दक्षिणी गोलार्ध में व्यापारिक पवनों के उत्तर में।
  • इससे क्या पलता है: अरब सागर को पृथ्वी के सबसे जैविक रूप से उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है, और सबसे मूल्यवान ट्यूना पकड़ में हिंद महासागर का हिस्सा दूसरे स्थान पर है।
  • उत्पादकता की कीमत: अरब सागर में विश्व के तीन सबसे बड़े ऑक्सीजन-न्यून क्षेत्रों में से एक है, और विश्व में सबसे कम ऑक्सीजन ओमान की खाड़ी में है।

INCOIS की संभावित मत्स्यन क्षेत्र सलाह: धाराओं और समुद्री सतह के तापमान का उपयोग

भारत इस विज्ञान को दैनिक सलाह में बदलता है। भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS), जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन 1998 में बना हैदराबाद स्थित एक स्वायत्त निकाय है, संभावित मत्स्यन क्षेत्र (Potential Fishing Zone) की सलाह जारी करता है। भारत की 8,100 किमी से लंबी तटरेखा पर लगभग 70 लाख लोग मत्स्यन पर निर्भर हैं, और मछलियों के झुंड खोजने में उनका समय और पैसा लगता है।

  • क्षेत्र कैसे पहचाने जाते हैं: उपग्रह समुद्री सतह का तापमान और क्लोरोफ़िल मापते हैं; इन आँकड़ों में दिखने वाले अग्रभाग, भँवर, वलय और उत्प्रवाह क्षेत्र बताते हैं कि मछलियाँ कहाँ इकट्ठी होती हैं।
  • सलाह मछुआरों तक कैसे पहुँचती है: गुजरात से निकोबार द्वीप समूह तक 14 तटीय क्षेत्रों में बँटे 586 मत्स्य अवतरण केंद्रों के लिए प्रतिदिन, हर क्षेत्र की अपनी भाषा में मानचित्र और पाठ के रूप में, पवन की गति और दिशा सहित, ताकि खिसकते क्षेत्र का पता चलता रहे।
  • सेवा कब रुकती है: यह मत्स्यन प्रतिबंध की अवधि और चक्रवात, ऊँची लहरों या सुनामी के समय को छोड़कर वर्ष भर चलती है।

हिंद महासागर के अपेक्षाकृत शांत जल ने इसके तटों को अटलांटिक या प्रशांत से पहले व्यापार के लिए खोल दिया, और प्रबल मानसून ने नौकायन की लय तय की। जहाज़ ऋतु के आरंभ में पश्चिम की ओर जा सकते थे, कुछ महीने रुककर पूर्व की ओर लौटते थे, और पश्चिमी नाविक भी इसी मानसून से महासागर पार करते थे; पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में अफ़्रीका के सींग और भारत के बीच इस व्यापार का वर्णन करता है।

पाल वाले जहाज़ों के युग में पवनों और धाराओं का ज्ञान आज से भी अधिक आवश्यक था, और यह महासागर आज भी विश्व व्यापार के लिए, विशेषकर तेल और अन्य हाइड्रोकार्बन के लिए, बहुत महत्त्वपूर्ण है। सतही धारा के साथ चलने से ईंधन का खर्च घटता है, इसलिए धाराओं का ज्ञान जहाज़रानी के लिए आज भी आवश्यक है। धाराएँ ख़तरनाक भी हो सकती हैं: दक्षिण अफ़्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट के पास, अगुलहास धारा के क्षेत्र में और मध्य-पूर्व से यूरोप के मुख्य जहाज़ी मार्ग पर, असामान्य दैत्य लहरें 30 मीटर से ऊँची हो सकती हैं, और 1981 से 1991 के बीच वहाँ लगभग 30 बड़े जहाज़ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए या डूब गए।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2022, सामान्य अध्ययन-Iसमुद्री धाराओं को प्रभावित करने वाली शक्तियाँ कौन सी हैं? विश्व के मत्स्य-उद्योग में इनके योगदान का वर्णन करें।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: वर्णन करें · दृष्टिकोण: हर बल को उसकी क्रिया-विधि की एक पंक्ति के साथ लिखें, फिर नामित उदाहरणों सहित मत्स्य-उद्योग में धाराओं का योगदान बताएँ, और अंत में आज इस ज्ञान के उपयोग पर समाप्त करें।

    भूमिका: महासागरीय धारा को निश्चित मार्ग पर जल के नियमित प्रवाह के रूप में परिभाषित करें, जिसे प्राथमिक बल चलाते हैं और द्वितीयक बल नियंत्रित करते हैं।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्राथमिक बल: सौर ऊर्जा से गर्म होना (विषुवत् वृत्त पर जल लगभग 8 सेमी ऊँचा), पवन और घर्षण, गुरुत्वाकर्षण, और कोरियोलिस बल, जो उत्तर में दाईं और दक्षिण में बाईं ओर मोड़कर वलय बनाता है।
    • घनत्व: अधिक ठंडा और लवणीय जल नीचे बैठता है; ठंडा जल ध्रुवों से गहराई में और गर्म जल सतह पर विषुवत् वृत्त से बाहर फैलता है।
    • मिश्रण से मत्स्यन: गर्म और ठंडी धाराओं के मिलन पर ऑक्सीजन और प्लैंकटन बढ़ते हैं, और यहीं संसार के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र हैं।
    • उत्प्रवाह से मत्स्यन: मानसून और सोमाली धारा पश्चिमी हिंद महासागर में पोषक तत्व ऊपर लाते हैं; अरब सागर सबसे उत्पादक सागरों में है और मूल्यवान ट्यूना पकड़ में हिंद महासागर दूसरे स्थान पर है।
    • आज का उपयोग: भारत का INCOIS समुद्री सतह के तापमान और क्लोरोफ़िल से प्रतिदिन मत्स्यन क्षेत्र की सलाह देता है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि जो बल जल को चलाते हैं वही पोषक तत्वों को भी चलाते हैं, इसलिए धाराओं का मानचित्र बहुत हद तक विश्व के मत्स्य क्षेत्रों का मानचित्र है।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-Iमहासागरी धाराओं की उत्पत्ति के उत्तरदायी कारकों को स्पष्ट कीजिए। वे प्रादेशिक जलवायुओं, समुद्री जीवन तथा नौचालन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: स्पष्ट कीजिए · दृष्टिकोण: उत्पत्ति के कारक संक्षेप में स्पष्ट करें, फिर जलवायु, समुद्री जीवन और नौचालन को क्रम से लें, हर एक में हिंद महासागर का एक उदाहरण देकर।

    भूमिका: बताएँ कि धाराएँ सौर ऊर्जा से गर्म होने, पवन, गुरुत्वाकर्षण और कोरियोलिस बल से उत्पन्न होती हैं, और घनत्व उनकी ऊर्ध्वाधर गति तय करता है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्रादेशिक जलवायु: उष्ण कटिबंध में ठंडी धाराओं वाले पश्चिमी तटों पर कम तापमान, कोहरा और शुष्कता; उच्च अक्षांशों के गर्म जल वाले पश्चिमी तटों पर मृदु समुद्री जलवायु; गर्म धाराओं वाले उष्णकटिबंधीय पूर्वी तट गर्म और आर्द्र।
    • समुद्री जीवन: मिश्रण क्षेत्र और उत्प्रवाह, जैसे ग्रीष्म मानसून में सोमालिया और ओमान के पास, सबसे समृद्ध मत्स्य क्षेत्र बनाते हैं।
    • नौचालन: जहाज़ मानसून के आरंभ में पश्चिम जाकर महीनों बाद पूर्व लौटते थे; धारा के साथ चलने से ईंधन बचता है, जबकि अगुलहास धारा के क्षेत्र में लहरों ने बड़े जहाज़ों को क्षति पहुँचाई है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि धाराएँ महासागर को आसपास के स्थलों की जलवायु, भोजन और व्यापार से जोड़ती हैं, और मानसून से चलने वाले हिंद महासागर में यह संबंध सबसे स्पष्ट है।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1997 (हिंदी रूपांतर)हिंद महासागर में महासागरीय धाराओं की नियमित दिशा में परिवर्तन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारक उत्तरदायी है?
    1. a हिंद महासागर 'आधा महासागर' है
    2. b हिंद महासागर में मानसून वाह है
    3. c हिंद महासागर एक स्थलरुद्ध महासागर है
    4. d हिंद महासागर की लवणता में अधिक भिन्नता है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: चरण 1: प्रश्न पूछता है कि धाराओं की दिशा कौन बदलता है। चरण 2: उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ मानसून पवनों के साथ चलती हैं, अप्रैल से नवंबर तक पूर्व और जनवरी से मार्च तक पश्चिम की ओर। चरण 3: यही ऋतुवार पलटाव मानसून वाह है, विकल्प (b)।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (a) उस आकृति का नाम लेता है जो मानसून को संभव बनाती है, पर धाराओं को वास्तव में मानसून वाह ही मोड़ता है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 'आधा महासागर': गलत। बंद उत्तरी सीमा बताती है कि मानसून प्रबल क्यों है, पर आकृति स्वयं धारा को नहीं पलटती।
    • (b) मानसून वाह: सही। मानसून पवनों के पलटने के साथ धाराएँ पलटती हैं।
    • (c) स्थलरुद्ध महासागर: गलत। हिंद महासागर केवल उत्तर में बंद है, दक्षिण में खुला है।
    • (d) लवणता में अधिक भिन्नता: गलत। सतही धाराएँ पवन के साथ चलती हैं; लवणता के अंतर उन्हें हर ऋतु में नहीं पलटते।

    उत्तर: मानसून वाह: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि मानसून पवनें हर ऋतु में विषुवत् वृत्त के उत्तर की धाराओं को पलट देती हैं।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2012 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कारकों पर विचार कीजिए:
    1. पृथ्वी का घूर्णन
    2. वायुदाब और पवन
    3. समुद्री जल का घनत्व
    4. पृथ्वी की परिक्रमा

    उपर्युक्त में से कौन-से कारक महासागरीय धाराओं को प्रभावित करते हैं?

    1. a केवल 1 और 2
    2. b 1, 2 और 3
    3. c 1 और 4
    4. d 2, 3 और 4
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: घूर्णन कोरियोलिस बल से गतिशील जल को मोड़ता है, इसलिए 1 सही है। चरण 2: पवन सतही जल को धकेलती है और पवन वायुदाब से चलती है, इसलिए 2 सही है। चरण 3: घनत्व ठंडे और लवणीय जल को नीचे बैठाता है, इसलिए 3 सही है। चरण 4: परिक्रमा जल को चलाने वाले बलों में नहीं है, इसलिए 4 नहीं। उत्तर 1, 2 और 3।

    इस भ्रम से बचें: परिक्रमा घूर्णन जितनी ही प्रासंगिक लगती है, पर कोरियोलिस बल केवल घूर्णन से उत्पन्न होता है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1 और 2: गलत। इसमें घनत्व छूट गया है, जो धाराओं की ऊर्ध्वाधर गति तय करता है।
    • (b) 1, 2 और 3: सही। घूर्णन, वायुदाब और पवन, तथा घनत्व, तीनों धाराओं को प्रभावित करते हैं।
    • (c) 1 और 4: गलत। परिक्रमा धाराओं पर कोई बल नहीं है, और पवन तथा घनत्व छूट गए हैं।
    • (d) 2, 3 और 4: गलत। इसमें परिक्रमा है और घूर्णन छूट गया है।

    उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि घूर्णन, वायुदाब और पवन, तथा घनत्व धाराओं को प्रभावित करते हैं, परिक्रमा नहीं।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।