परिचय

भारत में कुक्कुट पालन की समस्याएँ वे लागतें और जोखिम हैं जो मुर्गी पालने वाले किसान को दबाते हैं: मक्का से बना महँगा आहार, अंडों और ब्रॉयलर के दामों का उतार-चढ़ाव, रोग और प्रतिजैविकों का दुरुपयोग, एक कंपनी के अनुबंध पर निर्भरता, ऋण और ज़मीन तक कमज़ोर पहुँच, और दक्षिण के कुछ राज्यों में सिमटा उत्पादन।

भारत में कुक्कुट पालन की समस्याएँ: एक परिचय

कुक्कुट पालन की प्रमुख चुनौतियाँ एक नज़र में

2024-25 में भारत ने 149.11 अरब अंडे और 51.8 लाख टन कुक्कुट मांस का उत्पादन किया, और यह क्षेत्र हर वर्ष 7 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। इतनी तेज़ वृद्धि के पीछे उस किसान का दबाव छिप जाता है जो पक्षी पालता है। कुक्कुट पालन की चुनौतियाँ छह समूहों में आती हैं:

  • आहार: हर खेप के लिए किसान आहार ख़रीदता है, और उसका दाम मक्का के बाज़ार के साथ चलता है।
  • दाम और विपणन: अंडों और ब्रॉयलर के दाम घटते-बढ़ते हैं, और बहुत-सा चिकन अब भी जीवित पक्षी के रूप में बिकता है।
  • रोग और प्रतिजैविक: बर्ड फ़्लू का प्रकोप झुंड को मार सकता है और बाज़ार बंद करा सकता है; प्रतिजैविकों का दुरुपयोग प्रतिरोध पैदा करता है।
  • अनुबंध की शर्तें: कंपनी के लिए पक्षी पालने वाला छोटा किसान एक ही ख़रीदार पर निर्भर रहता है।
  • ऋण, ज़मीन और मान्यता: छोटे और पट्टेदार किसानों तथा अनेक महिलाओं के लिए संस्थागत ऋण पाना कठिन है।
  • क्षेत्रीय असमानता: कुछ राज्य प्रति व्यक्ति शेष देश से कहीं अधिक अंडे पैदा करते हैं।

यह उद्योग कैसे संगठित है, और इसे सहकारी समितियों के बजाय निजी कंपनियों ने क्यों खड़ा किया, यह भारत का पोल्ट्री उद्योग में समझाया गया है। यह पृष्ठ उसी उद्योग को उसकी समस्याओं और उनके समाधानों की ओर से देखता है।

पोल्ट्री फीड की लागत: मक्का, सोयाबीन और एथनॉल का दबाव

पोल्ट्री फीड किसान का मुनाफ़ा कैसे तय करता है

आधुनिक मुर्गी अनाज को बहुत तेज़ी से मांस और अंडे में बदलती है, इसलिए पोल्ट्री फीड की लागत हर खेप पर भारी पड़ती है। ब्रॉयलर चार से छह सप्ताह की आयु में बिकने लायक वज़न पा लेता है, और हर किलो वज़न बढ़ाने में उसे लगभग 1.6 किलो आहार लगता है। इसी अनुपात को आहार रूपांतरण अनुपात (feed conversion ratio, FCR) कहते हैं: बढ़े हुए हर किलो वज़न पर खाया गया आहार। अनुपात जितना कम, पक्षी उतना कुशल।

आहार के दो सबसे महत्त्वपूर्ण अनाज मक्का और सोयाबीन हैं, और वाणिज्यिक फार्म हर खेप के लिए इन्हें तैयार आहार के रूप में ख़रीदता है। बेहतर नस्ल, शेड और स्वास्थ्य-देखभाल से किसान यह अनुपात सुधार सकता है, किन्तु मक्का का दाम उसके हाथ में नहीं है। मक्का महँगा होते ही हर अंडे और हर किलो चिकन की लागत बढ़ जाती है, जबकि बिक्री का दाम उतना बढ़े, यह ज़रूरी नहीं।

एथनॉल मिश्रण और गर्मी: मक्का पर दो दबाव

पेट्रोल में एथनॉल मिलाने के कार्यक्रम ने मक्का को आहार के साथ-साथ ईंधन की फ़सल भी बना दिया है। E20 पेट्रोल, अर्थात् 20 प्रतिशत एथनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल, 6 फ़रवरी 2023 से बिकने लगा। अगस्त 2026 में सरकार ने बताया कि देश में बनने वाले एथनॉल का लगभग तीन-चौथाई अब अनाज से आता है, और कच्चे माल में गन्ने की जगह मक्का का बड़ा हिस्सा हो गया है। मक्का निर्यात की कमाई घटी, और 2025 में भारत मक्का का शुद्ध आयातक रहा।

इसलिए कुक्कुट किसान एक ही अनाज के लिए आसवनियों से होड़ करते हैं। ईंधन के लिए खाद्यान्न का यह उपयोग खाद्य सुरक्षा पर भी असर डालता है, यह बात E20 पर चल रही बहस में उठी है। दूसरा दबाव जलवायु का है: औसत वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री की वृद्धि मक्का, चावल, सोयाबीन और गेहूँ की उपज को लगभग 6 प्रतिशत घटा देती है।

प्रवाह चित्र: एथनॉल मिश्रण, जिसमें भारत का लगभग तीन-चौथाई एथनॉल अब अनाज से बनता है, मक्का की माँग बढ़ाता है; 2025 में भारत मक्का का शुद्ध आयातक रहा; मक्का और सोयाबीन आहार के मुख्य अनाज हैं; ब्रॉयलर को हर किलो भार बढ़ाने में लगभग 1.6 किलो आहार लगता है। गर्मी दूसरा दबाव जोड़ती है: हर 1 °C तापवृद्धि मक्का, चावल, सोयाबीन और गेहूँ की उपज लगभग 6 प्रतिशत घटाती है।

कुक्कुट पालन में दामों का उतार-चढ़ाव और विपणन की बाधाएँ

अंडे और ब्रॉयलर के दाम, निर्यात और व्यापार का दबाव

अंडे और ब्रॉयलर अलग-अलग दबाव में बिकते हैं। ब्रॉयलर को बिकने लायक वज़न पर पहुँचते ही बेचना पड़ता है, इसलिए किसान अच्छे दाम की प्रतीक्षा नहीं कर सकता; जबकि अंडे कुछ समय टिकते हैं और एक उत्पादन केंद्र से दूसरे तक जाते हैं। 1980 के दशक की शुरुआत में अंडों का दाम उत्पादन लागत से नीचे चला गया, तब किसानों ने राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति (NECC) बनाई, जो 1982 से अंडों के दैनिक और मासिक दाम जारी करती है; ये सांकेतिक दाम माने जाते हैं।

उपभोक्ता की ओर भी दाम घटते-बढ़ते हैं। जुलाई 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में मांस और अंडे उन वस्तुओं में थे जिनकी मुद्रास्फीति दो अंकों में रही। सितंबर 2026 में घर पर बनी मांसाहारी थाली की लागत एक वर्ष में 6 प्रतिशत बढ़ी, जो शाकाहारी थाली से कम थी, क्योंकि ब्रॉयलर के दाम धीमे बढ़े। खुदरा दाम बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि किसान की कमाई बढ़ी: आहार की लागत फार्म पर मिलने वाले दाम से तेज़ बढ़े तो उसका मुनाफ़ा घटता है।

घरेलू बाज़ार की भीड़ से निकलने का रास्ता निर्यात है, पर यह धीमा रहा है। 2024-25 में अंडों और अंडा उत्पादों का निर्यात ₹1,308 करोड़ पर ठहरा रहा, जो ठहराव का संकेत है, जबकि भैंस का मांस पशुधन का सबसे बड़ा निर्यात बना रहा। व्यापार प्रतिस्पर्धा भी लाता है। जून 2026 में किसान संगठनों और कुक्कुट व्यापारियों ने सरकार से अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार वार्ता रोकने को कहा, क्योंकि उनके अनुसार सब्सिडी वाली अमेरिकी उपज घरेलू उत्पादकों को नष्ट कर देगी। रोग-मुक्त कम्पार्टमेंट से निर्यात की चर्चा भारत का पोल्ट्री उद्योग में है।

परिवहन एवं विपणन की बाधाएँ: जीवित पक्षी और शीत शृंखला

भारत में बहुत-सा चिकन अब भी जीवित पक्षी के रूप में ख़रीदार तक पहुँचता है, और जीवित पक्षियों से ठंडे तथा जमे चिकन की ओर बदलाव इस उद्योग की आगे की वृद्धि की एक कुंजी है। जो बाज़ार अनेक फार्मों से जीवित पक्षी इकट्ठा करता है, वह उनके रोग भी इकट्ठा करता है: एवियन इन्फ़्लुएंज़ा के विषाणु घरेलू और वाणिज्यिक कुक्कुट तथा जीवित पक्षी बाज़ारों में पाए गए हैं, और जीवित पक्षियों की आवाजाही रानीखेत रोग को नए क्षेत्र में ला सकती है।

  • जल्दी खराब होना: ठंडे या जमे चिकन को प्रसंस्करण संयंत्र से दुकान तक प्रशीतन चाहिए, और असंगठित खाद्य व्यापार में स्वच्छता, प्रशीतन और नियमों के पालन में अब भी कमियाँ हैं।
  • आवाजाही पर रोक: बर्ड फ़्लू के प्रकोप में संक्रमित और आसपास के पक्षी मारे जाते हैं और आवाजाही रोकी जाती है, इसलिए बिक्री थम जाती है।
  • बाज़ार का ढाँचा: दिल्ली का ग़ाज़ीपुर कुक्कुट बाज़ार ₹193.29 करोड़ की लागत से बन रहा है, जिसमें 100 थोक व्यापारियों की दुकानें और 120 प्रसंस्करण इकाइयाँ होंगी।

कुक्कुट पालन में रोग, प्रतिजैविक और खाद्य सुरक्षा

कुक्कुट पालन के नुकसान: रोग और प्रतिजैविकों का दुरुपयोग

रोग कुक्कुट व्यवसाय को बहुत जल्दी ख़त्म कर सकता है। अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ़्लुएंज़ा झुंड के 100 प्रतिशत पक्षियों को मार सकता है, और हर प्रकोप उत्पादन घटाता है, मौतें बढ़ाता है और नियंत्रण का ख़र्च लाता है। बर्ड फ़्लू, रानीखेत रोग और अन्य कुक्कुट रोग कैसे फैलते हैं और फार्म उन्हें कैसे बाहर रखते हैं, यह भारत में कुक्कुट रोग में समझाया गया है।

स्वास्थ्य की दूसरी समस्या प्रतिजैविक हैं। संक्रमण रोकने और वृद्धि तेज़ करने के लिए इन्हें कभी-कभी पशुओं और कुक्कुट के आहार में मिलाया जाता है, जबकि ये रोग के उपचार के लिए हैं, रोकथाम के लिए नहीं। चिकित्सा की तरह कृषि में भी इनका अति-उपयोग रोगाणुरोधी प्रतिरोध (antimicrobial resistance) बढ़ाता है, अर्थात् सूक्ष्मजीवों का उन दवाओं से बच निकलना जो उन्हें मारने के लिए बनी हैं। भारत ने नवंबर 2025 में रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर दूसरी राष्ट्रीय कार्य योजना (2025-29) शुरू की।

खाद्य सुरक्षा इन दोनों को जोड़ती है। आँत का संक्रमण करने वाला गैर-टाइफ़ॉइड साल्मोनेला प्रायः कुक्कुट, अंडों और अन्य पशु-आधारित भोजन से जुड़ा होता है, और प्रतिजैविक प्रतिरोध गंभीर संक्रमणों का इलाज कठिन बना रहा है। संदूषण फार्म से थाली तक कई जगह हो सकता है, इसलिए कुक्कुट और अंडों को अच्छी तरह पकाना और कच्चे मांस को पके भोजन से अलग रखना ज़रूरी है। आहार से खाद और फिर मिट्टी तक अवशेष कैसे पहुँचते हैं, यह मुर्गी की खाद और संधारणीय कुक्कुट पालन में है।

छोटे कुक्कुट किसान: अनुबंध, ज़मीन और ऋण

क्या भारत में मुर्गी पालन लाभदायक है? संविदा कृषि और उसकी शर्तें

भारत के कुक्कुट क्षेत्र में संविदा कृषि (contract farming) व्यापक है। इसमें कंपनी चूज़े, आहार और पशु-चिकित्सा सहायता देती है, किसान शेड और श्रम लगाता है, और बड़े पक्षी कंपनी वापस ख़रीद लेती है। इससे किसान को निश्चित बाज़ार और उत्पादन में सहायता मिलती है, और रोग या मौसम का जोखिम घट सकता है।

क्या भारत में मुर्गी पालन लाभदायक है? हो सकता है, पर मुनाफ़ा तीन ऐसी चीज़ों पर टिका है जो किसान के हाथ में नहीं: आहार-अनाज का दाम, रोग और बिक्री का दाम। संविदा कृषि इस जोखिम का बड़ा हिस्सा कंपनी पर डाल देती है। एशियाई विकास बैंक के 2023 के एक अध्ययन में पाया गया कि भारत की एक बड़ी पोल्ट्री कंपनी के लिए पक्षी पालने वाले छोटे किसानों की आजीविका संविदा कृषि से सुधरी, और दामों के उतार-चढ़ाव, रोग के प्रकोप तथा आहार के दाम बढ़ने का जोखिम घटा।

  • एक ही ख़रीदार: कंपनी कभी तय दाम या तय मात्रा पर नहीं ख़रीदती, या उपज की श्रेणी घटा देती है।
  • भुगतान में देरी: देर से भुगतान कंपनी पर किसान का भरोसा तोड़ देता है।
  • महिलाएँ बाहर: अनुबंध प्रायः पुरुष के नाम होता है, भुगतान भी उसी को मिलता है, और काम करने वाली महिलाओं को प्रशिक्षण नहीं मिलता।
  • क़ानूनी संरक्षण नहीं: संविदा कृषि पर केंद्रीय क़ानून, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020, को संसद ने 29 नवंबर 2021 को निरस्त कर दिया।
संविदा कुक्कुट पालन का आरेख: कंपनी चूज़े, आहार और पशु-चिकित्सा सहायता देती है और बड़े पक्षी वापस ख़रीदती है; किसान शेड और श्रम देता है और पक्षियों को पालता है। अनुबंध दामों के उतार-चढ़ाव, रोग के प्रकोप और आहार के दाम बढ़ने का जोखिम घटाता है; एक ही ख़रीदार की शर्तें, भुगतान में देरी और अनुबंधों तथा प्रशिक्षण से महिलाओं का बाहर रहना, ये जोखिम बचे रहते हैं।

छोटी भूमि जोत और आदर्श भूमि पट्टा अधिनियम

भारत के अधिकांश खेत छोटे हैं: लगभग 86 प्रतिशत भूमि जोत दो हेक्टेयर से कम हैं, और औसत जोत लगभग 1.1 हेक्टेयर है। कुक्कुट शेड के लिए कम ज़मीन चाहिए, इसलिए यह छोटे किसानों के अनुकूल है। किन्तु जो किसान अनौपचारिक रूप से ज़मीन किराए पर लेता है, उसके पास पट्टे का कोई रिकॉर्ड नहीं होता, और ऐसे अनौपचारिक पट्टेदारों को संस्थागत ऋण, बीमा और अन्य सहायता सेवाएँ नहीं मिलतीं।

नीति आयोग की टी. हक़ की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने 2016 में आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम का प्रारूप बनाया। इसका प्रस्ताव है कि पट्टे को वैध किया जाए, ताकि भू-स्वामी का स्वामित्व सुरक्षित रहे और पट्टेदार को तय अवधि तक सुरक्षा मिले; शर्तें दोनों पक्ष आपस में तय करें; और बटाईदारों सहित सभी पट्टेदारों को बीमा और बैंक ऋण मिले। भूमि राज्य का विषय है, इसलिए इसे अपनाना हर राज्य पर निर्भर है।

मुर्गी पालन लोन: किसान क्रेडिट कार्ड और सब्सिडी

किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना अगस्त 1998 में नाबार्ड के बनाए मॉडल पर शुरू हुई और 2019 तक पशुपालन और मत्स्यपालन तक बढ़ा दी गई। भारतीय रिज़र्व बैंक के 2026 के निर्देशों के अनुसार, जो 1 जनवरी 2027 से स्वीकृत ऋणों पर लागू होंगे, KCC छह वर्ष की अवधि वाली एक समग्र सुविधा है, और कुक्कुट पक्षियों का पालन उन सहायक गतिविधियों में गिनाया गया है जिनके लिए यह ऋण देता है।

तालिका 1. रिज़र्व बैंक के 2026 के निर्देशों के अनुसार किसान क्रेडिट कार्ड से मिलने वाला ऋण।
अल्पकालीन ऋण (एक सीमा) दीर्घकालीन निवेश ऋण
फ़सल की खेती और कुक्कुट जैसी सहायक गतिविधियाँ भूमि विकास और लघु सिंचाई
फ़सल कटाई या उत्पादन के बाद के ख़र्च कृषि उपकरणों की ख़रीद
कृषक परिवार की उपभोग आवश्यकताएँ पशु या पक्षी शेड का निर्माण
फार्म और सहायक परिसंपत्तियों का रख-रखाव; बीमा; विपणन ऋण पशुधन की ख़रीद

राष्ट्रीय पशुधन मिशन कम आदान वाली तकनीक के पक्षियों की ग्रामीण कुक्कुट इकाई के लिए 50 प्रतिशत, अधिकतम ₹25 लाख, की एकमुश्त पूँजी सब्सिडी देता है। बची हुई कमी मान्यता की है। योजनाओं का लाभ प्रायः ज़मीन के स्वामित्व से जुड़ा है, इसलिए पशुपालन और कुक्कुट पालन में लगी महिलाओं को अक्सर किसान नहीं माना जाता; महाराष्ट्र का 2026 का महिला किसान विधेयक इसी को बदलने के लिए तैयार हुआ।

भारत में कुक्कुट पालन की क्षेत्रीय असमानता

राज्यवार प्रति व्यक्ति अंडा उत्पादन: दक्षिण और शेष भारत

भारत में कुक्कुट पालन कुछ ही राज्यों में सिमटा है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना मिलकर देश के लगभग आधे, 46.98 प्रतिशत, अंडे देते हैं, और दस राज्यों में कुल कुक्कुट पक्षियों का लगभग 78 प्रतिशत है। यह अंतर सबसे साफ़ तब दिखता है जब हर राज्य के अंडा उत्पादन को उसकी जनसंख्या से भाग दिया जाए।

2024-25 में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष उत्पादित अंडों का स्तंभ चित्र: आंध्र प्रदेश 514, तेलंगाना 506, तमिलनाडु 302, हरियाणा 299, पश्चिम बंगाल 161, कर्नाटक 146, अखिल भारत 106, बिहार 29, झारखंड 27, उत्तर प्रदेश 26 और असम 18।

2024-25 में आंध्र प्रदेश ने प्रति व्यक्ति 514 और तेलंगाना ने 506 अंडे पैदा किए, जो 106 के राष्ट्रीय आँकड़े का लगभग पाँच गुना है। बिहार में यह 29, उत्तर प्रदेश में 26 और असम में 18 रहा। ये आँकड़े उत्पादन बताते हैं, खपत नहीं। सूची में नीचे का राज्य भले थाली में अंडे पाता हो, पर उसके गाँवों में वह कुक्कुट पालन बहुत कम है जो ग्रामीण परिवारों को काम और आय देता है।

कुक्कुट पालन की समस्याओं के समाधान

आहार, बाज़ार, स्वास्थ्य और छोटे किसानों के लिए नीतिगत उपाय

उपाय समस्याओं के क्रम में ही आते हैं। इनमें से कोई नया नहीं है; कमी पहुँच की है, ताकि बिहार के छोटे किसान को भी वही सुविधा मिले जो आंध्र प्रदेश में किसी बड़ी कंपनी के अनुबंधित किसान को मिलती है।

  • आहार के लिए, मक्का और सोयाबीन का अधिक उत्पादन, और यह निगरानी कि कितना अनाज एथनॉल में जा रहा है, ताकि कुक्कुट और आसवनियाँ एक-दूसरे से होड़ न करें।
  • बाज़ार के लिए, प्रसंस्करण इकाइयों वाले आधुनिक कुक्कुट बाज़ार और शीत शृंखला, ताकि अधिक चिकन जीवित के बजाय ठंडा करके बिक सके।
  • स्वास्थ्य के लिए, 2024 की कुक्कुट रोग कार्य योजना मानक टीकाकरण अनुसूची, प्रतिजैविकों के ज़िम्मेदार उपयोग के दिशानिर्देश, प्रकोप पर त्वरित कार्रवाई और हर फार्म पर जैव सुरक्षा माँगती है।
  • छोटे किसानों के लिए, समय पर भुगतान वाली स्पष्ट अनुबंध शर्तें, ज़मीन का वैध पट्टा, कुक्कुट के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, और महिला कुक्कुट किसानों को मान्यता।
  • पिछड़े क्षेत्रों के लिए, कम अंडा उत्पादन वाले राज्यों में राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत सब्सिडी वाली ग्रामीण कुक्कुट इकाइयाँ।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-IIIग्रामीण क्षेत्रों में कृषीतर रोज़गार और आय का प्रबन्ध करने में पशुधन पालन की बड़ी संभाव्यता है। भारत में इस क्षेत्रक की प्रोन्नति करने के उपयुक्त उपाय सुझाते हुए चर्चा कीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: उपाय सुझाते हुए चर्चा कीजिए · दृष्टिकोण: पहले दिखाएँ कि पशुधन, विशेषकर कुक्कुट, ग्रामीण रोज़गार और आय क्यों दे सकता है; फिर उपायों को उस समस्या के अनुसार बाँटें जिसका वे उत्तर हैं: आदान, बाज़ार, स्वास्थ्य, वित्त और संस्थाएँ।

    भूमिका: 2024-25 में भारत ने 149.11 अरब अंडे और 51.8 लाख टन कुक्कुट मांस पैदा किया; कुक्कुट शेड के लिए कम ज़मीन चाहिए, इसलिए यह छोटे और भूमिहीन ग्रामीण परिवारों के अनुकूल है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • संभावना: कम ज़मीन; जल्दी आय (ब्रॉयलर चार से छह सप्ताह में बिकता है); संविदा कृषि से आदान और पक्का ख़रीदार।
    • बाधाएँ: मक्का के एथनॉल में जाने से आहार की लागत, दामों का उतार-चढ़ाव, रोग से नुकसान, एक ख़रीदार वाले अनुबंध, ऋण और पट्टे की कमियाँ, महिलाओं को किसान न मानना, दक्षिण में केंद्रित उत्पादन।
    • आदान और स्वास्थ्य के उपाय: आहार-अनाज की आपूर्ति, टीकाकरण अनुसूची, प्रतिजैविकों का ज़िम्मेदार उपयोग, कुक्कुट रोग कार्य योजना के तहत जैव सुरक्षा।
    • बाज़ार और वित्त के उपाय: आधुनिक बाज़ार और शीत शृंखला, कुक्कुट के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, राष्ट्रीय पशुधन मिशन की सब्सिडी, ज़मीन का वैध पट्टा, अनुबंध की उचित शर्तें।
    • समता के उपाय: पिछड़े राज्यों में ग्रामीण कुक्कुट इकाइयाँ, महिलाओं को मान्यता और प्रशिक्षण।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि पशुधन पालन ग्रामीण श्रम को तभी अपना पाएगा जब छोटे उत्पादकों को आदान, ऋण, बाज़ार और दाम तथा रोग के झटकों से सुरक्षा मिले।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2020, सामान्य अध्ययन-IIIभारत में कृषि उत्पादों के परिवहन एवं विपणन में मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: मुख्य बाधाएँ बताइए · दृष्टिकोण: बाधाओं को परिवहन, भंडारण, बाज़ार के ढाँचे और दाम की जानकारी में बाँटें, हर एक का एक उदाहरण दें, और अंत में उनके उत्तर देने वाले सुधार लिखें।

    भूमिका: परिवहन, भंडारण और बाज़ार कमज़ोर हों तो खेत से ख़रीदार तक पहुँचते-पहुँचते उपज का मूल्य घट जाता है, और कुक्कुट जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज में यह सबसे तीखा दिखता है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • परिवहन: जल्दी खराब होने वाली उपज, छोटे खेप, रास्ते में नुकसान; जीवित पक्षी वज़न खोते हैं और रोग फैलाते हैं।
    • भंडारण और शीत शृंखला: प्रसंस्करण से दुकान तक प्रशीतन की कमी; असंगठित खाद्य व्यापार की कमियाँ।
    • बाज़ार का ढाँचा: आधुनिक बाज़ार कम; बहुत-सी उपज अब भी जीवित पक्षी के रूप में बिकती है।
    • दाम का जोखिम: उतार-चढ़ाव का बोझ फार्म के दाम पर; सांकेतिक दाम केवल वहाँ जहाँ उत्पादक संगठित हैं, जैसे अंडों के लिए NECC।
    • झटके: रोग के प्रकोप में आवाजाही पर रोक से बिक्री थम जाती है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में शीत शृंखला, प्रसंस्करण वाले आधुनिक बाज़ार, उत्पादक संगठन और दाम की जानकारी को इन बाधाओं के सुधार के रूप में लिखें।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2020'किसान क्रेडिट कार्ड' योजना के अन्तर्गत, निम्नलिखित में से किन-किन उद्देश्यों के लिए कृषकों को अल्पकालीन ऋण समर्थन उपलब्ध कराया जाता है?
    1. 1. फार्म परिसंपत्तियों के रख-रखाव हेतु कार्यशील पूँजी के लिए
    2. 2. कम्बाइन कटाई मशीनों, ट्रैक्टरों एवं मिनी ट्रकों के क्रय के लिए
    3. 3. फार्म परिवारों की उपभोग आवश्यकताओं के लिए
    4. 4. फ़सल कटाई के बाद के खर्चों के लिए
    5. 5. परिवार के लिए घर निर्माण तथा गाँव में शीतागार सुविधा की स्थापना के लिए

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :

    1. a केवल 1, 2 और 5
    2. b केवल 1, 3 और 4
    3. c केवल 2, 3, 4 और 5
    4. d 1, 2, 3, 4 और 5
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: KCC की अल्पकालीन सीमा में खेती और सहायक गतिविधियाँ, कटाई के बाद के ख़र्च, परिवार की उपभोग आवश्यकताएँ, फार्म परिसंपत्तियों का रख-रखाव, बीमा और विपणन ऋण आते हैं। चरण 2: मशीनें और भवन दीर्घकालीन निवेश ऋण में आते हैं। चरण 3: अतः 1, 3 और 4 अल्पकालीन उद्देश्य हैं; 2 निवेश ऋण है; 5 अल्पकालीन KCC का उद्देश्य नहीं है। उत्तर (b)।

    इस भ्रम से बचें: सूची की हर मद ऐसी है जिसके लिए किसान ऋण ले सकता है, और कुछ के लिए KCC में निवेश ऋण भी मिल सकता है। प्रश्न केवल अल्पकालीन ऋण समर्थन के बारे में है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1, 2 और 5: गलत। ट्रैक्टर और कम्बाइन (2) निवेश ऋण में हैं, और घर तथा शीतागार (5) अल्पकालीन उद्देश्य नहीं; इसमें 3 और 4 भी छूट गए हैं।
    • (b) केवल 1, 3 और 4: सही। फार्म परिसंपत्तियों का रख-रखाव, उपभोग आवश्यकताएँ और कटाई के बाद के ख़र्च अल्पकालीन KCC उद्देश्य हैं।
    • (c) केवल 2, 3, 4 और 5: गलत। इसमें 2 और 5 शामिल हैं और 1 छूट गया है।
    • (d) 1, 2, 3, 4 और 5: गलत। कथन 2 और 5 अल्पकालीन उद्देश्य नहीं हैं।

    उत्तर: विकल्प (b): KCC की अल्पकालीन सीमा फार्म परिसंपत्तियों के रख-रखाव, उपभोग और कटाई के बाद के ख़र्चों के लिए है; मशीनें निवेश ऋण में आती हैं।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख आधिकारिक आँकड़ों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।