परिचय
मुर्गी की खाद मुर्गियों और अन्य पालतू पक्षियों की बीट है, जो जैविक उर्वरक के रूप में, आमतौर पर आहार, पंखों और बिछावन से मिले लिटर के रूप में, काम आती है। पशु-खादों में इसमें नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस और पोटैशियम सबसे अधिक होते हैं, पर इसे पहले कम्पोस्ट या डाइजेस्ट करना पड़ता है, क्योंकि ताज़ी बीट पौधों को नुकसान पहुँचाती है और गीला लिटर अमोनिया छोड़ता है, जो अभिक्रियाशील नाइट्रोजन का एक रूप है।
मुर्गी की खाद: अर्थ, लिटर और उर्वरक मूल्य
मुर्गी की खाद क्या है: मुर्गी की बीट और लिटर
मुर्गियों, बत्तखों और अन्य पालतू पक्षियों का मल, जब मिट्टी को पोषण देने के लिए उपयोग होता है, तो उसे मुर्गी की खाद या कुक्कुट खाद (poultry manure) कहते हैं। इसकी नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा मूत्र वाले भाग में रहता है, इसलिए जो खाद अपना द्रव बचाए रखती है, उसका मूल्य भी अधिक बचता है। वाणिज्यिक फार्म पर बीट शेड के फ़र्श पर बिछे बिछावन पर गिरती है, और इनसे जो मिश्रण बनता है, उसे कुक्कुट लिटर (poultry litter) कहते हैं।
- बीट: पक्षियों का मल, जो पोषक तत्वों का मुख्य स्रोत है।
- गिरा हुआ आहार: आहार पात्रों से नीचे गिरा अनाज और दाना।
- पंख: बढ़ते पक्षियों से झड़े हुए पंख।
- बिछावन: लकड़ी की छीलन, बुरादा, मूँगफली के छिलके, धान की भूसी या पुआल जैसी सूखी, सोखने वाली और सस्ती सामग्री, जो नमी सोखकर अमोनिया और हानिकारक कीटाणुओं को कम करती है।
एक ही फार्म पर इसकी मात्रा बड़ी होती है। लगभग 47 दिन पाला गया एक ब्रॉयलर लगभग दो पाउंड लिटर छोड़ता है, इसलिए 20,000 से अधिक पक्षियों वाला एक ब्रॉयलर शेड एक झुंड में 18,000 किलोग्राम से अधिक लिटर बना सकता है। एक मुर्गी हर महीने लगभग 3.6 से 5 किलोग्राम खाद बनाती है। 2019 में गिने गए 85.18 करोड़ कुक्कुट पक्षियों को देखते हुए खाद इस उद्योग का सबसे बड़ा उप-उत्पाद है; उद्योग का संगठन भारत का पोल्ट्री उद्योग में समझाया गया है।
मुर्गी खाद के फायदे और उसकी सीमाएँ
मुर्गी की खाद सदियों से उर्वरक के रूप में काम आती रही है। दूसरी पशु-खादों की तरह यह मिट्टी की संरचना सुधारती है, जिससे मिट्टी अधिक पानी और पोषक तत्व रोक पाती है, और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को भोजन देती है। इसकी ख़ास बात सांद्रता है: मुर्गी का लिटर नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ेट से भरपूर होता है, और सभी पशु-खादों में इसमें नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस और पोटैशियम सबसे अधिक होते हैं। तुलना में गोबर की खाद नाइट्रोजन और कार्बनिक कार्बन के अच्छे स्रोत के रूप में मानी जाती है।
तीन सीमाएँ मुर्गी की खाद को रासायनिक उर्वरक का विकल्प बनने से रोकती हैं। पहली, ताज़ी बीट पौधों के लिए हानिकारक होती है और कम्पोस्टिंग के बाद ही अच्छा उर्वरक बनती है। दूसरी, लिटर रासायनिक उर्वरक से कम सांद्र होता है, इसलिए प्रति टन इसका मूल्य कम है और इसे दूर ले जाना घाटे का सौदा है; इसे शेडों के पास के खेतों में ही काम लाना पड़ता है। तीसरी, ठीक से न रखा जाए तो यह जल्दी नाइट्रोजन खो देता है, जिसका बड़ा भाग अमोनिया बनकर उड़ जाता है।
असली समस्या जगह के बेमेल की है। जहाँ बहुत से कुक्कुट फार्म पास-पास हों और आसपास खेती की ज़मीन कम हो, वहाँ सारा लिटर पास में नहीं फैलाया जा सकता, उसका बिक्री मूल्य गिर जाता है, और जो खाद बिकनी चाहिए थी, वह सँभालने लायक अपशिष्ट बन जाती है।
ज़रूरत से अधिक डाली गई खाद पानी की समस्या भी बनती है। खाद वाली ज़मीन में नाइट्रोजन का उपयोग नपे-तुले खनिज उर्वरक की तुलना में अक्सर कम कुशलता से होता है, और जहाँ बहुत से पशुओं के लिए खेती की ज़मीन कम हो, वहाँ अतिरिक्त पोषक तत्व बहकर निकल जाते हैं। अमेरिका की चेसापीक खाड़ी इसका प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ मुर्गी की खाद वाले खेतों से बहे पानी को बढ़ते फ़ॉस्फ़ोरस और 'मृत क्षेत्रों' के फैलाव के लिए ज़िम्मेदार माना गया, और मैरीलैंड राज्य ने किसानों द्वारा डाली जाने वाली मुर्गी की खाद की मात्रा सीमित करने का प्रयास किया।
कुक्कुट अपशिष्ट प्रबंधन: कम्पोस्टिंग, बायोगैस और गोबरधन
मुर्गी की खाद की कम्पोस्टिंग और लिटर प्रबंधन
अच्छा लिटर प्रबंधन शेड से ही शुरू होता है। ठीक से चलाए जा रहे ब्रॉयलर शेड में लिटर की नमी 25 से 35 प्रतिशत रखी जाती है, ताकि वह भुरभुरा बना रहे। टपकते पानी के बर्तनों या टपकती छत के पास वह अधिक गीला हो जाए, तो जमकर एक चिपचिपी परत बन जाता है, जिसमें जीवाणु, मक्खियाँ और अमोनिया पनपते हैं। इससे पक्षियों के पैरों और सीने पर घाव होते हैं और झुंड में मौतें बढ़ती हैं। जमा हुआ लिटर हर झुंड के बाद हटाना ज़रूरी है।
शेड के भीतर सबसे बड़ा शत्रु अमोनिया है। किसान इसे हवादारी और लिटर संशोधकों (litter amendments) से नियंत्रित करते हैं, अर्थात् ऐसे पदार्थ जो लिटर में मिलाकर उसका रसायन बदलते हैं। सबसे आम अम्लीकारक हैं फिटकरी, सोडियम बाइसल्फ़ेट और फ़ेरिक सल्फ़ेट, जो लिटर की ऊपरी सतह का पीएच तीन से पाँच दिन के लिए 4 से नीचे ले आते हैं। इससे अधिक नाइट्रोजन अमोनियम के रूप में रुकी रहती है और अमोनिया गैस बनकर नहीं उड़ती; खेतों के लिए भी लिटर में अधिक नाइट्रोजन बचती है।
कम्पोस्टिंग शेड से निकाले गए लिटर को सुरक्षित उर्वरक बनाती है। इसमें नाइट्रोजन खाद से और कार्बन बिछावन से आता है। एक आम विधि विंड्रो कम्पोस्टिंग (windrow composting) है, जिसमें लिटर को लंबी कतारों में ढेर किया जाता है; ढेर के भीतर का तापमान 60 से 71 °C तक पहुँच जाए, तो यह गर्मी ई. कोलाई और साल्मोनेला जैसे हानिकारक जीवाणुओं को मार देती है। कम्पोस्ट की गई खाद थैलों में भरकर मृदा सुधारक के रूप में भी बेची जाती है।
बायोगैस, संपीडित बायोगैस और गोबरधन योजना
मुर्गी की खाद से ऊर्जा भी बनती है। बायोगैस संयंत्र में सूक्ष्मजीव बिना हवा के जैविक अपशिष्ट को तोड़ते हैं और बायोगैस बनाते हैं, जो मुख्यतः मीथेन है। इसे साफ़ और संपीडित करके वाहनों और पाइप वाली गैस के लिए संपीडित बायोगैस (CBG) बनाई जाती है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में आम कच्चा माल गोबर, मुर्गी की खाद, फ़सल अवशेष और भोजन का कचरा है, और इनके उपयोग से वह मीथेन पकड़ में आ जाती है जो कचरा सड़ने पर हवा में चली जाती। बचा हुआ घोल, डाइजेस्टेट, जैविक खाद बन जाता है।
लिटर सीधे ईंधन के रूप में भी जलता है। ब्रिटेन में कई बिजलीघर कुक्कुट और टर्की के लिटर को मुख्य ईंधन के रूप में जलाते हैं; दुनिया के पहले तीन ऐसे बिजलीघर थेटफ़र्ड, आई और ग्लैनफ़र्ड थे, जिनमें सबसे बड़ा थेटफ़र्ड 38.5 मेगावाट का है।
भारत में इसके लिए गोबरधन (गैल्वनाइज़िंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज़ धन) योजना है। यह अप्रैल 2018 में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत शुरू हुई, ताकि गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट से बायोगैस और खाद बनाई जा सके; इसमें संबंधित मंत्रालयों का समन्वय पेयजल और स्वच्छता विभाग करता है। प्रगति धीमी रही: 2018 की SATAT पहल ने 2023 तक 5,000 संपीडित बायोगैस संयंत्रों का लक्ष्य रखा था, किन्तु जून 2026 तक केवल 132 पूरे हुए।
- परिव्यय और अवधि: अगस्त 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय चक्रीय जैव-ऊर्जा योजना, गोबरधन, को 2026-27 से 2035-36 के लिए ₹23,731 करोड़ के साथ मंज़ूरी दी।
- लक्ष्य: संपीडित बायोगैस का उत्पादन लगभग दस गुना करना, अर्थात् लगभग 0.4 मिलियन मानक घन मीटर प्रतिदिन से 4 से 6 तक।
- पूँजी सहायता: नई क्षमता पर ₹1.25 करोड़ प्रति टन प्रतिदिन, एक परियोजना के लिए अधिकतम ₹30 करोड़।
- सुनिश्चित ख़रीद: पात्र उत्पादन का शत-प्रतिशत तक ₹2,110 प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट पर, जो लगभग ₹98 प्रति किलोग्राम है।
- खाद: किसानों के लिए लगभग 25 करोड़ टन जैविक खाद बनने की आशा है, और ऐसे संयंत्रों की किण्वित जैविक खाद पर ₹1,500 प्रति टन बाज़ार विकास सहायता मिलती है।
कुक्कुट पालन का पर्यावरण पर प्रभाव: अमोनिया, नाइट्रोजन और प्रतिजैविक
कुक्कुट लिटर से अमोनिया और अभिक्रियाशील नाइट्रोजन
मुर्गी की बीट में नाइट्रोजन मुख्यतः यूरिक अम्ल और कार्बनिक नाइट्रोजन के रूप में होती है। लिटर के सूक्ष्मजीव इसे अमोनियम (NH4+) में बदलते हैं, जिसे पौधे उपयोग कर सकते हैं और जो लिटर से बँधा रहता है या पानी में घुल जाता है। अमोनियम का एक भाग फिर अमोनिया गैस (NH3) बन जाता है, और ऊँचा तापमान, ऊँचा पीएच और गीला लिटर, तीनों इस बदलाव को तेज़ करते हैं। अमोनिया पक्षियों की आँखों और श्वसन को नुकसान पहुँचाती है, संक्रमण से लड़ने की उनकी क्षमता, वृद्धि और आहार दक्षता घटाती है, और बाहर निकलने पर स्वास्थ्य तथा पर्यावरण की समस्याएँ पैदा करती है।
अमोनिया अभिक्रियाशील नाइट्रोजन (reactive nitrogen) का एक रूप है। वायुमंडल की निष्क्रिय नाइट्रोजन गैस (N2) को छोड़कर नाइट्रोजन के सभी रूप इसी नाम से जाने जाते हैं: नाइट्रोजन के ऑक्साइड, अमोनिया, नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और नाइट्रेट। जीवमंडल में आने वाली अभिक्रियाशील नाइट्रोजन का आधे से कुछ अधिक भाग अब मानव गतिविधियों से आता है, और इसकी अधिकता सुपोषण (eutrophication) जैसी समस्याएँ पैदा करती है।
कृषि इसे कई तरह से बढ़ाती है: उर्वरक डाली गई मृदाएँ नाइट्रोजन के ऑक्साइड छोड़ती हैं, जबकि मृदाएँ और पशुधन इकाइयाँ अमोनिया छोड़ती हैं, जो हवा के साथ दूर तक जाती है। नाइट्रस ऑक्साइड ग्रीनहाउस गैस के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 300 गुना अधिक प्रभावी है, और 2020 में विश्व के मानवजनित नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 10.9 प्रतिशत थी, जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।
कुक्कुट आहार में प्रतिजैविक और रोगाणुरोधी प्रतिरोध
मुर्गी की खाद में छिपा दूसरा बोझ प्रतिजैविकों (ऐंटिबायोटिक्स) का है। संक्रमण रोकने के लिए इन्हें पशुओं और मुर्गियों के आहार में मिलाया जाता है, और इनका कुछ भाग बीट में निकल आता है। खेतों में डाली जाने वाली पशु-खाद में आमतौर पर 1 से 10 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक प्रतिजैविक अवशेष, प्रतिरोधी जीवाणु और प्रतिरोध के जीन रहते हैं, और ऐसी मिट्टी में उगी फ़सलें भी प्रतिजैविक सोख सकती हैं। चिकित्सा और कृषि, दोनों में इनका अति-उपयोग रोगाणुरोधी प्रतिरोध (antimicrobial resistance) का प्रमुख कारण है, जिसमें रोगाणु उन्हीं दवाओं से बचने के तरीके विकसित कर लेते हैं जो उन्हें मारने के लिए बनी हैं।
जून 2026 में वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से मिट्टी और कुक्कुट तथा डेयरी फार्मों में प्रतिजैविक अवशेषों के आँकड़े जुटाए जाएँ।
प्रतिरोध से निपटने का भारत का मुख्य साधन रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्य योजना है। पहली योजना 2017 में आई, और 2025 से 2029 की दूसरी योजना 18 नवंबर 2025 को शुरू हुई, ताकि पहली योजना की कमियाँ दूर हों: हर क्षेत्र अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी ले, मंत्रालयों के बीच समन्वय मज़बूत हो और निजी क्षेत्र भी जुड़े।
वैश्विक ढाँचा विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य और कृषि संगठन, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन का 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण है; विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2026 से 2036 की वैश्विक योजना कृषि-खाद्य प्रणालियों में रोगाणुरोधी दवाओं का उपयोग घटाना चाहती है, और देश हर वर्ष एक स्व-मूल्यांकन सर्वेक्षण से अपनी प्रगति बताते हैं।
प्रतिरोध अस्पतालों तक सीमित नहीं रहता। भारत विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यहाँ एक साथ बार-बार पड़ने वाले सूखे, मनुष्यों और पशुधन में प्रतिजैविकों का भारी उपयोग और अपशिष्ट जल से सिंचाई, तीनों मौजूद हैं।
डॉक्टर की सलाह के बिना प्रतिजैविक लेना प्रतिरोध पनपने के प्रमुख कारणों में है, और यही तर्क फार्म पर भी लागू होता है: प्रतिजैविक संक्रमण का इलाज करने के लिए हैं, इसलिए वृद्धि बढ़ाने या रोग रोकने के लिए उन्हें आहार में नियमित रूप से देना प्रतिरोधी रोगाणुओं को ही बढ़ावा देता है। कनाडा, चीन, जापान और अमेरिका सहित कई देशों ने पशुधन में प्रतिजैविकों के उपयोग पर रोक लगाई है।
मुर्गी पालन में प्रतिजैविकों का उपयोग और उसके नियम हैचरी, कुक्कुट आहार और तकनीक (अंग्रेज़ी में) में, और रोग नियंत्रण भारत में कुक्कुट रोग और बर्ड फ़्लू (अंग्रेज़ी में) में समझाए गए हैं।
आहार, अनाज और जलवायु: चिकन कितना संधारणीय है
आहार रूपांतरण अनुपात: चिकन, गोमांस और सूअर के मांस की तुलना
कुक्कुट पालन कितना संधारणीय है, यह इस पर भी निर्भर है कि उसे कितना आहार चाहिए। खाए गए आहार को उत्पादित मांस या अंडों से भाग देने पर आहार रूपांतरण अनुपात (feed conversion ratio, FCR) मिलता है; यह संख्या जितनी कम हो, प्रति किलोग्राम भोजन के लिए उतना कम आहार लगता है। ब्रॉयलर सबसे कुशल पालतू पशुओं में हैं: 2011 में अमेरिका में उनका FCR 1.6 था और वे 39 दिन में बाज़ार-योग्य वज़न पर पहुँच जाते थे, जबकि 2013 के आसपास विश्व औसत जीवित वज़न पर लगभग 2.0 और शव वज़न पर 2.8 था। अमेरिका में गोमांस वाले मवेशियों का FCR जीवित वज़न पर 6 से अधिक रहता था।
| पशु और पद्धति | आहार रूपांतरण अनुपात | टिप्पणी |
|---|---|---|
| ब्रॉयलर, अमेरिका, 2011 | 1.6 (जीवित वज़न) | 39 दिन में बाज़ार-योग्य |
| ब्रॉयलर, विश्व औसत, 2013 | 2.0 जीवित वज़न, 2.8 शव वज़न | सभी पद्धतियों का औसत |
| अंडा देने वाली मुर्गियाँ, अमेरिका, 2011 | लगभग 2 | प्रति मुर्गी वर्ष में लगभग 330 अंडे |
| औसत घरेलू झुंड | अंडों के लिए 9.2, शव के लिए 14.6 | कहीं कम कुशल |
| गोमांस वाले मवेशी, अमेरिका, 2013 | 6 से अधिक (जीवित वज़न) | सामान्य सीमा 4.5 से 7.5 |
ब्रॉयलरों के इतने कुशल होने का मुख्य कारण प्रजनन है। पिछले 50 वर्षों में कुक्कुट की आहार दक्षता लगभग 250 प्रतिशत बढ़ी, और 1960 के दशक के आरंभ से 2011 तक अमेरिका में ब्रॉयलरों का FCR आधा हो गया, मुख्यतः बेहतर आनुवंशिकी से।
अनाज के रूप में मापें, तो अंतर उतना ही स्पष्ट है। पद्धति और आहार के अनुसार एक किलोग्राम गोमांस के लिए 0.9 से 7.9 किलोग्राम, सूअर के मांस के लिए 0.1 से 4.3 किलोग्राम और चिकन के लिए 0 से 3.5 किलोग्राम अनाज लग सकता है। अतः चिकन को सामान्यतः गोमांस या सूअर के मांस से कम अनाज चाहिए, यद्यपि उसके लिए उगाया गया आहार भी ज़मीन, पानी और उर्वरक लेता है।
मक्का, एथनॉल और भोजन, आहार तथा ईंधन की होड़
वाणिज्यिक कुक्कुट आहार अनाज पर टिका है, और आहार के दो सबसे महत्त्वपूर्ण अनाज मक्का और सोयाबीन हैं। इसलिए कुक्कुट फार्म अनाज बाज़ार से बँधा है, और भारत में यह बाज़ार बदल रहा है। अगस्त 2026 में सरकार ने बताया कि देश में बनने वाले एथनॉल का लगभग तीन-चौथाई अब अनाज से, मुख्यतः मक्का से, बनता है, क्योंकि पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जा रहा है।
बदलाव तेज़ रहा: एथनॉल के लिए जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गई, और सरकार मक्का से बने एथनॉल का प्रशासित मूल्य चावल से बने एथनॉल से अधिक तय करती है। मक्का निर्यात की कमाई घटी है और भारत हाल में मक्का का शुद्ध आयातक बन गया।
असल प्रश्न उपयोग का है। अनाज सीधे लोगों का भोजन बन सकता है, पक्षियों का आहार बनकर भोजन में बदल सकता है, या ईंधन बन सकता है, और ये तीनों एक ही फ़सल के लिए होड़ करते हैं। संधारणीय कुक्कुट पालन के लिए इसका उत्तर मक्का और सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने, बेहतर FCR से आहार की बर्बादी घटाने और जहाँ हो सके, अनाज की जगह उप-उत्पादों के उपयोग में है।
लू और जलवायु परिवर्तन: कुक्कुट फार्मों पर ताप का जोखिम
जलवायु परिवर्तन भी कुक्कुट को प्रभावित करता है। अप्रैल 2026 में खाद्य और कृषि संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक रिपोर्ट ने चेताया कि अत्यधिक गर्मी खेती को किनारे तक धकेल रही है। पशुधन के लिए रिपोर्ट एक ताप-आर्द्रता सूचकांक बताती है, जिसके पार होते ही तीव्र ताप-तनाव शुरू हो जाता है, और कहती है कि तापमान के अचानक उछाल से उन फार्मों में बड़ी संख्या में मुर्गियाँ मर सकती हैं, जहाँ औद्योगिक स्तर का जलवायु नियंत्रण नहीं है।
इसी रिपोर्ट के अनुसार औसत वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री की वृद्धि मक्का, चावल, सोयाबीन और गेहूँ की उपज लगभग 6 प्रतिशत घटाती है, और 2025 अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में रहा। इसलिए गर्मी कुक्कुट पर दो बार चोट करती है: सीधे शेड में, और आहार की कीमत के रास्ते। ताप-सहिष्णुता के लिए प्रजनन पुराना उपाय है; भारत के संकरण कार्यक्रम लंबे समय से गर्मी के अनुकूलन और ऊँचे तापमान को सहने की क्षमता पर ध्यान देते आए हैं।
भारत में संधारणीय कुक्कुट पालन: पद्धतियाँ और नीति
संधारणीय कुक्कुट पालन की पद्धतियाँ: शेड से खेत तक
संधारणीय कुक्कुट पालन का अर्थ है अंडे और मांस का उत्पादन करते हुए फार्म के अपशिष्ट, नाइट्रोजन, दवाओं और जलवायु जोखिम को नियंत्रण में रखना। नीचे का हर कदम इस लेख में समझाई गई पद्धतियों पर टिका है।
- लिटर की नमी 25 से 35 प्रतिशत रखें, टपकते पानी के बर्तन ठीक करें और हर झुंड के बाद जमा लिटर हटाएँ।
- अम्लीकारक लिटर संशोधकों और हवादारी से नाइट्रोजन को अमोनियम के रूप में रोकें और अमोनिया घटाएँ।
- खेत में डालने से पहले लिटर को कतारों में इतना गर्म होने दें (60 से 71 °C) कि ई. कोलाई और साल्मोनेला मर जाएँ।
- खाद केवल पास की ज़मीन पर, नपी-तुली मात्रा में डालें, ताकि फ़ॉस्फ़ोरस और नाइट्रोजन बहकर न जाएँ।
- अतिरिक्त लिटर बायोगैस और संपीडित बायोगैस संयंत्रों को भेजें, जो ईंधन और किण्वित जैविक खाद देते हैं।
- प्रतिजैविक केवल रोग के इलाज के लिए, पशु-चिकित्सक की देखरेख में दें, आहार में नियमित रूप से नहीं।
- ताप-सहिष्णु पक्षी चुनें और लू से बचाव के लिए छाया तथा हवादारी रखें।
घरेलू कुक्कुट पालन इस तस्वीर में अपने ढंग से फ़िट होता है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन उन ग्रामीण इकाइयों को सहायता देता है जो खुले में पाले जा सकने वाले कम लागत तकनीक वाले पक्षी पालती हैं, और कम लागत वाले आहार को बढ़ावा देता है। रोग नियंत्रण भी संधारणीयता का हिस्सा है: 2024 की कुक्कुट रोग कार्य योजना जैव-सुरक्षा, टीकाकरण और शीघ्र पहचान को एक ढाँचे में जोड़ती है। छोटी इकाइयों की योजनाएँ कुक्कुट पालन के प्रकार और सरकारी योजनाएँ (अंग्रेज़ी में) में दी गई हैं।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2014, सामान्य अध्ययन-IIIक्या ऐन्टीबायोटिकों का अति-उपयोग और डॉक्टरी नुस्खे के बिना मुक्त उपलब्धता, भारत में औषधि-प्रतिरोधी रोगों के आविर्भाव के अंशदाता हो सकते हैं? अनुवीक्षण और नियंत्रण की क्या क्रियाविधियाँ उपलब्ध हैं? इस सम्बन्ध में विभिन्न मुद्दों पर समालोचनापूर्वक चर्चा कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: रोगाणुरोधी प्रतिरोध तब पैदा होता है जब रोगाणु उन दवाओं से बचने के तरीके विकसित कर लेते हैं जो उन्हें मारने के लिए बनी हैं; चिकित्सा और कृषि में दुरुपयोग और अति-उपयोग इसके मुख्य कारण हैं।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- अति-उपयोग और मुक्त उपलब्धता: बिना सलाह दवा लेना प्रतिरोध के प्रमुख कारणों में है; दुरुपयोग और अति-उपयोग मुख्य चालक हैं।
- पशुधन और कुक्कुट: आहार में मिले प्रतिजैविक; खाद में 1 से 10 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम अवशेष, प्रतिरोधी जीवाणु और जीन; फ़सलें इन्हें सोख लेती हैं।
- भारत की संवेदनशीलता: बार-बार सूखा, लोगों और पशुधन में प्रतिजैविकों का भारी उपयोग, अपशिष्ट जल से सिंचाई।
- क्रियाविधियाँ: रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्य योजना (2017; दूसरी योजना 2025 से 2029, क्षेत्रवार ज़िम्मेदारी, अंतर-क्षेत्रीय समन्वय, निजी क्षेत्र); विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य और कृषि संगठन, UNEP और WOAH का 'वन हेल्थ'; 2026 से 2036 की वैश्विक योजना और वार्षिक स्व-मूल्यांकन; कृषि विज्ञान केंद्रों से मिट्टी और फार्मों के अवशेषों के आँकड़े।
- मुद्दे: पशु-आहार में नियमित उपयोग, खाद और मिट्टी में अवशेष, और अस्पताल पर ही रुक जाने वाला अनुवीक्षण।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि प्रतिरोध 'वन हेल्थ' की समस्या है: नियंत्रण के लिए लोगों में नुस्खे का अनुशासन, पशुओं में नियमित उपयोग पर रोक, और अस्पतालों के साथ फार्म, मिट्टी और पानी का अनुवीक्षण चाहिए।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. कृषि मृदाएँ पर्यावरण में नाइट्रोजन के ऑक्साइड निर्मुक्त करती हैं।
- 2. मवेशी पर्यावरण में अमोनिया निर्मुक्त करते हैं।
- 3. कुक्कुट उद्योग पर्यावरण में अभिक्रियाशील नाइट्रोजन यौगिक निर्मुक्त करते हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1: उर्वरक डालने और मृदा की प्रक्रियाओं से नाइट्रोजन के ऑक्साइड निकलते हैं; सही। चरण 2: कथन 2: पशुधन इकाइयाँ, मवेशियों सहित, अमोनिया छोड़ती हैं; सही। चरण 3: कथन 3: कुक्कुट लिटर के सूक्ष्मजीव यूरिक अम्ल को अमोनियम और अमोनिया गैस में बदलते हैं, और अमोनिया अभिक्रियाशील नाइट्रोजन है; सही। चरण 4: तीनों सही, विकल्प (d)।
इस भ्रम से बचें: अभिक्रियाशील नाइट्रोजन कोई एक गैस नहीं है। अमोनिया, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और नाइट्रेट, सभी इसमें आते हैं, इसलिए इनमें से किसी का भी स्रोत अभिक्रियाशील नाइट्रोजन का स्रोत है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1 और 3: गलत। कथन 2 भी सही है; पशुधन इकाइयाँ अमोनिया छोड़ती हैं।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। कथन 1 भी सही है; उर्वरक वाली मृदाएँ नाइट्रोजन के ऑक्साइड छोड़ती हैं।
- (c) केवल 2: गलत। कथन 1 और 3 भी सही हैं।
- (d) 1, 2 और 3: सही। मृदा, मवेशी और कुक्कुट लिटर, तीनों अभिक्रियाशील नाइट्रोजन के स्रोत हैं।
उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि मृदा, पशुधन और कुक्कुट लिटर, तीनों अभिक्रियाशील नाइट्रोजन छोड़ते हैं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019निम्नलिखित में से कौन-से, भारत में सूक्ष्मजैविक रोगजनकों में बहु-औषध प्रतिरोध के होने के कारण हैं?
- 1. कुछ व्यक्तियों में आनुवंशिक पूर्ववृत्ति (जेनेटिक प्रीडिस्पोजीशन) का होना
- 2. रोगों के उपचार के लिए प्रतिजैविकों (ऐंटिबॉयोटिक्स) की गलत खुराकें लेना
- 3. पशुधन फार्मिंग में प्रतिजैविकों का इस्तेमाल करना
- 4. कुछ व्यक्तियों में चिरकालिक रोगों की बहुलता होना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: आनुवंशिक पूर्ववृत्ति: प्रतिरोध रोगाणुओं में उत्परिवर्तन, जीन-स्थानांतरण और दवाओं के दबाव से पैदा होता है, रोगी के जीन से नहीं; कारण नहीं। चरण 2: गलत खुराक: दुरुपयोग प्रतिरोध बढ़ाता है; कारण। चरण 3: पशुधन फार्मिंग में प्रतिजैविक: कृषि में अति-उपयोग प्रतिरोध बढ़ाता है; कारण। चरण 4: चिरकालिक रोगों की बहुलता: अपने-आप में प्रतिरोध का कारण नहीं। चरण 5: केवल 2 और 3, विकल्प (b)।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 और 4 रोगी के बारे में हैं, दवा के उपयोग के बारे में नहीं; परीक्षक वे कारण पूछ रहा है जो प्रतिजैविकों के उपयोग के ढंग से पैदा होते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 1 और 2: गलत। कथन 1 कारण नहीं है; प्रतिरोध रोगाणुओं में पैदा होता है।
- (b) केवल 2 और 3: सही। गलत खुराक और पशुधन में प्रतिजैविक, दोनों दुरुपयोग के रूप हैं।
- (c) 1, 3 और 4: गलत। कथन 1 और 4 रोगी के बारे में हैं, दवा के दुरुपयोग के बारे में नहीं।
- (d) 2, 3 और 4: गलत। चिरकालिक रोग अपने-आप में प्रतिरोध का कारण नहीं है।
उत्तर: केवल 2 और 3: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि लोगों और पशुधन में प्रतिजैविकों का दुरुपयोग ही प्रतिरोध बढ़ाता है।
स्रोत
- NCERT: Science, Class VIII, Chapter 2, Microorganisms: Friend and Foe
- NCERT: Science, Class IX, Chapter 15, Improvement in Food Resources (poultry farming)
- Department of Animal Husbandry and Dairying: Poultry Disease Action Plan 2024
- Department of Animal Husbandry and Dairying: 20th Livestock Census 2019, key results
- Department of Animal Husbandry and Dairying: National Livestock Mission guidelines
- Ministry of Jal Shakti (PIB): GOBAR-Dhan, Waste to Wealth, frequently asked questions (16 March 2022)
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- The Hindu (Delhi), 7 August 2026: Govt. okays GOBARdhan scheme
- The Hindu (Delhi), 30 August 2026: compressed biogas offtake price
- The Hindu (Delhi), 22 August 2026: Sugar price hike, Centre says ethanol not to blame
- The Hindu (Delhi), 17 September 2026: What lies beyond India's E20 push
- The Hindu (Delhi), 3 October 2026: GOBARdhan eyes 10-fold increase in CBG output
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों, आधिकारिक दस्तावेज़ों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
