परिचय

कुक्कुट रोग मुर्गियों, बत्तखों और अन्य पालतू पक्षियों के वे संक्रमण हैं जो विषाणु, जीवाणु और परजीवी पैदा करते हैं। बर्ड फ्लू और रानीखेत (न्यूकैसल) रोग की सूचना देना अनिवार्य है और ये व्यापार रोक सकते हैं; इनका नियंत्रण टीकाकरण, जैव सुरक्षा, निगरानी और, बर्ड फ्लू में, राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत पक्षियों को मारकर होता है।

भारत में कुक्कुट रोग: कारण और मुख्य प्रकार

विषाणुजनित, जीवाणुजनित और परजीवी कुक्कुट रोग

झुंड पास-पास रहता है, इसलिए एक संक्रमण तेज़ी से फैलता है; यही कुक्कुट रोगों को गंभीर बनाता है। प्रकोप से उत्पादन घटता है, मौतें बढ़ती हैं और नियंत्रण का ख़र्च आता है, और कुछ रोग कुक्कुट उत्पादों का व्यापार भी रोक देते हैं। पशुपालन एवं डेयरी विभाग की 2024 की कुक्कुट रोग कार्य योजना वाणिज्यिक और घरेलू, दोनों तरह के झुंडों के लिए बर्ड फ्लू, संक्रामक ब्रोंकाइटिस, फ़ाउल हैज़ा, फ़ाउल पॉक्स, गम्बोरो, रानीखेत रोग, पुलोरम रोग और अन्य रोगों को शामिल करती है।

कारण के अनुसार कुक्कुट रोगों का आरेख। विषाणु: एवियन इन्फ़्लुएंज़ा, रानीखेत (न्यूकैसल) रोग, मारेक रोग, गम्बोरो (संक्रामक बर्सल रोग), फ़ाउल पॉक्स और संक्रामक ब्रोंकाइटिस। जीवाणु: पुलोरम रोग, फ़ाउल टाइफ़ॉइड, फ़ाउल हैज़ा और भोजन में साल्मोनेला। प्रोटोज़ोआ: कॉक्सीडियोसिस, जो संक्रमित बीट से फैलता है। नियंत्रण कारण पर निर्भर है: विषाणु के लिए टीके, जीवाणु के लिए दवा और जाँच, प्रोटोज़ोआ के लिए कॉक्सीडियोस्टैट।
तालिका 1. भारत के प्रमुख कुक्कुट रोग: कारण, प्रभाव और नियंत्रण।
रोग कारण रोग क्या करता है मुख्य नियंत्रण
बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ़्लुएंज़ा) इन्फ़्लुएंज़ा A विषाणु अत्यधिक रोगजनक स्ट्रेन झुंड के 100 प्रतिशत पक्षी मार सकते हैं पक्षियों को मारना, आवाजाही पर रोक, जैव सुरक्षा
रानीखेत (न्यूकैसल) रोग एवियन पैरामिक्सोवायरस टाइप 1 साँस और तंत्रिका के लक्षण; पहली बार संपर्क वाले झुंड में 50 प्रतिशत से अधिक मौतें जीवित और निष्कृत टीके
मारेक रोग अल्फ़ाहर्पीसवायरस टी-कोशिका लिंफ़ोमा; पक्षी जीवन भर विषाणु ढोते हैं टर्की हर्पीसवायरस (HVT) टीका
फ़ाउल पॉक्स एवीपॉक्सवायरस त्वचा पर पपड़ी या मुँह और श्वासनली में घाव क्षीणित जीवित टीका; मच्छर नियंत्रण
पुलोरम रोग साल्मोनेला पुलोरम (जीवाणु) अंडे के रास्ते फैलता है; चूज़ों में सफ़ेद दस्त प्रजनक झुंड की जाँच
कॉक्सीडियोसिस कॉक्सीडियन आदिजंतु छोटे चूज़ों की आँत का रोग चूज़ों के आहार में कॉक्सीडियोस्टैट

कारण जान लेने से पता चलता है कि रोग से कैसे लड़ें। विषाणुजनित रोगों की रोकथाम टीकाकरण और जैव सुरक्षा से होती है, क्योंकि प्रतिजैविक विषाणुओं पर प्रभावी नहीं होते; जीवाणुजनित रोग प्रजनक झुंड की जाँच और दवाओं से नियंत्रित होते हैं; और कॉक्सीडियोसिस चूज़ों के आहार में मिले कॉक्सीडियोस्टैट से दबाया जाता है। इन रोगों की आर्थिक मार भारत में कुक्कुट पालन की समस्याएँ में से एक है।

भारत में बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ़्लुएंज़ा) और उसका नियंत्रण

बर्ड फ्लू क्या है? स्ट्रेन, रोगजनकता और प्रसार

एवियन इन्फ़्लुएंज़ा, जिसे आम बोलचाल में बर्ड फ्लू कहते हैं, पालतू कुक्कुट और अनेक दूसरे पक्षियों का विषाणुजनित संक्रमण है। इसका कारण ऑर्थोमिक्सोविरिडी कुल के इन्फ़्लुएंज़ा A विषाणु हैं। इन विषाणुओं के नाम दो सतही प्रोटीनों, हीमएग्लूटिनिन (H) और न्यूरामिनिडेज़ (N), से बनते हैं, इसीलिए H5N1, H5N8 और H9N2 जैसे उप-प्रकार होते हैं।

  • निम्न रोगजनक एवियन इन्फ़्लुएंज़ा (LPAI): लक्षण बहुत कम या नहीं, या साँस की हल्की तकलीफ़ और अंडों में कमी।
  • अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ़्लुएंज़ा (HPAI): गंभीर रोग; झुंड में मौतें 100 प्रतिशत तक पहुँच सकती हैं।
  • केवल H5 और H7 स्ट्रेन पशुजन्य (ज़ूनोटिक) महत्त्व के हैं और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) को इन्हीं की सूचना दी जाती है।

इस विषाणु का प्राकृतिक भंडार जंगली जलपक्षी और तटीय पक्षी हैं: वे बिना बीमार हुए इसे ढोते हैं और दूसरे पक्षियों तक पहुँचाते हैं। संक्रमित पक्षी लार, नाक के स्राव और बीट में विषाणु छोड़ते हैं; यह पानी में और कम तापमान पर लंबे समय तक जीवित रहता है और उपकरणों के सहारे एक फार्म से दूसरे फार्म पहुँचता है। H5N1 2006 के शुरुआती महीनों में भारत के जंगली पक्षियों तक पहुँचा, जबकि निम्न रोगजनक स्ट्रेन H9N2 भारत में पहली बार 2003 में हरियाणा के मुर्गी फार्मों से अलग किया गया।

भारत में बर्ड फ्लू नियंत्रण: कार्य योजना, पक्षियों को मारना और कम्पार्टमेंट

भारत 2005 से एवियन इन्फ़्लुएंज़ा के नियंत्रण और रोकथाम की राष्ट्रीय कार्य योजना चला रहा है, जिसे 2021 में संशोधित किया गया। अत्यधिक रोगजनक बर्ड फ्लू की पुष्टि होते ही संक्रमित और आसपास के पक्षी मारे जाते हैं, आवाजाही रोकी जाती है और क्षेत्र को कीटाणुरहित किया जाता है, क्योंकि त्वरित कार्रवाई विषाणु को अगले फार्म तक पहुँचने से पहले रोक देती है।

इसका क़ानूनी आधार पशुओं में संक्रामक और सांसर्गिक रोग निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 2009 है। इसके तहत प्रकोप की जानकारी रखने वाले हर व्यक्ति को निकटतम पशु औषधालय या अस्पताल को सूचना देनी होती है; यह सूचना राज्य के पशु-चिकित्सा सेवा निदेशक, फिर पशुपालन एवं डेयरी विभाग और वहाँ से तत्काल सूचना के रूप में WOAH तक जाती है।

  • निगरानी तंत्र: 69,202 संस्थाएँ, जिनमें 13,042 पशु अस्पताल और पॉलीक्लिनिक, 22,823 औषधालय तथा 33,337 सहायता केंद्र और चलते-फिरते क्लिनिक हैं।
  • निगरानी की प्राथमिकता: जीवित पक्षी बाज़ार, आर्द्रभूमियाँ, सीमावर्ती क्षेत्र और घने या प्रवासी पक्षियों वाले स्थान।
  • रोग-मुक्त कम्पार्टमेंट: भारत के 32 कुक्कुट कम्पार्टमेंट बर्ड फ्लू से मुक्त हैं, जिन्हें WOAH ने भारत की स्व-घोषणा पर स्वीकार किया है।

क्या बर्ड फ्लू मनुष्यों को होता है? पशुजन्य रोग और 'वन हेल्थ'

बर्ड फ्लू मनुष्यों को हो सकता है, पर कभी-कभार ही। पक्षियों के इन्फ़्लुएंज़ा A विषाणु कभी-कभी मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों को संक्रमित करते हैं, प्रायः संक्रमित पक्षियों के निकट संपर्क के बाद। इसीलिए बर्ड फ्लू एक पशुजन्य रोग (zoonosis) है, अर्थात् मनुष्य का ऐसा संक्रामक रोग जिसका रोगजनक किसी पशु से मनुष्य तक पहुँचता है। जून 2026 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने केरल को निपाह, एवियन इन्फ़्लुएंज़ा H5N1 और क्यासानूर वन रोग जैसे उच्च ख़तरे वाले रोगजनकों के प्रति सतर्क रहने को कहा।

ऐसे रोगों के ख़तरे के कारण ही स्वास्थ्य तंत्र अब वन हेल्थ (One Health) की बात करते हैं: मनुष्य, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य का एक साथ प्रबंधन। यह शब्द पहली बार आधिकारिक रूप से 2003-2004 में प्रयोग हुआ और H5N1 के फैलाव के साथ इसे बल मिला; आज खाद्य और कृषि संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम मिलकर इस पर काम करते हैं। भोजन दूसरा रास्ता है: गैर-टाइफ़ॉइड साल्मोनेला, जो प्रायः कुक्कुट और अंडों से जुड़ा है, भी पशुजन्य रोग है, इसलिए कुक्कुट और अंडों को अच्छी तरह पकाना चाहिए।

कुक्कुट में रानीखेत रोग (न्यूकैसल रोग)

रानीखेत रोग: कारण, लक्षण और टीके

दुनिया में न्यूकैसल रोग के नाम से जाना जाने वाला रानीखेत रोग एवियन पैरामिक्सोवायरस टाइप 1 (APMV-1) के उग्र स्ट्रेनों से होता है, जो पैरामिक्सोविरिडी कुल के ऑर्थोएवुलावायरस वंश का विषाणु है। इसका भारतीय नाम उत्तराखंड के रानीखेत से पड़ा, जहाँ 1927 में भारत में इसका पहला प्रकोप हुआ, और अब यह देश के अधिकांश भागों में मौजूद है।

  • लक्षण: छींक, हाँफना और खाँसी, हरे पानी जैसे दस्त, गर्दन का मुड़ना, पंखों का लटकना और लकवा, अंडा उत्पादन में तेज़ गिरावट और पतले छिलके वाले अंडे।
  • गति: ऊष्मायन अवधि 3 से 6 दिन है, और जिस झुंड ने कभी विषाणु का सामना नहीं किया, उसमें मौतें 50 प्रतिशत से ऊपर जा सकती हैं।
  • प्रसार: हवा और मुँह के रास्ते; जीवित और प्रवासी पक्षियों की आवाजाही इसे नए क्षेत्र में ला सकती है।
  • टीके और जैव सुरक्षा: जीवित और निष्कृत टीके, जिनमें प्रजनक और अंडा देने वाले झुंडों को जीवित टीके के बाद तेल-आधारित निष्कृत टीका दिया जाता है, और कड़ी जैव सुरक्षा। इस रोग की सूचना देना अनिवार्य है और इससे व्यापार पर रोक लग सकती है।

अन्य कुक्कुट रोग: मारेक, गम्बोरो, फ़ाउल पॉक्स और कॉक्सीडियोसिस

कुक्कुट में मारेक रोग और गम्बोरो रोग

मारेक रोग मुर्गियों का अत्यधिक संक्रामक विषाणुजनित कैंसर है, जो एक अल्फ़ाहर्पीसवायरस से होता है। इसका नाम हंगरी के पशु-चिकित्सक योज़ेफ़ मारेक पर पड़ा, जिन्होंने 1907 में इसका वर्णन किया। यह विषाणु टी-कोशिका लिंफ़ोमा पैदा करता है और तंत्रिकाओं तथा अंगों में लिंफ़ोसाइट भर देता है। संक्रमित पक्षी जीवन भर विषाणु ढोते और फैलाते रह सकते हैं, इसलिए रोकथाम टीकाकरण पर टिकी है: टर्की का एक संबंधित हर्पीसवायरस (HVT) टीके के स्ट्रेन के रूप में प्रयोग होता है। नए चूज़े कुछ सप्ताह तक माँ से मिली प्रतिपिंडों से सुरक्षित रहते हैं, उसके बाद बिना टीके वाला झुंड असुरक्षित हो जाता है।

गम्बोरो रोग, या संक्रामक बर्सल रोग (IBD), छोटी मुर्गियों पर हमला करता है। इसकी पहचान पहली बार 1962 में अमेरिका के डेलावेयर राज्य के गम्बोरो में हुई। यह विषाणु बर्सा को नष्ट करता है, वह अंग जो छोटे पक्षी की उन्मुक्ति (प्रतिरक्षा) बनाता है, इसलिए जो झुंड बच जाता है वह दूसरे संक्रमणों के आगे कमज़ोर रहता है। बहुत उग्र स्ट्रेनों में मौतें 30 से 40 प्रतिशत या उससे अधिक हो सकती हैं।

फ़ाउल पॉक्स, संक्रामक ब्रोंकाइटिस और कॉक्सीडियोसिस

  • फ़ाउल पॉक्स: धीरे फैलने वाला विषाणुजनित रोग (एवीपॉक्सवायरस वंश, पॉक्सविरिडी कुल), जो भारत में स्थानिक है। इसमें त्वचा पर मोटी पपड़ी बनती है, जिसे त्वचीय रूप कहते हैं, या मुँह और श्वासनली में घाव होते हैं, जिसे डिफ़्थीरिक रूप कहते हैं। मच्छर इसे फैलाते हैं; क्षीणित जीवित टीके झुंड की रक्षा करते हैं।
  • संक्रामक ब्रोंकाइटिस: एवियन कोरोनावायरस से होने वाला अत्यधिक संक्रामक श्वसन रोग, जिसमें अंडों का उत्पादन और गुणवत्ता गिरती है। जीवित और मृत विषाणु वाले टीके उपलब्ध हैं, पर विषाणु के अलग-अलग प्रकार एक-दूसरे से सुरक्षा नहीं देते, जिससे नियंत्रण कठिन होता है।
  • कॉक्सीडियोसिस: कॉक्सीडियन आदिजंतुओं (प्रोटोज़ोआ) से होने वाला आँत का परजीवी रोग, जो संक्रमित बीट से फैलता है। यह छोटे चूज़ों के लिए सबसे गंभीर है, उन्हें मार सकता है या उनका पाचन बिगाड़ सकता है; कुछ चूज़ा-आहारों में इसे दबाने के लिए कॉक्सीडियोस्टैट मिलाया जाता है।

जीवाणुजनित रोग इस सूची को पूरा करते हैं। साल्मोनेला पुलोरम से होने वाला पुलोरम रोग अंडे के रास्ते फैलता है और छोटे चूज़ों को सफ़ेद दस्त से मारता है, जबकि साल्मोनेला गैलिनेरम से होने वाला फ़ाउल टाइफ़ॉइड बढ़ते और वयस्क पक्षियों को पकड़ता है; दोनों भारत के सभी भागों में स्थानिक हैं और प्रजनक झुंड की जाँच से नियंत्रित होते हैं। पाश्चुरेला मल्टोसिडा से होने वाला फ़ाउल हैज़ा भी पूरे देश में स्थानिक है।

कुक्कुट फार्म पर जैव सुरक्षा: रोग को बाहर रखना

कुक्कुट फार्म जैव सुरक्षा की चार परतें

जैव सुरक्षा उन उपायों को कहते हैं जो रोगजनकों को फार्म से बाहर रखते हैं और भीतर फैलने से रोकते हैं। कुक्कुट रोग कार्य योजना इसके दो उद्देश्य रखती है, स्वस्थ झुंड और स्वस्थ कर्मचारी, और उपायों को चार परतों में बाँटती है: फार्म कहाँ बने, से लेकर शेड में कौन जा सकता है, तक।

पशुपालन एवं डेयरी विभाग की कुक्कुट रोग कार्य योजना 2024 की जैव सुरक्षा की चार परतों का आरेख: संरचनात्मक (फार्म अन्य सुविधाओं से 1 से 2 किमी दूर, एक गेट वाली बाड़), परिचालन (फ़ुट डिप, वाहन कीटाणुशोधन, चूहों के लिए चारा स्टेशन), प्रबंधकीय (नए पक्षी 21 दिन अलग, एक शेड में एक आयु वर्ग) और कर्मचारी (हर झुंड के अलग कर्मचारी, सुरक्षात्मक वस्त्र), तथा शेड के चारों ओर 3 मीटर पौधों से मुक्त पट्टी।
  • संरचनात्मक: फार्म दूसरी वाणिज्यिक सुविधाओं से 1 से 2 किमी दूर, एक ही गेट वाली बाड़, और शेड के चारों ओर तीन मीटर पट्टी पौधों से मुक्त, ताकि चूहे और जंगली पक्षी दूर रहें।
  • परिचालन: प्रवेश पर चूने और ब्लीचिंग पाउडर का फ़ुट डिप, हर वाहन का कीटाणुशोधन, और चूहों के लिए चारा स्टेशन।
  • प्रबंधकीय: नए पक्षी पुराने झुंड से कम से कम 21 दिन अलग, एक शेड में एक ही आयु वर्ग, और प्रकोप के बाद शेड तीन सप्ताह ख़ाली।
  • कर्मचारी: हर झुंड के लिए अलग कर्मचारी, प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के लिए सुरक्षात्मक वस्त्र और जूते, और पहले छोटे फिर बड़े झुंडों का दौरा।

कुक्कुट रोग नियंत्रण में टीके और विषाणु संवर्धन

टीके कैसे काम करते हैं: जीवित, निष्कृत और नए प्रकार

टीका (वैक्सीन) एक जैविक निर्मिति है जो किसी रोग के विरुद्ध सक्रिय अर्जित उन्मुक्ति देती है। इसमें रोगाणु जैसा एक कारक होता है, प्रायः उसका कमज़ोर या मारा हुआ रूप, उसका विष या उसका कोई सतही प्रोटीन। प्रतिरक्षा तंत्र उस कारक को पहचानना और नष्ट करना सीखता है, और उसे याद रखता है, इसलिए बाद में असली रोगाणु मिलने पर उसे नष्ट कर देता है।

कुक्कुट के टीके मुख्य प्रकार दिखाते हैं। रानीखेत रोग और फ़ाउल पॉक्स की रोकथाम क्षीणित जीवित टीकों से होती है, ऐसे कमज़ोर विषाणु जो रोग पैदा किए बिना पक्षी की उन्मुक्ति को प्रशिक्षित करते हैं; मारे गए विषाणु से बने निष्कृत टीके हर पक्षी को हाथ से देने पड़ते हैं और प्रायः जीवित टीके के बाद दिए जाते हैं। मारेक रोग में टर्की का एक संबंधित विषाणु टीके के स्ट्रेन का काम करता है।

भारत के कोविड-19 टीकों में तीन अलग पद्धतियाँ अपनाई गईं। भारत बायोटेक ने ICMR के राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान के साथ कोवैक्सीन बनाया, जो पूरे निष्कृत विषाणु पर आधारित टीका है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया का कोविशील्ड रोगवाहक (वेक्टर) टीका है: एक हानिरहित चिम्पैंज़ी एडेनोवायरस कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन का जीन ले जाता है। कैडिला हेल्थकेयर का ZyCoV-D एक DNA प्लाज़्मिड टीका है, जिसका प्लाज़्मिड टीका लेने वाले की कोशिकाओं से स्पाइक प्रोटीन बनवाता है।

विषाणु अंडों में क्यों उगाए जाते हैं: सूक्ष्मजीवों का संवर्धन

जीवाणु और कवक पोषक शोरबा और अगर प्लेट जैसे कृत्रिम माध्यम पर उगाए जा सकते हैं, क्योंकि उनका अपना उपापचय होता है। विषाणु ऐसा नहीं कर सकता: यह एक अति-सूक्ष्म संक्रामक कारक है जो केवल किसी जीव की जीवित कोशिकाओं के भीतर बढ़ता है, क्योंकि इसका अपना उपापचय नहीं होता और यह मेज़बान कोशिका की मशीनरी का उपयोग करता है। विषाणु कई तरह से फैलते हैं: कीट रोगवाहकों से, पर साँस में जाने वाले एरोसोल और भोजन या पानी से भी।

आरेख: जीवाणु और कवक पोषक शोरबा और अगर प्लेट जैसे कृत्रिम माध्यम पर उगते हैं, क्योंकि उनका अपना उपापचय है; विषाणु केवल जीवित कोशिकाओं में बढ़ते हैं। इसलिए कुक्कुट प्रयोगशालाएँ बर्ड फ़्लू वायरस को 9 से 11 दिन के भ्रूणयुक्त अंडों में और फ़ाउल पॉक्स वायरस को अंडे की कोरियोऐलेंटॉइक झिल्ली पर उगाती हैं।

इसीलिए कुक्कुट प्रयोगशालाएँ विषाणुओं को भ्रूणयुक्त मुर्गी के अंडों में उगाती हैं। बर्ड फ्लू का विषाणु 9 से 11 दिन पुराने अंडों में उगाया जाता है, और फ़ाउल पॉक्स विषाणु अंडे की कोरियोऐलेंटॉइक झिल्ली पर अलग किया जाता है। यह तरीका पुराना है: 1931 में फ़ाउल पॉक्स विषाणु को भ्रूणयुक्त अंडे में उगाया गया था, और मनुष्यों के इन्फ़्लुएंज़ा टीके आज भी मुर्गी के अंडों में उगाए गए विषाणुओं से बनते हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2022, सामान्य अध्ययन-IIIवैक्सीन विकास का आधारभूत सिद्धांत क्या है? वैक्सीन कैसे कार्य करते हैं? कोविड-19 टीकों के निर्माण हेतु भारतीय वैक्सीन निर्माताओं ने क्या-क्या पद्धतियाँ अपनाई हैं?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: सिद्धांत समझाइए, कार्यविधि बताइए और पद्धतियाँ पहचानिए · दृष्टिकोण: तीनों भाग क्रम से लिखें: एक-दो पंक्तियों में सिद्धांत, फिर टीका उन्मुक्ति को कैसे प्रशिक्षित करता है, फिर हर भारतीय पद्धति उसके निर्माता और प्लेटफ़ॉर्म के साथ।

    भूमिका: टीका असली संक्रमण से पहले प्रतिरक्षा तंत्र को रोगजनक का हानिरहित रूप या अंश दिखाकर सक्रिय अर्जित उन्मुक्ति देता है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • सिद्धांत: रोगजनक जैसा प्रतिजन (कमज़ोर या मारा हुआ रोगाणु, विष, सतही प्रोटीन या उसका जीन) देना, बिना रोग पैदा किए।
    • कार्यविधि: प्रतिरक्षा तंत्र प्रतिजन को ख़तरा मानकर नष्ट करता है और स्मृति रखता है, ताकि बाद का संक्रमण जल्दी रोका जा सके; प्रतिजन, प्रतिरक्षा अनुक्रिया और स्मृति का छोटा आरेख उपयोगी है।
    • प्रकार और उदाहरण: क्षीणित जीवित (कुक्कुट के रानीखेत और फ़ाउल पॉक्स टीके), निष्कृत (मारा हुआ विषाणु), रोगवाहक, DNA।
    • भारत की कोविड-19 पद्धतियाँ: कोवैक्सीन (भारत बायोटेक और ICMR-NIV, पूरा निष्कृत विषाणु); कोविशील्ड (सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, स्पाइक जीन ले जाने वाला चिम्पैंज़ी एडेनोवायरस रोगवाहक); ZyCoV-D (कैडिला, DNA प्लाज़्मिड)।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि भारत ने पूरे निष्कृत विषाणु से लेकर रोगवाहक और DNA तक कई प्लेटफ़ॉर्म अपनाए, इसलिए उसकी टीका आपूर्ति किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं रही।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021निम्नलिखित पर विचार कीजिए :
    1. 1. जीवाणु
    2. 2. कवक
    3. 3. विषाणु

    उपर्युक्त में से किन्हें कृत्रिम/संश्लेषित माध्यम में संवर्धित किया जा सकता है?

    1. a केवल 1 और 2
    2. b केवल 2 और 3
    3. c केवल 1 और 3
    4. d 1, 2 और 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: जीवाणु पोषक शोरबा और अगर पर उगते हैं, अतः 1 संवर्धित हो सकता है। चरण 2: कवक भी कृत्रिम माध्यम पर उगते हैं, अतः 2 भी। चरण 3: विषाणु केवल जीवित कोशिकाओं में बढ़ता है और उसका अपना उपापचय नहीं होता, अतः वह कृत्रिम या संश्लेषित माध्यम में नहीं उग सकता; उसे भ्रूणयुक्त अंडे जैसी कोशिकाएँ चाहिए। उत्तर: केवल 1 और 2।

    इस भ्रम से बचें: प्रयोगशालाओं में विषाणु उगाए जाते हैं, इसलिए कुछ लोग मान लेते हैं कि वे माध्यम में संवर्धित होते हैं। वे जीवित कोशिकाओं या अंडों में उगते हैं, कोशिका-रहित कृत्रिम माध्यम में नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1 और 2: सही। जीवाणु और कवक कृत्रिम माध्यम पर उगते हैं; विषाणु नहीं।
    • (b) केवल 2 और 3: गलत। इसमें जीवाणु छूट गए और विषाणु शामिल हैं।
    • (c) केवल 1 और 3: गलत। इसमें कवक छूट गए और विषाणु शामिल हैं।
    • (d) 1, 2 और 3: गलत। विषाणु केवल जीवित कोशिकाओं में बढ़ते हैं।

    उत्तर: विकल्प (a): जीवाणु और कवक कृत्रिम माध्यम पर उगते हैं; विषाणु को जीवित कोशिकाएँ चाहिए।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2013 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
    1. 1. विषाणुओं में ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक एंज़ाइम नहीं होते।
    2. 2. विषाणुओं को किसी भी संश्लेषित माध्यम में संवर्धित किया जा सकता है।
    3. 3. विषाणु एक जीव से दूसरे जीव तक केवल जैविक रोगवाहकों द्वारा संचरित होते हैं।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2 और 3
    3. c केवल 1 और 3
    4. d 1, 2 और 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: विषाणु का अपना उपापचय नहीं होता और वह मेज़बान कोशिका की मशीनरी पर निर्भर है, अतः उसमें ऊर्जा बनाने वाले एंज़ाइम नहीं होते; कथन 1 सही है। चरण 2: वह केवल जीवित कोशिकाओं में बढ़ता है, अतः किसी संश्लेषित माध्यम में संवर्धित नहीं हो सकता; कथन 2 गलत है। चरण 3: विषाणु कई तरह से फैलते हैं, कीट रोगवाहकों से भी और एरोसोल, भोजन तथा पानी से भी, अतः 'केवल जैविक रोगवाहकों से' गलत है। उत्तर: केवल 1।

    इस भ्रम से बचें: कथन 3 का शब्द 'केवल'। कुछ विषाणु कीट रोगवाहकों से अवश्य फैलते हैं, पर अनेक हवा या भोजन और पानी से फैलते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: सही। विषाणुओं में ऊर्जा बनाने वाला अपना उपापचय नहीं होता।
    • (b) केवल 2 और 3: गलत। विषाणु संश्लेषित माध्यम में नहीं उगते और केवल रोगवाहकों से नहीं फैलते।
    • (c) केवल 1 और 3: गलत। 'केवल' के कारण कथन 3 असत्य है।
    • (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 2 और 3 असत्य हैं।

    उत्तर: विकल्प (a): विषाणु का अपना उपापचय नहीं होता; उसे जीवित कोशिकाएँ चाहिए और वह कई तरह से फैलता है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख आधिकारिक दस्तावेज़ों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।