परिचय
दिल्ली सल्तनत वह राज्य था जिस पर 1206 से 1526 तक दिल्ली से सुल्तानों के पाँच राजवंशों ने क्रम से शासन किया: ममलूक या गुलाम वंश, ख़लजी, तुग़लक़, सैयद और लोदी। इसके संस्थापक क़ुतुबुद्दीन ऐबक थे, जो मुहम्मद ग़ोरी के दास रह चुके थे। मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय यह अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँची, और 1526 में पानीपत में बाबर के हाथों इब्राहीम लोदी की हार के साथ समाप्त हुई।
दिल्ली सल्तनत के राजवंश, काल और संस्थापक
दिल्ली सल्तनत का संस्थापक और सल्तनत की स्थापना
दिल्ली पहली बार तोमर राजपूतों के समय किसी राज्य की राजधानी बनी। बारहवीं शताब्दी के मध्य में अजमेर के चौहानों ने तोमरों को हरा दिया। सल्तनत से पहले दिल्ली पर यही दो राजवंश शासन करते थे। बदलाव मुहम्मद ग़ोरी के साथ आया। ग़ोर के इस शासक ने 1192 में तराइन के पास पृथ्वीराज चौहान के नेतृत्व वाले राजपूत संघ को बुरी तरह हराया। 1206 में ग़ोरी की हत्या हुई, तब उसके तुर्क गुलाम सेनापति ऐबक ने उसके भारतीय प्रदेशों की सत्ता सँभाली और वह दिल्ली का पहला सुल्तान बना।
पहले राजवंश को इतिहासकार ममलूक या गुलाम वंश कहते हैं। ममलूक (Mamluk) उस सैनिक को कहते थे जो मूलतः दास रहा हो। ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन, तीनों ऊँचे पद पाने से पहले दास रह चुके थे। यह नाम वास्तव में दास मूल के तीन घरानों के लिए है, जिन्होंने 1206 से 1290 तक शासन किया: क़ुत्बी, पहला इल्बरी और दूसरा इल्बरी। पूरी सल्तनत में प्रशासन की भाषा फ़ारसी रही।
दिल्ली सल्तनत की समयरेखा: पाँच राजवंश और उनके शासक
पाँचों राजवंश इस क्रम में आए: ममलूक, ख़लजी, तुग़लक़, सैयद और लोदी। सबसे लंबा शासन तुग़लक़ वंश का रहा, लगभग 94 वर्ष, जबकि ख़लजी वंश ने सबसे कम, केवल 30 वर्ष, शासन किया। चित्र 1 में हर राजवंश के प्रमुख सुल्तान उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें उन्होंने शासन किया। तालिका में हर राजवंश के वर्ष, संस्थापक और अंतिम शासक हैं।
| राजवंश | वर्ष | संस्थापक | अंतिम शासक |
|---|---|---|---|
| ममलूक | 1206 से 1290 | क़ुतुबुद्दीन ऐबक | क़ैमुर्स |
| ख़लजी | 1290 से 1320 | जलालुद्दीन ख़लजी | क़ुतुबुद्दीन मुबारक शाह |
| तुग़लक़ | 1320 से 1414 | ग़यासुद्दीन तुग़लक़ | नासिरुद्दीन महमूद |
| सैयद | 1414 से 1451 | ख़िज़्र ख़ान | आलम शाह |
| लोदी | 1451 से 1526 | बहलोल लोदी | इब्राहीम लोदी |
दिल्ली सल्तनत के शासक: राजवंश के अनुसार
गुलाम वंश: ऐबक, इल्तुतमिश, रज़िया और बलबन
ऐबक केवल चार वर्ष, 1206 से 1210 तक, शासन कर सका और उसकी राजधानी लाहौर रही। उसने क़ुतुब मीनार की नींव रखी। 1210 में लाहौर में चौगान (पोलो जैसा खेल) खेलते हुए वह घोड़े से गिरा, काठी का उभरा भाग उसकी पसलियों में धँस गया और उसकी मृत्यु हो गई।
सल्तनत को मज़बूत करने का काम उसके दामाद इल्तुतमिश (1210 से 1236) ने किया। ऐबक के उत्तराधिकारी आरामशाह को हटाने के लिए चालीस अमीरों के एक दल, चहलगानी या चालीसा, ने उसे बदायूँ से बुलाया था। इल्तुतमिश ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। उसने अपने प्रतिद्वंद्वी यल्दौज़ और क़ुबाचा को हटाया, मुल्तान, बंगाल और रणथंभौर जीते, क़ुतुब मीनार पूरी करवाई और सल्तनत की मुद्रा-व्यवस्था खड़ी की। 1228 में अब्बासी ख़लीफ़ा ने उसे सम्मान के वस्त्र भेजे, जो भारत में उसकी सत्ता की मान्यता थी।
इल्तुतमिश ने अपने बेटों की जगह अपनी बेटी रज़िया को उत्तराधिकारी चुना। उसने 1236 से 1240 तक शासन किया, फिर अमीरों ने उसे हटा दिया। बलबन स्वयं कभी चालीसा का सदस्य था; 1266 से 1287 तक के अपने शासन में उसने उसी दल की शक्ति तोड़ दी। उसने ज़िल्ल-ए-इलाही (ईश्वर की छाया) की उपाधि ली, दरबार में सिजदा (भूमि पर झुककर अभिवादन) और पैबोस (सुल्तान के पैर चूमना) की फ़ारसी रीतियाँ लागू कीं, और मंगोल आक्रमणों को पीछे धकेला।
1290 में जलालुद्दीन ख़लजी ने युवा सुल्तान कैक़ुबाद को मरवाया, शिशु क़ैमुर्स की हत्या की और गद्दी पर बैठ गया। पूरी कहानी ऐबक और इल्तुतमिश (अंग्रेज़ी में) तथा बाद के गुलाम सुल्तान, रज़िया और बलबन (अंग्रेज़ी में) में है।
ख़लजी वंश: अलाउद्दीन ख़लजी की सेना, विजय और बाज़ार नियंत्रण
तुर्क-अफ़ग़ान मूल के ख़लजी 1290 में जलालुद्दीन ख़लजी के नेतृत्व में सत्ता में आए। गद्दी पर बैठते समय उसकी आयु लगभग सत्तर वर्ष थी। 1296 में उसके भतीजे और दामाद अलाउद्दीन ने उसकी हत्या करवाई और स्वयं सुल्तान बना। वही इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक (1296 से 1316) सिद्ध हुआ। कड़ा का सूबेदार रहते हुए वह मालवा और देवगिरि पर धावा बोल चुका था। सुल्तान बनने के बाद उसने गुजरात और राजपूताना जीते, और अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को दक्षिण भारत में दूर तक भेजा।
1299/1300 और 1302-03 के मंगोल आक्रमणों ने उसकी शासन-व्यवस्था का रूप तय किया। अलाउद्दीन ने दिल्ली के किसी भी शासक से बड़ी स्थायी सेना खड़ी की। वह पहला सुल्तान था जिसने सैनिकों को पूरा वेतन नक़द दिया: एक घुड़सवार को वर्ष में 238 टंका, जो सल्तनत का चाँदी का सिक्का था। कोई कमज़ोर घोड़ा जाँच में न खप जाए, इसके लिए उसने सैनिकों के घोड़ों पर दाग़ लगवाए। वेतन पूरा पड़े, इसके लिए उसने दिल्ली के बाज़ारों में कीमतें नियंत्रित कीं; इतिहासकारों ने उसके शासन की सस्ती कीमतों और नियमित आपूर्ति की प्रशंसा की।
अंतिम ख़लजी, क़ुतुबुद्दीन मुबारक शाह, ख़ुसरो ख़ान के हाथों मारा गया और 1320 में ग़ाज़ी मलिक ने ख़ुसरो ख़ान को हटा दिया। विस्तार अलाउद्दीन ख़लजी की विजय और बाज़ार नियंत्रण (अंग्रेज़ी में) में है।
तुग़लक़ वंश: मुहम्मद बिन तुग़लक़, फ़िरोज़ शाह और तैमूर का आक्रमण
ग़ाज़ी मलिक 1320 से ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के नाम से शासक बना और 1321 में उसने दिल्ली के पास तुग़लक़ाबाद का क़िला बनवाया। उसके बेटे मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1324 से 1351) के समय सल्तनत अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँची और उपमहाद्वीप का अधिकांश भाग उसके अधीन आ गया। NCERT उसके गद्दी पर बैठने का वर्ष 1324 देता है, जबकि कुछ अन्य विवरण 1325 बताते हैं। उसकी साहसिक योजनाएँ किसी भी सुल्तान से अधिक याद की जाती हैं:
- दूसरी राजधानी: देवगिरि, जिसका नाम दौलताबाद रखा गया; पुरानी दिल्ली के निवासियों को वहाँ भेजा गया।
- सांकेतिक मुद्रा: 1329 से 1332 तक जारी सस्ती धातु के सिक्के, जिनकी नक़ल लोगों ने आसानी से कर ली; उन्हें वापस लेना पड़ा।
- ट्रांसऑक्सियाना: मध्य एशिया में मंगोलों पर आक्रमण के लिए खड़ी की गई बड़ी सेना, जिसे बाद में भंग कर दिया गया।
- विद्रोह: 1327 से विद्रोह शुरू हुए; 1335 में मदुरै अलग हुआ, 1336 में विजयनगर और 1347 में बहमनी सल्तनत की स्थापना हुई।
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ (1351 से 1388) ने 37 वर्ष शासन किया और उसका काल समृद्धि का काल रहा। उसने पाँच बड़ी नहरें बनवाईं, जिनमें पश्चिमी यमुना नहर का नवीनीकरण भी शामिल था, अपना नगर फ़िरोज़ाबाद बसाया, और इक्ता को, अर्थात् अधिकारियों को दिए गए राजस्व-क्षेत्रों को, वंशानुगत बना दिया।
फ़िरोज़ शाह की मृत्यु के बाद वंश गृहयुद्ध में डूब गया। उसका परपोता तुग़लक़ ख़ान थोड़े समय ग़यासुद्दीन तुग़लक़ शाह द्वितीय के नाम से शासक रहा, और 1390 के दशक तक दो संबंधी, दिल्ली में नासिरुद्दीन महमूद और फ़िरोज़ाबाद में नुसरत शाह, दोनों स्वयं को सुल्तान कहने लगे। समरक़ंद के तुर्क-मंगोल शासक तैमूर ने 17 दिसंबर 1398 को दिल्ली लूटी। नासिरुद्दीन महमूद गुजरात भाग गया और लौटकर तुग़लक़ वंश का अंतिम, नाममात्र का, शासक बना। देखें तुग़लक़ वंश (अंग्रेज़ी में)।
सैयद वंश: ख़िज़्र ख़ान और सिमटती सल्तनत
सैयद वंश में 37 वर्षों में चार शासक हुए। इसका संस्थापक ख़िज़्र ख़ान फ़िरोज़ शाह के समय मुल्तान का सूबेदार रह चुका था। दिल्ली की लूट के बाद तैमूर ने उसे मुल्तान में अपना प्रतिनिधि बनाया और लाहौर तथा दीपालपुर भी उसके ज़िम्मे किए। 28 मई 1414 को उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसने सुल्तान की उपाधि नहीं ली, बल्कि रैयत-ए-आला के रूप में, एक अधीनस्थ शासक की तरह, राज किया: पहले तैमूर के और फिर उसके बेटे शाहरुख़ के अधीन, जिसका नाम ख़ुत्बे (जुमे की नमाज़ के प्रवचन) में पढ़ा जाता था।
उसके बेटे मुबारक शाह ने 1421 में स्वयं को सुल्तान घोषित किया और तैमूरी अधीनता छोड़ दी। उसने मालवा के होशंग शाह से कर वसूला, पर पंजाब के खोए प्रदेश वापस नहीं ले सका। सैयदों के समय सल्तनत एक छोटी शक्ति रह गई। अंतिम सैयद आलम शाह के समय यह कहावत चल पड़ी कि संसार के बादशाह का राज्य दिल्ली से पालम तक है, जो लगभग 13 किलोमीटर की दूरी है। 1451 में आलम शाह ने गद्दी बहलोल लोदी को सौंप दी।
लोदी वंश: बहलोल, सिकंदर और इब्राहीम लोदी
लोदी अफ़ग़ान थे। पंजाब में सरहिंद का सूबेदार बहलोल लोदी (1451 से 1489) अफ़ग़ान और तुर्क सरदारों के एक ढीले संघ को एकजुट रखता था। उसका अधिकांश शासन जौनपुर के शर्की सुल्तानों से लड़ने में बीता। अंततः उसने उनका राज्य मिला लिया और दिल्ली से वाराणसी तक का क्षेत्र फिर दिल्ली के अधीन आ गया।
उसका बेटा सिकंदर लोदी (1489 से 1517) इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक है। उसके समय सल्तनत फिर उभरती दिखती है:
- विजय: उसने शर्कियों से बिहार छीनकर अपने राज्य में मिलाया।
- नई राजधानी: 1504 में उसने आगरा को फिर से बसाया और अपना दरबार दिल्ली से वहाँ ले गया।
- अमीरों पर नियंत्रण: उसने अपने अफ़ग़ान अमीरों से हिसाब लेकर उसकी राजकीय जाँच करवाई।
- विद्या: वह गुलरुख़ी उपनाम से फ़ारसी कविता लिखता था और उसने चिकित्सा के संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया।
अंतिम लोदी इब्राहीम (1517 से 1526) योग्य सैनिक था, किन्तु राजनीति में उतावला था। अफ़ग़ान और फ़ारसी अमीरों तथा क्षेत्रीय सरदारों का समर्थन उसके साथ नहीं था। लाहौर के सूबेदार दौलत ख़ान लोदी ने तैमूरी शासक बाबर को आक्रमण के लिए बुलाया। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहीम को हराया और मार डाला, और इसी के साथ दिल्ली सल्तनत का अंत हुआ। विस्तार के लिए सैयद, लोदी और सल्तनत का पतन (अंग्रेज़ी में) पढ़ें।
मंगोल आक्रमण और दिल्ली सल्तनत का विस्तार
मंगोल आक्रमण: सिंधु पर चंगेज़ ख़ान से तैमूर तक
एक शताब्दी से अधिक समय तक मंगोल सल्तनत के लिए सबसे बड़ा बाहरी ख़तरा रहे। 1218 में उन्होंने मध्य एशिया के ख़्वारिज़्मी साम्राज्य को नष्ट किया, और 1221 में चंगेज़ ख़ान ने सिंधु के युद्ध में उसके शासक जलालुद्दीन मंगबरनी को हराया। यह इल्तुतमिश का शासनकाल था। जलालुद्दीन बचकर पंजाब आया और दिल्ली से गठबंधन चाहा। इल्तुतमिश ने मना कर दिया, और लगता है कि उसने चंगेज़ ख़ान की यह इच्छा मानी कि वह इस राजकुमार की सहायता न करे।
सबसे गंभीर आक्रमण अलाउद्दीन ख़लजी के समय हुए। 1299 में क़ुतलुग़ ख़्वाजा के नेतृत्व में एक मंगोल सेना ने दिल्ली को आसपास के क्षेत्र से काट दिया और नगर की कई गलियों में घुस आई; दिल्ली को ही निशाना बनाने वाला यह पहला गंभीर मंगोल अभियान था। 1302-03 में मंगोल फिर आए और दो महीने तक अलाउद्दीन के सामने डेरा डाले रहे, जबकि वह अपने नए सैनिक नगर सीरी में डटा रहा। दोनों बार मंगोल लौट गए। इसके बाद अलाउद्दीन ने बड़ी सेना खड़ी की और ब्यास के पास के क़िलों की मरम्मत करवाई, जिससे आगे के धावे विफल किए गए।
मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय पलड़ा सल्तनत के पक्ष में और झुक गया। जब तरमाशीरीन के नेतृत्व में मंगोल सिंध में घुसकर दिल्ली से लगभग 65 किलोमीटर दूर मेरठ तक पहुँचे, तो सुल्तान ने उन्हें झेलम के पास हराया, कलानौर पर अधिकार किया और कुछ समय के लिए सिंधु के पार पेशावर तक अपनी सत्ता फैलाई। अंतिम बड़ा प्रहार तैमूर का था, जिसने 1398 में नासिरुद्दीन महमूद के समय दिल्ली लूटी। विवरण मंगोल आक्रमण और दक्कन की विजय (अंग्रेज़ी में) में है।
दिल्ली सल्तनत का मानचित्र और विस्तार: भीतरी और बाहरी सीमा
तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में सुल्तानों का नियंत्रण क़िलेबंद सैनिक नगरों (गैरिसन) से आगे बहुत कम था। रसद के लिए वे व्यापार, कर या लूट पर निर्भर रहते थे। सल्तनत का विस्तार मुख्यतः बलबन, अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय दो दिशाओं में हुआ:
- भीतरी सीमा: सैनिक नगरों के आसपास के क्षेत्रों को सुरक्षित करने के अभियान। गंगा-यमुना दोआब के जंगल काटे गए, ज़मीन किसानों को दी गई, और व्यापार मार्गों पर नए क़िले और नगर बसाए गए।
- बाहरी सीमा: दक्षिण भारत में अभियान, जो अलाउद्दीन ख़लजी के समय शुरू हुए और मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय सबसे दूर तक पहुँचे। इनसे हाथी, घोड़े, दास और बहुमूल्य धातुएँ आईं।
नियंत्रण कभी पूरा नहीं हुआ। दिल्ली से बंगाल को सँभालना कठिन था, दक्षिण का क्षेत्र जीते जाने के तुरंत बाद अलग हो गया, और गंगा के मैदान में भी ऐसे जंगल थे जिनमें सुल्तान की सेनाएँ घुस नहीं पाती थीं। यात्री इब्न बतूता ने ऐसे सरदारों का वर्णन किया है जो बाँस के इतने घने झुरमुटों में क़िलेबंदी करते थे कि उन्हें केवल वही बड़ी सेना हरा सकती थी जो काटते हुए भीतर पहुँचे।
दिल्ली सल्तनत का प्रशासन, अर्थव्यवस्था और तकनीक
केंद्रीय प्रशासन: सुल्तान, वज़ीर और विभाग
राज्य का केंद्र सुल्तान था। उत्तराधिकार का कोई स्पष्ट नियम कभी नहीं बना, इसलिए प्रायः सैन्य शक्ति ही तय करती थी कि गद्दी किसे मिलेगी, और सेना की कमान सुल्तान अपने हाथ में रखता था। वह अपने चुने हुए मंत्रियों के माध्यम से शासन करता था। तेरहवीं शताब्दी के अंत तक विभागों का एक स्थिर ढाँचा बन गया था, जो चित्र 3 में दिखाया गया है।
- वज़ीर: राजस्व विभाग, दीवान-ए-विज़ारत, का प्रमुख। आरंभिक वज़ीर सैनिक नेता थे; चौदहवीं शताब्दी तक वज़ीर राजस्व का विशेषज्ञ बन गया, और उसके अधीन एक महालेखा परीक्षक और एक महालेखाकार होते थे।
- आरिज़-ए-मुमालिक: सैन्य विभाग, दीवान-ए-अर्ज़, का प्रमुख, जो सेना की भर्ती, साज-सामान और वेतन देखता था। बलबन ने पहली बार इसे अलग विभाग बनाया।
- मुख्य सद्र: दीवान-ए-रिसालत का प्रमुख, जो धार्मिक मामले, धर्मार्थ संस्थाएँ और विद्वानों के वज़ीफ़े देखता था; प्रायः वही मुख्य क़ाज़ी, अर्थात् न्याय का प्रमुख, भी होता था।
- दीवान-ए-इंशा: राजकीय पत्राचार का विभाग, चाहे पत्र औपचारिक हों या गोपनीय।
बरीद नाम के गुप्तचर साम्राज्य के हर भाग से शासक को सूचना देते थे। फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने दो विभाग और जोड़े: दासों का विभाग और लोक निर्माण का विभाग, जिसने उसकी नहरें और इमारतें बनाईं।
दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली: मुक़्ती, आमिल और भू-राजस्व
देश जीतने के बाद तुर्कों ने उसे इक्ता नाम के भू-भागों में बाँटकर अपने प्रमुख अमीरों को सौंप दिया। इक्ता (iqta) एक इस्लामी प्रथा थी, जिसे तुर्क अपने साथ लाए: किसी भू-भाग का राजस्व वेतन के बदले किसी सैनिक अधिकारी को सौंप दिया जाता था। उसका धारक, मुक़्ती या वली, व्यवस्था बनाए रखता, राजस्व वसूलता, उसी से अपने सैनिकों को वेतन देता और शेष अपने पास रखता था। आगे चलकर यही भू-भाग प्रांत बने।
केंद्र सरकार जैसे-जैसे मज़बूत हुई, उसने हर इक्ता की वास्तविक आय का हिसाब लगाया, मुक़्ती और उसके सैनिकों का वेतन नक़द में तय किया और शेष राशि केंद्र को भेजना अनिवार्य कर दिया। इस बची हुई राशि को फ़वाज़िल कहते थे, और राज्य के लेखाकार मुक़्तियों के हिसाब की जाँच करते थे। इक्ता के नीचे शिक़ और परगना थे। परगने का प्रमुख आमिल था, जो राजस्व वसूली का प्रभारी अधिकारी था। गाँव में प्रमुख लोग ख़ुत (भूस्वामी) और मुक़द्दम (मुखिया) थे, और हिसाब पटवारी रखता था।
आरंभिक सुल्तान, विशेषकर इल्तुतमिश, बंदगाँ के माध्यम से शासन करना पसंद करते थे। ये सैनिक सेवा के लिए ख़रीदे और प्रशिक्षित किए गए दास थे, जो पूरी तरह अपने स्वामी पर निर्भर रहते थे। अलाउद्दीन ख़लजी ने भू-राजस्व के निर्धारण और वसूली को राज्य के सीधे नियंत्रण में ले लिया और तीन कर लगाए: खेती पर ख़राज, जो किसान की उपज का लगभग आधा था, मवेशियों पर कर और घरों पर कर। पूरी कार्यप्रणाली दिल्ली सल्तनत का प्रशासन (अंग्रेज़ी में) में समझाई गई है।
दिल्ली सल्तनत के सिक्के: टंका, जीतल और सांकेतिक मुद्रा
सल्तनत की मुद्रा-व्यवस्था इल्तुतमिश ने खड़ी की। इसकी मूल इकाइयाँ थीं चाँदी का टंका, जिसका भार एक तोला, अर्थात् 96 रत्ती (11.2 ग्राम), था, और जीतल, जो ताँबे में थोड़ी चाँदी मिलाकर बनता था; 48 जीतल का एक टंका होता था। उसके चाँदी के टंकों पर उसकी उपाधियों के साथ अब्बासी ख़लीफ़ा का नाम भी अंकित था, जिससे पता चलता है कि आरंभिक सुल्तान ख़लीफ़ा की मान्यता को कितना महत्त्व देते थे।
अलाउद्दीन की कीमतें इसी मुद्रा में तय थीं: गेहूँ 7½ जीतल प्रति मन (लगभग 15 किलोग्राम), चावल 5 जीतल, और एक घुड़सवार का वेतन वर्ष में 238 टंका। इसके बाद मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने अपनी सांकेतिक मुद्रा चलाई। बहुमूल्य धातु की कमी के कारण उसने 1329 से 1332 तक सोने और चाँदी के स्थान पर ताँबे और पीतल के सिक्के जारी किए। लोगों ने इन पर भरोसा नहीं किया: उन्होंने सोना-चाँदी जमा कर लिया और कर इन्हीं सिक्कों में चुकाए। इनकी नक़ल भी आसानी से हो जाती थी, इसलिए योजना वापस लेनी पड़ी। व्यापार, शिल्प और मुद्रा का विवरण दिल्ली सल्तनत की अर्थव्यवस्था (अंग्रेज़ी में) में है।
सल्तनत काल के तकनीकी बदलाव: रहट, कागज़, चरखा, मेहराब और गुंबद
तुर्कों ने कई नए शिल्प और तकनीकें या तो शुरू कीं या लोकप्रिय बनाईं, और इनसे खेतों, कार्यशालाओं और सेना, तीनों का काम बदल गया। इनमें से सब नई नहीं थीं, किन्तु भारतीय कारीगरों के कौशल पर टिककर इनके प्रसार और सुधार ने रोज़मर्रा का जीवन बदल दिया।
- सिंचाई: सुधरा हुआ रहट, एक ऐसा चक्र जो अधिक गहराई से पानी उठाता था, जिससे अधिक भूमि सींची जा सकी।
- वस्त्र: चरखा और सुधरा हुआ करघा; धुनिया (रुई धुनने वाले) की धनुही ने कपास की सफ़ाई तेज़ और बेहतर कर दी।
- कागज़: कागज़ बनाना उन नए शिल्पों में था जो तुर्कों ने शुरू किए; इससे अभिलेख और पुस्तकें तैयार करना आसान हुआ।
- निर्माण: एक बेहतर गारा, जिसकी सहायता से तुर्क सच्ची मेहराब और गुंबद पर टिकी विशाल इमारतें खड़ी कर सके।
- घुड़सवार सेना और शस्त्र: लोहे की रकाब तथा घोड़े और सवार के लिए कवच, जिनसे धातु उद्योग बढ़ा; इस काल के बिलकुल अंत में बाबर की तोपों ने पानीपत की पहली लड़ाई का फ़ैसला किया।
खेती के विस्तार के साथ इन शिल्पों के प्रसार ने चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध को विकास और अपेक्षाकृत समृद्धि का काल बना दिया। यह बदलाव अधिक व्यस्त कार्यशालाओं में, बेहतर सिंचित खेतों में और मेहराब-गुंबद वाली नई इमारतों में दिखाई देता है।
दिल्ली सल्तनत का स्थापत्य, स्मारक और संस्कृति
दिल्ली सल्तनत के स्मारक: निर्माण के क्रम में
भारतीय-इस्लामी स्थापत्य की शुरुआत सुल्तानों के समय हुई। नई इमारतें सच्ची मेहराब और गुंबद पर टिकी थीं, और हर राजवंश ने दिल्ली पर अपनी छाप छोड़ी। निर्माण के क्रम में:
| स्मारक | निर्माण | राजवंश |
|---|---|---|
| क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद | 1198, ऐबक द्वारा | ममलूक |
| क़ुतुब मीनार, 72.5 मीटर | 1199 में आरंभ; इल्तुतमिश ने मंज़िलें जोड़ीं | ममलूक |
| अलाई दरवाज़ा | 1311, अलाउद्दीन द्वारा | ख़लजी |
| तुग़लक़ाबाद क़िला | 1321, ग़यासुद्दीन द्वारा | तुग़लक़ |
| फ़िरोज़ाबाद (कोटला) | 1354, फ़िरोज़ शाह द्वारा | तुग़लक़ |
| मुहम्मद शाह का मक़बरा | 1444 | सैयद |
| सिकंदर लोदी का मक़बरा | 1517 से 1518 | लोदी |
क़ुव्वत-उल-इस्लाम दिल्ली के सुल्तानों की सबसे पुरानी बची हुई मस्जिद है। क़ुतुब मीनार की नींव ऐबक ने रखी और उसकी पहली मंज़िल बनवाई; इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें और जोड़ीं, और बाद में फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ तथा सिकंदर लोदी ने इसकी मरम्मत करवाई। मस्जिद का दक्षिणी द्वार, अलाउद्दीन का अलाई दरवाज़ा, वह पहली इमारत है जिसमें निर्माण और अलंकरण के इस्लामी सिद्धांत अपनाए गए। क़ुतुब से दुगुनी मीनार बनाने की उसकी योजना पहली मंज़िल पर ही रुक गई। दिल्ली के लोदी गार्डन में अंतिम दो राजवंशों के मक़बरे हैं, और क़ुतुब मीनार तथा उसके स्मारक यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल हैं। इन इमारतों का विस्तृत अध्ययन दिल्ली सल्तनत का भारतीय-इस्लामी स्थापत्य (अंग्रेज़ी में) में है।
फ़ारसी, हिंदवी और अमीर ख़ुसरो: भाषा और साहित्य
फ़ारसी प्रशासन और दरबारी इतिहासों की भाषा थी, और सल्तनत ने भारत को व्यापक इस्लामी जगत से जोड़ा। इस संपर्क का एक परिणाम हिंदुस्तानी भाषा का विकास था। इस युग के सबसे बड़े लेखक अमीर ख़ुसरो (1253 से 1325) थे, जो दरबारी कवि और दिल्ली के सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
ख़ुसरो ने मुख्यतः फ़ारसी में, किन्तु हिंदवी में भी, अनेक काव्य-रूपों में लिखा और ग़ज़ल के विकास में बड़ा योगदान दिया। उन्हें सूफ़ियों के भक्ति-गायन, क़व्वाली, का जनक माना जाता है, और उन्होंने भारत में ग़ज़ल शैली का गायन शुरू किया। अपनी वाक्पटुता के कारण वे तूती-ए-हिंद, अर्थात् भारत का तोता, कहलाए। लोदी दरबार का साहित्य भी इसी दिशा में था: सिकंदर लोदी फ़ारसी कविता लिखता था और उसने चिकित्सा के संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया। इस काल के धर्म, सूफ़ी और भक्ति संतों का विवरण सल्तनत में समाज और धर्म (अंग्रेज़ी में) में है।
दिल्ली सल्तनत के इतिहास के स्रोत
फ़ारसी तवारीख, बरनी और यात्रियों के विवरण
अभिलेख, सिक्के और इमारतें बहुत कुछ बताते हैं, किन्तु सबसे समृद्ध स्रोत फ़ारसी में लिखे इतिहास हैं, जिन्हें तवारीख (एकवचन तारीख़) कहते हैं। इनके लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारी थे। वे नगरों में, मुख्यतः दिल्ली में, रहते थे, और प्रायः बड़े इनाम की आशा में सुल्तानों के लिए लिखते थे। वे जन्मसिद्ध अधिकार और लिंगभेद पर टिकी एक आदर्श समाज-व्यवस्था की सलाह देते थे।
यही दृष्टि उनके लेखन में झलकती है। मिन्हाज-ए-सिराज ने माना कि रज़िया अपने भाइयों से अधिक योग्य थी, फिर भी एक रानी को शासक के रूप में स्वीकार करने में उसे असहजता थी। ज़ियाउद्दीन बरनी ने मुहम्मद बिन तुग़लक़ द्वारा एक कलाल, एक नाई और एक बावर्ची को ऊँचे पदों पर बैठाने को सुल्तान के विवेक के नाश का संकेत माना। उसने अपना इतिहास पहले 1356 में लिखा और दो वर्ष बाद फिर से; पहला रूप 1971 में ही प्रकाश में आया। फ़ख़्र-ए-मुदब्बिर ने न्याय-चक्र समझाया: राजा को सैनिक चाहिए, सैनिकों को वेतन, वेतन राजस्व से आता है, और किसान राजस्व तभी दे सकते हैं जब वे न्यायपूर्ण शासन में ख़ुशहाल हों।
बरनी राज्य की एक मूल विशेषता भी समझाता है। सुल्तानों को इस्लामी क़ानून के साथ अपने बनाए नियम भी जोड़ने पड़े, जिन्हें ज़वाबित कहते थे; अलाउद्दीन ने मुख्य क़ाज़ी से कहा था कि वह अपने क़ानून राज्य की ज़रूरतों के अनुसार बनाता है। इसी कारण बरनी ने इस राज्य को सच्चे अर्थों में इस्लामी मानने से इनकार किया। यात्री बाहर का दृष्टिकोण जोड़ते हैं, विशेषकर मोरक्को का इब्न बतूता, जिसे मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने दिल्ली में क़ाज़ी, अर्थात् न्यायाधीश, नियुक्त किया।
दिल्ली सल्तनत का पतन और मुग़लों का उदय
दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण: अति-विस्तार, अमीर, तैमूर और क्षेत्रीय राज्य
पतन सल्तनत की शक्ति के शिखर पर, मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय, शुरू हुआ और लगभग दो शताब्दियों तक चला। इसके मुख्य कारण थे:
- अति-विस्तार और विद्रोह: दौलताबाद की ओर स्थानांतरण और सांकेतिक मुद्रा की विफलता से असंतोष फैला, 1327 से विद्रोह हुए, और दक्षिण मदुरै, विजयनगर और बहमनी सल्तनत के रूप में अलग हो गया।
- अस्थिर अमीर वर्ग: दास और आश्रित अपने स्वामी के प्रति वफ़ादार रहते थे, उसके उत्तराधिकारियों के प्रति नहीं, इसलिए हर उत्तराधिकार पर टकराव होता था; फ़िरोज़ शाह की वंशानुगत इक्ताओं ने केंद्र की पकड़ और ढीली की।
- तैमूर का आक्रमण: 1398 में दिल्ली की लूट ने सल्तनत को अराजकता में छोड़ दिया।
- क्षेत्रीय राज्य: पंद्रहवीं शताब्दी तक जौनपुर, बंगाल, मालवा, गुजरात, राजस्थान और पूरे दक्षिण भारत में अपने-अपने स्वतंत्र शासक थे।
- अंतिम लोदी: इब्राहीम ने अपने अमीरों को नाराज़ किया, उनमें से एक ने बाबर को बुलाया, और 1526 में पानीपत में बाबर जीता।
दिल्ली सल्तनत और मुग़ल साम्राज्य में अंतर
मुग़ल साम्राज्य वहीं से शुरू हुआ जहाँ सल्तनत समाप्त हुई, 1526 में पानीपत से, और उसने सुल्तानों की बनाई बहुत-सी व्यवस्थाओं पर अपना ढाँचा खड़ा किया। फिर भी दोनों राज्य अपने शासकों, अमीर वर्ग और अधिकारियों को वेतन देने के तरीक़े में अलग थे:
| बिंदु | दिल्ली सल्तनत | मुग़ल साम्राज्य |
|---|---|---|
| काल | 1206 से 1526 | 1526 से, बाबर से आरंभ |
| शासक | क्रम से पाँच राजवंश | एक ही परिवार, तैमूर के वंशज |
| अमीर | बंदगाँ और आश्रित | ज़ात से श्रेणीबद्ध मनसबदार |
| राजस्व-क्षेत्र | इक्ता, मुक़्ती के प्रबंध में | जागीर, केवल राजस्व |
| प्रांत | मुक़्तियों के अधीन इक्ता | सूबेदारों के अधीन सूबे |
| राजधानी | दिल्ली; लोदियों के समय आगरा | आगरा; 1571 में फ़तेहपुर सीकरी |
सबसे बड़ा अंतर राजस्व-क्षेत्र के प्रबंध में है। मुग़ल अमीर, मनसबदार, की श्रेणी ज़ात नामक संख्या से तय होती थी, और उसे जागीर के माध्यम से वेतन मिलता था, जो कुछ हद तक इक्ता जैसा राजस्व-क्षेत्र था। किन्तु मुक़्ती अपनी इक्ता में रहकर उसका शासन चलाता था, जबकि अधिकांश मनसबदार न अपनी जागीर में रहते थे, न उसका प्रशासन करते थे; वे केवल उसका राजस्व लेते थे, जिसे उनके कर्मचारी वसूलते थे।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2023, सामान्य अध्ययन-Iसल्तनत काल के दौरान किये गये बड़े तकनीकी बदलाव क्या थे? उन तकनीकी बदलावों ने भारतीय समाज को कैसे प्रभावित किया था? (उत्तर 250 शब्दों में दीजिए)
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भूमिका में लिखें कि तुर्कों ने भारतीय कारीगरों के कौशल के सहारे कई नए शिल्प और तकनीकें शुरू कीं या लोकप्रिय बनाईं।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- सिंचाई: सुधरा हुआ रहट अधिक गहराई से पानी उठाता था; अधिक भूमि सिंची और उपज बढ़ी।
- वस्त्र: चरखा, सुधरा करघा और धुनिया की धनुही; अधिक और सस्ता कपड़ा, बुनकरी का बड़ा शिल्प।
- कागज़: अभिलेख, पुस्तकें और फ़ारसी इतिहास तैयार करना आसान हुआ।
- निर्माण: बेहतर गारे से सच्ची मेहराब और गुंबद संभव हुए; क़ुतुब मीनार से लोदी मक़बरों तक।
- युद्ध: लोहे की रकाब और कवच से धातु शिल्प बढ़ा; 1526 में पानीपत में बाबर की तोपें।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि खेती के विस्तार के साथ इन शिल्पों ने चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध को विकास और अपेक्षाकृत समृद्धि का काल बनाया, यद्यपि इनमें से अधिकांश ने कोई नया आविष्कार करने के बजाय पुराने कौशल को फैलाया।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2020, सामान्य अध्ययन-Iमध्यकालीन भारत के फ़ारसी साहित्यिक स्रोत उस काल के युगबोध का प्रतिबिंब हैं। टिप्पणी कीजिए। (250 शब्दों में उत्तर दीजिए)
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भूमिका में तवारीख का परिचय दें: सचिवों, प्रशासकों, कवियों और दरबारियों के लिखे फ़ारसी इतिहास, जो सल्तनत के मुख्य साहित्यिक स्रोत हैं।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- लेखक: नगरों में, मुख्यतः दिल्ली में, रहने वाले दरबारी, जो इनाम की आशा में सुल्तानों के लिए लिखते थे।
- आदर्श: जन्मसिद्ध अधिकार और लिंगभेद पर टिकी व्यवस्था; फ़ख़्र-ए-मुदब्बिर का न्याय-चक्र।
- उदाहरण: रानी के रूप में रज़िया पर मिन्हाज-ए-सिराज की असहजता; निम्न कुल के अधिकारियों पर बरनी का तिरस्कार।
- राज्य: ज़वाबित पर बरनी, अर्थात् राज्य की ज़रूरत के अनुसार बने नियम, इसलिए राज्य सच्चे अर्थों में इस्लामी नहीं।
- सीमाएँ: गाँवों और किसानों पर बहुत कम; अभिलेख, सिक्के और इब्न बतूता से जाँच।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि ये स्रोत पूरे समाज से अधिक शासक वर्ग के दरबारी और श्रेणीबद्ध युगबोध को दर्शाते हैं, और यह झुकाव स्वयं उस युग का प्रमाण है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1997 (हिंदी रूपांतर)अपनी शक्ति सुदृढ़ करने के बाद बलबन ने कौन-सी भव्य उपाधि धारण की?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: बलबन ने अपनी राजसत्ता गद्दी के आतंक और प्रतिष्ठा पर टिकाई। चरण 2: उसने स्वयं को ईश्वर की छाया, ज़िल्ल-ए-इलाही, कहा। चरण 3: बाकी तीन में से एक कवि का उपनाम है, एक किसी सुल्तान की उपाधि कभी नहीं रही, और एक अकबर के धार्मिक मार्ग का नाम है।
इस भ्रम से बचें: ज़िल्ल-ए-इलाही और दीन-ए-इलाही मिलते-जुलते लगते हैं; बलबन की केवल पहली है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) तूती-ए-हिंद: ग़लत। 'भारत का तोता' अमीर ख़ुसरो का उपनाम था, किसी सुल्तान की उपाधि नहीं।
- (b) क़ैसर-ए-हिंद: ग़लत। यह दिल्ली के किसी सुल्तान की उपाधि कभी नहीं रही।
- (c) ज़िल्ल-ए-इलाही: सही। बलबन स्वयं को ईश्वर की छाया कहता था।
- (d) दीन-ए-इलाही: ग़लत। यह तीन शताब्दी बाद अकबर का चलाया धार्मिक मार्ग था।
उत्तर: ज़िल्ल-ए-इलाही: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि बलबन ने स्वयं को ईश्वर की छाया कहा।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
- अभिकथन (A): आरंभ में भारत में तुर्क प्रशासन मूलतः सैनिक था।
- कारण (R): देश को 'इक्ताओं' के रूप में प्रमुख सैनिक नेताओं में बाँट दिया गया था।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: अभिकथन कहता है कि पहले तुर्क शासन का स्वरूप सैनिक था; यह सही है। चरण 2: कारण कहता है कि देश इक्ताओं के रूप में सैनिक नेताओं में बाँटा गया; यह भी सही है। चरण 3: इक्ताओं ने ही सैनिक सेनापतियों को देश का शासक बनाया, इसलिए कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
इस भ्रम से बचें: दोनों कथन सही हैं; भूल यह होती है कि कारण को अभिकथन से असंबद्ध मान लिया जाए।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों सही, और R, A की सही व्याख्या है: सही। इक्ताधारी सेनापतियों का शासन ही उसे सैनिक बनाता था।
- (b) दोनों सही, किन्तु R, A की व्याख्या नहीं: ग़लत। इक्ता ही वह कारण है जिससे प्रशासन सैनिक था।
- (c) A सही, R ग़लत: ग़लत। भूमि वास्तव में इक्ताओं के रूप में प्रमुख अमीरों में बाँटी गई थी।
- (d) A ग़लत, R सही: ग़लत। आरंभिक प्रशासन सैनिक था; आरंभिक वज़ीर तक सैनिक थे।
उत्तर: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर: दोनों सही हैं और इक्ता प्रणाली सैनिक स्वरूप की व्याख्या करती है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
- I. तुग़लक़ाबाद क़िला
- II. लोदी गार्डन
- III. क़ुतुब मीनार
- IV. फ़तेहपुर सीकरी
जिस सही कालानुक्रम में इनका निर्माण हुआ, वह है:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: क़ुतुब मीनार, जिसे ऐबक ने 1199 में शुरू करवाया (III)। चरण 2: तुग़लक़ाबाद, जिसे ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने 1321 में बनवाया (I)। चरण 3: लोदी गार्डन के मक़बरे, 1444 और 1517-18 (II)। चरण 4: फ़तेहपुर सीकरी, 1571 से अकबर की राजधानी (IV)। क्रम: III, I, II, IV।
इस भ्रम से बचें: प्रश्न में तुग़लक़ाबाद पहले लिखा है, किन्तु वह क़ुतुब मीनार के एक शताब्दी से भी अधिक बाद बना।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) III, I, IV, II: ग़लत। फ़तेहपुर सीकरी (1571) लोदी मक़बरों के बाद आती है, पहले नहीं।
- (b) III, I, II, IV: सही। 1199, 1321, फिर पंद्रहवीं और आरंभिक सोलहवीं शताब्दी, और अंत में 1571।
- (c) I, III, II, IV: ग़लत। क़ुतुब मीनार (1199) तुग़लक़ाबाद (1321) से पुरानी है।
- (d) I, III, IV, II: ग़लत। इसमें तुग़लक़ाबाद पहले है और फ़तेहपुर सीकरी लोदी मक़बरों से पहले।
उत्तर: III, I, II, IV: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, ममलूक से मुग़ल तक निर्माण का क्रम।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)सल्तनत काल में 'फ़वाज़िल' का अर्थ था
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: मुक़्ती अपनी इक्ता का राजस्व वसूलता और उसी से अपना और सैनिकों का वेतन लेता था। चरण 2: जो बचता, उसे केंद्र को भेजना होता था। चरण 3: राजकोष में भेजी गई यही अतिरिक्त राशि फ़वाज़िल थी।
इस भ्रम से बचें: विकल्प (b) स्वयं इक्ता का वर्णन है, फ़वाज़िल का नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अमीरों को दिया गया अतिरिक्त भुगतान: ग़लत। फ़वाज़िल इक्तादार से राजकोष की ओर जाता था, अमीरों की ओर नहीं।
- (b) वेतन के बदले सौंपा गया राजस्व: ग़लत। यह स्वयं इक्ता है।
- (c) इक्तादारों द्वारा राजकोष में जमा की गई अतिरिक्त राशि: सही। यह वेतन और सैनिकों के ख़र्च के बाद की बचत थी।
- (d) किसानों से की गई अवैध वसूली: ग़लत। फ़वाज़िल केंद्र को भेजी जाने वाली वैध राशि थी।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: फ़वाज़िल इक्तादार की वह बचत थी जो राजकोष में भेजी जाती थी।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)दिल्ली का वह सुल्तान, जिसे भारत में सबसे बड़ा नहर-तंत्र बनवाने का श्रेय दिया जाता है, था
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: नहर-तंत्र किसी निर्माता सुल्तान का काम है, जिसका शासन लंबा और शांत रहा हो। चरण 2: फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने 37 वर्ष शासन किया और पाँच बड़ी नहरें बनवाईं। चरण 3: बाकी तीन दूसरे कामों के लिए जाने जाते हैं।
इस भ्रम से बचें: ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने एक बड़ा क़िला बनवाया, नहर-तंत्र नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) इल्तुतमिश: ग़लत। उसने क़ुतुब मीनार पूरी करवाई और मुद्रा-व्यवस्था खड़ी की; नहर-तंत्र उसका नहीं।
- (b) ग़यासुद्दीन तुग़लक़: ग़लत। उसका काम तुग़लक़ाबाद का क़िला था।
- (c) फ़िरोज़ शाह तुग़लक़: सही। पश्चिमी यमुना नहर सहित पाँच बड़ी नहरें।
- (d) सिकंदर लोदी: ग़लत। वह आगरा को फिर से बसाने के लिए जाना जाता है, नहरों के लिए नहीं।
उत्तर: फ़िरोज़ शाह तुग़लक़: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, उसकी पाँच नहरों के कारण।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2000 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए:
- I. विजयनगर के कृष्णदेव राय का शासन
- II. क़ुतुब मीनार का निर्माण
- III. भारत में पुर्तगालियों का आगमन
- IV. फ़िरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु
उपर्युक्त घटनाओं का सही कालानुक्रम निम्नलिखित में से कौन-सा है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: क़ुतुब मीनार, 1199 में आरंभ (II)। चरण 2: फ़िरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु, 1388 (IV)। चरण 3: वास्को द गामा 1498 में कोझिकोड पहुँचा (III)। चरण 4: कृष्णदेव राय का शासन 1509 से (I)। क्रम: II, IV, III, I।
इस भ्रम से बचें: कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध राजा है, किन्तु वह पुर्तगालियों के आने के बाद आया।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) II, IV, III, I: सही। 1199, 1388, 1498, 1509।
- (b) II, IV, I, III: ग़लत। कृष्णदेव राय (1509) पुर्तगालियों (1498) के बाद आया।
- (c) IV, II, I, III: ग़लत। क़ुतुब मीनार फ़िरोज़ की मृत्यु से पुरानी है, और अंतिम दो भी उलटे हैं।
- (d) IV, II, III, I: ग़लत। फ़िरोज़ की मृत्यु 1388 में हुई, क़ुतुब मीनार शुरू होने के बहुत बाद।
उत्तर: II, IV, III, I: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)चंगेज़ ख़ान के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर किसके शासनकाल में आक्रमण किया?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: चंगेज़ ख़ान 1221 में सिंधु पर पहुँचा और 1227 में उसकी मृत्यु हुई। चरण 2: 1210 से 1236 तक दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश था। चरण 3: बाकी तीनों ने चंगेज़ ख़ान की मृत्यु के बाद शासन किया।
इस भ्रम से बचें: बलबन ने भी मंगोलों से युद्ध किया, किन्तु चंगेज़ ख़ान के कई दशक बाद।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) बलबन: ग़लत। उसका शासन 1266 से था, 1227 में चंगेज़ ख़ान की मृत्यु के कई दशक बाद।
- (b) फ़िरोज़ तुग़लक़: ग़लत। उसका शासन 1351 से था।
- (c) इल्तुतमिश: सही। चंगेज़ ख़ान 1221 में, उसी के शासनकाल में, सिंधु तक पहुँचा।
- (d) मुहम्मद बिन तुग़लक़: ग़लत। उसका शासन 1324 से था; उसका मंगोल शत्रु तरमाशीरीन था।
उत्तर: इल्तुतमिश: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि 1221 उसी के शासनकाल में पड़ता है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2002 (हिंदी रूपांतर)इतिहासकार बरनी ने दिल्ली के सुल्तानों के अधीन भारत के राज्य को सच्चे अर्थों में इस्लामी मानने से इनकार किया, क्योंकि
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: बरनी ने राज्य को उसके क़ानून से परखा। चरण 2: सुल्तानों ने शरीअत के साथ राज्य की ज़रूरत के अनुसार बने अपने ज़वाबित जोड़े। चरण 3: ऐसे सांसारिक नियमों से चलने वाला राज्य उसकी दृष्टि में सच्चे अर्थों में इस्लामी नहीं था।
इस भ्रम से बचें: कई विकल्प सल्तनत के बारे में सही तथ्य हैं; बरनी का बताया कारण केवल एक है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अधिकांश लोग इस्लाम नहीं मानते थे: कारण के रूप में ग़लत। यह तथ्य सही था, पर बरनी की आपत्ति क़ानून पर थी।
- (b) धर्मशास्त्रियों की प्रायः उपेक्षा होती थी: कारण के रूप में ग़लत। इल्तुतमिश के वज़ीर ने उलेमा की बात नहीं मानी थी, पर मूल बात सुल्तान के अपने नियम थे।
- (c) सुल्तान ने अपने नियमों से मुस्लिम क़ानून को अनुपूरित किया: सही। यही नियम ज़वाबित थे।
- (d) ग़ैर-मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता: कारण के रूप में ग़लत। उनका संरक्षित दर्जा सिंध की अरब विजय के समय से चला आ रहा था।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: बरनी की दृष्टि में ज़वाबित ने राज्य को सांसारिक बना दिया।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2003 (हिंदी रूपांतर)क़ुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु कैसे हुई?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ऐबक ने केवल चार वर्ष, 1206 से 1210 तक, शासन किया। चरण 2: लाहौर में चौगान, अर्थात् पोलो जैसा खेल, खेलते हुए एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हुई। चरण 3: युद्ध और घेरे वाले विकल्प उसके जीवन की सच्ची घटनाएँ हैं, पर उसकी मृत्यु की नहीं।
इस भ्रम से बचें: यल्दौज़ और कालिंजर दोनों ऐबक के जीवन से जुड़े हैं, इसलिए ये विकल्प लुभाते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) एक महत्त्वाकांक्षी अमीर ने छुरा घोंपा: ग़लत। किसी अमीर ने उसे नहीं मारा; उसकी मृत्यु दुर्घटना में हुई।
- (b) यल्दौज़ से युद्ध में मारा गया: ग़लत। 1206 के बाद उसने यल्दौज़ से युद्ध किया, पर उसके हाथों नहीं मरा।
- (c) कालिंजर के घेरे में घायल हुआ: ग़लत। उसने 1202 में कालिंजर घेरा और बच गया।
- (d) चौगान खेलते हुए घोड़े से गिरा: सही। लाहौर में, 1210 में।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: लाहौर में चौगान की दुर्घटना।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2004 (हिंदी रूपांतर)दिल्ली सल्तनत के तुग़लक़ वंश का अंतिम शासक कौन था?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: 1388 में फ़िरोज़ शाह की मृत्यु के बाद वंश गृहयुद्ध में बँट गया। चरण 2: 1398 में नासिरुद्दीन महमूद के समय तैमूर ने दिल्ली लूटी। चरण 3: नासिरुद्दीन लौटा और 1414 में सैयदों के दिल्ली लेने तक नाम मात्र का शासक रहा।
इस भ्रम से बचें: फ़िरोज़ शाह अंतिम शक्तिशाली तुग़लक़ था, अंतिम तुग़लक़ नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) फ़िरोज़ शाह तुग़लक़: ग़लत। 1388 में उसकी मृत्यु के बाद भी इस वंश के शासक हुए।
- (b) ग़यासुद्दीन तुग़लक़ शाह द्वितीय: ग़लत। वह फ़िरोज़ के बाद आया और जल्दी ही गृहयुद्ध में मारा गया।
- (c) नासिरुद्दीन महमूद: सही। तैमूर की लूट के बाद वह लौटा और अंतिम, नाममात्र का, तुग़लक़ शासक रहा।
- (d) नुसरत शाह: ग़लत। वह फ़िरोज़ाबाद में नासिरुद्दीन का प्रतिद्वंद्वी सुल्तान था, वंश का अंतिम शासक नहीं।
उत्तर: नासिरुद्दीन महमूद: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2006 (हिंदी रूपांतर)दिल्ली की गद्दी पर बैठे अफ़ग़ान शासकों का सही कालानुक्रम निम्नलिखित में से कौन-सा है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: बहलोल ने 1451 में लोदी वंश की नींव रखी। चरण 2: उसका बेटा सिकंदर, यहाँ सिकंदर शाह, 1489 से शासक रहा। चरण 3: अंतिम शासक इब्राहीम 1526 में पानीपत में हारा।
इस भ्रम से बचें: सिकंदर शाह ही सिकंदर लोदी है, जो बीच का शासक था।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) सिकंदर शाह, इब्राहीम लोदी, बहलोल ख़ान लोदी: ग़लत। संस्थापक बहलोल पहले आता है, अंत में नहीं।
- (b) सिकंदर शाह, बहलोल ख़ान लोदी, इब्राहीम लोदी: ग़लत। सिकंदर बहलोल का बेटा था, इसलिए उसके बाद आया।
- (c) बहलोल ख़ान लोदी, सिकंदर शाह, इब्राहीम लोदी: सही। संस्थापक, बेटा, पोता।
- (d) बहलोल ख़ान लोदी, इब्राहीम लोदी, सिकंदर शाह: ग़लत। इब्राहीम अंतिम लोदी था।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: बहलोल, सिकंदर, इब्राहीम।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- दिल्ली सल्तनत के राजस्व प्रशासन में राजस्व वसूली के प्रभारी को 'आमिल' कहा जाता था।
- दिल्ली के सुल्तानों की इक्ता प्रणाली एक प्राचीन देशी संस्था थी।
- 'मीर बख़्शी' का पद दिल्ली के ख़लजी सुल्तानों के शासनकाल में अस्तित्व में आया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 सही है, क्योंकि आमिल परगने का प्रमुख था और राजस्व वसूलता था। चरण 2: कथन 2 ग़लत है; इक्ता तुर्कों द्वारा लाई गई इस्लामी प्रथा थी, प्राचीन देशी संस्था नहीं। चरण 3: कथन 3 भी ग़लत है; मीर बख़्शी मुग़लों के सैन्य विभाग का प्रमुख था, ख़लजियों का कोई पद नहीं। चरण 4: अतः केवल 1।
इस भ्रम से बचें: मीर बख़्शी सल्तनत के आरिज़-ए-मुमालिक जैसा लगता है, पर यह पद मुग़ल है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: सही। केवल आमिल वाला कथन सही है।
- (b) केवल 1 और 2: ग़लत। इक्ता प्राचीन देशी संस्था नहीं थी।
- (c) केवल 3: ग़लत। मीर बख़्शी मुग़ल पद था।
- (d) 1, 2 और 3: ग़लत। कथन 2 और 3 ग़लत हैं।
उत्तर: केवल 1: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इल्तुतमिश के शासनकाल में, चंगेज़ खान भगोड़े ख्वारिज़्म युवराज की खोज में सिंधु नदी तक पहुँचा था।
- मुहम्मद बिन तुग़लक के शासनकाल में, तैमूर ने मुल्तान पर अधिकार किया था और सिंधु नदी पार की थी।
- विजयनगर साम्राज्य के देव राय द्वितीय के शासनकाल में, वास्को द गामा केरल के तट पर पहुँचा था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 सही है: 1221 में चंगेज़ ख़ान जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा करते हुए, इल्तुतमिश के समय, सिंधु तक आया। चरण 2: कथन 2 ग़लत है: तैमूर 1398 में नासिरुद्दीन महमूद के समय आया, मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय नहीं, जिसकी मृत्यु 1351 में हो चुकी थी। चरण 3: कथन 3 भी ग़लत है: वास्को द गामा 1498 में केरल पहुँचा, जबकि देव राय द्वितीय का शासन 1446 में समाप्त हो चुका था। चरण 4: अतः केवल 1।
इस भ्रम से बचें: हर कथन एक सच्ची घटना को किसी शासक से जोड़ता है; तिथियाँ ही बताती हैं कि कौन-सी जोड़ी सही है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: सही। केवल चंगेज़ ख़ान वाला कथन अपने शासनकाल से मेल खाता है।
- (b) 1 और 2: ग़लत। तैमूर 1398 में आया, मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु के लगभग पचास वर्ष बाद।
- (c) केवल 3: ग़लत। देव राय द्वितीय की मृत्यु 1446 में हुई; वास्को द गामा 1498 में आया।
- (d) 2 और 3: ग़लत। दोनों कथनों में घटनाओं की तिथियाँ ग़लत रखी गई हैं।
उत्तर: केवल 1: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2022भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत पर पहला मंगोल आक्रमण जलालुद्दीन खिलज़ी के राज्यकाल में हुआ।
- अलाउद्दीन खिलज़ी के राज्य-काल में, एक मंगोल आक्रमण दिल्ली तक आ पहुँचा और उस शहर पर घेरा डाल दिया।
- मुहम्मद-बिन-तुगलक मंगोलों से अपने राज्य के कुछ उत्तरी-पश्चिमी भाग अस्थायी रूप से हार गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 ग़लत है: पहला मंगोल आक्रमण 1221 में इल्तुतमिश के समय हुआ, जलालुद्दीन ख़लजी के समय नहीं। चरण 2: कथन 2 सही है: 1299 में अलाउद्दीन के समय मंगोलों ने दिल्ली को घेरा। चरण 3: कथन 3 ग़लत है: मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने झेलम के पास मंगोलों को हराकर पेशावर तक सत्ता फैलाई; उसने उत्तर-पश्चिम उन्हें नहीं खोया। चरण 4: अतः केवल 2।
इस भ्रम से बचें: कथन 3 विश्वसनीय लगता है, क्योंकि मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय मंगोल सचमुच सिंध में घुसे थे; पर उसने उन्हें पीछे धकेल दिया।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 1 और 2: ग़लत। पहला मंगोल आक्रमण इल्तुतमिश के समय हुआ।
- (b) केवल 2: सही। दिल्ली पर मंगोल धावा अलाउद्दीन के समय हुआ।
- (c) 1 और 3: ग़लत। ये दोनों कथन ग़लत हैं।
- (d) केवल 3: ग़लत। मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने मंगोलों को पीछे धकेला।
उत्तर: केवल 2: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
स्रोत
- NCERT: हमारे अतीत II (कक्षा 7), अध्याय 3, दिल्ली: बारहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी
- NCERT: Our Pasts II (Class VII), The Delhi Sultans and The Mughal Empire
- NCERT: Medieval India (Satish Chandra), The Delhi Sultanat and its government
- NCERT: Themes in Indian History II (Class XII), An Imperial Capital: Vijayanagara
- Archaeological Survey of India: Qutb Minar and its Monuments
- UNESCO World Heritage Centre: Qutb Minar and its Monuments, Delhi
- Incredible India (Ministry of Tourism): Qutub Minar
- Wikipedia: Delhi Sultanate
- Wikipedia: Mamluk dynasty (Delhi)
- Wikipedia: Khalji dynasty
- Wikipedia: Tughlaq dynasty
- Wikipedia: Sayyid dynasty
- Wikipedia: Lodi dynasty
- Wikipedia: Qutb ud-Din Aibak
- Wikipedia: Iltutmish
- Wikipedia: Ghiyas ud din Balban
- Wikipedia: Muhammad bin Tughluq
- Wikipedia: Firuz Shah Tughlaq
- Wikipedia: Sack of Delhi (1398)
- Wikipedia: First Battle of Panipat
- Wikipedia: Iqta'
- Wikipedia: Tanka (coin)
- Wikipedia: Jital
- Wikipedia: Alai Darwaza
- Wikipedia: Tughlaqabad Fort
- Wikipedia: Feroz Shah Kotla
- Wikipedia: Lodi Gardens
- Wikipedia: Tomb of Sikandar Lodi
- Wikipedia: Fatehpur Sikri
- Wikipedia: Mughal Empire
- Wikipedia: Amir Khusrau
- Wikipedia: Ibn Battuta
- Wikipedia: Vijayanagara Empire
- Wikipedia: Vasco da Gama
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
शासनकाल की तिथियाँ NCERT की पाठ्यपुस्तकों के अनुसार हैं; अन्य विवरणों में एक वर्ष का अंतर हो सकता है। यह लेख इस पृष्ठ पर दिए गए स्रोतों पर आधारित है।
