परिचय

गैर-संचारी रोग (non-communicable diseases, NCDs), जिन्हें चिरकालिक या जीवनशैली रोग भी कहते हैं, एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते। ये लंबे समय तक चलते हैं और आनुवंशिक, शारीरिक, पर्यावरणीय तथा व्यवहारगत कारकों से पैदा होते हैं; इनमें प्रमुख हैं हृदय-वाहिका रोग, कैंसर, चिरकालिक श्वसन रोग और मधुमेह।

गैर-संचारी रोग: अर्थ, बोझ और जोखिम कारक

संचारी और गैर-संचारी रोग में अंतर

रोगों को मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा जाता है। संचारी या संक्रामक रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं, जबकि गैर-संचारी रोग नहीं फैलते। गैर-संचारी रोगों को असंक्रामक रोग भी कहते हैं। ये प्रायः लंबे समय तक चलते हैं और आनुवंशिक, शारीरिक, पर्यावरणीय तथा व्यवहारगत कारकों के मेल से पैदा होते हैं।

संचारी और गैर-संचारी रोग: तुलना
आधार संचारी रोग गैर-संचारी रोग
कारण रोगजनक जीन, शरीर, पर्यावरण और व्यवहार
फैलाव एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलता
अवधि प्रायः कम प्रायः लंबी, चिरकालिक
उदाहरण मलेरिया, क्षय रोग हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह

प्रमुख गैर-संचारी रोग चार हैं: हृदयाघात और स्ट्रोक जैसे हृदय-वाहिका रोग, कैंसर, COPD और दमा जैसे चिरकालिक श्वसन रोग, तथा मधुमेह। इनमें से अनेक व्यक्ति की जीवनशैली से जुड़े होते हैं, इसलिए इन्हें अक्सर जीवनशैली रोग (lifestyle diseases) कहा जाता है। संक्रामक रोगों की चर्चा संक्रामक रोग वाले लेख में की गई है।

गैर-संचारी रोगों के नाम: जीवनशैली रोग और अन्य उदाहरण

समय से पहले होने वाली गैर-संचारी रोगों की मौतों में से 80 प्रतिशत चार समूहों से होती हैं: हृदय-वाहिका रोग, कैंसर, चिरकालिक श्वसन रोग और मधुमेह। इनमें भी सबसे अधिक मौतें हृदय-वाहिका रोगों से होती हैं। इनके अलावा मानसिक विकार, गुर्दे और यकृत के दीर्घकालिक रोग तथा जीन के माध्यम से माता-पिता से मिलने वाले विकार भी इसी श्रेणी में आते हैं।

गैर-संचारी रोग: प्रमुख समूह और उदाहरण
समूह उदाहरण विशेष बात
हृदय-वाहिका रोग हृदयाघात, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप, आमवाती हृदय रोग विश्व में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण
कैंसर फेफड़े, स्तन, बड़ी आँत और मलाशय, प्रोस्टेट, मुख और गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर; ल्यूकीमिया 2024 में लगभग 1 करोड़ मौतें
चिरकालिक श्वसन रोग चिरकालिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग (COPD), दमा COPD विश्व में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण
मधुमेह टाइप 1, टाइप 2 और गर्भकालीन मधुमेह 2022 में 83 करोड़ लोग मधुमेह से ग्रस्त
मानसिक विकार अवसाद, चिंता विकार, मनोभ्रंश (डिमेंशिया) लगभग हर सात में से एक व्यक्ति प्रभावित
गुर्दे और यकृत के रोग दीर्घकालिक गुर्दा रोग, गैर-मादक वसीय यकृत रोग दोनों भारत के NCD कार्यक्रम में शामिल
वंशागत विकार सिकल सेल रोग, सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस माता-पिता से मिली आनुवंशिक सूचना की त्रुटियों से

इन्हें चिरकालिक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि ये धीरे-धीरे बढ़ते हैं और लंबे समय तक बने रहते हैं। कई रोगों की जड़ आदतों में है, किन्तु ये आदतें स्वयं व्यक्ति के सामाजिक, व्यावसायिक और भौतिक परिवेश से बनती हैं। अतः इन रोगों पर नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य, वित्त, परिवहन, शिक्षा और कृषि जैसे सभी क्षेत्रों को मिलकर काम करना पड़ता है।

विश्व और भारत में गैर-संचारी रोगों का बोझ

आज विश्व में सबसे अधिक मौतें गैर-संचारी रोगों से होती हैं। 2021 में इनसे कम से कम 4.3 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई, जो महामारी से इतर हुई सभी मौतों का 75 प्रतिशत था। इनमें से 1.8 करोड़ लोगों की आयु 70 वर्ष से कम थी। समय से पहले होने वाली इन मौतों में से 82 प्रतिशत निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुईं, और इन्हीं देशों में गैर-संचारी रोगों की कुल मौतों का 73 प्रतिशत होता है।

भारत में कुल मौतों में से 55 प्रतिशत से अधिक गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के INDIAB अध्ययन के अनुसार 2023 में देश में मधुमेह से ग्रस्त लोगों की संख्या 10.1 करोड़ थी, जबकि जनसंख्या-आधारित जाँच में लगभग 7 करोड़ लोग उच्च रक्तचाप से ग्रस्त पाए गए हैं।

ये रोग धीरे-धीरे और अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ते हैं। इसी कारण इनसे निपटने का आधार है समय पर पहचान, जाँच और उपचार, तथा जिनका रोग ठीक नहीं हो सकता उनके लिए प्रशामक देखभाल (palliative care)। सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा का लक्ष्य है कि 30 से 70 वर्ष की आयु के बीच चार प्रमुख गैर-संचारी रोगों में से किसी से मृत्यु की संभावना एक-तिहाई घटाई जाए। गरीबी और ये रोग एक-दूसरे को बढ़ाते हैं: लंबे उपचार का खर्च परिवारों को गरीबी में धकेल देता है, जबकि गरीब लोग स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुँच के कारण जल्दी बीमार पड़ते हैं और जल्दी मरते हैं।

गैर-संचारी रोगों के कारण: व्यवहारगत, चयापचयी और पर्यावरणीय जोखिम कारक

गैर-संचारी रोगों के कारण तीन तरह के होते हैं। पहले हैं व्यवहारगत जोखिम कारक (behavioural risk factors), अर्थात् आदतें: तंबाकू का सेवन, अधिक नमक, चीनी और वसा वाला अस्वास्थ्यकर आहार, शराब का हानिकारक सेवन और बहुत कम शारीरिक गतिविधि। वर्षों बाद ये आदतें शरीर में चार चयापचयी जोखिम कारकों (metabolic risk factors) के रूप में दिखती हैं: बढ़ा हुआ रक्तचाप, अधिक वजन और मोटापा, रक्त में अधिक ग्लूकोज़, तथा रक्त वसा का असामान्य स्तर, जैसे अधिक कोलेस्ट्रॉल। इनमें बढ़ा हुआ रक्तचाप सबसे आगे है; विश्व में गैर-संचारी रोगों की 25 प्रतिशत मौतें इससे जुड़ी हैं।

तीन स्तंभों का प्रवाह-चित्र। व्यवहार: तंबाकू सेवन, अस्वास्थ्यकर आहार, शराब का हानिकारक सेवन और शारीरिक निष्क्रियता। इनसे चयापचयी परिवर्तन होते हैं: बढ़ा हुआ रक्तचाप, अधिक वजन और मोटापा, रक्त में अधिक ग्लूकोज़ और रक्त वसा का असामान्य स्तर। इनसे प्रमुख गैर-संचारी रोग होते हैं: हृदय-वाहिका रोग, कैंसर, चिरकालिक श्वसन रोग और मधुमेह। वायु प्रदूषण सीधे हृदय और फेफड़ों पर असर करता है। गैर-संचारी रोगों की 25 प्रतिशत मौतें बढ़े हुए रक्तचाप से जुड़ी हैं।

तीसरा कारण पर्यावरण है, और इसमें सबसे बड़ा है घर के भीतर और बाहर का वायु प्रदूषण। इससे हर वर्ष होने वाली 67 लाख मौतों में से लगभग 56 लाख गैर-संचारी रोगों से होती हैं: स्ट्रोक, हृदय रोग, COPD और फेफड़े का कैंसर। आदतों में सबसे घातक है तंबाकू। यह हर वर्ष 70 लाख से अधिक लोगों की जान लेता है, जिनमें 16 लाख से अधिक ऐसे लोग भी हैं जो स्वयं धूम्रपान नहीं करते किन्तु दूसरों के धुएँ के संपर्क में रहते हैं। तंबाकू के धुएँ का कोई भी स्तर सुरक्षित नहीं है।

  • निकोटिन: तंबाकू का यह ऐल्कलॉइड अधिवृक्क ग्रंथि से एड्रिनलिन और नॉरएड्रिनलिन का स्राव करवाता है, जिससे रक्तचाप और हृदय गति बढ़ती है; इसकी लत बहुत जल्दी लगती है।
  • धूम्रपान: फेफड़े, मूत्राशय और गले के कैंसर, श्वसनीशोथ (ब्रोंकाइटिस), वातस्फीति (एम्फ़िसीमा), कोरोनरी हृदय रोग और आमाशय के अल्सर से इसका संबंध है। यह रक्त में कार्बन मोनोऑक्साइड बढ़ाता है और रक्त की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता घटाता है। तंबाकू चबाने से मुख के कैंसर का खतरा बढ़ता है।
  • शराब: लंबे समय तक इसका सेवन तंत्रिका तंत्र और यकृत को क्षति पहुँचाता है, जिससे यकृत का सिरोसिस होता है।
  • निष्क्रियता: विश्व के लगभग 31 प्रतिशत वयस्क (180 करोड़ लोग) सप्ताह में अनुशंसित 150 मिनट की मध्यम गतिविधि नहीं करते।
  • आहार: लोग अब अस्वास्थ्यकर वसा, चीनी और नमक वाला प्रसंस्कृत भोजन अधिक खाते हैं; विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सलाह है कि 10 वर्ष से अधिक आयु का हर व्यक्ति प्रतिदिन कम से कम 400 ग्राम फल और सब्ज़ियाँ खाए।

हृदय-वाहिका रोग और उच्च रक्तचाप

उच्च रक्तचाप क्या है: सामान्य रक्तचाप और इसके छिपे रहने का कारण

जब रक्त वाहिकाओं में दाब 140/90 mmHg या उससे अधिक हो जाए, तो उसे उच्च रक्तचाप (hypertension) कहते हैं। यह आम है और उपचार न हो तो गंभीर हो सकता है, फिर भी इससे ग्रस्त बहुत से लोगों को कोई लक्षण महसूस नहीं होता। अतः रक्तचाप की जाँच ही इसे जानने का एकमात्र तरीका है। यह दाब बनता कैसे है, यह परिसंचरण तंत्र (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में समझाया गया है।

रक्तचाप दो संख्याओं में लिखा जाता है। पहली संख्या प्रकुंचन दाब (systolic) है, अर्थात् हृदय के धड़कते समय का दाब; दूसरी अनुशिथिलन दाब (diastolic) है, अर्थात् दो धड़कनों के बीच हृदय के विश्राम के समय का दाब। दो अलग-अलग दिनों की जाँच में प्रकुंचन दाब 140 या अधिक हो, अनुशिथिलन दाब 90 या अधिक हो, या दोनों हों, तो उच्च रक्तचाप माना जाता है।

  • व्यापकता: 2024 में 30 से 79 वर्ष के लगभग 140 करोड़ वयस्क उच्च रक्तचाप से ग्रस्त थे, जो इस आयु वर्ग का एक-तिहाई है। इनमें से 44 प्रतिशत को अपनी स्थिति का पता ही नहीं था, और केवल 23 प्रतिशत का रक्तचाप नियंत्रण में था।
  • जोखिम कारक: बढ़ती आयु, आनुवंशिकता, अधिक वजन, शारीरिक निष्क्रियता, अधिक नमक वाला आहार और अधिक शराब।
  • भारत में: राष्ट्रीय NCD कार्यक्रम में 40.87 करोड़ से अधिक लोगों की उच्च रक्तचाप के लिए जाँच हुई; लगभग 7 करोड़ में रोग पाया गया और 5.57 करोड़ का उपचार शुरू हुआ।
  • वैश्विक लक्ष्य: 2010 से 2025 के बीच अनियंत्रित उच्च रक्तचाप की व्यापकता 25 प्रतिशत घटाना।
विश्व में 2024 में उच्च रक्तचाप से ग्रस्त 30 से 79 वर्ष के वयस्कों का दंड-चित्र। पूरा दंड सभी 140 करोड़ ग्रस्त वयस्क हैं। इनमें से 44 प्रतिशत को अपनी स्थिति का पता नहीं था, और केवल 23 प्रतिशत का रक्तचाप नियंत्रण में था।

इसमें नमक की सीधी भूमिका है। अधिक नमक से शरीर में अतिरिक्त पानी रुकता है, जिससे रक्त का आयतन और धमनियों की दीवारों पर दाब बढ़ता है। ICMR के सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में पुरुष प्रतिदिन औसतन 8.9 ग्राम नमक खाते हैं और महिलाएँ लगभग 7.1 ग्राम, जबकि WHO की सलाह 5 ग्राम से कम की है। स्वस्थ आहार, तंबाकू छोड़ने और अधिक सक्रिय रहने से भी रक्तचाप घटता है, हालाँकि कुछ लोगों को दवाओं की आवश्यकता बनी रहती है।

धमनी-काठिन्य, हृदयाघात, स्ट्रोक और अन्य हृदय-वाहिका रोग

हृदय और रक्त वाहिकाओं के विकारों को हृदय-वाहिका रोग (cardiovascular diseases, CVD) कहते हैं। विश्व में सबसे अधिक मौतें इन्हीं से होती हैं: 2022 में अनुमानतः 1.98 करोड़ लोगों की मृत्यु इनसे हुई, जो कुल मौतों का लगभग 32 प्रतिशत है। इनमें से 85 प्रतिशत मौतें हृदयाघात और स्ट्रोक से हुईं।

  • कोरोनरी हृदय रोग: हृदय की पेशियों को रक्त पहुँचाने वाली वाहिकाओं का रोग।
  • मस्तिष्क-वाहिका रोग: मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाली वाहिकाओं का रोग।
  • परिधीय धमनी रोग: हाथों और पैरों तक रक्त ले जाने वाली वाहिकाओं का रोग।
  • आमवाती हृदय रोग: स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु से होने वाले आमवाती ज्वर के कारण हृदय की पेशियों और वाल्वों की क्षति।
  • जन्मजात हृदय रोग: जन्म से हृदय की संरचना में दोष।
  • गहरी शिरा घनास्त्रता और फुफ्फुसीय अंतःशल्यता (deep vein thrombosis, pulmonary embolism): पैरों की शिराओं में बने रक्त के थक्के, जो टूटकर हृदय और फेफड़ों तक पहुँच सकते हैं।

हृदयाघात और स्ट्रोक प्रायः अचानक होते हैं। इनमें कोई रुकावट हृदय या मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने से रोक देती है। इसका सामान्य कारण है धमनी-काठिन्य (atherosclerosis): धमनी की दीवार में वसा, कोलेस्ट्रॉल, प्रतिरक्षा कोशिकाओं और कैल्शियम की परत (प्लाक) जमती जाती है और धमनी को संकरा कर देती है। यह प्रक्रिया अक्सर दशकों तक बिना किसी लक्षण के चलती है। जब यह प्लाक फटती है, तो उस पर रक्त का थक्का बन जाता है, जो कुछ ही मिनटों में धमनी को बंद कर सकता है; तब उस धमनी से रक्त पाने वाले ऊतक मरने लगते हैं। स्ट्रोक मस्तिष्क में रक्तस्राव से भी हो सकता है।

अधिकांश हृदय-वाहिका रोगों से बचा जा सकता है, यदि तंबाकू, अस्वास्थ्यकर आहार, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, शराब के हानिकारक सेवन और वायु प्रदूषण पर अंकुश लगे।

अक्सर मूल रोग का कोई लक्षण नहीं दिखता और हृदयाघात या स्ट्रोक ही पहला संकेत होता है। हृदयाघात में प्रायः छाती के बीच में दर्द या बेचैनी होती है, जो बाँहों, बाएँ कंधे, कोहनियों, जबड़े या पीठ में भी हो सकती है।

मधुमेह और मोटापा

मधुमेह किसे कहते हैं: टाइप 1, टाइप 2 और गर्भकालीन मधुमेह

मधुमेह (diabetes) एक चिरकालिक रोग है। इसमें या तो अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता, या शरीर बने हुए इंसुलिन का ठीक से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर ऊँचा बना रहता है। इंसुलिन कैसे काम करता है, यह अंतःस्रावी तंत्र (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में बताया गया है। मधुमेह से ग्रस्त लोगों की संख्या 1990 में 20 करोड़ थी, जो 2022 तक बढ़कर 83 करोड़ हो गई।

  • टाइप 1: शरीर बहुत कम इंसुलिन बनाता है, इसलिए प्रतिदिन इंसुलिन देना पड़ता है; इसका कारण और इससे बचाव का तरीका ज्ञात नहीं है।
  • टाइप 2: शरीर इंसुलिन का ठीक से उपयोग नहीं कर पाता। मधुमेह के 95 प्रतिशत से अधिक रोगी इसी प्रकार के हैं, और संतुलित आहार, सक्रियता, सामान्य वजन तथा तंबाकू से दूरी से इसे प्रायः रोका जा सकता है।
  • गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था में रक्त ग्लूकोज़ का बढ़ना, जिससे आगे चलकर टाइप 2 मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है।

समय के साथ मधुमेह हृदय, आँखों, गुर्दों और तंत्रिकाओं की रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुँचाता है। इससे अंधापन, गुर्दे की विफलता, हृदयाघात, स्ट्रोक और अंग-विच्छेदन तक की नौबत आ सकती है। भारत में 40.68 करोड़ से अधिक लोगों की मधुमेह के लिए जाँच हुई है और लगभग 4.68 करोड़ में यह रोग पाया गया है।

मोटापा, ट्रांस वसा और आहार से जुड़े रोग

WHO मोटापे (obesity) को एक चिरकालिक और बार-बार लौटने वाला रोग मानता है। इसके पीछे आनुवंशिकता, तंत्रिका-जीव विज्ञान, खान-पान का व्यवहार, स्वस्थ आहार तक पहुँच, बाज़ार की शक्तियाँ और व्यापक परिवेश, सबकी भूमिका होती है। 2022 में हर आठ में से एक व्यक्ति मोटापे से ग्रस्त था। 1990 के बाद से वयस्कों में मोटापा दोगुने से अधिक और किशोरों में चार गुना हो गया है। अधिक वजन और मोटापा तब होते हैं, जब भोजन से मिलने वाली ऊर्जा और गतिविधि में खर्च होने वाली ऊर्जा का संतुलन बिगड़ जाता है।

  • अधिक वजन: 2022 में 43 प्रतिशत वयस्कों का वजन सामान्य से अधिक था, और 16 प्रतिशत मोटापे से ग्रस्त थे।
  • ट्रांस वसा: तरल वनस्पति तेलों में हाइड्रोजन मिलाकर औद्योगिक रूप से बनाई जाती है और वनस्पति घी, मार्जरीन तथा तले-भुने और बेकरी के खाद्यों में मिलती है। यह धमनियों को अवरुद्ध करती है और हर वर्ष 2.78 लाख से अधिक मौतों से जुड़ी है। प्राकृतिक ट्रांस वसा गाय, भेड़ और बकरी के मांस तथा दुग्ध उत्पादों में भी होती है।
  • भारत की सीमा: 1 जनवरी 2022 से भारत में किसी खाद्य के तेल और वसा में औद्योगिक ट्रांस वसा उनके द्रव्यमान के 2 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती; दूध, मांस और मछली के उत्पाद इस नियम से बाहर हैं।

ताज़े फल और सब्ज़ियाँ प्रतिऑक्सीकारक (antioxidants) देते हैं। ये ऐसे यौगिक हैं जो ऑक्सीकरण को रोकते हैं, अर्थात् उस रासायनिक अभिक्रिया को, जिससे हानिकारक मुक्त मूलक (free radicals) बन सकते हैं।

कैंसर: कारण, प्रकार, पहचान और उपचार

कैंसर क्या है: अनियंत्रित कोशिका विभाजन, अर्बुद और मैटास्टेसिस

शरीर में कोशिकाओं की वृद्धि और विभाजन कड़े नियंत्रण में रहते हैं। जब यह नियंत्रण टूट जाता है, तो कैंसर होता है। सामान्य कोशिकाएँ दूसरी कोशिकाओं के संपर्क में आते ही विभाजन रोक देती हैं; इस गुण को संस्पर्श संदमन (contact inhibition) कहते हैं। कैंसर कोशिकाओं में यह गुण नहीं रहता, इसलिए वे विभाजित होती रहती हैं और कोशिकाओं का ढेर बना देती हैं, जिसे अर्बुद (ट्यूमर) कहते हैं।

ऊतक के दो भाग। बाएँ, सुदम अर्बुद: एक चिकना पुंज, जो अपने मूल स्थान पर रहता है और थोड़ी ही क्षति करता है। दाएँ, दुर्दम अर्बुद: एक अनियमित पुंज, जो आसपास के ऊतक में फैलता है; उसकी कोशिकाएँ टूटकर रक्त या लसीका वाहिका में जाती हैं और दूसरी जगह नए अर्बुद बनाती हैं, जिसे मैटास्टेसिस कहते हैं। सामान्य कोशिकाएँ संपर्क होते ही विभाजन रोकती हैं; कैंसर कोशिकाओं में यह संस्पर्श संदमन नहीं रहता।
  • सुदम अर्बुद (benign): अपने मूल स्थान तक सीमित रहते हैं और थोड़ी ही क्षति करते हैं।
  • दुर्दम अर्बुद (malignant): तेज़ी से विभाजित होने वाली नवद्रव्यीय कोशिकाओं के पुंज, जो आसपास के ऊतकों में घुसकर उन्हें क्षति पहुँचाते हैं और सामान्य कोशिकाओं के हिस्से के पोषक तत्व छीन लेते हैं।
  • मैटास्टेसिस: दुर्दम अर्बुद से टूटी कोशिकाएँ रक्त या लसीका के रास्ते दूसरे स्थानों पर पहुँचकर नए अर्बुद बनाती हैं; यही कैंसर का सबसे डरावना गुण है।

कैंसर मृत्यु के प्रमुख कारणों में है: 2024 में इससे लगभग 1 करोड़ मौतें हुईं; विश्व में लगभग हर छह में से एक मौत कैंसर से होती है। सामान्य कोशिकाओं की मृत्यु भी एक तय कार्यक्रम से होती है, जिसे एपोप्टोसिस (apoptosis) या क्रमादेशित कोशिका मृत्यु कहते हैं; कैंसर कोशिकाओं के साथ इसे कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में समझाया गया है।

कैंसर कैसे होता है: कैंसरजन, अर्बुदजीन और कैंसर उत्पन्न करने वाले विषाणु

सामान्य कोशिकाएँ भौतिक, रासायनिक या जैविक कारकों के प्रभाव से कैंसर कोशिकाओं में बदल जाती हैं। ऐसे कारकों को कैंसरजन (carcinogens) कहते हैं। एक्स-किरणें और गामा किरणें जैसे आयनकारी विकिरण, तथा पराबैंगनी किरणें जैसे अनायनकारी विकिरण, DNA को क्षति पहुँचाते हैं; तंबाकू के धुएँ के रसायन फेफड़े के कैंसर का एक प्रमुख कारण हैं।

  • अर्बुदीय विषाणु: कैंसर उत्पन्न करने वाले विषाणुओं में विषाणुवीय अर्बुदजीन (viral oncogenes) नामक जीन होते हैं।
  • आदिअर्बुद जीन: सामान्य कोशिकाओं में भी कोशिकीय अर्बुदजीन होते हैं, जो कुछ विशेष परिस्थितियों में सक्रिय होकर कोशिका को कैंसरग्रस्त बना सकते हैं।
  • जीवनशैली: कैंसर की लगभग एक-चौथाई मौतें तंबाकू, शराब, अधिक बॉडी मास इंडेक्स, फल-सब्ज़ियों की कमी और निष्क्रियता से जुड़ी हैं।
  • संक्रमण: निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में लगभग 30 प्रतिशत कैंसर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) और यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) से होते हैं। भारत ने 2026 में 14 वर्ष की लड़कियों के लिए राष्ट्रव्यापी HPV टीकाकरण शुरू किया, जैसा कि प्रतिरक्षा और टीके (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में बताया गया है।

कैंसर के प्रकार और उसकी पहचान

विश्व में सबसे आम कैंसर फेफड़े, स्तन, बड़ी आँत और मलाशय, तथा प्रोस्टेट के हैं। जल्दी पहचान इसलिए आवश्यक है क्योंकि अनेक कैंसर समय पर पकड़ में आएँ और ठीक से उपचार हो, तो ठीक हो जाते हैं। पहचान का आधार है जीवूतिपरीक्षा (बायोप्सी): संदिग्ध ऊतक का एक पतला, अभिरंजित टुकड़ा सूक्ष्मदर्शी से जाँचा जाता है।

  • रक्त और अस्थिमज्जा की जाँच: ल्यूकीमिया में कोशिकाओं की बढ़ी हुई गणना देखी जाती है।
  • इमेजिंग: एक्स-किरणों से रेडियोग्राफ़ी, एक्स-किरणों से त्रिविम चित्र बनाने वाली CT, और तेज़ चुंबकीय क्षेत्र तथा अनायनकारी विकिरण का उपयोग करने वाली MRI से भीतरी अंगों के कैंसर पकड़े जाते हैं।
  • प्रतिरक्षी और जीन: कैंसर-विशिष्ट प्रतिजनों के विरुद्ध प्रतिरक्षियों से कुछ कैंसरों का पता चलता है, और आणविक परीक्षणों से ऐसे वंशागत जीन मिलते हैं जो खतरा बढ़ाते हैं।

भारत का कार्यक्रम तीन आम कैंसरों की जाँच करता है: मुख, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा। अब तक 34 करोड़ से अधिक लोगों की मुख कैंसर के लिए, 16 करोड़ की स्तन कैंसर के लिए और 8.73 करोड़ महिलाओं की गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिए जाँच हो चुकी है।

जल्दी पहचान के दो भाग हैं। पहला है प्रारंभिक निदान (early diagnosis), अर्थात् लक्षण पहचानकर तुरंत उपचार लेना; दूसरा है ऐसे लोगों की जाँच, जिनमें अभी कोई लक्षण नहीं है। स्तन, गर्भाशय ग्रीवा, मुख और बड़ी आँत के कैंसर जल्दी पकड़ में आएँ और ठीक से उपचार हो, तो इनके ठीक होने की दर ऊँची है। इसी कारण भारत इनमें से तीन की जाँच करता है।

कैंसर का उपचार: शल्यक्रिया, विकिरण चिकित्सा, रसायन चिकित्सा और प्रतिरक्षा चिकित्सा

कैंसर के उपचार के आम तरीके हैं शल्यक्रिया, विकिरण चिकित्सा, रसायन चिकित्सा और प्रतिरक्षा चिकित्सा। अधिकांश कैंसरों में शल्यक्रिया, विकिरण चिकित्सा और रसायन चिकित्सा को साथ-साथ अपनाया जाता है।

इस बोझ का बड़ा हिस्सा खर्च है। अक्टूबर 2026 में केंद्र सरकार ने तय किया कि सभी गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक सीमित रहेगा, चाहे दवा ब्रांडेड हो या जेनेरिक, देश में बनी हो या आयातित। यह निर्णय राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के इस निष्कर्ष के बाद आया कि ऐसी दवाओं पर औसत मार्क-अप लगभग 170 प्रतिशत था, और कुछ दवाओं पर 700 प्रतिशत तक।

  • विकिरण चिकित्सा: अर्बुद कोशिकाओं पर घातक मात्रा में विकिरण डाला जाता है, और आसपास के सामान्य ऊतक को बचाने का ध्यान रखा जाता है।
  • साइबरनाइफ़ (CyberKnife): विकिरण चिकित्सा का एक उपकरण, जिसमें एक छोटा रैखिक त्वरक रोबोटिक भुजा पर लगा होता है। इसकी इमेज-निर्देशन प्रणाली त्रिविम चित्र लेती है, हिलते हुए अर्बुद पर नज़र रखती है और भुजा को उसी पर किरण केंद्रित करने का निर्देश देती है, ताकि सटीक मात्रा अर्बुद तक पहुँचे। यह अर्बुद का उपचार करता है; कैंसर कहाँ तक फैला है, यह पता लगाना ऊपर बताई गई इमेजिंग विधियों का काम है।
  • रसायन चिकित्सा: दवाएँ कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करती हैं, और कुछ दवाएँ विशेष अर्बुदों के लिए होती हैं; अधिकतर के दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे बालों का झड़ना और रक्ताल्पता।
  • प्रतिरक्षा चिकित्सा: अर्बुद कोशिकाएँ प्रतिरक्षा तंत्र की पकड़ से बच निकलती हैं। इसलिए रोगियों को ऐल्फ़ा-इंटरफ़ेरॉन जैसे जैविक अनुक्रिया रूपांतरक (biological response modifiers) दिए जाते हैं, जो प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करते हैं और उसे कैंसर को पहचानकर उससे लड़ने में मदद करते हैं।

चिरकालिक श्वसन रोग, मानसिक स्वास्थ्य और वृद्धावस्था

चिरकालिक श्वसन रोग: COPD और दमा

चिरकालिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग (COPD) में श्वास नलियों में हवा का प्रवाह बाधित होता है और साँस लेना कठिन हो जाता है; इसे कभी-कभी वातस्फीति या चिरकालिक श्वसनीशोथ भी कहते हैं। 2023 में 34 लाख मौतों के साथ यह विश्व में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण था। धूम्रपान और वायु प्रदूषण इसके सबसे आम कारण हैं; गरीब देशों में घर के भीतर का वायु प्रदूषण बड़ा खतरा है। खाँसी, अक्सर बलगम के साथ, साँस लेने में कठिनाई, घरघराहट और थकान इसके लक्षण हैं। COPD ठीक नहीं होता, किन्तु धूम्रपान और प्रदूषित हवा से बचने, संक्रमणों के टीके लगवाने और दवाएँ लेने से लक्षण कम होते हैं।

दमा (asthma) में छोटी श्वास नलियों में सूजन आती है और वे संकरी हो जाती हैं, जिससे खाँसी, घरघराहट, साँस फूलना और छाती में जकड़न होती है। 2023 में अनुमानतः 36.3 करोड़ लोग इससे प्रभावित थे। बच्चों में यह सबसे आम चिरकालिक रोग है, और साँस से ली जाने वाली दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है। श्वास नलियाँ कैसे काम करती हैं, यह श्वसन तंत्र (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में बताया गया है।

मानसिक स्वास्थ्य और बढ़ती आयु संभाविता की स्वास्थ्य चुनौतियाँ

विश्व में लगभग हर सात में से एक व्यक्ति किसी मानसिक विकार के साथ जी रहा है। रोकथाम और उपचार के प्रभावी उपाय मौजूद हैं, किन्तु अधिकांश लोगों की उन तक पहुँच नहीं है। भारत में इसके लिए 1982 से राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम चल रहा है, और टेली-मानस हेल्पलाइन भी है। सबसे आम हैं चिंता और अवसाद के विकार: 2023 में 47 करोड़ लोग चिंता विकार और 32.2 करोड़ अवसाद के साथ जी रहे थे। अवसाद मन के सामान्य उतार-चढ़ाव से अलग है और कम से कम दो सप्ताह तक बना रहता है।

दुनिया भर में लोग अब अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं। 2015 से 2050 के बीच विश्व की जनसंख्या में 60 वर्ष से अधिक आयु वालों की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी होकर 12 से 22 प्रतिशत हो जाएगी, और 2030 तक हर छह में से एक व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक का होगा। लंबा जीवन अपनी स्वास्थ्य चुनौतियाँ लाता है, क्योंकि वृद्ध लोगों में एक साथ कई रोग होने की संभावना अधिक होती है।

  • वृद्धावस्था के आम रोग: कम सुनाई देना, मोतियाबिंद और दृष्टि दोष, पीठ और गर्दन का दर्द, अस्थि-संधिशोथ, COPD, मधुमेह, अवसाद और मनोभ्रंश; मनोभ्रंश तंत्रिका तंत्र (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में समझाया गया है।
  • भारत का उत्तर: NCD कार्यक्रम 30 वर्ष से अधिक आयु के हर व्यक्ति की आम चिरकालिक रोगों के लिए जाँच करता है, जबकि मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस अवसाद तथा अन्य विकारों से ग्रस्त लोगों तक पहुँचते हैं।

भारत में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण

राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग कार्यक्रम (NP-NCD): जाँच और आयुष्मान आरोग्य मंदिर

भारत का उत्तर है गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण का राष्ट्रीय कार्यक्रम (NP-NCD), जो 2010 में शुरू हुआ और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत चलता है। इसका ध्यान मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मुख, स्तन और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर, दीर्घकालिक गुर्दा रोग, हृदयाघात, COPD, गैर-मादक वसीय यकृत रोग और स्ट्रोक पर है।

देखभाल के पाँच स्तरों का पिरामिड, नीचे से ऊपर: समुदाय, जहाँ आशा और ANM 30 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों की जाँच करती हैं; आयुष्मान आरोग्य मंदिर, जो घर के पास जाँच करते हैं; 6,410 NCD क्लिनिक वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र; 770 NCD क्लिनिक और 233 हृदय देखभाल इकाइयों वाले ज़िला अस्पताल; और तृतीयक देखभाल। एक तीर ऊपर की ओर रेफ़रल दिखाता है। कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत है।
  • जनसंख्या-आधारित जाँच: 30 वर्ष से अधिक आयु के हर व्यक्ति की आम गैर-संचारी रोगों के लिए जाँच आशा और ANM करती हैं, और आवश्यकता होने पर उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, ज़िला अस्पताल और तृतीयक देखभाल तक भेजा जाता है।
  • सुविधाएँ: 770 ज़िला NCD क्लिनिक, 479 ज़िला डे-केयर केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 6,410 NCD क्लिनिक और 233 हृदय देखभाल इकाइयाँ।
  • जाँच अभियान: 20 फ़रवरी से 31 मार्च 2025 तक एक राष्ट्रीय अभियान में 30 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों की जाँच का लक्ष्य रखा गया, जो आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और अन्य सुविधाओं के माध्यम से चला।

75/25 पहल विश्व उच्च रक्तचाप दिवस, 17 मई 2023 को शुरू हुई। इसका लक्ष्य था कि दिसंबर 2025 तक उच्च रक्तचाप और मधुमेह से ग्रस्त 7.5 करोड़ लोगों को मानक उपचार मिले। 5 मार्च 2025 तक 4.201 करोड़ लोगों का उच्च रक्तचाप और 2.527 करोड़ का मधुमेह के लिए उपचार चल रहा था, जो लक्ष्य का 89.7 प्रतिशत है।

तंबाकू नियंत्रण, स्वस्थ आहार और स्वस्थ जीवनशैली

तंबाकू नियंत्रण का आधार है सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA)। यह सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान, नाबालिगों को और नाबालिगों द्वारा बिक्री, शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज़ के भीतर बिक्री और तंबाकू के विज्ञापन पर रोक लगाता है, तथा पैकेटों पर स्वास्थ्य चेतावनी अनिवार्य करता है।

  • राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम: 2007-08 में शुरू हुआ, ताकि जागरूकता बढ़े, आपूर्ति घटे, COTPA लागू हो, लोग तंबाकू छोड़ सकें और WHO के तंबाकू नियंत्रण फ्रेमवर्क अभिसमय का पालन हो।
  • छोड़ने में सहायता: 2,000 से अधिक तंबाकू समाप्ति केंद्र, और 2018 से एक राष्ट्रीय टोल-फ्री क्विटलाइन।
  • तंबाकू सेवन में गिरावट: वयस्कों में तंबाकू का सेवन 2009-10 के 34.6 प्रतिशत से घटकर 2016-17 में 28.6 प्रतिशत रह गया; यह 17.3 प्रतिशत की सापेक्ष कमी है।

खाद्य नियमों ने एक दूसरा मोर्चा खोला है: ट्रांस वसा की सीमा तय करके भारत थाईलैंड के बाद एशिया के उन पहले देशों में शामिल हुआ, जिनकी ट्रांस वसा नीतियाँ सर्वोत्तम मानी जाती हैं। स्वस्थ आहार, नियमित गतिविधि, और तंबाकू तथा शराब के हानिकारक सेवन से दूरी, गैर-संचारी रोग से मृत्यु का खतरा घटाते हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2022, सामान्य अध्ययन-III (हिंदी रूपांतर)देश में आयु संभाविता में वृद्धि से समुदाय में स्वास्थ्य की नई चुनौतियाँ सामने आई हैं। वे चुनौतियाँ कौन-सी हैं और उनसे निपटने के लिए कौन-से कदम उठाए जाने चाहिए?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: चुनौतियाँ पहचानिए; कदम सुझाइए · दृष्टिकोण: प्रश्न दो भागों में है और दोनों का संबंध एक ही तथ्य से है: लोग अधिक जी रहे हैं, इसलिए चिरकालिक रोग बढ़ रहे हैं। पहले यह संबंध स्थापित करें, फिर चुनौतियाँ गिनाएँ, और अंत में बताएँ कि भारत क्या कर रहा है और आगे क्या करना चाहिए।

    भूमिका: भारत में आज 55 प्रतिशत से अधिक मौतें गैर-संचारी रोगों से होती हैं; जैसे-जैसे आयु संभाविता बढ़ती है, यही स्वास्थ्य का मुख्य बोझ बनते जाते हैं।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • चुनौतियाँ: हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और COPD; वृद्धावस्था में एक साथ कई रोग।
    • मनोभ्रंश, अवसाद और अन्य मानसिक विकार, जबकि उपचार तक पहुँच कम है।
    • जोखिम कारक: तंबाकू, शराब, अस्वास्थ्यकर आहार, निष्क्रियता, वायु प्रदूषण।
    • कदम: 30 वर्ष से अधिक आयु के हर व्यक्ति की NP-NCD जाँच, 75/25 पहल, कैंसर जाँच।
    • तंबाकू नियंत्रण (COTPA, राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम), ट्रांस वसा की सीमा, मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और टेली-मानस।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष यह रखें कि लंबे और स्वस्थ जीवन का रास्ता रोकथाम, समय पर जाँच और समुदाय के निकट देखभाल से होकर जाता है।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)खाद्य उत्पादों का विपणन करने वाली एक कंपनी विज्ञापन देती है कि उसके उत्पादों में ट्रांस वसा नहीं है। ग्राहकों के लिए इस अभियान का क्या अर्थ है?
    1. खाद्य उत्पाद हाइड्रोजनीकृत तेलों से नहीं बने हैं।
    2. खाद्य उत्पाद पशु वसा/तेलों से नहीं बने हैं।
    3. प्रयुक्त तेलों से उपभोक्ताओं के हृदय-वाहिका स्वास्थ्य को क्षति पहुँचने की संभावना नहीं है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2 और 3
    3. c केवल 1 और 3
    4. d 1, 2 और 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन प्रश्न (आहार और हृदय स्वास्थ्य)

    हल करने की विधि: हर कथन को इस आधार पर परखें कि ट्रांस वसा बनती कैसे है और करती क्या है। औद्योगिक ट्रांस वसा तरल वनस्पति तेलों में हाइड्रोजन मिलाकर बनती है, इसलिए ट्रांस वसा-मुक्त उत्पाद हाइड्रोजनीकृत तेलों से नहीं बना है: कथन 1 सही है। प्राकृतिक ट्रांस वसा गाय, भेड़ और बकरी के मांस तथा दुग्ध उत्पादों में भी होती है, किन्तु दावा सभी पशु वसाओं के बारे में कुछ नहीं कहता, इसलिए कथन 2 इससे नहीं निकलता। ट्रांस वसा धमनियों को अवरुद्ध करती है, अतः इसके बिना बने उत्पाद हृदय को कम हानि पहुँचाते हैं: कथन 3 सही है।

    इस भ्रम से बचें: कथन 2 गलत है, क्योंकि ट्रांस वसा-मुक्त होने का अर्थ पशु वसा-मुक्त होना नहीं है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: गलत। इसमें कथन 3 छूट जाता है, जबकि ट्रांस वसा हटाने से धमनियों को अवरुद्ध करने वाली वसा हटती है।
    • (b) केवल 2 और 3: गलत। कथन 2 सही नहीं है, क्योंकि ट्रांस वसा-मुक्त उत्पाद में भी पशु वसा हो सकती है।
    • (c) केवल 1 और 3: सही। हाइड्रोजनीकृत तेल नहीं हैं, और हृदय के लिए खतरा कम है।
    • (d) 1, 2 और 3: गलत। इसमें कथन 2 भी शामिल है।

    उत्तर: दावे से कथन 1 एवं कथन 3 निकलते हैं, अतः उत्तर विकल्प (c) है।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)आहार में ताज़े फलों और सब्ज़ियों का नियमित सेवन इसलिए सुझाया जाता है, क्योंकि ये प्रतिऑक्सीकारकों के अच्छे स्रोत हैं। प्रतिऑक्सीकारक किसी व्यक्ति को स्वस्थ रहने और दीर्घायु होने में कैसे सहायता करते हैं?
    1. a ये शरीर में विटामिन संश्लेषण के लिए आवश्यक एंज़ाइमों को सक्रिय करते हैं और विटामिन की कमी रोकने में सहायता करते हैं
    2. b ये शरीर में कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के अत्यधिक ऑक्सीकरण को रोकते हैं और ऊर्जा की अनावश्यक बर्बादी से बचाते हैं
    3. c ये उपापचय के दौरान शरीर में बनने वाले मुक्त मूलकों को निष्प्रभावी करते हैं
    4. d ये शरीर की कोशिकाओं में कुछ जीनों को सक्रिय करते हैं और बुढ़ापे की प्रक्रिया को टालने में सहायता करते हैं
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर वाला प्रश्न (पोषण)

    हल करने की विधि: पहले याद करें कि प्रतिऑक्सीकारक करता क्या है: यह ऑक्सीकरण को रोकता है, जो हानिकारक मुक्त मूलक बना सकता है। फिर वह विकल्प चुनें जो ठीक यही बताता है, और उन विकल्पों को हटा दें जो प्रतिऑक्सीकारक को कोई दूसरा काम सौंपते हैं।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (b) वैज्ञानिक लगता है, किन्तु प्रतिऑक्सीकारक कोशिकाओं की रक्षा करते हैं, ऊर्जा की बचत नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) विटामिन संश्लेषण के एंज़ाइम सक्रिय करना: गलत। यह प्रतिऑक्सीकारकों का काम नहीं है; वे ऑक्सीकरण के विरुद्ध काम करते हैं।
    • (b) ऊर्जा की बर्बादी रोकने के लिए ऑक्सीकरण रोकना: गलत। इसमें ऑक्सीकरण शब्द तो है, किन्तु रक्षा की भूमिका को ऊर्जा बचाने की भूमिका बना दिया गया है।
    • (c) उपापचय में बने मुक्त मूलकों को निष्प्रभावी करना: सही। प्रतिऑक्सीकारक उस ऑक्सीकरण को रोकते हैं, जिससे हानिकारक मुक्त मूलक बनते हैं।
    • (d) जीन सक्रिय करके बुढ़ापा टालना: गलत। जीन सक्रिय करने की ऐसी कोई भूमिका प्रतिऑक्सीकारक की परिभाषा में नहीं है।

    उत्तर: प्रतिऑक्सीकारक मुक्त मूलकों के विरुद्ध काम करते हैं, अतः उत्तर विकल्प (c) है।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)'मैटास्टेसिस' वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा
    1. a दवाओं के प्रभाव में कोशिकाएँ तेज़ी से विभाजित होती हैं
    2. b कैंसर कोशिकाएँ रक्त या लसीका तंत्र के माध्यम से दूसरे स्थानों या अंगों तक फैलती हैं
    3. c कोशिका केंद्रकों के गुणसूत्र पश्चावस्था (anaphase) के ध्रुवों की ओर जाने से पहले तर्कु से जुड़ते हैं
    4. d कैंसर कोशिकाओं का आगे विभाजन सफलतापूर्वक रोक दिया जाता है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर वाला प्रश्न (परिभाषा)

    हल करने की विधि: दुर्दम अर्बुदों का सबसे डरावना गुण याद करें: अर्बुद से टूटी कोशिकाएँ रक्त या लसीका से यात्रा करती हैं, कहीं और ठहरती हैं और नए अर्बुद बनाती हैं। इसी वर्णन को विकल्पों से मिलाएँ।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (c) समसूत्री विभाजन का वर्णन है; यह भ्रामक विकल्प उनके लिए है जो कैंसर को केवल कोशिका विभाजन से जोड़ते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) दवाओं के प्रभाव में कोशिकाओं का तेज़ विभाजन: गलत। मैटास्टेसिस नए स्थानों तक फैलाव है, दवा से होने वाला विभाजन नहीं।
    • (b) कैंसर कोशिकाओं का रक्त या लसीका तंत्र से दूसरे स्थानों या अंगों तक फैलना: सही। यही मैटास्टेसिस है।
    • (c) गुणसूत्रों का ध्रुवों की ओर जाने से पहले तर्कु से जुड़ना: गलत। यह सामान्य कोशिका विभाजन, समसूत्री विभाजन, के एक चरण का वर्णन है।
    • (d) कैंसर कोशिकाओं का आगे विभाजन सफलतापूर्वक रुक जाना: गलत। दुर्दम कोशिकाएँ इसके ठीक उलट करती हैं।

    उत्तर: रक्त या लसीका से फैलाव मैटास्टेसिस है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।

  5. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2010 (हिंदी रूपांतर)कैंसरग्रस्त अर्बुदों के उपचार के संदर्भ में, साइबरनाइफ़ नामक एक उपकरण चर्चा में रहा है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?
    1. a यह एक रोबोटिक इमेज-निर्देशित प्रणाली है
    2. b यह विकिरण की अत्यंत सटीक मात्रा प्रदान करता है
    3. c इसमें उप-मिलीमीटर सटीकता प्राप्त करने की क्षमता है
    4. d यह शरीर में अर्बुद के फैलाव का मानचित्र बना सकता है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: गलत कथन पहचानने वाला प्रश्न

    हल करने की विधि: पहले याद करें कि साइबरनाइफ़ है क्या: विकिरण चिकित्सा का उपकरण, जिसमें छोटा रैखिक त्वरक रोबोटिक भुजा पर लगा है और इमेज-निर्देशन प्रणाली अर्बुद पर नज़र रखकर किरण को उस पर केंद्रित करती है। यह उपचार का उपकरण है। कैंसर कहाँ तक फैला है, यह जानना निदान का काम है, जो इमेजिंग करती है। अतः जो कथन इस उपकरण को यह काम सौंपता है, वही गलत है।

    इस भ्रम से बचें: इमेज-निर्देशन सुनकर लगता है कि यह निदान के लिए चित्र बनाता है; साइबरनाइफ़ में चित्र केवल उपचार के दौरान किरण की दिशा तय करते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) रोबोटिक इमेज-निर्देशित प्रणाली: सही कथन। त्वरक रोबोटिक भुजा पर लगा है, जिसे एकीकृत इमेज-निर्देशन प्रणाली चलाती है।
    • (b) विकिरण की अत्यंत सटीक मात्रा देना: सही कथन। निर्देशन प्रणाली हिलते हुए अर्बुद पर भी किरण को ठीक से केंद्रित करती है।
    • (c) उप-मिलीमीटर सटीकता: सही कथन। UPSC की उत्तर-कुंजी इसे सही मानती है; अर्बुद पर नज़र रखकर किरण को उसी पर मोड़ने का पूरा डिज़ाइन सटीकता के लिए ही बना है।
    • (d) शरीर में अर्बुद के फैलाव का मानचित्रण: सही नहीं, अतः यही उत्तर है। साइबरनाइफ़ विकिरण देता है; कैंसर के फैलाव का पता CT और MRI जैसी इमेजिंग से चलता है।

    उत्तर: साइबरनाइफ़ अर्बुद का उपचार करता है, उसके फैलाव का मानचित्र नहीं बनाता, अतः उत्तर विकल्प (d) है।

  6. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)क्रमादेशित कोशिका मृत्यु के कोशिकीय और आण्विक नियंत्रण को क्या कहा जाता है?
    1. a एपोप्टोसिस
    2. b बुढ़ापा (एजिंग)
    3. c अपह्रास (डीजनरेशन)
    4. d नेक्रोसिस
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर वाला प्रश्न (शब्द की पहचान)

    हल करने की विधि: 'क्रमादेशित कोशिका मृत्यु' का नाम पहचानें, फिर कोशिकाओं के नष्ट होने के बाकी रूपों को हटा दें।

    इस भ्रम से बचें: नेक्रोसिस भी कोशिका मृत्यु है, किन्तु चोट से होने वाली अनियंत्रित मृत्यु।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) एपोप्टोसिस: सही। यही कोशिकाओं की क्रमादेशित, नियंत्रित मृत्यु है।
    • (b) बुढ़ापा: गलत। यह बूढ़े होने की प्रक्रिया है, कोशिका मृत्यु की कोई नामित क्रियाविधि नहीं।
    • (c) अपह्रास: गलत। यह ऊतक का सामान्य क्षय है, प्रश्न में बताई गई नियंत्रित कोशिका मृत्यु नहीं।
    • (d) नेक्रोसिस: गलत। यह तीव्र चोट से होने वाली कोशिका मृत्यु है, एपोप्टोसिस के उलट अनियंत्रित।

    उत्तर: क्रमादेशित कोशिका मृत्यु एपोप्टोसिस है, अतः उत्तर विकल्प (a) है।

  7. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)"यह एक कोशिका के रूप में शुरू होता है और एक निर्मम रोग बन जाता है, जो हर वर्ष लाखों लोगों की जान लेता है। किन्तु वैज्ञानिक धीरे-धीरे इसके रहस्य खोल रहे हैं, और इसके विरुद्ध लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई हो सकती है। नई खोजें बेहतर उपचार और … के विरुद्ध युद्ध में आशा का वादा करती हैं।" उपर्युक्त उद्धरण में किस रोग की बात की गई है?
    1. a कैंसर
    2. b एड्स
    3. c क्षय रोग
    4. d अल्ज़ाइमर रोग
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: अनुच्छेद पर आधारित एक सही उत्तर वाला प्रश्न

    हल करने की विधि: अनुच्छेद ऐसे रोग का वर्णन करता है जो एक कोशिका से शुरू होकर बढ़ता है। कैंसर तब शुरू होता है जब एक कोशिका का वृद्धि-नियंत्रण टूट जाता है और वह विभाजित होकर अर्बुद बनाती रहती है; बाकी विकल्प किसी और तरह शुरू होते हैं।

    इस भ्रम से बचें: एड्स और क्षय रोग भी लाखों की जान लेते हैं, किन्तु ये बाहर से शरीर में आए विषाणु या जीवाणु से शुरू होते हैं, शरीर की किसी एक कोशिका से नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) कैंसर: सही। यह एक कोशिका के अनियंत्रित विभाजन से शुरू होता है, और 2024 में इससे लगभग 1 करोड़ मौतें हुईं।
    • (b) एड्स: गलत। यह बाहर से आए विषाणु, HIV, के संक्रमण से शुरू होता है।
    • (c) क्षय रोग: गलत। यह जीवाणु माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के संक्रमण से शुरू होता है।
    • (d) अल्ज़ाइमर रोग: गलत। यह तंत्रिका-अपक्षयी रोग है, मनोभ्रंश का सबसे आम कारण, कोशिकाओं की वृद्धि नहीं।

    उत्तर: जो रोग एक कोशिका से शुरू होकर बढ़ता है, वह कैंसर है, अतः उत्तर विकल्प (a) है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख UPSC की तैयारी के लिए है और गैर-संचारी रोगों तथा उनके नियंत्रण को समझाता है। यह चिकित्सीय सलाह नहीं है; किसी भी लक्षण के लिए डॉक्टर से मिलें।