परिचय

विलवणीकरण समुद्री जल से घुले लवण निकालकर मीठा जल बनाने की प्रक्रिया है, जो झिल्ली से प्रतिलोम परासरण द्वारा या आसवन द्वारा होती है; विश्व में प्रतिदिन लगभग 9.5 करोड़ घन मीटर ऐसा जल बनता है। भारत में चेन्नई बड़े प्रतिलोम परासरण संयंत्रों पर और लक्षद्वीप निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण पर निर्भर है। समुद्र का लवण भारत के नमक का 80 प्रतिशत भी देता है, विलवणीकरण संयंत्रों से ब्राइन बनकर लौटता है, और समुद्री जल घुसपैठ के रूप में तटीय जलभृतों में प्रवेश करता है।

विलवणीकरण: अर्थ, विधियाँ और इसकी आवश्यकता

विलवणीकरण क्या है: समुद्री जल से मीठा जल

विलवणीकरण (desalination) वह कृत्रिम प्रक्रिया है जिसमें खारे जल, प्रायः समुद्री जल, को मीठे जल में बदला जाता है; इसमें हमेशा एक गाढ़ा लवणीय घोल भी बचता है, जिसे ब्राइन (brine) कहते हैं। इसकी आवश्यकता सीधे महासागर की लवणता से जुड़ी है। 1,000 ग्राम समुद्री जल में घुले लवण के ग्राम ही उसकी लवणता है, और इसका औसत लगभग 35 प्रति हज़ार भाग है। इतना लवणीय जल न पिया जा सकता है, न सिंचाई में लगाया जा सकता है, इसलिए समुद्र के किनारे बसा नगर भी पानी की कमी झेल सकता है। सागरों की लवणता की तुलना सबसे अधिक लवणता वाला सागर लेख में है।

विलवणीकरण का महत्त्व इस बात में है कि पुनर्चक्रित अपशिष्ट जल के साथ यह उन गिने-चुने जल-स्रोतों में है जो वर्षा पर निर्भर नहीं करते। इसीलिए जिन नगरों का मानसून विफल हो जाता है या जिनके पास अपनी कोई नदी नहीं, वे इसकी ओर मुड़ते हैं। इसका विस्तार भी तेज़ी से हुआ है: 2020 तक विश्व में 16,800 से अधिक संयंत्र चल रहे थे, जिनकी क्षमता लगभग 9.7 करोड़ घन मीटर प्रतिदिन थी, और अनुबंधित परियोजनाएँ इसे 11.4 करोड़ से ऊपर ले जाएँगी।

इसकी कीमत ऊर्जा है। जल से लवण अलग करने में काम लगता है, इसलिए विलवणीकृत समुद्री जल सामान्यतः नदियों, भौम जल, पुनर्चक्रण या जल-संरक्षण से मिलने वाले जल से महँगा पड़ता है। आवश्यक ऊर्जा बहुत घटी है: 1970 में प्रति घन मीटर 20 से 30 किलोवाट-घंटे, जबकि 2018 में लगभग 3, अर्थात् दस गुना सुधार। फिर भी 2016 में जल क्षेत्र की कुल ऊर्जा-खपत का लगभग एक-चौथाई हिस्सा विलवणीकरण में गया।

विलवणीकरण की प्रक्रिया: प्रतिलोम परासरण, बहु-चरणीय फ़्लैश और बहु-प्रभावी आसवन

हर विलवणीकरण दो में से एक तरीके से होता है: या तो झिल्ली जल को लवण से अलग करती है, या जल को वाष्प बनाकर फिर संघनित किया जाता है और लवण पीछे छूट जाता है। झिल्ली वाली विधि परासरण पर टिकी है। परासरण (osmosis) में जल अपने-आप एक अर्ध-पारगम्य झिल्ली से होकर कम लवण वाली ओर से अधिक लवण वाली ओर जाता है, ताकि दोनों ओर की सांद्रता बराबर होने लगे।

विलवणीकरण संयंत्र जल को उलटी दिशा में धकेलता है, और इसे प्रतिलोम परासरण (reverse osmosis) कहते हैं। लवणीय ओर पर परासरण दाब से अधिक दाब डाला जाता है, जिससे जल के अणु झिल्ली से होकर निकल जाते हैं, जबकि लवण दाब वाली ओर ही रुका रहता है। शुद्ध जल दूसरी ओर इकट्ठा होता है। इसमें जल को गर्म नहीं करना पड़ता, इसलिए आसवन की तुलना में कहीं कम ऊर्जा लगती है, और लगभग सभी नए संयंत्र इसी विधि पर बनते हैं। 2013 में इस प्रकार का सबसे बड़ा संयंत्र इज़राइल के सोरेक में था, जो प्रतिदिन 6.24 लाख घन मीटर जल बनाता था।

दो भाग। बाईं ओर प्रतिलोम परासरण: अर्ध-पारगम्य झिल्ली के एक ओर समुद्री जल पर उच्च दाब डाला जाता है; जल झिल्ली से होकर मीठे जल की ओर चला जाता है, जबकि लवण रुका रहता है; गर्म करने की आवश्यकता नहीं, इसलिए सबसे कम ऊर्जा लगती है। दाईं ओर तापीय आसवन: गर्म किया गया समुद्री जल वाष्प छोड़ता है, ठंडा संघनित्र वाष्प को मीठे जल में बदलता है और लवण-घोल पीछे बचता है; MSF, MED और LTTD इसी तरह काम करते हैं, और MSF विश्व के विलवणीकृत जल का लगभग 26 प्रतिशत बनाता है।
  • बहु-चरणीय फ़्लैश आसवन (MSF): गर्म समुद्री जल 30 तक कक्षों से गुज़रता है, जिनमें हर अगले कक्ष का दाब कम होता है, इसलिए हर कक्ष में उसका कुछ भाग अचानक भाप बन जाता है; यह भाप संघनित होकर मीठा जल बनती है। विश्व का लगभग 26 प्रतिशत विलवणीकृत जल MSF संयंत्र बनाते हैं।
  • बहु-प्रभावी आसवन (MED): समुद्री जल भाप से गर्म नलियों पर छिड़का जाता है; उससे निकली वाष्प अगले चरण को गर्म करती है, इसलिए हर चरण पिछले चरण की ऊर्जा का पुनः उपयोग करता है, क्रमशः कम तापमान और दाब पर।
  • निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (LTTD): निर्वात में गर्म समुद्री जल अपने ही तापमान पर वाष्पित हो जाता है और गहरे समुद्र का ठंडा जल उस वाष्प को संघनित करता है; जल गर्म करने के लिए ईंधन नहीं लगता।

निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण: कवरत्ती और लक्षद्वीप के संयंत्र

लक्षद्वीप में अपनाई गई विधि, निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (LTTD), एक सरल तथ्य पर चलती है: दाब कम हो तो जल कम तापमान पर ही उबल जाता है। निर्वात पंप एक कक्ष का दाब इतना घटा देते हैं कि समुद्र की सतह का गर्म जल अपने ही तापमान पर वाष्पित होने लगता है। 600 मीटर तक की गहराई से खींचा गया ठंडा समुद्री जल कुंडलियों से बहता है और इस वाष्प को संघनित कर देता है; यही संघनित जल मीठा जल है। सिद्धांत रूप में दोनों जलों के बीच केवल 8 °C का अंतर हो, तब भी जल वाष्पित हो जाता है, पर काम करने वाले संयंत्र को इससे अधिक अंतर चाहिए।

किसी द्वीप के तट पर LTTD संयंत्र का अनुप्रस्थ काट, पैमाने पर नहीं। समुद्र की सतह का गर्म जल पाइप से निर्वात कक्ष में लाया जाता है, जहाँ कम दाब पर वह वाष्पित होता है। 600 मीटर तक की गहराई से 7 से 15 °C का ठंडा जल कुंडलियों तक पहुँचता है और वाष्प को मीठे जल में संघनित करता है। इसके लिए लगभग 15 °C का तापमान-अंतर चाहिए, जो लक्षद्वीप के पास मिलता है। 2005 में खुला कवरत्ती संयंत्र प्रतिदिन 1 लाख लीटर जल बनाता है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान, राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT), ने 2004 से LTTD पर काम शुरू किया और 2005 में लक्षद्वीप के कवरत्ती में इसका पहला संयंत्र खोला। यह संयंत्र 7 से 15 °C के गहरे समुद्री जल की सहायता से प्रतिदिन 1 लाख लीटर पेयजल बनाता है, और इसकी पूँजीगत लागत लगभग ₹5 करोड़ थी। इसके बाद अगत्ती और मिनिकॉय में भी प्रतिदिन 1 लाख लीटर वाले संयंत्र बने। NIOT ने इस विचार को बड़े पैमाने और नए रूप में भी आज़माया:

  • 2007: चेन्नई के तट से दूर एक प्रायोगिक तैरता संयंत्र, जिसकी क्षमता प्रतिदिन 10 लाख लीटर थी।
  • 2009: उत्तर चेन्नई ताप विद्युत केंद्र में एक छोटा संयंत्र, जिसमें समुद्र की सतह के गर्म जल के स्थान पर बिजलीघर का गर्म शीतलन-जल प्रयोग हुआ।
  • अगला चरण: अमिनी, आंद्रोत, चेतलात, कदमत, कल्पेनी और किल्तान में प्रतिदिन 1.5 लाख लीटर वाले छह और संयंत्र, जिनका काम गृह मंत्रालय ने लक्षद्वीप प्रशासन के माध्यम से सौंपा; इनकी कुल लागत ₹187.75 करोड़ है।

LTTD के लिए लक्षद्वीप उपयुक्त क्यों है, इसका उत्तर भूगोल में है। इन संयंत्रों को तट के पास सतह और गहरे समुद्री जल के बीच लगभग 15 °C का अंतर चाहिए। 2022 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने बताया कि ऐसा अंतर फिलहाल केवल लक्षद्वीप के तटों के आसपास ही मिलता है। इसीलिए पेयजल देने वाले LTTD संयंत्र द्वीपों पर हैं, जबकि चेन्नई के बड़े संयंत्र प्रतिलोम परासरण अपनाते हैं।

भारत में विलवणीकरण संयंत्र और विलवणीकरण की सीमाएँ

भारत में विलवणीकरण संयंत्र: चेन्नई के मिंजूर, नेम्मेली और पेरूर

भारत में विलवणीकरण का सबसे स्पष्ट उदाहरण चेन्नई है। नगर के पास कोई बारहमासी नदी नहीं है; उसके जलाशय मुख्यतः उत्तर-पूर्वी मानसून से भरते हैं, और जब भी यह मानसून विफल होता है, नगर में पानी की कमी हो जाती है। सूखे से बचाव के उपाय के रूप में सरकार ने बंगाल की खाड़ी के तट पर विलवणीकरण संयंत्रों में निवेश किया; नए संयंत्र समुद्री जल प्रतिलोम परासरण (SWRO) पर आधारित हैं।

तालिका 1. चेन्नई के विलवणीकरण संयंत्र। MLD का अर्थ है मिलियन लीटर प्रतिदिन।
संयंत्र क्षमता स्थिति लाभान्वित क्षेत्र
मिंजूर, चेन्नई के उत्तर में 100 MLD 31 जुलाई 2010 को उद्घाटन; डिज़ाइन, निर्माण, स्वामित्व, संचालन और हस्तांतरण (DBOOT) आधार पर बना उत्तरी चेन्नई: मनाली, एन्नोर, तिरुवोट्टियूर आदि, लगभग 12 लाख लोग
नेम्मेली, ईस्ट कोस्ट रोड 110 MLD 2013 से चालू; ₹805.08 करोड़, पूरी सहायता केंद्र सरकार की दक्षिणी चेन्नई: शोलिंगनल्लूर, नीलांगरई आदि
नेम्मेली (दूसरा संयंत्र) 150 MLD नेम्मेली के उसी परिसर में; जर्मनी की KfW और अमृत (AMRUT) से वित्तपोषित विस्तारित नगर
पेरूर, नेम्मेली के पास 400 MLD प्रस्तावित; चारों में सबसे बड़ा तांबरम, पल्लावरम और दक्षिणी उपनगर, लगभग 22.67 लाख लोग

ये आँकड़े दिखाते हैं कि कोई नगर समुद्र पर कितना निर्भर हो सकता है: अकेला 400 MLD संयंत्र बीस लाख से अधिक लोगों को जल देने के लिए है। विलवणीकरण अब नगरों की जल-आपूर्ति से आगे भी बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, गुजरात की 2026 की डेटा सेंटर नीति इस क्षेत्र की अधिक जल-आवश्यकता पूरी करने के लिए कैप्टिव विलवणीकरण संयंत्रों को वित्तीय सहायता देती है।

विलवणीकरण की लागत और सीमाएँ: ऊर्जा, मूल्य और सुरक्षा

विलवणीकरण जल की समस्या तो हल करता है, पर बदले में ऊर्जा की समस्या खड़ी करता है। लगभग 3 किलोवाट-घंटे प्रति घन मीटर पर भी बड़े संयंत्र को लगातार बिजली चाहिए, और जहाँ यह बिजली कोयले या गैस से आती है, वहाँ मीठे जल का हर लीटर कार्बन उत्सर्जन बढ़ाता है। इसीलिए विलवणीकृत जल सामान्यतः नदियों या जलभृतों के जल से महँगा पड़ता है, और इसे वहीं चुना जाता है जहाँ ये सस्ते स्रोत न हों या ख़त्म हो चुके हों।

  • ऊर्जा और कार्बन: चलाने का सबसे बड़ा ख़र्च; संयंत्रों को अब सौर और पवन ऊर्जा से जोड़ा जा रहा है, और LTTD तो महासागर के अपने तापमान-अंतर से चलकर ईंधन से पूरी तरह बच जाता है।
  • जल का मूल्य: सतही जल, भौम जल, पुनर्चक्रण या जल-संरक्षण से महँगा, इसलिए यह पहला विकल्प नहीं, बल्कि पूरक और सूखे के समय का भंडार है।
  • ब्राइन: हर संयंत्र एक लवणीय अपशिष्ट धारा समुद्र में लौटाता है, जो अगले खंड का विषय है।
  • जोखिम का केंद्रीकरण: जो नगर या देश अपना अधिकांश पेयजल कुछ ही संयंत्रों से लेता है, वह उनकी सुरक्षा पर निर्भर हो जाता है।

ब्राइन का निस्सरण: विलवणीकरण की पर्यावरणीय कीमत

ब्राइन का निस्सरण और समुद्री जीवन पर इसका प्रभाव

हर विलवणीकरण संयंत्र समुद्री जल को दो धाराओं में बाँटता है: लोगों के लिए मीठा जल, और एक गाढ़ा ब्राइन, जिसमें निकाला गया सारा लवण होता है। विश्व भर के विलवणीकरण संयंत्र प्रतिदिन लगभग 14.2 करोड़ घन मीटर ब्राइन छोड़ते हैं, जो उनके बनाए मीठे जल से भी अधिक है; तटीय संयंत्रों से यह वापस समुद्र में छोड़ा जाता है।

नुकसान ब्राइन के तीन गुणों से होता है। पहला, यह समुद्र से अधिक लवणीय है, इसलिए अधिक घना है; यह मिलने के बजाय समुद्र तल पर बैठकर फैलता है और निकास के आसपास की लवणता को तली पर रहने वाले पौधों और जीवों की सहनसीमा से ऊपर ले जाता है। दूसरा, यह प्रायः समुद्र से अधिक गर्म होता है। तीसरा, इसमें झिल्लियों की सफ़ाई और परत जमने से रोकने वाले रसायनों के अवशेष होते हैं, साथ ही संक्षारण से निकली भारी धातुएँ, विशेषकर तापीय संयंत्रों में।

  • तनुकरण: समुद्र में छोड़ने से पहले ब्राइन को किसी अन्य बहिर्वाह, जैसे बिजलीघर के शीतलन-जल या शोधित अपशिष्ट जल, में मिलाने से उसकी लवणता घटती है।
  • फैलाव: निकास को फैलाकर और ऐसी जगह रखकर जहाँ धाराएँ उसे बहा ले जाएँ, ब्राइन को एक जगह जमा होने से रोका जाता है; कुछ संयंत्र तो जहाज़ों पर लगाए गए हैं, ताकि ब्राइन कभी एक स्थान पर इकट्ठा न हो।
  • पुनः उपयोग: ब्राइन एक संसाधन भी हो सकता है; उसकी ऊँची लवणता समुद्री जल से अधिक तीखी लवणता-प्रवणता देती है, और डेनमार्क की एक कंपनी उच्च-लवणता वाले ब्राइन पर चलने वाला व्यावसायिक परासरण ऊर्जा संयंत्र बना रही है।

समुद्री नमक और खनिज: भारत में नमक उत्पादन

भारत में नमक उत्पादन: गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु

साधारण नमक के उत्पादन में भारत चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद विश्व में तीसरे स्थान पर है; 2021-22 में यहाँ लगभग 266 लाख टन नमक बना। इसका अधिकांश भाग समुद्री नमक है: नमक मुख्यतः समुद्री जल के सौर वाष्पन से बनता है, और देश के उत्पादन में समुद्री नमक की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत है। शेष नमक अंतर्देशीय लवण-जल से आता है, जैसे कच्छ के छोटे रण का भूमिगत लवणीय जल और राजस्थान की लवण झीलें।

2021-22 में भारत के नमक उत्पादन में राज्यों की हिस्सेदारी का बार चार्ट: गुजरात 85 प्रतिशत, राजस्थान 6 प्रतिशत और तमिलनाडु 6 प्रतिशत। भारत ने लगभग 266 लाख टन नमक बनाया, जो चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद विश्व में तीसरा स्थान है, और इसमें समुद्री नमक लगभग 80 प्रतिशत था।

2021-22 में उत्पादन में गुजरात की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत थी; उसके बाद राजस्थान और तमिलनाडु लगभग 6-6 प्रतिशत के साथ आते हैं। नमक धूप से बनता है, इसलिए फ़सल मौसम पर निर्भर है, और गुजरात का शुष्क तट तथा रण के मैदान इसके अनुकूल हैं। 2021-22 में 97.12 प्रतिशत नमक निजी उत्पादकों ने बनाया। स्वतंत्रता के समय कमी आयात से पूरी होती थी, पर 1953 में भारत नमक में आत्मनिर्भर हो गया और अब इसका निर्यात करता है, मुख्यतः चीन, कोरिया गणराज्य, जापान और क़तर को।

  • संघ का विषय: नमक संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची की प्रविष्टि 58 है, इसलिए इसके निर्माण, आपूर्ति और वितरण पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है।
  • नियामक: जयपुर स्थित नमक आयुक्त संगठन, जो उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग का संबद्ध कार्यालय है, उत्पादन, गुणवत्ता, मूल्य और आपूर्ति की निगरानी करता है।
  • वार्षिक आवश्यकता: खाने के लिए, पशुओं सहित, लगभग 63 लाख टन और उद्योग के लिए 118 लाख टन; खाद्य और औद्योगिक मिलाकर प्रति व्यक्ति खपत लगभग 14 किलोग्राम प्रति वर्ष है।
  • सेंधा नमक: भारत में बहुत कम; इसके एकमात्र संसाधन, लगभग 1.278 करोड़ टन, हिमाचल प्रदेश के मंडी में हैं।

समुद्री जल में साधारण नमक के अलावा और भी बहुत कुछ है। सोडियम के बाद मैग्नीशियम इसमें दूसरा सबसे प्रचुर धनायन है, द्रव्यमान में सोडियम आयनों का लगभग आठवाँ भाग, इसलिए समुद्री जल और समुद्री नमक इस धातु के व्यावसायिक स्रोत हैं। चूना मिलाने पर मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड अवक्षेपित होता है, जिसे मैग्नीशियम क्लोराइड में और फिर विद्युत-अपघटन से धातु में बदला जाता है। समुद्री जल में ब्रोमीन लगभग 65 भाग प्रति दस लाख है, चट्टानों से कहीं अधिक, क्योंकि लंबे निक्षालन से महासागरों में यह जमा होता गया; इसके मुख्य उत्पादक इज़राइल और जॉर्डन हैं।

भारत में ये खनिज मुख्यतः नमक बनाने वाली इकाइयों से ही मिलते हैं: नमक उद्योग नमक बनाते समय उप-उत्पाद के रूप में जिप्सम, ब्रोमीन, मैग्नीशियम क्लोराइड, मैग्नीशियम सल्फ़ेट, अमोनियम बाइकार्बोनेट, सोडा ऐश, कास्टिक सोडा और सोडियम बाइकार्बोनेट प्राप्त करता है।

नमक कैसे बनता है: कच्छ के रण से ओंगोल तक सौर नमक-क्यारियाँ

नमक-क्यारी (salt pan) एक उथला, चौड़ा तालाब होता है, जिसमें समुद्री जल या लवणीय जल को धूप में वाष्पित होने के लिए छोड़ दिया जाता है, जब तक नमक क्रिस्टल बनकर जम न जाए और उसे इकट्ठा न किया जा सके। क्यारियों को नीची मेड़ें अलग करती हैं। जल का रंग उसकी लवणता के साथ बदलता है, क्योंकि हर चरण में अलग शैवाल और सूक्ष्मजीव पनपते हैं, हल्के हरे से लेकर गहरे लाल तक। ये क्यारियाँ जल-पक्षियों को भोजन और विश्राम की जगह देती हैं, यद्यपि इन्हें बनाने से मैंग्रोव और कीचड़-भरे तट नष्ट भी हो सकते हैं।

भारतीय तट पर नमक बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सौराष्ट्र तट पर हड़प्पाकालीन स्थल पाडरी को लगभग 2200 से 2000 ईसा पूर्व में समुद्री नमक बनाने का विशेष केंद्र माना जाता है। आज यह काम ऋतुओं के साथ चलता है। कच्छ के छोटे रण में मानसून ज़मीन को लवणीय जल से भर देता है; अक्टूबर में जल उतरने के बाद श्रमिक लवणीय जल को खेतों में पंप करते हैं और बाकी काम धूप करती है। छह से सात कठिन महीनों में भारत का अधिकांश अंतर्देशीय नमक यहीं बनता है।

भारत के तटीय जलभृतों में समुद्री जल घुसपैठ

समुद्री जल घुसपैठ: अर्थ और गाइबेन-हर्ज़बर्ग संबंध

कई तटों पर भौम जल धीरे-धीरे खारा हो रहा है, और इसका कारण समुद्री जल घुसपैठ (seawater intrusion) है, जिसे लवणता-प्रवेश (salinity ingress) भी कहते हैं। इसमें लवणीय जल तटीय जलभृतों के मीठे भौम जल में घुस आता है। ऐसा इसलिए होता है कि घुले लवणों के कारण समुद्री जल मीठे जल से अधिक घना है। तट पर समुद्र की ओर बहता मीठा भौम जल महासागर की ओर से आते लवणीय भौम जल से मिलता है, और घना लवणीय जल मीठे जल के नीचे कील के आकार में भीतर सरकता है; दोनों के बीच मिश्रण का एक क्षेत्र होता है।

सामान्यतः यह कील तट के पास ही रहती है, क्योंकि भीतर की ओर मीठा जल ऊँचा खड़ा रहता है और उसका भार लवणीय जल को रोके रखता है। गाइबेन-हर्ज़बर्ग संबंध (Ghyben-Herzberg relation) इस संतुलन को संख्या देता है। मीठे जल का घनत्व लगभग 1.000 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है और समुद्री जल का लगभग 1.025, इसलिए मीठा भौम जल समुद्र तल से जितने मीटर ऊपर खड़ा होता है, उसका लगभग चालीस गुना समुद्र तल के नीचे तक फैला रहता है।

तट का अनुप्रस्थ काट, पैमाने पर नहीं। बाईं ओर समुद्र है; भीतर की ओर मीठा भौम जल घने समुद्री जल की एक कील पर टिका है, जो भूमि के नीचे तक फैली है। जहाँ भौम जल-स्तर समुद्र तल से 1 मीटर ऊपर है, वहाँ मीठा जल समुद्र तल से लगभग 40 मीटर नीचे तक फैला है, क्योंकि मीठे जल का घनत्व 1.000 और समुद्री जल का 1.025 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है। नलकूप भौम जल-स्तर को नीचे करता है और अपने नीचे से लवणीय जल को ऊपर खींच लेता है।

भारत में समुद्री जल घुसपैठ के कारण: अति-दोहन, ज्वार और समुद्र-तल वृद्धि

भारत में समुद्री जल घुसपैठ के प्राकृतिक और मानवीय, दोनों कारण हैं, और मानवीय कारणों ने इसे फैलाया है। मुख्य कारण भौम जल का अति-दोहन है: जब तटीय कुएँ वर्षा की भरपाई से तेज़ जल खींचते हैं, तो मीठा जल-स्तर गिरता है, उसका दाब घटता है और घना समुद्री जल भीतर बढ़ता है। लवणीय कील के ऊपर स्थित कुआँ नीचे से भी लवणीय जल ऊपर खींच सकता है; इसे अपकोनिंग (upconing) कहते हैं।

  • अति-दोहन: सिंचाई, नगरों और उद्योगों के कुएँ जल-स्तर गिराते हैं; मुंबई के पास वसई-विरार क्षेत्र में देखे गए लवणता-प्रवेश का मुख्य कारण सिंचाई के लिए भौम जल का अत्यधिक उपयोग है।
  • मौसमी उलटी प्रवणता: गुजरात तट पर मानसून से पहले जल-स्तर गिर जाता है और तट के पास जल-स्तर का ढाल उलट जाता है, जिससे समुद्री जल भूमि की ओर बहता है; मानसून के बाद ढाल फिर पलटता है और मीठा भौम जल अरब सागर में बहने लगता है।
  • ज्वारीय प्रवेश: उच्च ज्वार निचली दलदली भूमि को डुबो देता है, और लवणीय जल रिसकर ऊपरी जलभृतों में पहुँचता है; खाड़ियाँ (creeks) इसे भीतर तक ले जाती हैं।
  • नहरें और जलमार्ग: नौवहन, जल-निकासी और कृषि के लिए बने जलमार्ग लवणीय जल को भीतर का रास्ता देते हैं, और जल-निकासी मीठा जल-स्तर नीचे करती है।
  • नमक-क्यारियाँ: क्यारियों और उन्हें भरने वाली नहरों का लवणीय जल आसपास के भौम जल में लवण मिलाता है।
  • समुद्र-तल वृद्धि और तूफ़ानी लहरें: ऊँचा समुद्र कील को और भीतर धकेलता है, और चक्रवात की लहरें तट को समुद्री जल से भर देती हैं।
प्रायद्वीपीय भारत का मानचित्र, क्रमांकित स्थानों के साथ। समुद्री जल घुसपैठ, लाल रंग में: गुजरात के सौराष्ट्र तट पर 1 मंगरोल और चोरवाड़ तथा 2 पोरबंदर; महाराष्ट्र में 3 वसई-विरार; कर्नाटक में 4 उल्लाल और 5 बैंदूर; तमिलनाडु में 6 मिंजूर, 7 कडलूर, 8 नागपट्टिनम, 9 रामनाथपुरम और 10 थूथुकुडी। विलवणीकरण, नीले रंग में: 11 चेन्नई के संयंत्र; लक्षद्वीप में 12 कवरत्ती, 13 अगत्ती और 14 मिनिकॉय। नमक उत्पादन, गेरुए रंग में: 15 कच्छ का छोटा रण, 16 दांडी और 17 ओंगोल। प्राकृतिक रूप से लवणीय भौम जल: 18 सुंदरबन।

यह समस्या गुजरात और तमिलनाडु में सबसे स्पष्ट है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड ने सौराष्ट्र तट की मंगरोल, चोरवाड़ और पोरबंदर पट्टी में लवणता-प्रवेश पाया है। तमिलनाडु में प्रभावित क्षेत्रों में चेन्नई के उत्तर में मिंजूर, तिरुवनमियूर से कोवलम तक का क्षेत्र, कडलूर तट, और रामनाथपुरम, नागपट्टिनम, तंजावुर, तिरुवरूर तथा थूथुकुडी ज़िले शामिल हैं। मिंजूर में मीठे और लवणीय जल की सीमा 1972 में तट से लगभग 3.5 किमी भीतर थी; 2022 तक यह लगभग 15 किमी भीतर पहुँच गई। अन्य जगहों पर समस्या स्थानीय है: महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्से, कर्नाटक तट पर उल्लाल और बैंदूर, केरल में मौसमी ज्वारीय प्रवेश, और तटीय ओडिशा तथा सुंदरबन में प्राकृतिक रूप से लवणीय भौम जल।

समुद्री जल घुसपैठ के उपचारात्मक उपाय: पुनर्भरण, अवरोध और विनियमन

कारण गिरता हुआ मीठा जल-स्तर है, इसलिए उपायों का लक्ष्य उसे फिर ऊपर उठाना, लवणीय जल के रास्ते बंद करना और दोहन को नियंत्रित करना है। भारत में जल राज्य का विषय है, इसलिए यह काम अधिकतर राज्य करते हैं, जबकि केंद्र केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के माध्यम से संरक्षण, वर्षा जल संचयन और निगरानी में सहायता देता है; राष्ट्रीय जल नीति, 2012 लवणता से निपटने के लिए हस्तक्षेप की बात करती है।

  • कृत्रिम पुनर्भरण: वर्षा जल संचयन और अन्य पुनर्भरण कार्य जलभृत में जल लौटाते हैं और उस मीठे जल-स्तर को ऊपर उठाते हैं जो लवणीय जल को रोके रखता है।
  • दोहन का विनियमन: गुजरात ने अति-दोहन रोकने के लिए अपने तट के कुछ भागों को डार्क ज़ोन घोषित किया है और भौम जल की माँग घटाने के लिए सूक्ष्म-सिंचाई को बढ़ावा दिया है।
  • समुद्र के विरुद्ध अवरोध: केरल ने अपनी पश्चजल (backwaters) प्रणाली से समुद्री जल बाहर रखने के लिए प्रमुख मुहानों पर ज्वारीय नियामक लगाए हैं; कर्नाटक तटीय नदियों पर वेंटेड बाँध और लवणीय जल अवरोधी बाँध बना रहा है और अपनी खारलैंड भूमि का पुनरुद्धार कर रहा है।
  • पूरे तट की योजना: सौराष्ट्र और कच्छ में लवणता-प्रवेश पर गुजरात की उच्च स्तरीय समितियों ने इसे रोकने और लवणीय सीमा को समुद्र की ओर वापस धकेलने के लिए कार्यों की योजना और लागत तय की।
  • वैकल्पिक आपूर्ति: चेन्नई की तरह विलवणीकृत जल तटीय जलभृतों पर दबाव घटाता है।

लवणता प्रवणता ऊर्जा: जहाँ नदी समुद्र से मिलती है, वहाँ परासरण ऊर्जा

परासरण ऊर्जा: दाब-मंदित परासरण और प्रतिलोम विद्युत-अपोहन

जहाँ नदी समुद्र में गिरती है, वहाँ मीठा और लवणीय जल मिलता है, और उनके लवण की मात्रा के अंतर में ऐसी ऊर्जा छिपी है जो सामान्यतः व्यर्थ चली जाती है। परासरण ऊर्जा (osmotic power), जिसे लवणता प्रवणता ऊर्जा या ब्लू एनर्जी भी कहते हैं, इसी ऊर्जा को पकड़ने का प्रयास है। यह विचार 1954 का है; दाब-मंदित परासरण की विधि इज़राइल में सिडनी लोएब ने 1973 में खोजी, और इसकी प्रेरणा उन्हें आंशिक रूप से जॉर्डन नदी को मृत सागर में गिरते देखकर मिली।

  • दाब-मंदित परासरण (PRO): मीठा जल परासरण द्वारा झिल्ली से होकर दाबयुक्त समुद्री जल वाले कक्ष में जाता है; बढ़ता आयतन और दाब टरबाइन घुमाते हैं।
  • प्रतिलोम विद्युत-अपोहन (RED): नदी और समुद्री जल के बीच बारी-बारी से लगी ऋणायन और धनायन विनिमय झिल्लियाँ सीधे बिजली पैदा करती हैं, मानो एक लवण-बैटरी हो।

यह तकनीक प्रयोगशालाओं में तो सफल रही, पर अभी लाभ में नहीं चल सकी। नॉर्वे की स्टैटक्राफ़्ट ने 24 नवंबर 2009 को ओस्लो फ़्योर्ड पर विश्व का पहला प्रायोगिक परासरण ऊर्जा संयंत्र खोला। उसने केवल लगभग 4 किलोवाट बिजली दी, और जनवरी 2014 में स्टैटक्राफ़्ट ने इसे आगे न चलाने की घोषणा की, क्योंकि मौजूदा झिल्लियों के साथ नदी और समुद्र के बीच की लवणता-प्रवणता आर्थिक रूप से पर्याप्त नहीं थी। विलवणीकरण और भूतापीय ब्राइन में यह प्रवणता अधिक तीखी होती है, इसलिए परासरण ऊर्जा का भविष्य नदियों के मुहानों से अधिक विलवणीकरण संयंत्रों के पास हो सकता है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IIIभारत में तटीय जलभृत में समुद्री जल घुसपैठ एक मुख्य चिंता का विषय है। समुद्री जल घुसपैठ के क्या कारण हैं तथा ऐसी आपदा का सामना करने के उपचारात्मक उपाय क्या हैं?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: कारण बताइए और उपचारात्मक उपाय सुझाइए · दृष्टिकोण: पहले घनत्व के आधार पर समुद्री जल घुसपैठ को परिभाषित करें, फिर भारतीय उदाहरणों के साथ कारण लिखें, और अंत में उपचारात्मक उपायों को पुनर्भरण, विनियमन, अवरोध और वैकल्पिक आपूर्ति के शीर्षकों में रखें।

    भूमिका: समुद्री जल घुसपैठ को तटीय जलभृतों के मीठे भौम जल में घने समुद्री जल के प्रवेश के रूप में परिभाषित करें, जिसे मीठा जल-स्तर रोके रखता है (गाइबेन-हर्ज़बर्ग: समुद्र तल से 1 मीटर ऊपर का मीठा जल नीचे लगभग 40 मीटर मीठा जल थामे रखता है)।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • मानवीय कारण: सिंचाई, नगरों और उद्योगों के लिए अति-दोहन (वसई-विरार); कुओं के नीचे अपकोनिंग; नहरें और जल-निकासी मार्ग; नमक-क्यारियाँ।
    • प्राकृतिक और जलवायु-संबंधी कारण: निचली भूमि में ज्वारीय प्रवेश; गुजरात तट पर मानसून से पहले की उलटी प्रवणता; समुद्र-तल वृद्धि और तूफ़ानी लहरें।
    • विस्तार: सौराष्ट्र तट पर मंगरोल, चोरवाड़ और पोरबंदर; मिंजूर, जहाँ सीमा 1972 के लगभग 3.5 किमी से बढ़कर लगभग 15 किमी भीतर पहुँच गई; कडलूर, नागपट्टिनम, रामनाथपुरम, थूथुकुडी।
    • उपाय: वर्षा जल संचयन और कृत्रिम पुनर्भरण; दोहन का विनियमन (गुजरात में डार्क ज़ोन) और सूक्ष्म-सिंचाई; ज्वारीय नियामक (केरल), वेंटेड बाँध और लवणीय जल अवरोधी बाँध (कर्नाटक); गुजरात की उच्च स्तरीय समितियाँ; जलभृतों का दबाव घटाने के लिए विलवणीकृत जल (चेन्नई)।
    • शासन: जल राज्य का विषय; केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की निगरानी; राष्ट्रीय जल नीति, 2012 लवणता से निपटने के लिए हस्तक्षेप की बात करती है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि मीठा जल-स्तर लौटे बिना घुसपैठ नहीं पलटती, इसलिए हर तट पर पुनर्भरण और विनियमन साथ-साथ चलने चाहिए।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2008 (हिंदी रूपांतर)प्रतिदिन एक लाख लीटर मीठा जल बनाने वाला, निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण के सिद्धांत पर आधारित भारत का पहला विलवणीकरण संयंत्र कहाँ चालू किया गया?
    1. a कवरत्ती
    2. b पोर्ट ब्लेयर
    3. c मंगलौर
    4. d वलसाड
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: चरण 1: LTTD के लिए तट के पास सतह और गहरे समुद्री जल के बीच लगभग 15 °C का अंतर चाहिए। चरण 2: भारत में ऐसा अंतर लक्षद्वीप के तटों के पास मिलता है। चरण 3: प्रतिदिन 1 लाख लीटर वाला NIOT का पहला LTTD संयंत्र 2005 में कवरत्ती में खुला।

    इस भ्रम से बचें: पोर्ट ब्लेयर भी एक द्वीपीय राजधानी है, पर भारत के सभी LTTD संयंत्र लक्षद्वीप में हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) कवरत्ती: सही। NIOT का पहला LTTD संयंत्र 2005 में यहीं खुला, जो प्रतिदिन 1 लाख लीटर जल बनाता है।
    • (b) पोर्ट ब्लेयर: गलत। यह अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में है, जहाँ LTTD संयंत्र नहीं बने।
    • (c) मंगलौर: गलत। यह मुख्य भूमि का बंदरगाह है; LTTD संयंत्र लक्षद्वीप के द्वीपों पर हैं।
    • (d) वलसाड: गलत। यह गुजरात तट पर है; भारत के LTTD संयंत्र लक्षद्वीप में हैं।

    उत्तर: कवरत्ती: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि भारत का पहला LTTD संयंत्र यहीं बना।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2005 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. परासरण की प्रक्रिया के दौरान विलायक सांद्र विलयन से तनु विलयन की ओर जाता है।
    2. प्रतिलोम परासरण में बाहरी दाब तनु विलयन पर लगाया जाता है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2
    3. c 1 और 2 दोनों
    4. d न तो 1, न ही 2
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: परासरण में विलायक तनु विलयन से सांद्र विलयन की ओर जाता है, इसलिए इसका उलटा कहने वाला कथन 1 गलत है। चरण 2: प्रतिलोम परासरण में बाहरी दाब सांद्र विलयन पर डाला जाता है, ताकि उसमें से जल बाहर निकले; इसलिए तनु विलयन कहने वाला कथन 2 भी गलत है। चरण 3: कोई भी कथन सही नहीं है।

    इस भ्रम से बचें: दोनों कथन विश्वसनीय लगते हैं, क्योंकि हर एक में केवल 'तनु' और 'सांद्र' की अदला-बदली की गई है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: गलत। परासरण में जल तनु ओर से सांद्र ओर जाता है।
    • (b) केवल 2: गलत। प्रतिलोम परासरण में दाब सांद्र, अर्थात् लवणीय, ओर पर डाला जाता है।
    • (c) 1 और 2 दोनों: गलत। दोनों कथन वास्तविक दिशा को उलट देते हैं।
    • (d) न तो 1, न ही 2: सही। हर कथन तनु और सांद्र विलयन की अदला-बदली करता है।

    उत्तर: न तो 1, न ही 2: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि दोनों कथन परासरण की दिशा और डाले गए दाब की दिशा उलट देते हैं।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख आधिकारिक रिपोर्टों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।