परिचय
दक्कन सल्तनत स्थापत्य बहमनी सल्तनत (1347 से) और उसके बाद दक्कन के पठार पर 1686 और 1687 की मुगल विजय तक रहीं पाँच सल्तनतों का इंडो-इस्लामिक भवन-निर्माण है। इसकी प्रमुख कृतियाँ बीदर के बहमनी मकबरे और मदरसा, बीजापुर का गोल गुंबद और इब्राहिम रौज़ा, और कुतुबशाहियों का गोलकुंडा किला और चारमीनार हैं।
दक्कन सल्तनतों का स्थापत्य: अर्थ, राजवंश और केंद्र
दक्कन सल्तनत स्थापत्य क्या है: इंडो-इस्लामिक भवन-निर्माण की दक्कनी शैली
चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक दक्कन के पठार के मुस्लिम राज्यों ने, पहले बहमनी सल्तनत और फिर उसके बाद की पाँच सल्तनतों ने, जो भवन बनवाए, उनकी शैली को दक्कन सल्तनत स्थापत्य कहते हैं। यह इंडो-इस्लामिक स्थापत्य का एक क्षेत्रीय रूप है, जिस पर दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल भवन-निर्माण का प्रभाव पड़ा, जिसमें फ़ारसी और मध्य एशियाई तत्त्व हैं, और जो इसी क्षेत्र के हिंदू मंदिर स्थापत्य से बहुत भिन्न है।
बहमनी सल्तनत 1347 में गुलबर्गा राजधानी के साथ स्थापित हुई; बाद में राजधानी बीदर गई। उसके बिखरने पर पाँच उत्तराधिकारी राज्य बने: अहमदनगर, बीजापुर और बरार ने 1490 में, बीदर ने लगभग 1492 में और गोलकुंडा ने 1518 तक स्वतंत्रता घोषित की। सबने स्वयं को बहमनियों का उत्तराधिकारी बताया। अहमदनगर ने 1574 में बरार जीता और बीजापुर ने 1619 में बीदर मिला लिया; मुगलों ने 1636 तक अहमदनगर लिया और 1686 तथा 1687 के औरंगज़ेब के अभियान में बीजापुर और गोलकुंडा के साथ यह क्रम पूरा हुआ।
| राजवंश | राजधानी | प्रसिद्ध इमारतें |
|---|---|---|
| बहमनी (1347 से) | गुलबर्गा, फिर बीदर | गुलबर्गा का किला और जामा मस्जिद; बीदर का किला; बहमनी मकबरे; महमूद गवाँ का मदरसा; चाँद मीनार |
| आदिलशाही | बीजापुर | गोल गुंबद; इब्राहिम रौज़ा; जामा मस्जिद; गगन महल |
| कुतुबशाही | गोलकुंडा, फिर हैदराबाद | गोलकुंडा का किला; चारमीनार; मक्का मस्जिद; कुतुबशाही मकबरे |
| निज़ामशाही | अहमदनगर | फ़राह बाग जैसे महल (1583) |
| बरीदशाही और इमादशाही | बीदर; बरार में अचलपुर | बीदर के बरीदशाही मकबरे; गाविलगढ़ और नरनाला के किले |
इन राज्यों का राजनीतिक इतिहास बहमनी सल्तनत (अंग्रेज़ी में) और पाँच दक्कन सल्तनतें (अंग्रेज़ी में) लेखों में है; यह पृष्ठ उनकी इमारतों पर है।
दक्कन के स्मारक किसने बनाए: फ़ारसी वास्तुकार और स्थानीय कारीगर
यह शैली एक मिले-जुले दरबार से निकली। बहमनी शासक प्रायः इमारत की मुख्य रूपरेखा के लिए फ़ारसी वास्तुकार रखते थे, जबकि हिंदू राजमिस्त्री और कारीगर निर्माण की देखरेख करते और बारीकियाँ भरते थे। बीजापुर में मुहम्मद आदिलशाह ने अपने मकबरे के लिए उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों से वास्तुकार और अभियंता बुलाए और सजावट के लिए स्थानीय कारीगर रखे। बीजापुर में हब्शी (अबीसीनियाई) ऊँचे पदों पर थे: मलिक संदल ने इब्राहिम रौज़ा के निर्माण की देखरेख की, और मलिक याकूत ने नगर की जामा मस्जिद पूरी करवाई।
विचार सीमाओं के पार भी गए। विजयनगर के शासकों के हाथी-अस्तबल पड़ोसी बीजापुर और गोलकुंडा सल्तनतों के स्थापत्य से गहराई से प्रभावित थे, यद्यपि दोनों पक्ष प्रतिद्वंद्वी थे; 1565 में सल्तनतों ने मिलकर तालीकोटा में विजयनगर को हराया। विजयनगर का पक्ष हम्पी में विजयनगर स्थापत्य (अंग्रेज़ी में) में है।
बहमनी स्थापत्य: गुलबर्गा, बीदर और दौलताबाद
गुलबर्गा का किला, उसकी जामा मस्जिद और हफ़्त गुंबद
कर्नाटक का गुलबर्गा, आज का कलबुर्गी, बहमनियों की पहली राजधानी था। दिल्ली सल्तनत से नाता तोड़ने के बाद अलाउद्दीन बहमन शाह ने 1347 में इसके किले का बहुत विस्तार किया, और इसके भीतर मस्जिदें, महल और मकबरे बने।
- जामा मस्जिद (1367): किले के भीतर फ़ारसी शैली में बनी, मेहराबदार स्तंभों पर टिके गुंबदों से पूरी तरह ढकी, गुलबर्गा में बहमनी शासन की स्थापना की स्मृति में; यह 38,000 वर्ग फुट में फैली है और इसका सामूहिक नमाज़ का आँगन ढका हुआ है, जो इस क्षेत्र में अनोखा है।
- हफ़्त गुंबद: चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी के सात मकबरों का समूह, जिनमें चार बहमनी सुल्तानों के हैं, तुग़लक़ शैली की याद दिलाते हुए। इनके दो कक्षों वाले मकबरे, एक कक्ष राजा के लिए और दूसरा उसके परिवार के लिए, और कहीं नहीं मिलते; फ़िरोज़ शाह बहमनी का मकबरा सबसे बड़ा है।
- बाद का इतिहास: विजयनगर ने किला ढहा दिया; 1565 के बाद बीजापुर के यूसुफ़ आदिलशाह ने इसे फिर बनवाया, और 1687 में औरंगज़ेब ने इसे जीता।
पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ तक गुलबर्गा राजधानी रहा, फिर सुल्तान बेहतर जलवायु वाले बीदर चले गए। शुरुआती बहमनी सुल्तान हफ़्त गुंबद में दफ़न हैं, बाद वाले बीदर में।
बीदर: किला, बहमनी मकबरे और महमूद गवाँ का मदरसा
अहमद शाह प्रथम वली (1422 से 1436) के समय बीदर बहमनी राजधानी बना। उन्होंने यहाँ का पुराना किला फिर से बनवाया और मदरसे, मस्जिदें, महल और बाग बनवाए। किला बीदर पठार के किनारे एक अनियमित समचतुर्भुज के आकार में है, उत्तर और पूर्व में खड़ी दीवारों के साथ, और इसके भीतर 30 से अधिक स्मारक हैं। इसकी लंबी, घुमावदार पत्थर और गारे की दीवारें फ़ारसी और तुर्की वास्तुकारों ने खाई से निकले पत्थर से बनाईं।
- बहमनी मकबरे: बीदर में राजवंश का कब्रिस्तान, 1436 से 1535 के बीच बना, जिसकी शुरुआत अहमद शाह के अपने मकबरे से हुई। कंदाकार गुंबदों वाले वर्गाकार मकबरे, चूने में जड़े काले ट्रैप पत्थर के, जिन पर कभी फूल-पत्ती, ज्यामितीय और सुलेख वाली चमकीली (एनकॉस्टिक) टाइलें थीं। अहमद शाह के मकबरे के भीतर चित्रकारी है और कूफ़ी तथा सुल्स लिपि में अभिलेख हैं। बहमनी शक्ति घटने के साथ बाद के मकबरे छोटे होते गए।
- महमूद गवाँ का मदरसा (1471 से 1472): बहमनी प्रधानमंत्री महमूद गवाँ ने बनवाया, जो ईरान के गीलान से आए एक फ़ारसी व्यापारी थे और 1453 में बीदर आए। उन्होंने इसे अपने धन से बनवाया, और यह खुरासान के मदरसों के नमूने पर एक आवासीय विश्वविद्यालय की तरह चलता था: आँगन के चारों ओर तीन मंज़िलों में कमरे, और पूर्व की ओर लगभग 30 मीटर ऊँची दो मीनारों के बीच प्रवेश।
यह मदरसा दिखाता है कि इमारतें कैसे क्षति झेलती हैं। मुगलों ने इसे घुड़सवार सेना की बैरक बनाया; इसमें रखा बारूद फटा और इमारत का लगभग एक-चौथाई भाग नष्ट हो गया, और 1695 या 1696 में बिजली गिरने के बाद यह उपयोग से बाहर हो गया। 1914 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपने संरक्षण में लिया। महमूद गवाँ के जीवन के लिए देखें महमूद गवाँ और बहमनी सल्तनत का उत्कर्ष (अंग्रेज़ी में)।
दौलताबाद: चाँद मीनार और किले की रक्षा-व्यवस्था
महाराष्ट्र के दौलताबाद में चाँद मीनार खड़ी है। यह 1445 में विजयनगर पर बहमनी विजय की स्मृति में बनी और दिल्ली की कुतुब मीनार से प्रेरित है। लगभग 63 मीटर ऊँची यह मीनार चार मंज़िलों में उठती है; इसके बाहरी भाग पर कभी चमकीली टाइलों में शेवरॉन (V-आकार) की आकृतियाँ और कुरान की आयतों की चौड़ी पट्टियाँ थीं, और इसके छज्जे टोड़ों पर टिके हैं, जो भारतीय तत्त्व है। यह स्थानीय वास्तुकारों और दिल्ली तथा ईरान से आए वास्तुकारों का मिला-जुला काम था।
इसके चारों ओर का किला, जिसका पुराना नाम देवगिरि था, आक्रमणकारी को उलझाने के लिए बना था। इसके प्रवेश-द्वार आड़े-तिरछे थे, ताकि हाथी भी फाटक न तोड़ सकें; इसमें दो किले थे, एक दूसरे के भीतर और ऊँचाई पर; और इसके घुमावदार रास्तों में एक गलत मोड़ शत्रु सैनिक को चक्कर में डाल सकता था या कई सौ फुट नीचे गिरा सकता था।
बीजापुर का आदिलशाही स्थापत्य: गोल गुंबद और इब्राहिम रौज़ा
गोल गुंबद, बीजापुर: मुहम्मद आदिलशाह का विशाल गुंबद
बीजापुर, आज के कर्नाटक के विजयपुरा, के आदिलशाही वंश के सातवें सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह (1626 से 1656) का मकबरा गोल गुंबद कहलाता है। सुल्तान ने इसे स्वयं बनवाना शुरू किया; 1656 में उनकी मृत्यु पर काम रुक गया और मकबरा अधूरा रह गया, फिर भी यह एक शानदार इमारत है। यह दीवारों से घिरे बाग में है, जिसमें प्रवेश-द्वार, नक्कारख़ाना, मस्जिद और सराय हैं।
- सामग्री: गहरे सलेटी रंग का बेसाल्ट पत्थर और सजा हुआ पलस्तर; विशाल गुंबद स्वयं ईंटों और चूने के गारे की परतों से बना है।
- आकार: हर दीवार 135 फुट लंबी, 110 फुट ऊँची और 10 फुट मोटी है; ढोल और गुंबद मिलाकर इमारत 200 फुट से अधिक ऊँची है।
- गुंबद: एक ही वर्गाकार कक्ष पर 125 फुट व्यास का अर्धगोलाकार गुंबद, जो 18,337 वर्ग फुट के बिना स्तंभ वाले फ़र्श को ढकता है; बाहर से नापने पर गुंबद लगभग 44 मीटर (144 फुट) चौड़ा है।
- संरचना: कोनों पर बगली डाट (पेंडेंटिव) गुंबद को आकार देती हैं और उसका भार नीचे की दीवारों पर डालती हैं; परस्पर काटती मेहराबों से बने कोणों को चाप-जालियाँ ढकती हैं।
- फुसफुसाहट दीर्घा: ढोल के चारों ओर एक दीर्घा है, जहाँ दीवार के पास फुसफुसाया गया शब्द दूसरी किसी भी जगह सुनाई देता है और आवाज़ कई बार गूँजती है।
- कोने और कार्निस: हर कोने पर सात मंज़िली अष्टभुजाकार मीनार है, जिसमें गुंबद तक जाने की सीढ़ियाँ हैं; बाहरी भाग पर टोड़ों पर टिकी भारी कार्निस है।
मकबरे के कक्ष में सुल्तान और उनके परिवार की स्मारक-कब्रें हैं, जबकि असली कब्रें नीचे तहखाने में हैं। गुंबद, मेहराबें, अनुपात और भार उठाने की तकनीक तैमूरी और फ़ारसी शैली की याद दिलाते हैं, पर सामग्री स्थानीय है और सतह की सजावट दक्कनी। अपने समय में यह आधुनिक युग से पहले बने संसार के सबसे बड़े गुंबदों में था।
इब्राहिम रौज़ा और बीजापुर की जामा मस्जिद
इब्राहिम रौज़ा, अर्थात् बाग वाला मकबरा, इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय के काल की सबसे सुंदर इमारत है। इसके फ़ारसी अभिलेख बताते हैं कि इसे उनकी बेगम ताज सुल्ताना ने बनवाया, जो 1626 या 1627 में पूरा हुआ, और हब्शी मलिक संदल ने काम की देखरेख की; सुल्तान की मृत्यु के बाद यह पारिवारिक मकबरा बना। इसकी आकाश-रेखा के कारण इसे लोकप्रिय रूप से "काला ताजमहल" या "दक्षिण का ताज" कहा जाता है।
- योजना: एक जैसी रूपरेखा वाले मकबरे और मस्जिद एक ही ऊँचे चबूतरे पर आमने-सामने हैं, बीच में फ़व्वारा और हौज़, और चारों ओर दीवारों से घिरा परिसर।
- अलंकरण: पत्थर की बारीक नक्काशी, सुलेख से कटी पत्थर की जालियाँ, और ऐसा सुलेखन जो और कहीं नहीं दिखता; सुलेखक सैयद नक़ीउद्दीन अल-हुसैनी ने अपने काम पर हस्ताक्षर किए।
- स्थान: पुराने नगर के मक्का दरवाज़े के बाहर, नौरसपुर की सड़क पर, जिस नए नगर को इब्राहिम द्वितीय ने 1599 में बसाना शुरू किया।
बीजापुर की जामा मस्जिद, नगर की सबसे बड़ी मस्जिद, अली आदिलशाह प्रथम ने 1576 में तालीकोटा के युद्ध में मिले धन से शुरू करवाई, और यह कभी पूरी नहीं हुई। इसमें 4,000 नमाज़ी आ सकते हैं; इसके नमाज़-कक्ष में सात मेहराबें हैं, जिनमें केवल बीच वाली सजी है, ऊपर अर्धगोलाकार गुंबद है, और इसके फ़र्श को बाद में औरंगज़ेब ने जानमाज़ जैसे 2,250 आयताकार खानों में बँटवाया। गगन महल, जिसे 1561 का माना जाता है, शाही निवास और दरबार-कक्ष दोनों था।
गोलकुंडा और हैदराबाद का कुतुबशाही स्थापत्य: चारमीनार और मकबरे
गोलकुंडा का किला: कुतुबशाहियों का ग्रेनाइट का गढ़
गोलकुंडा की शुरुआत काकतीय राजाओं के मिट्टी के एक छोटे किले के रूप में हुई, जो बाद में बहमनियों के पास आया। उनके सूबेदार सुल्तान क़ुली ने 1518 में स्वतंत्रता घोषित की और इसे अपनी राजधानी बनाया। 62 वर्षों में पहले तीन कुतुबशाही सुल्तानों ने इसे लगभग 5 किलोमीटर घेरे वाले ग्रेनाइट के किले में बदला, और 7 किलोमीटर लंबी बाहरी दीवार ने नगर को घेरा। 1590 में हैदराबाद बसने तक यही राजधानी रहा।
- रक्षा: बाहरी दीवारों के संकेंद्री घेरे, ताकि शत्रु को हर घेरा बारी-बारी से तोड़ना पड़े।
- ध्वनि-व्यवस्था: फ़तेह दरवाज़े के प्रवेश पर गुंबद के नीचे बजाई गई ताली लगभग एक किलोमीटर दूर, सबसे ऊँचे बाला हिसार मंडप तक सुनाई देती है।
- समृद्धि: पास की हीरे की खानों ने गोलकुंडा को धन का पर्याय बना दिया; कोहिनूर और होप हीरा कभी इसके तहखाने में रखे गए थे।
- पतन: आठ महीने की घेराबंदी के बाद 1687 में किला औरंगज़ेब के हाथ आया, और अंतिम सुल्तान अबुल हसन कुतुबशाह बंदी बने।
चारमीनार और मक्का मस्जिद: कुतुबशाही हैदराबाद का केंद्र
पाँचवें कुतुबशाही शासक मुहम्मद क़ुली कुतुबशाह ने अपनी राजधानी गोलकुंडा से नए नगर हैदराबाद ले जाकर 1591 में उसके केंद्र में चारमीनार बनवाई। प्रायः माना जाता है कि यह प्लेग के अंत की स्मृति में बनी; फ़्रांसीसी यात्री थेवनो ने इसे दूसरी इस्लामी सहस्राब्दी के आरंभ से जोड़ा।
- मेहराबें और मीनारें: हर भुजा 20 मीटर लंबी, एक वर्गाकार संरचना, जिसकी हर भुजा पर एक दिशा की ओर खुलती बड़ी मेहराब है; हर कोने पर 56 मीटर ऊँची धारीदार मीनार, जो मुख्य संरचना में ही बनी है।
- छत पर मस्जिद: सबसे ऊपरी मंज़िल पर मस्जिद है, जिसमें नमाज़ के 45 स्थान हैं; छत का बाकी भाग कुतुबशाही काल में शाही दरबार के काम आता था।
- ग्रेनाइट और पलस्तर: ग्रेनाइट, चूना पत्थर, गारा और पिसा संगमरमर, और भरपूर पलस्तर की सजावट, जंगले और छज्जे।
- नगर-योजना: यह वहाँ है जहाँ मछलीपट्टनम बंदरगाह तक जाने वाला व्यापार-मार्ग नगर को काटता था, और पुराना नगर इसके चारों ओर चार भागों में बसाया गया, उत्तर में चार मेहराबों, चार कमान, के साथ।
चारमीनार के ठीक दक्षिण में मक्का मस्जिद मुहम्मद कुतुबशाह ने 1617 में शुरू करवाई; उन्होंने मक्का से लाई मिट्टी से ईंटें बनवाकर इसकी केंद्रीय मेहराब में लगवाईं, जिससे इसका नाम पड़ा। लगभग 8,000 मज़दूरों ने इसे बनाया, और 1694 में औरंगज़ेब ने इसे पूरा करवाया; 10,000 नमाज़ियों की क्षमता के साथ यह नगर की सबसे बड़ी मस्जिद है।
गोलकुंडा के इब्राहिम बाग में कुतुबशाही मकबरे
गोलकुंडा किले के पास इब्राहिम बाग में आठ में से सात कुतुबशाही सुल्तानों और उनके परिवारों के मकबरे हैं। ये वर्गाकार आधार पर बने, नुकीली मेहराबों से घिरे गुंबददार भवन हैं, फ़ारसी और भारतीय रूपों का मेल, जो ऊँचे चबूतरों पर खड़े हैं; छोटे मकबरों की दीर्घाएँ एक मंज़िल की और बड़ों की दो मंज़िल की हैं, और गुंबद कभी नीली और हरी टाइलों से ढके थे।
कुतुबशाही काल में इन मकबरों का बड़ा सम्मान था, जहाँ कालीन, झाड़-फ़ानूस और कुरान पढ़ने वाले होते थे। 1687 की घेराबंदी में मुगल सेना ने इन्हें बैरक बना दिया और इन पर तोपें चढ़ा दीं। उन्नीसवीं शताब्दी में सालार जंग तृतीय ने इनका जीर्णोद्धार करवाया, और 2013 से तेलंगाना राज्य पुरातत्व और संग्रहालय विभाग ने आग़ा ख़ान ट्रस्ट फ़ॉर कल्चर के साथ इन्हें फिर से सँवारा; यह जीर्णोद्धार 10 मार्च 2020 को लोगों के सामने आया।
दक्कन सल्तनत स्थापत्य की विशेषताएँ
दक्कनी शैली की विशेषताएँ: गुंबद, मीनारें, पलस्तर और पत्थर
दक्कनी शैली उसके तीन केंद्रों की तुलना से सबसे आसानी से याद होती है। तीनों ने गुंबद, मेहराब और मीनार की एक ही इंडो-इस्लामिक भाषा अपनाई, पर अपने-अपने पत्थर और अलंकरण के साथ, जैसा चित्र 3 की समय-रेखा में दिखता है।
| केंद्र | सामग्री | क्या अलग है |
|---|---|---|
| बीदर और गुलबर्गा (बहमनी) | चूने में जड़ा काला ट्रैप पत्थर | फ़ारसी वास्तुकारों की फ़ारसी योजनाएँ; चमकीली टाइलें; गुलबर्गा की ढकी मस्जिद |
| बीजापुर (आदिलशाही) | गहरा सलेटी बेसाल्ट; ईंट का गुंबद | बगली डाटों पर विशाल गुंबद; गोल गुंबद; इब्राहिम रौज़ा की नक्काशी और सुलेखन |
| गोलकुंडा और हैदराबाद (कुतुबशाही) | ग्रेनाइट, चूना और पलस्तर | संरचना में बनी मीनारें; भरपूर पलस्तर; मकबरों के टाइलदार गुंबद |
- किले: गोलकुंडा में संकेंद्री दीवारें, बीदर में दोहरी दीवारें, दौलताबाद में आड़े-तिरछे द्वार और भूलभुलैया।
- गुंबद: अर्धगोलाकार और कंदाकार गुंबद, सबसे बड़ा गोल गुंबद का; चारमीनार की मीनारें पंखुड़ी जैसे आधार वाले छोटे गुंबदों पर समाप्त होती हैं।
- मीनारें: पतली होती चाँद मीनार; गोल गुंबद के कोनों की मीनारें; चारमीनार की मीनारें।
- सतह: बीदर में चमकीली टाइलें, दौलताबाद में फ़ारसी नीली टाइलें, हैदराबाद में पलस्तर, बीजापुर में पत्थर की नक्काशी।
- मेल: फ़ारसी और मध्य एशियाई संरचना, भारतीय टोड़े और स्थानीय कारीगरी।
सल्तनत दरबारों में दक्कनी चित्रकला, संगीत और साहित्य
दक्कनी चित्रकला: अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा की शैलियाँ
इन्हीं दरबारों ने चित्रकला की अपनी शैली भी बनाई। सोलहवीं शताब्दी के अंत से 1680 के दशक की मुगल विजय तक फली-फूली दक्कनी चित्रकला गहरे, चटख रंगों, घनी रचना और रूमानी वातावरण के लिए जानी जाती है; इसमें फ़ारस से लिए ऊँचे क्षितिज और सुनहरे आकाश हैं, और लेपाक्षी के भित्ति-चित्रों जैसी दक्षिण भारतीय वेशभूषा में स्त्रियाँ।
- अहमदनगर: दक्कनी चित्रकला के सबसे पुराने उदाहरण हुसैन निज़ामशाह प्रथम (1553 से 1565) के शासन पर लिखे कविता-संग्रह, तारीफ़-ए-हुसैन शाही, के चित्र हैं।
- बीजापुर: नुजूम-अल-उलूम (1570), एक विश्वकोश, जिसमें अस्त्र-शस्त्र, बर्तनों और नक्षत्रों के 876 लघु चित्र हैं; संरक्षक अली आदिलशाह प्रथम और इब्राहिम द्वितीय थे; संभवतः इब्राहिम द्वितीय ने 1590 के दशक में रागमाला शृंखला बनवाई।
- गोलकुंडा: पूर्वी तट के व्यापार और सत्रहवीं शताब्दी से हीरों के कारण सोलहवीं शताब्दी के अंत तक सबसे धनी दक्कनी राज्य; इसके सुल्तानों के छवि चित्र डच व्यापारी यूरोप ले गए।
राष्ट्रीय संग्रहालय में हैदराबाद शैली का एक चित्र सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया को अपने शिष्य अमीर ख़ुसरो का संगीत सुनते दिखाता है; ख़ुसरो को क़व्वाली, अर्थात् सूफ़ियों के भक्ति-गायन, का जनक माना जाता है।
इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय, किताब-ए-नौरस और दक्कनी साहित्य
इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय (1580 से 1627), जिनके समय बीजापुर अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँचा, संगीतज्ञ, कवि और संरक्षक थे और "जगद्गुरु बादशाह" कहलाते थे। उन्होंने दक्कनी में किताब-ए-नौरस लिखी, विभिन्न रागों और रागिनियों में बँधे गीतों की पुस्तक, जिसमें उन्होंने पैगंबर मुहम्मद और गुलबर्गा के सूफ़ी संत ख़्वाजा बंदानवाज़ गेसूदराज़ के साथ देवी सरस्वती की भी स्तुति की।
- संगीत: वे तानपूरा बजाते थे, जिसे वे मोती ख़ान कहते थे, और उन्होंने अपने युग के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों और नर्तकों को बीजापुर बुलाया।
- नौरसपुर: 1599 में उन्होंने बीजापुर के पश्चिम में विद्या और कला का नया नगर नौरसपुर बसाना शुरू किया; यह कभी पूरा नहीं हुआ।
- विद्या: उनके आदेश पर फ़िरिश्ता ने फ़ारसी में दक्कन सल्तनतों का इतिहास, तारीख़-ए-फ़िरिश्ता, लिखा।
- गोलकुंडा के कवि-राजा: मुहम्मद क़ुली कुतुबशाह ने दक्कनी, फ़ारसी और तेलुगु में लिखा और दक्कनी कविताओं का संग्रह, कुल्लियात, छोड़ा।
दक्कन सल्तनत स्मारकों का महत्त्व और संरक्षण
दक्कनी शैली क्यों महत्त्वपूर्ण है: समन्वय, दक्कनी संस्कृति और विश्व धरोहर का दावा
दक्कन के स्मारक सीमांत की एक संस्कृति को काम करते हुए दिखाते हैं। फ़ारसी वास्तुकारों, हब्शी अमीरों, हिंदू राजमिस्त्रियों और स्थानीय कवियों ने ऐसी शैली बनाई जो न दिल्ली की नकल थी, न ईरान की, और इन्हीं दरबारों ने दक्कनी को साहित्य की भाषा बनाया और इब्राहिम द्वितीय के रूप में भारतीय संगीत को एक शाही संरक्षक दिया।
- विश्व धरोहर का दावा: 15 अप्रैल 2014 को “दक्कन सल्तनत के स्मारक और किले” यूनेस्को की संभावित (टेंटेटिव) सूची में आए: बीदर के बहमनी और बरीदशाही स्मारक, बीजापुर के आदिलशाही स्मारक, हैदराबाद के कुतुबशाही स्मारक, और इनके साथ हफ़्त गुंबद तथा महमूद गवाँ का मदरसा।
- अभियांत्रिकी: गोल गुंबद का गुंबद, आधुनिक युग से पहले के सबसे बड़े गुंबदों में से एक, और उसकी दीर्घा तथा गोलकुंडा के द्वार की ध्वनि-व्यवस्था।
- नगर-योजना: तट तक जाने वाले व्यापार-मार्ग पर चारमीनार के चारों ओर चार भागों में बसा हैदराबाद।
दक्कन स्मारकों का संरक्षण: उपेक्षा, बैरकें और जीर्णोद्धार
इनमें से कई इमारतें खंडहर होने के करीब पहुँचीं। 1686 की मुगल विजय के बाद बीजापुर लगभग वीरान हो गया, अकाल, बाढ़ और हैज़े से उसकी आबादी घट गई, और गोल गुंबद उपेक्षित पड़ा रहा; कुतुबशाही मकबरे और महमूद गवाँ का मदरसा मुगल बैरकें बन गए। आज गुलबर्गा का हफ़्त गुंबद उन दुकानों और संस्थाओं से घिरा है जिन्होंने परिसर पर अतिक्रमण कर लिया है।
- सर्वेक्षण और संग्रहालय: 1892 में गोल गुंबद एक संग्रहालय के साथ लोगों के लिए खुला, और 1962 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसका दायित्व लिया; महमूद गवाँ का मदरसा 1914 से सर्वेक्षण के संरक्षण में है।
- जीर्णोद्धार की साझेदारी: तेलंगाना राज्य पुरातत्व और संग्रहालय विभाग तथा आग़ा ख़ान ट्रस्ट फ़ॉर कल्चर 2013 से कुतुबशाही मकबरों का जीर्णोद्धार कर रहे हैं, और बावड़ियों के जीर्णोद्धार का खर्च सांस्कृतिक संरक्षण के लिए अमेरिकी राजदूत कोष ने उठाया।
- मान्यता: 2014 की संभावित विश्व धरोहर सूची दक्कन के किलों और मकबरों को देखभाल के अंतरराष्ट्रीय मानक के सामने रखती है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से किस स्मारक का गुंबद विश्व के सबसे बड़े गुंबदों में से एक कहा जाता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: प्रश्न उस गुंबद को पूछता है जो विश्व के सबसे बड़े गुंबदों में गिना जाता है। चरण 2: बीजापुर का गोल गुंबद, मुहम्मद आदिलशाह का मकबरा, 18,337 वर्ग फुट के एक ही कक्ष पर 125 फुट व्यास का गुंबद रखता है। चरण 3: बाकी तीन प्रसिद्ध मकबरे और एक मस्जिद हैं, पर कोई अपने गुंबद के आकार के लिए प्रसिद्ध नहीं।
इस भ्रम से बचें: दिल्ली की जामा मस्जिद भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है, सबसे बड़े गुंबद वाली इमारत नहीं; आकार के इन दो अर्थों में भ्रम न करें।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) शेरशाह का मकबरा, सासाराम: गलत। विश्व के सबसे बड़े गुंबदों में गिना जाने वाला गुंबद गोल गुंबद का है, इस सूर मकबरे का नहीं।
- (b) जामा मस्जिद, दिल्ली: गलत। यह भारत की सबसे बड़ी मस्जिद के रूप में जानी जाती है, जिस पर तीन गुंबद हैं; इसकी प्रसिद्धि मस्जिद के आकार की है, किसी एक गुंबद की नहीं।
- (c) ग़यासुद्दीन तुग़लक़ का मकबरा, दिल्ली: गलत। दिल्ली सल्तनत का यह मकबरा वह नहीं जिसका गुंबद सबसे बड़ों में गिना जाता है; वह गोल गुंबद है।
- (d) गोल गुंबद, बीजापुर: सही। इसका 125 फुट व्यास का गुंबद आधुनिक युग से पहले के संसार के सबसे बड़े गुंबदों में था।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: गोल गुंबद, बीजापुर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2003 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- हिंदू देवी-देवताओं और मुस्लिम संतों की प्रशंसा में गीतों का संग्रह किताब-ए-नौरस इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने लिखा था।
- अमीर ख़ुसरो भारत में क़व्वाली नामक संगीत शैली के आरंभिक रूप के प्रवर्तक थे।
इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1। बीजापुर के इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने किताब-ए-नौरस लिखी, रागों में बँधे गीत, जिनमें पैगंबर के साथ देवी सरस्वती और सूफ़ी संत बंदानवाज़ की स्तुति है; सही। चरण 2: कथन 2। अमीर ख़ुसरो को सूफ़ियों के भक्ति-गायन क़व्वाली का जनक माना जाता है; सही। चरण 3: दोनों कथन सही हैं।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 एक ही पुस्तक में हिंदू देवी-देवताओं और मुस्लिम संतों की स्तुति बताता है; यही मेल किताब-ए-नौरस को प्रसिद्ध बनाता है, इसलिए यह कोई चाल नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 2 भी सही है: अमीर ख़ुसरो को क़व्वाली का जनक माना जाता है।
- (b) केवल 2: गलत। कथन 1 भी सही है: किताब-ए-नौरस इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने लिखी।
- (c) 1 और 2 दोनों: सही। बीजापुर के सुल्तान की गीत-पुस्तक और ख़ुसरो की क़व्वाली, दोनों का वर्णन सही है।
- (d) न तो 1, न ही 2: गलत। दोनों कथन सही हैं।
उत्तर: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर: दोनों कथन सही हैं।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-Iभारतीय कला विरासत का संरक्षण वर्तमान समय की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भारत की कला धरोहर को उसकी मिली-जुली संस्कृति का अभिलेख बताएँ, और दिल्ली और आगरा से आगे के उदाहरण के रूप में दक्कन सल्तनतों के स्मारक रखें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- क्यों महत्त्वपूर्ण: फ़ारसी वास्तुकारों, हब्शी अमीरों, हिंदू राजमिस्त्रियों और दक्कनी कवियों की मिली-जुली संस्कृति; गोल गुंबद के गुंबद जैसी अभियांत्रिकी; हैदराबाद की नगर-योजना।
- क्षति के कारण: वीरानी और आबादी का घटना (1686 के बाद बीजापुर); दुरुपयोग (कुतुबशाही मकबरों और महमूद गवाँ के मदरसे में मुगल बैरकें, बारूद का विस्फोट); बिजली; दुकानों और संस्थाओं का अतिक्रमण (हफ़्त गुंबद)।
- क्या किया गया: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1914 से मदरसा, 1962 से गोल गुंबद); स्थल संग्रहालय (1892); राज्य और निजी साझेदारी (कुतुबशाही मकबरों पर तेलंगाना विभाग और आग़ा ख़ान ट्रस्ट, 2013 से 2020); 2014 की संभावित विश्व धरोहर सूची।
- क्या बाकी है: अतिक्रमण हटाना, जीर्णोद्धार जारी रखना और 2014 की सूची जिस विश्व धरोहर दर्जे की माँग करती है, उसे पाना।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि कला धरोहर की रक्षा इसलिए तात्कालिक है कि उपेक्षा और अतिक्रमण समय से अधिक तेज़ी से क्षति करते हैं, और कुतुबशाही जीर्णोद्धार दिखाता है कि साझेदारी क्या कर सकती है।
स्रोत
- NCERT: भारतीय कला का परिचय, भाग 1 (कक्षा 11), इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के कुछ कलात्मक पहलू
- NCERT: भारतीय कला का परिचय, भाग 2 (कक्षा 12), दक्कनी चित्रकला शैली
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part I (Class XI), Some Aspects of Indo-Islamic Architecture
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part II (Class XII), The Deccani Schools of Painting
- NCERT: Our Pasts II (Class VII), Rulers and Buildings
- UNESCO World Heritage Centre: Monuments and Forts of the Deccan Sultanate (Tentative List, 15 April 2014)
- Archaeological Survey of India: Red Fort Complex and Jama Masjid, Delhi (World Heritage)
- The Hindu (Delhi), 29 May 2026: the Qutb Shahi dynasty on film
- Wikipedia: Deccan sultanates
- Wikipedia: Architecture of the Deccan sultanates
- Wikipedia: Bahmani Kingdom
- Wikipedia: Gulbarga Fort
- Wikipedia: Haft Gumbaz
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- Wikipedia: Bahmani Tombs
- Wikipedia: Mahmud Gawan Madrasa
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- Wikipedia: Jama Mosque, Bijapur
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- Wikipedia: Ibrahim Adil Shah II
- Wikipedia: Golconda
- Wikipedia: Charminar
- Wikipedia: Makkah Masjid, Hyderabad
- Wikipedia: Qutb Shahi tombs
- Wikipedia: Deccan painting
- Wikipedia: Amir Khusrau
- Wikipedia: Qawwali
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
इमारतों की तिथियाँ जहाँ NCERT देती है वहाँ उसके अनुसार हैं, अन्यथा इस पृष्ठ पर दिए गए स्रोतों के अनुसार; कुछ विवरणों में कुछ वर्षों का अंतर है।
