परिचय

महासागरीय जल का तापमान सतह पर औसतन लगभग 27 °C है और ध्रुवों की ओर हर अक्षांश पर लगभग 0.5 °C घटता है। लगभग 500 मीटर मोटी गर्म सतही परत के नीचे ताप प्रवणता में तापमान तेज़ी से गिरता है, और महासागर का लगभग 90 प्रतिशत जल उसके नीचे, लगभग 0 °C पर है। सतह पर बना जल अपने तापमान और अपनी लवणता के साथ जल राशियों के रूप में डूबता है, जिन्हें T-S आरेख से पहचाना जाता है और अग्रभाग एक-दूसरे से अलग करते हैं।

महासागरीय जल का तापमान: समुद्री सतह का तापमान और उसका वितरण

समुद्री सतह का तापमान: अर्थ और तापमान का क्षैतिज वितरण

सतह के निकट महासागरीय जल के तापमान को समुद्री सतह का तापमान (sea surface temperature) कहते हैं, जिसे प्रायः सतह से 1 मिलीमीटर से 20 मीटर नीचे के बीच कहीं मापा जाता है। स्थल की तरह महासागर भी सूर्य से गर्म होता है, पर वह धीरे गर्म होता है और धीरे ठंडा। फिर भी सतह दिन भर बदलती रहती है: शांत दिनों में इसका तापमान 6 °C तक बदल सकता है, जबकि हवा वाले दिनों में कम, क्योंकि पवन जल को मिला देती है।

पूरी पृथ्वी पर सतह का तापमान अक्षांश के अनुसार चलता है। महासागरों की सतह के जल का औसत तापमान लगभग 27 °C है, और यह विषुवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर क्रमशः घटता है, सामान्यतः हर अक्षांश पर लगभग 0.5 °C। 20° अक्षांश पर यह लगभग 22 °C, 40° पर 14 °C और ध्रुवों के पास लगभग 0 °C होता है। उच्चतम तापमान ठीक विषुवत् वृत्त पर नहीं, बल्कि उससे कुछ उत्तर की ओर मिलता है।

अक्षांश के सामने समुद्री सतह के औसत तापमान का रेखा-चार्ट: विषुवत् वृत्त के पास औसत लगभग 27 °C, 20° अक्षांश पर 22 °C, 40° पर 14 °C और ध्रुवों के पास 0 °C, अर्थात् हर अक्षांश पर लगभग 0.5 °C की कमी।

दोनों गोलार्धों में भी अंतर है। उत्तरी गोलार्ध के महासागरों का औसत वार्षिक तापमान लगभग 19 °C और दक्षिणी गोलार्ध का लगभग 16 °C है, क्योंकि उत्तरी महासागर कहीं बड़े स्थल-भाग के संपर्क में हैं, जो उन्हें अधिक ऊष्मा देता है। घिरे हुए सागर अपने अक्षांश का असर और भी गहराई से दिखाते हैं: निम्न अक्षांशों में वे खुले सागर से अधिक गर्म होते हैं, और उच्च अक्षांशों में अधिक ठंडे।

महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक

किसी स्थान पर महासागरीय जल का तापमान इस पर निर्भर करता है कि उसे कितनी ऊष्मा मिलती है और कौन-सी शक्तियाँ ऊष्मा को भीतर लाती या बाहर ले जाती हैं। समुद्री सतह के तापमान के मानचित्र का अधिकांश प्रतिरूप चार कारकों से समझ में आता है।

  1. अक्षांश: ध्रुवों की ओर सूर्यातप घटता है, इसलिए विषुवत् वृत्त से दूर सतह का जल ठंडा होता जाता है।
  2. स्थल और जल का असमान वितरण: उत्तरी गोलार्ध के महासागरों को अधिक ऊष्मा मिलती है, क्योंकि वे दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में अधिक बड़े स्थल-भाग से सटे हैं।
  3. प्रचलित पवनें: स्थल से सागर की ओर चलने वाली पवनें गर्म सतही जल को तट से दूर धकेल देती हैं और उसकी जगह नीचे से ठंडा जल ऊपर आ जाता है; सागर से स्थल की ओर चलने वाली पवनें गर्म जल को तट पर जमा कर उसका तापमान बढ़ाती हैं।
  4. महासागरीय धाराएँ: गर्म धाराएँ ठंडे क्षेत्रों का तापमान बढ़ाती हैं और ठंडी धाराएँ गर्म क्षेत्रों का घटाती हैं। गल्फ स्ट्रीम उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट और यूरोप के पश्चिमी तट को गर्म करती है, जबकि ठंडी लैब्राडोर धारा उत्तरी अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट के पास तापमान घटाती है।

तीसरा कारक बताता है कि समुद्री सतह का तापमान केवल अक्षांश के साथ नहीं, बल्कि एक ही अक्षांश पर भी बदलता है। जहाँ स्थल की ओर से चलने वाली पवनें सतही जल को दूर ले जाती हैं, वहाँ नीचे से ऊपर आता ठंडा और घना जल सतह को ठंडा रखता है, और उसके साथ आए पोषक तत्व विश्व के कुछ सबसे उत्पादक मत्स्य-क्षेत्रों को पालते हैं। इस प्रक्रिया, उत्प्रवाह, पर हम अग्रभागों वाले खंड में लौटेंगे।

तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण: मिश्रित परत और ताप प्रवणता

महासागर में तापमान सतह पर सबसे अधिक होता है, क्योंकि सतह सूर्य की ऊष्मा सीधे पाती है, और गहराई के साथ घटता जाता है। यह गिरावट एक-सी नहीं है: लगभग 200 मीटर की गहराई तक तापमान बहुत तेज़ी से गिरता है और उसके बाद कहीं धीरे। मध्य और निम्न अक्षांशों में महासागर की तापीय संरचना को सतह से तली तक तीन परतों के रूप में समझा जा सकता है।

  1. गर्म सतही परत: लगभग 500 मीटर मोटी, जिसका तापमान 20 °C से 25 °C के बीच रहता है। उष्ण कटिबंध में यह पूरे वर्ष रहती है, जबकि मध्य अक्षांशों में केवल ग्रीष्म ऋतु में बनती है। इसका ऊपरी भाग मिश्रित परत (mixed layer) है, जिसमें लहरें और विक्षोभ तापमान को लगभग एक-सा रखते हैं, प्रायः ऊपरी 100 मीटर में।
  2. बीच की परत: ताप प्रवणता, एक सीमा-परत, जो प्रायः सतह से 100 से 400 मीटर नीचे शुरू होती है और 500 से 1,000 मीटर मोटी होती है; इसमें गहराई के साथ तापमान तेज़ी से गिरता है।
  3. गहरी परत: बहुत ठंडा जल, जो महासागर की तली तक फैला है। महासागर के आयतन का लगभग 90 प्रतिशत यहीं, ताप प्रवणता के नीचे है, जहाँ तापमान 0 °C के निकट पहुँच जाता है।
दो जल-स्तंभ, पैमाने पर नहीं। उष्ण और मध्य अक्षांशों में लगभग 500 मीटर मोटी, 20 से 25 °C की गर्म सतही परत, उसके नीचे 500 से 1,000 मीटर मोटी ताप प्रवणता, जहाँ तापमान सबसे तेज़ी से गिरता है, और सबसे नीचे लगभग 0 °C की गहरी ठंडी परत, जिसमें महासागर के आयतन का लगभग 90 प्रतिशत है। ध्रुवीय जल में सतह से तली तक लगभग 0 °C की एक ही ठंडी परत है।

इस प्रकार ताप प्रवणता (थर्मोक्लाइन) तापमान के तीव्र परिवर्तन की वह परत है, जो गर्म और मिश्रित सतही जल को शांत, ठंडे गहरे जल से अलग करती है। उष्ण कटिबंध में यह लगभग स्थायी है, शीतोष्ण जल में ऋतु के साथ बदलती है, और ध्रुवीय क्षेत्रों में उथली होती है या होती ही नहीं, क्योंकि वहाँ सतह से तली तक जल ठंडा रहता है और केवल एक परत होती है। घनत्व के अचानक बदलने से ध्वनि परावर्तित होती है, इसलिए पनडुब्बी युद्ध में ताप प्रवणता का महत्त्व है: यह सोनार संकेतों को मोड़ या लौटा सकती है। लवणता के तीव्र परिवर्तन वाली परत, हैलोक्लाइन, और गहरे परिसंचरण का वर्णन तापलवणीय परिसंचरण (अंग्रेज़ी में) लेख में है।

समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि और उष्णकटिबंधीय चक्रवात

समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि: महासागर कितना गर्म हुआ है

समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि का अर्थ है वैश्विक तापन के कारण महासागर की सतह का दीर्घकालीन रूप से गर्म होना। 1850-1900 से 2011-2020 के बीच वैश्विक औसत समुद्री सतह का तापमान बहुत संभवतः 0.88 °C बढ़ा, और इसमें से अधिकांश, 0.60 °C, 1980 से 2020 के बीच बढ़ा। स्थल महासागर से तेज़ी से गर्म होता है, पर ऊष्मा कहीं अधिक महासागर ही लेता है: ग्रीनहाउस गैसों द्वारा रोकी गई अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत महासागर सोख लेता है।

यह ऊष्मा सतह पर ही नहीं रुकती। 1971 से 2018 के बीच वैश्विक तापन से पृथ्वी में जमा अतिरिक्त ऊर्जा का 90 प्रतिशत से अधिक भाग महासागर की बढ़ती ऊष्मा-मात्रा में गया, और ऊपरी 700 मीटर से शुरू हुई तापवृद्धि मध्यवर्ती गहराइयों तक फैल चुकी है। इसे मुख्यतः लगभग 4,000 आर्गो (Argo) रोबोटिक फ़्लोटों का नेटवर्क मापता है, जो 2000 से तैनात हैं और अनेक गहराइयों पर तापमान तथा लवणता दर्ज करते हैं।

समुद्री सतह का तापमान उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण को कैसे प्रभावित करता है

उष्णकटिबंधीय चक्रवात केवल गर्म जल के ऊपर बनते हैं, और समुद्री सतह का तापमान उनकी पहली शर्त है। लगभग 50 मीटर की गहराई तक महासागर का तापमान कम से कम 26.5 °C होना चाहिए। यही गर्म परत वह ऊष्मा और नमी देती है जो तूफ़ान के गर्म केंद्र को चलाए रखती है: गर्म सागर से जल वाष्पित होता है, नम वायु ऊपर उठकर ठंडी होती है, और जब वाष्प संघनित होकर बादल और वर्षा बनती है, तो निकली ऊष्मा तूफ़ान को शक्ति देती है।

  • अधिक ईंधन: अधिक गर्म सतह अधिक जलवाष्प और ऊष्मा छोड़ती है, इसलिए गर्म जल के ऊपर चक्रवात अधिक शक्तिशाली हो सकता है।
  • गर्म जल की गहराई: चक्रवात ऊपरी महासागर को मथ देता है और पीछे ठंडी पट्टी छोड़ जाता है, जिसमें ऊपरी लगभग 30 मीटर मिल जाते हैं। गर्म परत उथली हो तो ठंडा जल ऊपर आकर तूफ़ान को कमज़ोर कर देता है; गहरी गर्म परत उसे ईंधन देती रहती है। इसीलिए हिंद महासागर में चक्रवात की तीव्रता के लिए केवल सतह के तापमान के बजाय ऊपरी महासागर की ऊष्मा-मात्रा को बेहतर संकेतक माना गया है। पूर्वानुमानकर्ता ताप प्रवणता के ऊपर के गर्म जल की गहराई को तूफ़ान की ‘ईंधन टंकी’ का आकार मानते हैं।
  • ठंडे जल के ऊपर: जो चक्रवात 26.5 °C से काफ़ी ठंडे जल पर पहुँचता है, वह अपना गर्म केंद्र खो देता है और अवशिष्ट निम्न दाब में बदल जाता है।

समुद्री सतह का तापमान चक्रवातों से कहीं आगे के मौसम को भी आकार देता है। यह अपने ऊपर से गुज़रने वाली वायुराशियों को बदलता है, तटों पर समुद्री समीर और समुद्री कोहरे को प्रभावित करता है, और हिंद महासागर में जनवरी से मार्च के बीच दक्षिण-पश्चिमी भाग के ऊपरी महासागर में जमा ऊष्मा यह बताने में सतह के तापमान से बेहतर पाई गई है कि मानसून औसत से अधिक होगा या कम।

महासागर की जल राशियाँ: निर्माण और पहचान

जल राशि क्या है: उत्पत्ति, गुण और गहराई

जल राशि (water mass) महासागरीय जल का एक पहचानने योग्य पिंड है, जिसका निर्माण-इतिहास एक है और जिसके भौतिक गुण आसपास के जल से अलग हैं। इसका तापमान और इसकी लवणता सतह पर, जहाँ यह बनती है, ऊष्मा, शीतलन, वाष्पन, वर्षा और बर्फ़ के स्थानीय संतुलन से तय होते हैं। सतह से नीचे डूब जाने के बाद यह इन गुणों को लंबे समय तक बनाए रखती है, क्योंकि पड़ोसी जल के साथ धीमे मिश्रण के अलावा नीचे कोई भी इसमें ऊष्मा या मीठा जल न जोड़ता है, न घटाता है।

जल राशियों की पहचान अनुरेखकों (tracers) से होती है। तापमान और लवणता संरक्षी अनुरेखक हैं, जो केवल मिश्रण से बदलते हैं; घुली ऑक्सीजन, सिलिकेट, नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट असंरक्षी हैं, जो जीवों के उपयोग या उत्सर्जन से बदलते हैं। ऊर्ध्वाधर स्थिति के अनुसार भी जल राशियाँ सतही, मध्यवर्ती और गहरी होती हैं, क्योंकि हर एक उस गहराई पर टिकती है जहाँ उसका घनत्व आसपास के जल के बराबर हो।

इन्हें घनत्व ही क्रम में लगाता है। ठंडा जल गर्म जल से और लवणीय जल मीठे जल से अधिक घना होता है, इसलिए जो जल राशि ठंडी और लवणीय बनती है वह गहराई तक डूबती है, जबकि ठंडी किंतु कम लवणीय जल राशि मध्यवर्ती गहराई पर रुक जाती है। समुद्री जल लगभग −2 °C पर जमता है, और जब समुद्री बर्फ़ बनती है, तो लवण नीचे के जल में छूट जाता है, जिससे वह और ठंडा, लवणीय तथा भारी हो जाता है: विश्व महासागर का सबसे घना जल इसी तरह बनता है।

T-S आरेख: समुद्र विज्ञानी जल राशियों को कैसे पहचानते हैं

जल राशि पहचानने का मानक साधन T-S आरेख (T-S diagram) है, जो तापमान को लवणता के सामने दिखाने वाला आलेख है। हर गुण को गहराई के सामने अलग-अलग दिखाने के बजाय इसमें ऊर्ध्वाधर अक्ष पर विभव तापमान और क्षैतिज अक्ष पर लवणता होती है, जिससे जल का हर नमूना एक बिंदु बन जाता है। आरेख में समान घनत्व की वक्र रेखाएँ, समघनत्व रेखाएँ (isopycnals), खिंची होती हैं, क्योंकि समुद्री जल कितना घना है, यह तापमान और लवणता मिलकर तय करते हैं।

तापमान-लवणता आरेख, जिसमें ऊर्ध्वाधर अक्ष पर तापमान और क्षैतिज अक्ष पर लवणता है। अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल 3 से 7 °C और 34.2 से 34.4 पर; उत्तरी अटलांटिक गहन जल 2.0 से 3.5 °C और 34.9 से 35.0 पर; अंटार्कटिक तली जल -0.8 से 2 °C और 34.6 से 35.0 पर। समान घनत्व की धराशायी रेखाएँ आरेख को काटती हैं, और अधिक घना, गहरा जल नीचे दाईं ओर है।

गहरी जल राशि सतह छोड़ने के बाद अपना तापमान और अपनी लवणता बनाए रखती है, इसलिए उसके नमूने कहीं भी लिए जाएँ, वे आरेख के एक ही भाग में इकट्ठा होते हैं और उनसे जल के बनने के स्थान तक पहुँचा जा सकता है। सामान्यतः गहरा जल आरेख के नीचे दाईं ओर होता है, जहाँ लवणता अधिक और तापमान कम है। यही साधन परिवर्तन भी पकड़ता है: हाल के दशकों में उत्तरी अटलांटिक में असामान्य सतही लवणता वाले क्षेत्रों को दूर तक फैलते देखा गया है, जिससे स्थानीय पारितंत्र और जल राशियों का डूबना प्रभावित हुआ।

प्रमुख जल राशियाँ: अंटार्कटिक तली जल, उत्तरी अटलांटिक गहन जल और मध्यवर्ती जल

गहरे महासागर का अधिकांश भाग कुछ ही जल राशियों से भरा है, और हर एक किसी विशेष स्थान पर, किसी विशेष प्रक्रिया से बनती है। ये कहाँ और कैसे बनती हैं, यह जानने से गहरे महासागर की परतबंदी समझ में आती है।

तालिका 1. विश्व महासागर की तीन प्रमुख जल राशियाँ।
जल राशि कहाँ बनती है तापमान और लवणता किस गहराई पर
अंटार्कटिक तली जल वेडेल और रॉस सागर, एडेली तट के पास और केप डार्नली के निकट −0.8 से 2 °C; 34.6 से 35.0 ग्राम/किग्रा दक्षिणी महासागर से जुड़े बेसिनों में 4,000 मी से नीचे
उत्तरी अटलांटिक गहन जल उत्तरी अटलांटिक, जहाँ लवणीय सतही जल ठंडा होकर डूबता है 2.0 से 3.5 °C; 34.9 से 35.0 1,500 से 4,000 मी
अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल अंटार्कटिक अभिसरण क्षेत्र, 50° द और 60° द के बीच 3 से 7 °C; बनते समय 34.2 से 34.4 700 से 1,200 मी
  • अंटार्कटिक तली जल: महासागरों की सबसे घनी जल राशि। यह सतह के पास तटीय पॉलिन्या, अर्थात् समुद्री बर्फ़ के बीच के खुले भागों, में बनती है, जहाँ शीत ऋतु में बर्फ़ बनने से लवण नीचे के जल में रह जाता है; महाद्वीप से चलने वाली ठंडी पवनें बर्फ़ को दूर धकेलकर पॉलिन्या को खुला रखती हैं। सतह पर बनने के कारण यह ऑक्सीजन को नीचे ले जाती है और गहरे महासागर तक ऑक्सीजन पहुँचाती है।
  • उत्तरी अटलांटिक गहन जल: उत्तर की ओर बहता गर्म सतही जल वाष्पन से लवण पाता है, फिर उत्तरी अटलांटिक में ठंडा होकर डूब जाता है। इसकी पहचान ऊँची लवणता और ऑक्सीजन से होती है, और इसका डूबना उत्तरी अटलांटिक अपवाह को उत्तर की ओर खींचता है, जो अटलांटिक के व्युत्क्रमण परिसंचरण का भाग है।
  • अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल: यह असामान्य है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम लवणीय होते हुए भी डूबता है। यह अंटार्कटिक अभिसरण पर बनकर मध्यवर्ती गहराइयों पर उत्तर की ओर फैलता है, और अपनी न्यूनतम लवणता से पहचाना जाता है।
  • भूमध्यसागरीय बहिर्वाह: जिब्राल्टर से निकलता लवणीय जल जलसंधि पार करते समय तेज़ी से मिश्रित होता है और फिर गहराई में अटलांटिक में फैल जाता है।

मिलकर ये किसी महासागरीय बेसिन की परतबंदी समझाती हैं: सबसे ऊपर गर्म सतही जल, उसके नीचे मध्यवर्ती जल, उससे नीचे उत्तरी अटलांटिक गहन जल, और तली पर अंटार्कटिक तली जल। लवणीय भूमध्यसागरीय बहिर्वाह और जिब्राल्टर पर उसका दो-परतीय विनिमय सबसे अधिक लवणता वाला सागर लेख में समझाया गया है।

महासागर में मिश्रण: साल्ट फ़िंगरिंग और द्वि-विसरण

साल्ट फ़िंगरिंग और तापलवणीय सीढ़ियाँ

जल राशियाँ हमेशा अलग नहीं रहतीं; वे मिलती हैं, और उनके मिलने का एक तरीका सीधे लवणता पर निर्भर है। साल्ट फ़िंगरिंग (salt fingering) वहाँ होती है जहाँ अपेक्षाकृत गर्म और लवणीय जल ठंडे और कम लवणीय जल के ऊपर हो। जल में ऊष्मा लवण की तुलना में अधिक आसानी से फैलती है। इसलिए ठंडी परत में डूबने वाला गर्म, लवणीय जल का छोटा अंश अपना लवण खोने से पहले अपनी ऊष्मा खो देता है, आसपास के जल से भारी हो जाता है और डूबता चला जाता है; ऊपर धकेला गया ठंडा, मीठा अंश ऊष्मा पाकर हल्का होता है और ऊपर उठता चला जाता है।

परिणाम पतले, उँगली जैसे स्तंभों का एक प्रतिरूप है, जो लवण को नीचे ले जाते हैं। साल्ट फ़िंगरिंग द्वि-विसरण (double diffusion) का एक उदाहरण है, अर्थात् वह मिश्रण जो ऊष्मा और लवण के फैलने की अलग-अलग दरों से होता है। इससे तापलवणीय सीढ़ियाँ बन सकती हैं: कुछ मीटर मोटी, अच्छी तरह मिश्रित परतों की ऐसी शृंखला जो सैकड़ों किलोमीटर तक फैली हो, जैसे कैरेबियन सागर में। इस प्रक्रिया का पहला गणितीय वर्णन 1960 में मेल्विन स्टर्न ने किया था।

महासागरीय अग्रभाग और अभिसरण क्षेत्र

महासागरीय अग्रभाग, अंटार्कटिक अभिसरण और उत्प्रवाह: ये उत्पादक क्यों हैं

जहाँ दो जल राशियाँ मिलती हैं, उनके बीच की सीमा को महासागरीय अग्रभाग (ocean front) कहते हैं। अग्रभाग के दोनों ओर जल का तापमान, लवणता या घनत्व अलग होता है, और प्रायः उसका जीवन भी। अग्रभाग कुछ सौ मीटर जितने सँकरे या कई दसियों किलोमीटर जितने चौड़े हो सकते हैं; अधिकांश जल्दी बनते और मिटते हैं, पर कुछ लंबे समय तक बने रहते हैं।

शोध-यात्राओं के आँकड़ों पर टिकी पुरानी परिभाषा अग्रभागों को जल राशियों के बीच की स्थिर रेखाएँ मानती थी: दक्षिणी महासागर में उसने अंटार्कटिका को घेरने वाले पाँच निरंतर अग्रभाग पहचाने। अब उपग्रह समुद्र-सतह की ऊँचाई लगातार मापते हैं, जिससे अग्रभागों के साथ बहती प्रबल धाराएँ दिखती हैं। इस दृष्टि से दक्षिणी महासागर के अग्रभाग निरंतर वलय नहीं हैं, और उनकी स्थिति एल नीनो जैसी घटनाओं के साथ खिसकती है।

विश्व मानचित्र। अंटार्कटिक तली जल 1 वेडेल सागर, 2 रॉस सागर और 3 एडेली तट के पास बनता है। उत्तरी अटलांटिक का गहन जल 4 लैब्राडोर सागर, 5 ग्रीनलैंड सागर और 6 नॉर्वेजियन सागर में बनता है। 7 जिब्राल्टर जलसंधि भूमध्यसागरीय बहिर्वाह को, 8 कैरेबियन सागर तापलवणीय सीढ़ियों को, और 9 गल्फ स्ट्रीम एक गर्म धारा को दिखाते हैं। 48° और 61° दक्षिण के बीच की रंगी पट्टी अंटार्कटिका के चारों ओर अंटार्कटिक अभिसरण है।

सबसे प्रसिद्ध अग्रभाग अंटार्कटिक अभिसरण (Antarctic Convergence) है, जिसे अंटार्कटिक ध्रुवीय अग्रभाग भी कहते हैं: अंटार्कटिका को घेरने वाली वह पट्टी जहाँ उत्तर की ओर बहता ठंडा अंटार्कटिक जल उप-अंटार्कटिक के अपेक्षाकृत गर्म जल से मिलता है। यह लगभग 37 से 55 किमी चौड़ी है और लगभग 48° द से 61° द के बीच, ऋतु और देशांतर के साथ खिसकती रहती है। ठंडा अंटार्कटिक जल गर्म जल के नीचे डूबता है, और इस रेखा पर मिश्रण तथा उत्प्रवाह इसे समुद्री जीवन, विशेषकर अंटार्कटिक क्रिल, से भरपूर बनाते हैं। यह दो अलग जलवायु और जीवन वाले क्षेत्रों को भी बाँटती है।

ऐसे क्षेत्र इतने उत्पादक क्यों हैं, इसका उत्तर उत्प्रवाह में है। उत्प्रवाह (upwelling) में पवनें घने, ठंडे और प्रायः पोषक तत्वों से भरपूर जल को गहराई से सतह की ओर ले आती हैं, और पोषक तत्वों से खाली हो चुके गर्म सतही जल की जगह लेती हैं। गहरा जल नाइट्रेट, फ़ॉस्फ़ेट और सिलिसिक अम्ल से भरपूर होता है, जो ऊपर से डूबे मृत प्लवकों के अपघटन से मुक्त होते हैं। प्रकाश में आकर ये पोषक तत्व पादप प्लवकों को और उनके माध्यम से पूरी आहार-शृंखला को पोषण देते हैं।

  • छोटा क्षेत्र, बड़ी पकड़: विश्व की समुद्री मछली-पकड़ का लगभग एक-चौथाई भाग पाँच उत्प्रवाह क्षेत्रों से आता है, जो महासागर का केवल 5 प्रतिशत घेरते हैं।
  • आसानी से पहचान: उपग्रह चित्रों में उत्प्रवाह क्षेत्र ठंडे समुद्री सतह तापमान और क्लोरोफ़िल की ऊँची सांद्रता से पहचाने जाते हैं।
  • धाराओं का मिश्रण: जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ मिश्रण ऑक्सीजन की पूर्ति करता है और मछलियों के प्राथमिक भोजन, प्लवकों, की वृद्धि में सहायक होता है; विश्व के सर्वोत्तम मत्स्य-क्षेत्र मुख्यतः इन्हीं मिश्रण क्षेत्रों में हैं।

महासागरीय धाराएँ और जल राशियाँ: समुद्री जीवन और तटीय पर्यावरण पर प्रभाव

महासागर धाराएँ और जल राशियाँ अपने प्रभावों में कैसे भिन्न हैं

महासागर धाराएँ और जल राशियाँ आपस में जुड़ी हैं, पर एक नहीं हैं। धारा किसी मार्ग पर गतिमान जल है, और उसके प्रभाव मुख्यतः सतह पर और तटों के साथ दिखते हैं। जल राशि अपने गुणों से परिभाषित जल-पिंड है, और उसके प्रभाव मुख्यतः गहराई में दिखते हैं, जहाँ वह अपने जन्म-स्थान का तापमान, लवणता और ऑक्सीजन पूरे बेसिनों तक ले जाती है। इसीलिए समुद्री जीवन और तटों पर उनके प्रभाव अलग हैं।

तालिका 2. महासागर धाराओं और जल राशियों की तुलना।
तुलना का आधार महासागर धाराएँ जल राशियाँ
क्या हैं निश्चित मार्गों पर जल की क्षैतिज गति अपने तापमान, लवणता और अनुरेखकों वाले जल-पिंड
तटों की जलवायु उष्ण और उपोष्ण अक्षांशों में ठंडी धाराओं वाले पश्चिमी तट ठंडे, कोहरे वाले और शुष्क; उच्च अक्षांशों में गर्म धाराओं वाले पश्चिमी तटों पर हल्की सर्दियाँ और ठंडी गर्मियाँ तटीय वायु पर सीधा प्रभाव कम; प्रभाव सागर की परतबंदी के माध्यम से
समुद्री जीवन गर्म और ठंडी धाराओं के मिलन पर ऑक्सीजन की पूर्ति और प्लवकों की वृद्धि, जिससे समृद्ध मत्स्य-क्षेत्र अंटार्कटिक तली जल जैसी गहरी जल राशियाँ ऑक्सीजन को गहराई तक ले जाती हैं; जल राशियों के बीच के अग्रभाग उत्पादक
उदाहरण पश्चिमी यूरोप को गर्म करती गल्फ स्ट्रीम; उत्तर-पूर्वी उत्तरी अमेरिका को ठंडा करती लैब्राडोर धारा महासागर की तली पर अंटार्कटिक तली जल; 1,500 से 4,000 मी पर उत्तरी अटलांटिक गहन जल

दोनों अग्रभागों और उत्प्रवाह क्षेत्रों में मिलती हैं। धारा दो जल राशियों को आमने-सामने ला सकती है, और जहाँ वह तट से सतही जल को दूर ले जाती है, वहाँ नीचे से गहरा, पोषक तत्वों से भरपूर जल ऊपर खींच लाती है। इसीलिए सबसे उत्पादक सागर वहीं हैं जहाँ धाराएँ और जल राशियाँ परस्पर क्रिया करती हैं, और दोनों अपने निकट के तटों के मत्स्य-उद्योग तथा जलवायु को आकार देती हैं। भारत के अपने सागर, जहाँ मानसून धाराओं की दिशा पलट देता है, हिंद महासागर की लवणता लेख में समझाए गए हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2024, सामान्य अध्ययन-Iसमुद्री सतह के तापमान में वृद्धि क्या है? यह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण को कैसे प्रभावित करता है?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: स्पष्ट कीजिए · दृष्टिकोण: पहले आँकड़ों सहित समुद्री सतह के तापमान और उसमें वृद्धि को परिभाषित करें, फिर चक्रवात बनने की प्रक्रिया क्रम से समझाएँ, और अंत में बताएँ कि गर्म जल की गहराई सतह जितनी ही महत्त्वपूर्ण क्यों है।

    भूमिका: समुद्री सतह के तापमान को महासागर की ऊपरी परत के तापमान के रूप में परिभाषित करें, और उसकी वृद्धि को 1850-1900 से लगभग 0.88 °C की तापवृद्धि के रूप में, जिसका अधिकांश 1980 के बाद हुआ, क्योंकि वैश्विक तापन की अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत महासागर सोखता है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • सीमा: उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को लगभग 50 मीटर तक कम से कम 26.5 °C का जल चाहिए।
    • प्रक्रिया: गर्म जल से वाष्पन, नम वायु का ऊपर उठना, संघनन से निकली ऊष्मा गर्म केंद्र को शक्ति देती है।
    • बढ़ता तापमान: अधिक ऊष्मा और नमी, इसलिए तूफ़ान अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं; ठंडे जल पर वे गर्म केंद्र खो देते हैं।
    • गहराई: चक्रवात ऊपरी 30 मीटर को मथकर ठंडी पट्टी छोड़ते हैं; गहरी गर्म परत (अधिक ऊष्मा-मात्रा) उन्हें ईंधन देती है, इसीलिए हिंद महासागर में तीव्रता का बेहतर संकेतक ऊष्मा-मात्रा है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि गर्म होता महासागर चक्रवातों को अधिक ऊर्जा देता है, इसलिए पूर्वानुमान में केवल सतह नहीं, ऊपरी महासागर में संचित ऊष्मा पर भी नज़र रखनी होगी।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-Iमहासागर धाराएँ और जल राशियाँ समुद्री जीवन और तटीय पर्यावरण पर अपने प्रभावों में किस-किस प्रकार परस्पर भिन्न हैं? उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: भिन्नता बताइए, उदाहरण सहित · दृष्टिकोण: दोनों को परिभाषित करें, फिर समुद्री जीवन और तटीय पर्यावरण पर उनके प्रभावों की तुलना अलग-अलग शीर्षकों में करें, हर बिंदु के साथ एक नामित उदाहरण देकर।

    भूमिका: धारा, अर्थात् निश्चित मार्ग पर बहता जल, और जल राशि, अर्थात् बनने के स्थान पर तय हुए अपने तापमान, लवणता और अनुरेखकों वाला जल-पिंड, का अंतर स्पष्ट करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • धाराएँ और तट: उष्ण अक्षांशों में ठंडी धाराओं वाले ठंडे, कोहरे वाले, शुष्क पश्चिमी तट; उच्च अक्षांशों में गर्म धाराओं वाली हल्की समुद्री जलवायु; गल्फ स्ट्रीम और पश्चिमी यूरोप, लैब्राडोर धारा और उत्तर-पूर्वी उत्तरी अमेरिका।
    • धाराएँ और समुद्री जीवन: गर्म और ठंडी धाराओं के मिलन से ऑक्सीजन और प्लवकों की पूर्ति, जिससे सबसे समृद्ध मत्स्य-क्षेत्र; तटीय उत्प्रवाह पोषक तत्व लाता है।
    • जल राशियाँ और समुद्री जीवन: अंटार्कटिक तली जल गहरे महासागर तक ऑक्सीजन ले जाता है; अंटार्कटिक अभिसरण जैसे अग्रभाग क्रिल से भरपूर हैं।
    • जल राशियाँ और तट: ये मुख्यतः सागर की परतबंदी के माध्यम से काम करती हैं; जहाँ धाराएँ गहरा जल ऊपर खींचती हैं, वहाँ पोषक तत्वों से भरपूर जल सतह पर आता है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि धाराएँ मुख्यतः सतह और तटों पर, जल राशियाँ मुख्यतः गहराई में काम करती हैं, और सबसे उत्पादक सागर वहीं हैं जहाँ दोनों परस्पर क्रिया करती हैं।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)पारितंत्र उत्पादकता के संदर्भ में, समुद्री उत्प्रवाह क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे समुद्री उत्पादकता बढ़ाते हैं, सतह पर लाकर
    1. अपघटक सूक्ष्मजीवों को
    2. पोषक तत्वों को
    3. तली में रहने वाले जीवों को

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a 1 और 2
    2. b केवल 2
    3. c 2 और 3
    4. d केवल 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: उत्प्रवाह गहरे जल को सतह पर लाता है। चरण 2: गहरा जल सड़ते प्लवकों से मुक्त पोषक तत्वों से भरपूर होता है, और ये पोषक तत्व पादप प्लवकों को पोषण देते हैं, इसलिए कथन 2 सही है। चरण 3: उत्पादकता पोषक तत्व बढ़ाते हैं, अपघटक या तली के जीव नहीं, इसलिए कथन 1 और 3 कारण नहीं हैं। चरण 4: केवल 2।

    इस भ्रम से बचें: गहराई में पोषक तत्व अपघटक ही बनाते हैं, इसलिए कथन 1 सही लगता है, पर उत्प्रवाह ऊपर पोषक तत्वों को लाता है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 1 और 2: गलत। कथन 1 उत्पादकता बढ़ने का कारण नहीं है; कारण पोषक तत्व हैं।
    • (b) केवल 2: सही। उत्प्रवाह वाला जल पादप प्लवकों को पोषण देने वाले पोषक तत्व लाता है।
    • (c) 2 और 3: गलत। उत्प्रवाह तली के जीवों को सतह पर नहीं लाता।
    • (d) केवल 3: गलत। यह पोषक तत्वों को छोड़ देता है, जो वास्तविक कारण हैं।

    उत्तर: केवल 2: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि उत्प्रवाह पोषक तत्वों को सतह पर लाकर उत्पादकता बढ़ाता है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।