परिचय
मौलिक अधिकार (संविधान की शब्दावली में मूल अधिकार) संविधान के भाग III, अनुच्छेद 12 से 35, में दिए वे अधिकार हैं जिनकी गारंटी स्वयं संविधान देता है और जिन्हें न्यायालय लागू कराते हैं। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार आज छह हैं: समता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, और संवैधानिक उपचारों का अधिकार। अनुच्छेद 12 बताता है कि ये किन पर लागू होते हैं, और अनुच्छेद 13 इन्हें छीनने वाली हर विधि को शून्य करता है।
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार: अर्थ और उद्भव
मौलिक अधिकार क्या हैं और इन्हें मौलिक क्यों कहा जाता है
संविधान का भाग III, अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक, उन अधिकारों की सूची देता है जिनकी गारंटी स्वयं संविधान भारत के लोगों को देता है। संविधान निर्माताओं ने इसकी प्रेरणा संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकार-पत्र से ली थी, और भाग III को अक्सर भारत का मैग्ना कार्टा कहा जाता है। न्यायालय में लागू कराए जा सकने वाले अधिकारों की ऐसी लंबी और विस्तृत सूची किसी अन्य देश के संविधान में नहीं है, अमेरिका के संविधान में भी नहीं।
इन्हें मौलिक कहने के दो कारण हैं। पहला, इनकी गारंटी और संरक्षण संविधान देता है, जो देश की मूल विधि है। दूसरा, ये व्यक्ति के भौतिक, बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक, अर्थात् सर्वांगीण विकास के लिए सबसे आवश्यक हैं। इनका लक्ष्य वह शासन है जिसे व्यक्तियों का नहीं, विधियों का शासन कहा गया है, जिसमें सत्ता में बैठे लोग अपनी इच्छा मात्र से किसी की स्वतंत्रता नहीं छीन सकते।
साधारण विधिक अधिकार और मौलिक अधिकार में अंतर इस बात का है कि उन्हें बदला कैसे जा सकता है। साधारण अधिकार साधारण विधि से बनता है, इसलिए विधानमंडल उसे विधि-निर्माण की सामान्य प्रक्रिया से बदल सकता है। मौलिक अधिकार केवल संविधान संशोधन से बदला जा सकता है, और सरकार का कोई भी अंग उसके विरुद्ध काम नहीं कर सकता। विधायिका या कार्यपालिका का कोई कार्य किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करे या उस पर अनुचित प्रतिबंध लगाए, तो न्यायालय उसे अवैध घोषित कर सकते हैं।
मौलिक अधिकारों का उद्भव: स्वराज विधेयक से संविधान सभा तक
लिखित अधिकारों की माँग राष्ट्रीय आंदोलन के साथ बढ़ी। 1895 के स्वराज विधेयक में, जिसका औपचारिक नाम भारत का संविधान विधेयक था, वाक्-स्वतंत्रता, निजता और मताधिकार की बात थी। 1919 के रॉलेट अधिनियम ने अनिश्चित काल तक नज़रबंदी और सेंसरशिप की छूट दी, तो यह माँग गारंटीशुदा नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए जन-अभियान बन गई।
- नेहरू रिपोर्ट, 1928: मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में सर्वदलीय सम्मेलन ने डोमिनियन दर्जा, मौलिक अधिकारों की सूची, और अल्पसंख्यकों के लिए स्थानों के आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचन की माँग की।
- कराची अधिवेशन, 1931: कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रम पर प्रस्ताव पारित किया, जिसमें नागरिक अधिकारों के साथ न्यूनतम मज़दूरी, छुआछूत और बेगार की समाप्ति जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की प्रतिबद्धता थी।
- संविधान सभा: मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय तथा अपवर्जित क्षेत्रों संबंधी सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल थे, और उसकी मौलिक अधिकार उप-समिति के अध्यक्ष जे. बी. कृपलानी।
- मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे 10 दिसंबर 1948 को अपनाया, जब संविधान सभा का काम चल रहा था; मौलिक अधिकार फ़रवरी 1948 के पहले प्रारूप में ही आ चुके थे।
भाग III का निर्माण संविधान सभा और उसकी समितियों की बड़ी कथा का हिस्सा है। मौलिक अधिकार फ़रवरी 1948 के पहले प्रारूप और अक्टूबर 1948 के दूसरे प्रारूप से होते हुए 26 नवंबर 1949 को अपनाए गए अंतिम पाठ तक पहुँचे।
मौलिक अधिकारों की सूची अनुच्छेदों सहित
भाग III के छह मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 14 से 32
मूल संविधान में मौलिक अधिकारों के सात समूह थे। आज छह हैं, क्योंकि 1978 में संपत्ति का अधिकार भाग III से निकाल दिया गया। हर समूह कुछ अनुच्छेदों में फैला है; पहले समूह के अनुच्छेद समानता का अधिकार, अनुच्छेद 14 से 18 वाले पृष्ठ पर विस्तार से समझाए गए हैं।
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद | क्या आता है |
|---|---|---|
| समता का अधिकार | 14 से 18 | विधि के समक्ष समता, विभेद का निषेध, लोक नियोजन में अवसर की समता, अस्पृश्यता और उपाधियों का अंत |
| स्वतंत्रता का अधिकार | 19 से 22 | नागरिकों की छह स्वतंत्रताएँ, दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण, प्राण और दैहिक स्वतंत्रता, प्रारंभिक शिक्षा, गिरफ़्तारी से संरक्षण |
| शोषण के विरुद्ध अधिकार | 23 और 24 | मानव दुर्व्यापार और बेगार पर रोक; कारख़ानों और जोखिम वाले कामों में बच्चों से काम पर रोक |
| धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | 25 से 28 | अंतःकरण और धर्म, धार्मिक कार्यों का प्रबंध, किसी धर्म के लिए कर नहीं, धार्मिक शिक्षा |
| सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार | 29 और 30 | अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति; अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाएँ |
| संवैधानिक उपचारों का अधिकार | 32 | उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार, जो अधिकार लागू कराने के लिए रिट जारी करता है |
प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार, अनुच्छेद 21क, बाद में जोड़ा गया। 2002 के 86वें संशोधन अधिनियम ने प्रारंभिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया और भाग IV के अनुच्छेद 45 को प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख की ओर मोड़ दिया। अनुच्छेद 32 वह अधिकार है जो बाक़ी सबको शक्ति देता है: बी. आर. आंबेडकर ने इसे संविधान का हृदय और आत्मा कहा, और उच्चतम न्यायालय की रिट अधिकारिता इसी का व्यवहार में रूप है।
संपत्ति का अधिकार: मौलिक अधिकार से अनुच्छेद 300क तक
संपत्ति का अधिकार भाग III में दो रूपों में था: अनुच्छेद 19(1)(च), जो नागरिकों को संपत्ति अर्जित करने, रखने और बेचने का अधिकार देता था, और अनुच्छेद 31, जो हर व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित न किए जाने का संरक्षण देता था। संसद और उच्चतम न्यायालय के बीच सबसे अधिक टकराव इसी अधिकार पर हुआ, मुख्यतः उस मुआवज़े को लेकर जो राज्य को भूमि अर्जित करने पर देना था।
1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने, जिसे मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार लाई थी, दोनों उपबंध हटा दिए। उसने भाग XII में अनुच्छेद 300क जोड़ा, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। संपत्ति अब संवैधानिक या विधिक अधिकार है, जो केवल नागरिकों को नहीं, हर व्यक्ति को उपलब्ध है, पर यह मौलिक अधिकार नहीं रहा।
- संसद साधारण विधि से इसे विनियमित कर सकती है; संविधान संशोधन की ज़रूरत नहीं।
- यह संपत्ति को कार्यपालिका की कार्रवाई से बचाता है, विधायिका की कार्रवाई से नहीं।
- संपत्ति छिनने पर व्यक्ति अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय नहीं जा सकता, यद्यपि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय जा सकता है।
- राज्य निजी संपत्ति अर्जित करे तो मुआवज़े का कोई गारंटीशुदा अधिकार नहीं है।
मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ
मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ: न्यायोचित, सीमित और संशोधनीय
मौलिक अधिकारों की कुछ साझी विशेषताएँ हैं, जो बताती हैं कि वे न्यायालय में कैसे काम करते हैं और उन्हें कितना सीमित किया जा सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि वे असीमित नहीं हैं: राज्य उन पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है, और निर्बंधन युक्तियुक्त है या नहीं, यह न्यायालय तय करते हैं। इस तरह ये अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाते हैं।
- कुछ केवल नागरिकों को मिलते हैं; बाक़ी सभी व्यक्तियों को, विदेशियों और कंपनियों जैसे विधिक व्यक्तियों को भी।
- अधिकतर व्यक्ति को राज्य से बचाते हैं; अनुच्छेद 15(2), 17 और 23 जैसे कुछ निजी व्यक्तियों पर भी लागू होते हैं।
- कुछ नकारात्मक हैं, जो राज्य को रोकते हैं; कुछ सकारात्मक, जो व्यक्ति को विशेषाधिकार देते हैं।
- ये न्यायोचित हैं, और इनकी गारंटी उच्चतम न्यायालय देता है, जहाँ सीधे जाया जा सकता है।
- इन्हें केवल संविधान संशोधन से घटाया जा सकता है, साधारण विधि से कभी नहीं, और मूल ढाँचे को क्षति पहुँचाकर कभी नहीं।
- राष्ट्रीय आपात में इन्हें निलंबित किया जा सकता है, अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर।
- अधिकतर स्वतः लागू होते हैं; कुछ को प्रभावी बनाने के लिए विधि चाहिए, और अनुच्छेद 35 वह विधि बनाने का अधिकार संसद को देता है।
संशोधन वाली बात आगे अनुच्छेद 13 के अंतर्गत आए लंबे संघर्ष का विषय है। आपात वाली बात के अपने नियम हैं, क्योंकि संविधान अनुच्छेद 19 को बाक़ी अधिकारों से अलग ढंग से देखता है।
विदेशियों को उपलब्ध मौलिक अधिकार और केवल नागरिकों के अधिकार
पाँच अधिकार केवल भारत के नागरिकों के हैं। बाक़ी अधिकार भारत के राज्यक्षेत्र में हर व्यक्ति को मिलते हैं, नागरिक हो या विदेशी, शत्रु विदेशी को छोड़कर। यह विभाजन अधिकार के स्वभाव पर टिका है: लोक नियोजन या भारत में कहीं भी बसने जैसे अधिकार, जो राजनीतिक समुदाय की सदस्यता से जुड़े हैं, नागरिकों को मिलते हैं; जीवन और स्वतंत्रता जैसे अधिकार, जो हर मनुष्य की रक्षा करते हैं, सबको।
| केवल नागरिकों को | सभी व्यक्तियों को (शत्रु विदेशी को छोड़कर) |
|---|---|
| अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का निषेध | अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण |
| अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समता | अनुच्छेद 20, 21 और 21क: दोषसिद्धि में संरक्षण, प्राण और दैहिक स्वतंत्रता, प्रारंभिक शिक्षा |
| अनुच्छेद 19: वाक्, सम्मेलन, संगम, संचरण, निवास और वृत्ति की छह स्वतंत्रताएँ | अनुच्छेद 22, 23 और 24: गिरफ़्तारी में संरक्षण, और दुर्व्यापार, बेगार तथा बाल श्रम से संरक्षण |
| अनुच्छेद 29 और 30: अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार | अनुच्छेद 25 से 28: धार्मिक स्वतंत्रता |
नागरिकों के अधिकार इस पर निर्भर हैं कि नागरिक कौन है, जो भाग II और उस विधि से तय होता है जिसका विवरण भारत में नागरिकता वाले पृष्ठ पर है।
आपात के दौरान मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 358 और 359
राष्ट्रीय आपात मौलिक अधिकारों पर दो अलग तरह से असर डालता है, और 1975 से 1977 के आपातकाल के बाद 44वें संशोधन ने दोनों को सीमित किया। आपात में अधिकार निलंबित करने का विचार जर्मनी के वाइमर संविधान से आया।
| बिंदु | अनुच्छेद 358 | अनुच्छेद 359 |
|---|---|---|
| क्या होता है | अनुच्छेद 19 राज्य पर रोक नहीं रहता, इसलिए विधि और कार्यपालिका की कार्रवाई छह स्वतंत्रताओं को सीमित कर सकती है | राष्ट्रपति आदेश द्वारा, आदेश में नामित अधिकारों को लागू कराने के लिए किसी न्यायालय में जाने का अधिकार निलंबित कर सकता है |
| कब | केवल जब आपात युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित हो | किसी भी आपात की उद्घोषणा के दौरान |
| कौन-से अधिकार | केवल अनुच्छेद 19 पर लागू | अनुच्छेद 20 और 21 आदेश में कभी नामित नहीं किए जा सकते |
| सीमा | केवल वे विधियाँ जिनमें आपात से संबंध का उल्लेख हो | केवल वे विधियाँ जिनमें आपात से संबंध का उल्लेख हो |
अनुच्छेद 20 और 21 का संरक्षण 1975 का सबक है। 20 जून 1979 को 44वाँ संशोधन लागू होने के बाद से, प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार और दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण राष्ट्रीय आपात में भी लागू रहते हैं। ये शक्तियाँ राष्ट्रपति की आपात शक्तियों वाले पृष्ठ पर समझाई गई हैं।
मौलिक अधिकारों की सीमाएँ: अनुच्छेद 31क से 31ग और 33 से 35
कई उपबंध भाग III की पहुँच सीमित करते हैं। तीन व्यावृत्ति खंड कुछ विधियों को बचाते हैं, और तीन अनुच्छेद संसद को विशेष परिस्थितियों के लिए अधिकारों में बदलाव की छूट देते हैं।
- अनुच्छेद 31क: संपदाओं के अर्जन आदि के लिए बनी विधियों को बचाता है।
- अनुच्छेद 31ख: नौवीं अनुसूची में रखे अधिनियमों और विनियमों को विधिमान्य करता है।
- अनुच्छेद 31ग: कुछ निदेशक तत्त्वों को लागू करने वाली विधियों को बचाता है।
- अनुच्छेद 33: संसद को सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस और गुप्तचर संस्थाओं के अधिकार सीमित या समाप्त करने देता है।
- अनुच्छेद 34: किसी क्षेत्र में सेना विधि (मार्शल लॉ) लागू रहने पर निर्बंधन की अनुमति देता है, जो राष्ट्रीय आपात से भिन्न है।
- अनुच्छेद 35: कुछ अधिकारों को प्रभावी बनाने वाली विधियाँ बनाने का अधिकार राज्य विधानमंडलों को नहीं, संसद को देता है, ताकि वे पूरे भारत में एक जैसी हों।
अनुच्छेद 31ख सबसे व्यापक व्यावृत्ति खंड है, क्योंकि यह नौवीं अनुसूची में रखी विधि को हर मौलिक अधिकार से बचाता है। जनवरी 2007 में आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसी कोई पूर्ण छूट नहीं हो सकती: 24 अप्रैल 1973, अर्थात् केशवानंद भारती निर्णय की तिथि, के बाद नौवीं अनुसूची में जोड़ी गई विधियों को चुनौती दी जा सकती है, यदि वे अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 या मूल ढाँचे का उल्लंघन करती हों।
अनुच्छेद 12: राज्य की परिभाषा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12: राज्य किसे माना जाता है
अधिकतर मौलिक अधिकार राज्य के विरुद्ध दावे हैं, इसलिए भाग III को बताना पड़ता है कि राज्य कौन है। अनुच्छेद 12 भाग III और IV के लिए यह काम करता है: जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, राज्य में भारत की सरकार और संसद, प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल, तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण में सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी शामिल हैं।
- संघ की कार्यपालिका और विधायिका, अर्थात् भारत की सरकार और संसद।
- प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका और विधायिका।
- स्थानीय प्राधिकारी, जैसे नगरपालिकाएँ, पंचायतें, ज़िला बोर्ड और सुधार न्यास।
- अन्य प्राधिकारी, अर्थात् एलआईसी, ओएनजीसी और सेल जैसी सांविधिक या गैर-सांविधिक संस्थाएँ।
यह परिभाषा जान-बूझकर व्यापक रखी गई है। अधिकतर अधिकारों के लिए केवल राज्य, या राज्य माने जाने वाली किसी संस्था, के कार्य को ही मौलिक अधिकार के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी जा सकती है। अनुच्छेद 13(2) भी यही परिभाषा लेता है, जब वह राज्य को अधिकार छीनने वाली विधि बनाने से रोकता है।
अनुच्छेद 12 में अन्य प्राधिकारी: सजातीयता के नियम से साधन परीक्षण तक
"अन्य प्राधिकारी" शब्दों का अर्थ समय के साथ फैलता गया। न्यायालयों ने पहले इसे संकीर्ण पढ़ा, फिर हर सांविधिक निकाय को इसमें लिया, और अंत में यह पूछा कि क्या कोई संस्था सार रूप में सरकार की ही भुजा है।
- मद्रास विश्वविद्यालय बनाम शांता बाई (1954): मद्रास उच्च न्यायालय ने सजातीयता का नियम (एजुस्डेम जेनेरिस) लगाया और माना कि अन्य प्राधिकारी पहले गिनाई गई सरकारों और विधानमंडलों जैसे होने चाहिए, इसलिए विश्वविद्यालय राज्य नहीं था।
- राजस्थान राज्य विद्युत बोर्ड बनाम मोहन लाल (1967): उच्चतम न्यायालय ने यह नियम नकारा और कहा कि विधि से बना और शक्तियाँ प्राप्त हर निकाय अन्य प्राधिकारी है, उसका काम संप्रभु हो या वाणिज्यिक।
- सुखदेव सिंह बनाम भगतराम (1975): एलआईसी, ओएनजीसी और औद्योगिक वित्त निगम जैसे सांविधिक निगम राज्य हैं, क्योंकि वे अपने कर्मचारियों के लिए बाध्यकारी नियम बनाते हैं।
- रमना दयाराम शेट्टी बनाम अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण (1979): न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती ने साधन या अभिकरण परीक्षण दिया, जिसके अनुसार पंजीकृत सोसाइटी या सरकारी कंपनी भी राज्य है, यदि वह सरकार का अभिकरण हो।
साधन परीक्षण कई संकेतकों को देखता है, जिनमें से कोई अकेला निर्णायक नहीं: क्या पूँजी राज्य देता है, क्या उस पर राज्य का गहरा और व्यापक नियंत्रण है, क्या उसके कार्य लोक महत्त्व के या शासकीय स्वभाव के हैं, क्या कोई सरकारी विभाग उसे सौंपा गया, और क्या उसे राज्य से मिला या राज्य द्वारा संरक्षित एकाधिकार प्राप्त है।
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड इस परीक्षण का उदाहरण है। उच्चतम न्यायालय ने ज़ी टेलीफ़िल्म्स (2005) मामले में कहा कि बीसीसीआई राज्य नहीं है: वह स्वायत्त है, सरकार पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं, और उस पर गहरा तथा व्यापक नियंत्रण नहीं है। राष्ट्रीय टीम चुनने का लोक कर्तव्य निभाने के कारण वह अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों के प्रति उत्तरदायी है, पर उसके विरुद्ध अनुच्छेद 32 में याचिका नहीं दी जा सकती।
अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों से असंगत विधियाँ
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13: पुरानी विधियाँ, नई विधियाँ और न्यायिक पुनर्विलोकन
अनुच्छेद 13 मौलिक अधिकारों को साधारण विधि से ऊपर रखता है। वह संविधान के आरंभ के समय लागू विधियों और उसके बाद बनी विधियों को अलग-अलग देखता है, और संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति का सबसे स्पष्ट कथन यही है।
- अनुच्छेद 13(1): 26 जनवरी 1950 से पहले लागू विधियाँ भाग III से असंगति की मात्रा तक शून्य हैं।
- अनुच्छेद 13(2): राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इन अधिकारों को छीने या न्यून करे; इसका उल्लंघन करने वाली विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य है।
- अनुच्छेद 13(3): इस अनुच्छेद के लिए “विधि” और “प्रवृत्त विधि” की परिभाषा देता है।
- अनुच्छेद 13(4): 1971 के 24वें संशोधन से जोड़ा गया; कहता है कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किए गए संशोधन पर अनुच्छेद 13 की कोई बात लागू नहीं होगी।
अनुच्छेद 13 के अंतर्गत किसी विधि को शून्य घोषित करने की शक्ति अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की है। इसीलिए भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन अनुच्छेद 13 के साथ अनुच्छेद 32 और 226 पर टिका है।
अनुच्छेद 13(3) में विधि: अध्यादेश, नियम, उपविधि और रूढ़ि
अनुच्छेद 13(3)(क) विधि शब्द को व्यापक अर्थ देता है, ताकि किसी दूसरे साधन से काम लेकर अधिकारों से बचा न जा सके। इनमें से कोई भी, मौलिक अधिकार का उल्लंघन करे तो, रद्द किया जा सकता है।
- संसद या राज्य विधानमंडलों की बनाई स्थायी विधियाँ।
- अस्थायी विधियाँ, अर्थात् राष्ट्रपति या राज्यपालों के अध्यादेश।
- प्रत्यायोजित विधान, जैसे आदेश, उपविधियाँ, नियम, विनियम और अधिसूचनाएँ।
- विधि का बल रखने वाली रूढ़ि या प्रथा।
अध्यादेश से इसका महत्त्व समझ आता है। अध्यादेश को संसद के अधिनियम जैसा बल प्राप्त है: वह किसी अधिनियम को संशोधित या निरस्त कर सकता है और, किसी अन्य विधि की तरह, पिछली तिथि से लागू हो सकता है। पर अनुच्छेद 13 के अंतर्गत वह विधि है, इसलिए उस पर अधिनियम वाली ही सीमाएँ हैं, और वह किसी मौलिक अधिकार को न छीन सकता है, न न्यून कर सकता है।
आच्छादन का सिद्धांत और पृथक्करणीयता का सिद्धांत
"असंगति की मात्रा तक शून्य" का व्यवहार में अर्थ दो सिद्धांत समझाते हैं। दोनों अनुच्छेद 13 के शब्दों से ही निकलते हैं।
आच्छादन का सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ एक्लिप्स) संविधान से पहले लागू विधियों पर लागू होता है। मौलिक अधिकार से टकराने वाली संविधान-पूर्व विधि मिटती नहीं; उसका असंगत भाग अधिकार की छाया में आ जाता है और निष्प्रभावी हो जाता है। यदि बाद में संविधान संशोधित होकर टकराव ख़त्म कर दे, तो छाया हट जाती है और विधि फिर लागू हो जाती है। संविधान के बाद बनी विधि अलग है: भाग III का उल्लंघन करने वाली ऐसी विधि आरंभ से ही शून्य है, इसलिए संशोधन के पास उसे जीवित करने को कुछ बचता नहीं।
पृथक्करणीयता का सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ सेवरेबिलिटी) "की मात्रा तक" शब्दों से निकलता है। यदि विधि का केवल एक भाग भाग III से असंगत हो और उसे बाक़ी से अलग किया जा सके, तो न्यायालय केवल असंगत भाग रद्द करता है और शेष को बने रहने देता है। पूरी विधि तभी गिरती है जब दोषपूर्ण भाग अलग न किया जा सके।
क्या संविधान संशोधन विधि है? अनुच्छेद 13(4) और मूल ढाँचा
अनुच्छेद 13 के अंतर्गत सबसे कठिन प्रश्न यह था कि क्या संसद मौलिक अधिकारों को ही संशोधित कर सकती है। यदि संशोधन विधि है, तो अनुच्छेद 13(2) किसी अधिकार को न्यून करने वाले हर संशोधन को शून्य कर देगा। स्थिर होने से पहले उच्चतम न्यायालय ने इसका उत्तर तीन अलग ढंग से दिया।
- शंकरी प्रसाद (1951): पहले संशोधन को बनाए रखते हुए न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 13 में विधि का अर्थ केवल साधारण विधि है, इसलिए संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
- गोलकनाथ (1967): न्यायालय ने अपना मत पलटा, अधिकारों को सर्वोपरि और अपरिवर्तनीय स्थान दिया, और कहा कि संशोधन अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधि है और अधिकार न्यून करे तो शून्य है।
- 24वाँ संशोधन (1971): संसद ने अनुच्छेद 13(4) जोड़ा और अनुच्छेद 368 बदलकर घोषित किया कि संशोधन अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधि नहीं है।
- केशवानंद भारती (1973): न्यायालय ने 24वें संशोधन को बनाए रखा, पर कहा कि संसद मूल ढाँचा नहीं बदल सकती, इसलिए मूल ढाँचे का हिस्सा बने अधिकार को छीना नहीं जा सकता।
- 42वाँ संशोधन (1976): संसद ने अनुच्छेद 368 फिर बदला और घोषित किया कि उसकी संविधायी शक्ति पर कोई सीमा नहीं और किसी संशोधन पर किसी न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
- मिनर्वा मिल्स (1980): न्यायालय ने 42वें संशोधन के वे खंड रद्द किए जो संशोधनों को पुनर्विलोकन से बाहर करना चाहते थे, और न्यायिक पुनर्विलोकन को ही मूल ढाँचे का हिस्सा माना।
इस सिद्धांत के आलोचक भी हैं। संविधान अपने बुनियादी अभिलक्षणों की सूची नहीं देता, न्यायालयों ने भी उन्हें कभी पूरी तरह परिभाषित नहीं किया, और क्या इसमें आता है यह केवल न्यायपालिका तय करती है; इसलिए आलोचकों को इसमें अनिर्वाचित न्यायाधीश निर्वाचित संसद की सीमा तय करते दिखते हैं। मिनर्वा मिल्स में न्यायालय का उत्तर था कि सीमित संशोधन शक्ति स्वयं एक बुनियादी अभिलक्षण है: सीमित शक्ति पाने वाला उस शक्ति का प्रयोग करके उसे असीमित नहीं बना सकता।
परिणाम यह है कि अनुच्छेद 13(4) वैध है, पर संशोधनों को अब भी मूल ढाँचे की कसौटी पर परखा जाता है। यह सिद्धांत न्यायिक पुनर्विलोकन और मूल ढाँचा वाले पृष्ठ पर विस्तार से है।
मौलिक अधिकारों का महत्त्व और आलोचना
भारतीय लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों का महत्त्व
मौलिक अधिकार भारत में लोकतंत्र की आधारशिला हैं। वे व्यक्ति को उस समय के बहुमत से बचाते हैं, अल्पसंख्यकों और कमज़ोर वर्गों की रक्षा करते हैं, और सामाजिक समता तथा सामाजिक न्याय की नींव रखते हैं। सरकार की शक्ति सीमित करके वे विधि के शासन को केवल कागज़ी नहीं, वास्तविक बनाते हैं।
- वे व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के मज़बूत रक्षक हैं।
- वे राज्य के पंथनिरपेक्ष स्वरूप को मज़बूत करते हैं और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करते हैं।
- वे सरकार के किसी भी निरंकुश सत्ता के दावे पर अंकुश लगाते हैं।
- वे लोगों को राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रिया में विश्वास के साथ भाग लेने देते हैं।
मौलिक अधिकारों की आलोचना: निर्बंधन, आपात और अस्पष्टता
आलोचकों ने भाग III में कई कमज़ोरियाँ बताई हैं। इनमें से अधिकतर इस बात से जुड़ी हैं कि अधिकारों को कितनी दूर तक सीमित किया जा सकता है।
- अत्यधिक निर्बंधन: इतने अपवाद अधिकारों को घेरते हैं कि जसपत राय कपूर ने अध्याय का नाम मौलिक अधिकारों पर निर्बंधन रखने का सुझाव दिया।
- सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं: सूची मुख्यतः राजनीतिक है; काम, सामाजिक सुरक्षा और विश्राम का अधिकार इसमें नहीं।
- अस्पष्ट शब्दावली: लोक व्यवस्था और युक्तियुक्त निर्बंधन जैसे शब्द परिभाषित नहीं हैं, और सर आइवर जेनिंग्स ने संविधान को वकीलों का स्वर्ग कहा।
- स्थायित्व नहीं: संसद संशोधन से इन्हें घटा सकती है, जैसा 1978 में संपत्ति के अधिकार की समाप्ति ने दिखाया।
- निलंबन और निवारक निरोध: आपात में इनका निलंबन और अनुच्छेद 22 के अंतर्गत निवारक निरोध इन्हें कमज़ोर करते हैं, और न्यायिक उपचार ग़रीबों के लिए महँगा है।
पहली आलोचना का उत्तर बी. आर. आंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में दिया। आलोचक कहते थे कि अपवादों ने अधिकारों को खा लिया है, और अधिकार तभी वास्तविक हैं जब असीमित हों, जैसे अमेरिकी अधिकार-पत्र में। उन्होंने उत्तर दिया कि अमेरिका में भी अधिकार असीमित नहीं हैं: वहाँ के उच्चतम न्यायालय ने उन पर सीमाएँ बनाए रखने के लिए पुलिस शक्ति का सिद्धांत गढ़ा, इसलिए अंतर रूप का है, सार का नहीं।
समय के साथ न्यायालयों ने इनमें से कुछ बातों का उत्तर दिया। मूल ढाँचे का सिद्धांत संशोधन को सीमित करता है, 44वें संशोधन ने आपात में अनुच्छेद 20 और 21 को सुरक्षित किया, और जनहित याचिका किसी को भी उन लोगों की ओर से न्यायालय जाने देती है जो स्वयं जाने का ख़र्च नहीं उठा सकते।
मौलिक अधिकार और निदेशक तत्त्वों में अंतर, और भाग III के बाहर के अधिकार
भाग III के साथ दो और भाग अधिकारों और कर्तव्यों की बात करते हैं। भाग IV के राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व राज्य को दिए निर्देश हैं जिन्हें न्यायालय लागू नहीं करा सकते, और भाग IVक के मौलिक कर्तव्य नागरिकों के दायित्व हैं। न्यायालय में लागू केवल भाग III है।
| बिंदु | मौलिक अधिकार (भाग III) | निदेशक तत्त्व (भाग IV) |
|---|---|---|
| न्यायालय में लागू | हाँ, अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत | नहीं; अनुच्छेद 37 के अनुसार ये शासन में मूलभूत हैं, पर लागू नहीं कराए जा सकते |
| स्वभाव | मुख्यतः राज्य पर रोक | सकारात्मक लक्ष्य, जिन्हें राज्य को पाना है |
| उद्देश्य | राजनीतिक लोकतंत्र | सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र |
| प्रेरणा का स्रोत | संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकार-पत्र | आयरलैंड का संविधान |
कुछ अधिकार न्यायालय में लागू होते हुए भी भाग III से बाहर हैं। वे संवैधानिक या विधिक अधिकार हैं, जिन्हें अनुच्छेद 32 के बजाय उच्च न्यायालयों और साधारण विधि से लागू कराया जाता है।
- अनुच्छेद 265: विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर न लगाया जाएगा, न वसूला जाएगा।
- अनुच्छेद 300क: किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।
- अनुच्छेद 301: भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम स्वतंत्र होगा।
- अनुच्छेद 326: लोक सभा और विधान सभाओं के निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-II“संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति एक परिसीमित शक्ति है और इसे आत्यंतिक शक्ति के रूप में विस्तृत नहीं किया जा सकता है ।” इस कथन के आलोक में व्याख्या कीजिए कि क्या संसद संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अपनी संशोधन की शक्ति का विशदीकरण करके संविधान के मूल ढांचे को नष्ट कर सकती है ?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन की शक्ति देता है, पर 1973 से उच्चतम न्यायालय का मत है कि यह शक्ति मूल ढाँचा बदलने तक नहीं जाती, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- संघर्ष: शंकरी प्रसाद (1951) ने अधिकारों में संशोधन की अनुमति दी; गोलकनाथ (1967) ने रोका; 24वें संशोधन (1971) ने अनुच्छेद 13(4) जोड़ा।
- केशवानंद भारती (1973): संसद अधिकारों सहित किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, पर मूल ढाँचे में नहीं।
- 42वें संशोधन (1976) ने असीम शक्ति का दावा किया; मिनर्वा मिल्स (1980) ने सीमित संशोधन शक्ति को स्वयं बुनियादी अभिलक्षण और न्यायिक पुनर्विलोकन को मूल ढाँचे का हिस्सा माना।
- कोएल्हो (2007): 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखी विधियाँ पुनर्विलोकन के लिए खुली हैं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि संसद संशोधन कर सकती है, नष्ट नहीं: सीमित शक्ति पाने वाला उसे असीमित नहीं बना सकता।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2016, सामान्य अध्ययन-IIकोहिलो केस में क्या अभिनिर्धारित किया गया था ? इस संदर्भ में, क्या आप कह सकते हैं कि न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान के बुनियादी अभिलक्षणों में प्रमुख महत्त्व का है ?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नौवीं अनुसूची की विधियों को कोई पूर्ण छूट नहीं हो सकती, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- निर्णय: 24 अप्रैल 1973 के बाद जोड़ी गई विधियाँ अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 तथा मूल ढाँचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं।
- न्यायिक पुनर्विलोकन क्यों: अनुच्छेद 13 अधिकार न्यून करने वाली विधियों को शून्य करता है; अनुच्छेद 32 और 226 उपचार देते हैं; पुनर्विलोकन के बिना अनुच्छेद 31ख किसी भी विधि को बचा सकता।
- मिनर्वा मिल्स (1980) पहले ही न्यायिक पुनर्विलोकन को मूल ढाँचे का हिस्सा मान चुका था।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि न्यायिक पुनर्विलोकन वह अभिलक्षण है जो बाक़ी हर बुनियादी अभिलक्षण को लागू करने योग्य बनाता है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2013, सामान्य अध्ययन-II (हिंदी रूपांतर)‘भारत का उच्चतम न्यायालय संविधान संशोधन में संसद की मनमानी शक्ति पर अंकुश रखता है।’ आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 13 और मूल ढाँचे के सिद्धांत से संसद की संशोधन शक्ति पर अंकुश रखता है, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- अंकुश: केशवानंद (1973), मिनर्वा मिल्स (1980) और कोएल्हो (2007) ने मूल ढाँचे को क्षति पहुँचाने वाले संशोधनों को सीमित किया।
- पक्ष में: यह अधिकारों, न्यायिक पुनर्विलोकन और सीमित शासन को क्षणिक बहुमत से बचाता है, जो 42वें संशोधन का सबक है।
- विपक्ष में: संविधान बुनियादी अभिलक्षणों की सूची नहीं देता, वे मामले-दर-मामले तय होते हैं, और अनिर्वाचित न्यायाधीश सीमा तय करते हैं।
- संतुलन: संसद अब भी लगभग हर उपबंध संशोधित कर सकती है; केवल मूल भाग सुरक्षित है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अंकुश वास्तविक है पर सीमित, और उसकी वैधता उसके संयमित प्रयोग पर टिकी है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2025भारतीय राज्य-व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- I. अध्यादेश किसी केन्द्रीय अधिनियम को संशोधित कर सकता है।
- II. अध्यादेश किसी मूल अधिकार को न्यून कर सकता है।
- III. अध्यादेश किसी पिछली तारीख से प्रभावी हो सकता है।
उपर्युक्त कथनों में कौन-कौन से सही हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: हर शक्ति को अनुच्छेद 13 पर परखें। कथन I: अध्यादेश को संसद के अधिनियम जैसा बल प्राप्त है और वह किसी अधिनियम को संशोधित या निरस्त कर सकता है, इसलिए केंद्रीय अधिनियम संशोधित कर सकता है। कथन II: अनुच्छेद 13(3)(क) के अंतर्गत अध्यादेश विधि है, इसलिए अनुच्छेद 13(2) उसे उतनी मात्रा तक शून्य करता है जितना वह मूल अधिकार न्यून करे; वह वैध रूप से ऐसा नहीं कर सकता। कथन III: किसी अन्य विधि की तरह अध्यादेश भूतलक्षी हो सकता है और पिछली तारीख से लागू हो सकता है। I और III टिकते हैं।
इस भ्रम से बचें: कथन II सही लगता है क्योंकि अध्यादेश शक्तिशाली है; निर्णय अनुच्छेद 13(3)(क) की विधि की परिभाषा से होता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल I और II: गलत। कथन II गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 13 के अंतर्गत अध्यादेश विधि है और मूल अधिकार न्यून नहीं कर सकता।
- (b) केवल II और III: गलत। कथन II गलत है, और सही कथन I छूट गया है।
- (c) केवल I और III: सही। अध्यादेश केंद्रीय अधिनियम संशोधित कर सकता है और पिछली तारीख से लागू हो सकता है।
- (d) I, II और III: गलत। कथन II गलत है।
उत्तर: विकल्प (c): अनुच्छेद 13(3)(क) अध्यादेश को विधि मानता है, इसलिए वह मूल अधिकार न्यून नहीं कर सकता।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021 (हिंदी रूपांतर)भारत में संपत्ति के अधिकार की क्या स्थिति है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले स्थिति: 1978 के 44वें संशोधन ने संपत्ति को भाग III से हटाकर अनुच्छेद 300क में रखा, इसलिए यह विधिक या संवैधानिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं। फिर किसे मिलता है: अनुच्छेद 300क कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा, इसलिए यह केवल नागरिकों को नहीं, हर व्यक्ति को उपलब्ध है।
इस भ्रम से बचें: 'केवल नागरिक' आकर्षक लगता है, क्योंकि अनुच्छेद 19(1)(च) यह अधिकार नागरिकों को देता था; अनुच्छेद 300क किसी व्यक्ति की बात करता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल नागरिकों को उपलब्ध विधिक अधिकार: गलत। अनुच्छेद 300क हर व्यक्ति की रक्षा करता है।
- (b) किसी भी व्यक्ति को उपलब्ध विधिक अधिकार: सही। अनुच्छेद 300क के अनुसार किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।
- (c) केवल नागरिकों को उपलब्ध मूल अधिकार: गलत। संपत्ति 1978 में भाग III से निकल गई।
- (d) न मूल अधिकार, न विधिक अधिकार: गलत। अनुच्छेद 300क इसे विधिक, संवैधानिक अधिकार बनाता है।
उत्तर: विकल्प (b): अनुच्छेद 300क, 'किसी व्यक्ति', भाग III से बाहर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2005 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अनुच्छेद 301 संपत्ति के अधिकार से संबंधित है।
- संपत्ति का अधिकार विधिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं।
- अनुच्छेद 300क केंद्र की कांग्रेस सरकार ने 44वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1: अनुच्छेद 301 व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता से जुड़ा है, संपत्ति से नहीं, इसलिए गलत। कथन 2: संपत्ति अनुच्छेद 300क के अंतर्गत विधिक अधिकार है और अब मूल अधिकार नहीं, इसलिए सही। कथन 3: अनुच्छेद 300क 44वें संशोधन से जुड़ा, पर वह संशोधन मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार लाई थी, कांग्रेस सरकार नहीं, इसलिए गलत। केवल 2 टिकता है।
इस भ्रम से बचें: कथन 3 में संशोधन सही है और सरकार गलत; पूरा कथन पढ़ें।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 2: सही। केवल यह कथन सही है कि संपत्ति विधिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं।
- (b) 2 और 3: गलत। 44वाँ संशोधन जनता पार्टी सरकार लाई थी, कांग्रेस नहीं।
- (c) 1 और 3: गलत। अनुच्छेद 301 व्यापार से जुड़ा है, और कथन 3 में सरकार गलत है।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 1 और 3 गलत हैं।
उत्तर: विकल्प (a): अनुच्छेद 301 व्यापार का है, और 44वाँ संशोधन जनता पार्टी सरकार का।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1999 (हिंदी रूपांतर)भारत में रह रहा ब्रिटिश नागरिक किस अधिकार का दावा नहीं कर सकता?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: ब्रिटिश नागरिक भारत में विदेशी है। देखें कि चार में से कौन-सा अधिकार केवल नागरिकों का है। अनुच्छेद 19, जिसमें कोई वृत्ति अपनाने या व्यापार करने की स्वतंत्रता है, केवल नागरिकों को मिलता है। विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14), प्राण और दैहिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) और धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) सभी व्यक्तियों को मिलती हैं।
इस भ्रम से बचें: धर्म की स्वतंत्रता नागरिक का अधिकार लगता है, पर अनुच्छेद 25 से 28 हर व्यक्ति की रक्षा करते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) व्यापार और वृत्ति की स्वतंत्रता: सही। यह अनुच्छेद 19 का हिस्सा है, जिसका दावा केवल नागरिक कर सकते हैं।
- (b) विधि के समक्ष समता: गलत। अनुच्छेद 14 हर व्यक्ति की रक्षा करता है, नागरिक हो या विदेशी।
- (c) प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण: गलत। अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति की रक्षा करता है।
- (d) धर्म की स्वतंत्रता: गलत। अनुच्छेद 25 से 28 सभी व्यक्तियों को उपलब्ध हैं।
उत्तर: विकल्प (a): अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ केवल नागरिकों की हैं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के काल के संदर्भ में, नेहरू रिपोर्ट ने निम्नलिखित में से किसकी/किनकी सिफ़ारिश की थी?
- भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता।
- अल्पसंख्यकों के लिए स्थानों के आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचन।
- संविधान में भारत के लोगों के लिए मौलिक अधिकारों का प्रावधान।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1: नेहरू रिपोर्ट ने पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, डोमिनियन दर्जा माँगा था, इसलिए गलत। कथन 2: रिपोर्ट ने अल्पसंख्यकों के लिए स्थानों के आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचन का प्रस्ताव रखा, इसलिए सही। कथन 3: उसने मौलिक अधिकारों की सूची का प्रस्ताव रखा, इसलिए सही। 2 और 3 टिकते हैं।
इस भ्रम से बचें: पूर्ण स्वतंत्रता भ्रामक विकल्प है: रिपोर्ट की माँग डोमिनियन दर्जा थी।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। रिपोर्ट ने पूर्ण स्वतंत्रता नहीं माँगी।
- (b) केवल 2 और 3: सही। आरक्षित स्थानों के साथ संयुक्त निर्वाचन और मौलिक अधिकार दोनों रिपोर्ट में थे।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। कथन 1 गलत है और कथन 2 छूट गया है।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 1 गलत है।
उत्तर: विकल्प (b): डोमिनियन दर्जा, पूर्ण स्वतंत्रता नहीं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2003 (हिंदी रूपांतर)सूची I (भारतीय संविधान का विषय) को सूची II (वह देश जिससे लिया गया) से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- सूची I: A. राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व; B. मौलिक अधिकार; C. संघ-राज्य संबंधों में समवर्ती सूची; D. संघ को अधिक शक्तियों वाला राज्यों का संघ भारत
- सूची II: 1. ऑस्ट्रेलिया; 2. कनाडा; 3. आयरलैंड; 4. यूनाइटेड किंगडम; 5. संयुक्त राज्य अमेरिका
कूट: A B C D
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: हर विषय को बारी-बारी से मिलाएँ। A, निदेशक तत्त्व: आयरलैंड (3)। B, मौलिक अधिकार: संयुक्त राज्य अमेरिका (5)। C, समवर्ती सूची: ऑस्ट्रेलिया (1)। D, संघ को अधिक शक्तियों वाला राज्यों का संघ, अर्थात् मज़बूत केंद्र वाला परिसंघ: कनाडा (2)। कूट 3 5 1 2 है।
इस भ्रम से बचें: ऑस्ट्रेलिया और कनाडा आसानी से आपस में बदल जाते हैं; समवर्ती सूची ऑस्ट्रेलियाई है और मज़बूत केंद्र कनाडाई।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 5 4 1 2: गलत। निदेशक तत्त्व अमेरिका से नहीं, और मौलिक अधिकार ब्रिटेन से नहीं।
- (b) 3 5 2 1: गलत। इसमें C और D के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा उलट गए हैं।
- (c) 5 4 2 1: गलत। A, B, C और D सभी गलत मिले हैं।
- (d) 3 5 1 2: सही। आयरलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा।
उत्तर: विकल्प (d): आयरलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा।
स्रोत
- Legislative Department, Ministry of Law and Justice: The Constitution of India
- NCERT: Indian Constitution at Work, Class 11, Chapter 2, Rights in the Indian Constitution
- Supreme Court of India: In Re Section 6A of the Citizenship Act, judgment of 17 October 2024
- Supreme Court of India: Property Owners Association v. State of Maharashtra, judgment of 5 November 2024
- Constituent Assembly Debates, Volume VII: B. R. Ambedkar introducing the Draft Constitution, 4 November 1948
- United Nations: Universal Declaration of Human Rights
- Wikipedia: Fundamental rights in India
- Wikipedia: Basic structure doctrine
- Wikipedia: Article 12 of the Constitution of India
- Wikipedia: Nehru Report
- Wikipedia: Golaknath v. State of Punjab
- Wikipedia: Kesavananda Bharati v. State of Kerala
- Wikipedia: Twenty-fourth Amendment of the Constitution of India
- Wikipedia: Minerva Mills v. Union of India
- Wikipedia: Ninth Schedule to the Constitution of India
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख भाग III को संविधान के पाठ, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों, एनसीईआरटी और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है। यह अध्ययन सामग्री है, विधिक सलाह नहीं।
