परिचय
ज्वारनदमुख नदी का वह ज्वारीय मुहाना है जहाँ मीठा और खारा जल मिलता है, सागर से खुला एक अर्ध-घिरा जल-क्षेत्र, जिसमें समुद्री जल मीठे जल से स्पष्ट रूप से तनु हो जाता है। इसकी लवणता ज्वारीय सीमा पर लगभग शून्य से मुहाने पर लगभग 3.4 प्रतिशत तक जाती है और ज्वार तथा ऋतु के साथ बदलती है, इसलिए यहाँ मैंग्रोव और पृथुलवणी जीव जैसे लवण-सहिष्णु जीवन पनपते हैं। ज्वारनदमुख पौधशाला, छन्नी और तटीय सुरक्षा हैं, और भारत में नर्मदा ज्वारनदमुख, चिल्का, पुलिकट, वेंबनाड और सुंदरबन इसके उदाहरण हैं।
ज्वारनदमुख क्या है: अर्थ और परिभाषा
ज्वारनदमुख का अर्थ: जहाँ नदी का जल सागर से मिलता है
नदी का वह ज्वारीय मुहाना, जहाँ मीठा और खारा जल मिलता है, ज्वारनदमुख (estuary) कहलाता है। सबसे अधिक स्वीकार्य परिभाषा के अनुसार यह तट पर अर्ध-घिरा जल-क्षेत्र है, जो खुले सागर से स्वतंत्र रूप से जुड़ा रहता है और जिसमें समुद्री जल स्थल से आए मीठे जल से स्पष्ट रूप से तनु हो जाता है। यह शब्द लैटिन के aestuarium से बना है, जिसका अर्थ है सागर की ज्वारीय खाड़ी, और जो aestus अर्थात् ज्वार से निकला है। एक व्यापक परिभाषा में अनूप, फ़्योर्ड, नदी-मुहाने और ज्वारीय खाड़ियाँ भी आती हैं, यहाँ तक कि वे जल-क्षेत्र भी जिनका सागर से संपर्क वर्ष के कुछ समय बंद रहता है।
ज्वारनदमुख एक संक्रमण क्षेत्र (ecotone) है, जहाँ दो पारितंत्र आपस में मिलते हैं। एक ओर से ज्वार, लहरें और समुद्री जल का प्रवेश इस पर काम करते हैं, दूसरी ओर से मीठे जल का प्रवाह और उसके साथ आया अवसाद। इस मिश्रण से जल और अवसाद में पोषक तत्व बहुत बढ़ जाते हैं, इसलिए ज्वारनदमुख विश्व के सबसे उत्पादक प्राकृतिक आवासों में हैं। आज के अधिकांश ज्वारनदमुख होलोसीन काल में बने, जब लगभग 10,000 से 12,000 वर्ष पहले समुद्र-तल उठने लगा और उसने नदी-घाटियों को डुबो दिया। ज्वारनदमुख डेल्टा से कैसे भिन्न है, यह नदी स्थलरूप, डेल्टा और ज्वारनदमुख (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
ज्वारनदमुख के प्रकार: स्थलरूप और मिश्रण के आधार पर
स्थलरूप के आधार पर ज्वारनदमुख: डूबी घाटी, रोधिका-निर्मित, फ़्योर्ड और विवर्तनिक
ज्वारनदमुखों का वर्गीकरण उनकी आकृति और उत्पत्ति, उनके जल-परिसंचरण, उनकी लवणता और उनकी ऊर्जा के आधार पर होता है। स्थलरूप के आधार पर इनके चार प्रकार हैं, और हर प्रकार की अपनी परिस्थिति है।
- डूबी नदी-घाटी: सागर ऊपर उठकर किसी नदी-घाटी में भर गया है और ज्वारनदमुख ने घाटी का आकार बनाए रखा है; यह चौड़ा होता है और शायद ही कभी 30 मीटर से अधिक गहरा। शीतोष्ण जलवायु में यही सबसे सामान्य प्रकार है।
- रोधिका-निर्मित या अनूप प्रकार: अवसाद का जमाव समुद्र-तल के उठने के साथ चलता रहा, इसलिए ज्वारनदमुख उथला है और रेतीली स्पिट या रोधिका द्वीपों से सागर से अलग है, केवल सँकरे मुहानों से जुड़ा। उष्ण और उपोष्ण भूभागों में यह सामान्य है। चिल्का झील इसी तरह बनी, बंगाल की खाड़ी की धाराओं से बनी 60 किमी लंबी रोधिका के पीछे, और श्रीहरिकोटा का रोधिका द्वीप पुलिकट झील को सागर से अलग करता है।
- फ़्योर्ड प्रकार: हिमनदों ने घाटी को U आकार में गहरा कर दिया और मुहाने पर उथली देहली छोड़ दी; ऊपरी भाग 300 मीटर से भी गहरा हो सकता है।
- विवर्तनिक: भ्रंशन, ज्वालामुखी या भूस्खलन से सागर भीतर आ गया। ऐसे ज्वारनदमुख कम हैं; सैन फ़्रांसिस्को खाड़ी इसका एक उदाहरण है।
मिश्रण के आधार पर ज्वारनदमुख: लवण फान, आंशिक मिश्रित, पूर्ण मिश्रित और प्रतिलोम
मीठा और खारा जल कैसे मिलता है, यह नदी और ज्वार के संतुलन पर निर्भर है, और यही तय करता है कि किसी पौधे या जीव को लवणता का कैसा प्रतिरूप मिलेगा।
- लवण फान (salt wedge): नदी का प्रवाह सागर से आने वाले जल से बहुत अधिक है और ज्वार का प्रभाव कम। मीठा जल ऊपर तैरता है और घना समुद्री जल तली के साथ फान की तरह स्थल की ओर बढ़ता है। गोवा का मांडवी ज्वारनदमुख मानसून में ऐसा ही व्यवहार करता है।
- आंशिक रूप से मिश्रित: ज्वार प्रबल और नदी कमज़ोर है, इसलिए विक्षोभ पूरे जल-स्तंभ को मिलाता है और लवणता गहराई की अपेक्षा ज्वारनदमुख की लंबाई में अधिक बदलती है।
- पूर्णतः मिश्रित: ज्वारीय मिश्रण नदी के प्रवाह से अधिक है, लवणता की ऊर्ध्वाधर प्रवणता मिट जाती है और मीठे तथा खारे जल की सीमा समाप्त हो जाती है।
- प्रतिलोम: शुष्क जलवायु में वाष्पन मीठे जल के आगम से बहुत अधिक होता है, इसलिए ज्वारनदमुख मुहाने पर नहीं, भीतर सबसे अधिक लवणीय होता है।
ज्वारनदमुख में लवणता प्रवणता और लवणता तनाव
लवणता प्रवणता: ज्वारनदमुख में लवणता कैसे बदलती है
ज्वारनदमुख के नदी वाले सिरे से सागर तक लवणता में होने वाले परिवर्तन को लवणता प्रवणता (salinity gradient) कहते हैं। यह नदियों की ज्वारीय सीमा पर लगभग शून्य से मुहाने पर लगभग 3.4 प्रतिशत, अर्थात् सागर की लवणता, तक जाती है। ज्वारनदमुखों में लवणता ऋतु के साथ 0 से 35 प्रति हज़ार के बीच कहीं भी घटती-बढ़ती रहती है। समुद्री जल कितना तनु होगा, यह मीठे जल की मात्रा, ज्वारीय परास और वाष्पन पर निर्भर करता है।
प्रवणता अपनी जगह भी बदलती है। किसी एक बिंदु पर लवणता ज्वार और ऋतु के साथ बहुत बदलती है, जिससे ज्वारनदमुख रहने के लिए कठिन स्थान बन जाता है। घुली ऑक्सीजन और अवसाद भी बदलते हैं: अवसाद अंतर्ज्वारीय कच्छभूमि पर जमता है, जहाँ बसना कठिन है, और यह जीवों के भोजन और श्वसन अंगों को अवरुद्ध कर सकता है। चिल्का झील एक ही जल-क्षेत्र में यह परास दिखाती है: दया नदी के मुहाने के पास 0 प्रति हज़ार से शुष्क ऋतु में निकास नहर में 42 तक।
जीवों में लवणता तनाव: पृथुलवणी, तनुलवणी और परासरण नियमन
जीव लवणता तनाव का सामना परासरण नियमन (osmoregulation) से करते हैं, अर्थात् वह सक्रिय प्रक्रिया जिससे कोई जीव अपने शरीर में जल की मात्रा स्थिर रखता है, ताकि उसके शरीर-द्रव न बहुत तनु हों, न बहुत सांद्र। इसकी दो रणनीतियाँ हैं।
- परासरण अनुरूपी (osmoconformers): ये अपने शरीर-द्रवों की सांद्रता आसपास के जल के अनुरूप कर लेते हैं। अधिकांश समुद्री अकशेरुकी ऐसा करते हैं।
- परासरण नियामक (osmoregulators): ये जल कैसा भी हो, शरीर की सांद्रता स्थिर रखते हैं। मीठे जल की मछली अपने गलफड़ों से लवण ग्रहण करती है और भीतर आए अतिरिक्त जल को बहुत तनु मूत्र के रूप में बाहर निकालती है।
कोई जीव लवणता का कितना परास सह सकता है, इससे जीव दो समूहों में बँटते हैं। पृथुलवणी (euryhaline) जीव लवणता के बड़े परास के अनुकूल हो जाते हैं और ज्वारनदमुखों तथा ज्वारीय कुंडों में सामान्य हैं; हरा केकड़ा खारे और अर्ध-लवणीय (brackish) जल दोनों में रहता है, और सैल्मन तथा ईल मछलियाँ अपने जीवन-चक्र में मीठे जल और सागर के बीच आती-जाती हैं। तनुलवणी (stenohaline) जीव केवल छोटा परास सह पाते हैं: मीठे जल की अधिकांश मछलियाँ, जैसे गोल्डफ़िश, सागर में मर जाती हैं, और अधिकांश समुद्री मछलियाँ, जैसे हैडॉक, मीठे जल में। इसलिए ज्वारनदमुख पृथुलवणी जीवन के अनुकूल है।
लवणमृदोद्भिद् और मैंग्रोव: पौधे लवण में कैसे जीवित रहते हैं
लवणीय मिट्टी या जल में उगने वाले लवण-सहिष्णु पौधे को लवणमृदोद्भिद् (halophyte) कहते हैं; ऐसे पौधे लवण कच्छ क्षेत्रों, मैंग्रोव दलदलों और समुद्र-तटों पर मिलते हैं। संभवतः केवल 2 प्रतिशत पौधों की प्रजातियाँ ऐसी हैं; अधिकांश पौधे लवण से आसानी से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। मैंग्रोव उष्ण और उपोष्ण तटों पर खारे जल में रहने वाले अकेले काष्ठीय लवणमृदोद्भिद् हैं।
- लवण को बाहर रखना: बहुत अपारगम्य जड़ें छन्नी का काम करती हैं; भारतीय मैंग्रोव Avicennia officinalis की जड़ें पौधे द्वारा लिए गए जल का 90 से 95 प्रतिशत लवण बाहर रोक देती हैं।
- जल की बचत: लवणीय मिट्टी में मीठा जल दुर्लभ है, इसलिए मैंग्रोव अपने रंध्रों का खुलना सीमित कर पत्तियों से जल की हानि घटाते हैं।
- जलमग्न कीचड़ में श्वसन: कीचड़ में मुक्त ऑक्सीजन बहुत कम होती है, इसलिए श्वसन मूल (pneumatophores) नामक जड़ें कीचड़ से ऊपर निकलकर हवा लेती हैं।
- पेड़ पर ही अंकुरण: अनेक मैंग्रोव सजीवप्रजक (viviparous) हैं: बीज पेड़ पर लगे-लगे ही अंकुरित हो जाता है, और गिरने वाला प्रवर्ध्य पानी पर तैरकर एक वर्ष तक जीवित रह सकता है।
ज्वारनदमुख पारितंत्र: उत्पादकता और सेवाएँ
ज्वारनदमुख पारितंत्र की सेवाएँ: पौधशाला, छन्नी और तटीय सुरक्षा
ज्वारनदमुख पारितंत्र स्थल, नदियों और सागर को एक तंत्र में जोड़ता है। मीठे जल, सागर और स्थल की प्रजातियाँ यहाँ जटिल आहार-शृंखलाओं में साथ रहती हैं, और इस पारितंत्र की सेवाएँ इसके तटों से कहीं आगे तक पहुँचती हैं।
- पौधशाला: ज्वारनदमुख अनेक समुद्री मछलियों और कवचधारी जीवों के बच्चों को आश्रय देते हैं और नदियों तथा सागर के बीच आने-जाने वाली मछलियों के प्रवास-गलियारे हैं। ज्वारनदमुख और अनूप जैसे अर्ध-लवणीय जल स्रोत महत्त्वपूर्ण मत्स्य भंडार हैं।
- छन्नी: दलदल और लवण कच्छ क्षेत्र नदियों द्वारा लाए अवसाद, पोषक तत्वों और प्रदूषकों को रोककर जल साफ़ करते हैं।
- तटीय सुरक्षा: मैंग्रोव दलदल तटों को अपरदन से, उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के समय तूफ़ानी लहरों से और सुनामी से बचाते हैं, और लवण कच्छ की घासें तटरेखा को स्थिर रखती हैं। घनी, उलझी अवस्तंभ जड़ें मैंग्रोव को ज्वार के रोज़ के चढ़ाव-उतार में खड़ा रखती हैं और बहते जल की गति धीमी करती हैं, जिससे अवसाद नीचे बैठ जाता है।
- कार्बन भंडार: मैंग्रोव ब्लू कार्बन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं; 2012 में विश्व के मैंग्रोवों में लगभग 4.19 Gt कार्बन संचित था, और उनका प्राथमिक उत्पादन उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों और प्रवाल भित्तियों के बराबर है।
ज्वारनदमुखों पर संकट: सुपोषण, शैवाल प्रस्फुटन और मृतक्षेत्र
सुपोषण और लाल ज्वार: ज्वारनदमुखों में हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन
ज्वारनदमुख की अनेक समस्याएँ उसकी नदियों के साथ आती हैं। सुपोषण (eutrophication), अर्थात् जल में पोषक तत्वों की अधिकता, मुख्यतः खेतों के अपवाह, सीवेज और पशु-अपशिष्ट के नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ेट से आता है। इससे हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन (harmful algal bloom) होता है, अर्थात् शैवाल की ऐसी अति-वृद्धि जो विष, ऑक्सीजन की कमी या भौतिक क्षति से दूसरे जीवों को हानि पहुँचाती है। तटीय जल में ऐसे प्रस्फुटन को प्रायः लाल ज्वार (red tide) कहते हैं, जो रंजित डाइनोफ़्लैजेलेट के प्रस्फुटन से बना नाम है।
- मानवीय कारण: स्थल से आने वाला अपवाह, जिसमें उर्वरक, सीवेज और पशु-अपशिष्ट होते हैं।
- प्राकृतिक कारण: नदियों की बाढ़ और सागर-तल से पोषक तत्वों का उत्प्रवाह; कुछ स्थानों पर प्रस्फुटन तटीय उत्प्रवाह का मौसमी परिणाम है।
- सहायक दशाएँ: अधिक गर्म जल और कम परिसंचरण।
भारत में हर वर्ष अधिक प्रस्फुटन दर्ज हो रहे हैं। प्रस्फुटन के मरने पर उसे विघटित करने वाले सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन का उपयोग कर लेते हैं, जिससे मछलियाँ मर सकती हैं और पीछे मृतक्षेत्र बन सकता है।
मृतक्षेत्र (डैड ज़ोन्स): अल्प-ऑक्सीजनता और समुद्री जीवन पर परिणाम
महासागर या बड़ी झील का वह अल्प-ऑक्सीजन क्षेत्र, जहाँ घुली ऑक्सीजन 2 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे कम हो जाती है, मृतक्षेत्र (dead zone) कहलाता है। 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे सामूहिक मृत्यु होती है। नदियाँ खेतों और नगरों से पोषक तत्व लाती हैं; पोषक तत्व उत्पादकता बढ़ाते हैं; कार्बनिक पदार्थ नीचे बैठकर श्वसन में उपयोग होता है; और यह श्वसन ऑक्सीजन समाप्त कर देता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने 2004 में विश्व के महासागरों में 146 मृतक्षेत्र गिने, और बाल्टिक सागर में ये लगभग 5,000 से बढ़कर 60,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो गए।
- जीवन बाहर जाता है या मरता है: ऑक्सीजन घटने पर मछलियाँ और दूसरे गतिशील जीव क्षेत्र छोड़ देते हैं, जबकि तली पर रहने वाले जीवों को 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे भारी हानि होती है।
- जेलीफ़िश का प्रभुत्व: जेलीफ़िश मृतक्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में पनप सकती हैं और आहार-शृंखला बदल देती हैं।
- मत्स्य-उद्योग की हानि: जैव विविधता घटती है और तली के जीवों की संख्या ढह जाती है, जिससे पकड़ सीमित हो जाती है।
बाँध, गाद, जलकृषि और बदलती लवणता
पोषक तत्व अकेला दबाव नहीं हैं। मृदा अपरदन, वनोन्मूलन, अत्यधिक मत्स्यन, आर्द्रभूमियों को पाटना, भारी धातुओं और हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषक, और बाढ़-नियंत्रण या जल-मोड़ के लिए बने बाँध और तटबंध भी ज्वारनदमुखों को क्षीण करते हैं। इनमें से कई स्वयं लवणता प्रवणता को बदल देते हैं।
- कम मीठा जल, अधिक लवण: समुद्र-तल वृद्धि और मीठे जल की घटती आपूर्ति से सुंदरबन की लवणता बढ़ रही है।
- अधिक गाद, कम लवण: चिल्का में ऊपर से आई गाद ने झील को सिकोड़ा, उसकी लवणता घटाई और मीठे जल की खरपतवार फैलने दी, और व्यावसायिक झींगा जलकृषि के विस्तार ने इसके मत्स्य और पक्षियों की गिरावट बढ़ाई।
- अवरोध: केरल में तन्नीरमुक्कम अवरोध कुट्टनाड के निचले भागों से खारा जल दूर रखता है, पर मछलियों और झींगों का ऊपर की ओर प्रवास रोकता है और खरपतवार बढ़ाता है।
ज्वारनदमुख को मिलने वाला मीठा जल भी मनुष्य बदल सकता है। हुगली में बहने वाला अधिकांश जल नदी के प्राकृतिक स्रोत से नहीं, फ़रक्का फ़ीडर नहर से आता है, जिसमें फ़रक्का बैराज गंगा का जल मोड़ता है। हुगली ज्वारनदमुख में ज्वार की शक्ति भी दिखाती है: जहाँ ज्वारनदमुख अचानक सँकरा होकर नदी में बदलता है, वहाँ आगे बढ़ता ज्वार ज्वारीय बोर बनाता है, जो प्रायः 2.1 मीटर से ऊँचा होता है।
भारत में ज्वारनदमुख: ज्वारनदमुख, अनूप और मैंग्रोव वन
भारत के पश्चिमी और पूर्वी तटों के ज्वारनदमुख और अनूप
भारत के दोनों तटों पर अलग-अलग प्रकार के ज्वारनदमुख हैं। पश्चिमी तटीय मैदान एक जलमग्न तट है, और इसे पार करने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनातीं; नर्मदा और तापी भ्रंश द्रोणियों में बहती हैं और इनमें डेल्टाई निक्षेप कम हैं। नर्मदा भरूच के दक्षिण में 27 किमी लंबा चौड़ा ज्वारनदमुख बनाकर अरब सागर से मिलती है, और गोवा का प्राकृतिक पोताश्रय मर्मागाओ जुआरी ज्वारनदमुख के प्रवेश पर स्थित है। मालाबार तट पर कयाल (backwaters) हैं, जिनका उपयोग मत्स्यन और अंतर्देशीय नौकायन में होता है। पूर्वी तटीय मैदान अधिक चौड़ा है, जिसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के डेल्टा तथा बड़े अनूप हैं।
| जल-क्षेत्र | कहाँ | क्या विशेष है |
|---|---|---|
| चिल्का झील | ओडिशा, दया नदी के मुहाने पर | भारत के पूर्वी तट का सबसे बड़ा अर्ध-लवणीय अनूप; भारत के पहले रामसर स्थलों में |
| पुलिकट झील | आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु | भारत का दूसरा सबसे बड़ा अर्ध-लवणीय अनूप, 759 वर्ग किमी, श्रीहरिकोटा के पीछे |
| वेंबनाड | केरल | भारत की सबसे लंबी झील, 2,033 वर्ग किमी; इसके दक्षिणी भाग में कुट्टनाड |
| नर्मदा ज्वारनदमुख | गुजरात, भरूच के दक्षिण में | पश्चिमी तट पर 27 किमी लंबा चौड़ा ज्वारनदमुख |
भारत के मैंग्रोव वन: सुंदरबन, भितरकनिका, कोरिंगा और पिचावरम
भारत के तटों पर मैंग्रोव लवण कच्छ क्षेत्रों, ज्वारीय खाड़ियों, कच्छभूमि और ज्वारनदमुखों में उगते हैं। 2023 में भारत का कुल मैंग्रोव आवरण 4,992 वर्ग किलोमीटर था। ये सुंदरबन तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में सबसे अधिक विकसित हैं, और महानदी, गोदावरी तथा कृष्णा के डेल्टाओं में भी इनके महत्त्वपूर्ण वन हैं।
- सुंदरबन: विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन, गंगा डेल्टा में 10,277 वर्ग किलोमीटर, जिसमें से लगभग 4,260 पश्चिम बंगाल में हैं। सुंदरी वृक्ष (Heritiera fomes) इसकी सबसे अधिक मिलने वाली प्रजातियों में है, और 2020 के एक आकलन में भारतीय सुंदरबन को संकटग्रस्त माना गया।
- भितरकनिका: ओडिशा में ब्राह्मणी और बैतरणी के डेल्टाओं में 650 वर्ग किलोमीटर की मैंग्रोव आर्द्रभूमि, जिसमें लगभग 62 मैंग्रोव प्रजातियाँ और खारे पानी का मगरमच्छ हैं; 2002 से रामसर स्थल।
- कोरिंगा: आंध्र प्रदेश में काकीनाडा के पास एक ज्वारनदमुख और भारत का तीसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र, जिसमें मैंग्रोव वृक्षों की 24 प्रजातियाँ हैं।
- मन्नार की खाड़ी और पिचावरम: तमिलनाडु के तट के पास मन्नार की खाड़ी जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र में 21 द्वीप हैं, जिनमें ज्वारनदमुख, समुद्री घास, प्रवाल भित्तियाँ, लवण कच्छ और मैंग्रोव हैं, और पिचावरम मैंग्रोव वन भारत के सबसे पारिस्थितिक रूप से महत्त्वपूर्ण तटीय आर्द्रभूमियों में गिना जाता है।
ज्वारनदमुखों का प्रबंधन: चिल्का झील का पुनरुद्धार और वेंबनाड का लवण अवरोध
चिल्का दिखाती है कि लवणता लौटाकर ज्वारनदमुख को सुधारा जा सकता है। 1993 तक इसकी गिरावट ने इसे मॉन्ट्रो रिकॉर्ड पर पहुँचा दिया, अर्थात् रामसर के उन स्थलों की सूची पर जिनकी पारिस्थितिकी मानवीय क्रियाओं से बदल रही है। ओडिशा ने 1992 में चिल्का विकास प्राधिकरण बनाया, और सितंबर 2000 में सतपड़ा पर रोधिका को काटकर सागर की ओर नया मुहाना खोला गया। नए मुहाने ने निकास नहर को 18 किमी छोटा किया, पूरी झील को अधिक और स्थिर लवणता दी, मत्स्य उत्पादन बढ़ाया और मीठे जल की खरपतवार घटाई। 2002 में चिल्का को रामसर आर्द्रभूमि संरक्षण पुरस्कार मिला।
वेंबनाड इसके उलट विकल्प दिखाती है। 1,252 मीटर लंबा तन्नीरमुक्कम अवरोध ज्वारीय खारे जल को कुट्टनाड के निचले भागों से दूर रखने के लिए बना, जहाँ समुद्र-तल से नीचे धान उगाया जाता है। इसके फाटक बाढ़ का जल निकालने के लिए जुलाई में खोले जाते हैं और नवंबर के मध्य तक बंद रहते हैं। खेतों को मीठा जल मिला, पर मछलियों और झींगों का ऊपर जाने का मार्ग बंद हुआ और जलकुंभी फैल गई। दोनों उदाहरण बताते हैं कि ज्वारनदमुख का प्रबंधन उसकी लवणता प्रवणता का प्रबंधन है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-Iसमुद्री पारिस्थितिकी पर 'मृतक्षेत्रों' (डैड ज़ोन्स) के विस्तार के क्या-क्या परिणाम होते हैं?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: मृतक्षेत्र को ऐसे अल्प-ऑक्सीजन क्षेत्र के रूप में परिभाषित करें जहाँ घुली ऑक्सीजन 2 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे कम हो, जो तब बनता है जब नदी के पोषक तत्वों से हुए प्रस्फुटन का विघटन ऑक्सीजन समाप्त कर देता है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- विस्तार: 2004 में 146 मृतक्षेत्र; बाल्टिक सागर में ये लगभग 5,000 से 60,000 वर्ग किमी से अधिक हो गए।
- जीव: गतिशील मछलियाँ हट जाती हैं; 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे तली के जीव मरते हैं।
- आहार-शृंखला: जैव विविधता घटती है और जेलीफ़िश बहुत बड़ी संख्या में छा सकती हैं।
- अर्थव्यवस्था: तली के जीवों के ढहने से मत्स्य पकड़ सीमित हो जाती है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि मृतक्षेत्र स्थल और ज्वारनदमुखों से शुरू होते हैं, इसलिए पोषक तत्वों के अपवाह को घटाना ही उपाय है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-Iमैंग्रोवों के रिक्तीकरण के कारणों पर चर्चा कीजिए और तटीय पारिस्थितिकी का अनुरक्षण करने में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: मैंग्रोव को उष्णकटिबंधीय तटों के अकेले काष्ठीय लवणमृदोद्भिद् के रूप में प्रस्तुत करें; भारत का मैंग्रोव आवरण 4,992 वर्ग किमी है (भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023)।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- रिक्तीकरण के कारण: झींगा पालन जैसी जलकृषि, गाद और प्रदूषण, मीठा जल रोकने वाले बाँध और अवरोध, और समुद्र-तल वृद्धि से बढ़ती लवणता, जैसे सुंदरबन में।
- महत्त्व: मछलियों और कवचधारी जीवों की पौधशाला, नदी के अवसाद और प्रदूषकों की छन्नी।
- तटीय सुरक्षा: जड़ें ज्वार में टिकी रहती हैं और जल की गति धीमी करती हैं; दलदल अपरदन, तूफ़ानी लहरों और सुनामी की क्षति घटाते हैं।
- कार्बन: मैंग्रोव ब्लू कार्बन के बड़े भंडार हैं; पिचावरम का कुल आर्थिक मूल्य ₹2,485.38 करोड़ आँका गया।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि मैंग्रोवों की रक्षा मत्स्य-उद्योग, तट और जलवायु, तीनों की एक साथ रक्षा है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)भारत के समुद्री जल में हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन में वृद्धि चिंता का विषय है। इस परिघटना के कारक क्या हो सकते हैं?
- ज्वारनदमुखों से पोषक तत्वों का निस्सरण।
- मानसून के दौरान स्थल से अपवाह।
- समुद्रों में उत्प्रवाह।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ज्वारनदमुखों से छोड़े गए पोषक तत्व प्रस्फुटन को पोषण देते हैं, इसलिए 1 कारण है। चरण 2: स्थल का अपवाह उर्वरक और सीवेज लाता है, इसलिए 2 कारण है। चरण 3: उत्प्रवाह सागर-तल से पोषक तत्व ऊपर लाता है और एक प्राकृतिक कारण है, इसलिए 3 भी कारण है। उत्तर 1, 2 और 3।
इस भ्रम से बचें: उत्प्रवाह एक प्राकृतिक, हानिरहित प्रक्रिया लगती है, पर यह वही पोषक तत्व ऊपर लाता है जो प्रस्फुटन को पोषण देते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: ग़लत। इसमें स्थल का अपवाह और उत्प्रवाह छूट गए हैं।
- (b) केवल 1 और 2: ग़लत। इसमें उत्प्रवाह छूट गया है, जो पोषक तत्वों का प्राकृतिक स्रोत है।
- (c) केवल 2 और 3: ग़लत। इसमें ज्वारनदमुखों से छोड़े गए पोषक तत्व छूट गए हैं।
- (d) 1, 2 और 3: सही। तीनों हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन को पोषक तत्व देते हैं।
उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि ज्वारनदमुखों से छोड़े गए पोषक तत्व, स्थल का अपवाह और उत्प्रवाह, तीनों प्रस्फुटन को पोषक तत्व देते हैं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)ज्वारनदमुखों में एक रंजित डाइनोफ़्लैजेलेट की अत्यधिक वृद्धि से विशिष्ट प्रस्फुटन होते हैं। इन प्रस्फुटनों को कहा जाता है
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: प्रश्न ज्वारनदमुखों में रंजित डाइनोफ़्लैजेलेट के प्रस्फुटन का वर्णन करता है। चरण 2: इन डाइनोफ़्लैजेलेट के तटीय प्रस्फुटन को लाल ज्वार कहते हैं। उत्तर (a)।
इस भ्रम से बचें: हर विकल्प में समुद्र से जुड़ा शब्द है; डाइनोफ़्लैजेलेट प्रस्फुटन का नाम केवल एक है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) लाल ज्वार: सही। यह नाम डाइनोफ़्लैजेलेट की कई प्रजातियों के प्रस्फुटन से आया है।
- (b) समुद्री ज्वार: ग़लत। ज्वार सागर का चढ़ना-उतरना है, प्रस्फुटन नहीं।
- (c) काला ज्वार: ग़लत। यह डाइनोफ़्लैजेलेट प्रस्फुटन का नाम नहीं है।
- (d) समुद्री पुष्प: ग़लत। यह शैवाल प्रस्फुटन का कोई शब्द नहीं है।
उत्तर: लाल ज्वार: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि तटीय जल में डाइनोफ़्लैजेलेट प्रस्फुटन को लाल ज्वार कहते हैं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)2004 की सुनामी ने लोगों को यह अनुभव कराया कि मैंग्रोव तटीय आपदाओं के विरुद्ध विश्वसनीय सुरक्षा-कवच का काम कर सकते हैं। मैंग्रोव सुरक्षा-कवच का काम कैसे करते हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: प्रश्न पूछता है कि मैंग्रोव सुरक्षा-कवच कैसे बनते हैं। चरण 2: उनकी सुरक्षा जड़ों से आती है, जो पेड़ों को ज्वार में थामे रखती हैं और जल को धीमा करती हैं। उत्तर (d)।
इस भ्रम से बचें: विकल्प (c) सुरक्षा जैसा लगता है, पर मैंग्रोव अपनी जड़ों के कारण कवच हैं, इसलिए नहीं कि लोग उनके नीचे शरण लेते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) ऐसा क्षेत्र जहाँ लोग नहीं रहते: ग़लत। सुरक्षा स्वयं वन से आती है, लोगों को दूर रखने से नहीं।
- (b) भोजन और औषधियाँ: ग़लत। ये उत्पाद हैं, आपदा से बचाव नहीं।
- (c) ऊँचे पेड़ शरण के रूप में: ग़लत। मैंग्रोव शरण-स्थल नहीं; दलदल जल को धीमा करता है और तट को थामता है।
- (d) विस्तृत जड़ें उखड़ने नहीं देतीं: सही। घनी जड़ें पेड़ों को ज्वार और तूफ़ान में थामे रखती हैं।
उत्तर: विस्तृत जड़ें: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि मैंग्रोव की जड़ें ज्वार और तूफ़ानी जल में टिकी रहती हैं और उसे धीमा करती हैं।
स्रोत
- NCERT: भारत: भौतिक पर्यावरण (कक्षा 11)
- NCERT: Fundamentals of Physical Geography (Class XI), Chapter 12, Water (Oceans)
- NCERT: India Physical Environment (Class XI), Chapters 2, 3 and 5
- NCERT: India People and Economy (Class XII), Chapter on transport
- NCERT: Science (Class IX), Improvement in Food Resources
- Wikipedia: Estuary
- Wikipedia: Brackish water
- Wikipedia: Osmoregulation
- Wikipedia: Euryhaline
- Wikipedia: Stenohaline
- Wikipedia: Halophyte
- Wikipedia: Mangrove
- Wikipedia: Harmful algal bloom
- Wikipedia: Dead zone (ecology)
- Wikipedia: Chilika Lake
- Wikipedia: Pulicat Lake
- Wikipedia: Vembanad
- Wikipedia: Sundarbans
- Wikipedia: Bhitarkanika Mangroves
- Wikipedia: Coringa Wildlife Sanctuary
- Wikipedia: Hooghly River
- NOAA National Ocean Service: What is an estuary?
- PIB: Union Minister releases India State of Forest Report 2023 (21 December 2024)
- The Hindu (Delhi), 3 September 2026: How valuable are mangroves? (Pichavaram study)
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
