परिचय
नाभिकीय विखंडन और संलयन वे दो तरीके हैं जिनसे नाभिक ऊर्जा मुक्त करता है: विखंडन यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक को तोड़ता है और संलयन हाइड्रोजन जैसे हल्के नाभिकों को जोड़ता है; दोनों में बनने वाले नाभिक अधिक दृढ़ता से बँधे होते हैं। रेडियोधर्मिता अस्थायी नाभिकों का अपने-आप होने वाला क्षय है, जिसकी गति अर्धायु से मापी जाती है। नियंत्रित विखंडन भारत के रिएक्टरों और त्रि-चरणीय कार्यक्रम को चलाता है, जबकि संलयन सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है और ITER का लक्ष्य।
परमाणु नाभिक: प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और बंधन-ऊर्जा
न्यूक्लिऑन, समस्थानिक और नाभिकीय बल
परमाणु का नाभिक दो तरह के कणों से बनता है: प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। इन दोनों को मिलाकर न्यूक्लिऑन (nucleons) कहा जाता है। किसी नाभिक में जितने प्रोटॉन हों, वही उस तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) है, और प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों की कुल संख्या उसकी द्रव्यमान संख्या (A) कहलाती है। न्यूट्रॉन की खोज 1932 में जेम्स चैडविक ने की थी, जिसके लिए उन्हें 1935 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। न्यूट्रॉन पर कोई आवेश नहीं होता और इसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन जितना होता है। नाभिक के बाहर अकेला न्यूट्रॉन अस्थायी होता है, किन्तु नाभिक के भीतर वह स्थायी रहता है।
एक ही तत्व के सभी परमाणु समान भार के हों, यह आवश्यक नहीं। जिन परमाणुओं के नाभिक में प्रोटॉन बराबर हों, पर न्यूट्रॉन अलग-अलग, उन्हें समस्थानिक (isotopes) कहते हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था एक जैसी होती है, इसलिए रासायनिक अभिक्रियाओं में इनका व्यवहार भी एक-सा रहता है। हाइड्रोजन इसका सरल उदाहरण है। इसके तीन समस्थानिक हैं: साधारण हाइड्रोजन, जिसके नाभिक में केवल एक प्रोटॉन है; ड्यूटीरियम, जिसमें एक प्रोटॉन और एक न्यूट्रॉन है; और ट्राइटियम, जिसमें एक प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन हैं। परमाणु की संरचना परमाणु संरचना और समस्थानिक (अंग्रेज़ी में) लेख में विस्तार से समझाई गई है।
- समभारिक (isobars): वे नाभिक जिनकी द्रव्यमान संख्या समान हो, जैसे हाइड्रोजन-3 और हीलियम-3।
- समन्यूट्रॉनिक (isotones): वे नाभिक जिनमें न्यूट्रॉन बराबर हों, किन्तु परमाणु क्रमांक अलग।
- नाभिकीय घनत्व: लगभग 2.3 × 1017 किलोग्राम प्रति घन मीटर। यह घनत्व हर नाभिक के लिए लगभग एक जैसा है और जल के घनत्व (103 किलोग्राम प्रति घन मीटर) से कहीं अधिक है।
नाभिक के सभी प्रोटॉन धनावेशित होते हैं और एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं। फिर भी नाभिक बिखरता नहीं, क्योंकि न्यूक्लिऑनों के बीच एक प्रबल आकर्षण काम करता है, जिसे नाभिकीय बल कहते हैं। यह बल विद्युत प्रतिकर्षण से कहीं अधिक शक्तिशाली है, पर केवल कुछ फेम्टोमीटर की दूरी तक ही काम करता है। आवेश से इसका कोई संबंध नहीं, अतः यह प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों, दोनों को समान रूप से बाँधता है।
द्रव्यमान क्षति और बंधन-ऊर्जा: E = mc²
किसी नाभिक का द्रव्यमान मापें, तो वह उसके सभी प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों के अलग-अलग द्रव्यमानों के योग से हमेशा कुछ कम निकलता है। इस अंतर को द्रव्यमान क्षति (mass defect) कहते हैं; ऑक्सीजन-16 के नाभिक में यह 0.13691 परमाणु द्रव्यमान मात्रक है। यह द्रव्यमान कहाँ गया, इसका उत्तर आइंस्टाइन का समीकरण E = mc2 देता है: न्यूक्लिऑनों के जुड़कर नाभिक बनाते समय इतना द्रव्यमान ऊर्जा के रूप में बाहर निकल गया था। इसी कारण नाभिक को फिर से अलग-अलग न्यूक्लिऑनों में तोड़ने के लिए ठीक इतनी ही ऊर्जा बाहर से देनी पड़ती है।
इसी ऊर्जा को नाभिक की बंधन-ऊर्जा (binding energy) कहते हैं। इसे न्यूक्लिऑनों की संख्या से भाग दें, तो पता चलता है कि नाभिक कितनी मज़बूती से बँधा है। द्रव्यमान संख्या 30 से 170 के बीच प्रति न्यूक्लिऑन बंधन-ऊर्जा लगभग 8 MeV रहती है। A = 56 के आसपास यह सबसे अधिक, लगभग 8.75 MeV होती है, जबकि बहुत हल्के और बहुत भारी नाभिकों में घट जाती है; A = 238 पर यह 7.6 MeV है। पृष्ठ के आरंभ में दिया वक्र यही दिखाता है।
रेडियोधर्मिता और अर्धायु
रेडियोधर्मिता की खोज: बैकेरल और क्यूरी दंपती
रेडियोधर्मिता की खोज 1896 में ए. एच. बैकेरल ने संयोग से की थी। उन्होंने यूरेनियम-पोटैशियम सल्फ़ेट के कुछ टुकड़े काले कागज़ में लपेटकर फ़ोटोग्राफ़िक प्लेट के पास रखे; दोनों के बीच चाँदी की एक पट्टी भी थी। कई घंटे बाद प्लेट काली पड़ गई। स्पष्ट था कि यूरेनियम के इस यौगिक से कुछ ऐसा निकल रहा है, जो कागज़ और चाँदी, दोनों को पार कर सकता है। आगे चलकर मैरी और पियरे क्यूरी ने रेडियम और पोलोनियम को अलग किया। मैरी क्यूरी दो नोबेल पुरस्कार पाने वाली पहली व्यक्ति बनीं: 1903 में भौतिकी का और 1911 में रसायनशास्त्र का।
कोई नमूना कितना रेडियोधर्मी है, यह उसकी सक्रियता (activity) से मापा जाता है, अर्थात् एक सेकंड में होने वाले क्षयों की संख्या से। इसका मात्रक बेकरेल है; एक बेकरेल का अर्थ है प्रति सेकंड एक क्षय। पुराना मात्रक क्यूरी 3.7 × 1010 बेकरेल के बराबर है। ट्राइटियम और प्लूटोनियम जैसे कुछ रेडियोधर्मी तत्व ब्रह्मांड की आयु की तुलना में बहुत जल्दी क्षयित हो जाते हैं। इसी कारण प्रकृति में ये उल्लेखनीय मात्रा में नहीं मिलते, और इन्हें प्रयोगशालाओं तथा रिएक्टरों में बनाया जाता है।
ऐल्फ़ा, बीटा और गामा क्षय
अस्थायी नाभिक तीन प्रकार से क्षयित होता है, और हर प्रकार उसे अलग ढंग से बदलता है। इनमें पहला, ऐल्फ़ा कण, वास्तव में हीलियम का नाभिक है: दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन, एक साथ बँधे हुए। दो प्रोटॉनों के कारण इस पर दो धनात्मक आवेश होते हैं, और इसका द्रव्यमान लगभग हीलियम परमाणु जितना होता है।
- ऐल्फ़ा क्षय: नाभिक हीलियम का एक नाभिक बाहर फेंकता है। इससे द्रव्यमान संख्या 4 और परमाणु क्रमांक 2 घट जाता है; जैसे यूरेनियम-238 बदलकर थोरियम-234 बन जाता है।
- बीटा क्षय: नाभिक का एक न्यूट्रॉन प्रोटॉन में बदल जाता है और एक इलेक्ट्रॉन बाहर निकलता है (बीटा-ऋण क्षय)। कुछ नाभिकों में इसका उलटा होता है: एक प्रोटॉन न्यूट्रॉन में बदलता है और एक पॉज़िट्रॉन निकलता है। दोनों में द्रव्यमान संख्या वही रहती है।
- गामा क्षय: उत्तेजित नाभिक निचली ऊर्जा अवस्था में आते हुए उच्च ऊर्जा का एक फ़ोटॉन छोड़ता है। द्रव्यमान संख्या और परमाणु क्रमांक, दोनों में कोई परिवर्तन नहीं होता।
गामा किरणें प्रायः ऐल्फ़ा या बीटा क्षय के बाद निकलती हैं। कोबाल्ट-60 में यही होता है: बीटा क्षय से यह निकेल-60 का उत्तेजित नाभिक बनता है, जो 1.17 MeV और 1.33 MeV की गामा किरणें छोड़कर स्थिर हो जाता है। बीटा क्षय में इलेक्ट्रॉन या पॉज़िट्रॉन के साथ एक और कण निकलता है: बीटा-ऋण क्षय में प्रतिन्यूट्रिनो और पॉज़िट्रॉन वाले क्षय में न्यूट्रिनो। इन दोनों पर कोई आवेश नहीं होता और इनका द्रव्यमान बहुत कम या शून्य है। पदार्थ से इनकी अन्योन्यक्रिया इतनी कम होती है कि ये पूरी पृथ्वी को पार कर जाते हैं।
अर्धायु, रेडियोधर्मी क्षय और कार्बन डेटिंग
हर सेकंड कितने नाभिक क्षयित होंगे, यह इस पर निर्भर करता है कि उस समय कितने नाभिक बचे हैं। इसी कारण रेडियोधर्मी क्षय चरघातांकी (exponential) नियम से चलता है। बल्बों के साथ ऐसा नहीं होता; एक साथ लगाए गए बल्ब लगभग एक ही समय पर फ्यूज़ हो जाते हैं। हर रेडियोधर्मी नाभिक की अर्धायु निश्चित होती है। उदाहरण के लिए, ट्राइटियम की अर्धायु 12.5 वर्ष, फ़ॉस्फ़ोरस-32 की 14.3 दिन और यूरेनियम-238 की 4.5 × 109 वर्ष है।
इसी निश्चितता का उपयोग कार्बन डेटिंग में होता है। जब तक कोई पौधा या जंतु जीवित रहता है, वह कार्बन-14 ग्रहण करता रहता है। मृत्यु के बाद यह ग्रहण रुक जाता है, और शरीर में बचा कार्बन-14 लगभग 5,730 वर्ष की अर्धायु से घटने लगता है। अतः लकड़ी या हड्डी में बचे कार्बन-14 को मापकर बताया जा सकता है कि मृत्यु कितने समय पहले हुई। यह विधि लगभग 50,000 वर्ष पुराने नमूनों तक विश्वसनीय परिणाम देती है।
नाभिकीय ऊर्जा: नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन
नाभिकीय विखंडन और श्रृंखला अभिक्रिया
एनरिको फ़र्मी ने देखा कि विभिन्न तत्वों पर न्यूट्रॉनों की बौछार करने से नए रेडियोधर्मी तत्व बनते हैं। जब कोई न्यूट्रॉन यूरेनियम-235 के नाभिक से टकराता है, तो नाभिक लगभग बराबर के दो खंडों में टूट जाता है, जैसे बेरियम-144 और क्रिप्टॉन-89, और साथ में तीन न्यूट्रॉन निकलते हैं। इसी प्रक्रिया को नाभिकीय विखंडन (nuclear fission) कहते हैं। हर विखंडन में लगभग 200 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा पहले खंडों की गति के रूप में दिखती है और अंत में आसपास के पदार्थ में ऊष्मा बन जाती है।
एक विखंडन में औसतन ढाई न्यूट्रॉन निकलते हैं, जबकि उसे आरंभ करने में एक ही न्यूट्रॉन लगा था। ये अतिरिक्त न्यूट्रॉन आगे और नाभिकों को तोड़ सकते हैं। इस क्रम को श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) कहते हैं, जिसका सुझाव फ़र्मी ने 1939 में दिया था। यह अभिक्रिया अनियंत्रित और तीव्र हो, तो परमाणु बम बनता है; नियंत्रित और स्थिर रहे, तो नाभिकीय रिएक्टर। इससे मिलने वाली ऊर्जा भी असाधारण है। एक किलोग्राम कोयला जलाने से लगभग 107 जूल ऊर्जा मिलती है, जबकि एक किलोग्राम यूरेनियम के विखंडन से लगभग 1014 जूल। अर्थात् समान मात्रा के पदार्थ से नाभिकीय स्रोत रासायनिक स्रोतों की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जा देते हैं।
सूर्य और ITER में नाभिकीय संलयन
संलयन, विखंडन की ठीक उलटी प्रक्रिया है। नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) में दो हल्के नाभिक जुड़कर एक भारी नाभिक बनाते हैं। कठिनाई यह है कि दोनों नाभिक धनावेशित होते हैं और एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं। इस प्रतिकर्षण को पार करने के लिए अत्यधिक ताप और दाब चाहिए, जो प्रकृति में केवल तारों के भीतर मिलता है। सूर्य प्रोटॉन-प्रोटॉन चक्र से हाइड्रोजन को हीलियम में बदलता है: चार हाइड्रोजन परमाणु मिलकर एक हीलियम परमाणु बनाते हैं और 26.7 MeV ऊर्जा निकलती है। सूर्य लगभग 5 अरब वर्ष से इसी प्रकार चमक रहा है, और उसमें लगभग इतने ही समय के लिए हाइड्रोजन शेष है।
पृथ्वी पर नियंत्रित संलयन कराना कहीं अधिक कठिन है। फिर भी भारत सहित कई देश इस पर काम कर रहे हैं, क्योंकि संलयन रिएक्टर को भविष्य का ऊर्जा स्रोत माना जाता है। इस दिशा की सबसे बड़ी परियोजना ITER (अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर) है। यह दक्षिणी फ़्रांस में कडाराश अनुसंधान केंद्र के पास बन रहा एक टोकामैक (tokamak) है। इसका लक्ष्य 50 MW ऊष्मा देकर 500 MW संलयन ऊष्मा प्राप्त करना है, अर्थात् दस गुना लाभ। इसमें पहला प्लाज़्मा 2033 से 2034 के बीच बनने की आशा है।
- ITER के सदस्य: चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका। भारत 2005 में औपचारिक रूप से इसका सदस्य बना।
- भारत का हिस्सा: निर्माण का 9.1 प्रतिशत, जो नकद नहीं, बल्कि उपकरणों के रूप में दिया जा रहा है। यह काम अहमदाबाद के प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान में स्थित ITER-India करता है।
- भारत के उपकरण: क्रायोस्टैट, क्रायोलाइन, इन-वेसल शील्डिंग, तथा शीतलन और शीतलन जल प्रणालियाँ।
- वैज्ञानिक और उद्योग: लगभग 200 भारतीय वैज्ञानिक और सहयोगी, तथा L&T, आइनॉक्स इंडिया, TCS, TCE और HCL टेक्नोलॉजीज़ जैसी कंपनियाँ।
भारत में संलयन अनुसंधान का केंद्र प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान (Institute for Plasma Research) रहा है। 1989 में यहाँ ADITYA टोकामैक शुरू हुआ, जिससे देश में पूर्ण टोकामैक प्रयोगों की शुरुआत हुई। 1995 के एक निर्णय के बाद SST-1 बना, जो 1,000 सेकंड तक लगातार चलने के लिए बनाया गया अतिचालक, स्थिर-अवस्था टोकामैक है। संलयन का सबसे बड़ा आकर्षण उसका ईंधन है। ड्यूटीरियम-ट्राइटियम मिश्रण का केवल एक ग्राम 90,000 किलोवाट-घंटे ऊर्जा दे सकता है, जो लगभग 11 टन कोयले के बराबर है।
नाभिकीय विखंडन और संलयन में अंतर
| बिंदु | विखंडन | संलयन |
|---|---|---|
| क्या होता है | भारी नाभिक टूटता है | हल्के नाभिक जुड़ते हैं |
| सामान्य ईंधन | यूरेनियम-235, प्लूटोनियम-239 | हाइड्रोजन के समस्थानिक |
| प्रक्रिया कैसे शुरू होती है | एक धीमे न्यूट्रॉन से | अत्यधिक ताप और दाब से |
| कहाँ होता है | रिएक्टर और परमाणु बम में | सूर्य, तारों और हाइड्रोजन बम में |
| अवशेष | अत्यधिक रेडियोधर्मी प्रयुक्त ईंधन | सूर्य के चक्र में हीलियम |
| बिजली उत्पादन | आज के परमाणु संयंत्र इसी पर चलते हैं | अभी प्रायोगिक, जैसे ITER |
हाइड्रोजन बम में दोनों प्रक्रियाएँ साथ आती हैं। इसमें पहले एक विखंडन बम का विस्फोट किया जाता है, जिससे इतना ताप पैदा होता है कि ड्यूटीरियम और ट्राइटियम का संलयन हो सके। ऐसा पहला उपकरण 1 नवंबर 1952 को एनीवेटॉक एटॉल पर विस्फोटित किया गया था। बिजली उत्पादन की दृष्टि से दोनों में सबसे बड़ा अंतर उनके अवशेष का है: विखंडन के बाद अत्यधिक रेडियोधर्मी प्रयुक्त ईंधन बचता है, जबकि सूर्य में होने वाला संलयन अंत में हीलियम बनाता है।
नाभिकीय रिएक्टर की कार्यप्रणाली और भारत का नाभिकीय कार्यक्रम
नाभिकीय रिएक्टर कैसे काम करता है: ईंधन, भारी जल मंदक, नियंत्रक छड़ें और शीतलक
विखंडन की श्रृंखला अभिक्रिया को स्थिर गति से चलाने और उससे बनी ऊष्मा को बाहर ले जाने वाले यंत्र को नाभिकीय रिएक्टर कहते हैं। विखंडन से निकले न्यूट्रॉन तेज़ होते हैं; उनकी औसत ऊर्जा लगभग 2 MeV होती है। ऐसे तेज़ न्यूट्रॉन प्रायः यूरेनियम-235 के किसी नाभिक को तोड़े बिना निकल जाते हैं, जबकि धीमे न्यूट्रॉन कहीं आसानी से विखंडन कराते हैं। इसलिए रिएक्टर में हल्के नाभिकों से बना एक मंदक (moderator) रखा जाता है, जो न्यूट्रॉनों को धीमा करता है। जैसे कोई कंचा अपने ही जैसे दूसरे कंचे से सीधा टकराकर रुक जाता है और अपनी ऊर्जा उसे दे देता है, वैसे ही न्यूट्रॉन हल्के नाभिकों से टकराकर अपनी गति खो देते हैं।
- ईंधन: यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम। भारत के पहले चरण के रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम जलाते हैं।
- मंदक: जल, भारी जल या ग्रेफ़ाइट। भारत के विद्युत रिएक्टरों में भारी जल (D2O) का उपयोग होता है, जबकि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) का अप्सरा अनुसंधान रिएक्टर साधारण जल का उपयोग करता है। भारी जल बहुत कम न्यूट्रॉन सोखता है; इसी कारण भारी जल या कार्बन (ग्रेफ़ाइट) जैसे मंदक के साथ प्राकृतिक यूरेनियम से भी श्रृंखला अभिक्रिया चल सकती है।
- नियंत्रक छड़ें: कैडमियम या किसी अन्य न्यूट्रॉन-अवशोषक की छड़ें, जो अभिक्रिया की गति तय करती हैं। अलग से लगी सुरक्षा छड़ें आपात स्थिति में नीचे गिराकर रिएक्टर को तुरंत बंद कर सकती हैं।
- शीतलक: रिएक्टर की ऊष्मा को भाप जनित्र तक ले जाता है। दाबित जल रिएक्टर में यह काम लगभग 600 K ताप और 150 वायुमंडल दाब पर रखा जल करता है, और इससे बनी भाप टरबाइन घुमाती है।
भारत के विद्युत रिएक्टरों में मंदक के रूप में भारी जल का उपयोग होता है। भारी जल में साधारण हाइड्रोजन के स्थान पर ड्यूटीरियम होता है, जिसकी खोज 1931 में हेरोल्ड यूरे ने की थी। रिएक्टर किस अवस्था में है, यह उसके गुणन गुणांक (K) से पता चलता है। न्यूट्रॉनों की किसी पीढ़ी में हुए विखंडनों की संख्या को पिछली पीढ़ी के विखंडनों से भाग देने पर K मिलता है। K = 1 होने पर रिएक्टर क्रांतिक (critical) होता है, अर्थात् अभिक्रिया स्थिर और स्वपोषी रहती है। K के 1 से अधिक होने पर शक्ति चरघातांकी रूप से बढ़ती है, जैसा 1986 में चेर्नोबिल में हुआ; 1 से कम होने पर अभिक्रिया धीरे-धीरे रुक जाती है।
तापीय और द्रुत प्रजनक रिएक्टर: कल्पक्कम का प्रोटोटाइप द्रुत प्रजनक रिएक्टर
भारत के दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) तापीय रिएक्टर हैं, जिनमें मंदक न्यूट्रॉनों को धीमा करता है। द्रुत प्रजनक रिएक्टर (fast breeder reactor) में ऐसा नहीं होता। वह तेज़ न्यूट्रॉनों से ही श्रृंखला अभिक्रिया चलाता है, इसलिए उसे मंदक की आवश्यकता नहीं होती। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बिजली बनाते हुए यह जितना विखंडनीय ईंधन जलाता है, उससे अधिक बना देता है। इसके लिए यह यूरेनियम-238 को, जो स्वयं विखंडित नहीं होता, प्लूटोनियम-239 में बदल देता है।
| बिंदु | तापीय रिएक्टर | द्रुत प्रजनक रिएक्टर |
|---|---|---|
| न्यूट्रॉन | मंदक से धीमे किए जाते हैं | तेज़ रहते हैं, कोई मंदक नहीं |
| भारत में ईंधन | प्राकृतिक यूरेनियम | यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड |
| शीतलक | भारी जल | द्रव सोडियम |
| ईंधन का निर्माण | प्रयुक्त ईंधन से प्लूटोनियम मिलता है | जितना जलाता है, उससे अधिक विखंडनीय ईंधन बनाता है |
कल्पक्कम में भारत का 500 MWe क्षमता का प्रोटोटाइप द्रुत प्रजनक रिएक्टर (PFBR) 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रांतिक हुआ, अर्थात् इसमें नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया शुरू हुई। इसकी रूपरेखा इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) ने बनाई है और निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) ने किया है। इसके कोर में मिश्रित ऑक्साइड ईंधन है, जिसके चारों ओर यूरेनियम-238 का एक आवरण (blanket) है। तेज़ न्यूट्रॉन इस आवरण के यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम-239 में बदलते हैं। आगे चलकर इसी आवरण में थोरियम-232 रखकर यूरेनियम-233 बनाया जा सकेगा। इस घटना का पूरा विवरण कल्पक्कम में PFBR की पहली क्रांतिकता (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
थोरियम और भारत का त्रि-चरणीय नाभिकीय कार्यक्रम
भारत के पास यूरेनियम कम है, किन्तु थोरियम के भंडार विश्व के सबसे बड़े भंडारों में गिने जाते हैं। इसी को ध्यान में रखकर देश ने तीन चरणों वाली रणनीति अपनाई, जिसमें हर चरण अगले चरण के लिए ईंधन तैयार करता है। थोरियम को सीधे ईंधन की तरह नहीं जलाया जा सकता। यह उर्वर तत्व है, विखंडनीय नहीं; पहले इसे रिएक्टर में यूरेनियम-233 में बदलना पड़ता है। केरल और ओडिशा की तटीय रेत में मोनाज़ाइट प्रचुर मात्रा में मिलता है, जिसमें लगभग 8 से 10 प्रतिशत थोरियम होता है।
- पहला चरण: दाबित भारी जल रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम जलाते हैं, और इनमें भारी जल मंदक का काम करता है। इनके प्रयुक्त ईंधन से प्लूटोनियम-239 प्राप्त होता है।
- दूसरा चरण: द्रुत प्रजनक रिएक्टर यही प्लूटोनियम जलाते हैं और साथ में नया ईंधन बनाते हैं, जिसमें थोरियम-232 से बना यूरेनियम-233 भी शामिल है।
- तीसरा चरण: यूरेनियम-233 से चलने वाले रिएक्टर बड़े पैमाने पर भारत के थोरियम भंडार का उपयोग करेंगे।
पृथ्वी की भूपर्पटी में थोरियम, यूरेनियम से लगभग तीन गुना अधिक है। थोरियम ईंधन चक्र से कम नाभिकीय अपशिष्ट बनने की आशा है, और इससे बनने वाले यूरेनियम-233 से हथियार बनाना कठिन है। कल्पक्कम का KAMINI अनुसंधान रिएक्टर यूरेनियम-233 ईंधन पर चलता है।
भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र: रिएक्टर, क्षमता और मानचित्र
| संयंत्र | राज्य | विशेष बात |
|---|---|---|
| तारापुर | महाराष्ट्र | भारत का पहला वाणिज्यिक संयंत्र |
| रावतभाटा | राजस्थान | राजस्थान का संयंत्र |
| नरोरा | उत्तर प्रदेश | बुलंदशहर ज़िले में |
| काकरापार | गुजरात | तापी नदी के पास |
| कैगा | कर्नाटक | काली नदी के पास |
| कल्पक्कम | तमिलनाडु | PFBR भी यहीं है |
| कुडनकुलम | तमिलनाडु | सबसे बड़ा; रूस के सहयोग से बना |
भारत के विद्युत उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। कोयला, जलविद्युत, सौर और पवन ऊर्जा के बाद परमाणु ऊर्जा पाँचवाँ सबसे बड़ा स्रोत है। देश के अधिकतर परमाणु रिएक्टर दाबित भारी जल रिएक्टर हैं, जो प्राकृतिक यूरेनियम पर चलते हैं; इसी कारण पहले चरण के लिए संवर्धित ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। इसके विपरीत, विश्व के अधिकांश विद्युत रिएक्टर हल्के जल रिएक्टर हैं, जिनमें लगभग 3 से 5% तक संवर्धित यूरेनियम-235 का उपयोग होता है।
भारत का नाभिकीय कार्यक्रम स्वतंत्रता के आसपास होमी जे. भाभा के नेतृत्व में शुरू हुआ। 3 अगस्त 1948 को परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ और भाभा इसके पहले अध्यक्ष बने। अनुसंधान रिएक्टर अप्सरा 4 अगस्त 1956 को क्रांतिक हुआ, और 1960 में CIRUS। ट्रॉम्बे में भारत ने अपनी ही रूपरेखा और निर्माण से प्लूटोनियम संयंत्र बनाया, जिससे पुनर्संसाधन (reprocessing) की तकनीक मिली; इस तकनीक से प्रयुक्त ईंधन में से उपयोगी विखंडनीय और उर्वर पदार्थ अलग किए जाते हैं। बाद में ZERLINA, PURNIMA, DHRUVA और KAMINI जैसे अनुसंधान रिएक्टर बने। आज भारत अपनी आवश्यकता से अधिक भारी जल बना लेता है।
नाभिकीय नीति: SHANTI अधिनियम, लघु मॉड्यूलर रिएक्टर और IAEA सुरक्षा उपाय
सरकार नाभिकीय ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार करना चाहती है। केंद्रीय बजट 2025-26 के नाभिकीय ऊर्जा मिशन में 2047 तक 100 GW क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य 2070 तक नेट ज़ीरो (शुद्ध शून्य उत्सर्जन) की राह का हिस्सा है, और 2031-32 तक क्षमता 22.38 GW तक पहुँचने की आशा है। इस विस्तार के लिए दो बदलाव किए जा रहे हैं: नया विधिक ढाँचा और नए प्रकार के रिएक्टर।
- SHANTI अधिनियम, 2025: Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India Act। यह नाभिकीय क्षेत्र की विधियों को एक ढाँचे में लाता है, विनियमन के अधीन सीमित निजी भागीदारी की अनुमति देता है, और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को सांविधिक मान्यता देता है।
- लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR): इनके डिज़ाइन और स्थापना के लिए ₹20,000 करोड़ रखे गए हैं, और 2033 तक कम-से-कम पाँच स्वदेशी इकाइयाँ चालू करने का लक्ष्य है। BARC 200 MWe का भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर और 55 MWe का SMR-55 डिज़ाइन कर रहा है।
- दायित्व: 2010 के सिविल दायित्व अधिनियम (Civil Liability for Nuclear Damage Act, 2010) ने दोष सिद्ध किए बिना दायित्व (no-fault liability) की व्यवस्था की, ताकि नाभिकीय दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवज़ा मिल सके।
नाभिकीय सुविधाओं के निरीक्षण के नियम आयातित ईंधन से जुड़े हैं। 2005 में भारत इस पर सहमत हुआ कि वह अपनी असैनिक और सैनिक नाभिकीय सुविधाओं को अलग करेगा, और असैनिक सुविधाओं को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षण, अर्थात् आई.ए.ई.ए. सुरक्षा उपायों (IAEA safeguards), के अधीन रखेगा। 6 सितंबर 2008 को नाभिकीय पूर्तिकर्ता समूह (NSG) से छूट मिलने के बाद भारत के लिए दूसरे देशों से नाभिकीय ईंधन और तकनीक लेने का रास्ता खुला। आयातित यूरेनियम पर चलने वाले रिएक्टर इन सुरक्षा उपायों के अधीन हैं। लघु रिएक्टरों पर अधिक जानकारी लघु मॉड्यूलर रिएक्टर और भारत स्मॉल रिएक्टर (अंग्रेज़ी में) लेख में है।
विकिरण के उपयोग और खतरे
चिकित्सा, कृषि और उद्योग में रेडियो समस्थानिक; RTG
अनुसंधान रिएक्टर बिजली बनाने के लिए नहीं, शोध के लिए बनाए जाते हैं। ये रेडियो समस्थानिकों (radioisotopes) के भी उत्तम स्रोत हैं। किसी तत्व के रेडियोधर्मी समस्थानिक को रेडियो समस्थानिक कहते हैं। रासायनिक व्यवहार में यह उसी तत्व के साधारण परमाणु जैसा होता है, पर इसके विकिरण को संवेदनशील संसूचक बहुत कम मात्रा में भी पकड़ लेते हैं। इसी गुण के कारण किसी पदार्थ का मार्ग खोजने वाले अनुरेखक (tracer) के रूप में और विकिरण के स्रोत के रूप में इनका उपयोग होता है। भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग की इकाई, बोर्ड ऑफ़ रेडिएशन एंड आइसोटोप टेक्नोलॉजी (BRIT), नवी मुंबई, इन्हीं उपयोगों को विकसित करती है।
- चिकित्सा: कोबाल्ट-60 की गामा किरणें कैंसर के उपचार (कोबाल्ट चिकित्सा) में और चिकित्सा उपकरणों को रोगाणुमुक्त करने में काम आती हैं। आयोडीन-131, जिसकी अर्धायु लगभग आठ दिन है, थायरॉइड के रोगों के उपचार में दिया जाता है, और PET तथा SPECT जैसे स्कैन रेडियोधर्मी अनुरेखकों पर आधारित हैं।
- कृषि और खाद्य: गामा किरणों से खाद्य विकिरणन (food irradiation) किया जाता है, जो आलू, प्याज़ और लहसुन का अंकुरण रोकता है और खाद्य पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखता है। विकिरण से कीटों को बंध्य बनाकर उनकी संख्या भी नियंत्रित की जाती है, और कार्बन-14 तथा फ़ॉस्फ़ोरस के रेडियो समस्थानिक पौधों में जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं का मार्ग खोजने में काम आते हैं।
- उद्योग और शोध: कोबाल्ट-60 औद्योगिक रेडियोग्राफ़ी में विकिरण स्रोत के रूप में उपयोग होता है, और प्राकृतिक कार्बन-14 से पुरानी लकड़ी तथा हड्डियों की आयु निकाली जाती है।
विकिरण समस्थानिक ताप-वैद्युत जेनरेटर (RTG) एक प्रकार की नाभिकीय बैटरी है, जिसमें कोई चलने वाला पुर्ज़ा नहीं होता। इसमें तापयुग्म (thermocouples) रेडियोधर्मी क्षय से निकली ऊष्मा को बिजली में बदलते हैं, अतः यह विखंडन रिएक्टर बिल्कुल नहीं है। टूटने या घिसने वाला कोई भाग न होने से यह अत्यंत विश्वसनीय है। दूरस्थ और कठोर परिस्थितियों में, विशेषकर सूर्य से बहुत दूर जाने वाले अंतरिक्षयानों में, जहाँ सौर पैनल ठीक से काम नहीं कर पाते, RTG ही ऊर्जा का पसंदीदा स्रोत है।
- ईंधन: प्लूटोनियम-238, जिसकी अर्धायु 87.7 वर्ष है और जिससे गामा किरणें तथा न्यूट्रॉन कम निकलते हैं।
- ईंधन का स्रोत: अधिकांश प्लूटोनियम-238 नेप्च्यूनियम-237 को विकिरणित करके बनाया गया। नेप्च्यूनियम-237 हथियार-श्रेणी प्लूटोनियम-239 बनाने की प्रक्रिया का उपोत्पाद है।
- मिशन: पायनियर 10 और 11, वॉयेजर 1 और 2, गैलीलियो, कैसिनी और न्यू होराइज़न्स।
क्या नाभिकीय ऊर्जा नवीकरणीय है? सुरक्षा, नाभिकीय अपशिष्ट और दुर्घटनाएँ
नाभिकीय ऊर्जा को नवीकरणीय नहीं माना जाता। इसका ईंधन यूरेनियम खनन से मिलता है, और एक बार उपयोग होने के बाद अपने-आप फिर से नहीं बनता। फिर भी यह निम्न-कार्बन ऊर्जा स्रोत है। द्रव्यमान के हिसाब से इसे रासायनिक ईंधनों की तुलना में लगभग दस लाख गुना कम ईंधन चाहिए, और कोयला, तेल या गैस जलाने वाले संयंत्रों के विपरीत इसके संयंत्र बिजली बनाते समय ग्रीनहाउस गैसें नहीं छोड़ते।
नाभिकीय ऊर्जा की सबसे बड़ी समस्या प्रयुक्त ईंधन है, जो अत्यधिक रेडियोधर्मी होता है और जीवन के लिए बहुत खतरनाक है। हर रिएक्टर में नाभिकीय अपशिष्ट जमा होता रहता है, जिसमें विखंडन उत्पाद भी होते हैं और प्लूटोनियम तथा अमेरिशियम जैसे भारी तत्व भी। इस अपशिष्ट को बहुत सावधानी से संभालना और पुनर्संसाधित करना पड़ता है।
- चेर्नोबिल, 1986: 26 अप्रैल 1986 को यूक्रेन में प्रिप्यात के पास रिएक्टर संख्या 4 में विस्फोट हुआ। यह दुर्घटना बताती है कि रिएक्टर में गड़बड़ी कितनी विनाशकारी हो सकती है।
- फ़ुकुशिमा, 2011: 11 मार्च 2011 को तोहोकू भूकंप और सुनामी के कारण फ़ुकुशिमा दाइची संयंत्र की बिजली और लगभग सभी वैकल्पिक व्यवस्थाएँ बंद हो गईं। रिएक्टरों को ठंडा नहीं किया जा सका, और रेडियोधर्मी पदार्थ बाहर फैल गया।
- स्थानीय विरोध: तमिलनाडु के कुडनकुलम संयंत्र का काम स्थानीय मछुआरों के विरोध के कारण कई बार रुका।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2026, सामान्य अध्ययन-IIIएक द्रुत प्रजनक रिएक्टर (एफ बी आर) और एक तापीय परमाणुक रिएक्टर के बीच भेद बताइए। कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से विकसित प्रथम प्रारूपी (प्रोटोटाइप) एफ बी आर के संदर्भ में, 'क्रान्तिकता (क्रिटकलिटी)' पद की व्याख्या कीजिए। हमारे देश के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य के लिये इसके निहितार्थ क्या हैं?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: कल्पक्कम के 500 MWe के PFBR से शुरुआत करें: इसकी रूपरेखा IGCAR ने बनाई, निर्माण BHAVINI ने किया, और यह 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रांतिक हुआ।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- तापीय रिएक्टर: मंदक न्यूट्रॉनों को धीमा करता है; ईंधन प्राकृतिक यूरेनियम; मंदक भारी जल।
- द्रुत प्रजनक रिएक्टर: तेज़ न्यूट्रॉन, कोई मंदक नहीं; मिश्रित ऑक्साइड ईंधन; द्रव सोडियम शीतलक; जितना ईंधन जलाता है, उससे अधिक बनाता है।
- क्रांतिकता: गुणन गुणांक K = 1, अर्थात् नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया स्थिर और स्वपोषी हो गई।
- निहितार्थ: भारत का नाभिकीय कार्यक्रम दूसरे चरण में; थोरियम तक पहुँचने की कड़ी; बंद ईंधन चक्र; रूस के बाद ऐसा करने वाला दूसरा देश।
- स्वच्छ ऊर्जा: निम्न-कार्बन आधार-भार बिजली; 2047 तक 100 GW का लक्ष्य; 2070 तक नेट ज़ीरो।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि PFBR भारत के सीमित यूरेनियम और प्रचुर थोरियम को दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा का आधार बनाता है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IIIभारत में संलयन ऊर्जा कार्यक्रम का पिछले कुछ दशकों में निरंतर क्रमिक-विकास हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय संलयन ऊर्जा परियोजना: अंतर्राष्ट्रीय तापनाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (आई टी ई आर) में भारत के योगदान का उल्लेख कीजिए। वैश्विक ऊर्जा के भविष्य के लिए इस परियोजना की सफलता के क्या निहितार्थ होंगे?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: संलयन को सूर्य की ऊर्जा का स्रोत बताते हुए शुरुआत करें, और ITER को इसे पृथ्वी पर नियंत्रित करने का सबसे बड़ा प्रयास बताएँ, जो फ़्रांस में कडाराश के पास बन रहा टोकामैक है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- भारत का कार्यक्रम: प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान; ADITYA टोकामैक (1989); SST-1 स्थिर-अवस्था टोकामैक।
- ITER सदस्यता: भारत 2005 में शामिल हुआ; निर्माण में 9.1 प्रतिशत हिस्सा, जो ITER-India उपकरणों के रूप में दे रहा है।
- उपकरण: क्रायोस्टैट, क्रायोलाइन, इन-वेसल शील्डिंग, शीतलन और शीतलन जल प्रणालियाँ; लगभग 200 वैज्ञानिक; L&T और आइनॉक्स इंडिया जैसी कंपनियाँ।
- निहितार्थ: 50 MW ऊष्मा से 500 MW संलयन ऊष्मा (दस गुना लाभ); हल्का हाइड्रोजन ईंधन; दीर्घजीवी विखंडन अपशिष्ट नहीं; प्रचुर स्वच्छ ऊर्जा की संभावना।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि ITER की सफलता संलयन को प्रयोगशाला से ऊर्जा स्रोत तक ले जाएगी, और भारत इस तकनीक में भागीदार होगा।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-IIIऊर्जा की बढ़ती हुई जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिए? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता से शुरुआत करें, और बताएँ कि 8.78 GW क्षमता के साथ विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 3% (2024-25) है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- तथ्य: निम्न-कार्बन और विश्वसनीय आधार-भार बिजली; द्रव्यमान के हिसाब से रासायनिक ईंधनों की तुलना में लगभग दस लाख गुना कम ईंधन।
- तथ्य: ऊर्जा सुरक्षा के लिए त्रि-चरणीय कार्यक्रम और थोरियम; PFBR; 2047 तक 100 GW का लक्ष्य।
- भय: दुर्घटनाएँ (चेर्नोबिल 1986, फ़ुकुशिमा 2011); अत्यधिक रेडियोधर्मी प्रयुक्त ईंधन और अपशिष्ट।
- भय: दुर्घटना होने पर दायित्व; कुडनकुलम जैसा स्थानीय विरोध; आयातित यूरेनियम पर निर्भरता।
- समाधान: SHANTI अधिनियम के अंतर्गत परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की सांविधिक भूमिका; सुरक्षा छड़ें और सुरक्षित डिज़ाइन; प्रयुक्त ईंधन का पुनर्संसाधन।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि कठोर विनियमन, अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन और जन-विश्वास के साथ विस्तार जारी रखना उचित है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2017, सामान्य अध्ययन-IIIभारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संवृद्धि और विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए। भारत में तीव्र प्रजनक रियेक्टर कार्यक्रम का क्या लाभ है?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: स्वतंत्रता के आसपास होमी जे. भाभा के नेतृत्व में शुरू हुए कार्यक्रम से शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- पड़ाव: अप्सरा 4 अगस्त 1956 को क्रांतिक हुआ; CIRUS 1960 में; ट्रॉम्बे का प्लूटोनियम संयंत्र; DHRUVA और KAMINI।
- क्षमताएँ: ईंधन निर्माण, भारी जल उत्पादन, रिएक्टर डिज़ाइन और पुनर्संसाधन; दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR)।
- सीमित यूरेनियम और प्रचुर थोरियम को देखते हुए बनी त्रि-चरणीय रणनीति।
- द्रुत प्रजनक रिएक्टर के लाभ: जितना ईंधन जलाता है, उससे अधिक बनाता है; यूरेनियम-238 का उपयोग करता है; थोरियम तक पहुँचने की कड़ी है; बंद ईंधन चक्र पर चलता है।
- 2026 में PFBR का पहली बार क्रांतिक होना, अर्थात् दूसरे चरण की शुरुआत।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि द्रुत प्रजनक रिएक्टर ही वह कड़ी है, जिससे भारत का थोरियम लंबे समय तक नाभिकीय ऊर्जा दे सकेगा।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)नाभिकीय रिएक्टर में भारी जल का कार्य है
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: विखंडन से निकले न्यूट्रॉन तेज़ होते हैं और अधिकतर बिना विखंडन कराए निकल जाते हैं। चरण 2: धीमे न्यूट्रॉन यूरेनियम-235 को कहीं आसानी से तोड़ते हैं, इसलिए रिएक्टर में हल्के नाभिकों का मंदक रखा जाता है। चरण 3: भारत के विद्युत रिएक्टरों में भारी जल ही मंदक है; अतः इसका काम न्यूट्रॉनों को धीमा करना है।
इस भ्रम से बचें: भारी जल कुछ ऊष्मा भी ले जाता है, पर मंदक के रूप में इसका मूल काम न्यूट्रॉनों को धीमा करना है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) न्यूट्रॉनों की गति धीमी करना: सही। भारी जल मंदक है।
- (b) न्यूट्रॉनों की गति बढ़ाना: गलत। मंदक का काम इसका ठीक उलटा है।
- (c) रिएक्टर को ठंडा करना: उत्तर के रूप में गलत। भारी जल कुछ ऊष्मा अवश्य ले जाता है, किन्तु श्रृंखला अभिक्रिया चलाए रखने में इसकी मुख्य भूमिका न्यूट्रॉनों को धीमा करने की है।
- (d) नाभिकीय अभिक्रिया को रोकना: गलत। यह काम कैडमियम जैसे न्यूट्रॉन-अवशोषकों से बनी नियंत्रक और सुरक्षा छड़ें करती हैं।
उत्तर: न्यूट्रॉनों की गति धीमी करना: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि भारी जल मंदक है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: नाभिकीय रिएक्टर में स्वपोषी श्रृंखला अभिक्रिया संभव है, क्योंकि
- प्रत्येक विखंडन अभिक्रिया में अधिक न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं।
- न्यूट्रॉन तुरंत विखंडन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
- तेज़ न्यूट्रॉनों को ग्रेफ़ाइट द्वारा धीमा किया जाता है।
- विखंडन अभिक्रिया में मुक्त होने वाला प्रत्येक न्यूट्रॉन आगे विखंडन आरंभ करता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन I सही है, क्योंकि हर विखंडन जितने न्यूट्रॉन लेता है, उससे अधिक (औसतन ढाई) छोड़ता है। चरण 2: कथन II गलत है। विखंडन से निकले न्यूट्रॉन तेज़ होते हैं; पहले उन्हें धीमा करना पड़ता है, इसलिए वे तुरंत विखंडन में भाग नहीं लेते। चरण 3: कथन III सही है, क्योंकि ग्रेफ़ाइट जैसा मंदक तेज़ न्यूट्रॉनों को धीमा करता है। चरण 4: कथन IV गलत है। बहुत से न्यूट्रॉन बाहर निकल जाते हैं या अवशोषित हो जाते हैं, और रिएक्टर को K = 1 पर रखा जाता है। चरण 5: केवल I और III सही हैं, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
इस भ्रम से बचें: यदि कथन IV सही होता, तो अभिक्रिया स्थिर रहने के बजाय अनियंत्रित हो जाती।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) I, II और III: गलत। कथन II गलत है, क्योंकि न्यूट्रॉनों को पहले धीमा करना पड़ता है।
- (b) I और III: सही। हर विखंडन में अधिक न्यूट्रॉन निकलते हैं, और ग्रेफ़ाइट मंदक उन्हें धीमा करता है।
- (c) II और IV: गलत। ये दोनों कथन गलत हैं।
- (d) II, III और IV: गलत। कथन II और IV गलत हैं।
उत्तर: I और III: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि यही दो कथन बताते हैं कि श्रृंखला अभिक्रिया कैसे चलती रहती है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)एक रेडियोधर्मी पदार्थ की अर्धायु चार महीने है। इस पदार्थ का तीन-चौथाई भाग कितने समय में क्षयित होगा?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: तीन-चौथाई भाग क्षयित होने का अर्थ है कि एक-चौथाई बचा है। चरण 2: एक अर्धायु के बाद आधा भाग बचता है, और दो अर्धायु के बाद एक-चौथाई। चरण 3: एक अर्धायु 4 महीने की है, अतः दो अर्धायु 2 × 4 = 8 महीने।
इस भ्रम से बचें: क्षय रैखिक नहीं है; तीन-चौथाई क्षय में किसी निश्चित अवधि का तीन-चौथाई समय नहीं लगता।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 3 महीने: गलत। एक अर्धायु से कम समय में आधे से अधिक पदार्थ बचा रहता है।
- (b) 4 महीने: गलत। एक अर्धायु में केवल आधा भाग क्षयित होता है।
- (c) 8 महीने: सही। दो अर्धायु के बाद एक-चौथाई बचता है, अर्थात् तीन-चौथाई क्षयित हो चुका होता है।
- (d) 12 महीने: गलत। तीन अर्धायु के बाद केवल आठवाँ भाग बचता है, अर्थात् सात-आठवाँ भाग क्षयित हो चुका होता।
उत्तर: 8 महीने: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि दो अर्धायु के बाद एक-चौथाई भाग बचता है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)ऐल्फ़ा कण पर दो धनात्मक आवेश होते हैं। इसका द्रव्यमान लगभग किसके द्रव्यमान के बराबर होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ऐल्फ़ा कण हीलियम का नाभिक है, जिसमें दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन होते हैं। चरण 2: अतः इसका द्रव्यमान चार न्यूक्लिऑनों के बराबर, अर्थात् लगभग हीलियम परमाणु जितना है। चरण 3: वह विकल्प चुनें जो इस द्रव्यमान से मेल खाए।
इस भ्रम से बचें: दो धनात्मक आवेश होने का अर्थ यह नहीं कि द्रव्यमान भी दो प्रोटॉनों जितना है; दो न्यूट्रॉन भी द्रव्यमान जोड़ते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दो प्रोटॉन: गलत। इसमें दो न्यूट्रॉन भी हैं, इसलिए इसका द्रव्यमान दो प्रोटॉनों का लगभग दोगुना है।
- (b) हीलियम का एक परमाणु: सही। ऐल्फ़ा कण हीलियम का नाभिक ही है।
- (c) दो पॉज़िट्रॉनों और दो न्यूट्रॉनों के द्रव्यमानों का योग: गलत। पॉज़िट्रॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन जितना होता है, इसलिए यह योग कम पड़ता है।
- (d) दो पॉज़िट्रॉन: गलत। पॉज़िट्रॉनों का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉनों जितना होता है, जो बहुत कम है।
उत्तर: हीलियम का एक परमाणु: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि ऐल्फ़ा कण हीलियम का नाभिक है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)नाभिकीय रिएक्टर और परमाणु बम में अंतर यह है कि
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: नाभिकीय रिएक्टर और परमाणु बम, दोनों विखंडन की श्रृंखला अभिक्रिया पर चलते हैं। चरण 2: रिएक्टर में नियंत्रक छड़ें इसे K = 1 पर स्थिर रखती हैं, जबकि बम में यह अनियंत्रित रहती है। चरण 3: अतः अंतर नियंत्रण का है।
इस भ्रम से बचें: जो विकल्प रिएक्टर या बम, किसी एक में श्रृंखला अभिक्रिया होने से ही इनकार करते हैं, वे दोनों गलत हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) रिएक्टर में श्रृंखला अभिक्रिया नहीं होती: गलत। रिएक्टर नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया पर ही चलता है।
- (b) रिएक्टर में श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित होती है: सही। नियंत्रक छड़ें K को 1 पर बनाए रखती हैं।
- (c) रिएक्टर में श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित नहीं होती: गलत। यह बम का वर्णन है।
- (d) बम में श्रृंखला अभिक्रिया नहीं होती: गलत। बम की ऊर्जा अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया से ही आती है।
उत्तर: रिएक्टर में श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित होती है: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2024विकिरण समस्थानिक ताप-वैद्युत जेनरेटरों (RTGs) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- RTGs लघु विखंडन रिऐक्टर हैं।
- RTGs का प्रयोग अंतरिक्षयानों के ऑन-बोर्ड प्रणालियों को विद्युत आपूर्ति करने के लिए होता है।
- RTGs में प्लूटोनियम-238 का उपयोग किया जा सकता है, जो शस्त्र विकास का एक उपोत्पाद है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 गलत है। RTG रेडियोधर्मी क्षय की ऊष्मा से बिजली बनाता है, उसमें विखंडन की श्रृंखला अभिक्रिया नहीं होती, अतः वह लघु विखंडन रिएक्टर नहीं है। चरण 2: कथन 2 सही है, क्योंकि RTG सूर्य से दूर जाने वाले अंतरिक्षयानों को बिजली देते हैं। चरण 3: कथन 3 सही है। RTG में प्लूटोनियम-238 का उपयोग होता है, जो अधिकतर नेप्च्यूनियम-237 से बना, और नेप्च्यूनियम-237 हथियार-श्रेणी प्लूटोनियम बनाने का उपोत्पाद है। चरण 4: केवल 2 और 3 सही हैं, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
इस भ्रम से बचें: दोनों नाभिकीय हैं, किन्तु RTG क्षय की ऊष्मा पर चलता है, विखंडन पर नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1 और 2: गलत। कथन 1 गलत है, क्योंकि RTG विखंडन रिएक्टर नहीं है।
- (b) केवल 2 और 3: सही। RTG अंतरिक्षयानों को बिजली देते हैं और इनमें प्लूटोनियम-238 का उपयोग हो सकता है।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। कथन 1 गलत है।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 1 गलत है।
उत्तर: केवल 2 और 3: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि RTG विखंडन से नहीं, क्षय की ऊष्मा से चलता है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2020भारत में, क्यों कुछ परमाणु रिऐक्टर “आई.ए.ई.ए. सुरक्षा उपायों” के अधीन रखे जाते हैं जबकि अन्य इस सुरक्षा के अधीन नहीं रखे जाते?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: भारत ने अपनी असैनिक और सैनिक नाभिकीय सुविधाएँ अलग कीं, और 2008 में NSG से छूट मिलने के बाद विदेशी ईंधन पाने के बदले असैनिक सुविधाओं को आई.ए.ई.ए. सुरक्षा उपायों के अधीन रखा। चरण 2: आयातित यूरेनियम पर चलने वाले रिएक्टर इन सुरक्षा उपायों के अधीन हैं। चरण 3: अतः विभाजन ईंधन के स्रोत से होता है।
इस भ्रम से बचें: ईंधन का प्रकार (यूरेनियम या थोरियम) और स्वामित्व, ये दोनों सुरक्षा उपाय तय नहीं करते।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) कुछ यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य थोरियम का: गलत। सुरक्षा उपाय असैनिक सुविधाओं और आयातित ईंधन से तय होते हैं, ईंधन के तत्व से नहीं।
- (b) कुछ आयातित यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य घरेलू आपूर्ति का: सही। आयातित यूरेनियम पर चलने वाले रिएक्टर आई.ए.ई.ए. सुरक्षा उपायों के अधीन हैं।
- (c) कुछ विदेशी उद्यमों द्वारा संचालित होते हैं और अन्य घरेलू उद्यमों द्वारा: गलत। निर्णायक बात असैनिक उपयोग और आयातित ईंधन है, न कि संचालक कौन है।
- (d) कुछ सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं और अन्य निजी स्वामित्व वाले: गलत। सुरक्षा उपाय स्वामित्व से नहीं, असैनिक उपयोग और आयातित ईंधन से तय होते हैं।
उत्तर: आयातित और घरेलू यूरेनियम का अंतर: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2016भारत ‘अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (International Thermonuclear Experimental Reactor)’ का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है। यदि यह प्रयोग सफल हो जाता है, तो भारत का तात्कालिक लाभ क्या है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ITER संलयन का प्रयोग है, एक टोकामैक जिसका लक्ष्य 500 MW संलयन ऊष्मा है। चरण 2: यह सफल हुआ, तो सिद्ध होगा कि संलयन से बिजली बनाई जा सकती है। चरण 3: अतः भारत जैसे सदस्य को तात्कालिक लाभ संलयन रिएक्टर बना पाने की क्षमता का होगा। थोरियम, उपग्रह मार्गनिर्देशन और विखंडन की दक्षता वाले विकल्प दूसरी तकनीकों से जुड़े हैं।
इस भ्रम से बचें: थोरियम भारत के त्रि-चरणीय विखंडन कार्यक्रम का हिस्सा है, ITER का नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) विद्युत् उत्पादन के लिए यूरेनियम की जगह थोरियम: गलत। थोरियम भारत के विखंडन कार्यक्रम का तीसरा चरण है; ITER में इसका उपयोग नहीं होता।
- (b) उपग्रह मार्गनिर्देशन में वैश्विक भूमिका: गलत। ITER संलयन रिएक्टर है; उपग्रह मार्गनिर्देशन से इसका कोई संबंध नहीं।
- (c) विखंडन रिएक्टरों की दक्षता में तेज़ी से सुधार: गलत। ITER संलयन पर काम करता है, विखंडन पर नहीं।
- (d) विद्युत् उत्पादन के लिए संलयन रिएक्टरों का निर्माण: सही। नियंत्रित संलयन को सिद्ध करना ही ITER का उद्देश्य है।
उत्तर: बिजली के लिए संलयन रिएक्टर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि ITER संलयन का प्रयोग है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2008 (हिंदी रूपांतर)अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (ITER) परियोजना निम्नलिखित में से किस स्थान पर बनाई जानी है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ITER कडाराश अनुसंधान केंद्र के पास बन रहा है। चरण 2: कडाराश दक्षिणी फ़्रांस में है। चरण 3: अतः उत्तर दक्षिणी फ़्रांस है।
इस भ्रम से बचें: ITER यूरोप में बन रहा है, इसलिए हर यूरोपीय विकल्प सही लग सकता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) उत्तरी स्पेन: गलत। ITER फ़्रांस में बन रहा है।
- (b) दक्षिणी फ़्रांस: सही। इसका स्थल कडाराश अनुसंधान केंद्र के पास है।
- (c) पूर्वी जर्मनी: गलत। जर्मनी इसका मेज़बान नहीं है।
- (d) दक्षिणी इटली: गलत। इटली इसका मेज़बान नहीं है।
उत्तर: दक्षिणी फ़्रांस: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2007 (हिंदी रूपांतर)हाल ही में यूरोपीय संघ और भारत सहित छह अन्य देशों ने अंतर्राष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (ITER) परियोजना पर हस्ताक्षर किए। निम्नलिखित में से कौन इस पर हस्ताक्षर करने वालों में नहीं था?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: ITER के सात सदस्य याद करें: चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका। चरण 2: हर विकल्प को इस सूची से मिलाएँ। चरण 3: जो देश सूची में नहीं है, वह कनाडा है।
इस भ्रम से बचें: यह 'नहीं' वाला प्रश्न है, इसलिए वह देश चुनें जो सूची में शामिल नहीं है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) कनाडा: सही। कनाडा ITER के सात सदस्यों में नहीं है, अतः यही उत्तर है।
- (b) चीन: गलत। चीन सदस्य है।
- (c) जापान: गलत। जापान सदस्य है।
- (d) संयुक्त राज्य अमेरिका: गलत। अमेरिका सदस्य है।
उत्तर: कनाडा: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि दिए गए देशों में केवल वही सदस्य नहीं है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2023निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कथन-I: भारत, अपने पास यूरेनियम निक्षेप (डिपॉजिट) होने के बावजूद, अपने अधिकांश विद्युत् उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर करता है।
- कथन-II: विद्युत् उत्पादन के लिए कम-से-कम 60% तक समृद्ध (एनरिच्ड) यूरेनियम का होना आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों के बारे में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन-I की जाँच करें। भारत के विद्युत उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, जबकि परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 3% (2024-25) है। अतः यूरेनियम निक्षेप होने के बावजूद भारत कोयले पर निर्भर है; कथन-I सही है। चरण 2: कथन-II की जाँच करें। भारत के दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) प्राकृतिक यूरेनियम पर चलते हैं, और हल्के जल रिएक्टरों में भी लगभग 3 से 5% तक संवर्धित यूरेनियम का उपयोग होता है। इसलिए 60% तक संवर्धित यूरेनियम आवश्यक नहीं है; कथन-II गलत है। चरण 3: कथन-I सही है, जबकि कथन-II गलत है। अतः विकल्प (a), (b) और (d) को हटाया जा सकता है, और उत्तर (c) है।
इस भ्रम से बचें: अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम हथियारों और कुछ विशेष रिएक्टरों में लगता है; विद्युत रिएक्टरों को बहुत कम संवर्धन चाहिए, या बिल्कुल नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों कथन सही हैं और कथन-II, कथन-I की सही व्याख्या है: गलत। कथन-II ही गलत है।
- (b) दोनों कथन सही हैं, किन्तु कथन-II, कथन-I की सही व्याख्या नहीं है: गलत। कथन-II गलत है।
- (c) कथन-I सही है, किन्तु कथन-II गलत है: सही। विद्युत उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, और विद्युत रिएक्टरों के लिए प्राकृतिक या लगभग 3 से 5% तक संवर्धित यूरेनियम पर्याप्त है।
- (d) कथन-I गलत है, किन्तु कथन-II सही है: गलत। कथन-I सही है, जबकि कथन-II गलत है।
उत्तर: कथन-I सही है, जबकि कथन-II गलत है: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2008 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से किसने भारी जल की खोज की?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: भारी जल वह जल है, जिसमें साधारण हाइड्रोजन के स्थान पर ड्यूटीरियम होता है। चरण 2: ड्यूटीरियम की खोज 1931 में हेरोल्ड यूरे ने की थी। चरण 3: अतः उत्तर एच. सी. यूरे है।
इस भ्रम से बचें: बाकी तीनों नाम दूसरे क्षेत्रों के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हाइनरिख हर्ट्ज़: गलत। हर्ट्ज़ ने विद्युतचुंबकीय तरंगों पर काम किया।
- (b) एच. सी. यूरे: सही। यूरे ने 1931 में ड्यूटीरियम की खोज की, जो भारी जल का हाइड्रोजन है।
- (c) जी. मेंडल: गलत। मेंडल ने आनुवंशिकता के अध्ययन की नींव रखी।
- (d) जोसेफ़ प्रीस्टली: गलत। प्रीस्टली ऑक्सीजन की खोज के लिए जाने जाते हैं।
उत्तर: एच. सी. यूरे: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
स्रोत
- NCERT: भौतिकी भाग 2 (कक्षा 12), अध्याय 13, नाभिक
- NCERT: Physics Part II (Class XII), Nuclei
- PIB: Prototype Fast Breeder Reactor at Kalpakkam attains first criticality (7 April 2026)
- PIB: A New Chapter in India's Nuclear Journey (7 April 2026)
- PIB: Prime Minister and President of France visit ITER (12 February 2025)
- PIB: The SHANTI Bill, 2025 (19 December 2025)
- PIB: Parliament question, enhancing nuclear power capacity
- NASA Science: Radioisotope Thermoelectric Generators
- Bhabha Atomic Research Centre: Thorium Fuel Cycle
- Wikipedia: ITER
- Wikipedia: Institute for Plasma Research
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- Wikipedia: Plutonium-238
- Wikipedia: Thorium-based nuclear power
- Wikipedia: Nuclear power in India
- Wikipedia: India–United States Civil Nuclear Agreement
- Wikipedia: Radiocarbon dating
- Wikipedia: Alpha particle
- Wikipedia: Heavy water
- Wikipedia: Enriched uranium
- Wikipedia: Electricity sector in India
- Wikipedia: Renewable energy
- Wikipedia: Tarapur Atomic Power Station
- Wikipedia: Rajasthan Atomic Power Station
- Wikipedia: Narora Atomic Power Station
- Wikipedia: Kakrapar Atomic Power Station
- Wikipedia: Kaiga Atomic Power Station
- Wikipedia: Madras Atomic Power Station
- Wikipedia: Kudankulam Nuclear Power Plant
- Wikipedia: Chernobyl disaster
- Wikipedia: Fukushima nuclear accident
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
