परिचय
स्वतंत्रता का अधिकार (यूपीएससी की शब्दावली में स्वातंत्र्य का अधिकार) भाग III का दूसरा मौलिक अधिकार है, जो अनुच्छेद 19 से 22 में दिया गया है। अनुच्छेद 19 नागरिकों को छह स्वतंत्रताएँ देता है, जिन्हें राज्य केवल गिनाए गए आधारों पर सीमित कर सकता है; अनुच्छेद 20 अपराध के आरोपी की रक्षा करता है; अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है; अनुच्छेद 21क बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है; और अनुच्छेद 22 मनमानी गिरफ्तारी और निरोध से बचाता है।
स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 22 एक नज़र में
स्वतंत्रता का अधिकार क्या है? चार अनुच्छेदों में पाँच गारंटियाँ
भारतीय संविधान के छह मौलिक अधिकारों में स्वतंत्रता का अधिकार समानता के अधिकार के बाद आता है। इसकी पाँच गारंटियों में सबसे बड़ा अंतर इस बात का है कि उनका दावा कौन कर सकता है: अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ केवल नागरिकों के लिए हैं, जबकि अनुच्छेद 20, 21 और 22 हर व्यक्ति की रक्षा करते हैं, विदेशियों की भी। तालिका पाँचों को साथ रखती है।
| अनुच्छेद | क्या गारंटी देता है | किसे उपलब्ध |
|---|---|---|
| 19 | छह स्वतंत्रताएँ: वाक् और अभिव्यक्ति, सम्मेलन, संगम, संचरण, निवास, वृत्ति | केवल नागरिक |
| 20 | भूतलक्षी आपराधिक विधि नहीं, एक अपराध के लिए दोहरा दंड नहीं, स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने की बाध्यता नहीं | हर व्यक्ति, कंपनियाँ भी |
| 21 | विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं | हर व्यक्ति |
| 21क | छह से चौदह वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा | बच्चे |
| 22 | गिरफ्तारी पर रक्षोपाय, और निवारक निरोध की सीमाएँ | हर व्यक्ति; एक भाग शत्रु अन्यदेशीय पर लागू नहीं |
अनुच्छेद 21 संविधान का सबसे व्यापक अधिकार बन गया है। न्यायालयों ने इसमें निजता, गरिमा, जीविकोपार्जन, स्वच्छ पर्यावरण और अनेक अन्य अधिकार पढ़े हैं, इसलिए आज अधिकांश नए अधिकार इसी पर टिके हैं। बाकी अनुच्छेद अपने पाठ के निकट रहते हैं, पर हर एक के पीछे निर्णयों की एक श्रृंखला है जिसे परीक्षा परखती है।
अनुच्छेद 19: नागरिकों की छह स्वतंत्रताएँ
अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ और 19(2) से 19(6) के युक्तियुक्त निर्बंधन
अनुच्छेद 19 हर नागरिक को छह अधिकार देता है। मूल रूप से ये सात थे: संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन का अधिकार 1978 के 44वें संशोधन ने हटा दिया। ये स्वतंत्रताएँ केवल नागरिकों की हैं; विदेशी या कंपनी जैसे विधिक व्यक्ति इनका दावा नहीं कर सकते, हालाँकि कंपनी के शेयरधारक नागरिक के रूप में कर सकते हैं।
कोई भी स्वतंत्रता असीमित नहीं है। राज्य युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है, पर केवल उन्हीं आधारों पर जो अनुच्छेद 19 हर स्वतंत्रता के लिए स्वयं गिनाता है, और निर्बंधन युक्तियुक्त है या नहीं, यह न्यायालय तय करते हैं। आधार हर स्वतंत्रता के लिए अलग हैं, जैसा तालिका दिखाती है।
| स्वतंत्रता | खंड | निर्बंधन के आधार |
|---|---|---|
| वाक् और अभिव्यक्ति | 19(1)(क), 19(2) | भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि, अपराध-उद्दीपन |
| शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन | 19(1)(ख), 19(3) | भारत की प्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था |
| संगम, संघ, सहकारी समितियाँ | 19(1)(ग), 19(4) | भारत की प्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था, सदाचार |
| भारत में सर्वत्र संचरण | 19(1)(घ), 19(5) | साधारण जनता का हित, अनुसूचित जनजातियों का संरक्षण |
| भारत में कहीं भी निवास और बसना | 19(1)(ङ), 19(5) | साधारण जनता का हित, अनुसूचित जनजातियों का संरक्षण |
| कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार | 19(1)(छ), 19(6) | साधारण जनता का हित; राज्य योग्यताएँ तय कर सकता है और स्वयं कोई व्यापार चला सकता है |
अनुच्छेद 19(1)(क): वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य
वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य हर नागरिक को अपने विचार बोलकर, लिखकर, छापकर, चित्रों से या किसी भी अन्य माध्यम से व्यक्त करने देता है। संविधान में प्रेस शब्द नहीं है, फिर भी उच्चतम न्यायालय ने प्रेस की स्वतंत्रता को, कई अन्य अधिकारों के साथ, अनुच्छेद 19(1)(क) में पढ़ा है।
- अपने और दूसरों के विचारों का प्रचार करने का अधिकार।
- प्रेस की स्वतंत्रता, और किसी समाचार पत्र पर पूर्व-सेंसरशिप से मुक्ति।
- व्यावसायिक विज्ञापनों की स्वतंत्रता, और प्रसारण का अधिकार, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर सरकार का एकाधिकार नहीं है।
- सरकारी गतिविधियों को जानने का अधिकार (सूचना का अधिकार अधिनियम भी देखें)।
- मौन रहने की स्वतंत्रता, और प्रदर्शन या धरने का अधिकार, पर हड़ताल का नहीं।
निर्बंधन के सभी आधार मूल पाठ में नहीं थे। 1951 के पहले संशोधन ने लोक व्यवस्था जोड़ी, ताकि 1950 के रोमेश थापर मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से बनी स्थिति से निपटा जा सके; उसी संशोधन ने विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध और अपराध-उद्दीपन भी जोड़े। 1963 के सोलहवें संशोधन ने भारत की प्रभुता और अखंडता जोड़ी।
जानने का अधिकार बढ़ता गया है। 15 फ़रवरी 2024 को उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने चुनावी बॉन्ड योजना रद्द कर दी, यह मानते हुए कि वह अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत राजनीतिक चंदे के बारे में मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है।
वाक् स्वातंत्र्य की सीमाएँ: राजद्रोह, धारा 66क और इंटरनेट बंदी
तीन विवाद दिखाते हैं कि न्यायालय वाक् पर निर्बंधन को कैसे परखते हैं: निर्बंधन अनुच्छेद 19(2) के किसी आधार में आना चाहिए और युक्तियुक्त होना चाहिए, जिसके लिए वाक् और उससे होने वाली कथित हानि में निकट संबंध आवश्यक है।
- राजद्रोह: भारतीय दंड संहिता की धारा 124क सरकार के प्रति घृणा या अवमान उत्पन्न करने या करने का प्रयत्न करने को दंडित करती थी। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य (1962) में उच्चतम न्यायालय ने इसे वैध माना, जबकि विधि स्वयं कहती थी कि घृणा या असंतोष भड़काए बिना सरकारी कार्रवाई से असहमति प्रकट करना अपराध नहीं है। 11 मई 2022 को न्यायालय ने इस विधि को रोक दिया, और भारतीय न्याय संहिता, 2023 राजद्रोह को अपराध के रूप में हटाती है; उसकी जगह भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता को संकट में डालने का अपराध रखा गया है।
- आईटी अधिनियम की धारा 66क: यह ऑनलाइन घोर आपत्तिजनक या धमकी भरी सूचना भेजने को दंडित करती थी। श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1)(क) का उल्लंघन मानकर रद्द किया, कहा कि अनुच्छेद 19(2) इसे नहीं बचाता, और यह भी कहा कि ऑनलाइन मध्यस्थों को सामग्री केवल न्यायालय या सरकार के आदेश पर हटानी होगी।
- इंटरनेट बंदी: अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट सेवाओं का अनिश्चितकालीन निलंबन अवैध है, हर बंदी को आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पूरी करनी होगी, और ऐसे आदेश सार्वजनिक किए जाएँगे तथा न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन होंगे।
लोक व्यवस्था जितनी व्यापक लगती है, उतनी है नहीं। इसका अर्थ लोक शांति, सुरक्षा और प्रशांति है, और सरकार की आलोचना मात्र से लोक व्यवस्था भंग नहीं होती। यदि लक्षित वाक् और लोक व्यवस्था बनाए रखने के बीच कोई तर्कसंगत संबंध न हो, तो निर्बंधन टिकता नहीं।
सम्मेलन, संगम, संचरण, निवास और वृत्ति की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 19 की बाकी पाँच स्वतंत्रताएँ वाणी की नहीं, कार्य की रक्षा करती हैं। हर एक की अपनी सीमाएँ हैं, जो उसके अपने खंड में तय हैं।
- सम्मेलन: शांतिपूर्वक और बिना हथियार सभा, प्रदर्शन और जुलूस का अधिकार। हिंसक या उपद्रवी जमावड़े इसमें संरक्षित नहीं हैं।
- संगम: संगम, संघ और सहकारी समितियाँ बनाने, उनमें बने रहने और किसी में शामिल न होने का अधिकार। किसी संगम को मान्यता पाना मौलिक अधिकार नहीं है।
- संचरण: पूरे भारत में स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार, जो नागरिकों के लिए देश को एक इकाई मानता है। विदेश जाना और लौटना अनुच्छेद 19 में नहीं, अनुच्छेद 21 में आता है।
- निवास: भारत में कहीं भी अस्थायी रूप से रहने और स्थायी रूप से बसने का अधिकार। अनुसूचित जनजातियों की संस्कृति और संपत्ति की रक्षा के लिए जनजातीय क्षेत्रों में प्रवेश और बसने पर रोक लग सकती है।
- वृत्ति: कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने का अधिकार। अनैतिक या खतरनाक व्यापार इसमें नहीं आते, और राज्य स्वयं कोई व्यापार चला सकता है, एकाधिकार के रूप में भी, बिना उसका औचित्य बताए।
अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
अनुच्छेद 20 में भूतलक्षी विधि, दोहरा दंड और आत्म-अभिशंसन
अनुच्छेद 20 अपराध के आरोपी हर व्यक्ति की, चाहे वह नागरिक हो, विदेशी हो या कंपनी जैसा विधिक व्यक्ति, मनमाने और अत्यधिक दंड से रक्षा करता है। इसमें तीन संरक्षण हैं, और अनुच्छेद 21 के साथ यह उन दो अनुच्छेदों में है जो राष्ट्रीय आपात के दौरान भी निलंबित नहीं किए जा सकते।
- भूतलक्षी विधि नहीं, अनुच्छेद 20(1): किसी को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब उसने कार्य के समय लागू विधि तोड़ी हो, और उसे उस समय की विधि से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता। यह रोक केवल आपराधिक विधियों पर है, सिविल दायित्वों या करों पर नहीं, जो भूतलक्षी प्रभाव से लगाए जा सकते हैं, और केवल दोषसिद्धि और दंड पर है, विचारण पर नहीं।
- दोहरा दंड नहीं, अनुच्छेद 20(2): किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता। यह संरक्षण न्यायालय या न्यायिक अधिकरण की कार्यवाही पर लागू है, विभागीय या प्रशासनिक कार्यवाही पर नहीं।
- आत्म-अभिशंसन नहीं, अनुच्छेद 20(3): किसी आरोपी को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्य पर लागू है, पर भौतिक वस्तुएँ प्रस्तुत करने, अँगूठे का निशान, नमूना हस्ताक्षर, रक्त का नमूना देने या शरीर दिखाने की बाध्यता पर नहीं।
अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
गोपालन से मेनका गांधी तक: विधि द्वारा स्थापित पद्धति और सम्यक् प्रक्रिया
अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। यह नागरिकों और विदेशियों, दोनों की रक्षा करता है। यह कितनी रक्षा करता है, यह इस पर निर्भर रहा कि न्यायालयों ने विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (विधि द्वारा स्थापित पद्धति) शब्दों को कैसे पढ़ा।
ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को संकीर्ण अर्थ में पढ़ा। यह केवल मनमानी कार्यपालिका कार्रवाई से रक्षा करता था, मनमानी विधियों से नहीं: यदि किसी विधि ने कोई प्रक्रिया तय कर दी, तो उसे अनुचित कहकर चुनौती नहीं दी जा सकती थी। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 में अमेरिका की विधि की सम्यक् प्रक्रिया की कसौटी लागू नहीं होती, जो न्यायालयों को विधि की निष्पक्षता परखने देती है, और निवारक निरोध अधिनियम, 1950 को एक धारा छोड़कर वैध माना।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने गोपालन को पलट दिया। न्यायालय ने कहा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और युक्तियुक्त होनी चाहिए, जिससे व्यवहार में सम्यक् प्रक्रिया आ गई, और यह भी कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 परस्पर जुड़े हैं, इसलिए दैहिक स्वतंत्रता छीनने वाली विधि को तीनों पर खरा उतरना होगा। न्यायालय ने यह भी माना कि प्राण का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व नहीं, मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
अनुच्छेद 21 में पढ़े गए अधिकार: गरिमा, जीविकोपार्जन, स्वास्थ्य
मेनका गांधी के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने अनेक अधिकारों को अनुच्छेद 21 का भाग घोषित किया है। उन्हें मोटे तौर पर चार समूहों में रखा जा सकता है।
| समूह | उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 में पढ़े गए अधिकार |
|---|---|
| गरिमा और व्यक्ति | मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार; निजता; ख्याति; एकांत कारावास, हथकड़ी, अमानवीय व्यवहार और हिरासत में उत्पीड़न के विरुद्ध |
| जीवन की परिस्थितियाँ | प्रदूषण-मुक्त वायु और जल सहित स्वच्छ पर्यावरण; जीविकोपार्जन; आश्रय; स्वास्थ्य; आपात चिकित्सा सहायता |
| निष्पक्ष प्रक्रिया | शीघ्र विचारण; निष्पक्ष विचारण; निःशुल्क विधिक सहायता; सुनवाई; विलंबित फाँसी और सार्वजनिक फाँसी के विरुद्ध |
| व्यक्ति की स्वतंत्रता | विदेश यात्रा; बँधुआ मजदूरी के विरुद्ध; किसी राज्य से बाहर न निकाले जाने का अधिकार; सूचना |
दो मामले दिखाते हैं कि यह पठन कैसे काम करता है। ओल्गा टेलिस (1985) में बंबई के फुटपाथ और झुग्गी निवासियों ने मानसून के दौरान अपनी बेदखली को चुनौती दी, और न्यायालय ने माना कि जीविका छीनना प्राण के अधिकार का एक अंश छीनना है। कॉमन कॉज़ (2018) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को अनुच्छेद 21 में पढ़ा और लिविंग विल (living will) की अनुमति दी, जिसके अंतर्गत असाध्य रोग या निष्चेष्ट अवस्था वाले रोगी को निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है; जनवरी 2023 में यह प्रक्रिया सरल की गई।
निजता का अधिकार: 2017 का पुट्टस्वामी निर्णय
एम. पी. शर्मा और खड़क सिंह मामलों में पहले की पीठों ने कहा था कि निजता का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। आधार योजना की चुनौती में यह प्रश्न फिर उठा। 11 अगस्त 2015 को तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इसे उचित संख्या वाली पीठ के पास भेज दिया, क्योंकि वे पहले के निर्णय आठ और छह न्यायाधीशों ने दिए थे।
न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में नौ न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से माना कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के आंतरिक भाग के रूप में, और भाग III की स्वतंत्रताओं के भाग के रूप में, संरक्षित है। निर्णय ने एम. पी. शर्मा और खड़क सिंह को पलट दिया। अन्य अधिकारों की तरह निजता भी सीमित की जा सकती है, पर केवल किसी बाध्यकारी राज्य हित के लिए।
अनुच्छेद 21क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009
अनुच्छेद 21क राज्य से अपेक्षा करता है कि वह छह से चौदह वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दे, उस रीति से जो राज्य विधि द्वारा तय करे। यह केवल प्रारंभिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है, उच्च या व्यावसायिक शिक्षा को नहीं। इसे 2002 के 86वें संशोधन अधिनियम ने जोड़ा।
संशोधन से पहले इस अधिकार का न्यायिक इतिहास था। 1993 में ही उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के भीतर प्राथमिक शिक्षा का मौलिक अधिकार माना था, जो बच्चे के चौदह वर्ष पूरे होने तक निःशुल्क है, और कहा था कि उसके बाद की शिक्षा राज्य की आर्थिक क्षमता पर निर्भर है। 86वें संशोधन ने अनुच्छेद 45 को बदलकर छह वर्ष तक की प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख से जोड़ा, और माता-पिता पर अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर देने का एक मूल कर्तव्य जोड़ा।
संसद ने अनुच्छेद 21क को निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 से लागू किया, जो 4 अगस्त 2009 को बना। धारा 3 छह से चौदह वर्ष के हर बच्चे को प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक पड़ोस के विद्यालय में निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देती है, और निजी विद्यालयों को 25 प्रतिशत सीटें वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। 16 फ़रवरी 2010 की अधिसूचना ने 86वें संशोधन को 1 अप्रैल 2010 से लागू किया, उसी दिन से अधिनियम भी प्रभावी हुआ। माता-पिता का कर्तव्य अन्य मूल कर्तव्यों के साथ है।
अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
अनुच्छेद 22(1) और 22(2) में गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार
अनुच्छेद 22 दो प्रकार के निरोध से जुड़ा है। दंडात्मक निरोध विचारण और दोषसिद्धि के बाद होता है; निवारक निरोध बिना विचारण का निरोध है, ताकि व्यक्ति निकट भविष्य में कोई अपराध न कर सके। अनुच्छेद का पहला भाग सामान्य विधि में गिरफ्तार व्यक्ति की रक्षा करता है।
- गिरफ्तारी के आधार बताए जाने का अधिकार।
- अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श और बचाव का अधिकार।
- यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार।
- मजिस्ट्रेट के आगे के निरोध का आदेश न देने पर 24 घंटे बाद छोड़े जाने का अधिकार।
ये रक्षोपाय शत्रु अन्यदेशीय पर, या निवारक निरोध विधि में पकड़े गए व्यक्ति पर, लागू नहीं होते। न्यायालयों ने इनमें जोड़ा है। डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में तय दिशानिर्देशों के अनुसार गिरफ्तार करने वाले अधिकारी की पहचान नाम-पट्टिका और पद से दिखनी चाहिए, गिरफ्तारी का ज्ञापन बनना चाहिए, और गिरफ्तार व्यक्ति को किसी संबंधी या मित्र को सूचित करने दिया जाना चाहिए। अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सात वर्ष से कम दंड वाले अपराधों में गिरफ्तारी अपवाद होनी चाहिए, और पुलिस को पहले तय करना होगा कि विधि की शर्तों के अनुसार गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं।
अनुच्छेद 22 में निवारक निरोध: रक्षोपाय और विधियाँ
अनुच्छेद 22 का दूसरा भाग निवारक निरोध विधि में पकड़े गए व्यक्तियों की रक्षा करता है, नागरिकों और विदेशियों, दोनों की। रक्षोपाय सीमित हैं, क्योंकि ऐसे निरोध का उद्देश्य संदेह पर आधारित सावधानी है।
- सलाहकार बोर्ड, जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों, पर्याप्त कारण न बताए तो निरोध तीन महीने से अधिक नहीं हो सकता।
- निरोध के आधार बताए जाने चाहिए, हालाँकि लोकहित के विरुद्ध माने गए तथ्य बताना आवश्यक नहीं।
- निरुद्ध व्यक्ति को आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन का अवसर मिलना चाहिए।
- संसद सलाहकार बोर्ड के बिना तीन महीने से अधिक निरोध के मामले, अधिकतम अवधि और बोर्ड की प्रक्रिया तय कर सकती है।
1978 के 44वें संशोधन ने सलाहकार बोर्ड की राय के बिना निरोध की अवधि तीन से घटाकर दो महीने की, पर वह उपबंध अब तक लागू नहीं हुआ है। रक्षा, विदेश मामलों और भारत की सुरक्षा से जुड़े निवारक निरोध की विधियाँ केवल संसद बना सकती है; राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और आवश्यक आपूर्ति के लिए संसद और राज्य, दोनों बना सकते हैं। आज मुख्य विधि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 है, जिसमें अधिकतम निरोध 12 महीने का है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2023, सामान्य अध्ययन-II“भारत का संविधान अत्यधिक गतिशीलता की क्षमताओं के साथ एक जीवंत यंत्र है। यह प्रगतिशील समाज के लिये बनाया गया एक संविधान है।” जीने के अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में हो रहे निरंतर विस्तार के विशेष संदर्भ में उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुच्छेद 21 केवल इतना कहता है कि प्राण और स्वतंत्रता विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से ही छीनी जा सकती है; न्यायालयों ने इसे संविधान का सबसे व्यापक अधिकार बना दिया, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- मोड़: गोपालन (1950) ने संकीर्ण अर्थ लिया; मेनका गांधी (1978) ने न्यायसंगत, निष्पक्ष और युक्तियुक्त प्रक्रिया माँगी और अनुच्छेद 14, 19 और 21 को जोड़ा।
- गरिमा: प्राण का अधिकार पशुवत अस्तित्व से अधिक है; इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीना शामिल है।
- नए अधिकार: जीविकोपार्जन (ओल्गा टेलिस, 1985), निजता (पुट्टस्वामी, 2017), गरिमा से मृत्यु और लिविंग विल (कॉमन कॉज़, 2018), स्वास्थ्य, आश्रय, शीघ्र विचारण, विधिक सहायता।
- पाठ का उत्तर: 1993 में अनुच्छेद 21 में पढ़ा गया शिक्षा का अधिकार 2002 में अनुच्छेद 21क बना।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अनुच्छेद 21 जीवंत संविधान का उदाहरण है: शब्द वही, संरक्षण लगातार व्यापक।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2017, सामान्य अध्ययन-IIनिजता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय के नवीनतम निर्णय के आलोक में, मौलिक अधिकारों के विस्तार का परीक्षण कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: पुट्टस्वामी (2017) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से निजता को मौलिक अधिकार माना, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- निर्णय: निजता अनुच्छेद 21 के प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का आंतरिक भाग है और भाग III की स्वतंत्रताओं का भी; एम. पी. शर्मा और खड़क सिंह पलटे गए।
- विस्तार: अधिकार अलग-अलग खानों में बंद नहीं; अनुच्छेद 14, 19 और 21 साथ काम करते हैं, जैसा मेनका गांधी ने कहा।
- सीमा: निजता केवल किसी बाध्यकारी राज्य हित के लिए सीमित की जा सकती है।
- परिणाम: निर्णय-स्वायत्तता, आँकड़े, और बाद के निर्णय जो इस पर बने।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि निर्णय ने अलिखित अधिकारों को पाठ में पढ़कर भाग III का विस्तार किया।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2013, सामान्य अध्ययन-II (हिंदी रूपांतर)आईटी अधिनियम की धारा 66क की, संविधान के अनुच्छेद 19 के कथित उल्लंघन के संदर्भ में, चर्चा कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आईटी अधिनियम की धारा 66क ऑनलाइन घोर आपत्तिजनक या धमकी भरी सूचना भेजने को दंडित करती थी, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- टकराव: आपत्तिजनक या खीझ जैसे अस्पष्ट शब्द अनुच्छेद 19(2) के आधारों में नहीं हैं।
- कसौटी: निर्बंधन किसी गिनाए गए आधार में आना चाहिए और उससे निकट संबंध रखना चाहिए, जैसे लोक व्यवस्था।
- परिणाम: श्रेया सिंघल (2015) ने धारा 66क रद्द की; मध्यस्थ केवल न्यायालय या सरकार के आदेश पर कार्रवाई करेंगे।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि ऑनलाइन वाक् को भी वही संरक्षण है, जो केवल अनुच्छेद 19(2) के आधारों पर सीमित हो सकता है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2024 (हिंदी रूपांतर)भारत के उच्चतम न्यायालय ने निजता के अधिकार को भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद के अंतर्गत रखा है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: 2017 में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का आंतरिक भाग माना, और भाग III की स्वतंत्रताओं का भाग भी। प्रश्न पूछता है कि न्यायालय ने इसे कहाँ रखा: अनुच्छेद 21।
इस भ्रम से बचें: अनुच्छेद 19 लुभाता है क्योंकि निजता कई स्वतंत्रताओं को छूती है, पर न्यायालय ने उसकी जड़ प्राण और दैहिक स्वतंत्रता में रखी।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अनुच्छेद 15: गलत। यह धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद से जुड़ा है।
- (b) अनुच्छेद 16: गलत। यह लोक नियोजन में अवसर की समता से जुड़ा है।
- (c) अनुच्छेद 19: गलत। निजता स्वतंत्रताओं से जुड़ी है, पर न्यायालय ने उसे प्राण और दैहिक स्वतंत्रता में रखा।
- (d) अनुच्छेद 21: सही। पुट्टस्वामी ने निजता को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का आंतरिक भाग माना।
उत्तर: विकल्प (d): अनुच्छेद 21, पुट्टस्वामी (2017)।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021 (हिंदी रूपांतर)'निजता का अधिकार' भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत संरक्षित है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: 2017 में निजता को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार, अनुच्छेद 21, का भाग माना गया। बाकी विकल्प समता, एक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकार हैं।
इस भ्रम से बचें: अनुच्छेद 19 फिर सही लगता है क्योंकि उसमें स्वतंत्रताएँ हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अनुच्छेद 15: गलत। यह विभेद का निषेध करता है।
- (b) अनुच्छेद 19: गलत। इसमें नागरिकों की छह स्वतंत्रताएँ हैं; निजता अनुच्छेद 21 में रखी गई।
- (c) अनुच्छेद 21: सही। निजता प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का आंतरिक भाग है।
- (d) अनुच्छेद 29: गलत। यह अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा करता है।
उत्तर: विकल्प (c): अनुच्छेद 21।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2018 (हिंदी रूपांतर)निजता का अधिकार, प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्भूत भाग के रूप में संरक्षित है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: विकल्प को निर्णय से मिलाएँ: निजता अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के आंतरिक भाग के रूप में, और भाग III की स्वतंत्रताओं के भाग के रूप में, संरक्षित है। केवल एक विकल्प अनुच्छेद 21 को भाग III की स्वतंत्रताओं के साथ रखता है।
इस भ्रम से बचें: किसी असंबद्ध अनुच्छेद को संशोधन के साथ जोड़ने वाले विकल्प भटकाते हैं; अनुच्छेद 21 पर टिके रहें।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अनुच्छेद 14 और 42वाँ संशोधन: गलत। निजता न अनुच्छेद 14 में रखी गई, न 42वें संशोधन से जुड़ी।
- (b) अनुच्छेद 17 और निदेशक तत्त्व: गलत। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है, और निदेशक तत्त्व प्रवर्तनीय अधिकार नहीं हैं।
- (c) अनुच्छेद 21 और भाग III की स्वतंत्रताएँ: सही। 2017 के निर्णय के यही शब्द हैं।
- (d) अनुच्छेद 24 और 44वाँ संशोधन: गलत। अनुच्छेद 24 बाल श्रम से जुड़ा है।
उत्तर: विकल्प (c): अनुच्छेद 21 और भाग III की स्वतंत्रताएँ।
स्रोत
- Legislative Department, Ministry of Law and Justice: The Constitution of India
- NCERT: Indian Constitution at Work, Class 11, Chapter 2, Rights in the Indian Constitution
- NCERT: Social and Political Life III, Class 8, Understanding Our Criminal Justice System
- Wikipedia: Maneka Gandhi v. Union of India
- Wikipedia: A. K. Gopalan v. State of Madras
- Wikipedia: Puttaswamy v. Union of India
- Wikipedia: Shreya Singhal v. Union of India
- Wikipedia: Olga Tellis v. Bombay Municipal Corporation
- Wikipedia: Euthanasia in India
- Wikipedia: Freedom of expression in India
- Wikipedia: Internet censorship in India
- Wikipedia: Electoral bonds
- Wikipedia: Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009
- Wikipedia: National Security Act, 1980
- Wikipedia: Arnesh Kumar Guidelines
- Supreme Court of India: Justice K. S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India, W.P. (C) 494 of 2012, reference order of 11 August 2015
- India Code: The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009, with notification S.O. 427(E)
- National Human Rights Commission: Guidelines for Police Personnel on Various Human Rights Issues
- Wikipedia: Section 124A of the Indian Penal Code
- Wikipedia: Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
- Wikipedia: Article 12 of the Constitution of India
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख स्वतंत्रता के अधिकार को संविधान के पाठ, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों, एनसीईआरटी और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है। यह अध्ययन सामग्री है, विधिक सलाह नहीं।
