परिचय
संक्रामक रोग (communicable diseases), जिन्हें संचारी रोग भी कहते हैं, वे रोग हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से फैलते हैं। ये रोगजनकों से होते हैं, अर्थात् रोग पैदा करने वाले जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ, कृमि और कवक से, और हवा, भोजन तथा जल, रक्त, संपर्क, पशुओं या मच्छर जैसे कीट रोगवाहकों से फैलते हैं।
संक्रामक रोग: रोगजनक और उनके फैलने के तरीके
संक्रामक रोग किसे कहते हैं: जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ, कृमि और कवक
जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तंत्रों का काम बिगड़ जाए और उसके चिह्न तथा लक्षण दिखने लगें, तो कहा जाता है कि व्यक्ति को रोग है। रोग मोटे तौर पर दो समूहों में बँटते हैं: संक्रामक और असंक्रामक। जो रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल जाते हैं, उन्हें संक्रामक रोग कहते हैं; सरकारी कार्यक्रमों में इन्हीं को संचारी रोग भी कहा जाता है। जो रोग इस तरह नहीं फैलते, जैसे हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह, उनकी चर्चा गैर-संचारी रोग वाले लेख में की गई है।
ये रोग रोगजनकों (pathogens) से होते हैं, अर्थात् रोग पैदा करने वाले वे जीव जो जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटोजोआ और कृमि (हेल्मिंथ) में से होते हैं। रोगजनक शरीर में प्रवेश करता है, अपनी संख्या बढ़ाता है और शरीर के सामान्य कामों में बाधा डालता है। इसके लिए उसे अपने परपोषी (host) के भीतर के वातावरण के अनुकूल होना पड़ता है; उदाहरण के लिए, आँत में पहुँचने वाले रोगजनक को आमाशय के निम्न pH और पाचक एंज़ाइमों को झेलना पड़ता है।
इनमें विषाणु सबसे अलग हैं। इनमें जीन तो होते हैं, पर कोशिकीय संरचना नहीं होती और न ही अपना कोई उपापचय। इसलिए नई प्रतियाँ बनाने के लिए इन्हें परपोषी कोशिका चाहिए, और उसके बाहर ये प्रजनन नहीं कर सकते। विषाणु का संजीन (genome) DNA का भी हो सकता है और RNA का भी: सामान्य जुकाम के एक कारण, एडीनोवायरस, में द्वि-तंतु DNA होता है, जबकि HIV जैसे रेट्रोवायरस में एकल-तंतु RNA होता है।
संक्रामक रोगों के नाम: रोगजनक और फैलने के तरीके के अनुसार उदाहरण
नीचे की तालिका में आम संक्रामक रोग एक-एक पंक्ति में दिए गए हैं। हर पंक्ति को बाएँ से दाएँ पढ़ें: रोगजनक बताता है कि रोग किस तरह के जीव से है, और फैलने का तरीका बताता है कि रोग को रोका कैसे जाए।
| रोग | रोगजनक | कैसे फैलता है | बचाव या उपचार |
|---|---|---|---|
| क्षय रोग (टीबी) | जीवाणु | खाँसी और छींक से हवा में | BCG टीका, छह महीने की दवाएँ |
| कुष्ठ रोग | जीवाणु | बिंदुक, लगातार निकट संपर्क | बहु-औषध चिकित्सा |
| टाइफॉइड | जीवाणु | दूषित भोजन और जल | स्वच्छ जल, प्रतिजैविक, टीका |
| हैजा | जीवाणु | दूषित भोजन और जल | मुख से पुनर्जलीकरण, सुरक्षित जल |
| सामान्य जुकाम | विषाणु | बिंदुक, छुई गई वस्तुएँ | निकट संपर्क से बचाव |
| खसरा | विषाणु | हवा | टीका |
| यकृतशोथ B | विषाणु | रक्त, शरीर के द्रव, माँ से शिशु | टीका |
| रेबीज़ | विषाणु | कुत्तों का काटना और खरोंच | संपर्क के बाद रोगनिरोधी उपचार |
| डेंगू | विषाणु | एडीज़ मच्छर | रोगवाहक नियंत्रण |
| मलेरिया | प्रोटोजोआ | मादा ऐनोफेलीज़ मच्छर | रोगवाहक नियंत्रण |
| कालाज़ार | प्रोटोजोआ | मादा बालूमक्खी (सैंडफ्लाई) | रोगवाहक नियंत्रण, उपचार |
| अमीबता | प्रोटोजोआ | भोजन और जल, घरेलू मक्खियाँ | स्वच्छता, स्वच्छ जल |
| लसीका फाइलेरिया | कृमि | मच्छर | सामूहिक दवा वितरण |
| दाद | कवक | मिट्टी, साझा तौलिये और कंघे | त्वचा सूखी रखें, साझा न करें |
तालिका में दो बातें साफ़ दिखती हैं। भोजन और जल से फैलने वाले रोग, जैसे टाइफॉइड, हैजा और अमीबता, स्वच्छ जल और अच्छी स्वच्छता से घटते हैं। इसके विपरीत, कीटों से फैलने वाले रोग, जैसे मलेरिया, डेंगू और कालाज़ार, तब घटते हैं जब रोगवाहक और उसके प्रजनन-स्थलों पर नियंत्रण हो।
संक्रामक रोग कैसे फैलते हैं: वायु, जल, भोजन, संपर्क, रक्त और रोगवाहक
रोगजनक अलग-अलग रास्तों से नए परपोषी तक पहुँचते हैं, और रास्ते के अनुसार नियंत्रण के उपाय भी बदल जाते हैं। वायुवाहित रोगजनक खाँसी और छींक से निकले बिंदुकों (droplets) से फैलते हैं। दूसरे रोगजनक दूषित भोजन और जल, रक्त और शरीर के द्रवों, साझा वस्तुओं, या किसी रोगवाहक (vector) के सहारे फैलते हैं। रोगवाहक वह जीव है, जैसे मच्छर, जो रोगजनक को एक परपोषी से दूसरे तक ले जाता है।
- व्यक्तिगत स्वच्छता: शरीर को साफ़ रखना, और पीने का स्वच्छ जल तथा साफ़ भोजन, सब्ज़ियाँ और फल खाना।
- सार्वजनिक स्वच्छता: अपशिष्ट और मल-मूत्र का सही निपटान, जलाशयों, कुंडों और टंकियों की समय-समय पर सफ़ाई तथा विसंक्रमण, और सार्वजनिक खान-पान में स्वच्छता के मानक। भोजन और जल से फैलने वाले टाइफॉइड, अमीबता और ऐस्केरिसता के लिए ये उपाय सबसे अधिक मायने रखते हैं।
- वायुवाहित रोग: न्यूमोनिया और सामान्य जुकाम में संक्रमित व्यक्तियों और उनके सामान के निकट संपर्क से भी बचना चाहिए।
- रोगवाहक-जनित रोग: मलेरिया और फाइलेरिया में सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है रोगवाहकों और उनके प्रजनन-स्थलों पर नियंत्रण।
चिकित्सा विज्ञान ने दो और साधन दिए हैं। पहला है टीका, जिसके बारे में प्रतिरक्षा और टीके (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में बताया गया है; टीकों से चेचक का पूर्ण उन्मूलन (eradication) हुआ और पोलियो, डिप्थीरिया, न्यूमोनिया तथा टिटनेस पर काफ़ी हद तक नियंत्रण पाया गया। दूसरा है संक्रमण के उपचार के लिए प्रतिजैविक और अन्य दवाएँ।
जीवाणु से होने वाले रोग: क्षय रोग, टाइफॉइड, हैजा, न्यूमोनिया और कुष्ठ रोग
क्षय रोग क्या है: गुप्त, सक्रिय, फुफ्फुसीय और औषध-प्रतिरोधी टीबी
जीवाणु से होने वाला क्षय रोग (tuberculosis, TB) सबसे अधिक फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी से ग्रस्त व्यक्ति जब खाँसता, छींकता या थूकता है, तो यह हवा के रास्ते फैलता है। किसी एक संक्रामक कारक से होने वाली मौतों में विश्व में टीबी सबसे आगे है: 2024 में 1.07 करोड़ लोग इससे बीमार हुए और 12.3 लाख की मृत्यु हुई। इससे बचा जा सकता है और इसका इलाज भी संभव है; शिशुओं को दिया जाने वाला BCG टीका बच्चों को इसके गंभीर रूपों से बचाता है।
टीबी जीवाणु से संक्रमित अधिकांश लोग बीमार नहीं पड़ते। गुप्त टीबी (latent TB) में संक्रमण के कोई लक्षण नहीं होते और व्यक्ति इसे आगे नहीं फैलाता; विश्व के लगभग एक-चौथाई लोग (लगभग 200 करोड़) इसके वाहक हैं। गुप्त संक्रमणों का एक छोटा हिस्सा सक्रिय टीबी (active TB) बन जाता है, और प्रतिरक्षा कमज़ोर होने पर ऐसा अधिक होता है। सक्रिय टीबी में लंबी खाँसी के साथ खून मिला बलगम, बुखार, रात में पसीना और वजन घटना होता है। टीबी प्रायः फेफड़ों में होता है, जिसे फुफ्फुसीय टीबी कहते हैं, किन्तु यह दूसरे अंगों में भी हो सकता है, जिसे फुफ्फुसेतर (extrapulmonary) टीबी कहते हैं।
साधारण टीबी पहली पंक्ति की दवाओं के छह महीने के कोर्स से ठीक हो जाता है। बहु-औषध प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) इनमें से दो सबसे प्रभावी दवाओं, रिफ़ैम्पिसिन और आइसोनियाज़िड, पर असर नहीं होने देता। व्यापक औषध-प्रतिरोधी टीबी (XDR-TB) इसके अलावा लेवोफ़्लॉक्सासिन या मॉक्सीफ़्लॉक्सासिन जैसी कम से कम एक फ़्लोरोक्विनोलोन दवा का भी प्रतिरोध करता है। प्रतिरोधी टीबी में दूसरी पंक्ति की दवाएँ देनी पड़ती हैं, जो कम प्रभावी, अधिक विषैली और अधिक महँगी हैं, और जिन्हें दो वर्ष तक लेना पड़ सकता है।
सबसे बड़ा बोझ भारत पर है: 2024 में विश्व के नए टीबी मामलों का लगभग 25 प्रतिशत भारत में था। 2020 में संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम का नाम बदलकर राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) रखा गया। इसका लक्ष्य वैश्विक लक्ष्य 2030 से पाँच वर्ष पहले, 2025 तक, टीबी का उन्मूलन था, और यह चार स्तंभों वाली राष्ट्रीय रणनीतिक योजना पर आधारित है: पहचान, उपचार, रोकथाम और निर्माण। 2015 से 2023 के बीच भारत में टीबी की घटना दर प्रति लाख जनसंख्या 237 से घटकर 195 रह गई; राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (अंग्रेज़ी में) वाला लेख इसे विस्तार से समझाता है।
सरकार का ज़ोर अब उन लोगों को खोजने पर है, जिन्हें टीबी है पर जो स्वास्थ्य तंत्र की पहुँच से बाहर हैं। अक्टूबर 2026 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने टीबी मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत JOSH (जॉइंट स्क्वॉड फ़ॉर हेल्थ) दल शुरू किए। राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) और MY Bharat के स्वयंसेवक 11 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 55 ज़िलों में घर-घर जाकर लक्षण वाले लोगों को खोजते हैं और उन्हें जाँच कराने तथा उपचार पूरा करने में मदद करते हैं।
कुष्ठ रोग: कारण, प्रकार, उपचार और भारत में उन्मूलन की स्थिति
माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक जीवाणु से होने वाले कुष्ठ रोग (leprosy) को हैन्सेन रोग भी कहते हैं। यह त्वचा और परिधीय तंत्रिकाओं को प्रभावित करता है। बिना उपचार वाले रोगियों के साथ लगातार निकट संपर्क में बिंदुकों से यह फैलता है, और बहु-औषध चिकित्सा (multidrug therapy, MDT) से ठीक हो जाता है। भारत का 1955 का राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम बना, और दिसंबर 2005 में देश ने राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग को जन स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त कर दिया, अर्थात् प्रति 10,000 लोगों पर 1 से कम मामला।
- दो प्रकार: कम जीवाणु वाला (paucibacillary) कुष्ठ रोग, जिसमें पाँच या उससे कम पीले, सुन्न त्वचा-धब्बे होते हैं, और अधिक जीवाणु वाला (multibacillary) कुष्ठ रोग, जिसमें इससे अधिक; दोनों का अंतर जीवाणुओं की संख्या का है।
- उपचार: डैप्सोन, रिफ़ैम्पिसिन और क्लोफ़ाज़िमीन से बहु-औषध चिकित्सा, कम जीवाणु वाले में छह महीने और अधिक जीवाणु वाले में बारह महीने।
- धीमी शुरुआत: औसत ऊष्मायन काल पाँच वर्ष है, और लक्षण संक्रमण के पहले वर्ष में भी दिख सकते हैं और 20 वर्ष बाद भी।
भारत में अब भी बड़ी संख्या में नए मामले मिल रहे हैं। 2025-26 में देश में कुष्ठ रोग के 91,783 नए मामले मिले, जो अनुमानित 65,000 से 41.2 प्रतिशत अधिक हैं, हालाँकि मार्च 2026 के अंत में राष्ट्रीय व्यापकता प्रति 10,000 जनसंख्या 0.56 थी। बोझ असमान है: छत्तीसगढ़ में व्यापकता सबसे अधिक, प्रति 10,000 पर 1.66, थी, और 114 ज़िले अब भी प्रति 10,000 पर एक मामले के उन्मूलन स्तर से ऊपर थे। कुष्ठ रोग के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना और रोडमैप 2023-2027 अब संक्रमण की कड़ी तोड़ने पर केंद्रित है।
टाइफॉइड, हैजा, न्यूमोनिया और मस्तिष्कावरण शोथ: जल और वायु से फैलने वाले जीवाणु रोग
टाइफॉइड ज्वर साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु से होता है। यह दूषित भोजन और जल के साथ छोटी आँत में पहुँचता है और फिर रक्त के रास्ते दूसरे अंगों तक फैल जाता है। इसमें 39 से 40 डिग्री सेल्सियस का लगातार तेज़ बुखार, कमज़ोरी, पेट दर्द, कब्ज़, सिरदर्द और भूख न लगना होता है, और इसकी पुष्टि विडाल परीक्षण से होती है। मैरी मैलॉन नाम की एक रसोइया, जिसे टाइफॉइड मैरी कहा गया, वर्षों तक अपने बनाए भोजन के ज़रिए यह रोग फैलाती रही।
- हैजा: विब्रियो कॉलेरी से दूषित भोजन या जल से होने वाला तीव्र दस्त का संक्रमण; उपचार न हो तो कुछ घंटों में जान ले सकता है। अधिकांश रोगी मुख से दिए जाने वाले पुनर्जलीकरण घोल (ORS) से ठीक हो जाते हैं, और सुरक्षित जल, स्वच्छता तथा साफ़-सफ़ाई इसे रोकते हैं।
- न्यूमोनिया: स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी और हीमोफ़िलस इन्फ़्लुएंज़ी जैसे जीवाणुओं से होता है; इसमें फेफड़ों के वायुकोष्ठ (एल्वियोलाई) द्रव से भर जाते हैं। यह बिंदुकों से या साझा गिलास और बर्तनों से फैलता है। गंभीर मामलों में होंठ और नाखून धूसर से नीले पड़ जाते हैं।
- मस्तिष्कावरण शोथ (meningitis): मस्तिष्क और मेरुरज्जु को ढकने वाले ऊतकों की सूजन; मेनिंगोकोकस और अन्य जीवाणु श्वसन बिंदुकों से एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं, और बुखार, गर्दन में अकड़न, सिरदर्द, जी मिचलाना और उल्टी इसके आम लक्षण हैं।
पेचिश, प्लेग और डिप्थीरिया मनुष्य के अन्य जीवाणु रोग हैं। टाइफॉइड का उपचार प्रतिजैविकों से होता है, किन्तु बढ़ते प्रतिजैविक प्रतिरोध (antibiotic resistance) से उपचार कठिन होता जा रहा है; इसीलिए जिन देशों में यह रोग आम है, वहाँ टाइफॉइड संयुग्मी टीके बच्चों के टीकाकरण में जोड़े जा रहे हैं।
विषाणु से होने वाले रोग: सामान्य जुकाम, इन्फ्लुएंज़ा, यकृतशोथ, पोलियो, रेबीज़ और निपाह
सामान्य जुकाम, इन्फ्लुएंज़ा और खसरा: हवा से फैलने वाले विषाणु रोग
मनुष्य के सबसे संक्रामक रोगों में से एक है सामान्य जुकाम। यह नासाविषाणुओं (rhinoviruses) से होता है, जो नाक और श्वसन मार्ग को संक्रमित करते हैं, फेफड़ों को नहीं। यह खाँसी और छींक के बिंदुकों से, या पेन, प्याले, दरवाज़े की मूठ और कीबोर्ड जैसी दूषित वस्तुओं से फैलता है, और इसके लक्षण प्रायः 3 से 7 दिन रहते हैं।
- इन्फ्लुएंज़ा: श्वसन तंत्र का तीव्र संक्रमण, जिसके हर वर्ष लगभग 100 करोड़ मामले होते हैं, जिनमें 30 से 50 लाख गंभीर होते हैं। इसके विषाणु चार प्रकार के हैं, A से D तक, और टीकाकरण इससे बचाव का सबसे अच्छा तरीका है। 2009 की स्वाइन फ़्लू विश्वमारी इन्फ्लुएंज़ा A के उपप्रकार H1N1 से हुई थी।
- खसरा: हवा से फैलने वाला अत्यंत संक्रामक विषाणु रोग, जो बच्चों में सबसे आम है; 2000 से 2024 के बीच खसरे के टीकाकरण ने लगभग 5.9 करोड़ मौतें टालीं।
हवा से फैलने वाले विषाणु सबसे पहले श्वसन तंत्र (अंग्रेज़ी में) तक पहुँचते हैं, और इन पर नियंत्रण निकट संपर्क से बचने तथा, जहाँ टीका उपलब्ध हो, टीकाकरण पर निर्भर करता है।
यकृतशोथ A से E, पोलियो, रेबीज़ और निपाह: ये कैसे फैलते हैं
यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) का अर्थ है यकृत की सूजन। विषाणुजनित यकृतशोथ पाँच अलग-अलग विषाणुओं से होता है, जिन्हें A से E तक नाम दिया गया है। फैलने के तरीके से ये दो समूहों में बँटते हैं: A और E दूषित भोजन और जल से फैलते हैं, जबकि B, C और D संक्रमित रक्त और शरीर के द्रवों से।
| विषाणु | कैसे फैलता है | रोग की प्रकृति और बचाव |
|---|---|---|
| यकृतशोथ A | दूषित भोजन और जल | अपने-आप ठीक, कभी दीर्घकालिक नहीं; टीका, स्वच्छ जल |
| यकृतशोथ B | रक्त, शरीर के द्रव, जन्म के समय माँ से शिशु | दीर्घकालिक बन सकता है; सुरक्षित टीका |
| यकृतशोथ C | संक्रमित रक्त, जैसे साझा सुइयाँ | दीर्घकालिक बन सकता है; टीका नहीं, दवाएँ 95 प्रतिशत से अधिक ठीक करती हैं |
| यकृतशोथ D | रक्त; केवल उन्हें, जिन्हें पहले से यकृतशोथ B है | यकृतशोथ B की रोकथाम से ही रुकता है |
| यकृतशोथ E | दूषित भोजन और जल | अपने-आप ठीक, कभी दीर्घकालिक नहीं; स्वच्छ जल |
यकृतशोथ B यकृत का विषाणु संक्रमण है। यह जन्म के समय माँ से शिशु में, तथा रक्त और शरीर के द्रवों, असुरक्षित इंजेक्शन, सुई चुभने, टैटू बनवाने और शरीर छिदवाने से फैलता है। 2024 में लगभग 24 करोड़ लोग दीर्घकालिक यकृतशोथ B के साथ जी रहे थे, और इससे लगभग 11 लाख मौतें हुईं, अधिकतर सिरोसिस और यकृत कैंसर से; एक सुरक्षित और प्रभावी टीका इसे रोकता है। यकृतशोथ C भी रक्त से फैलता है और लगभग 4.7 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है। इसका कोई टीका नहीं है, हालाँकि दवाएँ 95 प्रतिशत से अधिक मामलों को ठीक कर देती हैं।
- पोलियो: मुख्यतः पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्रभावित करता है; हर 200 संक्रमणों में से एक में स्थायी लकवा होता है। 1988 के बाद से वन्य पोलियो विषाणु के मामले 99 प्रतिशत से अधिक घट गए हैं।
- रेबीज़: मुख्यतः कुत्तों के काटने और खरोंच से फैलने वाला विषाणु रोग; मनुष्यों के 99 प्रतिशत मामले इसी से होते हैं। लक्षण दिखने के बाद यह शत-प्रतिशत घातक है, किन्तु समय पर संपर्क के बाद रोगनिरोधी उपचार (post-exposure prophylaxis) मृत्यु रोक देता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के एक हालिया अध्ययन का अनुमान है कि भारत में हर वर्ष 5,726 लोग रेबीज़ से मरते हैं; देश ने 2030 तक कुत्तों से होने वाले मानव रेबीज़ को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है।
- निपाह: एक पशुजन्य विषाणु, जिसके प्राकृतिक परपोषी फल खाने वाले चमगादड़ हैं; 1998 में पहली बार पहचाना गया, यह बांग्लादेश, भारत, मलेशिया, फ़िलीपींस और सिंगापुर में मिला है, और संक्रमित लोगों में से अनुमानतः 40 से 75 प्रतिशत की जान ले लेता है।
प्रोटोजोआ, कृमि और कवक से होने वाले रोग
मलेरिया का जीवन चक्र: प्लैज्मोडियम, मादा ऐनोफेलीज़ और मानव परपोषी
मलेरिया प्लैज्मोडियम नामक एक बहुत छोटे प्रोटोजोआ से होता है। इसकी अलग-अलग जातियाँ, प्लै. वाइवैक्स, प्लै. मलेरिआई और प्लै. फ़ैल्सीपैरम, अलग-अलग प्रकार का मलेरिया पैदा करती हैं। इनमें प्लै. फ़ैल्सीपैरम से होने वाला दुर्दम मलेरिया (malignant malaria) सबसे गंभीर है और घातक भी हो सकता है।
परजीवी व्यक्ति और मच्छर के बीच तीन चरणों में घूमता है, जैसा कि इस पृष्ठ के आरंभ में दिया जीवन चक्र दिखाता है:
- प्रवेश: संक्रमित मादा ऐनोफेलीज़ मच्छर के काटने से प्लैज्मोडियम जीवाणुज (sporozoites) के रूप में शरीर में प्रवेश करता है।
- यकृत और रक्त: परजीवी पहले यकृत की कोशिकाओं में अपनी संख्या बढ़ाते हैं और फिर लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं। ये कणिकाएँ फट जाती हैं और हीमोजोइन नामक विषैला पदार्थ छोड़ती हैं, जिससे हर तीन से चार दिन पर ठिठुरन और तेज़ बुखार आता है।
- फिर मच्छर में: मादा ऐनोफेलीज़ जब किसी संक्रमित व्यक्ति को काटती है, तो परजीवी उसके शरीर में पहुँच जाते हैं, वहाँ विकसित होकर जीवाणुज बनते हैं और उसकी लार ग्रंथियों में जमा हो जाते हैं, अगले काटने की प्रतीक्षा में।
इस तरह परजीवी को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए दो परपोषी चाहिए, मनुष्य और मच्छर, और मादा ऐनोफेलीज़ रोगवाहक भी है। मलेरिया एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलता। 2024 में विश्व में मलेरिया के अनुमानतः 28.2 करोड़ मामले और 6.1 लाख मौतें हुईं, जिनमें से 95 प्रतिशत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अफ़्रीकी क्षेत्र में थीं।
1947 में स्वतंत्रता के समय भारत में मलेरिया के हर वर्ष अनुमानतः 7.5 करोड़ मामले होते थे। 2015 से 2023 के बीच मामले 11,69,261 से घटकर 2,27,564 और मौतें 384 से घटकर 83 रह गईं, अर्थात् लगभग 80 प्रतिशत की गिरावट; 2024 में भारत WHO के 'हाई बर्डन टू हाई इम्पैक्ट' समूह से बाहर आ गया। मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय फ्रेमवर्क 2016-2030 के अंतर्गत भारत का लक्ष्य 2027 तक स्थानीय मामलों को शून्य करना और 2030 तक मलेरिया का उन्मूलन है। 2025 में भारत में मलेरिया से 55 लोगों की मृत्यु हुई।
अमीबता, ऐस्केरिसता, फाइलेरिया और दाद
कई आम रोग प्लैज्मोडियम के अलावा दूसरे प्रोटोजोआ, कृमियों और कवकों से होते हैं। अमीबता (amoebiasis), या अमीबी अतिसार, बड़ी आँत में रहने वाले एंटअमीबा हिस्टोलिटिका नामक प्रोटोजोआ से होता है। कब्ज़, पेट दर्द और ऐंठन, तथा श्लेष्मा और रक्त के थक्कों वाला मल इसके लक्षण हैं।
- अमीबता का फैलाव: घरेलू मक्खियाँ संक्रमित व्यक्ति के मल से परजीवी को भोजन तक ले जाकर वाहक का काम करती हैं, और मल से दूषित जल तथा भोजन संक्रमण के मुख्य स्रोत हैं।
- ऐस्केरिसता: आम गोलकृमि ऐस्केरिस से होती है, जो आँत का परजीवी है; आंतरिक रक्तस्राव, पेशियों में दर्द, बुखार, रक्ताल्पता और आँत में रुकावट इसके लक्षण हैं, और इसके अंडे मल से दूषित मिट्टी, जल और सब्ज़ियों से फैलते हैं।
- फाइलेरिया (श्लीपद या हाथीपाँव): वुचेरेरिया बैंक्रॉफ़्टाई और वु. मलायी नामक फाइलेरिया कृमियों से होता है, जो वर्षों तक लसीका वाहिकाओं में, प्रायः पैरों की, रहते हैं और दीर्घकालिक सूजन तथा भारी विकृतियाँ पैदा करते हैं; मादा मच्छर इन्हें फैलाते हैं।
- दाद (ringworm): माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफ़ाइटॉन और एपिडर्मोफ़ाइटॉन नामक कवकों से होने वाला रोग, जिसमें त्वचा, नाखूनों और सिर की त्वचा पर सूखे, पपड़ीदार और खुजली वाले धब्बे होते हैं; गर्मी और नमी इन कवकों को बढ़ने में मदद करती है, और यह मिट्टी या साझा तौलियों, कपड़ों और कंघों से फैलता है।
एथलीट्स फ़ुट (athlete's foot) पैरों की एक आम त्वचा संक्रमण है, जो प्रायः पैर की उँगलियों के बीच से शुरू होता है; यह भी कवक से होता है, उन्हीं वंशों के कवकों से जो दाद पैदा करते हैं।
भारत में वेक्टर जनित रोग
डेंगू, चिकनगुनिया और ज़ीका: एडीज़ मच्छर से फैलने वाले विषाणु रोग
तीन विषाणु रोग एक ही एडीज़ मच्छर से फैलते हैं, जो प्रायः दिन में काटता है। डेंगू से विश्व की लगभग आधी जनसंख्या को खतरा है; हर वर्ष अनुमानतः 10 से 40 करोड़ संक्रमण होते हैं, अधिकतर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में। भारत में पिछले दो दशकों में डेंगू के दर्ज मामले लगभग 11 गुना बढ़े हैं, कई क्षेत्रों में डेंगू विषाणु के चारों सीरोटाइप एक साथ फैल रहे हैं, और 2025 में डेंगू से 131 लोगों की मृत्यु हुई।
- डेंगू के लक्षण: तेज़ बुखार, तेज़ सिरदर्द, आँखों के पीछे दर्द, पेशियों और जोड़ों में दर्द, जी मिचलाना, उल्टी और चकत्ते; गंभीर डेंगू में मसूड़ों या नाक से खून और उल्टी में खून आ सकता है। भारत ने 2008 से डेंगू की मृत्यु दर 1 प्रतिशत से नीचे रखी है, जो 2024 में 0.13 प्रतिशत थी।
- चिकनगुनिया: बुखार और जोड़ों में तेज़, प्रायः लंबे समय तक रहने वाला दर्द पैदा करने वाला विषाणु; भारत में यह 1970 के दशक में दर्ज हुआ, और इसके लक्षण डेंगू तथा ज़ीका जैसे होने के कारण गलत पहचान आसानी से हो जाती है।
- ज़ीका: प्रायः हल्का रोग, किन्तु गर्भावस्था में संक्रमण से शिशु में लघुशीर्षता (microcephaly) हो सकती है; यौन संचरण की पुष्टि हो चुकी है, और फ़रवरी 2016 में WHO ने ज़ीका से जुड़ी लघुशीर्षता को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया।
भारत में स्वीकृत पहला डेंगू टीका क्यूडेंगा (Qdenga) है, जिसे जापानी कंपनी टाकेडा ने बनाया है। जुलाई 2026 में केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन ने 4 से 60 वर्ष के लोगों के लिए इसे विपणन की अनुमति दी। इसके 2027 की पहली छमाही में निजी बाज़ार में आने की आशा है, जबकि इसे सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करना एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।
मच्छर नियंत्रण का एक नया तरीका वोलबैचिया पद्धति है। वोलबैचिया एक जीवाणु है, जो एडीज़ इजिप्टी मच्छर का जीवनकाल घटा देता है। रोग फैलाने की सबसे अधिक संभावना बूढ़े मच्छरों में होती है, इसलिए कम जीने वाले मच्छर कम विषाणु फैलाते हैं।
कालाज़ार और लसीका फाइलेरिया: उन्मूलन के लक्ष्य
जिस रोग को कालाज़ार (visceral leishmaniasis) कहते हैं, वह लीशमैनिया नामक प्रोटोजोआ परजीवियों से होता है, जो संक्रमित मादा बालूमक्खियों (sandflies) के काटने से फैलते हैं। इसमें अनियमित बुखार, वजन घटना, प्लीहा और यकृत का बढ़ना, और रक्ताल्पता होती है; उपचार न हो तो 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में यह घातक है। इसके अधिकतर मामले ब्राज़ील, पूर्वी अफ़्रीका और भारत में होते हैं। 2025 में भारत में कालाज़ार से 27 मौतें दर्ज हुईं।
भारत ने उन्मूलन का पैमाना हर प्रखंड में प्रति 10,000 लोगों पर एक से कम मामला तय किया, और 2023 तक 54 ज़िलों के सभी 633 स्थानिक प्रखंड इस स्तर तक पहुँच गए, जो 2030 के वैश्विक लक्ष्य से बहुत पहले है; यह स्थिति अब भी बनी हुई है।
कृमि से होने वाले लसीका फाइलेरिया (lymphatic filariasis) के 90 प्रतिशत मामले वुचेरेरिया बैंक्रॉफ़्टाई से होते हैं। इसे शहरों में क्यूलेक्स, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐनोफेलीज़ और प्रशांत द्वीपों पर एडीज़ मच्छर फैलाते हैं। हर वर्ष सुरक्षित दवाओं के सामूहिक दवा वितरण (mass drug administration, MDA) से इसका उन्मूलन होता है। भारत के 348 स्थानिक ज़िलों में से 143 ने MDA बंद कर दिया है और संक्रमण सर्वेक्षण पार कर लिया है, और MDA का कवरेज 2014 के 75 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 85 प्रतिशत हो गया।
रोगवाहक नियंत्रण: राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम और मच्छर नियंत्रण
भारत में राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NVBDCP) के अंतर्गत तीन रोगों, मलेरिया, फाइलेरिया और कालाज़ार, को पूर्ण उन्मूलन (eradication) के बजाय उन्मूलन (elimination) के लिए चुना गया है। पूर्ण उन्मूलन का अर्थ है पूरे विश्व में संक्रमण को स्थायी रूप से शून्य कर देना; वेक्टर जनित रोगों का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं, क्योंकि उनके रोगवाहक तापमान, आर्द्रता और वर्षा पर निर्भर रहते हैं।
| रोग | लक्ष्य | भारत में स्थिति |
|---|---|---|
| मलेरिया | शून्य स्थानीय मामले | लक्ष्य 2027; पूर्ण उन्मूलन 2030 तक |
| कालाज़ार | हर प्रखंड में प्रति 10,000 पर 1 से कम | 2023 में सभी 633 स्थानिक प्रखंडों में प्राप्त |
| लसीका फाइलेरिया | माइक्रोफाइलेरिया दर 1 प्रतिशत से कम | 348 में से 143 ज़िलों ने सामूहिक दवा वितरण बंद किया |
- प्रजनन रोकें: घर के आसपास पानी जमा न होने दें और घरेलू कूलरों की नियमित सफ़ाई करें।
- काटने से बचें: मच्छरदानी का प्रयोग करें, और दरवाज़ों-खिड़कियों पर जाली लगाएँ।
- जैविक नियंत्रण: तालाबों में गंबुज़िया जैसी मछलियाँ डालें, जो मच्छर के लार्वा खाती हैं।
- रासायनिक नियंत्रण: खाइयों, जल-निकास क्षेत्रों और दलदलों में कीटनाशकों का छिड़काव करें।
भारत के कई भागों में एडीज़ से फैलने वाले डेंगू और चिकनगुनिया के व्यापक प्रकोप के बाद ये उपाय और भी महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। एक अन्य मच्छर-जनित विषाणु रोग, जापानी मस्तिष्क ज्वर (Japanese encephalitis), की मृत्यु दर 2014 के 17.6 प्रतिशत से घटकर 2024 में 7.1 प्रतिशत रह गई।
भारत में रोग नियंत्रण और निगरानी
पूर्ण उन्मूलन के पड़ाव: चेचक, पोलियो और गिनी कृमि
मनुष्य का अब तक एकमात्र रोग, जिसका पूर्ण उन्मूलन हुआ है, चेचक (smallpox) है। इसका अंतिम प्राकृतिक मामला अक्टूबर 1977 में मिला, और 1980 में WHO ने इसके वैश्विक उन्मूलन को प्रमाणित किया; यह टीकों और टीकाकरण का परिणाम था।
- पोलियो-मुक्त भारत: भारत का अंतिम मामला 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में दर्ज हुआ, और 27 मार्च 2014 को भारत सहित WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया।
- गिनी कृमि रोग: संक्रमित जल-पिस्सुओं वाला ठहरा पानी पीने से फैलने वाला परजीवी रोग; भारत ने 1983 में इसके उन्मूलन का कार्यक्रम शुरू किया और 2000 में इसे संक्रमण-मुक्त प्रमाणित किया गया। 2024 में पूरे विश्व में इसके केवल 13 मानव मामले दर्ज हुए।
उन्मूलन (elimination) पूर्ण उन्मूलन से छोटा लक्ष्य है। उदाहरण के लिए, कुष्ठ रोग को केवल जन स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त किया जा सकता है, क्योंकि माइकोबैक्टीरियम लेप्री के स्रोत मनुष्य के बाहर भी हैं; और क्षय रोग का पूर्ण उन्मूलन नहीं हो सकता, क्योंकि इसका संक्रमण लगातार जारी है।
पशुजन्य रोग और वन हेल्थ दृष्टिकोण
जो रोग या संक्रमण कशेरुकी पशुओं से मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से फैल सकता है, उसे पशुजन्य रोग (zoonosis) कहते हैं, और ऐसे 200 से अधिक रोग ज्ञात हैं। मनुष्यों के नए और पुराने रोगों में इनका बड़ा हिस्सा है; HIV जैसे कुछ रोग पशुजन्य रूप में शुरू हुए और बाद में केवल मनुष्यों में फैलने वाले रूप बन गए।
भारत का अपना उदाहरण है क्यासानूर वन रोग (Kyasanur Forest disease), किलनी (टिक) से फैलने वाला विषाणु ज्वर, जो पहली बार 1957 में कर्नाटक के क्यासानूर वन क्षेत्र में दर्ज हुआ। वहाँ इससे बहुत से बंदर मरे, इसलिए इसे स्थानीय रूप से 'मंकी फ़ीवर' कहा जाता है। ICMR इसके लिए एक स्वदेशी, दो खुराक वाला निष्क्रियित टीका विकसित कर रहा है। 2026 के हंतावायरस प्रकोप (अंग्रेज़ी में) जैसे विदेशी प्रकोप दिखाते हैं कि तैयारी क्यों आवश्यक है।
पशुजन्य रोगों से निपटने का तरीका है वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण, जिसमें कई विषयों के विशेषज्ञ मिलकर मनुष्यों, पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए काम करते हैं। भारत के राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन का लक्ष्य एकीकृत रोग निगरानी खड़ी करना और भविष्य की किसी विश्वमारी के 100 दिनों के भीतर चिकित्सीय उपाय विकसित करना है; अगस्त 2024 में इसने तैयारी परखने के लिए अजमेर में 'विषाणु युद्ध अभ्यास' किया।
एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम
भारत प्रकोपों पर नज़र एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (Integrated Disease Surveillance Programme, IDSP) से रखता है, जो विश्व बैंक की सहायता से नवंबर 2004 में शुरू हुआ। नवंबर 2019 से इसका डिजिटल अंग, एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (IHIP), 50 से अधिक महामारी-प्रवण रोगों की कागज़-रहित, मामला-आधारित रिपोर्टिंग करता है, और हर मामले को हीट मैप पर भौगोलिक रूप से अंकित किया जाता है, ताकि जल्दी पहचान और त्वरित कार्रवाई हो सके।
सीमाओं के पार अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियम (International Health Regulations) लागू होते हैं, जो रोगों के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार को रोकने, नियंत्रित करने और उस पर प्रतिक्रिया के विधिक रूप से बाध्यकारी नियम हैं। 1969 में पहली बार अपनाए गए और 2005 में संशोधित ये विनियम जून 2007 में 196 देशों के लिए लागू हुए। इनके अंतर्गत WHO 'अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' घोषित कर सकता है; इसका पहला पूर्ण उपयोग 2009 की स्वाइन फ़्लू विश्वमारी में हुआ, और COVID-19 के बाद 2024 में विनियम फिर संशोधित किए गए।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2023'वोलबैचिया पद्धति' का कभी-कभी निम्नलिखित में से किस एक के संदर्भ में उल्लेख होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले याद करें कि वोलबैचिया क्या है: एक जीवाणु, जो एडीज़ इजिप्टी मच्छर का जीवनकाल घटा देता है। रोग फैलाने की संभावना बूढ़े मच्छरों में सबसे अधिक होती है, इसलिए कम जीने वाले मच्छर कम संक्रमण फैलाते हैं। अतः यह पद्धति मच्छर नियंत्रण की है; बाकी तीन विकल्प अपशिष्ट और जैव मात्रा की तकनीकें हैं।
इस भ्रम से बचें: बाकी सभी विकल्प अपशिष्ट या जैव मात्रा की तकनीकें हैं; वोलबैचिया से उनका कोई संबंध नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) मच्छरों से होने वाले विषाणु रोगों का नियंत्रण: सही। वोलबैचिया एडीज़ इजिप्टी से डेंगू, चिकनगुनिया और ज़ीका का प्रसार घटाता है।
- (b) फसल अवशेष से पैकिंग सामग्री: गलत। यह अपशिष्ट की तकनीक है, वोलबैचिया से इसका संबंध नहीं।
- (c) जैव निम्नीकरणीय प्लास्टिक: गलत। यह पदार्थों की तकनीक है, मच्छर के जीवाणु से इसका कोई लेना-देना नहीं।
- (d) जैव मात्रा से बायोचार: गलत। यह ऊष्मरासायनिक प्रक्रिया है, मच्छरों से असंबद्ध।
उत्तर: वोलबैचिया मच्छर नियंत्रण की पद्धति है, अतः उत्तर विकल्प (a) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- एडीनोवायरसों में एकल-तंतु डी० एन० ए० संजीन (जीनोम) होते हैं, जबकि रेट्रोवायरसों में द्वि-तंतु डी० एन० ए० संजीन (जीनोम) होते हैं।
- कभी-कभी सामान्य जुकाम एडीनोवायरस के कारण होता है, जबकि एड्स (ए० आइ० डी० एस०) रेट्रोवायरस के कारण होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले हर विषाणु-कुल का संजीन जाँचें, फिर रोग। एडीनोवायरस में द्वि-तंतु DNA होता है और HIV जैसे रेट्रोवायरस में एकल-तंतु RNA, इसलिए कथन 1 दोनों के संजीन उलटकर बताता है। एडीनोवायरस सामान्य जुकाम का एक कारण है और रेट्रोवायरस HIV से एड्स होता है, इसलिए कथन 2 सही है।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 संजीन उलट देता है: एडीनोवायरस द्वि-तंतु DNA वाले हैं, जबकि रेट्रोवायरस RNA वाले।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 1 गलत है, क्योंकि एडीनोवायरस में द्वि-तंतु DNA होता है और रेट्रोवायरस में DNA नहीं, RNA होता है।
- (b) केवल 2: सही। सामान्य जुकाम एडीनोवायरस से हो सकता है और एड्स रेट्रोवायरस HIV से होता है।
- (c) 1 और 2 दोनों: गलत। इसमें गलत कथन 1 भी शामिल है।
- (d) न तो 1 और न ही 2: गलत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल कथन 2 सही है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: प्रश्न उस कथन को पूछता है जो सही नहीं है, इसलिए हर कथन को परखें और गलत को चुनें। यकृतशोथ B, HIV की तरह, रक्त और शरीर के द्रवों से फैलता है; लगभग 24 करोड़ लोग दीर्घकालिक यकृतशोथ B और 4.7 करोड़ यकृतशोथ C के साथ जी रहे हैं, जबकि HIV के साथ 4.1 करोड़; और यकृतशोथ C प्रायः दशकों तक बिना लक्षण के रहता है। टीके वाला कथन तथ्यों को उलट देता है।
इस भ्रम से बचें: टीके वाला तथ्य उलटा है: यकृतशोथ B का टीका है, यकृतशोथ C का नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) यकृतशोथ B, HIV की तरह संचरित होता है: सही कथन, अतः उत्तर नहीं। दोनों रक्त, शरीर के द्रवों, साझा सुइयों और माँ से शिशु में फैलते हैं।
- (b) यकृतशोथ C का टीका है, B का नहीं: सही नहीं, अतः यही उत्तर है। यकृतशोथ B का सुरक्षित और प्रभावी टीका है, जबकि यकृतशोथ C का कोई टीका नहीं।
- (c) यकृतशोथ B और C के संक्रमित HIV से कई गुना अधिक: सही कथन। लगभग 28.7 करोड़ लोग यकृतशोथ B या C के साथ जी रहे हैं, जो HIV के 4.1 करोड़ का लगभग सात गुना है।
- (d) कुछ संक्रमितों में वर्षों तक लक्षण नहीं: सही कथन। दीर्घकालिक यकृतशोथ C प्रायः संक्रमण के दशकों बाद तक लक्षणहीन रहता है।
उत्तर: टीके वाला कथन गलत है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ज़ीका विषाणु रोग उसी मच्छर से फैलता है, जो डेंगू फैलाता है।
- ज़ीका विषाणु रोग का यौन संचरण संभव है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले रोगवाहक जाँचें, फिर दूसरे रास्ते। एडीज़ मच्छर डेंगू, चिकनगुनिया और ज़ीका तीनों फैलाता है, इसलिए कथन 1 सही है। मच्छर-जनित रोगों में ज़ीका अपवाद है: इसके यौन संचरण की पुष्टि हो चुकी है, इसलिए कथन 2 भी सही है।
इस भ्रम से बचें: मच्छर-जनित रोगों का प्रायः कोई दूसरा रास्ता नहीं होता, किन्तु ज़ीका इसका अपवाद है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। इसमें यौन संचरण छूट जाता है, जिसकी पुष्टि हो चुकी है।
- (b) केवल 2: गलत। इसमें साझा रोगवाहक छूट जाता है: एडीज़ ज़ीका और डेंगू दोनों फैलाता है।
- (c) 1 और 2 दोनों: सही। डेंगू वाला ही मच्छर, और यौन संचरण संभव।
- (d) न तो 1 और न ही 2: गलत। दोनों कथन सही हैं।
उत्तर: दोनों कथन सही हैं, अतः उत्तर विकल्प (c) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2015 (हिंदी रूपांतर)H1N1 विषाणु का उल्लेख कभी-कभी समाचारों में निम्नलिखित में से किस रोग के संदर्भ में होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: H और N वाले नाम को इन्फ्लुएंज़ा A का उपप्रकार समझें, फिर याद करें कि H1N1 ने कौन-सा प्रकोप किया: 2009 की स्वाइन फ़्लू विश्वमारी। जो विकल्प दूसरे विषाणुओं या इन्फ्लुएंज़ा के दूसरे उपप्रकारों से होते हैं, उन्हें हटा दें।
इस भ्रम से बचें: बर्ड फ़्लू भी इन्फ्लुएंज़ा है, इसलिए यह आकर्षक लगता है, किन्तु H1N1 स्वाइन फ़्लू का विषाणु है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) एड्स: गलत। यह HIV से होता है, जो रेट्रोवायरस है, इन्फ्लुएंज़ा विषाणु नहीं।
- (b) बर्ड फ़्लू: गलत। बर्ड फ़्लू भी इन्फ्लुएंज़ा A है, किन्तु इसका सबसे प्रसिद्ध उपप्रकार H5N1 है, H1N1 नहीं।
- (c) डेंगू: गलत। यह डेंगू विषाणु से होता है और एडीज़ मच्छर से फैलता है।
- (d) स्वाइन फ़्लू: सही। इन्फ्लुएंज़ा A के उपप्रकार H1N1 से 2009 की स्वाइन फ़्लू विश्वमारी हुई।
उत्तर: H1N1 स्वाइन फ़्लू का विषाणु है, अतः उत्तर विकल्प (d) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2014 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित रोगों पर विचार कीजिए:
- डिप्थीरिया
- छोटी माता (चिकनपॉक्स)
- चेचक
उपर्युक्त में से किस/किन रोग/रोगों का भारत में उन्मूलन हो चुका है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: याद करें कि चेचक मनुष्य का एकमात्र रोग है जिसका पूर्ण उन्मूलन हुआ है: इसका अंतिम प्राकृतिक मामला अक्टूबर 1977 में था और WHO ने 1980 में इसके उन्मूलन को प्रमाणित किया। जो विकल्प कोई दूसरा रोग जोड़ता है, वह गलत होगा।
इस भ्रम से बचें: डिप्थीरिया टीकाकरण सूची में है, किन्तु नियंत्रण का अर्थ उन्मूलन नहीं है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1 और 2: गलत। डिप्थीरिया टीकों से नियंत्रित है, उन्मूलित नहीं, और छोटी माता का भी उन्मूलन नहीं हुआ।
- (b) केवल 3: सही। भारत और पूरे विश्व में केवल चेचक का उन्मूलन हुआ है।
- (c) 1, 2 और 3: गलत। इसमें डिप्थीरिया और छोटी माता भी जोड़ दिए गए हैं।
- (d) कोई नहीं: गलत। चेचक का उन्मूलन हो चुका है।
उत्तर: केवल चेचक का उन्मूलन हुआ है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2013 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन-से रोग गोदना (टैटू) बनवाने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकते हैं?
- चिकनगुनिया
- यकृतशोथ B
- HIV-एड्स
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: टैटू बनवाने में एक व्यक्ति का रक्त दूसरे तक पहुँच सकता है, इसलिए देखें कि तीनों में से कौन-से रोग रक्त से फैलते हैं। यकृतशोथ B रक्त, शरीर के द्रवों, टैटू और शरीर छिदवाने से फैलता है; HIV रक्त और साझा सुइयों से। चिकनगुनिया व्यक्ति से व्यक्ति तक केवल एडीज़ मच्छर के काटने से पहुँचता है।
इस भ्रम से बचें: चिकनगुनिया का विषाणु भी रक्त में होता है, किन्तु एक व्यक्ति से दूसरे में यह केवल मच्छर के काटने से जाता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। तीनों में चिकनगुनिया ही ऐसा रोग है जो टैटू से नहीं फैलता।
- (b) केवल 2 और 3: सही। यकृतशोथ B और HIV दोनों रक्त से फैलते हैं।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। इसमें चिकनगुनिया शामिल है और यकृतशोथ B छूट गया है।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। इसमें चिकनगुनिया शामिल है।
उत्तर: यकृतशोथ B और HIV, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2013 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं?
- विषाणुओं में ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए आवश्यक एंज़ाइमों का अभाव होता है।
- विषाणुओं का संवर्धन किसी भी संश्लेषित माध्यम में किया जा सकता है।
- विषाणु एक जीव से दूसरे जीव तक केवल जैविक रोगवाहकों द्वारा संचरित होते हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: हर कथन को इस आधार पर परखें कि विषाणु है क्या। विषाणुओं का अपना उपापचय नहीं होता और वे परपोषी कोशिका की व्यवस्था का उपयोग करते हैं, इसलिए कथन 1 सही है। परपोषी कोशिका के बाहर वे प्रजनन नहीं कर सकते, इसलिए किसी भी संश्लेषित माध्यम में उनका संवर्धन संभव नहीं: कथन 2 गलत है। कई विषाणु बिना रोगवाहक के हवा, रक्त या संपर्क से फैलते हैं, इसलिए 'केवल जैविक रोगवाहकों द्वारा' गलत है।
इस भ्रम से बचें: कथन 3 में 'केवल' शब्द है: सामान्य जुकाम और HIV बिना किसी रोगवाहक के फैलते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: सही। विषाणुओं में अपनी ऊर्जा बनाने वाले एंज़ाइम नहीं होते।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। दोनों कथन गलत हैं: विषाणुओं को जीवित परपोषी कोशिका चाहिए, और सामान्य जुकाम तथा HIV बिना रोगवाहक के फैलते हैं।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। 'केवल' शब्द के कारण कथन 3 गलत है।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 2 एवं कथन 3 गलत हैं।
उत्तर: केवल कथन 1 सही है, अतः उत्तर विकल्प (a) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2008 (हिंदी रूपांतर)मच्छरों के नियंत्रण में तालाबों और कुओं में निम्नलिखित में से किसे छोड़ना सहायक होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: मच्छर ठहरे पानी में पनपते हैं, इसलिए नियंत्रण का तरीका ऐसी मछली छोड़ना है जो उनके लार्वा खाए। गंबुज़िया, जिसे मच्छर-मछली भी कहते हैं, यही मछली है।
इस भ्रम से बचें: डॉगफ़िश भी मछली है, किन्तु यह समुद्री शार्क है, तालाबों में लार्वा खाने वाली मछली नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केकड़ा: गलत। मच्छर नियंत्रण में लार्वा खाने वाली मछली छोड़ी जाती है, केकड़ा नहीं।
- (b) डॉगफ़िश: गलत। यह मछली है, पर तालाबों और कुओं में छोड़ी जाने वाली लार्वा-भक्षी मछली नहीं।
- (c) गंबुज़िया मछली: सही। यह मच्छर के लार्वा खाती है और जैविक नियंत्रण के लिए तालाबों में छोड़ी जाती है।
- (d) घोंघा: गलत। घोंघे मच्छर नियंत्रण में काम नहीं आते।
उत्तर: गंबुज़िया मच्छर के लार्वा खाती है, अतः उत्तर विकल्प (c) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2006 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- मेनिंगोकोकल मस्तिष्कावरण शोथ एक व्यक्ति से दूसरे में मच्छर के काटने से फैलता है।
- उल्टी और गर्दन का दर्द मेनिंगोकोकल मस्तिष्कावरण शोथ के दो लक्षण हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले फैलने का रास्ता जाँचें, फिर लक्षण। मेनिंगोकोकल मस्तिष्कावरण शोथ एक व्यक्ति से दूसरे में श्वसन बिंदुकों से फैलता है, मच्छर के काटने से नहीं, इसलिए कथन 1 गलत है। बुखार, गर्दन में अकड़न, सिरदर्द, जी मिचलाना और उल्टी इसके आम लक्षण हैं, इसलिए कथन 2 सही है।
इस भ्रम से बचें: मच्छर का काटना भ्रामक है: यह रोग बिंदुकों से फैलता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 1 गलत है, क्योंकि जीवाणु श्वसन बिंदुकों से फैलते हैं।
- (b) केवल 2: सही। उल्टी और गर्दन में अकड़न इसके आम लक्षण हैं।
- (c) 1 और 2 दोनों: गलत। इसमें गलत कथन 1 भी शामिल है।
- (d) न तो 1 और न ही 2: गलत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल कथन 2 सही है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2005 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- डेंगू मच्छरों से फैलने वाला प्रोटोजोआ रोग है।
- आँखों के पीछे का दर्द (retro-orbital pain) डेंगू का लक्षण नहीं है।
- त्वचा पर चकत्ते तथा नाक और मसूड़ों से रक्तस्राव डेंगू के कुछ लक्षण हैं।
निम्नलिखित में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले रोगजनक जाँचें, फिर हर लक्षण। डेंगू एडीज़ मच्छर से फैलने वाले विषाणु से होता है, प्रोटोजोआ से नहीं, इसलिए कथन 1 गलत है। आँखों के पीछे दर्द डेंगू का विशिष्ट लक्षण है, इसलिए इसे नकारने वाला कथन 2 गलत है। चकत्ते, और गंभीर डेंगू में मसूड़ों या नाक से खून, कथन 3 को सही बनाते हैं।
इस भ्रम से बचें: आँखों के पीछे दर्द डेंगू का विशिष्ट लक्षण है, इसलिए कथन 2 गलत है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 1 और 2: गलत। दोनों कथन गलत हैं।
- (b) केवल 3: सही। चकत्ते और मसूड़ों या नाक से खून डेंगू के लक्षण हैं।
- (c) केवल 2: गलत। आँखों के पीछे दर्द डेंगू का लक्षण है, इसलिए कथन 2 गलत है।
- (d) 1 और 3: गलत। डेंगू विषाणु रोग है, इसलिए कथन 1 गलत है।
उत्तर: केवल कथन 3 सही है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)'एथलीट्स फ़ुट' रोग किससे होता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: एथलीट्स फ़ुट पैरों की त्वचा का संक्रमण है, जो प्रायः उँगलियों के बीच से शुरू होता है। यह उन्हीं वंशों के कवकों से होता है जो दाद पैदा करते हैं, और गर्मी तथा नमी इन कवकों को बढ़ने में मदद करती है।
इस भ्रम से बचें: यह नम जगहों पर फैलता है, जैसे कोई जीवाणु संक्रमण फैल सकता है, किन्तु इसका कारण कवक है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) जीवाणु: गलत। यह कुछ जीवाणु संक्रमणों की तरह नम जगहों पर फैलता है, पर इसका कारण कवक है।
- (b) कवक: सही। दाद पैदा करने वाले कवक-वंश ही इसके कारण हैं।
- (c) प्रोटोजोआ: गलत। प्रोटोजोआ से मलेरिया और अमीबता जैसे रोग होते हैं।
- (d) सूत्रकृमि: गलत। ऐस्केरिस जैसे गोलकृमि, अर्थात् सूत्रकृमि, आँत के कृमि संक्रमण पैदा करते हैं।
उत्तर: एथलीट्स फ़ुट कवक-जनित है, अतः उत्तर विकल्प (b) है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)सूची I (रोग) को सूची II (जीव) से सुमेलित कीजिए, जहाँ सूची II इस प्रकार है: A. कवक, B. जीवाणु, C. विषाणु, D. प्रोटोजोआ:
- I. I. मलेरिया
- II. II. पोलियोमाइलाइटिस
- III. III. क्षय रोग
- IV. IV. दाद
सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: एक जोड़ी तय करें जिस पर आप निश्चित हों, फिर विकल्प हटाएँ। मलेरिया प्रोटोजोआ से होता है (I-D), इससे विकल्प (c) और (d) हट जाते हैं। क्षय रोग जीवाणु से होता है (III-B), इससे विकल्प (b) हट जाता है। पोलियो विषाणु से (II-C) और दाद कवक से (IV-A) होता है, जो विकल्प (a) की पुष्टि करता है।
इस भ्रम से बचें: दाद का अंग्रेज़ी नाम ringworm कृमि जैसा लगता है, किन्तु यह कवक रोग है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) I-D, II-C, III-B, IV-A: सही। मलेरिया प्रोटोजोआ, पोलियो विषाणु, क्षय रोग जीवाणु, दाद कवक।
- (b) I-D, II-C, III-A, IV-B: गलत। यह क्षय रोग को कवक-जनित और दाद को जीवाणु-जनित बना देता है।
- (c) I-C, II-D, III-A, IV-B: गलत। यह मलेरिया को विषाणु-जनित और पोलियो को प्रोटोजोआ-जनित बना देता है।
- (d) I-C, II-D, III-B, IV-A: गलत। यह मलेरिया और पोलियो को आपस में बदल देता है।
उत्तर: I-D, II-C, III-B, IV-A, अतः उत्तर विकल्प (a) है।
स्रोत
- NCERT: जीव विज्ञान (कक्षा 12), मानव स्वास्थ्य तथा रोग
- NCERT: Biology, Class 12, Chapter 7, Human Health and Disease
- World Health Organization: Malaria, fact sheet
- World Health Organization: Dengue and severe dengue, fact sheet
- World Health Organization: Chikungunya, fact sheet
- World Health Organization: Zika virus, fact sheet
- World Health Organization: Tuberculosis, fact sheet
- World Health Organization: Leprosy, fact sheet
- World Health Organization: Typhoid, fact sheet
- World Health Organization: Cholera, fact sheet
- World Health Organization: Meningitis, fact sheet
- World Health Organization: Influenza (seasonal), fact sheet
- World Health Organization: Measles, fact sheet
- World Health Organization: Hepatitis B, fact sheet
- World Health Organization: Hepatitis C, fact sheet
- World Health Organization: HIV and AIDS, fact sheet
- World Health Organization: Poliomyelitis, fact sheet
- World Health Organization: Rabies, fact sheet
- World Health Organization: Nipah virus, fact sheet
- World Health Organization: Zoonoses, fact sheet
- World Health Organization: Leishmaniasis, fact sheet
- World Health Organization: Lymphatic filariasis, fact sheet
- World Health Organization: Dracunculiasis (guinea-worm disease), fact sheet
- Press Information Bureau: India's progress in malaria elimination, 25 December 2024
- Press Information Bureau: World Malaria Day 2025
- Press Information Bureau: disease eradication programmes, 23 July 2021
- Press Information Bureau: achievements in eliminating and controlling infectious diseases, 22 July 2025
- Press Information Bureau: Celebrating the Power of Vaccines, 17 March 2026
- Directorate General of Health Services: National Leprosy Eradication Programme
- Directorate General of Health Services: National Tuberculosis Elimination Programme
- Indian Council of Medical Research: ICMR Bulletin, first quarter 2026
- Wikipedia: Virus
- Wikipedia: Adenoviridae
- Wikipedia: Retrovirus
- Wikipedia: Influenza A virus subtype H1N1
- Wikipedia: Athlete's foot
- Wikipedia: Smallpox
- Wikipedia: Dracunculiasis
- Wikipedia: Wolbachia
- Wikipedia: Kyasanur Forest disease
- Wikipedia: One Health
- Wikipedia: Integrated Disease Surveillance Programme
- Wikipedia: International Health Regulations (2005)
- Wikipedia: Tuberculosis
- Wikipedia: Leprosy
- Wikipedia: Hepatitis
- The Hindu, Delhi edition, 19 September 2026: Dr. Reddy's to market Takeda's dengue shot in India
- The Hindu, Delhi edition, 5 October 2026: deaths from malaria, dengue, kala-azar and rabies
- The Hindu, Delhi edition, 7 October 2026, Editorial: leprosy
- The Hindu, Delhi edition, 8 October 2026: leprosy programme falls short of projections
- The Hindu, Delhi edition, 9 October 2026: Govt. launches JOSH teams to accelerate TB elimination
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख UPSC की तैयारी के लिए है और संक्रामक रोगों तथा उनके नियंत्रण को समझाता है। यह चिकित्सीय सलाह नहीं है; किसी भी लक्षण के लिए डॉक्टर से मिलें।
