परिचय

सगुण भक्ति साकार और गुणों वाले ईश्वर की भक्ति है, सबसे बढ़कर विष्णु के अवतार राम और कृष्ण की। उत्तर भारत में इसकी आवाज़ बने तुलसीदास, जिनके रामचरितमानस ने अवधी में रामायण कही, और वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के सूरदास तथा अष्टछाप के कवि, जिन्होंने ब्रजभाषा में कृष्ण को गाया; इसकी प्रतिरूप निर्गुण भक्ति निराकार ईश्वर की उपासना थी।

सगुण भक्ति क्या है: अर्थ, विशेषताएँ और साकार ईश्वर

सगुण और निर्गुण भक्ति में अंतर: अर्थ और विशेषताएँ

धर्म के इतिहासकार भक्ति परंपराओं को दो बड़ी धाराओं में बाँटते हैं। सगुण भक्ति (saguna bhakti), अर्थात् गुणों वाले ईश्वर की भक्ति, शिव, विष्णु और उनके अवतारों तथा देवी के रूपों जैसे विशिष्ट देवताओं पर केंद्रित थी, जिन्हें प्रायः मानव रूप में देखा जाता था। निर्गुण भक्ति ईश्वर के अमूर्त, निराकार रूप की उपासना थी। सगुण शब्द का अर्थ ही है गुणों सहित; सगुण ब्रह्म गुणों वाला परम सत्य है।

दोनों धाराएँ अपने आसपास की आस्था के प्रति अपने दृष्टिकोण में भी भिन्न थीं। कबीर और गुरु नानक ने सभी रूढ़िवादी धर्मों को अस्वीकार किया; तुलसीदास और सूरदास ने प्रचलित विश्वासों और प्रथाओं को स्वीकार किया, पर चाहा कि वे सबके लिए सुलभ हों। चित्र 1 दोनों को साथ-साथ रखता है।

दो स्तंभों की तुलना तालिका। सगुण भक्ति: साकार और गुणों सहित ईश्वर; आराध्य राम, कृष्ण, शिव और देवी; मूर्ति, मंदिर और लीला से उपासना; रूढ़िवादी प्रथा को स्वीकार कर सबके लिए सुलभ बनाया; संत तुलसीदास और सूरदास। निर्गुण भक्ति: निराकार और गुणों से रहित ईश्वर; एक अमूर्त ईश्वर; नाम और आंतरिक भक्ति से उपासना; रूढ़िवादी धर्म को अस्वीकार किया; संत कबीर, नानक और रविदास।

निर्गुण संत, कबीर, जिनकी वाणी बीजक में संकलित है, नानक और रविदास, निर्गुण भक्ति वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में हैं।

लीला, मूर्ति और अवतार: सगुण भक्त ईश्वर को कैसे देखते थे

तीन विचारों ने साकार ईश्वर को ऐसा बनाया जिससे भक्त प्रेम कर सके और जिसकी सेवा कर सके। पहला है अवतार: राम और कृष्ण विष्णु के रूप हैं जो संसार में आए, इसलिए उनकी कथाएँ स्वयं ईश्वर के कर्म हैं। दूसरा है लीला, अर्थात् दिव्य क्रीड़ा। सृष्टि कोई काम नहीं जिसे ईश्वर को पूरा करना था, बल्कि उसके क्रीड़ामय, स्वतंत्र स्वभाव का परिणाम है; वैष्णव भक्ति में लीला का अर्थ है ईश्वर और उसके भक्तों के कर्म, सबसे बढ़कर वृंदावन के ग्वालों के बीच कृष्ण का बचपन।

तीसरा है मूर्ति, अर्थात् उपासना में प्रयुक्त देवता की भक्ति-प्रतिमा। कुछ परंपराएँ इसे ईश्वर का प्रतीक मानती हैं; कुछ मानती हैं कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद ईश्वर सचमुच उसमें उपस्थित होता है और उसी के माध्यम से पूजा ग्रहण करता है। इसीलिए सगुण भक्ति ने मंदिर बनाए, मूर्तियों की भोजन और संगीत से सेवा की, और लीलाओं को नाटक और नृत्य में उतारा, राम की रामलीला से लेकर रासलीला तक, जिसमें कृष्ण ब्रज की राधा और गोपियों के साथ नृत्य करते हैं।

सगुण भक्ति की दार्शनिक जड़ें: रामानंद, वल्लभाचार्य और निंबार्क

उत्तर भारत की सगुण भक्ति ने दक्षिण के वेदांत आचार्यों से और गंगा घाटी में बसे आचार्यों से प्रेरणा ली। दोनों धाराओं के पीछे के प्रमुख व्यक्ति थे:

  • रामानंद (चौदहवीं शताब्दी): एक ब्राह्मण, जो जीवन का अधिकांश समय वाराणसी में रहे और रामानंदी संप्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं। परंपरा उनके विचारों को रामानुज से जोड़ती है; उन्होंने लिंग, वर्ग या जाति का भेद किए बिना शिष्य बनाए।
  • वल्लभाचार्य (लगभग 1479 से 1530): पुष्टिमार्ग, अर्थात् पोषण के मार्ग, के संस्थापक; यह मार्ग उनके शुद्धाद्वैत दर्शन के अनुसार बाल कृष्ण की उपासना करता है।
  • निंबार्क: द्वैताद्वैत, अर्थात् भेद में अभेद, के प्रमुख प्रवक्ता और निंबार्क संप्रदाय के संस्थापक; दक्षिण में जन्मे, उन्होंने जीवन का अधिकांश समय मथुरा में बिताया। उनकी तिथि विवादित है: बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी से लेकर छठी-सातवीं शताब्दी तक।

चित्र 2 दिखाता है कि उत्तर भारत की दोनों धाराएँ इन आचार्यों से उनके कवियों, ग्रंथों और केंद्रों तक कैसे बढ़ीं।

दो शाखाओं का आरेख। राम-भक्ति: आचार्य वाराणसी के रामानंद; कवि तुलसीदास; मुख्य ग्रंथ रामचरितमानस, 1574 में आरंभ; भाषा अवधी; केंद्र अयोध्या और बनारस। कृष्ण-भक्ति: आचार्य वल्लभाचार्य और उनका पुष्टिमार्ग; कवि सूरदास और अष्टछाप; मुख्य ग्रंथ सूरसागर; भाषा ब्रजभाषा; केंद्र नाथद्वारा और ब्रज।

दक्षिण के उनके पूर्ववर्ती, जिनमें रामानुज और मध्व थे, वेदांत आचार्यों वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में हैं।

राम-भक्ति: तुलसीदास और रामचरितमानस

तुलसीदास का जीवन परिचय और तुलसीदास की रचनाएं

रामबोला दुबे के नाम से जन्मे तुलसीदास रामानंदी परंपरा के वैष्णव संत और राम के भक्त कवि थे। उनकी मृत्यु 1623 में हुई; एक परंपरा उनका जन्म 1511 में और अन्य विवरण लगभग 1532 में रखते हैं। उन्होंने जीवन का अधिकांश समय बनारस और अयोध्या में बिताया; वाराणसी में गंगा का तुलसी घाट उन्हीं के नाम पर है, और संकटमोचन हनुमान मंदिर की स्थापना उन्होंने की।

उन्होंने संस्कृत, अवधी और ब्रजभाषा में लिखा, और उनकी रचनाएँ भाषा के अनुसार बँटती हैं:

भाषा के अनुसार तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ।
भाषा रचनाएँ
अवधी रामचरितमानस; हनुमान चालीसा; रामलला नहछू; बरवै रामायण; पार्वती मंगल; जानकी मंगल; रामाज्ञा प्रश्न
ब्रजभाषा विनय पत्रिका; गीतावली; कृष्ण गीतावली; दोहावली (1581, 573 छंद); वैराग्य संदीपनी

हनुमान चालीसा हनुमान की स्तुति में चालीस चौपाइयाँ है; विनय पत्रिका, अर्थात् विनती का पत्र, राम और अन्य देवताओं के भजनों का संग्रह है। कवितावली और विनय पत्रिका में तुलसीदास लिखते हैं कि जन्म के बाद उनके परिवार ने उन्हें त्याग दिया था। रामायण के लोकनाट्य रूप रामलीला को आरंभ करने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है, और उनका प्रभाव आज भी भाषा, रामलीला के मंच, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और लोकप्रिय संस्कृति में दिखता है।

रामचरितमानस: अवधी में रामकथा

तुलसीदास ने 1574 में अयोध्या में रामचरितमानस लिखना आरंभ किया। इसके नाम का अर्थ है राम के चरित का सरोवर, और इसकी मुख्य प्रेरणा वाल्मीकि की संस्कृत रामायण है। तुलसीदास संस्कृत के विद्वान थे, पर उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की भाषा अवधी चुनी ताकि साधारण लोग इसे पढ़ सकें; परंपरा कहती है कि लोकभाषा में लिखने के कारण वाराणसी के संस्कृत विद्वानों ने उनकी आलोचना की।

यह ग्रंथ भक्ति की अभिव्यक्ति और साहित्य, दोनों रूपों में महत्त्वपूर्ण है। इसे समस्त भक्ति साहित्य का सबसे महान ग्रंथ और भारतीय जनता की जीवित लोक-आस्था का सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक कहा गया है, और आम बोलचाल में यह तुलसी रामायण या बस मानस कहलाता है।

इसकी प्रतिष्ठा अंतरराष्ट्रीय भी है। 2024 में रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोचन के साथ, उलानबातार में हुई समिति की दसवीं बैठक में यूनेस्को के 'मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड' एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल हुआ; ये नामांकन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने किए थे।

कृष्ण-भक्ति: वल्लभाचार्य, सूरदास और अष्टछाप के कवि

वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग और श्रीनाथजी की सेवा

सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग, अर्थात् पोषण का मार्ग, स्थापित किया और उनके पुत्र विट्ठलनाथ (1515 से 1586) ने आगे बढ़ाया। इसके अनुयायी भागवत पुराण और गोवर्धन पर्वत के बाल कृष्ण की उपासना करते हैं। वल्लभाचार्य की शिक्षा में मनुष्य की आत्मा ईश्वर से अभिन्न है, फिर भी उसके अनुग्रह पर निर्भर है, और मुक्ति कृष्ण के अनुग्रह से मिलती है।

उपासना सेवा के रूप में होती है: कृष्ण की मूर्ति की भोजन, संगीत और कला से ऐसी सेवा, जो ब्रज में उनकी बाल-दिनचर्या को दोहराती है। केंद्रीय मूर्ति श्रीनाथजी की है, सात वर्ष के बालक कृष्ण, जिनकी सेवा को विट्ठलनाथ ने संस्थागत रूप दिया। औरंगज़ेब से बचाने के लिए यह मूर्ति बाद में वृंदावन के पास गोवर्धन से राजस्थान ले जाई गई, क्योंकि 1665 में वह वृंदावन के मंदिरों को नष्ट करने पर तुला था; आज यह उदयपुर के पास नाथद्वारा के सत्रहवीं शताब्दी के मंदिर में है। यह संप्रदाय राजस्थान और गुजरात में सबसे प्रबल है।

सूरदास का जीवन परिचय, अष्टछाप और रसखान: ब्रज के कृष्ण-कवि

सूरदास सोलहवीं शताब्दी के नेत्रहीन भक्त-कवि और कृष्ण के गायक थे, जिनका जीवनकाल परंपरा से 1483 से 1563 माना जाता है; उनके अधिकांश गीत ब्रजभाषा में हैं। उनकी रचनाएँ सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी में संकलित हैं। सूरसागर कृष्ण को गोकुल और ब्रज के प्यारे बालक के रूप में, प्रायः गोपियों की दृष्टि से, चित्रित करता है; इसके अनेक पद बाद के कवियों ने उनके नाम से जोड़े।

पुष्टिमार्ग सूरदास को वल्लभाचार्य का दीक्षित शिष्य और अपने आठ कवियों में सबसे श्रेष्ठ मानता है, यद्यपि आधुनिक विद्वान इस संबंध को ऐतिहासिक नहीं मानते। उनके पद आज भी संप्रदाय की गायन-उपासना के केंद्र में हैं।

अष्टछाप, अर्थात् आठ छापें, उन आठ कवियों का समूह है जिनके ब्रजभाषा कीर्तन पुष्टिमार्ग की उपासना में गाए जाते हैं; नाम हर पद के अंत की छाप, अर्थात् कवि के नाम, से पड़ा: कुंभनदास, सूरदास, नंददास, परमानंददास, कृष्णदास, चतुर्भुजदास, गोविंदस्वामी और छीतस्वामी। इनके आसपास हिंदी में एक व्यापक भक्ति और दरबारी साहित्य पनपा:

  • रसखान: सैयद इब्राहीम ख़ान, एक मुसलमान कवि, जिन्होंने विट्ठलनाथ से भक्ति-मार्ग सीखा, वृंदावन में रहे और कृष्ण को परमेश्वर माना; उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना प्रेमवाटिका है।
  • रहीम (1556 से 1627): अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक, जो अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • केशवदास (1555 से 1617): ओरछा दरबार के कवि, जिनकी रसिकप्रिया रीतिकाल की अग्रणी रचना है।
  • बिहारी (1595 से 1663): सतसई के रचयिता, राधा-कृष्ण पर लगभग सात सौ ब्रज दोहे, रीतिकाल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक।

भारत भर में सगुण भक्ति: राम, कृष्ण और विठोबा

अवध और ब्रज से परे सगुण भक्ति

कृष्ण-भक्ति की अपनी पवित्र भूमि थी। यमुना तट पर मथुरा और वृंदावन के आसपास का ब्रज क्षेत्र वह है जहाँ भागवत पुराण ग्वालों के बीच कृष्ण का बचपन बताता है; वृंदावन से लगभग 21 किलोमीटर दूर गोवर्धन पर्वत इसका पवित्र केंद्र है और स्वयं कृष्ण का प्राकृतिक रूप माना जाता है। पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के प्रमुख कृष्ण-आचार्य थे ब्रज में वल्लभाचार्य, असम में शंकरदेव और बंगाल में चैतन्य महाप्रभु।

सगुण भक्ति हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। साकार ईश्वर की यही भक्ति अन्यत्र क्षेत्रीय रूपों में दिखी:

  • राजस्थान की मीराबाई ने कृष्ण को अपना प्रियतम मानकर गाया।
  • बंगाल में चैतन्य ने राधा-कृष्ण का सार्वजनिक संकीर्तन चलाया।
  • महाराष्ट्र के वारकरी संतों ने पंढरपुर में कृष्ण के रूप विठोबा की उपासना की।

इन सबका पूरा विवरण क्षेत्रीय भक्ति वाले लेख में है। चित्र 3 इस लेख के उत्तर भारतीय सगुण कवियों को समय के क्रम में रखता है।

1450 से 1700 के समय-अक्ष पर उत्तर के सात सगुण कवियों और आचार्यों का चार्ट: वल्लभाचार्य, 1479 से 1530; विट्ठलनाथ, 1515 से 1586; तुलसीदास, जिनकी मृत्यु 1623 में हुई; रसखान, 1548 से 1628; केशवदास, 1555 से 1617; रहीम, 1556 से 1627; और बिहारी, 1595 से 1663। कृष्ण-भक्त, राम-भक्त और दरबारी कवि अलग रंगों में।

सगुण भक्ति का महत्त्व: साहित्य, रामलीला और मंदिर संस्कृति

अवधी और ब्रजभाषा का भक्ति साहित्य, रामलीला और मंदिर संस्कृति

सगुण भक्ति ने अपनी श्रेष्ठ कृतियाँ हिंदी के दो रूपों में लिखीं। अवधी में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा हैं; मथुरा के आसपास की बोली ब्रजभाषा में सूरसागर, अष्टछाप के कीर्तन, विनय पत्रिका, केशवदास की रसिकप्रिया और बिहारी की सतसई हैं। दरबार और मंदिर, दोनों के कवियों ने एक ही भाषा में लिखा, और मुसलमान कवियों ने भी हिंदी में लिखा: रसखान ने कृष्ण को गाया और रहीम ने दोहे रचे।

सगुण भक्ति की विरासत आज भी रोज़ जी जाती है। रामलीला उत्तर भारत के कस्बों में रामायण का मंचन करती है; 2008 में यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया, अयोध्या, रामनगर और वाराणसी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी को इसकी प्रमुख परंपराओं में गिना, और कहा कि यह जाति, धर्म या आयु के भेद के बिना लोगों को एक साथ लाती है।

रामलीला के अलावा हनुमान चालीसा का हिंदू नियमित पाठ करते हैं, और नाथद्वारा में पुष्टिमार्ग की सेवा चलती है, जिसके संगीतमय विधान में तीस से चालीस कवियों के लगभग दस हज़ार पद हैं।

इसकी सीमाएँ इसकी अपनी बनावट से आती हैं। प्रचलित विश्वासों को ठुकराने के बजाय स्वीकार कर सुलभ बनाने के कारण सगुण भक्ति ने उपासना का दायरा अधिक बढ़ाया, सामाजिक व्यवस्था कम बदली; जाति और कर्मकांड को अधिक तीखी चुनौती निर्गुण संतों से मिली।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2021, सामान्य अध्ययन-Iभक्ति साहित्य की प्रकृति का मूल्यांकन करते हुए भारतीय संस्कृति में इसके योगदान का निर्धारण कीजिए। (150 शब्दों में उत्तर दीजिए)
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: मूल्यांकन करते हुए निर्धारण कीजिए · दृष्टिकोण: भक्ति साहित्य की दोनों धाराओं की प्रकृति बताएँ, फिर भाषा, धर्म, मंचन और समाज में उसके योगदान को तौलें, और निष्कर्ष दें।

    भूमिका: भूमिका में भक्ति साहित्य को क्षेत्रीय भाषाओं में लिखी भक्ति के रूप में बताएँ, दो धाराओं में: साकार ईश्वर के लिए सगुण और निराकार ईश्वर के लिए निर्गुण।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्रकृति: लोकभाषा (अवधी, ब्रजभाषा, मराठी); भक्ति गीत (पद, दोहा, कीर्तन); रामायण और भागवत की पुनर्कथा; कर्मकांड से ऊपर ईश्वर से निजी प्रेम।
    • भाषा: अवधी में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा; ब्रजभाषा में सूरसागर, अष्टछाप और बिहारी की सतसई।
    • संस्कृति: रामलीला, नाथद्वारा में मंदिर-सेवा, भजन और कीर्तन; रसखान और रहीम जैसे मुसलमान कवियों का हिंदी में लेखन।
    • समाज: निर्गुण संतों ने जाति और कर्मकांड को ठुकराया; सगुण कवियों ने प्रचलित आस्था को सबके लिए सुलभ बनाया।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि भक्ति साहित्य ने भारतीय भाषाओं को उनकी श्रेष्ठ कृतियाँ दीं और लोक-धर्म को एक साझा, गाया जाने वाला रूप दिया, जो आज भी जीवित है।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)कृष्ण के जीवन पर कविताओं की रचना 'प्रेम वाटिका' किसने की थी?
    1. a बिहारी
    2. b सूरदास
    3. c रसखान
    4. d कबीर
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: चरण 1: प्रेम वाटिका प्रेमवाटिका है, अर्थात् प्रेम का उपवन। चरण 2: यह कृष्ण को परमेश्वर मानने वाले मुसलमान कवि रसखान की सबसे प्रसिद्ध रचना है। चरण 3: बाकी को उनकी रचनाओं से मिलाएँ: बिहारी की सतसई, सूरदास का सूरसागर, कबीर का बीजक।

    इस भ्रम से बचें: सूरदास सबसे प्रसिद्ध कृष्ण-कवि हैं, पर प्रेमवाटिका उनकी नहीं है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) बिहारी: ग़लत। उनकी रचना सतसई है, लगभग सात सौ ब्रज दोहे।
    • (b) सूरदास: ग़लत। उनके पद सूरसागर में संकलित हैं।
    • (c) रसखान: सही। प्रेमवाटिका उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है।
    • (d) कबीर: ग़लत। उनकी वाणी बीजक में संकलित है, और वे निराकार ईश्वर के उपासक थे।

    उत्तर: रसखान: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2014 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. 'बीजक' संत दादू दयाल के उपदेशों का संकलन है।
    2. पुष्टिमार्ग का दर्शन मध्वाचार्य ने प्रतिपादित किया था।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2
    3. c 1 और 2 दोनों
    4. d न तो 1, न ही 2
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1: बीजक कबीर की वाणी का संकलन है, दादू दयाल का नहीं; ग़लत। चरण 2: कथन 2: पुष्टिमार्ग वल्लभाचार्य ने स्थापित किया; मध्वाचार्य ने द्वैत दर्शन दिया; ग़लत। कोई कथन सही नहीं।

    इस भ्रम से बचें: दोनों कथन एक वास्तविक ग्रंथ या संप्रदाय को ग़लत संत से जोड़ते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: ग़लत। बीजक कबीर का है, दादू का नहीं।
    • (b) केवल 2: ग़लत। पुष्टिमार्ग वल्लभाचार्य का है, मध्व का नहीं।
    • (c) 1 और 2 दोनों: ग़लत। दोनों जोड़ियाँ ग़लत हैं।
    • (d) न तो 1, न ही 2: सही। बीजक कबीर का और पुष्टिमार्ग वल्लभाचार्य का है।

    उत्तर: न तो 1, न ही 2: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2010 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन भक्ति पंथ का प्रवर्तक नहीं था?
    1. a नागार्जुन
    2. b तुकाराम
    3. c त्यागराज
    4. d वल्लभाचार्य
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बेमेल चुनिए

    हल करने की विधि: चरण 1: वारकरी संत तुकाराम और राम की स्तुति में कृतियाँ रचने वाले त्यागराज भक्ति के उपासक थे। चरण 2: वल्लभाचार्य ने कृष्ण-केंद्रित पुष्टिमार्ग की स्थापना की। चरण 3: नागार्जुन (लगभग 150 से 250 ई.) ने महायान बौद्ध धर्म के माध्यमक संप्रदाय की स्थापना की।

    इस भ्रम से बचें: त्यागराज को संगीतकार के रूप में याद किया जाता है, पर उनकी कृतियाँ राम के भक्ति गीत हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) नागार्जुन: सही, वे नहीं थे। वे महायान बौद्ध दार्शनिक और माध्यमक के संस्थापक थे।
    • (b) तुकाराम: ग़लत। वे विठोबा के वारकरी भक्ति संत थे।
    • (c) त्यागराज: ग़लत। उनकी अधिकांश तेलुगु भक्ति कृतियाँ राम की स्तुति हैं।
    • (d) वल्लभाचार्य: ग़लत। उन्होंने कृष्ण-भक्ति के पुष्टिमार्ग संप्रदाय की स्थापना की।

    उत्तर: नागार्जुन: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

तुलसीदास, सूरदास, निंबार्क और रसखान की तिथियाँ स्रोतों में भिन्न हैं; लेख बताता है कि कहाँ। यह लेख इस पृष्ठ पर दिए गए स्रोतों पर आधारित है।