परिचय
विद्युत धारा (electric current) विद्युत आवेश के प्रवाह की दर है, जिसे ऐम्पियर में मापा जाता है और जो धातु के तारों में ओम के नियम (Ohm's law) से चलती है। धारा प्रतिरोध को गर्म करती है, चुंबकीय क्षेत्र बनाती है, और उलटे, बदलता चुंबकीय क्षेत्र धारा प्रेरित करता है; इन्हीं प्रभावों से फ्यूज़, मोटर, जनित्र और ट्रांसफार्मर चलते हैं, जबकि अर्धचालक और अतिचालक इन्हें चिप, LED, सौर सेल और शक्तिशाली चुंबकों तक ले जाते हैं।
विद्युत धारा, विभवांतर और प्रतिरोध
विद्युत धारा किसे कहते हैं: विद्युत आवेश और विद्युत धारा का मात्रक
विद्युत ऊर्जा का एक नियंत्रित और सुविधाजनक रूप है, जिसका उपयोग घरों, विद्यालयों, अस्पतालों और उद्योगों में होता है। जब धातु के तार जैसे किसी चालक से विद्युत आवेश प्रवाहित होता है, तो उसमें विद्युत धारा होती है, और धारा के लिए एक सतत, बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं। परिपथ कहीं भी टूट जाए, जैसा स्विच करता है, तो धारा रुक जाती है।
इलेक्ट्रॉनों की खोज से पहले धारा को धनावेश का प्रवाह माना गया था, इसलिए परंपरा से धारा की दिशा इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की विपरीत मानी जाती है। एक कूलॉम लगभग 6 × 1018 इलेक्ट्रॉनों का आवेश है, और प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर 1.6 × 10−19 कूलॉम आवेश होता है। धारा की दिशा होती है, फिर भी यह एक अदिश राशि है: परिपथ पर बना तीर केवल यह बताता है कि आवेश किस ओर बह रहा है। धारा को ऐमीटर से मापा जाता है, जिसे सदैव श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
आवेश तभी बहते हैं जब विद्युत दाब में अंतर हो। इसी अंतर को विभवांतर कहते हैं, जिसे सेल या बैटरी रासायनिक क्रिया से पैदा करती है। दो बिंदुओं के बीच का विभवांतर एक एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे तक ले जाने में किया गया कार्य है, और इसका मात्रक वोल्ट है: एक वोल्ट अर्थात् एक जूल प्रति कूलॉम। इसे वोल्टमीटर से मापते हैं, जिसे पार्श्वक्रम में जोड़ा जाता है।
ओम का नियम, प्रतिरोध और प्रतिरोधकता
1827 में जर्मन भौतिकविद् जॉर्ज साइमन ओम ने पाया कि किसी धातु के तार से बहने वाली धारा उसके सिरों के बीच के विभवांतर के अनुक्रमानुपाती होती है, बशर्ते तार का ताप न बदले। यही ओम का नियम है: V = IR, जहाँ R, अर्थात् प्रतिरोध, चालक का वह गुण है जो आवेश के प्रवाह का विरोध करता है। इसका मात्रक ओम है, और प्रतिरोध दोगुना हो तो धारा आधी रह जाती है।
किसी एकसमान चालक का प्रतिरोध उसकी लंबाई के अनुक्रमानुपाती और उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है, और यह पदार्थ पर भी निर्भर करता है। इस अनुपात के स्थिरांक को प्रतिरोधकता कहते हैं; यह पदार्थ का गुण है और इसका मात्रक ओम मीटर है। धातुओं और मिश्रधातुओं की प्रतिरोधकता 10−8 से 10−6 ओम मीटर होती है, जबकि रबड़ और काँच जैसे विद्युतरोधियों की 1012 से 1017।
- तापन के लिए मिश्रधातु: मिश्रधातु की प्रतिरोधकता उसकी घटक धातुओं से अधिक होती है और गर्म होने पर वह आसानी से ऑक्सीकृत नहीं होती, इसलिए विद्युत इस्त्री और टोस्टर में निक्रोम का उपयोग होता है।
- तंतु: 3380 डिग्री सेल्सियस गलनांक वाला टंगस्टन बल्ब के तंतु में प्रयुक्त होता है।
- संचरण तार: बहुत कम प्रतिरोधकता वाले ताँबा और ऐलुमिनियम।
- ताप का प्रभाव: प्रतिरोध और प्रतिरोधकता, दोनों ताप के साथ बदलते हैं।
प्रतिरोधकों का श्रेणीक्रम और पार्श्वक्रम संयोजन
श्रेणीक्रम में प्रतिरोधक सिरे से सिरा मिलाकर जोड़े जाते हैं। हर प्रतिरोधक से एक ही धारा बहती है, और कुल विभवांतर उनके अलग-अलग विभवांतरों का योग होता है। प्रतिरोध सीधे जुड़ जाते हैं, इसलिए संयोजन का प्रतिरोध किसी भी एक प्रतिरोधक से अधिक होता है। 6 वोल्ट की बैटरी पर 20 ओम का लैंप और 4 ओम का चालक मिलकर 24 ओम बनाते हैं और 0.25 ऐम्पियर धारा लेते हैं।
पार्श्वक्रम में हर प्रतिरोधक को पूरा विभवांतर मिलता है, और कुल धारा शाखाओं की धाराओं का योग होती है। संयुक्त प्रतिरोध का व्युत्क्रम अलग-अलग प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों का योग होता है, इसलिए कुल प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम रहता है: 12 वोल्ट पर पार्श्वक्रम में जुड़े 5, 10 और 30 ओम क्रमशः 2.4, 1.2 और 0.4 ऐम्पियर, कुल 4 ऐम्पियर, लेते हैं और 3 ओम की तरह व्यवहार करते हैं।
विद्युत धारा का तापीय प्रभाव और विद्युत शक्ति
जूल का तापन नियम और विद्युत फ्यूज़
जब परिपथ केवल प्रतिरोधी हो, तो स्रोत से मिलने वाली पूरी ऊर्जा ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाती है; यही विद्युत धारा का तापीय प्रभाव है। समय t में उत्पन्न ऊष्मा H = I2Rt होती है, जिसे जूल का तापन नियम कहते हैं: ऊष्मा धारा के वर्ग, प्रतिरोध और समय के अनुक्रमानुपाती होती है। विद्युत इस्त्री, टोस्टर, ओवन, केतली और हीटर, सब इसी पर काम करते हैं। प्रतिरोध स्वयं खिसकते इलेक्ट्रॉनों के धातु के भारी, स्थिर आयनों से टकराने से होता है, न कि धातु के परमाणुओं के आपसी टकराव से।
बल्ब भी इसी तापन से प्रकाश देता है: उसका टंगस्टन तंतु बिना पिघले बहुत गर्म होना चाहिए, और तंतु की आयु बढ़ाने के लिए बल्ब में रासायनिक रूप से निष्क्रिय नाइट्रोजन और आर्गन भरी जाती है। फिर भी अधिकांश शक्ति ऊष्मा बन जाती है और प्रकाश थोड़ा ही बनता है। ऊष्मा और उसके नियम ऊष्मा और ऊष्मागतिकी (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में समझाए गए हैं।
परिपथों और उपकरणों की रक्षा विद्युत फ्यूज़ करता है। यह उपयुक्त गलनांक वाली धातु या मिश्रधातु, जैसे ऐलुमिनियम, ताँबा, लोहा या सीसा, का एक तार होता है, जिसे उपकरण के साथ श्रेणीक्रम में लगाया जाता है। धारा निर्धारित मान से अधिक हो जाए, तो फ्यूज़ का तार गर्म होकर पिघल जाता है और परिपथ तोड़ देता है। घरेलू फ्यूज़ 1, 2, 3, 5 और 10 ऐम्पियर के होते हैं; 220 वोल्ट पर 1 किलोवाट की इस्त्री 4.54 ऐम्पियर धारा लेती है, इसलिए उसे 5 ऐम्पियर का फ्यूज़ चाहिए।
विद्युत शक्ति, किलोवाट घंटा और घरेलू विद्युत परिपथ
विद्युत ऊर्जा के व्यय होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं: P = VI, जो I2R और V2/R के बराबर भी है। इसका मात्रक वाट है, अर्थात् 1 वोल्ट पर 1 ऐम्पियर धारा लेने वाले उपकरण की शक्ति। विद्युत ऊर्जा का व्यापारिक मात्रक किलोवाट घंटा है, जिसे आम बोलचाल में 'यूनिट' कहते हैं और जो 3.6 × 106 जूल के बराबर है; प्रतिदिन 8 घंटे चलने वाला 400 वाट का रेफ्रिजरेटर 30 दिनों में 96 यूनिट खर्च करता है।
घरों में 220 वोल्ट और 50 हर्ट्ज़ की प्रत्यावर्ती धारा आती है: लाल विद्युतरोधी आवरण वाले विद्युन्मय तार और काले आवरण वाले उदासीन तार से, मुख्य फ्यूज़ और बिजली मीटर से होकर। एक तीसरा, हरा भूसंपर्क तार धरती में गहरे गड़ी धातु की प्लेट से जुड़ा रहता है; धातु के आवरण वाले उपकरण इससे जोड़े जाते हैं, ताकि धारा का कोई भी क्षरण आवरण को धरती के विभव पर रखे और उपयोगकर्ता को तेज़ झटका न लगे।
- दो परिपथ: गीज़र और कूलर के लिए 15 ऐम्पियर का परिपथ, और बल्ब तथा पंखों के लिए 5 ऐम्पियर का परिपथ।
- लघुपथन: जब क्षतिग्रस्त विद्युतरोधन या खराब उपकरण के कारण विद्युन्मय और उदासीन तार छू जाते हैं, तो धारा अचानक बढ़ जाती है।
- अतिभारण: आपूर्ति वोल्टता के अचानक बढ़ने या एक ही सॉकेट पर बहुत से उपकरण लगाने से भी होता है; फ्यूज़ इस अत्यधिक धारा को रोकता है।
बिजली इलेक्ट्रॉनों के रूप में खर्च नहीं होती: घर जिसका पैसा चुकाता है, वह अपने उपकरणों से इलेक्ट्रॉनों को बहाने में लगी ऊर्जा है। पूरा देश अपने सबसे व्यस्त घंटे में कितनी ऊर्जा लेता है, इसे भारत की अधिकतम बिजली माँग (अंग्रेज़ी में) में देखा जाता है।
विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव और विद्युत-चुंबक
चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र
1820 में हैंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने देखा कि पास के तार से विद्युत धारा बहने पर दिक्सूचक की सुई विक्षेपित हो जाती है; इससे पता चला कि विद्युत और चुंबकत्व आपस में जुड़े हैं। किसी चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र, जिसमें उसका बल अनुभव किया जा सके, उसका चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसे क्षेत्र रेखाओं से दिखाया जाता है: वे उत्तर ध्रुव से निकलती हैं, दक्षिण ध्रुव में प्रवेश करती हैं, बंद वक्र होती हैं, प्रबल क्षेत्र में पास-पास रहती हैं और एक-दूसरे को कभी नहीं काटतीं।
पृथ्वी स्वयं एक चुंबक की तरह व्यवहार करती है, जिसका क्षेत्र 10−5 टेस्ला की कोटि का है। माना जाता है कि यह बाहरी क्रोड के पिघले लोहे और निकल में बहने वाली विद्युत धाराओं से बनता है, जिसे डायनेमो प्रभाव कहते हैं। इस क्षेत्र का अक्ष घूर्णन अक्ष से लगभग 11.3 डिग्री झुका है, और उत्तरी चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा में है। उलझन की बात यह है कि यह ध्रुव छड़ चुंबक के दक्षिण ध्रुव जैसा व्यवहार करता है, क्योंकि क्षेत्र रेखाएँ वहाँ भीतर जाती हैं।
- खिसकता ध्रुव: जेम्स क्लार्क रॉस ने 1831 में उत्तरी चुंबकीय ध्रुव को उत्तरी कनाडा में खोजा था, और तब से यह कनाडाई आर्कटिक को पार करते हुए रूस की ओर बढ़ रहा है, आजकल लगभग 45 किलोमीटर प्रति वर्ष।
- उत्क्रमण: पिछले 8.3 करोड़ वर्षों में यह क्षेत्र कम से कम 183 बार उलटा है; अंतिम उत्क्रमण 7,80,000 वर्ष पहले हुआ था।
- थुंबा: तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र 1962 में भू-चुंबकीय भूमध्यरेखा से उसकी निकटता के कारण बना, और भारत का पहला साउंडिंग रॉकेट 21 नवंबर 1963 को यहीं से छोड़ा गया।
दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम, परिनालिका और विद्युत-चुंबक
धारा वाले सीधे तार के चारों ओर क्षेत्र रेखाएँ संकेंद्री वृत्तों में होती हैं। धारा बढ़ने पर क्षेत्र प्रबल होता है और तार से दूर जाने पर दुर्बल। इसकी दिशा दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम से मिलती है: तार को दाएँ हाथ में ऐसे पकड़ें कि अँगूठा धारा की दिशा में हो, तो उँगलियाँ क्षेत्र की दिशा में मुड़ती हैं।
तार को लूप में मोड़ने पर भीतर का क्षेत्र एक ही दिशा में हो जाता है, और n फेरों की कुंडली एक फेरे से n गुना क्षेत्र देती है। विद्युतरोधी ताँबे के तार के पास-पास लिपटे अनेक फेरों वाली कुंडली को परिनालिका कहते हैं। इसका क्षेत्र छड़ चुंबक जैसा होता है, एक उत्तर और एक दक्षिण सिरे वाला, और इसके भीतर क्षेत्र एकसमान रहता है। भीतर नर्म लोहे की क्रोड रखने पर वह प्रबल रूप से चुंबकित हो जाती है और विद्युत-चुंबक बन जाती है।
चालक पर बल: फ्लेमिंग का वामहस्त नियम और विद्युत मोटर
चुंबक अपने क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर बल लगाता है, जैसा आंद्रे मैरी ऐम्पियर ने सुझाया था। जब धारा क्षेत्र के लंबवत हो, तो बल अधिकतम होता है, और धारा या क्षेत्र में से किसी एक की दिशा उलटने पर बल भी उलट जाता है। फ्लेमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार बाएँ हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अँगूठे को परस्पर लंबवत फैलाएँ; तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में और मध्यमा धारा की दिशा में हो, तो अँगूठा बल की दिशा बताता है।
विद्युत मोटर इसी बल को घूर्णन में बदलती है, अर्थात् विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में। एक कुंडली चुंबक के ध्रुवों के बीच रखी होती है; उसकी दोनों भुजाओं पर बल विपरीत दिशाओं में लगते हैं और उसे घुमा देते हैं। विभक्त वलय, अर्थात् दिक्परिवर्तक, हर आधे चक्कर पर धारा उलट देता है, जिससे कुंडली एक ही दिशा में घूमती रहती है।
- व्यापारिक मोटरें: इनमें विद्युत-चुंबक, तार के अनेक फेरे और नर्म लोहे की क्रोड होती है, जिन्हें मिलाकर आर्मेचर कहते हैं।
- मोटर कहाँ काम आती है: पंखे, रेफ्रिजरेटर, मिक्सर, वॉशिंग मशीन और कंप्यूटर।
- गतिमान आवेश: चुंबकीय बल गतिमान आवेश पर लगता है, और ऋणावेश पर यह धनावेश के विपरीत दिशा में लगता है।
विद्युत चुंबकीय प्रेरण, प्रत्यावर्ती धारा और ट्रांसफार्मर
फैराडे का नियम, लेंज़ का नियम और फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम
गैल्वेनोमीटर से जुड़ी कुंडली की ओर चुंबक ले जाएँ, तो सुई विक्षेपित होती है; चुंबक दूर ले जाएँ, तो सुई दूसरी ओर विक्षेपित होती है; चुंबक स्थिर रखें, तो कोई धारा नहीं बहती। एक कुंडली में धारा चालू या बंद करने पर पास की दूसरी कुंडली में भी क्षणिक धारा प्रेरित होती है। हर स्थिति में कारण एक ही है: कुंडली से जुड़ी चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं में परिवर्तन।
प्रेरित धारा की दिशा लेंज़ के नियम से तय होती है, जो 1834 में दिया गया: प्रेरित धारा उस परिवर्तन का विरोध करती है जिसने उसे उत्पन्न किया। क्षेत्र में चलते चालक के लिए दिशा फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम बताता है: तर्जनी क्षेत्र की दिशा में और अँगूठा गति की दिशा में हो, तो मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा बताती है।
प्रत्यावर्ती धारा और विद्युत जनित्र: प्रत्यावर्ती और दिष्ट धारा में अंतर
विद्युत जनित्र यांत्रिक ऊर्जा से चुंबकीय क्षेत्र में एक कुंडली घुमाता है, और विद्युत चुंबकीय प्रेरण उसमें धारा उत्पन्न करता है। हर आधे चक्कर पर कुंडली की दोनों भुजाएँ ऊपर और नीचे जाने की भूमिका बदल लेती हैं, इसलिए धारा की दिशा उलट जाती है। जो धारा समान अंतराल पर दिशा बदलती है, उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं; सर्पी वलयों की जगह विभक्त वलय लगाने पर दिष्ट धारा मिलती है।
| आधार | दिष्ट धारा (DC) | प्रत्यावर्ती धारा (AC) |
|---|---|---|
| दिशा | सदैव एक ही | समय-समय पर उलटती है |
| स्रोत | सेल और बैटरियाँ | अधिकांश बिजलीघर |
| जनित्र में | विभक्त वलय | सर्पी वलय |
| ट्रांसफार्मर | उपयोग नहीं हो सकता | वोल्टता घटाता-बढ़ाता है |
| भारत में | बैटरियाँ, सौर सेल | घरों में 50 हर्ट्ज़, 220 वोल्ट |
भारत में प्रत्यावर्ती धारा हर 1/100 सेकंड में दिशा बदलती है, अर्थात् इसकी आवृत्ति 50 हर्ट्ज़ है। इसका बड़ा लाभ यह है कि इसे लंबी दूरी तक बिना अधिक ऊर्जा-हानि के भेजा जा सकता है; इसी कारण अधिकांश बिजलीघर इसे बनाते हैं और बिजलीघर का विद्युत जनित्र AC मशीन होता है।
ट्रांसफार्मर और लंबी दूरी तक विद्युत का संचरण
ट्रांसफार्मर अन्योन्य प्रेरण से प्रत्यावर्ती वोल्टता को बढ़ाता या घटाता है। नर्म लोहे की क्रोड पर एक-दूसरे से विद्युतरोधी दो कुंडलियाँ लिपटी होती हैं; प्राथमिक कुंडली की प्रत्यावर्ती धारा प्रत्यावर्ती फ्लक्स बनाती है, जो द्वितीयक कुंडली में वोल्टता प्रेरित करता है। वोल्टताओं का अनुपात फेरों की संख्या के अनुपात के बराबर होता है, और चूँकि ट्रांसफार्मर शक्ति को आगे भेजता है, धारा उलटे अनुपात में बदलती है।
- उच्चायी (स्टेप-अप): द्वितीयक में अधिक फेरे; 100 फेरों की प्राथमिक और 200 फेरों की द्वितीयक कुंडली 10 ऐम्पियर पर 220 वोल्ट को 5 ऐम्पियर पर 440 वोल्ट में बदल देती है।
- अपचायी (स्टेप-डाउन): द्वितीयक में कम फेरे; वोल्टता घटती है और धारा बढ़ती है।
- हानियाँ: फ्लक्स का रिसाव, कुंडलियों का गर्म होना और क्रोड में भँवर धाराएँ, फिर भी अच्छी तरह बना ट्रांसफार्मर 95 प्रतिशत से अधिक दक्ष होता है।
संचरण के लिए जनित्र की वोल्टता बढ़ाई जाती है, जिससे धारा घटती है और लंबी लाइनों में I2R से होने वाली ऊष्मा-हानि कम होती है। उपभोक्ताओं के पास के उपकेंद्रों पर और फिर वितरण उपकेंद्रों तथा खंभों पर वोल्टता घटाई जाती है, तब बिजली घरों तक पहुँचती है।
अर्धचालक, अतिचालक और भारत सेमिकंडक्टर मिशन
चालक, अर्धचालक और विद्युतरोधी: अपमिश्रण और p-n संधि डायोड
ठोसों को उनकी प्रतिरोधकता के आधार पर बाँटा जाता है। धातुओं की प्रतिरोधकता बहुत कम, 10−2 से 10−8 ओम मीटर, होती है; विद्युतरोधियों की बहुत अधिक, 1011 से 1019; और अर्धचालक बीच में, 10−5 से 106 पर। सिलिकॉन और जर्मेनियम तात्विक अर्धचालक हैं, जबकि गैलियम आर्सेनाइड और कैडमियम सल्फ़ाइड यौगिक अर्धचालक।
शुद्ध, अर्थात् नैज अर्धचालक कमरे के ताप पर कम चालन करता है। उपयुक्त अशुद्धि के कुछ भाग प्रति दस लाख मिलाने, अर्थात् अपमिश्रण (doping), से उसकी चालकता कई गुना बढ़ जाती है: आर्सेनिक या फ़ॉस्फ़ोरस जैसा पंचसंयोजी अपमिश्रक उसे अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों वाला n-प्रकार बनाता है, और बोरॉन या ऐलुमिनियम जैसा त्रिसंयोजी अपमिश्रक उसे कोटरों वाला p-प्रकार, जिनमें कोटर धनावेश की तरह काम करते हैं।
एक ही क्रिस्टल में जहाँ p-भाग और n-भाग मिलते हैं, वहाँ p-n संधि बनती है, जो डायोड और ट्रांज़िस्टर की मूल इकाई है। डायोड अग्र बायस में चालन करता है और पश्च बायस में नहीं, इसलिए p-n संधि डायोड प्रत्यावर्ती धारा का दिष्टकरण कर सकता है: अर्ध-तरंग दिष्टकारी हर चक्र का केवल आधा भाग आगे भेजता है, जबकि पूर्ण-तरंग दिष्टकारी दो डायोड से दोनों आधे भाग काम में लाता है।
LED लैंप, सौर सेल और फ़ोटोडायोड
कुछ p-n संधियाँ प्रकाश से जुड़ा काम करती हैं। प्रकाश उत्सर्जक डायोड विद्युत ऊर्जा को प्रकाश में बदलता है, फ़ोटोडायोड प्रकाश को पहचानता है, और सौर सेल सूर्य के प्रकाश को बिजली में बदलता है। सौर सेल में प्रकाश संधि के पास इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्म बनाता है, संधि का क्षेत्र उन्हें अलग करता है, और p-भाग धनात्मक तथा n-भाग ऋणात्मक हो जाता है, जिससे बिना किसी बाहरी बायस के फ़ोटो-वोल्टता मिलती है।
- LED लैंप: तापदीप्त और प्रतिदीप्त लैंपों से कहीं अधिक ऊर्जा-दक्ष, और कई गुना अधिक समय तक चलने वाले।
- प्रतिदीप्त लैंप और CFL: पारे की वाष्प में पराबैंगनी प्रकाश बनाते हैं, जिसे फ़ॉस्फ़र का लेप दृश्य प्रकाश में बदलता है; पारे के कारण इनका निपटान कठिन होता है।
- फ़ोटोडायोड: पश्च बायस में चलाया जाता है; प्रकाश की तीव्रता के साथ धारा बढ़ती है, इसलिए यह प्रकाशीय संकेतों को पहचानने में काम आता है।
LED प्रकाश और प्रकाशिकी में कहाँ बैठते हैं, यह प्रकाश का परावर्तन और अपवर्तन (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में बताया गया है।
अतिचालक और उनके उपयोग
जिस पदार्थ का विद्युत प्रतिरोध एक विशेष क्रांतिक ताप से नीचे ठीक शून्य हो जाए, उसे अतिचालक कहते हैं। ठंडा करने पर साधारण धातु का प्रतिरोध धीरे-धीरे घटता है, जबकि अतिचालक का अचानक शून्य हो जाता है, और अतिचालक तार के लूप में शुरू की गई धारा बिना किसी स्रोत के अनिश्चित काल तक बहती रह सकती है।
अतिचालकता की खोज 1911 में डच भौतिकविद् हेइके कामरलिंग ओन्स ने की थी। इसकी पहचान माइस्नर प्रभाव है, अर्थात् अतिचालक बनते समय पदार्थ के भीतर से चुंबकीय क्षेत्र का पूरी तरह बाहर निकल जाना। तार में आसानी से ढलने वाला नायोबियम-टाइटेनियम MRI स्कैनरों के अतिचालक चुंबकों और कण त्वरकों के मोड़ने और केंद्रित करने वाले चुंबकों का मुख्य पदार्थ बन गया।
भारत सेमिकंडक्टर मिशन: फैब, पैकेजिंग और चिप डिज़ाइन
अर्धचालक चिप आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव हैं, फ़ोन और कारों से लेकर उपग्रहों और रक्षा प्रणालियों तक। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2021 में अर्धचालक और डिस्प्ले पारितंत्र का कार्यक्रम स्वीकृत किया, जो ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ भारत सेमिकंडक्टर मिशन (ISM) के रूप में चलता है। विश्व के माइक्रोप्रोसेसर उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत भारत में खपता है, और मिशन का लक्ष्य आयातित चिपों पर निर्भरता घटाना है।
- अर्धचालक और डिस्प्ले फैब: परियोजना लागत के 50 प्रतिशत की वित्तीय सहायता, समान भागीदारी (पैरी-पासु) के आधार पर।
- यौगिक अर्धचालक, सेंसर और पैकेजिंग: असेंबली, परीक्षण, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP और OSAT) इकाइयों को सहायता, पहले 30 प्रतिशत और अब 50 प्रतिशत पूँजीगत व्यय।
- चिप डिज़ाइन: डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना पात्र व्यय का 50 प्रतिशत तक और पाँच वर्षों तक शुद्ध बिक्री का 6 से 4 प्रतिशत देती है।
- मोहाली की सेमी-कंडक्टर प्रयोगशाला: इसका आधुनिकीकरण होना है।
अगस्त 2025 तक 6 राज्यों में लगभग ₹1.60 लाख करोड़ के कुल निवेश वाली 10 परियोजनाएँ स्वीकृत हो चुकी थीं, जिनमें साणंद में माइक्रॉन की पैकेजिंग इकाई, धोलेरा (अंग्रेज़ी में) में ताइवान की PSMC के साथ टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का फैब, और असम के मोरीगाँव में टाटा की असेंबली और परीक्षण इकाई शामिल हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 ने उपकरण, सामग्री और भारतीय चिप बौद्धिक संपदा पर केंद्रित ISM 2.0 की घोषणा की, और इसका दूसरा चरण सितंबर 2026 में ₹1.27 लाख करोड़ के परिव्यय के साथ अधिसूचित हुआ; सभी इकाइयों की पूरी सूची भारत सेमिकंडक्टर मिशन: फैब और ISM 2.0 (अंग्रेज़ी में) में दी गई है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IIIभारत ने एक सेमिकंडक्टर विनिर्माण केन्द्र बनने का लक्ष्य रखा है। भारत में सेमिकंडक्टर उद्योग के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? भारत सेमिकंडक्टर मिशन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अर्धचालक चिप आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव हैं; भारत दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ से शुरू हुए भारत सेमिकंडक्टर मिशन के सहारे विनिर्माण केंद्र बनना चाहता है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- चुनौतियाँ: भारी पूँजी, ऊँचा जोखिम, लंबी परिपक्वता और भुगतान अवधि, तेज़ी से बदलती तकनीक।
- आधारभूत ज़रूरतें: अर्धचालक-स्तर का जल, उच्च गुणवत्ता की बिजली, लॉजिस्टिक्स और अनुसंधान पारितंत्र।
- कुशल कर्मियों की कमी, आयातित चिपों पर निर्भरता, और कुछ ही देशों में सिमटी आपूर्ति शृंखला।
- विशेषताएँ: फैब और डिस्प्ले फैब को 50 प्रतिशत सहायता; ATMP/OSAT और यौगिक अर्धचालकों को सहायता; डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव; मोहाली की SCL।
- प्रगति: 6 राज्यों में लगभग ₹1.60 लाख करोड़ की 10 परियोजनाएँ; धोलेरा फैब; उपकरण, सामग्री और बौद्धिक संपदा पर ISM 2.0।
निष्कर्ष: निष्कर्ष यह रखें कि निरंतर नीतिगत सहायता, कौशल और सुरक्षित आपूर्ति शृंखला ही तय करेंगे कि भारत पैकेजिंग से आगे उन्नत निर्माण तक पहुँचता है या नहीं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)मुख्य विद्युत आपूर्ति में फ्यूज़ का उपयोग सुरक्षा युक्ति के रूप में होता है। फ्यूज़ के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: फ्यूज़ का काम अत्यधिक धारा को रोकना है, इसलिए उसे उसी धारा के रास्ते में, अर्थात् श्रेणीक्रम में, होना चाहिए। वह धारा को पिघलकर रोकता है, जब धारा निर्धारित मान से अधिक हो जाए; अतः उसका निर्णायक गुण उपयुक्त कम गलनांक है। इन दो तथ्यों पर हर विकल्प को परखें, तो केवल (c) बचता है।
इस भ्रम से बचें: पार्श्वक्रम में लगा फ्यूज़ परिपथ को तोड़ ही नहीं सकता।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) मुख्य स्विच के साथ पार्श्वक्रम में: गलत। फ्यूज़ जिस उपकरण की रक्षा करता है, उसके साथ श्रेणीक्रम में लगता है; पार्श्वक्रम में वह परिपथ नहीं तोड़ सकता।
- (b) मुख्यतः चाँदी की मिश्रधातुएँ: गलत। फ्यूज़ का तार उपयुक्त गलनांक वाली धातु या मिश्रधातु का होता है, जैसे ऐलुमिनियम, ताँबा, लोहा या सीसा।
- (c) कम गलनांक: सही। धारा निर्धारित मान से अधिक होने पर फ्यूज़ का तार गर्म होकर पिघलता है और परिपथ तोड़ देता है।
- (d) बहुत अधिक प्रतिरोध: गलत। श्रेणीक्रम में बड़ा प्रतिरोध उपकरण की ज़रूरी धारा ही घटा देगा, क्योंकि धारा = विभवांतर/प्रतिरोध; फ्यूज़ को केवल निर्धारित धारा पर पिघलना है।
उत्तर: फ्यूज़ पिघलकर काम करता है, इसलिए कम गलनांक: विकल्प (c), जो आधिकारिक उत्तर है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)कथन (A) और कारण (R):
- कथन (A): धातु के तार से विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसका ताप बढ़ जाता है।
- कारण (R): धातु के परमाणुओं के आपस में टकराने से ऊष्मा ऊर्जा मुक्त होती है।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले कथन परखें: प्रतिरोधी तार से धारा बहने पर ऊर्जा ऊष्मा के रूप में व्यय होती है (H = I2Rt), इसलिए उसका ताप बढ़ता है; (A) सही है। अब कारण परखें: तापन खिसकते इलेक्ट्रॉनों के धातु के स्थिर आयनों से टकराने से होता है, परमाणुओं के आपस में टकराने से नहीं; (R) गलत है। (A) सही और (R) गलत, अर्थात् विकल्प (c)।
इस भ्रम से बचें: प्रतिरोध चलते इलेक्ट्रॉनों के रुकने से आता है, परमाणुओं के टकराव से नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों सही, (R) व्याख्या करता है: गलत। (R) गलत है।
- (b) दोनों सही, (R) व्याख्या नहीं करता: गलत। (R) गलत है, इसलिए यह भी नहीं हो सकता।
- (c) (A) सही, (R) गलत: सही। तार जूल तापन से गर्म होता है; टकराव इलेक्ट्रॉनों और स्थिर आयनों का है, परमाणुओं का आपस में नहीं।
- (d) (A) गलत, (R) सही: गलत। धारा सचमुच तार का ताप बढ़ाती है, और गलत हिस्सा (R) है।
उत्तर: तापन इलेक्ट्रॉन-आयन टकराव से होता है, इसलिए (A) सही, (R) गलत: विकल्प (c), जो आधिकारिक उत्तर है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)कथन (A) और कारण (R):
- कथन (A): ट्रांसफार्मर वोल्टता बढ़ाने या घटाने के लिए उपयोगी है।
- कारण (R): ट्रांसफार्मर दिष्ट धारा (D.C.) परिपथों में प्रयुक्त होने वाली युक्ति है।
उपर्युक्त दोनों कथनों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: ट्रांसफार्मर प्रत्यावर्ती वोल्टता को अधिक या कम मान में बदलता है, इसलिए (A) सही है। वह अन्योन्य प्रेरण से काम करता है, जिसके लिए बदलता चुंबकीय फ्लक्स चाहिए; स्थिर दिष्ट धारा से बदलता फ्लक्स नहीं बनता और कोई वोल्टता प्रेरित नहीं होती, इसलिए ट्रांसफार्मर DC की युक्ति नहीं है और (R) गलत है। (A) सही और (R) गलत, अर्थात् विकल्प (c)।
इस भ्रम से बचें: स्थिर दिष्ट धारा से बदलता फ्लक्स नहीं बनता, इसलिए वोल्टता प्रेरित नहीं होती।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों सही, (R) व्याख्या करता है: गलत। (R) गलत है।
- (b) दोनों सही, (R) व्याख्या नहीं करता: गलत। (R) गलत है, इसलिए यह भी नहीं हो सकता।
- (c) (A) सही, (R) गलत: सही। ट्रांसफार्मर वोल्टता बढ़ाता-घटाता है, किन्तु केवल AC पर।
- (d) (A) गलत, (R) सही: गलत। (A) सही है, और गलत हिस्सा (R) है।
उत्तर: ट्रांसफार्मर को बदलता फ्लक्स चाहिए, इसलिए (A) सही, (R) गलत: विकल्प (c), जो आधिकारिक उत्तर है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)दो तारों की लंबाई, व्यास और प्रतिरोधकता, तीनों का अनुपात 1 : 2 है। यदि पतले तार का प्रतिरोध 10 ओम है, तो मोटे तार का प्रतिरोध है
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: प्रतिरोध = प्रतिरोधकता × लंबाई ÷ क्षेत्रफल, और क्षेत्रफल व्यास के वर्ग के अनुक्रमानुपाती है। पतले तार की प्रतिरोधकता, लंबाई और व्यास, तीनों 1 इकाई हैं, और उसका प्रतिरोध 10 ओम है। मोटे तार की प्रतिरोधकता 2, लंबाई 2 और व्यास 2 है, इसलिए उसका क्षेत्रफल 2 × 2 = 4 गुना है। अतः उसका प्रतिरोध 10 × 2 × 2 ÷ 4 = 10 ओम।
इस भ्रम से बचें: व्यास दोगुना होने पर क्षेत्रफल चार गुना होता है, दोगुना नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 10 ओम: सही। 10 × 2 (प्रतिरोधकता) × 2 (लंबाई) ÷ 4 (क्षेत्रफल) = 10।
- (b) 5 ओम: गलत। यह तभी आता जब केवल क्षेत्रफल दोगुना होता और बाकी कुछ न बदलता।
- (c) 20 ओम: गलत। इसमें क्षेत्रफल को चार गुना के बजाय दोगुना माना गया है (10 × 2 × 2 ÷ 2)।
- (d) 40 ओम: गलत। इसमें बढ़ा हुआ क्षेत्रफल पूरी तरह छोड़ दिया गया है (10 × 2 × 2)।
उत्तर: चार गुना क्षेत्रफल दोगुनी प्रतिरोधकता और लंबाई को काट देता है, इसलिए 10 ओम: विकल्प (a), जो आधिकारिक उत्तर है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2005 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अक्ष पृथ्वी के भौगोलिक अक्ष से 23½° पर झुका है।
- उत्तरी गोलार्ध में पृथ्वी का चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा के एक प्रायद्वीप पर स्थित है।
- पृथ्वी की चुंबकीय भूमध्यरेखा दक्षिण भारत में थुंबा से होकर गुज़रती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1 में 23.5 डिग्री दिया है, जो पृथ्वी के घूर्णन अक्ष का झुकाव है; चुंबकीय अक्ष लगभग 11.3 डिग्री झुका है, इसलिए कथन 1 गलत है। उत्तरी चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा में है, इसलिए कथन 2 सही है। थुंबा को भू-चुंबकीय भूमध्यरेखा से निकटता के कारण चुना गया था, इसलिए कथन 3 सही है। 2 और 3 सही हैं, अर्थात् विकल्प (b)।
इस भ्रम से बचें: घूर्णन अक्ष के झुकाव (23.5 डिग्री) को चुंबकीय अक्ष के झुकाव (लगभग 11 डिग्री) से मिला देना।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) 1, 2 और 3: गलत। कथन 1 गलत है; चुंबकीय अक्ष लगभग 11.3 डिग्री झुका है।
- (b) 2 और 3: सही। उत्तरी चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा में है और चुंबकीय भूमध्यरेखा थुंबा के पास से गुज़रती है।
- (c) केवल 2: गलत। इसमें कथन 3 छूट जाता है, जो सही है।
- (d) केवल 3: गलत। इसमें कथन 2 छूट जाता है, जो सही है।
उत्तर: चुंबकीय झुकाव लगभग 11 डिग्री है, 23.5 नहीं, इसलिए 2 और 3: विकल्प (b), जो आधिकारिक उत्तर है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)CFL और LED लैंप में क्या अंतर है?
- प्रकाश उत्पन्न करने के लिए CFL पारे की वाष्प और फ़ॉस्फ़र का उपयोग करता है, जबकि LED लैंप अर्धचालक पदार्थ का।
- CFL का औसत जीवनकाल LED लैंप से बहुत अधिक होता है।
- LED लैंप की तुलना में CFL कम ऊर्जा-दक्ष है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: CFL पारे की वाष्प में पराबैंगनी प्रकाश बनाता है, जिसे फ़ॉस्फ़र दृश्य प्रकाश में बदलता है, जबकि LED अर्धचालक युक्ति है; कथन 1 सही है। LED लैंप प्रतिदीप्त लैंपों से कई गुना अधिक चलते हैं, इसलिए कथन 2 गलत है। LED कहीं अधिक ऊर्जा-दक्ष हैं, अतः CFL कम दक्ष है और कथन 3 सही है। केवल 1 और 3, अर्थात् विकल्प (c)।
इस भ्रम से बचें: कथन 2 सच को उलट देता है: अधिक समय LED चलता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 3 भी सही है।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। कथन 2 गलत है; LED अधिक समय चलता है।
- (c) केवल 1 और 3: सही। कथन 1 का प्रकाश बनाने का तरीका और कथन 3 की दक्षता, दोनों सही हैं।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 2 गलत है।
उत्तर: अधिक समय LED चलता है, CFL नहीं, इसलिए केवल 1 और 3: विकल्प (c), जो आधिकारिक उत्तर है।
स्रोत
- NCERT: विज्ञान (कक्षा 10), विद्युत
- NCERT: विज्ञान (कक्षा 10), विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव
- NCERT: Science (Class X), Electricity
- NCERT: Science (Class X), Magnetic Effects of Electric Current
- NCERT: Physics Parts I and II (Class XII): Magnetism and Matter; Electromagnetic Induction; Alternating Current; Semiconductor Electronics
- PIB: Cabinet approves programme for semiconductor and display ecosystem (15 December 2021)
- PIB: Fiscal support, MoUs and talent for chip manufacturing (2 April 2025)
- PIB: India's Semiconductor Revolution (3 August 2025)
- PIB: India Semiconductor Mission 2.0 (7 February 2026)
- NOAA NCEI: Tracking Changes in Earth's Magnetic Poles
- Vikram Sarabhai Space Centre: Genesis
- Wikipedia: Superconductivity
- Wikipedia: LED lamp
- Wikipedia: Compact fluorescent lamp
- Wikipedia: Geomagnetic reversal
- UPSC: Civil Services Examination question papers
- The Hindu, Delhi edition, 18 September 2026: Semicon India 2026 and the second phase of the India Semiconductor Mission
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
