परिचय

अनुच्छेद 239क संसद को साधारण विधि से किसी केंद्र शासित प्रदेश के लिए विधान-मंडल और मंत्रि-परिषद् बनाने देता है। पुडुचेरी में इसके अंतर्गत 1963 से विधान सभा है, और जम्मू-कश्मीर में 2019 से, जब अनुच्छेद 370 लागू नहीं रहा और राज्य का पुनर्गठन हुआ; उसी समय अलग किए गए लद्दाख के पास कोई विधान सभा नहीं है।

अनुच्छेद 239क: केंद्र शासित प्रदेश को विधान सभा कैसे मिलती है

अनुच्छेद 239क: साधारण विधि से विधान-मंडल और मंत्रि-परिषद्

केंद्र शासित प्रदेश, जिसे संविधान संघ राज्यक्षेत्र (Union Territory) कहता है, सीधे संघ के अधीन होता है। अनुच्छेद 239 के अनुसार राष्ट्रपति हर केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन एक प्रशासक के माध्यम से चलाते हैं। इस प्रशासक की नियुक्ति भी राष्ट्रपति करते हैं और उसका पदनाम भी वही तय करते हैं, इसीलिए कहीं उप-राज्यपाल हैं और कहीं प्रशासक। अनुच्छेद 239क (Article 239A) इस ढाँचे में एक और परत जोड़ता है: संसद विधि बनाकर उस प्रदेश के लिए विधान-मंडल बना सकती है, जो पूरी तरह निर्वाचित हो या अंशतः नामनिर्दिष्ट और अंशतः निर्वाचित; वह मंत्रि-परिषद् भी बना सकती है, या दोनों।

यह अनुच्छेद चौदहवें संविधान संशोधन से जोड़ा गया, जो 28 दिसंबर 1962 को लागू हुआ। आरंभ में यह छह केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होता था: हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव, तथा पांडिचेरी। इनमें से अधिकतर बाद में राज्य बन गए, और गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 के बाद से अनुच्छेद में केवल पुडुचेरी का नाम बचा है। इसी संशोधन ने पांडिचेरी को नौवाँ केंद्र शासित प्रदेश बनाया और उसे राज्य सभा में एक सीट दी।

इस अनुच्छेद का लचीलापन इसके खंड (2) में है। इसके अंतर्गत बनी विधि को अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाता, भले ही वह संविधान के लागू होने के ढंग को बदलती हो। अतः संसद साधारण बहुमत से किसी प्रदेश का विधान-मंडल बना सकती है, बढ़ा सकती है या उसका स्वरूप बदल सकती है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के लिए संसद ने ठीक यही रास्ता अपनाया।

विधान सभा वाले केंद्र शासित प्रदेश: दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर

भारत के आठ केंद्र शासित प्रदेशों में से तीन के पास विधान-मंडल है: दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर। शेष पाँच, जिनमें लद्दाख भी है, सीधे राष्ट्रपति के प्रशासक द्वारा चलाए जाते हैं। तीनों विधान सभाओं में अंतर तीन बातों का है: उनकी शक्ति कहाँ से आती है, उनका आकार कितना है, और कौन-से विषय उनकी पहुँच से बाहर हैं। इसी कारण परीक्षक इन्हें साथ रखकर पूछना पसंद करते हैं।

तालिका 1. विधान सभा वाले तीन केंद्र शासित प्रदेश।
प्रदेश आधार और सीटें मुख्यमंत्री, सीमाएँ, राज्य सभा
दिल्ली अनुच्छेद 239कक; 70 निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि पर शक्ति नहीं; 3 सीटें
पुडुचेरी अनुच्छेद 239क और 1963 का अधिनियम; 30 निर्वाचित, अधिकतम 3 नामनिर्दिष्ट राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; राज्य सूची के सभी विषय; 1 सीट
जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 239क और 2019 का अधिनियम; 90 निर्वाचित, अधिकतम 5 नामनिर्दिष्ट उप-राज्यपाल द्वारा नियुक्त; लोक व्यवस्था और पुलिस पर शक्ति नहीं; 4 सीटें

राज्य सभा में भी केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व है, पर केवल उन्हीं का जिनके पास विधान सभा है। चौथी अनुसूची दिल्ली को 3, पुडुचेरी को 1 और जम्मू-कश्मीर को 4 सीटें देती है; बाकी पाँच केंद्र शासित प्रदेशों की कोई सीट नहीं है।

सबसे सशक्त विधान सभा वाला प्रदेश भी एक बात में राज्य से पीछे रहता है। संसद किसी केंद्र शासित प्रदेश के लिए तीनों सूचियों के किसी भी विषय पर, राज्य सूची पर भी, विधि बना सकती है, और उसकी विधि विधान सभा की विधि पर अभिभावी होती है। प्रशासक राष्ट्रपति का अभिकर्ता है, राज्यपाल की तरह राज्य का प्रमुख नहीं; अतः निर्वाचित सरकार को भी संघ के प्रति उत्तरदायी एक अधिकारी के साथ काम करना होता है। संघ और राज्यों के बीच विषयों का बँटवारा सातवीं अनुसूची (अंग्रेज़ी में) लेख में दिया गया है।

पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश: फ्रांसीसी भारत से निर्वाचित विधान सभा तक

पुडुचेरी का मानचित्र: फ्रांसीसी शासन, विलय और चार ज़िले

पुडुचेरी राज्य नहीं, केंद्र शासित प्रदेश है। यह चार ज़िलों से बना है, जो एक-दूसरे से जुड़े नहीं हैं: पुडुचेरी और कराईकल तमिलनाडु से घिरे हैं, यानम आंध्र प्रदेश से घिरा है, और पश्चिमी तट पर स्थित माहे की सीमा केरल से लगती है। चारों फ्रांसीसी भारत (French India) की बस्तियाँ थीं; नीचे का मानचित्र दिखाता है कि वे एक-दूसरे से कितनी दूर हैं।

दक्षिण भारत का मानचित्र, जिसमें पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के चार ज़िले लाल रंग में हैं: 1 पुडुचेरी और 2 कराईकल, बंगाल की खाड़ी के तट पर तमिलनाडु से घिरे; 3 माहे, अरब सागर के तट पर केरल की सीमा से लगा; 4 यानम, आंध्र प्रदेश से घिरा। चेन्नई मद्रास उच्च न्यायालय के स्थान के रूप में अंकित है, जिसका क्षेत्राधिकार 6 नवंबर 1962 से पुडुचेरी पर है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, श्रीलंका तथा कावेरी और कृष्णा नदियाँ नामांकित हैं।

फ्रांसीसियों के बसने से पहले यहाँ कई यूरोपीय शक्तियाँ व्यापार कर चुकी थीं। सबसे पहले पुर्तगाली आए, जिन्होंने 1521 से वस्त्रों का व्यापार किया; 17वीं शताब्दी में डच और डेनिश आए। फ्रांसीसी बाद में आए और सबसे लंबे समय तक टिके, यद्यपि प्रतिद्वंद्वियों ने कई बार यह बस्ती उनसे छीनी:

  • 1674: फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने पांडिचेरी में व्यापारिक केंद्र स्थापित किया, जो भारत में उसकी प्रमुख बस्ती बना।
  • 1693 से 1699: डचों ने 1693 में पांडिचेरी पर अधिकार किया और 1699 की रिज़विक संधि से इसे फ्रांस को लौटा दिया।
  • 1720 के दशक से 1738: फ्रांसीसियों ने 1720 के दशक में माहे, 1731 में यानम और 1738 में कराईकल प्राप्त किया।
  • 1761 से 1763: अंग्रेज़ों ने 1761 में पांडिचेरी पर कब्ज़ा किया और पेरिस की संधि (1763) के अंतर्गत इसे लौटा दिया।
  • 1793 से 1814: फ्रांसीसी क्रांति के युद्धों के दौरान अंग्रेज़ों ने इसे फिर लिया और 1814 में फ्रांस को लौटाया।
  • 1 नवंबर 1954: फ्रांस ने चारों बस्तियाँ वास्तविक रूप से (de facto) भारत को सौंप दीं।
  • 16 अगस्त 1962: भारत और फ्रांस ने अनुसमर्थन पत्रों का आदान-प्रदान किया, और फ्रांस ने पूर्ण संप्रभुता सौंप दी।

पांडिचेरी (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 2006 से इस प्रदेश का नाम पुडुचेरी हुआ। इसका अपना उच्च न्यायालय नहीं है: 6 नवंबर 1962 से मद्रास उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस पर लागू है, जैसा कि उच्च न्यायालयों (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में समझाया गया है।

पुडुचेरी विधान सभा: संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963

अनुच्छेद 239क का प्रयोग करते हुए संसद ने 10 मई 1963 को संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (Government of Union Territories Act, 1963) बनाया, जो 1 जुलाई 1963 को लागू हुआ। उसी दिन फ्रांसीसी काल की प्रतिनिधि सभा पांडिचेरी की विधान सभा बन गई; इसलिए पहली विधान सभा बिना चुनाव के गठित हुई, और चुनाव 1964 से हो रहे हैं।

  • संरचना: अधिकतम 30 निर्वाचित सदस्य और संघ सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट अधिकतम 3 सदस्य; 5 निर्वाचित सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं।
  • नामनिर्दिष्ट सदस्य: इनकी शक्तियाँ निर्वाचित सदस्यों के समान हैं।
  • कार्यपालिका: उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं; अन्य मंत्री मुख्यमंत्री की सलाह पर नियुक्त होते हैं।
  • विधि-निर्माण: विधान सभा राज्य सूची और समवर्ती सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है, जबकि इन्हीं विषयों पर संसद की अपनी शक्ति बनी रहती है।

जिस समय विधान सभा काम नहीं कर पाती, उस समय के लिए दो शक्तियाँ संघ के पास रहती हैं। विधान सभा भंग या निलंबित हो, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 240 के अंतर्गत पुडुचेरी के लिए विनियम बना सकते हैं, और ऐसे विनियम का बल संसद के अधिनियम के बराबर होता है। विधान सभा का सत्र न चल रहा हो, तो अनुच्छेद 239ख के अंतर्गत उप-राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकते हैं, किन्तु राष्ट्रपति के अनुदेश प्राप्त करने के बाद ही।

अनुच्छेद 370 और 35क: 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा

अनुच्छेद 370 क्या है: अधिमिलन, खंड (1) से (3) और अस्थायी उपबन्ध

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा अनुच्छेद 370 पर टिका था। यही उपबन्ध तय करता था कि भारतीय संविधान का कितना भाग उस राज्य पर लागू होगा। यह भाग XXI, 'अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध', में था, और इसके साथ हाशिया नोट लगा था: 'जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी उपबन्ध'। इसने जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को यह सिफ़ारिश करने का अधिकार दिया कि संविधान राज्य पर किस सीमा तक लागू हो; 1954 का राष्ट्रपति आदेश इन्हीं सिफ़ारिशों पर जारी हुआ।

इस अनुच्छेद की जड़ राज्य के भारत में शामिल होने के तरीके में है। अन्य रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर का अधिमिलन (accession) भी तीन विषयों तक सीमित था: रक्षा, विदेश मामले और संचार। राज्य ने अपनी अलग संविधान सभा बनाई, और अनुच्छेद 370 के अनुसार संघ की अन्य शक्तियाँ राज्य तक तभी पहुँच सकती थीं जब राज्य सरकार सहमति दे और उस सहमति का अनुसमर्थन संविधान सभा करे। इसके खंड इस प्रकार काम करते थे:

  1. खंड (1)(ख): राज्य के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित थी जो अधिमिलन पत्र के अनुरूप थे, और उन अन्य विषयों तक जिन्हें राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से निर्दिष्ट करें।
  2. खंड (1)(ग): अनुच्छेद 1 और स्वयं अनुच्छेद 370 राज्य पर पूरी तरह लागू थे।
  3. खंड (1)(घ): संविधान के अन्य उपबन्ध केवल उन अपवादों और संशोधनों के साथ लागू होते थे जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्दिष्ट करें।
  4. खंड (2): राज्य की संविधान सभा के बुलाए जाने से पहले दी गई सहमति उस सभा के निर्णय के लिए उसके सामने रखी जानी थी।
  5. खंड (3): राष्ट्रपति सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकते थे कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा, किन्तु केवल राज्य की संविधान सभा की सिफ़ारिश पर।

तो 'अस्थायी' अनुच्छेद इतने लंबे समय तक कैसे बना रहा? राज्य की संविधान सभा ने 25 जनवरी 1957 को स्वयं को भंग कर दिया, और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने या संशोधित करने की कोई सिफ़ारिश नहीं की। तब से इस अनुच्छेद को संविधान की स्थायी विशेषता माना जाने लगा। 2016 के मुख्य परीक्षा प्रश्न का केंद्र यही बात है।

अनुच्छेद 35क: स्थायी निवासी, विशेषाधिकार और 15 वर्ष का अधिवास नियम

1954 के उसी राष्ट्रपति आदेश ने संविधान में अनुच्छेद 35क जोड़ा। इसके अंतर्गत राज्य का विधान-मंडल यह परिभाषित कर सकता था कि राज्य के स्थायी निवासी कौन हैं, और अचल संपत्ति, राज्य में बसने तथा रोज़गार के संबंध में उनके विशेषाधिकार क्या होंगे। राज्य के अपने संविधान के अनुसार केवल स्थायी निवासी ही भूमि और अचल संपत्ति ख़रीद सकते थे, राज्य के चुनावों में मतदान कर सकते और लड़ सकते थे, और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते थे; अन्य भारतीय नागरिक, वहाँ रहते हुए भी, ऐसा नहीं कर सकते थे।

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 35क निष्प्रभावी हो गया। पूरा संविधान लागू होते ही राज्य का अलग संविधान काम करना बंद कर गया, और उसके साथ ये विशेषाधिकार भी समाप्त हो गए। उनकी जगह अधिवास (domicile) का नियम आया: जो व्यक्ति जम्मू-कश्मीर में 15 वर्ष रहा हो, या वहाँ सात वर्ष पढ़कर कक्षा 10 या 12 की परीक्षा वहीं से दी हो, उसे उस प्रदेश का अधिवासी माना जाता है। पंचायतों और नगरपालिकाओं से जुड़े 73वें और 74वें संशोधन भी लागू हो गए, और शिक्षा का अधिकार लागू किया गया।

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 की समाप्ति: संविधान आदेश 272 और 273

अगस्त 2019 में दो दिनों के भीतर तीन चरणों में यह विशेष दर्जा समाप्त हुआ। पहले राष्ट्रपति ने पूरा संविधान राज्य पर लागू किया, फिर संसद ने सिफ़ारिश की कि अनुच्छेद 370 लागू न रहे, और फिर राष्ट्रपति ने इस आशय का दूसरा आदेश जारी किया:

  1. 5 अगस्त 2019: संविधान आदेश 272 ने 1954 के आदेश का स्थान लिया और संविधान के सभी उपबन्ध जम्मू-कश्मीर पर लागू कर दिए; राज्य सभा ने संकल्प और पुनर्गठन विधेयक पारित किया।
  2. 6 अगस्त 2019: लोक सभा ने दोनों पारित किए, और राष्ट्रपति ने संविधान आदेश 273 जारी किया, जिसके अंतर्गत उसी दिन से अनुच्छेद 370 लागू नहीं रहा।
  3. 9 अगस्त 2019: जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली।
  4. 31 अक्टूबर 2019: राज्य का पुनर्गठन दो केंद्र शासित प्रदेशों में हुआ।
एक रेखा पर समय-रेखा: 1954, राष्ट्रपति आदेश और अनुच्छेद 35क; 1957, राज्य की संविधान सभा भंग; अगस्त 2019, संविधान आदेश 272 और 273 से अनुच्छेद 370 की समाप्ति; 31 अक्टूबर 2019, दो केंद्र शासित प्रदेश बने; 2022, परिसीमन से 90 निर्वाचित सीटें; दिसंबर 2023, उच्चतम न्यायालय ने परिवर्तन को वैध ठहराया; 2024, केंद्र शासित प्रदेश के रूप में विधान सभा का पहला चुनाव। राज्य के दर्जे की बहाली अभी प्रतीक्षित है।

अनुच्छेद 370 पर उच्चतम न्यायालय (2023): निष्कर्ष और राज्य के दर्जे का निर्देश

11 दिसंबर 2023 को उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अनुच्छेद 370 की समाप्ति को वैध ठहराया। उसके निष्कर्ष इस परिवर्तन से जुड़े अधिकांश प्रश्नों का उत्तर देते हैं:

  • संप्रभुता नहीं: अधिमिलन पत्र के बाद जम्मू-कश्मीर के पास संप्रभुता का कोई तत्व नहीं बचा; अनुच्छेद 370 असममित संघवाद की विशेषता था, संप्रभुता की नहीं।
  • अस्थायी उपबन्ध: इसका इतिहास और भाग XXI में इसका स्थान दिखाते हैं कि अनुच्छेद 370 अस्थायी था, और राज्य की संविधान सभा के भंग होने के बाद भी अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत राष्ट्रपति की शक्ति बनी रही।
  • दोनों आदेश: संविधान आदेश 272 के द्वारा अनुच्छेद 367 का प्रयोग करके अनुच्छेद 370 में संशोधन करना अवैध था, किन्तु उसी आदेश से पूरा संविधान लागू करना वैध था, और संविधान आदेश 273 भी वैध था।
  • लद्दाख: किसी राज्य से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाना अनुच्छेद 3(क) और उसके स्पष्टीकरण I के अंतर्गत अनुमत है।
  • राज्य का संविधान: जम्मू-कश्मीर राज्य का संविधान अप्रवर्तनीय है और निरर्थक हो चुका है।

एक प्रश्न खुला छोड़ दिया गया: क्या संसद अनुच्छेद 3 के अंतर्गत पूरे राज्य को एक या अधिक केंद्र शासित प्रदेशों में बदल सकती है? न्यायालय ने इस पर निर्णय नहीं दिया, क्योंकि सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्य का दर्जा लौटाया जाएगा। न्यायालय ने 30 सितंबर 2024 तक विधान सभा के चुनाव कराने और 'यथाशीघ्र' राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया। चुनाव इस समय-सीमा के भीतर हो गए; राज्य का दर्जा अभी बहाल नहीं हुआ है।

पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019: दो केंद्र शासित प्रदेश

31 अक्टूबर 2019 से जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया। धारा 3 ने करगिल और लेह ज़िलों से 'विधान-मंडल रहित' लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनाया; धारा 4 ने राज्य के शेष भाग से 'विधान-मंडल सहित' जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बनाया।

  • विधान-मंडल: पुडुचेरी पर लागू अनुच्छेद 239क जम्मू-कश्मीर पर भी लागू होता है (धारा 13); पुरानी विधान परिषद् समाप्त कर दी गई (धारा 57)।
  • संसद: जम्मू-कश्मीर की राज्य सभा में 4 सीटें बनी रहीं; लोक सभा में जम्मू-कश्मीर की 5 और लद्दाख की 1 सीट है।
  • उच्च न्यायालय: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय दोनों केंद्र शासित प्रदेशों का साझा उच्च न्यायालय बना, और उसका व्यय दोनों की जनसंख्या के अनुपात में बँटता है।
  • तंत्र की विफलता: धारा 73 के अंतर्गत राष्ट्रपति, उप-राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा, जम्मू-कश्मीर में अधिनियम के उपबन्धों को निलंबित कर सकते हैं, लगभग वैसे ही जैसे राज्य के लिए अनुच्छेद 356 काम करता है।

इस मामले को असामान्य बनाती है परिवर्तन की दिशा। पहले के पुनर्गठनों में केंद्र शासित प्रदेश राज्य बने थे, जैसे हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और गोवा; 2019 में एक राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। इन प्रदेशों का पहले का इतिहास भारत के केंद्र शासित प्रदेश लेख में दिया गया है।

क्या जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश है: विधान सभा की सीटें और सदस्य

हाँ। जम्मू-कश्मीर आज विधान सभा वाला केंद्र शासित प्रदेश है, और उसका राज्य का दर्जा अभी बहाल नहीं हुआ है। 2019 के अधिनियम ने प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरी जाने वाली 107 सीटें तय की थीं; दिसंबर 2023 के संशोधन ने इन्हें 114 कर दिया। इनमें से 24 सीटें पाकिस्तान के कब्ज़े वाले क्षेत्रों के लिए हैं, जो रिक्त रहती हैं और विधान सभा की कुल संख्या में नहीं गिनी जातीं।

  • निर्वाचित सीटें: 2022 के परिसीमन ने भरी जाने वाली 90 सीटें तय कीं, जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर संभाग में 47; 7 सीटें अनुसूचित जातियों और 9 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
  • नामनिर्देशन: महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने पर उप-राज्यपाल 2 महिलाओं को, अधिकतम 2 कश्मीरी प्रवासियों को (जिनमें एक महिला हो) और पाक-अधिकृत जम्मू-कश्मीर से विस्थापित 1 व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट कर सकते हैं।
  • कार्यकाल: पाँच वर्ष; 2019 से पहले यह छह वर्ष था।
  • महिला आरक्षण: प्रत्यक्ष निर्वाचन वाली एक-तिहाई सीटें, जो 2023 के संशोधन के बाद होने वाली पहली जनगणना पर आधारित परिसीमन के बाद लागू होंगी।

केंद्र शासित प्रदेश की विधान सभा का पहला चुनाव सितंबर और अक्टूबर 2024 में हुआ। जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने पहली सरकार बनाई, और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।

जम्मू-कश्मीर विधान सभा और उप-राज्यपाल की शक्तियाँ

अधिनियम की धारा 32 के अनुसार विधान सभा लोक व्यवस्था और पुलिस को छोड़कर राज्य सूची के किसी भी विषय पर, और समवर्ती सूची पर, विधि बना सकती है, जहाँ तक ये विषय केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होते हैं। इस प्रदेश के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। कराधान से या संचित निधि के धन से जुड़ा कोई विधेयक उप-राज्यपाल की सिफ़ारिश पर ही प्रस्तुत किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रि-परिषद्, जिसका आकार विधान सभा के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता, विधान सभा की शक्तियों वाले विषयों पर उप-राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है। यहीं जम्मू-कश्मीर दिल्ली और पुडुचेरी, दोनों से अलग है: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति नहीं, उप-राज्यपाल करते हैं, और मंत्री उप-राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर रहते हैं, यद्यपि वे सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

संरचना आरेख। राष्ट्रपति उप-राज्यपाल को नियुक्त करते हैं। 2019 के अधिनियम की धारा 13 से अनुच्छेद 239क जम्मू-कश्मीर पर लागू होता है। उप-राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करते हैं, जो विधान सभा के अधिकतम 10 प्रतिशत आकार वाली मंत्रि-परिषद् के प्रमुख हैं; मंत्रि-परिषद् 90 निर्वाचित सीटों और अधिकतम 5 नामनिर्दिष्ट सदस्यों वाली विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। धारा 32 के अंतर्गत विधान सभा पुलिस और लोक व्यवस्था को छोड़कर राज्य सूची पर विधि बनाती है, और संसद किसी भी विषय पर उस पर अभिभावी हो सकती है। धारा 53 के अंतर्गत उप-राज्यपाल विधान सभा की शक्ति से बाहर के विषयों, अखिल भारतीय सेवाओं और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो पर अपने विवेक से कार्य करते हैं।
  • विधान सभा की शक्तियों से बाहर के विषय: इन पर उप-राज्यपाल अपने विवेक से कार्य करते हैं।
  • अखिल भारतीय सेवाएँ और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो: ये भी विवेक के विषय हैं।
  • अंतिम निर्णय: कोई विषय विवेक का है या नहीं, इस प्रश्न पर उप-राज्यपाल का निर्णय अंतिम होता है, और मंत्रियों ने क्या सलाह दी, इसकी जाँच किसी न्यायालय में नहीं हो सकती।

विधान-मंडल रहित लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश

क्या लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश है: उप-राज्यपाल, पहाड़ी परिषदें और ज़िले

हाँ। करगिल और लेह ज़िलों से बना लद्दाख 31 अक्टूबर 2019 को केंद्र शासित प्रदेश बना, और इसकी कोई विधान सभा नहीं है। राष्ट्रपति अनुच्छेद 239 के अंतर्गत नियुक्त उप-राज्यपाल के माध्यम से इसका प्रशासन चलाते हैं, और अनुच्छेद 240 के अंतर्गत इसके लिए विनियम बना सकते हैं; ऐसा विनियम लद्दाख पर लागू होने वाले संसद के किसी अधिनियम को निरस्त या संशोधित कर सकता है।

  • स्थानीय स्वशासन: लेह और करगिल की दो निर्वाचित स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें ग्राम पंचायतों के साथ आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि उपयोग, कराधान और स्थानीय शासन पर काम करती हैं।
  • ज़िले: पाँच नए ज़िले, ज़ांस्कर, द्रास, शाम, नुब्रा और चांगथांग, अगस्त 2024 में घोषित हुए और 27 अप्रैल 2026 को अधिसूचित हुए; इससे लद्दाख में ज़िलों की संख्या दो से बढ़कर सात हो गई।
  • प्रतिनिधित्व: लोक सभा में एक सीट; राज्य सभा में कोई सीट नहीं।
  • आकार: क्षेत्रफल में सबसे बड़ा केंद्र शासित प्रदेश, और जनसंख्या में दूसरा सबसे छोटा।
  • मानचित्र: 2019 के एक आदेश के अनुसार लेह ज़िले में 1947 के गिलगित, गिलगित वज़ारत, चिलास और जनजातीय क्षेत्र शामिल हैं, इसलिए भारत का आधिकारिक मानचित्र इन्हें लद्दाख के भीतर दिखाता है।

विधान-मंडल न होने से लद्दाख के लिए विधियाँ संसद बनाती है या राष्ट्रपति विनियम के रूप में, और पहाड़ी परिषदें ही यहाँ के एकमात्र निर्वाचित निकाय हैं। लद्दाख की राजनीति इसी कमी से चलती है: स्थानीय नेता ऐसे संवैधानिक संरक्षण माँगते रहे हैं जो पहाड़ी परिषदें नहीं दे सकतीं।

लद्दाख और छठी अनुसूची: अनुसूचित जनजाति आयोग की सिफ़ारिश और उच्चाधिकार प्राप्त समिति

अनुच्छेद 244(2) के अंतर्गत छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है। वहाँ हर स्वायत्त ज़िले में अधिकतम 30 सदस्यों की एक ज़िला परिषद् होती है, जिनमें से अधिकतम 4 राज्यपाल द्वारा नामनिर्दिष्ट होते हैं और शेष निर्वाचित। परिषद् भूमि, आरक्षित वनों को छोड़कर अन्य वनों, झूम खेती, ग्राम प्रशासन, उत्तराधिकार, विवाह और विवाह-विच्छेद तथा सामाजिक रीति-रिवाजों पर विधि बना सकती है, और प्राथमिक विद्यालय, औषधालय और बाज़ार चला सकती है। पाँचवीं अनुसूची अन्य स्थानों के अनुसूचित क्षेत्रों को कुछ कम संरक्षण देती है; दोनों अनुसूचियों का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 11 सितंबर 2019 को सिफ़ारिश की कि लद्दाख को छठी अनुसूची में लाया जाए, क्योंकि नया केंद्र शासित प्रदेश मुख्यतः जनजातीय क्षेत्र है। आयोग ने इसके चार कारण दिए:

  1. शक्तियों का लोकतांत्रिक हस्तांतरण।
  2. क्षेत्र की विशिष्ट संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन।
  3. भूमि पर अधिकार सहित कृषि अधिकारों की रक्षा।
  4. धन के अधिक हस्तांतरण से लद्दाख का तेज़ विकास।
दो स्तंभ। आज का लद्दाख: अनुच्छेद 239 और 240 के अंतर्गत उप-राज्यपाल का शासन; विधियाँ संसद या राष्ट्रपति के विनियम बनाते हैं; लेह और करगिल की निर्वाचित पहाड़ी परिषदें; लोक सभा की एक सीट। छठी अनुसूची के अंतर्गत (अनुच्छेद 244(2)): अधिकतम 30 सदस्यों की ज़िला परिषद्, जिनमें 4 नामनिर्दिष्ट, जो भूमि, वन, उत्तराधिकार, विवाह और सामाजिक रीतियों पर विधि बनाती है और प्राथमिक विद्यालय तथा बाज़ार चलाती है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 2019 में यह परिवर्तन सुझाया; सितंबर 2026 में संघ ने इसके स्थान पर अनुच्छेद 371 के नए अध्याय के अंतर्गत निर्वाचित निकाय का प्रस्ताव रखा।

गृह मंत्रालय ने गृह राज्य मंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई, जो एपेक्स बॉडी लेह और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस से बातचीत करती है। उसका दायरा संस्कृति और भाषा, भूमि और रोज़गार, पहाड़ी परिषदें और संवैधानिक संरक्षण है। संघ के अनुसार इन वार्ताओं से लद्दाख की अनुसूचित जनजातियों का आरक्षण 45 से बढ़कर 84 प्रतिशत हुआ, पहाड़ी परिषदों में महिलाओं को एक-तिहाई सीटें मिलीं, और भोटी तथा पुरगी को राजभाषा का दर्जा मिला।

लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 का प्रस्ताव: प्रत्यक्ष निर्वाचित निकाय (2026)

इसके बाद संघ ने एक अलग रास्ता सुझाया है। 22 मई 2026 की वार्ता में 'अपने ढंग के विशिष्ट मॉडल' का वादा किया गया था; फिर 9 सितंबर 2026 को गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 371 में नए अध्याय 'K' के माध्यम से लद्दाख के लिए एक निर्वाचित निकाय का प्रस्ताव रखा। अनुच्छेद 371 और उसके अध्याय A से J (हिंदी पाठ में 371क से 371ञ) में पहले से 12 राज्यों के लिए विशेष उपबन्ध हैं। प्रस्तावित निकाय प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुना जाएगा और भूमि, संस्कृति और भाषा, वन, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों तथा अनुच्छेद 240 के अंतर्गत केंद्र शासित प्रदेश के लिए आरक्षित अन्य विषयों पर विधि बनाएगा।

लद्दाख के मुख्य सचिव ने इसे न राज्य का दर्जा बताया, न विधान-मंडल वाला केंद्र शासित प्रदेश, बल्कि विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों वाला अपनी तरह का एक निकाय। लेह एपेक्स बॉडी ने बैठक को निराशाजनक बताया: उसमें मई की बातें ही दोहराई गईं, और कोई विस्तृत मसौदा प्रस्ताव नहीं दिया गया।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IIजम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद, जम्मू-कश्मीर विधान-सभा की प्रकृति का विवेचन कीजिए। केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की विधान-सभा की शक्तियों तथा कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: विवेचन कीजिए और संक्षेप में वर्णन कीजिए · दृष्टिकोण: प्रश्न के दो भाग हैं। पहले विधान सभा की प्रकृति बताएँ (वह कैसे बनी और उसकी संरचना क्या है), फिर उसकी शक्तियाँ और कार्य, और अंत में वे सीमाएँ जो उसे राज्य विधान-मंडल से कमज़ोर बनाती हैं।

    भूमिका: 2019 के अधिनियम से शुरुआत करें, जिसने धारा 13 के माध्यम से अनुच्छेद 239क लागू करके जम्मू-कश्मीर को एक सदनीय विधान सभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्रकृति: संविधान से नहीं, संसद की विधि से बना विधान-मंडल; 114 सीटें, जिनमें 24 रिक्त; 90 निर्वाचित, अधिकतम 5 नामनिर्दिष्ट; पाँच वर्ष का कार्यकाल; विधान परिषद् समाप्त।
    • शक्तियाँ: लोक व्यवस्था और पुलिस को छोड़कर राज्य सूची पर, और समवर्ती सूची पर विधि (धारा 32); अधिकतम 10 प्रतिशत की मंत्रि-परिषद्, जो विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
    • सीमाएँ: संसद की अभिभावी शक्ति; धन विधेयक केवल उप-राज्यपाल की सिफ़ारिश पर; मुख्यमंत्री की नियुक्ति उप-राज्यपाल करते हैं, और अखिल भारतीय सेवाओं, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो तथा विधान सभा की शक्ति से बाहर के विषयों पर वे विवेक से कार्य करते हैं।
    • संदर्भ: 2024 का पहला चुनाव; राज्य का दर्जा यथाशीघ्र बहाल करने का उच्चतम न्यायालय का निर्देश।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि यह विधान सभा केंद्र शासित प्रदेश के ढाँचे के भीतर निर्वाचित सरकार लौटाती है, और उसकी शक्तियाँ राज्य का दर्जा बहाल होने पर ही बढ़ेंगी।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2016, सामान्य अध्ययन-IIभारतीय संविधान का अनुच्छेद 370, जिसके साथ हाशिया नोट “जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अस्थायी उपबन्ध” लगा हुआ है, किस सीमा तक अस्थायी है ? भारतीय राज्य-व्यवस्था के संदर्भ में इस उपबन्ध की भावी सम्भावनाओं पर चर्चा कीजिए ।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: चर्चा कीजिए · दृष्टिकोण: पहले बताएँ कि अनुच्छेद को अस्थायी क्यों कहा गया, फिर यह कि वह स्थायी क्यों माना जाने लगा, और अंत में उसका भविष्य, जैसा कि अब तय हो चुका है।

    भूमिका: भाग XXI, 'अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध', में अनुच्छेद 370 के स्थान और उसे अस्थायी बताने वाले हाशिया नोट से शुरुआत करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • अस्थायी: इसका दायरा राज्य की संविधान सभा पर निर्भर था, जो इसे निरस्त या संशोधित करने की सिफ़ारिश कर सकती थी।
    • स्थायी माना गया: संविधान सभा 25 जनवरी 1957 को बिना किसी सिफ़ारिश के भंग हो गई; 1954 के आदेश और अनुच्छेद 35क ने राज्य का अलग दर्जा गढ़ा।
    • भविष्य, जैसा अब तय हुआ: अगस्त 2019 के संविधान आदेश 272 और 273; 2023 की संविधान पीठ ने अनुच्छेद को अस्थायी माना और उसकी समाप्ति को वैध ठहराया, साथ ही राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अस्थायी होने का प्रश्न 2019 के आदेशों और 2023 के निर्णय से तय हो चुका है; खुला प्रश्न अब राज्य के दर्जे का है।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2015 (हिंदी रूपांतर)भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची के उपबन्ध किसके लिए बनाए गए हैं?
    1. a अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा
    2. b राज्यों के बीच सीमाओं का निर्धारण
    3. c पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकार और उत्तरदायित्वों का निर्धारण
    4. d सभी सीमावर्ती राज्यों के हितों की रक्षा
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: चरण 1: याद करें कि दोनों अनुसूचियाँ किस पर लागू होती हैं। अनुच्छेद 244 पाँचवीं अनुसूची को अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों पर, और छठी को असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू करता है। चरण 2: दोनों का संबंध अनुसूचित जनजातियों से है, इसलिए दोनों का साझा उद्देश्य जनजातीय हितों की रक्षा है। चरण 3: अन्य विकल्प संविधान के दूसरे भागों का वर्णन करते हैं।

    इस भ्रम से बचें: सीमावर्ती राज्य और सीमाएँ इसलिए आकर्षक लगते हैं कि छठी अनुसूची वाले राज्य सीमा पर हैं, किन्तु ये अनुसूचियाँ जनजातियों के बारे में हैं, सीमाओं के बारे में नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा: सही। दोनों अनुसूचियाँ अनुसूचित क्षेत्रों और ज़िला परिषदों के माध्यम से यही करती हैं।
    • (b) राज्यों के बीच सीमाओं का निर्धारण: गलत। सीमाएँ संसद अनुच्छेद 3 के अंतर्गत बदलती है, इन अनुसूचियों से नहीं।
    • (c) पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकार और उत्तरदायित्वों का निर्धारण: गलत। यह भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची का विषय है।
    • (d) सभी सीमावर्ती राज्यों के हितों की रक्षा: गलत। अनेक सीमावर्ती राज्यों में छठी अनुसूची के क्षेत्र नहीं हैं; ये अनुसूचियाँ जनजातीय क्षेत्रों के अनुसार चलती हैं।

    उत्तर: अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि दोनों अनुसूचियाँ जनजातीय क्षेत्रों का शासन तय करती हैं।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2010 (हिंदी रूपांतर)पांडिचेरी (अब पुडुचेरी) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. पांडिचेरी पर अधिकार करने वाली पहली यूरोपीय शक्ति पुर्तगाली थी।
    2. पांडिचेरी पर अधिकार करने वाली दूसरी यूरोपीय शक्ति फ्रांसीसी थी।
    3. अंग्रेज़ों ने पांडिचेरी पर कभी अधिकार नहीं किया।

    उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2 और 3
    3. c केवल 3
    4. d 1, 2 और 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 सही है, क्योंकि औपनिवेशिक काल 1521 में पुर्तगालियों से शुरू हुआ। चरण 2: कथन 2 गलत है। डच और डेनिश 17वीं शताब्दी में आए, अर्थात् 1674 में फ्रांसीसियों के बसने से पहले, इसलिए फ्रांसीसी दूसरे नहीं थे। चरण 3: कथन 3 गलत है, क्योंकि अंग्रेज़ों ने 1761 में पांडिचेरी पर कब्ज़ा किया और 1763 में लौटाया। चरण 4: केवल कथन 1 सही है, अतः उत्तर विकल्प (a) है।

    इस भ्रम से बचें: पांडिचेरी फ्रांसीसियों से इतना जुड़ा है कि लगता है वे जल्दी आए होंगे; वास्तव में वे तीन अन्य शक्तियों के बाद आए।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: सही। पुर्तगाली सबसे पहले, 1521 में आए।
    • (b) केवल 2 और 3: गलत। डच और डेनिश फ्रांसीसियों से पहले आए, और अंग्रेज़ों ने 1761 में पांडिचेरी पर कब्ज़ा किया।
    • (c) केवल 3: गलत। अंग्रेज़ों ने 1761 में इस पर कब्ज़ा किया और 1763 में पेरिस की संधि से लौटाया।
    • (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 2 और 3, दोनों गलत हैं।

    उत्तर: केवल 1: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि पुर्तगाली सबसे पहले आए और शेष दोनों कथन गलत हैं।

  5. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2012 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. राज्य सभा में केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व नहीं है।
    2. निर्वाचन संबंधी विवादों का न्यायनिर्णयन मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकार-क्षेत्र में है।
    3. भारत के संविधान के अनुसार संसद में केवल लोक सभा और राज्य सभा होती हैं।

    उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b 2 और 3
    3. c 1 और 3
    4. d कोई नहीं
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 गलत है। चौथी अनुसूची दिल्ली (3) और पुडुचेरी (1) को, और आज जम्मू-कश्मीर (4) को भी, राज्य सभा की सीटें देती है। चरण 2: कथन 2 गलत है। अनुच्छेद 329(ख) के अनुसार निर्वाचन पर प्रश्न केवल निर्वाचन याचिका से उठाया जा सकता है, जिसका निर्णय न्यायालय करते हैं, मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं। चरण 3: कथन 3 गलत है। अनुच्छेद 79 के अनुसार संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों से मिलकर बनती है। चरण 4: कोई कथन सही नहीं, अतः उत्तर विकल्प (d) है।

    इस भ्रम से बचें: कथन 3 सही लगता है, क्योंकि आम बोलचाल में संसद को दो सदन मान लिया जाता है, किन्तु अनुच्छेद 79 में राष्ट्रपति भी शामिल हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: गलत। विधान सभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों की राज्य सभा में सीटें हैं।
    • (b) 2 और 3: गलत। निर्वाचन विवाद निर्वाचन याचिका से न्यायालय में जाते हैं, और संसद में राष्ट्रपति भी शामिल हैं।
    • (c) 1 और 3: गलत। दोनों कथन गलत हैं।
    • (d) कोई नहीं: सही। तीनों कथन गलत हैं।

    उत्तर: कोई नहीं: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि हर कथन संविधान के विपरीत है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख विधान सभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों को संविधान, पुनर्गठन अधिनियम और उसके संशोधनों, उच्चतम न्यायालय के निर्णय, आधिकारिक विज्ञप्तियों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।