परिचय
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी, या आनुवंशिक इंजीनियरिंग, किसी जीव से चुना हुआ जीन प्रतिबंधन एंजाइमों से काटती है, डीएनए लाइगेज से उसे संवाहक से जोड़ती है और परपोषी में डालती है, जहाँ उसकी प्रतियाँ बनती हैं और वह अभिव्यक्त होता है। पीसीआर, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, जीनोम अनुक्रमण और क्रिस्पर-कैस9 जीन संपादन के साथ यह चिकित्सा, कृषि, न्यायालयिक विज्ञान और उद्योग में आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का आधार है।
जैव प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक इंजीनियरिंग के सिद्धांत
जैव प्रौद्योगिकी क्या है: पारंपरिक और आधुनिक
जैव प्रौद्योगिकी व्यवहार में पुरानी है, पर उसकी विधियाँ नई हैं। दही, डबलरोटी या मदिरा बनाने में सूक्ष्मजीव काम करते हैं, इसलिए व्यापक अर्थ में यह भी जैव प्रौद्योगिकी है। आज यह शब्द सीमित अर्थ में उन प्रक्रमों के लिए प्रयुक्त होता है, जो आनुवंशिकतः रूपांतरित जीवों से बड़े पैमाने पर उत्पाद बनाते हैं। परखनली शिशु के लिए पात्रे निषेचन, जीन का संश्लेषण और उपयोग, डीएनए टीका बनाना और दोषपूर्ण जीन को ठीक करना, ये सब इसी के अंतर्गत आते हैं।
यूरोपीय जैव प्रौद्योगिकी संघ (European Federation of Biotechnology) की परिभाषा पुराने और नए, दोनों अर्थों को समेटती है: ‘उत्पादों और सेवाओं के लिए प्राकृतिक विज्ञान तथा जीवों, कोशिकाओं, उनके भागों और आण्विक अनुरूपों का समन्वय’। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी दो तकनीकों से संभव हुई:
- आनुवंशिक इंजीनियरिंग (genetic engineering): आनुवंशिक पदार्थ, अर्थात् डीएनए और आरएनए, के रसायन में परिवर्तन करके उसे परपोषी जीव (host organism) में प्रवेश कराना, ताकि परपोषी के लक्षण बदल जाएँ।
- जैव प्रक्रम इंजीनियरिंग (bioprocess engineering): बड़े संवर्धन को दूसरे सूक्ष्मजीवों के संदूषण से मुक्त रखना, ताकि केवल वांछित सूक्ष्मजीव या कोशिका ही बढ़े और प्रतिजैविक, टीके तथा एंजाइम पर्याप्त मात्रा में बन सकें।
आनुवंशिक इंजीनियरिंग और पुनर्योगज डीएनए: एक जीन कैसे स्थानांतरित होता है
पारंपरिक संकरण में जीनों के दो पूरे समूह मिलते हैं, इसलिए वांछित जीन के साथ अवांछित जीन भी आ जाते हैं। आनुवंशिक इंजीनियरिंग इस कमी को दूर करती है। पुनर्योगज डीएनए (recombinant DNA), अर्थात् विभिन्न स्रोतों के डीएनए को जोड़कर बना डीएनए, जीन क्लोनिंग और जीन स्थानांतरण की सहायता से यह केवल एक, या कुछ, वांछित जीनों को चुनकर लक्ष्य जीव में पहुँचाती है।
किसी कोशिका में डाला गया विजातीय डीएनए का खंड अपने आप गुणित नहीं हो पाता। वह तभी गुणित होता है, जब वह प्रतिकृति के मूल (origin of replication) नामक अनुक्रम से जुड़ा हो, जहाँ से प्रतिकृतियन शुरू होता है। ऐसे अनुक्रम से जुड़कर विजातीय डीएनए परपोषी के अपने डीएनए के साथ प्रतिकृति बनाता है और अगली पीढ़ी में जाता है। किसी डीएनए की इस प्रकार अनेक समान प्रतियाँ बनाना क्लोनिंग कहलाता है।
पहला पुनर्योगज डीएनए 1972 में स्टेनले कोहेन और हर्बर्ट बॉयर ने बनाया। उन्होंने सालमोनेला टाइफीम्यूरियम के प्लास्मिड से प्रतिजैविक प्रतिरोध का जीन काटकर दूसरे प्लास्मिड से जोड़ा और उसे एशरिशिया कोलाई में डाला, जिसने उसकी प्रतियाँ बनाईं। हर आनुवंशिक रूपांतरण आज भी उन्हीं तीन चरणों से होता है:
- वांछित जीन वाले डीएनए की पहचान।
- पहचाने गए डीएनए का परपोषी में प्रवेश।
- प्रविष्ट डीएनए को परपोषी में बनाए रखना और उसकी संतति तक पहुँचाना।
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के उपकरण
प्रतिबंधन एंजाइम: आण्विक कैंची
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के लिए कुछ मुख्य उपकरण चाहिए: डीएनए काटने के लिए प्रतिबंधन एंजाइम, उसकी प्रतियाँ बनाने के लिए पॉलिमरेज एंजाइम, जोड़ने के लिए लाइगेज, ले जाने के लिए संवाहक (vector) और उसे रखने के लिए परपोषी जीव। इनमें सबसे पहले प्रतिबंधन एंजाइम (restriction enzymes) मिले। 1963 में ई. कोलाई में जीवाणुभोजी की वृद्धि रोकने वाले दो एंजाइम पृथक किए गए; एक डीएनए में मिथाइल समूह जोड़ता था और दूसरा डीएनए को काटता था।
पाँच वर्ष बाद पहला ऐसा प्रतिबंधन एंजाइम, हिंड II (Hind II), मिला, जो डीएनए को एक निश्चित अनुक्रम पहचानकर ही काटता था। यह डीएनए को सदा छह क्षारक युग्मों के एक अनुक्रम पर काटता था, जिसे उसका पहचान अनुक्रम (recognition sequence) कहते हैं। आज 900 से अधिक प्रतिबंधन एंजाइम ज्ञात हैं, जो जीवाणुओं के 230 से अधिक प्रभेदों से पृथक किए गए हैं। इस वर्ग के एंजाइमों की खोज के लिए वर्नर आर्बर, हैमिल्टन स्मिथ और डैनियल नाथन्स को 1978 का शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला।
- प्रतिबंधन एंजाइमों का नामकरण: नाम का पहला अक्षर जीवाणु के वंश से और अगले दो अक्षर उसकी जाति से लिए जाते हैं; फिर प्रभेद का अक्षर और खोज के क्रम का रोमन अंक आता है। इको आर I (EcoRI) एशरिशिया कोलाई आर वाई 13 से मिला है।
- एक्सोन्यूक्लिएज और एंडोन्यूक्लिएज: एक्सोन्यूक्लिएज डीएनए के सिरों से न्यूक्लियोटाइड हटाते हैं; एंडोन्यूक्लिएज, जिनमें प्रतिबंधन एंजाइम आते हैं, डीएनए को भीतर विशिष्ट स्थलों पर काटते हैं।
- पैलिंड्रोमिक अनुक्रम: हर प्रतिबंधन एंजाइम एक पैलिंड्रोम पहचानता है, अर्थात् ऐसा अनुक्रम जो एक ही दिशा में पढ़ने पर दोनों लड़ियों पर एक-सा हो, जैसे GAATTC के सामने CTTAAG।
- चिपचिपे सिरे (sticky ends): अधिकतर एंजाइम पहचान स्थल के केंद्र से थोड़ा हटकर, किंतु दोनों लड़ियों पर उन्हीं दो क्षारकों के बीच काटते हैं। इससे सिरों पर छोटे एकल-लड़ी वाले भाग बचते हैं, जो उसी एंजाइम से कटे किसी भी दूसरे सिरे से जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, इको आर I अनुक्रम GAATTC को हर लड़ी पर G और A के बीच काटता है और चार क्षारकों वाले AATT सिरे छोड़ता है।
इसके बाद डीएनए लाइगेज (DNA ligase) जोड़ को बंद करता है। एक ही प्रतिबंधन एंजाइम से कटे संवाहक और जीन के चिपचिपे सिरे मेल खाते हैं, इसलिए लाइगेज उन्हें एक पुनर्योगज अणु में जोड़ देता है; अलग-अलग एंजाइमों से कटे होने पर वे सामान्यतः नहीं जुड़ते।
जेल वैद्युत कण संचलन: डीएनए खंडों का पृथक्करण
डीएनए को काटने से खंडों का मिश्रण मिलता है, जिसे जेल वैद्युत कण संचलन (gel electrophoresis) आकार के अनुसार अलग करता है। डीएनए पर ऋणात्मक आवेश होता है, इसलिए विद्युत क्षेत्र में वह जेल से होकर धनात्मक इलेक्ट्रोड, अर्थात् ऐनोड, की ओर बढ़ता है। सामान्यतः ऐगारोज जेल प्रयुक्त होता है, जो समुद्री घास से निकाला गया प्राकृतिक बहुलक है और छलनी का काम करता है: खंड जितना छोटा, वह उतना दूर जाता है।
- पट्टियाँ देखना: साधारण प्रकाश में डीएनए दिखाई नहीं देता। उसे इथीडियम ब्रोमाइड से अभिरंजित करके पराबैंगनी प्रकाश में चमकीली नारंगी पट्टियों के रूप में देखा जाता है।
- क्षालन (elution): जेल से पट्टी काटकर उसका डीएनए निकाला जाता है और पुनर्योगज डीएनए बनाने में लगाया जाता है।
- पाचन की जाँच: इसी विधि से पता चलता है कि प्रतिबंधन एंजाइम ने काटना पूरा किया या नहीं।
जीन क्लोनिंग संवाहक: प्लास्मिड, pBR322 और टी आई प्लास्मिड
क्लोनिंग संवाहक (cloning vector) वह डीएनए अणु है, जो विजातीय जीन को परपोषी में ले जाता है और वहाँ उसकी प्रतियाँ बनवाता है। प्लास्मिड, अर्थात् जीवाणुओं के भीतर स्वयं प्रतिकृति बनाने वाले छोटे वृत्ताकार डीएनए, और जीवाणुभोजी, अर्थात् जीवाणुओं के विषाणु, सामान्य संवाहक हैं। किसी प्लास्मिड की प्रति कोशिका एक या दो प्रतियाँ होती हैं, तो किसी की 15 से 100, और उससे जुड़ा जीन भी उतनी ही प्रतियों में बनता है। अच्छे संवाहक में चार विशेषताएँ होती हैं:
- प्रतिकृति का मूल (ori): वह अनुक्रम, जहाँ से प्रतिकृतियन शुरू होता है; यही जुड़े डीएनए की प्रतियों की संख्या भी तय करता है।
- वरणयोग्य चिह्नक (selectable marker): प्रायः एम्पिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन या केनामाइसिन जैसे प्रतिजैविक के प्रति प्रतिरोध का जीन, जिससे केवल रूपांतरित कोशिकाएँ बचती हैं।
- क्लोनिंग स्थल: संवाहक में हर सामान्य प्रतिबंधन एंजाइम का एक ही पहचान स्थल होना चाहिए, ताकि संवाहक एक ही जगह खुले।
- पुनर्योगजों को पहचानने की विधि: ई. कोलाई के संवाहक pBR322 में BamH I स्थल पर डाला गया जीन टेट्रासाइक्लिन प्रतिरोध को निष्क्रिय कर देता है; पुनर्योगज कोशिकाएँ एम्पिसिलिन पर बढ़ती हैं, टेट्रासाइक्लिन पर नहीं। नए संवाहकों में डाला गया जीन β-गैलेक्टोसिडेज के जीन को तोड़ देता है, इसलिए पुनर्योगज कॉलोनियाँ रंगहीन रहती हैं और बाकी नीली हो जाती हैं; इसे निवेशी निष्क्रियता (insertional inactivation) कहते हैं।
पादपों और जंतुओं में जीन पहुँचाने के उपकरण रोगजनकों से लिए गए हैं। एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस स्वाभाविक रूप से डीएनए का एक खंड, टी-डीएनए, द्विबीजपत्री पादपों की कोशिकाओं में पहुँचाकर उन्हें अर्बुद में बदल देता है। इसके अर्बुद-प्रेरक (टी आई) प्लास्मिड को ऐसा संवाहक बना दिया गया है, जो रोग नहीं करता पर जीन पहुँचाता है। पश्च विषाणु (retroviruses), जो जंतु कोशिकाओं को कैंसरकारी बना सकते हैं, इसी तरह अहानिकारक बनाकर जंतु कोशिकाओं में जीन पहुँचाने के काम में लिए जाते हैं।
सक्षम परपोषी और जीन स्थानांतरण की विधियाँ
डीएनए अपने आप कोशिका झिल्ली के पार नहीं जा सकता, इसलिए परपोषी कोशिका को उसे लेने के लिए सक्षम (competent) बनाना पड़ता है। जीवाणुओं को कैल्सियम जैसे द्विसंयोजी धनायन से उपचारित किया जाता है, पुनर्योगज डीएनए के साथ बर्फ पर रखा जाता है, फिर थोड़ी देर 42 डिग्री सेल्सियस का तापप्रघात (heat shock) देकर वापस बर्फ पर रखा जाता है। दूसरे परपोषियों के लिए दूसरी विधियाँ हैं:
- सूक्ष्म अंतःक्षेपण (microinjection): पुनर्योगज डीएनए को सीधे जंतु कोशिका के केंद्रक में अंतःक्षेपित किया जाता है।
- बायोलिस्टिक या जीन गन: पादप कोशिकाओं पर डीएनए से लिपटे स्वर्ण या टंगस्टन के सूक्ष्म कणों की बौछार की जाती है।
- अहानिकारक रोगजनक संवाहक: अहानिकारक टी आई प्लास्मिड या पश्च विषाणु जैसा संवाहक कोशिका को संक्रमित करके डीएनए भीतर पहुँचाता है।
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के प्रक्रम
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के चरण: जीन से उत्पाद तक
- डीएनए का पृथक्करण: कोशिकाओं को एंजाइमों से तोड़ा जाता है, जीवाणुओं के लिए लाइसोजाइम, पादप कोशिकाओं के लिए सेलुलेज और कवक के लिए काइटिनेज। राइबोन्यूक्लिएज आरएनए को और प्रोटीएज प्रोटीन को हटाता है, और द्रुतशीतित एथेनॉल डालने पर शुद्ध डीएनए महीन धागों के रूप में अवक्षेपित हो जाता है।
- विशिष्ट स्थलों पर काटना: डीएनए और संवाहक को एक ही प्रतिबंधन एंजाइम से काटा जाता है, और ऐगारोज जेल वैद्युत कण संचलन से काटने की जाँच होती है।
- जोड़ना: उपयोगी जीन और खुले संवाहक को डीएनए लाइगेज के साथ मिलाया जाता है, जिससे पुनर्योगज डीएनए बनता है।
- पीसीआर से प्रवर्धन: यदि पहले जीन की बहुत-सी प्रतियाँ चाहिए, तो वे पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया से बनाई जाती हैं।
- परपोषी में निवेशन: सक्षम कोशिकाएँ पुनर्योगज डीएनए लेती हैं, और एम्पिसिलिन प्रतिरोध जैसा वरणयोग्य चिह्नक रूपांतरित कोशिकाओं को छाँट देता है।
- उत्पाद प्राप्त करना: परपोषी जीन को अभिव्यक्त करता है। किसी विजातीय परपोषी में अभिव्यक्त जीन से बना प्रोटीन पुनर्योगज प्रोटीन कहलाता है।
पीसीआर तकनीक: पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया
पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया (पीसीआर) के लिए चाहिए: वह डीएनए जिसकी प्रतियाँ बनानी हैं, दो उपक्रामक (primers), अर्थात् रासायनिक रूप से बनाए गए छोटे डीएनए खंड जो लक्ष्य खंड के दोनों सिरों से मेल खाते हैं, चारों न्यूक्लियोटाइड और एक डीएनए पॉलिमरेज। इसका आविष्कार 1983 में अमेरिकी जैव-रसायनज्ञ कैरी मुलिस ने किया।
- निष्क्रियकरण (denaturation): मिश्रण को 94 से 98 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है, और डीएनए की दोनों लड़ियाँ अलग हो जाती हैं।
- तापानुशीलन (annealing): उसे 50 से 65 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जाता है, और उपक्रामक हर एकल लड़ी पर अपने मेल वाले स्थान से जुड़ जाते हैं।
- प्रसार (extension): लगभग 72 डिग्री सेल्सियस पर पॉलिमरेज उपक्रामकों को बढ़ाकर नई लड़ियाँ बनाता है।
हर चक्र उपक्रामकों के बीच के खंड को दोगुना कर देता है, इसलिए बार-बार के चक्रों से उसकी लगभग एक अरब प्रतियाँ बन जाती हैं। यह इसलिए संभव है कि इसमें प्रयुक्त एंजाइम, ताप-प्रेमी जीवाणु थर्मस एक्वेटिकस से मिला टैक पॉलिमरेज, हर निष्क्रियकरण के ऊँचे ताप में भी सक्रिय रहता है। इसके प्रयोग से पहले हर चक्र के बाद नया एंजाइम डालना पड़ता था।
बायोरिएक्टर और अनुप्रवाह संसाधन
प्रयोगशाला के फ्लास्क में काम करने वाले जीन से उपयोगी मात्रा में उत्पाद पाने के लिए उत्पादन बढ़ाना पड़ता है। सतत संवर्धन में एक ओर से प्रयुक्त माध्यम निकाला जाता है और दूसरी ओर से ताज़ा माध्यम डाला जाता है, जिससे कोशिकाएँ अपनी सबसे सक्रिय अवस्था में बनी रहती हैं। अधिक मात्रा के लिए संवर्धन को बायोरिएक्टर में बढ़ाया जाता है, जो 100 से 1,000 लीटर का पात्र है और ताप, पीएच, पोषक तत्वों और ऑक्सीजन को अनुकूलतम रखता है।
- विलोडन हौज बायोरिएक्टर (stirred-tank bioreactor): सबसे अधिक प्रयुक्त प्रकार, घुमावदार आधार वाला बेलन; विलोडक, या भीतर से गुज़ारी गई निर्जीवीकृत हवा, संवर्धन को मिलाती है और ऑक्सीजन फैलाती है।
- नियंत्रण तंत्र: प्रक्षोभक तंत्र, ऑक्सीजन प्रदाय तंत्र, झाग नियंत्रण, ताप और पीएच नियंत्रण, और थोड़ा-थोड़ा नमूना निकालने के द्वार।
- अनुप्रवाह संसाधन (downstream processing): उत्पाद का पृथक्करण और शोधन, परिरक्षकों के साथ उसका संरूपण, औषधि होने पर चिकित्सीय परीक्षण और कड़ा गुणवत्ता नियंत्रण।
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग और जीनोम अनुक्रमण
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग क्या है: वीएनटीआर और उपयोग
मानव डीएनए के लगभग 99.9 प्रतिशत क्षारक सभी लोगों में एक-से होते हैं, इसलिए पूरे जीनोम की तुलना धीमी है। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग (DNA fingerprinting) केवल पुनरावृत्त डीएनए (repetitive DNA) को देखती है, अर्थात् वे भाग जिनमें एक छोटा अनुक्रम बार-बार दोहराया जाता है। ये भाग सैटेलाइट डीएनए के अंग हैं, जिसे माइक्रोसैटेलाइट, मिनीसैटेलाइट आदि में बाँटा जाता है; ये प्रोटीन का कूटलेखन नहीं करते, और इनमें दोहराव की संख्या व्यक्ति-व्यक्ति में बहुत बदलती है।
लेस्टर विश्वविद्यालय के एलेक जेफ़्रीज़ ने 1984 में यह तकनीक विकसित की। उन्होंने वीएनटीआर (variable number of tandem repeats) नामक मिनीसैटेलाइट का उपयोग किया, जिसकी लंबाई 0.1 से 20 किलो क्षारक तक होती है। मूल विधि के छह चरण थे:
- डीएनए का पृथक्करण।
- प्रतिबंधन एंजाइमों से पाचन।
- वैद्युत कण संचलन से खंडों का पृथक्करण।
- खंडों को नाइट्रोसेलुलोस या नायलॉन की झिल्ली पर स्थानांतरित करना (साउदर्न ब्लॉटिंग)।
- चिह्नित वीएनटीआर संपरीक्षित्र (probe) से संकरण।
- स्वविकिरणी चित्रण (autoradiography) से पट्टियों की पहचान।
पट्टियाँ हर व्यक्ति का अपना पैटर्न बनाती हैं। रक्त, बाल की जड़, त्वचा, अस्थि, लार या शुक्राणु, किसी से भी लिया गया डीएनए एक ही पैटर्न देता है, इसलिए यह न्यायालयिक विज्ञान का साधन है; और दोहराव माता-पिता से संतान में जाते हैं, इसलिए यह पितृत्व परीक्षण का आधार है। पीसीआर के बाद एक कोशिका का डीएनए भी पर्याप्त है। आज प्रयोगशालाएँ प्रायः लघु अग्रानुक्रमिक पुनरावृत्तियों (short tandem repeats, STR) की तुलना करती हैं, जो माइक्रोसैटेलाइट के छोटे दोहराव हैं।
माइक्रोसैटेलाइट डीएनए, DNA बारकोडिंग और पर्यावरणीय डीएनए
जो विविधता किसी व्यक्ति को पहचानती है, वही समष्टियों और जातियों को भी अलग करती है। माइक्रोसैटेलाइट, अर्थात् अग्रानुक्रम में दोहराए गए छोटे अनुक्रम, डीएनए के अधिकतर भागों से तेज़ी से उत्परिवर्तित होते हैं, इसलिए इनमें बहुत विविधता होती है। इनका उपयोग डीएनए प्रोफ़ाइलिंग और संबंधों के विश्लेषण में होता है। समष्टि आनुवंशिकी में ये मापते हैं कि उपजातियाँ और समष्टियाँ आपस में कितनी निकट हैं, इसलिए जातियों के बीच विकासपरक संबंधों के अध्ययन में काम आते हैं।
- DNA बारकोडिंग: डीएनए का एक छोटा, मानक खंड किसी जाति को पहचानता है, जैसे बारकोड किसी उत्पाद को। जंतुओं के लिए प्रायः सूत्रकणिका के जीन साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज I (COI) का एक भाग लिया जाता है। यह एक-सी दिखने वाली जातियों को अलग करता है और प्रसंस्कृत खाद्य में अघोषित पादप या जंतु सामग्री पकड़ता है; यह किसी जीव की आयु नहीं बता सकता।
- पर्यावरणीय डीएनए (environmental DNA, eDNA): जीव मिट्टी, जल और वायु में डीएनए छोड़ते हैं। इसे एकत्र करके अनुक्रमित करने पर पता चलता है कि किसी पर्यावास में कौन-सी जातियाँ रहती हैं, उन संकटग्रस्त जंतुओं सहित जो कम दिखाई देते हैं।
- मेटाजिनोमिक्स (metagenomics): किसी पर्यावरण के सभी जीवों के समस्त आनुवंशिक पदार्थ का अध्ययन, हर जाति का अलग संवर्धन किए बिना। एरियल मेटाजिनोमिक्स किसी पर्यावास की वायु में मौजूद डीएनए को एक बार में एकत्र करता है।
मानव जीनोम परियोजना और जीनोम अनुक्रमण
किसी जीव के डीएनए के क्षारकों का पूरा क्रम पढ़ना जीनोम अनुक्रमण (genome sequencing) कहलाता है। फ्रेडरिक सैंगर की 1977 की विधि लगभग 40 वर्षों तक सबसे अधिक प्रयुक्त रही; बाद में व्यापक समांतर, या अगली पीढ़ी के, अनुक्रमण ने, जो एक साथ डीएनए के बहुत बड़ी संख्या में खंड पढ़ता है, लागत बहुत घटा दी। खमीर सैकेरोमाइसीज़ सेरेविसी पहला यूकैरियोट था, जिसका जीनोम पूरा अनुक्रमित हुआ; यह 1996 में जारी हुआ।
मानव जीनोम परियोजना 1990 में शुरू होकर 2003 में पूरी हुई। तेरह वर्ष के इस प्रयास का समन्वय अमेरिका के ऊर्जा विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने किया, और ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी तथा चीन इसके सहभागी थे। जीनोम को खंडों में तोड़कर जीवाणु और यीस्ट के कृत्रिम गुणसूत्रों में क्लोन किया गया, अनुक्रमित किया गया और कंप्यूटर से फिर जोड़ा गया। इसी काम से जैव सूचना-विज्ञान (bioinformatics) बढ़ा, अर्थात् जैविक आँकड़ों के भंडारण और विश्लेषण में कंप्यूटर का उपयोग। इसके मुख्य निष्कर्ष:
- मानव जीनोम में 3,164.7 मिलियन क्षारक हैं।
- इसका 2 प्रतिशत से कम भाग प्रोटीन का कूटलेखन करता है; बहुत बड़ा भाग दोहराए गए अनुक्रमों का है।
- गुणसूत्र 1 में सबसे अधिक जीन हैं, 2,968, और Y गुणसूत्र में सबसे कम, 231।
- लगभग 14 लाख स्थान मिले, जहाँ लोगों में एकल क्षारक भिन्न होते हैं; ये एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता (single nucleotide polymorphisms, SNP) रोग से जुड़े जीनों का स्थान खोजने में सहायक हैं।
जीन मानचित्र, फ़सल जीनोम और जीनोम इंडिया परियोजना
गुणसूत्रों पर जीनों और डीएनए सूचकों (markers) के स्थान का मानचित्र व्यावहारिक रूप से उपयोगी है। मवेशियों, सूअरों और मुर्गियों में मानचित्रित सूचकों से जनकत्व पता किया जाता है, और रोग प्रतिरोध से जुड़ा सूचक प्रजनकों को रोग की प्रतीक्षा किए बिना प्रतिरोधी पादप और जंतु चुनने देता है; इस विधि को सूचक-सहायित चयन (marker-assisted selection) कहते हैं।
किसी फ़सल का जीनोम अनुक्रमण यही काम बड़े पैमाने पर करता है। 2011-12 में भारतीय वैज्ञानिकों ने अरहर का जीनोम पढ़ा, जो पूर्णतः भारतीय संस्थानों द्वारा अनुक्रमित पहला पादप जीनोम था; इसके 47,004 प्रोटीन-कूटलेखी जीनों में 1,213 रोग प्रतिरोध के और 152 सूखा, ताप तथा लवणता सहने के हैं, और इस अनुक्रम से नई किस्मों के प्रजनन में तेज़ी आने की आशा है। किसी रोगजनक का जीनोम पढ़ने से वे प्रभावक प्रोटीन पता चलते हैं, जिनसे वह फ़सल पर आक्रमण करता है, और इससे फ़सल के मेल खाने वाले प्रतिरोधी जीन खोजने में सहायता मिलती है। किसी कोशिका में अभिव्यक्त सभी आरएनए अणुओं का समूह, ट्रांसक्रिप्टोम (transcriptome), बताता है कि कौन-से जीन वास्तव में काम में हैं।
- जीनोम इंडिया: जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने 99 स्थलों की 83 समष्टियों के 10,074 स्वस्थ व्यक्तियों के पूरे जीनोम अनुक्रमित किए; इनमें लगभग 36.7 प्रतिशत ग्रामीण, 32.2 प्रतिशत शहरी और 31.1 प्रतिशत जनजातीय थे।
- भारतीय जैविक आँकड़ा केंद्र (IBDC): 9 जनवरी 2025 को जारी ये आँकड़े इस राष्ट्रीय भंडार में रखे गए हैं और बायोटेक-प्राइड दिशानिर्देशों के अंतर्गत शोधकर्ताओं को दिए जाते हैं; आगे एक करोड़ जीनोम अनुक्रमित करने का लक्ष्य घोषित हुआ है।
- भारतीय आँकड़ों की आवश्यकता: भारतीय आनुवंशिक विविधता की सूची भारत की अपनी समष्टियों के लिए निदान चिप, निदान और उपचार बनाने देती है।
जीनोम संपादन और क्रिस्पर-कैस9
क्रिस्पर का पूरा नाम और क्रिस्पर-कैस9 कैसे काम करता है
जीनोम संपादन (genome editing) किसी जीवित जीव के डीएनए को चुने हुए स्थान पर बदलता है, जबकि पुरानी आनुवंशिक इंजीनियरिंग बाहर से जीन जोड़ती थी। इसका सबसे प्रसिद्ध उपकरण एक जीवाणु रक्षा तंत्र से निकला। जीवाणुओं और आर्किया के क्रिस्पर अनुक्रम उन विषाणुओं के डीएनए के टुकड़े सँजोकर रखते हैं, जिन्होंने कभी उन पर आक्रमण किया था; इन दोहरावों का अध्ययन करने वाले पहले वैज्ञानिकों में स्पेन के सूक्ष्मजीव-वैज्ञानिक फ़्रांसिस्को मोहिका थे। वही विषाणु लौटने पर सँजोए टुकड़े से बना आरएनए कैस9 (Cas9) प्रोटीन को विषाणु के डीएनए तक ले जाता है, और कैस9 उसे काट देता है।
- खोजना: मार्गदर्शक आरएनए में लक्ष्य से मेल खाने वाला 20 न्यूक्लियोटाइड का अनुक्रम होता है। कैस9 डीएनए को जाँचता है और वहीं जुड़ता है, जहाँ यह मेल NGG जैसे छोटे प्रोटोस्पेसर समीपस्थ मोटिफ़ (protospacer adjacent motif, PAM) के पास हो।
- काटना: आरएनए-निर्देशित एंडोन्यूक्लिएज कैस9 दोनों लड़ियों को काटता है, अर्थात् द्वि-लड़ी विच्छेद (double-strand break) बनाता है।
- सिरे जोड़कर मरम्मत: कोशिका की नॉन-होमोलोगस एंड जॉइनिंग (NHEJ) विच्छेद को जोड़ती है, पर प्रायः कुछ क्षारक जोड़ या घटा देती है, जिससे जीन निष्क्रिय हो जाता है।
- साँचे से मरम्मत: यदि वांछित परिवर्तन वाला डीएनए का टुकड़ा दिया जाए, तो होमोलॉजी-निर्देशित मरम्मत (HDR) उसकी प्रतिलिपि बनाती है, जिससे सटीक संपादन होता है।
2012 में जेनिफ़र डाउडना और इमैनुएल शार्पेंटिए ने दो प्राकृतिक आरएनए को जोड़कर एक मार्गदर्शक आरएनए बनाया। इससे यह तंत्र ऐसा उपकरण बन गया, जिसे केवल मार्गदर्शक बदलकर लगभग किसी भी जीन पर लगाया जा सकता है। उन्हें 2020 का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। नए रूप कम काटते हैं और अधिक बारीक संपादन करते हैं: बेस एडिटिंग (base editing) डीएनए की लड़ियाँ तोड़े बिना एक न्यूक्लियोटाइड बदलती है, और प्राइम एडिटिंग (prime editing), एक ‘खोजो और बदलो’ विधि, नई आनुवंशिक सूचना सीधे लक्ष्य स्थल पर लिखती है।
क्रिस्पर जीन संपादन: उपयोग, नैतिकता और भारत में विनियमन
जीनोम संपादन फ़सलों, चिकित्सा और शोध में काम आता है। कृषि में यह विजातीय डीएनए छोड़े बिना पौधे के अपने जीन बदल सकता है, इसलिए इसका विनियमन पुरानी पारजीवी फ़सलों से अलग है। चिकित्सा में यह रोगी की अपनी कोशिकाओं में किसी आनुवंशिक रोग के जीन को ठीक कर सकता है। ऐसी देह कोशिकाओं का संपादन, कायिक संपादन (somatic editing), केवल रोगी को प्रभावित करता है; अंडाणु, शुक्राणु या भ्रूण का संपादन, जनन-लाइन संपादन (germline editing), परिवर्तन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाता है।
- 1989 के नियम: भारत में आनुवंशिकतः इंजीनियरी किए गए जीवों से जुड़ा कार्य परिसंकटमय सूक्ष्मजीवों तथा आनुवंशिकतः इंजीनियरी किए गए जीवों या कोशिकाओं के विनिर्माण, उपयोग, आयात, निर्यात और भंडारण संबंधी नियम, 1989 के अधीन है, जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित हैं; इस अधिनियम का प्रशासन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय करता है।
- प्रयोगशाला पर निगरानी: प्रयोगशाला के कार्य की निगरानी संस्थागत जैव-सुरक्षा समितियाँ (IBSC) और आनुवंशिक हेरफेर समीक्षा समिति (RCGM) करती हैं।
- जीनोम-संपादित पादप: 30 मार्च 2022 के एक कार्यालय ज्ञापन ने SDN-1 और SDN-2 श्रेणियों के उन जीनोम-संपादित पादपों को, जिनमें विजातीय डीएनए नहीं है, नियम 7 से 11 से छूट दी, और उसी वर्ष उनकी समीक्षा की मानक संचालन प्रक्रियाएँ आईं। मई 2025 में भारत ने अपनी पहली दो जीनोम-संपादित धान किस्में, डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा डीएसटी धान 1, घोषित कीं।
- उपचार: जीन-संपादन उपचारों को केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) नई औषधि और नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 के अंतर्गत स्वीकृति देता है, और इसमें जीन चिकित्सा उत्पाद विकास और नैदानिक परीक्षण के राष्ट्रीय दिशानिर्देश, 2019 तथा ICMR के नैतिक दिशानिर्देश मार्ग दिखाते हैं। स्टेम कोशिका दिशानिर्देश जनन-लाइन कोशिकाओं और मानव भ्रूणों के संपादन को केवल प्रयोगशाला अध्ययनों तक सीमित रखते हैं।
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के उपयोग और भारत में अनुप्रयुक्त जैव-प्रौद्योगिकी
पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के उपयोग: चिकित्सा, कृषि और उद्योग
जैव प्रौद्योगिकी के उपयोगों में चिकित्सीय उत्पाद, निदान, आनुवंशिकतः रूपांतरित फ़सलें, प्रसंस्कृत खाद्य, जैव उपचार, अपशिष्ट उपचार और ऊर्जा उत्पादन आते हैं। इनमें से किसी की भी सफलता तीन शोध क्षेत्रों पर निर्भर है: सबसे अच्छा उत्प्रेरक, अर्थात् सुधरा हुआ सूक्ष्मजीव या शुद्ध एंजाइम; उस उत्प्रेरक के लिए सबसे अच्छी परिस्थितियाँ; और उत्पाद को शुद्ध करने के लिए अनुप्रवाह संसाधन।
| क्षेत्र | पुनर्योगज डीएनए और संबंधित उपकरणों का योगदान |
|---|---|
| चिकित्सा | जीवाणुओं में बना मानव इंसुलिन, पुनर्योगज टीके, जीन चिकित्सा, पीसीआर और एलाइजा से निदान |
| कृषि | बैसिलस थुरिंजिएंसिस जीवाणु का कीटनाशी जीन लिए बीटी फ़सलें, ठंड, सूखा, लवण या ताप सहने वाली फ़सलें, जीनोम-संपादित धान |
| शोध | मानव रोगों के प्रतिरूप के रूप में पारजीवी जंतु, जिनमें 95 प्रतिशत से अधिक चूहे हैं |
| न्यायालयिक विज्ञान और वन्यजीव | डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, DNA बारकोडिंग और पर्यावरणीय डीएनए सर्वेक्षण |
| उद्योग और पर्यावरण | एंजाइम, जैव-आधारित रसायन और प्रदूषण साफ़ करने वाले सूक्ष्मजीव |
इनमें चिकित्सा सबसे बड़ा क्षेत्र है, और जीन चिकित्सा और चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी वाला लेख उसे विस्तार से बताता है: इंसुलिन, जीन चिकित्सा, आणविक निदान और जैव-भेषज। टीके और प्रतिरक्षा तंत्र, तथा स्टेम कोशिकाएँ और जंतुओं की क्लोनिंग, अलग लेखों के विषय हैं।
भारत में जैव प्रौद्योगिकी: जैव प्रौद्योगिकी विभाग, BIRAC और BioE3 नीति
भारत ने 1986 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन अलग जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology, DBT) बनाया, जो जैव प्रौद्योगिकी के विकास और व्यावसायीकरण का प्रशासन करता है। हैदराबाद का डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं निदान केंद्र इसके संस्थानों में है, और इसका सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम, जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC), बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट जैसी योजनाओं से स्टार्ट-अप को धन देता है।
- BioE3 नीति: अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार के लिए जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology for Economy, Environment and Employment) नीति को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 अगस्त 2024 को स्वीकृति दी। इसका लक्ष्य जैव-विनिर्माण हब, जैव-एआई हब और बायोफ़ाउंड्री के माध्यम से भारत को रसायनों, एंजाइमों, कृषि और चिकित्सीय उत्पादों के उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण का केंद्र बनाना है।
- जैव-अर्थव्यवस्था का आकार: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 के 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 अरब डॉलर हो गई, और सरकार का लक्ष्य 2030 तक 300 अरब डॉलर है।
- स्टार्ट-अप: जैव प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप 2014 के लगभग 50 से बढ़कर 2023 में 8,500 से अधिक हो गए।
ये उपकरण ठोस रूप से गरीबों तक पहुँचते हैं। पीसीआर पर आधारित परीक्षण एचआईवी और दूसरे संक्रमणों का शीघ्र पता लगाते हैं; बीटी फ़सलें स्वयं कीटों से बचती हैं और उन्हें कम रासायनिक पीड़कनाशी चाहिए; जीनोम-संपादित धान उपज और जल बचत के लिए विकसित किया गया है; और स्वदेशी जीन चिकित्साएँ, जैसे कार-टी चिकित्सा नेक्सकार19 (NexCAR19) और सिकल सेल रोग के लिए बिरसा 101, विदेश में बिकने वाले उपचारों के मूल्य के एक अंश पर उपलब्ध होती हैं।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2013 (हिंदी रूपांतर)पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी (आनुवंशिक इंजीनियरिंग) से जीनों का स्थानांतरण संभव है:
- पादपों की विभिन्न जातियों के बीच
- जंतुओं से पादपों में
- सूक्ष्मजीवों से उच्च जीवों में
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी इसलिए काम करती है कि हर जीव में डीएनए का रसायन एक-सा है, अतः एक जीव से काटा गया जीन संवाहक से जुड़कर दूसरे जीव में काम कर सकता है। कथन 1, पादप जातियों के बीच: हाँ। कथन 2, जंतु जीन पादपों में: हाँ, बाधा केवल तकनीकी है। कथन 3, सूक्ष्मजीवों से उच्च जीवों में: हाँ, जीवाणु का बीटी जीन कपास में काम करता है। तीनों सही हैं।
इस भ्रम से बचें: यह मान लेना कि जीन जगतों की सीमा पार नहीं कर सकते; पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी का पूरा अर्थ यही है कि वे कर सकते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। जीन जंतुओं से पादपों में और सूक्ष्मजीवों से उच्च जीवों में भी जाते हैं।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। जीन पादपों की विभिन्न जातियों के बीच भी जाते हैं।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। जंतुओं के जीन भी पादपों में अभिव्यक्त हो सकते हैं।
- (d) 1, 2 और 3: सही। किसी भी जीव का जीन संवाहक से जुड़कर दूसरे जीव में अभिव्यक्त हो सकता है।
उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर। डीएनए का रसायन हर जगह एक है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)कथन और कारण:
- कथन (A): वैज्ञानिक डीएनए अणुओं को, उनके स्रोत की परवाह किए बिना, इच्छानुसार काट और जोड़ सकते हैं।
- कारण (R): प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज और डीएनए लाइगेज की सहायता से डीएनए खंडों में हेरफेर किया जा सकता है।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन परखें: वैज्ञानिक किसी भी स्रोत का डीएनए काट और जोड़ सकते हैं, यही पुनर्योगज डीएनए का आधार है; सही। कारण परखें: प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज निश्चित अनुक्रमों पर काटते हैं और डीएनए लाइगेज खंडों को जोड़ते हैं; सही। क्या कारण कथन की व्याख्या करता है? हाँ: यही दो एंजाइम काटना और जोड़ना संभव बनाते हैं।
इस भ्रम से बचें: दोनों को अलग तथ्य मानकर (b) चुनना; ये एंजाइम ही उस प्रक्रिया की क्रियाविधि हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों सही, R से A की व्याख्या: सही। प्रतिबंधन एंजाइम काटते हैं और लाइगेज जोड़ते हैं, इसी से डीएनए काटा-जोड़ा जाता है।
- (b) दोनों सही, पर R से A की व्याख्या नहीं: गलत। ये दो एंजाइम ही काटने और जोड़ने का साधन हैं।
- (c) A सही, R गलत: गलत। प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज और लाइगेज सचमुच डीएनए खंडों में हेरफेर करते हैं।
- (d) A गलत, R सही: गलत। किसी भी स्रोत का डीएनए काटा और जोड़ा जा सकता है, यही पुनर्योगज डीएनए है।
उत्तर: दोनों सही, R से A की व्याख्या: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019प्रायः समाचारों में आने वाला Cas9 प्रोटीन क्या है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कैस9 क्रिस्पर-कैस9 का एंजाइम है: मार्गदर्शक आरएनए उसे PAM के पास मेल खाते डीएनए अनुक्रम तक ले जाता है, और वह दोनों लड़ियाँ काटता है। इसलिए यह लक्ष्य-साधित जीन संपादन की आण्विक कैंची है।
इस भ्रम से बचें: कैस9 को पीड़क-प्रतिरोधी फ़सलों के बीटी जीन से मिला देना, जो समाचारों में आने वाला जैव प्रौद्योगिकी का दूसरा पद है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) लक्ष्य-साधित जीन संपादन की आण्विक कैंची: सही। मार्गदर्शक आरएनए जहाँ ले जाए, कैस9 वहीं डीएनए काटता है।
- (b) रोगजनकों की पहचान का जैव संवेदक: गलत। कैस9 डीएनए काटता है; वह संवेदक नहीं है।
- (c) पादपों को पीड़क-प्रतिरोधी बनाने वाला जीन: गलत। यह बीटी (क्राई) जीन का वर्णन है, कैस9 का नहीं।
- (d) जीएम फ़सलों में बनने वाला शाकनाशी: गलत। कैस9 एक जीवाणु रक्षा तंत्र का एंजाइम है।
उत्तर: लक्ष्य-साधित जीन संपादन में प्रयुक्त आण्विक कैंची: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017भारत में कृषि के संदर्भ में, प्रायः समाचारों में आने वाले 'जीनोम अनुक्रमण (जीनोम सीक्वेंसिंग)' की तकनीक का आसन्न भविष्य में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है?
- विभिन्न फ़सली पौधों में रोग प्रतिरोध और सूखा सहिष्णुता के लिए आनुवंशिक सूचकों का अभिज्ञान करने के लिए जीनोम अनुक्रमण का उपयोग किया जा सकता है।
- यह तकनीक, फ़सली पौधों की नई किस्मों को विकसित करने में लगने वाले आवश्यक समय को घटाने में मदद करती है।
- इसका प्रयोग, फ़सलों में पोषी-रोगाणु सम्बन्धों को समझने के लिए किया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन 1: फ़सल का जीनोम रोग प्रतिरोध और सूखा सहिष्णुता के जीन और सूचक दिखाता है; अरहर के जीनोम में 1,213 जीन रोग प्रतिरोध के और 152 सूखा, ताप और लवणता सहने के हैं। सही। कथन 2: सूचकों से प्रजनक लक्षण दिखने की प्रतीक्षा किए बिना चयन कर पाते हैं, इसलिए नई किस्में जल्दी आती हैं। सही। कथन 3: रोगजनक का जीनोम वे प्रभावक प्रोटीन दिखाता है, जिनसे वह फ़सल पर आक्रमण करता है, और इससे मेल खाने वाले प्रतिरोधी जीन खोजने में सहायता मिलती है। सही।
इस भ्रम से बचें: कथन 3 को बहुत आगे की बात मान लेना; पोषी-रोगाणु संबंध समझना जीनोमिकी का सामान्य उपयोग है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। अनुक्रमण प्रजनन भी तेज़ करता है और पोषी-रोगाणु संबंध भी बताता है।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। रोग प्रतिरोध और सूखा सहिष्णुता के सूचक खोजना इसका पहला उपयोग है।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। सूचक-आधारित चयन किस्म के प्रजनन का समय घटाता है।
- (d) 1, 2 और 3: सही। तीनों फ़सलों में जीनोम अनुक्रमण के उपयोग हैं।
उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)आजकल वैज्ञानिक किसी गुणसूत्र पर जीनों या डीएनए अनुक्रमों की व्यवस्था या सापेक्ष स्थितियाँ निर्धारित कर सकते हैं। इस ज्ञान से हमें क्या लाभ है?
- पशुधन की वंशावली जानना संभव है।
- सभी मानव रोगों के कारणों को समझना संभव है।
- रोग-प्रतिरोधी पशु नस्लें विकसित करना संभव है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: गुणसूत्रों पर जीनों और सूचकों का मानचित्र व्यक्तियों की तुलना का साधन है। कथन 1: सूचक जनकत्व बताते हैं, इसलिए पशुधन की वंशावली जानी जा सकती है। सही। कथन 2: जीनों का स्थान जानने से हर मानव रोग का कारण स्पष्ट नहीं होता। 'सभी' शब्द के कारण गलत। कथन 3: रोग प्रतिरोध से जुड़े सूचक प्रतिरोधी नस्लें चुनने देते हैं। सही।
इस भ्रम से बचें: कथन 2 का निरपेक्ष शब्द 'सभी'।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1 और 2: गलत। कथन 2 बढ़ा-चढ़ाकर कहता है; जीन मानचित्र सभी रोगों के कारण नहीं बताता।
- (b) केवल 2: गलत। कथन 2 ही गलत है।
- (c) केवल 1 और 3: सही। जीन मानचित्र वंशावली दिखाते हैं और रोग-प्रतिरोधी पशु नस्लें बनाने में सहायक हैं।
- (d) 1, 2 और 3: गलत। कथन 2 गलत है।
उत्तर: केवल 1 और 3: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1997 (हिंदी रूपांतर)किसी जीव के पूरे जीनोम (उसके सभी जीनों) का अनुक्रमण 1996 में पूरा हुआ। वह जीव था
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: जीनोम परियोजनाओं का क्रम याद करें: पहला पूरा यूकैरियोटिक जीनोम, खमीर का, 1996 में जारी हुआ; मानव जीनोम परियोजना 2003 में पूरी हुई। 1996 में केवल खमीर ठीक बैठता है।
इस भ्रम से बचें: सबसे प्रसिद्ध परियोजना, मानव जीनोम, को चुन लेना, जो सात वर्ष बाद पूरी हुई।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) ऐल्बिनो चूहा: गलत। 1996 में पूरा हुआ जीनोम खमीर का था।
- (b) खमीर: सही। सैकेरोमाइसीज़ सेरेविसी 1996 में पूरी तरह अनुक्रमित पहला यूकैरियोट था।
- (c) मनुष्य: गलत। मानव जीनोम परियोजना 1990 से 2003 तक चली।
- (d) प्लाज़्मोडियम वाइवैक्स: गलत। 1996 का जीनोम खमीर का था, किसी मलेरिया परजीवी का नहीं।
उत्तर: खमीर: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2016जैव सूचना-विज्ञान (बायोइंफॉर्मेटिक्स) में घटनाक्रमों/गतिविधि के संदर्भ में समाचारों में कभी-कभी दिखने वाला पद 'ट्रांसक्रिप्टोम (transcriptome)' किसे निर्दिष्ट करता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: प्रत्यय '-ओम' पूरे समूह का अर्थ देता है: जीनोम पूरा डीएनए है, और ट्रांसक्रिप्टोम वे सभी आरएनए अनुलेख, मुख्यतः mRNA, जो कोई कोशिका या जीव अभिव्यक्त करता है।
इस भ्रम से बचें: विकल्प (c), जो अनुलेखों के समूह के स्थान पर जीन अभिव्यक्ति की प्रक्रिया बताता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) जीनोम संपादन के एंजाइमों की श्रेणी: गलत। वे कैस9 जैसे न्यूक्लिएज हैं।
- (b) अभिव्यक्त mRNA अणुओं की पूर्ण शृंखला: सही। ट्रांसक्रिप्टोम सभी आरएनए अनुलेखों का समूह है।
- (c) जीन अभिव्यक्ति की क्रियाविधि: गलत। ट्रांसक्रिप्टोम अणुओं का समूह है, क्रियाविधि नहीं।
- (d) उत्परिवर्तनों की क्रियाविधि: गलत। ट्रांसक्रिप्टोम का उत्परिवर्तन से कोई संबंध नहीं।
उत्तर: किसी जीव द्वारा अभिव्यक्त mRNA अणुओं की पूर्ण शृंखला: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2000 (हिंदी रूपांतर)कथन और कारण:
- कथन (A): “डीएनए फिंगरप्रिंटिंग” बलात्कार और हमले के मामलों में पितृत्व और अपराधियों की पहचान स्थापित करने का शक्तिशाली साधन बन गई है।
- कारण (R): बाल, लार और सूखा वीर्य जैसे सूक्ष्म साक्ष्य डीएनए विश्लेषण के लिए पर्याप्त होते हैं।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: कथन: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग पितृत्व तय करती है और अपराधियों को पहचानती है; सही, क्योंकि दोहराव का पैटर्न अनूठा और वंशागत है। कारण: बाल, लार और सूखा वीर्य विश्लेषण के लिए पर्याप्त हैं; सही, क्योंकि हर ऊतक का डीएनए एक ही पैटर्न देता है और पीसीआर छोटी मात्रा को बढ़ा देती है। कारण बताता है कि यह साधन आपराधिक मामलों में क्यों काम करता है।
इस भ्रम से बचें: कारण को अलग तथ्य मान लेना; सूक्ष्म साक्ष्य का पर्याप्त होना ही वह कारण है, जिससे यह विधि हमले के मामलों में काम करती है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) दोनों सही, R से A की व्याख्या: सही। सूक्ष्म साक्ष्य में भी वही डीएनए पैटर्न होता है, इसलिए वह अपराधी को पहचान सकता है।
- (b) दोनों सही, पर R से A की व्याख्या नहीं: गलत। सूक्ष्म साक्ष्य का उपयोगी होना ही व्याख्या है।
- (c) A सही, R गलत: गलत। बाल, लार या वीर्य का डीएनए रक्त जैसा ही पैटर्न देता है।
- (d) A गलत, R सही: गलत। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग पितृत्व परीक्षण और न्यायालयिक पहचान का आधार है।
उत्तर: दोनों सही, R से A की व्याख्या: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1997 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से किस तकनीक से किसी बच्चे का पितृत्व स्थापित किया जा सकता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पितृत्व के लिए ऐसा लक्षण चाहिए, जो लोगों में भिन्न हो और हर जनक से आए। वीएनटीआर में दोहराव की संख्या लोगों में बहुत भिन्न होती है और माता-पिता से संतान में जाती है, इसलिए बच्चे की पट्टियाँ आधी माता से और आधी पिता से मेल खाती हैं।
इस भ्रम से बचें: विकल्प (c): जनक की पहचान दोहराव का पैटर्न करता है, डीएनए की मात्रा नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) प्रोटीन विश्लेषण: गलत। यह डीएनए के वंशागत दोहराव-पैटर्न को नहीं पढ़ता।
- (b) गुणसूत्रों की गिनती: गलत। गिनती गुणसूत्रों की संख्या बताती है, परिवारों को अलग करने वाली विविधता नहीं।
- (c) डीएनए का मात्रात्मक विश्लेषण: गलत। डीएनए की मात्रा से माता-पिता का पता नहीं चलता।
- (d) डीएनए फिंगरप्रिंटिंग: सही। बच्चे का वंशागत दोहराव-पैटर्न उसके माता-पिता से मेल खाता है।
उत्तर: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2023'माइक्रोसैटेलाइट डी० एन० ए०' निम्नलिखित में से किस एक मामले में प्रयोग किया जाता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: माइक्रोसैटेलाइट अग्रानुक्रम में दोहराए गए छोटे अनुक्रम हैं, जो तेज़ी से उत्परिवर्तित होते हैं और इसलिए बहुत भिन्न होते हैं। व्यक्तियों, समष्टियों और जातियों के बीच तुलना योग्य विविधता ही संबंध मापने के लिए चाहिए, इसलिए ये जातियों के बीच संबंधों के अध्ययन में काम आते हैं।
इस भ्रम से बचें: विकल्प (c): क्लोनी प्रसार पादप की प्रति बनाता है; उसे डीएनए सूचकों की आवश्यकता नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) जातियों के बीच विकासपरक संबंध: सही। परिवर्ती दोहराव समूहों की निकटता मापते हैं।
- (b) स्टेम कोशिकाओं को ऊतकों में बदलना: गलत। यह वृद्धि संकेतों से होता है, डीएनए सूचकों से नहीं।
- (c) पादपों का क्लोनी प्रसार: गलत। यह ऊतक संवर्धन है, जो सूचकों के बिना पादप की प्रति बनाता है।
- (d) औषध परीक्षण: गलत। औषधों की प्रभावकारिता नैदानिक परीक्षणों से परखी जाती है, माइक्रोसैटेलाइट से नहीं।
उत्तर: जातियों के बीच विकासपरक संबंधों का अध्ययन: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2022निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : DNA बारकोडिंग किसका उपसाधन हो सकता है?
- किसी पादप या प्राणी की आयु का आकलन करने के लिए
- समान दिखने वाली प्रजातियों के बीच भिन्नता जानने के लिए
- प्रसंस्कृत खाद्यपदार्थों में अवांछित प्राणी या पादप सामग्री को पहचानने के लिए
उपर्युक्त कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं ?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: बारकोड COI जैसे मानक जीन से जाति पहचानता है। कथन 1, आयु: डीएनए अनुक्रम जीवन भर एक-सा रहता है, इसलिए नहीं। कथन 2, एक-सी दिखने वाली जातियाँ: हाँ, उनके बारकोड भिन्न होते हैं। कथन 3, प्रसंस्कृत खाद्य में अवांछित सामग्री: हाँ, बारकोड बताता है कि खाद्य में कौन-सी जाति है।
इस भ्रम से बचें: कथन 1: बारकोड जाति का नाम बताता है, व्यक्ति की आयु नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। DNA बारकोड आयु नहीं बता सकता।
- (b) केवल 3: गलत। बारकोडिंग एक-सी दिखने वाली जातियों को भी अलग करती है।
- (c) 1 और 2: गलत। कथन 1 गलत है।
- (d) 2 और 3: सही। बारकोड क्षेत्र में भी और प्रसंस्कृत खाद्य में भी जाति पहचानते हैं।
उत्तर: 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2023'एरियल मेटाजिनोमिक्स' निम्नलिखित में से किस एक स्थिति को सबसे सही निर्दिष्ट करता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: मेटाजिनोमिक्स किसी पर्यावरण के सभी जीवों के समस्त आनुवंशिक पदार्थ का एक साथ अध्ययन है। 'एरियल' का अर्थ है कि नमूना वायु है, इसलिए एरियल मेटाजिनोमिक्स पर्यावास के जीवों का डीएनए वायु से एकत्र करता है।
इस भ्रम से बचें: प्राणियों या भूमि से नमूने लेने वाले विकल्प; यह विधि स्वयं वायु का नमूना लेती है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) पर्यावास की वायु से डीएनए नमूने एक बार में एकत्र करना: सही। यही एरियल मेटाजिनोमिक्स है।
- (b) पक्षी जातियों की आनुवंशिक रचना: गलत। 'एरियल' नमूने की वायु के लिए है, पक्षियों के लिए नहीं।
- (c) प्राणियों से रक्त लेने वाली वायुवाहित युक्तियाँ: गलत। इस विधि में प्राणियों को छूना नहीं पड़ता।
- (d) भूमि और जल से नमूने लेने वाले ड्रोन: गलत। नमूना वायु है, भूमि या जल नहीं।
उत्तर: किसी पर्यावास में वायु से डीएनए प्रतिदर्शों को एक बार में एकत्र करना: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2021, सामान्य अध्ययन-III (हिंदी रूपांतर)अनुप्रयुक्त जैव-प्रौद्योगिकी में अनुसंधान और विकास संबंधी उपलब्धियाँ क्या हैं? ये उपलब्धियाँ समाज के निर्धन वर्गों के उत्थान में किस प्रकार सहायक होंगी?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुप्रयुक्त जैव-प्रौद्योगिकी जीवित कोशिकाओं और उनके अणुओं से उत्पाद बनाती है; भारत ने इसे 1986 से जैव प्रौद्योगिकी विभाग, BIRAC और 2024 की BioE3 नीति के माध्यम से विकसित किया है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- स्वास्थ्य: पुनर्योगज इंसुलिन और टीके, पीसीआर से निदान, पहली स्वदेशी कार-टी चिकित्सा नेक्सकार19, और सिकल सेल रोग की क्रिस्पर चिकित्सा बिरसा 101।
- कृषि: कम पीड़कनाशी चाहने वाली बीटी फ़सलें, अरहर का जीनोम, 2025 की पहली जीनोम-संपादित धान किस्में।
- जीनोमिकी और आँकड़े: भारतीय समष्टियों के लिए निदान हेतु जीनोम इंडिया के 10,074 जीनोम।
- निर्धनों का उत्थान: विदेशी मूल्यों के एक अंश पर चिकित्सा, जनजातीय समुदायों के लिए सिकल सेल उपचार, सस्ता शीघ्र निदान, अधिक उपज, जैव-विनिर्माण हबों में रोज़गार।
निष्कर्ष: निष्कर्ष रखें कि जैव-प्रौद्योगिकी निर्धनों तक पहुँचेगी या नहीं, यह केवल आविष्कार से नहीं, सस्ती उपलब्धता से तय होता है, इसलिए सार्वजनिक-निजी उत्पादन महत्त्वपूर्ण है।
स्रोत
- NCERT: Biology (Class XII), Biotechnology: Principles and Processes
- NCERT: Biology (Class XII), Biotechnology and its Applications
- NCERT: Biology (Class XII, earlier edition), Molecular Basis of Inheritance
- PIB: Genome India data released through the Indian Biological Data Centre (9 January 2025)
- PIB: Parliament question, Indian Biological Data Centre (19 March 2025)
- PIB: Exemption of SDN-1 and SDN-2 genome-edited plants (2022)
- PIB: Standard operating procedures for genome-edited plants under SDN-1 and SDN-2 (27 October 2022)
- PIB: Two genome-edited rice varieties announced (4 May 2025)
- PIB: BIRSA 101, India's first indigenous CRISPR-based gene therapy (19 November 2025)
- PIB: Parliament question, self-reliance in CRISPR and gene editing (19 March 2026)
- PIB: Parliament question, BioE3 Policy
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संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
