परिचय
परिसीमन जनगणना के बाद लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के निर्वाचन-क्षेत्रों की संख्या और सीमाएँ तय करने की प्रक्रिया है। यह अनुच्छेद 82 और संसद की विधियों के अंतर्गत होता है, मुख्यतः लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 के अंतर्गत, जो यह भी तय करते हैं कि चुनाव कैसे होते हैं।
भारत में परिसीमन: अर्थ, संवैधानिक आधार और परिसीमन आयोग
परिसीमन का अर्थ: अनुच्छेद 82, 327 और 329
परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिससे हर राज्य में लोक सभा और विधान सभा के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों की संख्या और उनकी सीमाएँ तय होती हैं। इसके पीछे एक सीधा लोकतांत्रिक विचार है: अनुच्छेद 81(2) कहता है कि किसी राज्य के स्थानों की संख्या और उसकी जनसंख्या का अनुपात, जहाँ तक व्यवहार्य हो, सभी राज्यों के लिए एक-सा रहे, ताकि हर व्यक्ति के मत का मूल्य हर जगह बराबर हो।
अनुच्छेद 82 के अनुसार हर जनगणना पूरी होने पर राज्यों को लोक सभा के स्थानों का आवंटन और हर राज्य का निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन उस प्राधिकारी द्वारा और उस रीति से पुनः समायोजित होगा जो संसद विधि द्वारा तय करे। अनुच्छेद 327 संसद को निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन पर विधि बनाने की शक्ति देता है, और संसद ने इसका उपयोग परिसीमन आयोग अधिनियमों से किया है।
अनुच्छेद 329(क) इस काम को मुकदमेबाज़ी से बचाता है: निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन या स्थानों के आवंटन से जुड़ी किसी विधि की वैधता पर किसी न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है, और उसके आदेशों को भी किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
भारत के परिसीमन आयोग: 1952, 1963, 1973 और 2002
परिसीमन आयोग चार बार गठित हुए हैं: 1952, 1962 और 1972 के परिसीमन आयोग अधिनियमों तथा परिसीमन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत, और हर आयोग ने उस समय की नवीनतम जनगणना पर काम किया। 1952, 1973 और 2002 के आयोगों की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने की।
| आयोग | जनगणना | लोक सभा के स्थान | विधान सभा के स्थान | क्या बदला |
|---|---|---|---|---|
| 1952 | 1951 | 494 | 3,280 | स्वतंत्रता के बाद पहला परिसीमन; अध्यक्ष न्यायमूर्ति एन. चंद्रशेखर अय्यर |
| 1963 | 1961 | 522 | 3,771 | 1956 के राज्य पुनर्गठन के बाद पहला परिसीमन |
| 1973 | 1971 | 543 | 3,997 | लोक सभा के स्थान बढ़े; अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे. एल. कपूर |
| 2002 | 2001 | 543 | 4,123 | सीमाएँ फिर से खींची गईं; स्थानों या राज्यों के बीच उनके बँटवारे में कोई बदलाव नहीं |
2002 का आयोग 12 जुलाई 2002 को न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में गठित हुआ। उसके आदेश अधिकतर राज्यों में 19 फ़रवरी 2008 से लागू हुए, और मई 2008 का कर्नाटक विधान सभा चुनाव नई सीमाओं पर हुआ पहला चुनाव था। असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मणिपुर में परिसीमन 8 फ़रवरी 2008 के राष्ट्रपति आदेशों से सुरक्षा कारणों पर टाल दिया गया। मार्च 2020 में न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में इन चार राज्यों और जम्मू-कश्मीर के लिए आयोग बना, और मार्च 2021 में चारों पूर्वोत्तर राज्य उसके दायरे से हटा दिए गए।
आयोग के आदेश लोक सभा और संबंधित राज्य विधान सभाओं के सामने रखे जाते हैं, किन्तु ये सदन उनमें कोई संशोधन नहीं कर सकते। आदेश उस तिथि से लागू होते हैं जो राष्ट्रपति तय करते हैं।
लोक सभा के स्थानों पर रोक और परिसीमन विधेयक, 2026
लोक सभा के स्थान 1971 की जनगणना पर क्यों स्थिर हैं
1971 के बाद के पाँच दशकों में जनसंख्या असमान रूप से बढ़ी। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में वृद्धि केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से कहीं अधिक रही। केवल जनसंख्या के आधार पर स्थान बाँटने से स्थान तेज़ी से बढ़ते राज्यों की ओर खिसक जाते और जनसंख्या नियंत्रित करने वाले राज्य घाटे में रहते, इसलिए संसद ने आवंटन को स्थिर कर दिया।
- 42वाँ संशोधन, 1976: राज्यों के बीच स्थानों का आवंटन 1971 की जनगणना पर 2000 तक स्थिर किया।
- 84वाँ संशोधन, 2001: यह रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक बढ़ाई।
- 87वाँ संशोधन, 2003: हर राज्य के भीतर निर्वाचन-क्षेत्रों को 2001 की जनगणना पर फिर से खींचने की अनुमति दी, राज्य के स्थानों की संख्या बदले बिना।
इस रोक ने राजनीतिक शांति तो रखी, पर निर्वाचन-क्षेत्रों के आकार में बड़ा अंतर छोड़ दिया: सबसे बड़े निर्वाचन-क्षेत्र में तीस लाख से अधिक निर्वाचक हो गए और सबसे छोटे में 50,000 से कम। 1971 की जनगणना पर तय 543 स्थान, जब भारत की जनसंख्या 54.8 करोड़ थी, औसतन लगभग 10.1 लाख लोगों पर एक निर्वाचन-क्षेत्र बैठते थे।
परिसीमन विधेयक, 2026, महिला आरक्षण और संघीय बहस
2023 के 106वें संशोधन ने लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए, जो अगली जनगणना पर आधारित परिसीमन से लागू होंगे; यह जनगणना 2027 में होनी है। इससे अगला परिसीमन महिला आरक्षण से जुड़ गया।
अप्रैल 2026 में सरकार ने तीन विधेयक साथ रखे: 2029 के लोक सभा चुनाव तक महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026; परिसीमन आयोग के माध्यम से संसदीय और विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों को फिर से समायोजित करने के लिए परिसीमन विधेयक, 2026; और यह आरक्षण दिल्ली, पुदुच्चेरी तथा जम्मू-कश्मीर की विधायिकाओं तक ले जाने के लिए संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026। बहस में गृह मंत्री ने कहा कि इस परिसीमन के बाद लोक सभा में 816 स्थान होंगे और पाँच दक्षिणी राज्यों के स्थान 129 से बढ़कर 195 हो जाएँगे।
17 अप्रैल 2026 को संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक गिर गया: 298 सदस्यों ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मत दिया। उस समय सदन में 528 सदस्य उपस्थित थे, और संविधान संशोधन विधेयक के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या 352 थी। इसके बाद सरकार ने उस पर टिके परिसीमन विधेयक और संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक वापस ले लिए।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950: स्थान और निर्वाचक-नामावली
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950: स्थानों का आवंटन और निर्वाचन अधिकारी
संसद ने चुनाव से जुड़ी अपनी दो मुख्य विधियाँ अनुच्छेद 327 के अंतर्गत बनाईं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मतदाताओं की अर्हताओं, निर्वाचक-नामावली तैयार करने, निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन और संसद तथा राज्य विधान-मंडलों में स्थानों के आवंटन का उपबंध करता है। स्वतंत्रता के बाद का पहला परिसीमन, संसदीय और विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन आदेश, 1951, इसी अधिनियम के अंतर्गत बना।
धारा 3 राज्यों को लोक सभा के स्थान, और हर राज्य में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान, पहली अनुसूची के अनुसार देती है; धारा 4 कहती है कि हर संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र एक-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र होगा। यही अधिनियम वे अधिकारी बनाता है जो निर्वाचन आयोग के अधीन नामावली का काम चलाते हैं।
- मुख्य निर्वाचन अधिकारी (धारा 13क): हर राज्य में एक, जिसे निर्वाचन आयोग उस राज्य सरकार से परामर्श करके राज्य सरकार के अधिकारियों में से नामित करता है; वह राज्य की सभी नामावलियों को तैयार करने और उनके पुनरीक्षण का पर्यवेक्षण करता है।
- जिला निर्वाचन अधिकारी (धारा 13कक): हर जिले के लिए, जिसे निर्वाचन आयोग राज्य सरकार से परामर्श करके नामित करता है।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (धारा 13ख): हर विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र की नामावली तैयार करता है और उसका पुनरीक्षण करता है।
1950 के अधिनियम के अंतर्गत निर्वाचक-नामावली: मतदाता कौन बन सकता है
हर निर्वाचन-क्षेत्र की एक निर्वाचक-नामावली होती है, जो निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण में तैयार होती है (धारा 15)। धारा 19 के अनुसार कोई व्यक्ति दो शर्तें पूरी करने पर पंजीकरण का हकदार है: अर्हता तिथि पर उसकी आयु अठारह वर्ष से कम न हो, और वह उस निर्वाचन-क्षेत्र का साधारण निवासी (ordinarily resident) हो।
- कौन पंजीकृत नहीं हो सकता (धारा 16): जो भारत का नागरिक नहीं है, जिसे सक्षम न्यायालय ने विकृत-चित्त घोषित किया है, या जो भ्रष्ट आचरण और चुनाव संबंधी अपराधों की विधि के अंतर्गत मत देने से निरर्हित है।
- केवल एक प्रविष्टि (धारा 17 और 18): कोई व्यक्ति एक से अधिक निर्वाचन-क्षेत्र में, या किसी निर्वाचन-क्षेत्र में एक से अधिक बार, पंजीकृत नहीं हो सकता।
- साधारण निवासी (धारा 20): किसी निर्वाचन-क्षेत्र में मकान का स्वामी होने भर से कोई वहाँ का साधारण निवासी नहीं हो जाता, और अस्थायी अनुपस्थिति से साधारण निवास समाप्त नहीं होता।
- विदेश में रहने वाले निर्वाचक (धारा 20क): काम, शिक्षा या अन्य कारण से विदेश में रह रहा नागरिक, जिसने किसी दूसरे देश की नागरिकता नहीं ली है, पासपोर्ट में दिए भारत के निवास स्थान पर पंजीकृत हो सकता है।
नामावली में नाम न होने पर व्यक्ति निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के पास नाम जुड़वाने का आवेदन कर सकता है (धारा 23), और अपील पहले जिला मजिस्ट्रेट या समकक्ष अधिकारी के पास तथा फिर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास होती है (धारा 24)। धारा 21(3) निर्वाचन आयोग को यह अधिकार देती है कि वह कारण दर्ज करके किसी भी समय किसी निर्वाचन-क्षेत्र की नामावली के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे। 2025 और 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को इसी शक्ति का प्रयोग माना गया; यह पुनरीक्षण और उस पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय भारत के निर्वाचन आयोग वाले लेख में समझाए गए हैं।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: चुनाव का संचालन और विवाद
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951: नामांकन, प्रतिभूति राशि और मतदान
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनाव के वास्तविक संचालन का उपबंध करता है: प्रशासनिक तंत्र, मतदान, चुनाव संबंधी अपराध, निर्वाचन विवाद, उप-चुनाव और राजनैतिक दलों का पंजीकरण। इसके कई नियम तय करते हैं कि कौन चुनाव लड़ सकता है और कैसे।
- नामांकन (धारा 33): मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार को एक प्रस्तावक चाहिए; बाकी उम्मीदवारों को निर्वाचन-क्षेत्र के दस प्रस्तावक चाहिए।
- अधिकतम दो स्थान (धारा 33(7)): 1 अगस्त 1996 से कोई व्यक्ति आम चुनाव में दो से अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से, या किसी राज्य में दो से अधिक विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से, नामांकन नहीं कर सकता।
- प्रतिभूति राशि (धारा 34): लोक सभा के लिए 25,000 रुपये (अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए 12,500 रुपये) और विधान सभा के लिए 10,000 रुपये (5,000 रुपये); ये राशियाँ 1996 में और फिर 2010 से बढ़ाई गईं।
- उम्मीदवार की मृत्यु (धारा 52): मतदान केवल तब स्थगित होता है जब मरने वाला उम्मीदवार किसी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल का हो।
- मौन अवधि (धारा 126): मतदान समाप्त होने से पहले के 48 घंटों में मतदान क्षेत्र में न कोई सार्वजनिक सभा, न चुनाव सामग्री का प्रदर्शन।
- व्यय (धारा 77): हर उम्मीदवार नामांकन से परिणाम तक के चुनाव व्यय का लेखा रखता है।
राजनैतिक दलों का पंजीकरण और सदस्यों की निरर्हता
धारा 29क के अंतर्गत नागरिकों का कोई संगम, जो राजनैतिक दल के रूप में माना जाना चाहता है, पंजीकरण के लिए निर्वाचन आयोग को आवेदन देता है। आयोग फिर पंजीकृत दलों को चुनाव में उनके प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय या राज्य दल की मान्यता देता है।
धारा 8 कुछ अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्ति को निरर्हित करती है, जैसे समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना, चुनाव में रिश्वत, अस्पृश्यता से जुड़े अपराध और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के अंतर्गत अपराध। केवल जुर्माने की सज़ा पर निरर्हता दोषसिद्धि से छह वर्ष तक रहती है; कारावास की सज़ा पर दोषसिद्धि से लेकर रिहाई के छह वर्ष बाद तक। किसी अन्य अपराध में कम से कम दो वर्ष की सज़ा पर भी यही निरर्हता लागू होती है।
10 जुलाई 2013 को लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारा 8(4) निरस्त कर दी, जो वर्तमान सदस्यों को अपील के लिए तीन महीने देती थी और तब तक उनका स्थान बचाए रखती थी; अब दोषसिद्धि पर ही सदस्य का स्थान चला जाता है।
भ्रष्ट आचरण (corrupt practices) धारा 123 में गिनाए गए हैं: रिश्वत, असम्यक् असर, धर्म, मूलवंश, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर अपील, नागरिकों के वर्गों के बीच शत्रुता बढ़ाना, किसी उम्मीदवार के बारे में झूठे कथन छापना, मतदाताओं को लाने के लिए वाहन किराए पर लेना, सीमा से अधिक व्यय, और सरकारी सेवकों की सहायता लेना। धारा 8क के अंतर्गत भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया गया व्यक्ति राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, जो निर्वाचन आयोग की राय लेकर और उसी के अनुसार अधिकतम छह वर्ष की निरर्हता तय करते हैं।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत निर्वाचन अर्जी और विवाद
अनुच्छेद 329(ख) किसी चुनाव पर प्रश्न केवल निर्वाचन अर्जी (election petition) से उठाने देता है। 1966 के 19वें संशोधन ने निर्वाचन अधिकरण समाप्त किए, तब से ये अर्जियाँ उच्च न्यायालय सुनते हैं। धारा 81 के अंतर्गत कोई भी उम्मीदवार या उस निर्वाचन-क्षेत्र का कोई भी निर्वाचक परिणाम के 45 दिन के भीतर अर्जी दे सकता है।
धारा 100 बताती है कि उच्च न्यायालय किन स्थितियों में चुनाव को शून्य घोषित करेगा: चुनाव की तिथि पर निर्वाचित घोषित प्रत्याशी अर्हित नहीं था या निरर्हित था; प्रत्याशी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने भ्रष्ट आचरण किया; कोई नामांकन अनुचित रूप से अस्वीकार हुआ; या परिणाम पर अनुचित रूप से स्वीकार किए गए नामांकन, किसी अन्य अभिकर्ता के भ्रष्ट आचरण, मतों के अनुचित स्वीकार या अस्वीकार, अथवा संविधान या अधिनियम के किसी उल्लंघन से तात्त्विक प्रभाव पड़ा। धारा 116क के अंतर्गत उच्च न्यायालय के आदेश के 30 दिन के भीतर, विधि और तथ्य दोनों पर, उच्चतम न्यायालय में अपील होती है।
दो मामले दिखाते हैं कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है। एन. पी. पोन्नुस्वामी (1952) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मत देने या चुनाव लड़ने का अधिकार विधि की देन है, इसलिए उसके विवाद उसी मार्ग से चलते हैं जो विधि देती है। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज नारायण की निर्वाचन अर्जी पर इंदिरा गांधी का चुनाव धारा 123(7) के अंतर्गत रद्द कर उन्हें छह वर्ष के लिए रोक दिया; 7 नवंबर 1975 को उच्चतम न्यायालय ने वह निष्कर्ष पलट दिया, पर 39वें संशोधन से जोड़े गए अनुच्छेद 329क के खंड (4) और (5) को मूल ढाँचे का उल्लंघन मानकर निरस्त कर दिया।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2024दिसम्बर 2023 तक भारत सरकार द्वारा कितने परिसीमन आयोग गठित किए गए हैं ?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: स्वतंत्रता के बाद बने आयोग गिनें। चरण 2: वे 1952, 1962 और 1972 के परिसीमन आयोग अधिनियमों और परिसीमन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत बने। चरण 3: इस प्रकार संख्या चार है।
इस भ्रम से बचें: 2020 में जम्मू-कश्मीर और चार पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बना आयोग पाँच गिनने का लालच देता है; वह कुछ क्षेत्रों के लिए पुनर्गठन था, नया राष्ट्रीय परिसीमन नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) एक: गलत। आयोग चार बार गठित हुए।
- (b) दो: गलत। आयोग 1952, 1963, 1973 और 2002 में बने।
- (c) तीन: गलत। यह न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता वाले 2002 के आयोग को छोड़ देता है।
- (d) चार: सही। 1952, 1963, 1973 और 2002 के आयोग।
उत्तर: चार: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि आयोग चार अधिनियमों के अंतर्गत बने।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2012 (हिंदी रूपांतर)परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- जब परिसीमन आयोग के आदेश लोक सभा या राज्य विधान सभा के सामने रखे जाते हैं, तो वे उन आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकतीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 सही है। अनुच्छेद 329(क) परिसीमन से जुड़ी विधियों पर न्यायालय में प्रश्न उठाने से रोकता है, और आयोग के आदेशों को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। चरण 2: कथन 2 सही है। आदेश लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के सामने रखे जाते हैं, पर उनमें संशोधन की अनुमति नहीं है।
इस भ्रम से बचें: कथन 2 पर 'नहीं' कहने का लालच होता है, क्योंकि सदन प्रायः अपने सामने रखी बातों में संशोधन कर सकते हैं; परिसीमन आदेश इसका अपवाद हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 2 भी सही है।
- (b) केवल 2: गलत। कथन 1 भी सही है।
- (c) 1 और 2 दोनों: सही। न्यायालय आदेशों पर प्रश्न नहीं उठा सकते, और सदन उनमें संशोधन नहीं कर सकते।
- (d) न तो 1 और न ही 2: गलत। दोनों कथन सही हैं।
उत्तर: 1 और 2 दोनों: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि आदेश न्यायालय में भी अंतिम हैं और सदन में भी।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1999 (हिंदी रूपांतर)लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1996 द्वारा निर्वाचन विधि में हाल में किए गए संशोधनों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- I. भारत के राष्ट्रीय ध्वज या भारत के संविधान का अपमान करने के अपराध में दोषसिद्धि होने पर दोषसिद्धि की तिथि से छह वर्ष तक संसद और राज्य विधान-मंडलों के चुनाव लड़ने की निरर्हता होगी।
- II. लोक सभा का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को जमा करनी होने वाली प्रतिभूति राशि बढ़ाई गई है।
- III. अब कोई उम्मीदवार एक से अधिक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ सकता।
- IV. अब किसी लड़ने वाले उम्मीदवार की मृत्यु पर कोई चुनाव प्रत्यादिष्ट नहीं होगा।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन I सही है। राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के अंतर्गत दोषसिद्धि अब छह वर्ष की निरर्हता लाती है। चरण 2: कथन II सही है। 1996 के संशोधन ने प्रतिभूति राशि बढ़ाई। चरण 3: कथन III गलत है। उम्मीदवार अब भी दो निर्वाचन-क्षेत्रों से लड़ सकता है, केवल एक से नहीं। चरण 4: कथन IV, जिस रूप में यूपीएससी ने रखा, सही है: निर्दलीय उम्मीदवार की मृत्यु पर अब मतदान प्रत्यादिष्ट नहीं होता, और केवल मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार की मृत्यु पर स्थगित होता है।
इस भ्रम से बचें: कथन III आकर्षक लगता है, क्योंकि 1996 के संशोधन ने उम्मीदवारी सीमित की थी; पर सीमा दो सीटों की है, एक की नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) I और III: गलत। कथन III असत्य है, और यह II तथा IV को छोड़ देता है।
- (b) I, II और IV: सही। ये 1996 के संशोधन से मेल खाते हैं।
- (c) I, II और III: गलत। कथन III असत्य है: सीमा दो निर्वाचन-क्षेत्रों की है।
- (d) I, II, III और IV: गलत। कथन III असत्य है।
उत्तर: I, II और IV: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि सीमा दो निर्वाचन-क्षेत्रों की है, एक की नहीं।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2022, सामान्य अध्ययन-IIलोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अन्तर्गत संसद अथवा राज्य विधायिका के सदस्यों के चुनाव से उभरे विवादों के निर्णय की प्रक्रिया का विवेचन कीजिए । किन आधारों पर किसी निर्वाचित घोषित प्रत्याशी के निर्वाचन को शून्य घोषित किया जा सकता है ? इस निर्णय के विरुद्ध पीड़ित पक्ष को कौन-सा उपचार उपलब्ध है ? वाद विधियों का सन्दर्भ दीजिए ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुच्छेद 329(ख) से शुरुआत करें: संसद या राज्य विधान-मंडल के चुनाव पर प्रश्न केवल 1951 के अधिनियम के अंतर्गत निर्वाचन अर्जी से उठाया जा सकता है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- प्रक्रिया: कोई उम्मीदवार या निर्वाचक परिणाम के 45 दिन के भीतर उच्च न्यायालय में अर्जी देता है (धारा 81); 1966 के 19वें संशोधन ने निर्वाचन अधिकरण समाप्त किए, तब से उच्च न्यायालय अर्जियाँ सुनते हैं।
- आधार (धारा 100): अर्हित न होना या निरर्हित होना; विजेता या उसके निर्वाचन अभिकर्ता का भ्रष्ट आचरण; नामांकन का अनुचित अस्वीकार; किसी अनियमितता से परिणाम पर तात्त्विक प्रभाव।
- उपचार: विधि और तथ्य, दोनों पर 30 दिन के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील (धारा 116क)।
- वाद विधियाँ: अधिकार की सांविधिक प्रकृति पर एन. पी. पोन्नुस्वामी (1952); चुनावों के न्यायिक पुनर्विलोकन पर राज नारायण की अर्जी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, 1975) और इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975)।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अर्जी का मार्ग मतदान के दौरान चुनाव को अंतिम रखता है, पर बाद में हर परिणाम को न्यायिक जाँच के लिए खुला छोड़ता है।
स्रोत
- Legislative Department, Ministry of Law and Justice: The Constitution of India
- The Representation of the People Act, 1950 (consolidated text, Chief Electoral Officer, Telangana)
- The Representation of the People Act, 1951 (consolidated text, Chief Electoral Officer, Telangana)
- Supreme Court of India: In re Section 6A of the Citizenship Act, 1955, judgment of 17 October 2024
- NCERT: Indian Constitution at Work, Class 11, Chapter 3, Election and Representation
- The Hindu (Delhi): Constitution Amendment Bill, part of delimitation package, defeated, 18 April 2026
- The Hindu (Delhi): South's seat share won't be cut, say PM and Shah, 17 April 2026
- The Hindu (Delhi): The federal dilemma of delimitation, 17 August 2026
- Wikipedia: Delimitation Commission of India
- Wikipedia: Disqualification of convicted representatives in India
- Wikipedia: State of Uttar Pradesh v. Raj Narain
- Wikipedia: Indira Gandhi v. Raj Narain
- Wikipedia: Special Intensive Revision
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख परिसीमन और चुनाव की विधियों को संविधान के पाठ, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियमों, न्यायालयों के निर्णयों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।
