परिचय

भारत निर्वाचन आयोग वह स्थायी संवैधानिक निकाय है जो संसद, राज्यों के विधान-मंडलों और राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के पदों के चुनाव कराता है। अनुच्छेद 324 इन चुनावों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण आयोग में निहित करता है, जिसमें निर्वाचक-नामावली से लेकर परिणाम तक सब आता है।

अनुच्छेद 324 के अंतर्गत भारत निर्वाचन आयोग (चुनाव आयोग): अधिदेश और दायरा

अनुच्छेद 324: निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण

भारत निर्वाचन आयोग, जिसे आम बोलचाल में चुनाव आयोग कहा जाता है, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए 25 जनवरी 1950 को बना एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। अनुच्छेद 324(1) के अनुसार संसद और हर राज्य के विधान-मंडल के सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक-नामावली तैयार करने और निर्वाचन कराने का, तथा राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों के निर्वाचन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण आयोग में निहित है। इस तरह संघ और राज्य, दोनों के लिए एक ही आयोग काम करता है।

व्यवहार में इसका अर्थ चार तरह के चुनाव हैं: लोक सभा और राज्य सभा के, राज्यों की विधान सभाओं और विधान परिषदों के, राष्ट्रपति के पद का, जिसे संसद के दोनों सदनों और राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों का निर्वाचकमंडल चुनता है, और उप-राष्ट्रपति के पद का, जिसे संसद के दोनों सदनों के सदस्य चुनते हैं।

अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, ये तीन शब्द आयोग को चुनाव से जुड़े लगभग हर विषय में निर्णायक भूमिका देते हैं, और उच्चतम न्यायालय ने भी इस व्यापक अर्थ को स्वीकार किया है। चुनाव कब होंगे, यह आयोग तय करता है; चुनाव कराने वाले अधिकारियों की निगरानी करता है; और जहाँ स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव संभव न हो, वहाँ मतदान स्थगित या रद्द कर सकता है। आयोग की स्थापना का दिन, 25 जनवरी, अब हर वर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

पंचायत और नगरपालिका के चुनाव आयोग के दायरे से बाहर हैं। अनुच्छेद 243ट और 243यक ये चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपते हैं, जिसका प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है। उसे राज्यपाल नियुक्त करते हैं और उसे केवल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति ही हटाया जा सकता है। हर राज्य निर्वाचन आयोग भारत निर्वाचन आयोग से अलग, अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करता है।

अनुच्छेद 324 से 329: संविधान में निर्वाचन संबंधी भाग

संविधान का भाग 15 (अनुच्छेद 324 से 329) वह ढाँचा है जिसके भीतर आयोग काम करता है। अनुच्छेद 324 आयोग बनाता है; बाकी पाँच अनुच्छेद तय करते हैं कि मत कौन दे सकता है, निर्वाचन संबंधी विधि कौन बनाता है और न्यायालय कहाँ तक दखल दे सकते हैं।

तालिका 1. संविधान का भाग 15, अनुच्छेद 324 से 329।
अनुच्छेद क्या उपबंध करता है
324 निर्वाचन आयोग: निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, आयोग की संरचना और पद से हटाने के विरुद्ध सुरक्षा
325 हर प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक साधारण निर्वाचक-नामावली; केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी को बाहर नहीं किया जाएगा
326 वयस्क मताधिकार: 18 वर्ष या अधिक आयु का हर नागरिक, जो अन्यथा अयोग्य न हो, मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है
327 संसद अपने और राज्य विधान-मंडलों के निर्वाचन से जुड़े सभी विषयों पर, नामावली और परिसीमन सहित, विधि बना सकती है
328 जहाँ संसद ने विधि नहीं बनाई, वहाँ राज्य का विधान-मंडल अपने निर्वाचन के लिए ऐसी विधि बना सकता है
329 परिसीमन संबंधी विधि को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, और निर्वाचन को केवल निर्वाचन अर्जी से प्रश्नगत किया जा सकता है

अनुच्छेद 326 में पहले मतदान की आयु 21 वर्ष थी। 61वें संशोधन ने 28 मार्च 1989 से इसे घटाकर 18 वर्ष कर दिया। उसी वर्ष आगे चलकर आयोग में दो सदस्य जोड़े गए; मतदाताओं की संख्या बहुत बढ़ जाना इसका एक कारण था।

आयोग उन विधियों के भीतर काम करता है जो संसद ने अनुच्छेद 327 के अंतर्गत बनाई हैं। उदाहरण के लिए, राजनैतिक दल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29क के अंतर्गत आयोग के पास पंजीकृत होते हैं, जबकि निर्वाचक-नामावली के पुनरीक्षण से जुड़ा उपबंध लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 में है।

निर्वाचन आयोग की संरचना, नियुक्ति और स्वतंत्रता

एक सदस्य से तीन सदस्यों वाला निर्वाचन आयोग (1950 से 1993)

अनुच्छेद 324(2) के अनुसार आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (जिसे आम तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाता है) और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त होंगे, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें। अन्य आयुक्त नियुक्त होने पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त आयोग का अध्यक्ष होता है। आम चुनाव से पहले राष्ट्रपति आयोग से परामर्श करके उसकी सहायता के लिए प्रादेशिक आयुक्त भी नियुक्त कर सकते हैं।

लगभग चार दशक तक आयोग में एक ही सदस्य रहा। पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन 1950 से 1958 तक इस पद पर रहे। 16 अक्टूबर 1989 को पहली बार दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त हुए, किन्तु 1 जनवरी 1990 को ये पद समाप्त कर दिए गए और आयोग फिर एक सदस्य वाला हो गया। तीन सदस्यों वाली व्यवस्था 1 अक्टूबर 1993 को फिर लागू हुई और तब से चली आ रही है।

1993 के बदलाव पर विवाद हुआ। 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे टी. एन. शेषन ने नई व्यवस्था को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, और मामला तीन बराबर सदस्यों के पक्ष में सुलझा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करता है, पर उसकी शक्ति बाकी दोनों से अधिक नहीं है; मतभेद होने पर बहुमत का निर्णय मान्य होता है। अब यह आम सहमति है कि बहु-सदस्यीय आयोग बेहतर व्यवस्था है, क्योंकि इसमें शक्ति बँटती है और हर सदस्य अधिक जवाबदेह रहता है।

एक रेखा पर समय-रेखा: 1950, 25 जनवरी को आयोग की स्थापना; 1960, पहली आचार-संहिता, केरल में; 1982, केरल के परवूर में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पहला प्रयोग; 1989, 16 अक्टूबर को दो निर्वाचन आयुक्त जुड़े; 1993, 1 अक्टूबर से तीन सदस्यों वाला आयोग; 2013, नागालैंड के नोकसेन में VVPAT का पहला प्रयोग; 2023, नियुक्ति का नया अधिनियम, 2023 का अधिनियम संख्या 49; 2026, 27 मई को उच्चतम न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण को मान्यता दी।

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है: 2023 का अधिनियम

अनुच्छेद 324(2) नियुक्ति की विधि संसद पर छोड़ता है: नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, किन्तु संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन। सात दशक से अधिक समय तक संसद ने ऐसी कोई विधि नहीं बनाई, इसलिए राष्ट्रपति मंत्रि-परिषद् की सलाह पर आयुक्तों की नियुक्ति करते रहे। आलोचकों की आशंका थी कि इस तरह सत्ता में बैठा दल अपने ही मुकाबले का निर्णायक खुद चुन सकता है।

मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया कि जब तक संसद विधि नहीं बनाती, नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता की समिति की सलाह पर होंगी। इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 पारित किया। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की अनुमति मिली और इसने 1991 के अधिनियम का स्थान लिया।

  • कौन नियुक्त हो सकता है (धारा 5): वे व्यक्ति जो भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर हैं या रह चुके हैं, सत्यनिष्ठ हैं और चुनाव कराने का ज्ञान तथा अनुभव रखते हैं।
  • खोज समिति (धारा 6): विधि और न्याय मंत्री इसकी अध्यक्षता करते हैं और सचिव से कम स्तर के न होने वाले दो सदस्य इसमें होते हैं; यह पाँच नामों का पैनल बनाती है।
  • चयन समिति (धारा 7): प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, लोक सभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होते हैं। जहाँ विपक्ष का नेता मान्य न हो, वहाँ विपक्ष के सबसे बड़े दल का नेता यह स्थान लेता है।
  • व्यापक चयन (धारा 8): चयन समिति पैनल से बाहर के व्यक्ति पर भी विचार कर सकती है।
  • नियुक्ति (धारा 4): चयन समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से नियुक्ति करते हैं।
प्रवाह आरेख। विधि मंत्री की अध्यक्षता में सचिव स्तर के दो सदस्यों वाली खोज समिति (धारा 6) निर्वाचन का अनुभव रखने वाले सचिव स्तर के व्यक्तियों के पाँच नामों का पैनल बनाती है (धारा 5)। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री वाली चयन समिति (धारा 7) नाम की सिफ़ारिश करती है और पैनल से बाहर का नाम भी चुन सकती है (धारा 8)। राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से नियुक्त करते हैं (धारा 4)। कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, और किसी को दूसरा कार्यकाल नहीं (धारा 9)। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति, संसद के विशेष बहुमत से ही हटाया जा सकता है; अन्य निर्वाचन आयुक्त को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर (अनुच्छेद 324(5))।

न्यायालय की अंतरिम समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश थे; अधिनियम ने उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक कैबिनेट मंत्री को रखा। तीन में से दो सदस्य अब सरकार की ओर से आते हैं, इसलिए आलोचकों का तर्क है कि निर्णायक चुनने में सत्ता पक्ष को बहुमत मिल गया है। ज्ञानेश कुमार 19 फ़रवरी 2025 को देश के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने; सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी अन्य दो निर्वाचन आयुक्त हैं।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल, वेतन और पद से हटाना

जिन सेवा शर्तों को संविधान ने राष्ट्रपति पर छोड़ा था, उन्हें अब 2023 का अधिनियम तय करता है। नीचे की तालिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की तुलना है।

तालिका 2. अनुच्छेद 324 और 2023 के अधिनियम के अंतर्गत सेवा शर्तें।
विषय मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयुक्त
नियुक्ति चयन समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति चयन समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति
कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक; बाद में मुख्य आयुक्त बनने पर कुल छह वर्ष
दूसरा कार्यकाल पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं
वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर
पद से हटाना केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति, संसद के माध्यम से केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर
संवैधानिक संरक्षण नियुक्ति के बाद सेवा शर्तों में उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं अनुच्छेद 324 में ऐसा उपबंध नहीं

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी है। संसद के दोनों सदनों को विशेष बहुमत से, अर्थात् कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से, अक्षमता या सिद्ध कदाचार के आधार पर संकल्प पारित करना होता है। इसके बाद ही राष्ट्रपति उसे हटाते हैं। इसलिए वह राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होने पर भी उनके प्रसादपर्यंत नहीं, बल्कि सुरक्षित रूप से पद पर रहता है।

आयोग के भीतर तीनों सदस्यों की शक्तियाँ बराबर हैं। अधिनियम की धारा 18 कहती है कि जहाँ तक संभव हो, काम सर्वसम्मति से हो, और मतभेद होने पर बहुमत का निर्णय माना जाए। धारा 16 वर्तमान और पूर्व आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्य निभाते समय किए या कहे गए किसी भी काम के लिए दीवानी और आपराधिक कार्यवाही से संरक्षण देती है।

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता: सुरक्षा-उपाय और कमियाँ

संविधान आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा मुख्य रूप से मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद के माध्यम से करता है। आयोग को उस समय की सरकार से स्वतंत्र रखने वाले सुरक्षा-उपाय ये हैं:

  • पद की सुरक्षा: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति हटाया जा सकता है।
  • सेवा शर्तों की सुरक्षा: नियुक्ति के बाद उसकी सेवा शर्तों में उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
  • सहयोगियों का संरक्षण: किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है।
  • माँगने पर कर्मचारी: अनुच्छेद 324(6) के अंतर्गत आयोग के अनुरोध पर राष्ट्रपति या राज्यपाल को आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराने होते हैं।

कमियाँ उन बातों में हैं जिन्हें संविधान ने छोड़ दिया। उसमें सदस्यों की योग्यता नहीं लिखी, कार्यकाल तय नहीं किया, और सेवानिवृत्त आयुक्तों के सरकार में बाद में पद लेने पर रोक नहीं लगाई। 2023 का अधिनियम अब योग्यता और कार्यकाल तय करता है और दूसरा कार्यकाल रोकता है, किन्तु सेवानिवृत्ति के बाद के पदों पर कोई रोक नहीं जोड़ता। अन्य दो आयुक्तों के संरक्षण का एक दूसरा पहलू भी है: चूँकि उन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है, इसलिए उससे असहमत होने वाला सदस्य स्वयं को असुरक्षित महसूस कर सकता है।

भारत निर्वाचन आयोग के कार्य और शक्तियाँ

निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कार्य: नामावली, निर्वाचन कार्यक्रम, दल और चुनाव चिह्न

निर्वाचन आयोग के कार्यों और शक्तियों को आम तौर पर तीन वर्गों में रखा जाता है: प्रशासनिक, सलाहकारी और अर्ध-न्यायिक। प्रशासनिक कार्य चुनाव की पूरी व्यवस्था को नामावली से लेकर परिणाम तक चलाते हैं।

  • निर्वाचक-नामावली: नामावली तैयार करना और समय-समय पर उसका पुनरीक्षण करना, हर पात्र मतदाता का पंजीकरण करना और मतदाता पहचान पत्र जारी करना।
  • निर्वाचन कार्यक्रम: चुनाव का समय और कार्यक्रम तय करना, अधिसूचना और नामांकन, संवीक्षा तथा नाम वापसी की अंतिम तिथियों से लेकर मतदान, मतगणना और परिणाम तक।
  • उम्मीदवार: नामांकन पत्रों की संवीक्षा करना और चुनाव खर्च पर निगरानी रखना।
  • दल और चुनाव चिह्न: राजनैतिक दलों का पंजीकरण करना, चुनाव में उनके प्रदर्शन के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय या राज्य दल की मान्यता देना और चुनाव चिह्न आवंटित करना। एक ही चिह्न दो पंजीकृत दलों को नहीं दिया जा सकता।
  • प्रचार के दौरान आचरण: आदर्श आचार-संहिता लागू करना और रेडियो तथा टेलीविज़न पर दलों के प्रसारण का क्रम तय करना।

आम चुनाव और उप-चुनाव कब होंगे, यह कोई मंत्रालय नहीं, निर्वाचन आयोग तय करता है। दलों की मान्यता और चुनाव चिह्न के आवंटन से जुड़े विवादों में भी आयोग न्यायालय की तरह निर्णय देता है, जिनमें किसी मान्यता प्राप्त दल के टूटने पर प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच उठने वाले विवाद भी शामिल हैं।

निर्वाचन आयोग के सलाहकारी और अर्ध-न्यायिक कार्य

एक विषय पर आयोग की राय राष्ट्रपति और राज्यपालों पर बाध्यकारी है। यदि प्रश्न उठे कि संसद का कोई सदस्य अयोग्य हो गया है या नहीं, तो अनुच्छेद 103(2) के अनुसार राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेंगे और उसी राय के अनुसार कार्य करेंगे। अनुच्छेद 192(2) राज्य विधान-मंडल के सदस्यों के लिए यही कर्तव्य राज्यपाल पर डालता है। आयोग राष्ट्रपति को यह सलाह भी देता है कि राष्ट्रपति शासन वाले राज्य में चुनाव कराए जा सकते हैं या नहीं, और यह तब महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब आपात की अवधि एक वर्ष से आगे बढ़ानी हो।

अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ मतदान के दौरान काम आती हैं। धांधली, बूथ कब्ज़ा या हिंसा होने पर आयोग मतदान रद्द कर सकता है, किसी निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान का आदेश दे सकता है, और जहाँ मतगणना निष्पक्ष न रही हो, वहाँ फिर से मतगणना करा सकता है।

निर्वाचन तंत्र: मुख्य निर्वाचन अधिकारी से रिटर्निंग अधिकारी तक

आयोग के अपने कर्मचारी बहुत कम हैं; वह संघ और राज्यों के प्रशासन के माध्यम से चुनाव कराता है। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में आयोग के निर्देशन में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी चुनाव की देखरेख करता है। जिला और निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर यह काम जिला निर्वाचन अधिकारी, नामावली बनाने वाला निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, और मतदान तथा मतगणना कराने वाला रिटर्निंग अधिकारी करते हैं।

संरचना आरेख। अनुच्छेद 324 के अंतर्गत नई दिल्ली के निर्वाचन सदन में स्थित भारत निर्वाचन आयोग हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश देता है। उसके नीचे हर जिले के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी है। निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी निर्वाचक-नामावली बनाता है और रिटर्निंग अधिकारी मतदान और मतगणना कराता है। अनुच्छेद 324(6) के अंतर्गत संघ और राज्यों के अधिकारी निर्वाचन ड्यूटी पर लगाए जाते हैं। पंचायत और नगरपालिका के चुनाव इस शृंखला से बाहर हैं: अनुच्छेद 243ट के अंतर्गत इन्हें राज्य निर्वाचन आयोग कराता है।

चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही निर्वाचन ड्यूटी पर लगे अधिकारी आयोग के नियंत्रण में आ जाते हैं। आयोग उनका तबादला कर सकता है या तबादले रोक सकता है, और निष्पक्ष ढंग से काम न करने वाले अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है। तंत्र सरकारों का है पर नियंत्रण आयोग का; इसी के सहारे तीन सदस्यों वाला आयोग पूरे देश में चुनाव कराता है।

आदर्श आचार संहिता, ईवीएम और निर्वाचक-नामावली

आदर्श आचार संहिता: अर्थ, उद्भव और सात भाग

आदर्श आचार-संहिता वे दिशानिर्देश हैं जो निर्वाचन आयोग चुनाव के समय राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए जारी करता है। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होते ही यह लागू हो जाती है और निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने तक लागू रहती है। यह संहिता राजनैतिक दलों की सहमति से विकसित हुई है।

इस संहिता की शुरुआत केरल से हुई, जहाँ 1960 के विधान सभा चुनाव के लिए राज्य प्रशासन ने एक आचार-संहिता बनाई थी। आयोग ने 1962 के लोक सभा चुनाव के लिए इसे सभी मान्यता प्राप्त दलों और राज्य सरकारों को भेजा, और बार-बार के उल्लंघनों के बाद 1991 से इसे कहीं अधिक कड़ाई से लागू करना शुरू किया। उन्हीं वर्षों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे टी. एन. शेषन ऐसे ही सुधारों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें आचार-संहिता का पालन कराना और सभी के लिए मतदाता पहचान पत्र शामिल हैं।

इसके सात भाग सामान्य आचरण, सभाएँ, जुलूस, मतदान का दिन, मतदान केंद्र, सत्ताधारी दल और चुनाव घोषणा-पत्र से जुड़े हैं। व्यवहार में ये दलों और उम्मीदवारों से इन बातों की अपेक्षा करते हैं:

  1. सामान्य आचरण: धर्म के आधार पर कोई अपील नहीं, विरोधी के निजी जीवन पर हमला नहीं, रिश्वत, धमकी या प्रतिरूपण नहीं।
  2. सभाएँ और जुलूस: केवल पुलिस की अनुमति से, स्वीकृत मार्ग और समय पर।
  3. मतदान का दिन और मतदान केंद्र: दल अधिकारियों का सहयोग करें; केंद्रों के पास दल के चिह्न, प्रचार सामग्री या शराब नहीं; शिकायतें आयोग के पर्यवेक्षक के पास जाएँ।
  4. सत्ताधारी दल: प्रचार में सरकारी तंत्र या सार्वजनिक धन का उपयोग नहीं, मंत्रियों द्वारा नई योजनाओं या अनुदानों की घोषणा नहीं, और लाभ लेने के लिए तबादले नहीं।
  5. चुनाव घोषणा-पत्र: विधि या संविधान के विरुद्ध कोई वादा नहीं।

सत्ताधारी दल वाला भाग संहिता का सबसे प्रभावी हिस्सा है, क्योंकि यह चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद सरकार के कामकाज पर सीमा लगाता है। आयोग इसे कैसे लागू करता है, इस पर भी विवाद हो सकता है: 2019 में निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने आचार-संहिता के उल्लंघन वाली बैठकों में जाना बंद कर दिया था, क्योंकि उनकी असहमति दर्ज नहीं की जा रही थी।

ईवीएम और VVPAT: वोटिंग मशीन और कागज़ी पर्ची

भारत में मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से होता है, जिन्हें आयोग के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की दो कंपनियाँ, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, बनाती हैं। अगस्त 1980 में इसका एक कार्यशील मॉडल राजनैतिक दलों को दिखाया गया, और मई 1982 में केरल के परवूर विधान सभा क्षेत्र के उप-चुनाव में मशीनों का पहला प्रयोग हुआ। 2004 के आम चुनाव में पहली बार सभी 543 लोक सभा क्षेत्रों में ये मशीनें इस्तेमाल हुईं, और तब से हर विधान सभा और लोक सभा चुनाव इन्हीं से हुआ है।

हर मशीन में एक बैलट यूनिट होती है, जिस पर मतदाता उम्मीदवार के नाम और चिह्न के आगे बटन दबाता है, और एक कंट्रोल यूनिट, जिसमें मतों की गिनती जमा रहती है। चुनाव हारने वाले दलों ने समय-समय पर मशीनों में खराबी के आरोप लगाए हैं। 8 अक्टूबर 2013 को उच्चतम न्यायालय ने आयोग को कागज़ी पर्ची जोड़ने का निर्देश दिया। यह वोटर वेरिफ़िएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) हर मत का कागज़ी रिकॉर्ड छापता है, जिसे मतदाता देखकर जाँच सकता है।

VVPAT का पहला प्रयोग सितंबर 2013 में नागालैंड के नोकसेन विधान सभा क्षेत्र में हुआ, और 2014 में 8 लोक सभा क्षेत्रों में। 2019 के आम चुनाव तक यह सभी 543 क्षेत्रों में लग चुका था। उच्चतम न्यायालय ने तब से यह भी अनिवार्य किया है कि परिणाम घोषित होने से पहले कुछ मशीनों की पर्चियाँ गिनकर इलेक्ट्रॉनिक परिणाम से मिलाई जाएँ।

निर्वाचक-नामावली और 2025-2026 का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)

कोई चुनाव उतना ही निष्पक्ष होता है जितनी उसकी निर्वाचक-नामावली, जो मत देने के हकदार लोगों की सूची है। नियमित अद्यतन के अलावा आयोग समय-समय पर गहन पुनरीक्षण करता है, जिसमें घर-घर जाकर गणना होती है और नामावली नए सिरे से बनती है। 2025 से पहले के अंतिम गहन पुनरीक्षण 2002 से 2004 के बीच हुए थे।

24 जून 2025 को आयोग ने बिहार की नामावली के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का आदेश दिया, जो राज्य के विधान सभा चुनाव से चार महीने पहले था। SIR की अधिसूचना के समय नामावली में 7.89 करोड़ मतदाता थे; 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित अंतिम नामावली में 7.42 करोड़ रह गए। 27 अक्टूबर 2025 को घोषित दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल सहित 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 51 करोड़ मतदाता शामिल थे।

27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने SIR को वैध ठहराया और कहा कि आयोग ने यह काम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने संवैधानिक दायित्व के तहत किया। न्यायालय को इसके ठोस कारण मिले: पिछले गहन पुनरीक्षण के बाद दो दशक से अधिक का समय, उस अवधि में बड़े पैमाने पर नाम जुड़ना और हटना, तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण और प्रवास। SIR ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम या 1960 के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमों की जगह नहीं ली; उसने अनुच्छेद 324 के अधिदेश को ही लागू किया।

नागरिकता पर न्यायालय ने कहा कि नामावली में नाम जोड़ने के लिए नागरिकता पूर्व-शर्त है, इसलिए आयोग नामावली में नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय करने की सीमित हद तक नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जाँच कर सकता है। न्यायालय ने आयोग को निर्देश दिया कि जो मतदाता 2003 की नामावली में थे पर बिहार के SIR में गैर-नागरिक मानकर हटाए गए, उनके नाम चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजे जाएँ, ताकि नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी उनके मामलों का निर्णय कर सके।

क्या मताधिकार मौलिक अधिकार है? अनुच्छेद 326 और न्यायालय

मताधिकार भाग 3 के मौलिक अधिकारों में नहीं है। यह अनुच्छेद 326 से निकलता है, जिसके अनुसार 18 वर्ष या अधिक आयु का हर नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है, जब तक कि वह अनिवास, चित्तविकृति, अपराध या भ्रष्ट या अवैध आचरण के आधार पर अयोग्य न हो। इस अधिकार की प्रकृति पर उच्चतम न्यायालय का दृष्टिकोण समय के साथ बदला है।

  1. एन. पी. पोन्नुस्वामी (1952): मत देने या चुनाव लड़ने का अधिकार विधि की उपज है और उस विधि की सीमाओं के अधीन है।
  2. ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल (1982): निर्वाचन का अधिकार न मौलिक अधिकार है, न सामान्य विधि (common law) का अधिकार, बल्कि सांविधिक अधिकार है।
  3. पीपल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ (2013): मताधिकार मौलिक अधिकार भले न हो, पर संवैधानिक अधिकार है।
  4. राजबाला बनाम हरियाणा राज्य और अनूप बरनवाल (2023): अनुच्छेद 326 के अंतर्गत यह अधिकार केवल सांविधिक नहीं, संवैधानिक अधिकार है।

नागरिकता अधिनियम की धारा 6क पर 2024 के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने इस यात्रा का सार यह बताया कि न्यायिक व्याख्या के माध्यम से मताधिकार मात्र सांविधिक अधिकार से उठकर संवैधानिक अधिकार बन गया है। इसलिए इसे स्वयं संविधान का संरक्षण प्राप्त है, यद्यपि मौलिक अधिकार की तरह इसे अनुच्छेद 32 के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. भारत का निर्वाचन आयोग पाँच सदस्यों वाला निकाय है।
    2. केंद्रीय गृह मंत्रालय आम चुनाव और उप-चुनाव, दोनों के निर्वाचन कार्यक्रम तय करता है।
    3. निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों के विभाजन/विलय से जुड़े विवाद सुलझाता है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1 और 2
    2. b केवल 2
    3. c केवल 2 और 3
    4. d केवल 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन (सही संयोजन चुनिए)

    हल करने की विधि: चरण 1: सदस्य गिनें। 1 अक्टूबर 1993 से आयोग में तीन सदस्य हैं: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त। चरण 2: देखें कि मतदान की तिथियाँ कौन तय करता है। आम चुनाव और उप-चुनाव का समय और कार्यक्रम आयोग तय करता है, कोई मंत्रालय नहीं। चरण 3: दलों की मान्यता और चिह्न के आवंटन से जुड़े विवाद, जिनमें दल टूटने के बाद के विवाद भी हैं, आयोग न्यायालय की तरह तय करता है।

    इस भ्रम से बचें: कथन 2 विश्वसनीय लगता है, क्योंकि चुनाव की सुरक्षा गृह मंत्रालय देखता है; किन्तु सुरक्षा और निर्वाचन कार्यक्रम अलग बातें हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1 और 2: गलत। आयोग में पाँच नहीं, तीन सदस्य हैं, और कार्यक्रम वह स्वयं तय करता है।
    • (b) केवल 2: गलत। निर्वाचन कार्यक्रम गृह मंत्रालय तय नहीं करता।
    • (c) केवल 2 और 3: गलत। इसी कारण कथन 2 असत्य है।
    • (d) केवल 3: सही। केवल कथन 3 सही है: आयोग दलों की मान्यता और चिह्न से जुड़े विवाद सुलझाता है, दल टूटने के बाद के विवाद भी।

    उत्तर: केवल 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि आयोग में तीन सदस्य हैं और चुनाव की तिथियाँ वह स्वयं तय करता है।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2004 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कार्यों पर विचार कीजिए:
    1. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का अधीक्षण, निदेशन और संचालन
    2. संसद, राज्य विधान-मंडलों और राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के पद के सभी चुनावों के लिए निर्वाचक-नामावली तैयार करना
    3. राजनैतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले व्यक्तियों को मान्यता देना
    4. निर्वाचन विवादों में अंतिम निर्णय की उद्घोषणा

    उपर्युक्त में से कौन-से भारत के निर्वाचन आयोग के कार्य हैं?

    1. a 1, 2 और 3
    2. b 2, 3 और 4
    3. c 1 और 3
    4. d 1, 2 और 4
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन (सही संयोजन चुनिए)

    हल करने की विधि: चरण 1: कार्य 1 और 2 अनुच्छेद 324(1) को ही दोहराते हैं: निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण तथा निर्वाचक-नामावली तैयार करना। चरण 2: दलों को मान्यता देना और उम्मीदवारों के नामांकन की संवीक्षा आयोग के प्रशासनिक कार्य हैं। चरण 3: निर्वाचन विवाद पर अंतिम निर्णय केवल अनुच्छेद 329(ख) के अंतर्गत निर्वाचन अर्जी से होता है, जिसे 1966 के 19वें संशोधन के बाद से उच्च न्यायालय सुनता है।

    इस भ्रम से बचें: कार्य 4 आकर्षक लगता है, क्योंकि आयोग चुनाव चिह्न के विवाद सुलझाता है; पर वह निर्वाचन अर्जी पर निर्णय देने जैसा नहीं है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 1, 2 और 3: सही। अनुच्छेद 324 और निर्वाचन विधियों के अंतर्गत ये आयोग के कार्य हैं।
    • (b) 2, 3 और 4: गलत। यह कार्य 1 को छोड़ देता है और कार्य 4 जोड़ता है, जो न्यायालयों का है।
    • (c) 1 और 3: गलत। यह निर्वाचक-नामावली तैयार करने को छोड़ देता है, जो अनुच्छेद 324(1) का मूल कार्य है।
    • (d) 1, 2 और 4: गलत। निर्वाचन विवाद आयोग नहीं, निर्वाचन अर्जियों के माध्यम से न्यायालय तय करते हैं।

    उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि निर्वाचन विवाद अनुच्छेद 329(ख) के अंतर्गत न्यायालयों के पास जाते हैं।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2002 (हिंदी रूपांतर)भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियाँ बराबर हैं, किन्तु उनके वेतन असमान हैं।
    2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त उतने ही वेतन का हकदार है जितना उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को मिलता है।
    3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिन पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को।
    4. निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तिथि से पाँच वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।

    इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

    1. a 1 और 2
    2. b 2 और 3
    3. c 1 और 4
    4. d 2 और 4
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन (सही संयोजन चुनिए)

    हल करने की विधि: चरण 1: तीनों सदस्यों की शक्तियाँ और वेतन बराबर हैं, अतः कथन 1 अपने दूसरे भाग पर गलत है। चरण 2: वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर है; यह 1991 के अधिनियम में भी था और 2023 के अधिनियम की धारा 10 में भी है। चरण 3: अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति हटाया जा सकता है। चरण 4: कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक है, पाँच वर्ष या 62 वर्ष नहीं।

    इस भ्रम से बचें: कथन 4 कार्यकाल की दोनों संख्याएँ बदल देता है; नियम का ढाँचा नहीं, हर संख्या जाँचें।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 1 और 2: गलत। वेतन बराबर हैं, अतः कथन 1 असत्य है।
    • (b) 2 और 3: सही। वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर है, और हटाने की प्रक्रिया न्यायाधीश जैसी है।
    • (c) 1 और 4: गलत। दोनों कथन असत्य हैं: वेतन बराबर हैं, और कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक है।
    • (d) 2 और 4: गलत। कथन 4 कार्यकाल गलत बताता है।

    उत्तर: 2 और 3: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि वेतन बराबर हैं और कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक है।

  4. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2026, सामान्य अध्ययन-IIक्या मताधिकार एक मौलिक अधिकार है? निर्वाचक नामावली का पुनरीक्षण करते हुए भारत के निर्वाचन आयोग की प्रस्थिति की विवेचना कीजिए। क्या यह निर्वाचकों की नागरिकता के प्रश्न का भी परीक्षण कर सकता है?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: विवेचना कीजिए · दृष्टिकोण: तीनों भागों का उत्तर क्रम से दें: अधिकार की प्रकृति, आयोग की प्रस्थिति, और नागरिकता पर उसकी शक्ति; हर भाग को संविधान या किसी निर्णय से पुष्ट करें।

    भूमिका: अनुच्छेद 326 से शुरुआत करें: 18 वर्ष या अधिक आयु का हर नागरिक, जब तक विधि से अयोग्य न हो, मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • अधिकार की प्रकृति: भाग 3 में नहीं; पोन्नुस्वामी (1952) और ज्योति बसु (1982) में सांविधिक माना गया; पीयूसीएल (2013), राजबाला और अनूप बरनवाल (2023) में संवैधानिक अधिकार, जैसा धारा 6क वाले 2024 के निर्णय में दर्ज है।
    • आयोग की प्रस्थिति: अनुच्छेद 324 नामावली तैयार करने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण आयोग को देता है; 2026 के निर्णय ने SIR को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक दायित्व का अंग मानकर वैध ठहराया।
    • नागरिकता: नामावली में नाम के लिए नागरिकता पूर्व-शर्त है, इसलिए आयोग केवल नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय करने के लिए इसकी जाँच कर सकता है; नागरिकता पर अंतिम निर्णय नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी का है, जिसके पास बिहार के मामले भेजने का निर्देश न्यायालय ने दिया।
    • उपचार: अनुपस्थिति, मृत्यु, दोहराव या स्थान बदलने के आधार पर हटाए गए मतदाता आयोग के निर्णय को न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि मताधिकार संवैधानिक है, मौलिक नहीं, और नागरिकता के प्रश्न पर आयोग की भूमिका नामावली तक सीमित है।

  5. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2022, सामान्य अध्ययन-IIआदर्श आचार-संहिता के उद्भव के आलोक में, भारत के निर्वाचन आयोग की भूमिका का विवेचन कीजिए ।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: विवेचन कीजिए · दृष्टिकोण: पहले संहिता का विकास बताएँ, फिर दिखाएँ कि हर चरण ने आयोग की भूमिका कैसे बढ़ाई, और अंत में उसके प्रवर्तन की आलोचना को तौलें।

    भूमिका: आदर्श आचार-संहिता को दलों और उम्मीदवारों के लिए आयोग के उन दिशानिर्देशों के रूप में परिभाषित करें, जो कार्यक्रम की घोषणा से प्रक्रिया पूरी होने तक लागू रहते हैं।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • विकास: 1960 में केरल की संहिता, 1962 में पूरे देश में भेजी गई, 1991 से कड़ाई से लागू।
    • आयोग की भूमिका: अनुच्छेद 324 की शक्तियों से सहमति पर बनी संहिता को लागू करना; सत्ताधारी दल वाला भाग, जो योजनाओं, अनुदानों, तबादलों और सरकारी तंत्र के उपयोग पर रोक लगाता है।
    • आयोग के साधन: ज़मीन पर पर्यवेक्षक, निर्वाचन ड्यूटी वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की शक्ति, और मतदान स्थगित या रद्द करने का अधिकार।
    • आलोचना: 2019 का प्रसंग, जिसमें एक निर्वाचन आयुक्त की असहमति दर्ज नहीं हुई, ने यह प्रश्न उठाया कि संहिता सब पर समान रूप से लागू होती है या नहीं।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि संहिता की शक्ति आयोग की विश्वसनीयता पर टिकी है, इसलिए आयोग की स्वतंत्रता ही संहिता को प्रभावी रखती है।

  6. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-IIइलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ई॰ वी॰ एम॰) के इस्तेमाल संबंधी हाल के विवाद के आलोक में, भारत में चुनावों की विश्वास्यता सुनिश्चित करने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग के समक्ष क्या-क्या चुनौतियाँ हैं?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: चुनौतियाँ बताइए · दृष्टिकोण: भरोसे के सामने की चुनौतियाँ गिनाएँ, फिर हर एक पर आयोग ने क्या किया, यह दिखाएँ।

    भूमिका: 2004 से सभी 543 लोक सभा क्षेत्रों में इस्तेमाल हो रही ईवीएम और उनमें छेड़छाड़ के आरोपों से शुरुआत करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • तकनीकी भरोसा: मतदाता इलेक्ट्रॉनिक गिनती नहीं देख सकता; 8 अक्टूबर 2013 को उच्चतम न्यायालय के निर्देश से आया VVPAT उसे जाँचने लायक पर्ची देता है।
    • मिलान: परिणाम घोषित होने से पहले कुछ मशीनों की पर्चियों का इलेक्ट्रॉनिक गिनती से मिलान।
    • संस्थागत भरोसा: आयुक्तों की नियुक्ति की विधि और आयोग के भीतर असहमति का दर्ज होना।
    • संवाद: सुरक्षा-उपायों को मतदाताओं और दलों को साफ़ समझाना।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि चुनावों पर भरोसा मशीन जितना ही आयोग की स्वतंत्रता पर भी निर्भर है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख निर्वाचन आयोग को संविधान के पाठ, आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी विधि, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।