परिचय
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अनुच्छेद 148 के अंतर्गत वह संवैधानिक अधिकारी हैं जो संघ और राज्यों के लेखाओं की लेखापरीक्षा करके संसद और राज्य विधान-मंडलों को प्रतिवेदन देते हैं। यह पद जाँचता है कि सार्वजनिक धन वैध ढंग से, उचित रूप से और अच्छे परिणाम के लिए खर्च हुआ या नहीं।
अनुच्छेद 148 के अंतर्गत भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
अनुच्छेद 148: कैग की नियुक्ति, शपथ, कार्यकाल और पद से हटाना
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा विभाग के प्रमुख तथा देश की सर्वोच्च लेखापरीक्षा संस्था हैं। अनुच्छेद 148 इस पद का उपबंध करता है, और अनुच्छेद 149 संसद को यह अधिकार देता है कि वह संघ, राज्यों और किसी अन्य प्राधिकरण या निकाय के लेखाओं से जुड़े उनके कर्तव्य और शक्तियाँ विधि द्वारा तय करे। इस तरह शासन के दोनों स्तरों के सार्वजनिक धन की लेखापरीक्षा एक ही अधिकारी करता है।
कैग की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से करते हैं। पद ग्रहण करने से पहले कैग राष्ट्रपति के सामने तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप में शपथ लेते हैं, जिसमें बिना भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के कर्तव्य निभाने का वचन शामिल है। 1971 के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ तथा सेवा शर्तें) अधिनियम की धारा 4 के अनुसार कार्यकाल छह वर्ष का है, जो 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर पहले भी समाप्त हो सकता है; कैग किसी भी समय राष्ट्रपति को लिखकर त्यागपत्र दे सकते हैं।
कैग को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पर लागू होते हैं। संसद के दोनों सदनों को विशेष बहुमत से सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर संकल्प पारित करना होता है, जिसके बाद राष्ट्रपति उन्हें हटाते हैं। वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में कैग संविधान और संसद की विधियों की रक्षा करते हैं, इसी कारण बी. आर. आंबेडकर ने उन्हें संविधान के अंतर्गत सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी कहा था।
1950 से अब तक भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षकों की सूची
संविधान लागू होने के बाद से पंद्रह व्यक्ति यह पद संभाल चुके हैं। वी. नरहरि राव, जो 1950 से पहले भारत के महालेखा परीक्षक थे, पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक बने और 1954 तक इस पद पर रहे। वर्तमान कैग के. संजय मूर्ति ने 21 नवंबर 2024 को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के सामने पद की शपथ ली।
| क्रम | नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | वी. नरहरि राव | 1950 से 1954 |
| 2 | ए. के. चंदा | 1954 से 1960 |
| 3 | ए. के. रॉय | 1960 से 1966 |
| 4 | एस. रंगनाथन | 1966 से 1972 |
| 5 | ए. बक्शी | 1972 से 1978 |
| 6 | ज्ञान प्रकाश | 1978 से 1984 |
| 7 | टी. एन. चतुर्वेदी | 1984 से 1990 |
| 8 | सी. जी. सोमैया | 1990 से 1996 |
| 9 | वी. के. शुंगलू | 1996 से 2002 |
| 10 | वी. एन. कौल | 2002 से 2008 |
| 11 | विनोद राय | 2008 से 2013 |
| 12 | शशि कांत शर्मा | 2013 से 2017 |
| 13 | राजीव महर्षि | 2017 से 2020 |
| 14 | गिरीश चंद्र मुर्मू | 2020 से 2024 |
| 15 | के. संजय मूर्ति | 2024 से |
कैग की स्वतंत्रता: संवैधानिक सुरक्षा-उपाय
अनुच्छेद 148 और 1971 के अधिनियम के सुरक्षा-उपाय
कैग उसी सरकार की लेखापरीक्षा करते हैं जो उन्हें नियुक्त करती है, इसलिए संविधान ने इस पद को कई सुरक्षा-उपायों से घेरा है। अनुच्छेद 148 और 1971 का अधिनियम मिलकर ये व्यवस्थाएँ करते हैं:
- पद की सुरक्षा: केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति हटाया जाना, इसलिए कैग राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर नहीं रहते।
- बाद में कोई पद नहीं: अनुच्छेद 148(4) के अनुसार पद छोड़ने के बाद कैग भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी पद के पात्र नहीं होते।
- सुरक्षित सेवा शर्तें: वेतन संसद विधि से तय करती है, और नियुक्ति के बाद वेतन, छुट्टी, पेंशन या सेवानिवृत्ति की आयु में उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं हो सकता; 1971 के अधिनियम की धारा 3 वेतन को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर रखती है।
- विभाग पर नियंत्रण: भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा विभाग के कर्मचारियों की सेवा शर्तें और कैग की प्रशासनिक शक्तियाँ राष्ट्रपति कैग से परामर्श के बाद ही तय करते हैं।
- व्यय पर मतदान नहीं: कार्यालय का प्रशासनिक व्यय, वेतन और पेंशन सहित, भारत की संचित निधि पर भारित है, इसलिए संसद उस पर मतदान नहीं करती।
एक और नियम इस पद की रक्षा करता है: संसद में कोई मंत्री कैग का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और कैग के कार्यों का उत्तरदायित्व किसी मंत्री पर नहीं डाला जा सकता। कैग विधायिका से केवल अपने लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों के माध्यम से बात करते हैं।
कैग के कर्तव्य और शक्तियाँ: अनुच्छेद 149 से 151 और 1971 का अधिनियम
अनुच्छेद 149 और 1971 का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ तथा सेवा शर्तें) अधिनियम
अनुच्छेद 149 कैग के कर्तव्य और शक्तियाँ संसद पर छोड़ता है, और संसद ने इन्हें 1971 के अधिनियम में तय किया। 1976 में इस अधिनियम में संशोधन करके संघ सरकार में लेखा को लेखापरीक्षा से अलग कर दिया गया, इसलिए कैग अब संघ के लेखे तैयार नहीं करते, हालाँकि राज्यों के लेखे अब भी उनका कार्यालय तैयार करता है।
- धारा 13: भारत की संचित निधि, हर राज्य की और विधान सभा वाले हर संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि से हुए पूरे व्यय की, तथा आकस्मिकता निधियों और लोक लेखों से जुड़े सभी लेन-देन की लेखापरीक्षा।
- धारा 14: सरकारी अनुदान या ऋण से मुख्यतः चलने वाले निकायों की लेखापरीक्षा, अर्थात् जिन्हें किसी वर्ष कम से कम 25 लाख रुपये का अनुदान या ऋण मिला हो और वह उनके कुल व्यय का कम से कम 75 प्रतिशत हो।
- धारा 16: संचित निधियों में आने वाली सभी प्राप्तियों की लेखापरीक्षा, और यह जाँच कि नियम राजस्व के निर्धारण, संग्रह और आवंटन पर प्रभावी नियंत्रण रखते हैं।
- धारा 17: किसी भी कार्यालय या विभाग के भंडार और स्टॉक के लेखाओं की लेखापरीक्षा।
- धारा 18: कोषागारों सहित किसी भी लेखा कार्यालय का निरीक्षण, और लेखापरीक्षा से जुड़ी पुस्तकें तथा दस्तावेज़ मँगाने का अधिकार।
- धारा 19 और 20: कंपनी अधिनियम के अंतर्गत सरकारी कंपनियों की और अपनी-अपनी विधियों के अंतर्गत निगमों की लेखापरीक्षा, तथा राष्ट्रपति या राज्यपाल के अनुरोध पर किसी अन्य निकाय की लेखापरीक्षा।
| अनुच्छेद | क्या उपबंध करता है |
|---|---|
| 148 | कैग का पद: नियुक्ति, शपथ, हटाना, सेवा शर्तें, बाद में कोई पद नहीं, व्यय संचित निधि पर भारित |
| 149 | संघ, राज्यों और अन्य निकायों के लेखाओं से जुड़े कर्तव्य और शक्तियाँ, जैसा संसद विधि से तय करे |
| 150 | संघ और राज्यों के लेखे उस प्रारूप में रखे जाते हैं जो राष्ट्रपति कैग की सलाह पर तय करते हैं |
| 151 | संघ के लेखाओं पर प्रतिवेदन राष्ट्रपति को और किसी राज्य के लेखाओं पर राज्यपाल को, ताकि वे विधायिका के सामने रखे जाएँ |
| 279 | कैग किसी कर या शुल्क के शुद्ध आगम का निर्धारण और प्रमाणन करते हैं, और उनका प्रमाणपत्र अंतिम होता है |
अनुच्छेद 279 केंद्र-राज्य वित्त में भी कैग को भूमिका देता है। किसी कर का शुद्ध आगम, अर्थात् उसके आगम में से संग्रह की लागत घटाकर बची राशि, कैग प्रमाणित करते हैं, और यही प्रमाणपत्र तय करता है कि बँटवारे के लिए कितना धन उपलब्ध है। ये आगम कैसे बँटते हैं, यह वित्त आयोग और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में समझाया गया है।
नियंत्रक या केवल लेखापरीक्षक? कैग की भूमिका की सीमाएँ
पदनाम में नियंत्रक शब्द है, पर भारत में कैग केवल लेखापरीक्षक के रूप में काम करते हैं। संचित निधि से धन निकलने पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है: विभाग कैग की पूर्व स्वीकृति के बिना धन निकालते हैं, और कैग लेखापरीक्षा के चरण में ही, धन खर्च हो जाने के बाद, सामने आते हैं। इसके विपरीत ब्रिटेन में कार्यपालिका सार्वजनिक कोष से धन केवल नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वीकृति से ही निकाल सकती है।
लेखापरीक्षा की कुछ और सीमाएँ भी हैं। गुप्त सेवा व्यय के मामले में कैग ब्योरा नहीं माँग सकते और सक्षम प्राधिकारी का यह प्रमाणपत्र मान लेते हैं कि धन उसके अधिकार से खर्च हुआ। कुछ निगमों की लेखापरीक्षा निजी लेखापरीक्षक करते हैं, जिन्हें सरकार कैग से परामर्श करके नियुक्त करती है; इसके बाद कैग पूरक लेखापरीक्षा कर सकते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के लेखे कैग की लेखापरीक्षा के दायरे में बिल्कुल नहीं आते।
कैग लेखापरीक्षा के प्रकार: वैधता, औचित्य और निष्पादन
वैधानिक और विनियामक लेखापरीक्षा तथा औचित्य लेखापरीक्षा
बुनियादी कसौटी वैधता है। धारा 13 कैग से यह जाँचने को कहती है कि खर्च दिखाया गया धन उस प्रयोजन के लिए वैध रूप से उपलब्ध था या नहीं, और खर्च उसे नियंत्रित करने वाले प्राधिकार के अनुरूप हुआ या नहीं। यह वैधानिक और विनियामक लेखापरीक्षा अनिवार्य है।
वैधता से आगे औचित्य लेखापरीक्षा है, जो पूछती है कि खर्च में विवेक, निष्ठा और मितव्ययिता बरती गई या नहीं, और कैग को फ़िज़ूलखर्ची तथा अपव्यय पर टिप्पणी करने देती है। यह अनिवार्य नहीं, विवेकाधीन है। सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार (2013) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कैग सरकार के सभी खर्चों के औचित्य, वैधता और मान्यता की जाँच करते हैं, और यह भी कि कैग का कर्तव्य धन खर्च होने के बाद ही आरंभ होता है।
निष्पादन लेखापरीक्षा: मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता
निष्पादन लेखापरीक्षा यह पूछती है कि सार्वजनिक धन से क्या हासिल हुआ, अर्थात् सरकार ने अपने संसाधनों का उपयोग कितनी मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता से किया। कैग इसे वित्तीय और अनुपालन लेखापरीक्षाओं के साथ करते हैं। 13 जून 2006 को वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि निष्पादन लेखापरीक्षा 1971 के अधिनियम के अंतर्गत कैग के दायरे में आती है, और कैग के लेखापरीक्षा और लेखा विनियम, 2007 में इसका उपबंध किया गया।
अरविंद गुप्ता बनाम भारत संघ मामले में इस शक्ति को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई, जहाँ याचिकाकर्ता का तर्क था कि कैग को निष्पादन लेखापरीक्षा प्रतिवेदन देने का अधिकार नहीं है। 1 अक्टूबर 2012 को न्यायालय ने कहा कि मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता की जाँच 1971 के अधिनियम में ही अंतर्निहित है, विनियमों में कुछ भी असंवैधानिक नहीं पाया, और यह भी कहा कि ये प्रतिवेदन अनुच्छेद 151 के अंतर्गत विधायिका की जाँच के अधीन रहते ही हैं।
राज्य स्तर का एक हाल का उदाहरण दिखाता है कि ऐसी लेखापरीक्षा क्या परखती है। सितंबर 2026 में ओडिशा के जिला खनिज फ़ाउंडेशनों की कैग निष्पादन लेखापरीक्षा में पाया गया कि खनन से प्रभावित लोगों के लिए रखा धन नियमों का पालन किए बिना खर्च हुआ: क्योंझर में अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्रों पर खर्च का हिस्सा 40 प्रतिशत की सीमा के मुकाबले 45.68 प्रतिशत तक पहुँच गया।
कैग प्रतिवेदन और संसदीय जवाबदेही
कैग प्रतिवेदन और लोक लेखा समिति
अनुच्छेद 151 के अंतर्गत संघ के लेखाओं पर कैग के प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपे जाते हैं, जो उन्हें संसद के दोनों सदनों के सामने रखवाते हैं; किसी राज्य के लेखाओं पर प्रतिवेदन राज्यपाल को जाते हैं और राज्य विधान-मंडल के सामने रखे जाते हैं। कैग विधायिका के लिए लेखापरीक्षा करते हैं: वित्तीय मामलों में कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही इन्हीं प्रतिवेदनों से सुनिश्चित होती है।
सदन में रखे जाने के बाद प्रतिवेदन लोक लेखा समिति के पास जाते हैं। समिति में अधिकतम 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 लोक सभा से और अधिकतम 7 राज्य सभा से, हर वर्ष आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुने जाते हैं। 1967 से समिति का अध्यक्ष विपक्ष से होता है। कैग समिति के मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक की भूमिका निभाते हैं, और समिति प्रतिवेदनों की जाँच करके अपने निष्कर्ष संसद को देती है। कैग के प्रतिवेदनों और समिति के निष्कर्षों के आधार पर लोक सभा धन के दुरुपयोग के मामलों की जाँच कर सकती है।
कैग का प्रतिवेदन अंतिम शब्द नहीं है। अरुण कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रतिवेदन हमेशा संसद की जाँच के अधीन रहता है, संबंधित मंत्रालय अपना पक्ष रख सकता है, और लोक लेखा समिति कैग के निष्कर्ष स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। संवैधानिक प्राधिकारी का प्रतिवेदन होने के कारण उसका सम्मान है, पर केवल उसके आधार पर न्यायालय राहत नहीं देगा।
सार्वजनिक बहस को प्रभावित करने वाले कैग प्रतिवेदन
कुछ कैग प्रतिवेदन संसद से कहीं आगे तक पहुँचे। बिहार के पशुपालन विभाग पर एक प्रतिवेदन में आरोप था कि जो आपूर्तियाँ कभी हुई ही नहीं, उनके नाम पर 950 करोड़ रुपये धोखाधड़ी से निकाले गए; पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने जाँच की और 63 मामले दर्ज किए। इस तरह लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों की जानकारी जाँच एजेंसियों के लिए शुरुआती आधार बन सकती है, जबकि कैग स्वयं केवल लेखापरीक्षा करके प्रतिवेदन देते हैं।
2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंसों पर प्रतिवेदन में 1,76,600 करोड़ रुपये की अनुमानित हानि बताई गई। सीबीआई के 2 अप्रैल 2011 के आरोप-पत्र में हानि 31,000 करोड़ रुपये आँकी गई, और 21 दिसंबर 2017 को विशेष न्यायालय ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया। यह प्रसंग कैग प्रतिवेदन की पहुँच और उसकी सीमा, दोनों दिखाता है: लेखापरीक्षा में हानि का अनुमान अपराध का प्रमाण नहीं है, और दोष का निर्णय न्यायालय साक्ष्य के आधार पर करते हैं।
कैग की आलोचना और प्रस्तावित सुधार
इस पद के तीखे आलोचक भी रहे हैं। भारतीय प्रशासन पर अपने प्रतिवेदनों में पॉल एच. एपलबी ने कैग के कार्य को काफ़ी हद तक औपनिवेशिक शासन की विरासत बताया और निर्णय लेने तथा कार्य करने के प्रति व्यापक और पंगु बना देने वाली अनिच्छा के लिए लेखापरीक्षा को दोषी ठहराया; उन्होंने यहाँ तक सुझाव दिया कि कैग को लेखापरीक्षा के दायित्व से मुक्त कर दिया जाए।
दूसरी ओर लेखापरीक्षा का दायरा बढ़ाने का दबाव रहा है। नवंबर 2009 में तत्कालीन कैग ने सरकार से 1971 के अधिनियम में संशोधन का अनुरोध किया, ताकि सार्वजनिक-निजी भागीदारी, पंचायती राज संस्थाएँ और सरकारी धन पाने वाली समितियाँ कैग की लेखापरीक्षा में आएँ और दस्तावेज़ों तक उसकी पहुँच मज़बूत हो। बाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सरकार के साथ राजस्व-साझेदारी वाले सौदों में निजी कंपनियों की लेखापरीक्षा कैग कर सकते हैं। विशेष उद्यमों की तकनीकी लेखापरीक्षा के लिए प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफ़ारिश पर 1968 में कैग के कार्यालय में एक अध्यक्ष और दो सदस्यों वाला लेखापरीक्षा बोर्ड बनाया गया।
कैग भारत से बाहर भी लेखापरीक्षा करते हैं। वे संयुक्त राष्ट्र के बाह्य लेखापरीक्षकों के पैनल के नियमित सदस्य हैं, 2011 में संयुक्त राष्ट्र लेखापरीक्षक बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए, और खाद्य एवं कृषि संगठन तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन के बाह्य लेखापरीक्षक हैं।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2012 (हिंदी रूपांतर)भारत में, यह सुनिश्चित करने के अलावा कि सार्वजनिक धन का कुशलतापूर्वक और निर्धारित प्रयोजन के लिए उपयोग हो, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के पद का क्या महत्त्व है?
- राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपात/वित्तीय आपात की घोषणा होने पर कैग संसद की ओर से राजकोष पर नियंत्रण रखता है।
- मंत्रालयों द्वारा परियोजनाओं या कार्यक्रमों के निष्पादन पर कैग के प्रतिवेदनों पर लोक लेखा समिति चर्चा करती है।
- कैग के प्रतिवेदनों की जानकारी का उपयोग जाँच एजेंसियाँ सार्वजनिक वित्त के प्रबंधन में विधि का उल्लंघन करने वालों पर आरोप लगाने के लिए कर सकती हैं।
- सरकारी कंपनियों की लेखापरीक्षा और लेखांकन करते समय कैग के पास विधि का उल्लंघन करने वालों पर अभियोजन चलाने की कुछ न्यायिक शक्तियाँ होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1 गलत है। संचित निधि से धन निकलने पर कैग का कभी कोई नियंत्रण नहीं होता; आपात से यह नियंत्रण नहीं मिल जाता। चरण 2: कथन 2 सही है। कैग के प्रतिवेदनों की जाँच लोक लेखा समिति करती है। चरण 3: कथन 3 सही है। लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों के निष्कर्ष जाँच का शुरुआती आधार बने हैं, जैसे बिहार के पशुपालन मामले में, जहाँ सीबीआई ने 63 मामले दर्ज किए। चरण 4: कथन 4 गलत है। कैग लेखापरीक्षा करके प्रतिवेदन देते हैं; किसी पर अभियोजन चलाने की न्यायिक शक्ति उनके पास नहीं है।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 विश्वसनीय लगता है क्योंकि पदनाम में नियंत्रक शब्द है; भारत में यह पद राजकोष पर नियंत्रण कभी नहीं रखता था।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1, 3 और 4: गलत। कथन 1 और 4 कैग को ऐसी शक्तियाँ देते हैं जो उनके पास नहीं हैं।
- (b) केवल 2: गलत। यह कथन 3 को छोड़ देता है, जो सही है।
- (c) केवल 2 और 3: सही। प्रतिवेदनों पर लोक लेखा समिति चर्चा करती है, और जाँच एजेंसियाँ उनकी जानकारी का उपयोग कर सकती हैं।
- (d) 1, 2, 3 और 4: गलत। कैग के पास न राजकोष पर नियंत्रण है, न न्यायिक शक्तियाँ।
उत्तर: केवल 2 और 3: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि कैग केवल लेखापरीक्षा करके प्रतिवेदन देते हैं।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन-सा कर्तव्य भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक नहीं निभाते?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: विकल्प (a), (b) और (c) 1971 के अधिनियम की धारा 13 को दोहराते हैं: संचित निधि, आकस्मिकता निधियों और लोक लेखों, तथा व्यापारिक, विनिर्माण और लाभ-हानि लेखाओं की लेखापरीक्षा। चरण 2: विकल्प (d) सार्वजनिक धन की प्राप्ति और निकासी पर नियंत्रक के नियंत्रण का वर्णन करता है, जो भारत के कैग के पास नहीं है। चरण 3: उत्तर वही एक कर्तव्य है जो इस पद के पास नहीं है।
इस भ्रम से बचें: पदनाम में नियंत्रक शब्द विकल्प (d) को सही मानने को उकसाता है; भारत में यह पद केवल लेखापरीक्षक का है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) भारत की संचित निधि से हुए व्यय की लेखापरीक्षा: धारा 13 के अंतर्गत किया जाता है, इसलिए यह उत्तर नहीं।
- (b) आकस्मिकता निधियों और लोक लेखों की लेखापरीक्षा: धारा 13 के अंतर्गत किया जाता है, इसलिए यह उत्तर नहीं।
- (c) व्यापारिक, विनिर्माण और लाभ-हानि लेखाओं की लेखापरीक्षा: धारा 13 के अंतर्गत किया जाता है, इसलिए यह उत्तर नहीं।
- (d) सार्वजनिक धन की प्राप्ति और निकासी पर नियंत्रण: नहीं किया जाता, इसलिए यही उत्तर है।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर, क्योंकि सार्वजनिक धन की निकासी पर कैग का कोई नियंत्रण नहीं है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2024, सामान्य अध्ययन-II“नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कर्तव्य केवल व्यय की वैधता सुनिश्चित करना ही नहीं बल्कि उसका औचित्य भी सुनिश्चित करना है ।” टिप्पणी कीजिए ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुच्छेद 148 के अंतर्गत कैग को विधायिका के लिए सार्वजनिक खर्च के लेखापरीक्षक के रूप में प्रस्तुत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- वैधता: 1971 के अधिनियम की धारा 13 पूछती है कि धन वैध रूप से उपलब्ध था और अधिकृत ढंग से खर्च हुआ या नहीं; यह अनिवार्य है।
- औचित्य: विवेक, निष्ठा और मितव्ययिता; फ़िज़ूलखर्ची और अपव्यय पर टिप्पणी; सुब्रमण्यम बालाजी (2013) में न्यायालय ने कहा कि कैग औचित्य, वैधता और मान्यता की जाँच करते हैं।
- औचित्य से आगे: मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता की निष्पादन लेखापरीक्षा, जिसे अरविंद गुप्ता (2012) में सही ठहराया गया।
- सीमाएँ: औचित्य लेखापरीक्षा विवेकाधीन है, खर्च के बाद ही होती है, और उसके निष्कर्ष लोक लेखा समिति तथा संसद तौलती हैं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि औचित्य ही लेखापरीक्षा को बहीखाते से आगे जवाबदेही तक ले जाता है, जबकि अंतिम निर्णय संसद का रहता है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-II“नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सी॰ ए॰ जी॰) को एक अत्यावश्यक भूमिका निभानी होती है।” व्याख्या कीजिए कि यह किस प्रकार उसकी नियुक्ति की विधि और शर्तों और साथ ही साथ उन अधिकारों के विस्तार से परिलक्षित होती है, जिनका प्रयोग वह कर सकता है।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: कैग को भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा विभाग के प्रमुख के रूप में प्रस्तुत करें, जिन्हें आंबेडकर ने संविधान के अंतर्गत सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी कहा था।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- विधि और शर्तें: राष्ट्रपति द्वारा अधिपत्र से नियुक्ति; छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु; केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति हटाया जाना; बाद में कोई पद नहीं; न्यायाधीश के बराबर वेतन जो अलाभकारी रूप से नहीं बदला जा सकता; व्यय संचित निधि पर भारित।
- शक्तियाँ: संचित निधियों, आकस्मिकता निधियों और लोक लेखों, प्राप्तियों, भंडार, मुख्यतः अनुदान से चलने वाले निकायों और सरकारी कंपनियों की लेखापरीक्षा (धारा 13 से 19); अनुच्छेद 279 के अंतर्गत शुद्ध आगम का प्रमाणन।
- लेखापरीक्षा की पहुँच: वैधता, औचित्य और निष्पादन लेखापरीक्षा।
- संसद से कड़ी: अनुच्छेद 151 के अंतर्गत प्रतिवेदन, जिनकी जाँच लोक लेखा समिति करती है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि स्वतंत्र कार्यकाल और व्यापक लेखापरीक्षा शक्तियाँ मिलकर कैग को संसद की ओर से कार्यपालिका पर नज़र रखने देती हैं।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2016, सामान्य अध्ययन-IIसंघ और राज्यों के लेखाओं के सम्बन्ध में, नियंत्रक और महालेखापरीक्षक की शक्तियों का प्रयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 149 से व्युत्पन्न है । चर्चा कीजिए कि क्या सरकार की नीति कार्यान्वयन की लेखापरीक्षा करना अपने स्वयं (नियंत्रक और महालेखापरीक्षक) की अधिकारिता का अतिक्रमण करना होगा या कि नहीं ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अनुच्छेद 149 से शुरुआत करें, जो कैग के कर्तव्य और शक्तियाँ संसद पर छोड़ता है, और 1971 के अधिनियम से, जो उन्हें तय करता है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- अधिकारिता के भीतर: मितव्ययिता, दक्षता और प्रभावशीलता की निष्पादन लेखापरीक्षा 1971 के अधिनियम में अंतर्निहित है, जैसा अरविंद गुप्ता (2012) में उच्चतम न्यायालय ने कहा; 2006 में वित्त मंत्रालय ने भी यही स्पष्ट किया।
- रेखा: कार्यान्वयन और परिणामों की जाँच लेखापरीक्षा है; नीतियों के बीच चयन कार्यपालिका और संसद का काम है।
- चिंताएँ: 2जी की अनुमानित हानि जैसे लेखापरीक्षा अनुमान पर प्रश्न उठ सकते हैं; बाद में आपराधिक मामले का निर्णय न्यायालय ने साक्ष्य पर किया।
- सुरक्षा: हर प्रतिवेदन अनुच्छेद 151 के अंतर्गत विधायिका में जाता है, जहाँ लोक लेखा समिति और मंत्रालय उस पर आपत्ति कर सकते हैं (अरुण कुमार अग्रवाल, 2013)।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि कार्यान्वयन की लेखापरीक्षा कैग के अधिदेश में है, जबकि नीति पर निर्णय संसद का है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2017, सामान्य अध्ययन-IIजनता के प्रति सरकार की जवाबदेही स्थापित करने में लोक लेखा समिति की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: लोक लेखा समिति को उस संसदीय समिति के रूप में प्रस्तुत करें जो कैग के लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों की जाँच करती है।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- संरचना: अधिकतम 22 सदस्य, 15 लोक सभा से और अधिकतम 7 राज्य सभा से, हर वर्ष आनुपातिक प्रतिनिधित्व से चुने जाते हैं; 1967 से अध्यक्ष विपक्ष से।
- जवाबदेही: कैग की सहायता से प्रतिवेदनों की जाँच और संसद को निष्कर्ष, जिससे मंत्रालयों को अपने खर्च का स्पष्टीकरण देना पड़ता है।
- उदाहरण: सितंबर 2026 में रेलवे स्टेशनों की सुविधाओं पर कैग प्रतिवेदन की जाँच।
- सीमाएँ: समिति खर्च के बाद जाँच करती है, और प्रतिवेदन पर मंत्रालय का पक्ष और संसद का निर्णय बाकी रहता है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि लोक लेखा समिति कैग के निष्कर्षों को संसद तक ले जाकर जनता के प्रति जवाबदेही की कड़ी पूरी करती है।
स्रोत
- Legislative Department, Ministry of Law and Justice: The Constitution of India
- Comptroller and Auditor General of India: The CAG's (Duties, Powers and Conditions of Service) Act, 1971, with judgments and the Finance Ministry's 2006 clarification
- President of India: Press communique, K. Sanjay Murthy sworn in as Comptroller and Auditor General, 21 November 2024
- Akashvani News: K Sanjay Murthy sworn in as CAG of India, 21 November 2024
- NCERT: Indian Constitution at Work, Class 11, Chapter 5, Legislature
- The Hindu (Delhi): PAC pulls up Railways over gaps in amenities despite promises, 18 September 2026
- The Hindu (Delhi): CAG report flags irregularities in use of DMF funds in Odisha, 29 September 2026
- Wikipedia: Comptroller and Auditor General of India
- Wikipedia: Public Accounts Committee (India)
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख कैग को संविधान के पाठ, कैग से जुड़े अधिनियम, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।
