परिचय
राष्ट्रीय अधिकरण आयोग
2026 का अधिकरण सुधार अधिनियम राष्ट्रीय अधिकरण आयोग बनाता है, जो न्यायपालिका के नेतृत्व वाला निकाय है और 16 अधिकरणों (न्यायाधिकरण) के अध्यक्षों और सदस्यों का चयन करता है, उनके प्रदर्शन की समीक्षा करता है और उनके विरुद्ध शिकायतों की निगरानी करता है। संसद ने इसे 10 और 11 अगस्त 2026 को पारित किया, ताकि अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 की जगह ले सके, जिसके कुछ उपबंध उच्चतम न्यायालय रद्द कर चुका था।
अधिकरण सुधार अधिनियम 2026: यह चर्चा में क्यों है
अगस्त 2026 में पारित विधेयक और सितंबर के नियम
लोकसभा ने 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष के विरोध के बीच, बिना बहस के ध्वनिमत से विधेयक पारित किया; राज्यसभा ने इसे एक संक्षिप्त चर्चा के बाद पारित किया, जिसमें विपक्ष बहिर्गमन के कारण शामिल नहीं हुआ। विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि इससे अधिकरण सदस्यों के चयन में एकरूपता आएगी और दक्षता, पारदर्शिता तथा स्वतंत्रता बढ़ेगी, और यह किसी अधिकरण की अधिकारिता नहीं बदलता।
इसके बाद केंद्रीय विधि मंत्रालय ने आयोग को काम में लाने वाले नियम जारी किए। 30 सितंबर के राष्ट्रीय अधिकरण आयोग और अधिकरणों के अध्यक्ष तथा सदस्यों की अर्हता, चयन और सेवा शर्तें नियम, 2026 आयोग के अध्यक्ष का वेतन 2.5 लाख रुपये प्रति माह और सदस्यों का 2.25 लाख रुपये तय करते हैं, और अधिकरणों के अध्यक्षों तथा सदस्यों के लिए भी यही वेतन है। किसी रिक्ति को भरने की प्रक्रिया उसके होने से कम से कम छह महीने पहले शुरू करनी होगी, और चयन समितियाँ विशेषज्ञ मूल्यांकन, व्यक्तिगत बातचीत और आवश्यकता होने पर लिखित अभ्यास से उम्मीदवारों को परखेंगी।
राष्ट्रीय अधिकरण आयोग तक पहुँचाने वाले उच्चतम न्यायालय के निर्णय
यह अधिनियम अधिकरणों पर नियंत्रण को लेकर संसद और उच्चतम न्यायालय के बीच लंबे संवाद की नई कड़ी है। न्यायालय मानता है कि अधिकरण विशेषज्ञों को तकनीकी विवाद अदालतों से तेज़ी से निपटाने देते हैं, पर उसका आग्रह है कि वे उन मंत्रालयों से स्वतंत्र रहें, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते हैं।
- एस.पी. संपत कुमार (1987) और एल. चंद्र कुमार (1997): न्यायालय ने माना कि अधिकरणों के निर्णय उच्च न्यायालयों की समीक्षा के अधीन रहते हैं, क्योंकि न्यायिक पुनर्विलोकन मूल ढाँचे का भाग है।
- रोजर मैथ्यू (2019): वित्त अधिनियम 2017 से संसद द्वारा नियुक्तियों पर कार्यपालिका का नियंत्रण बढ़ाने के बाद न्यायालय ने एक स्वतंत्र, सांविधिक राष्ट्रीय अधिकरण आयोग की सिफ़ारिश की।
- 2021 का अध्यादेश और अधिनियम: अधिकरण सुधार अध्यादेश 2021 और फिर अधिकरण सुधार अधिनियम 2021 ने वे शर्तें लौटा दीं जिन्हें न्यायालय अस्वीकार कर चुका था, जैसे चार वर्ष का कार्यकाल और न्यूनतम 50 वर्ष की आयु।
- मद्रास बार एसोसिएशन (2025): 19 नवंबर 2025 को न्यायालय ने दोबारा बनाए गए उपबंध रद्द किए, पहले का ढाँचा बहाल किया और सरकार को चार महीने में आयोग बनाने को कहा।
भारत में अधिकरण: संवैधानिक आधार और पुनर्गठन
अनुच्छेद 323क और 323ख में अंतर: प्रशासनिक और अन्य अधिकरण
मूल संविधान में अधिकरणों का कोई उपबंध नहीं था। 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम ने भाग 14क जोड़ा, जो 3 जनवरी 1977 से लागू हुआ और जिसमें केवल दो अनुच्छेद हैं।
| विशेषता | अनुच्छेद 323क | अनुच्छेद 323ख |
|---|---|---|
| विषय | लोक सेवकों की भर्ती और सेवा शर्तों के लिए प्रशासनिक अधिकरण | अन्य विषयों के अधिकरण, जैसे कराधान, विदेशी मुद्रा, औद्योगिक और श्रम विवाद, भूमि सुधार, नगरीय संपत्ति की सीमा, निर्वाचन, खाद्य पदार्थ और किराया |
| कौन विधि बना सकता है | केवल संसद | संसद और राज्य विधानमंडल, अपने-अपने विषयों पर |
| पदानुक्रम | अधिकरणों का कोई पदानुक्रम नहीं | अधिकरणों का पदानुक्रम बनाया जा सकता है |
अनुच्छेद 323क(2)(घ) संसद को यह अनुमति देता था कि वह अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकारिता हटा दे। एल. चंद्र कुमार मामले में न्यायालय ने यह अपवर्जन और अनुच्छेद 323ख का मिलता-जुलता खंड रद्द कर दिया, इसलिए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेशों के विरुद्ध अपील पहले उच्च न्यायालय की खंडपीठ में जाती है। अनुच्छेद 323क के अंतर्गत संसद ने 1985 में प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम पारित किया, और उसी वर्ष दिल्ली में प्रधान पीठ के साथ केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) बना; इसके सदस्य न्यायिक और प्रशासनिक, दोनों धाराओं से आते हैं।
अधिकरण सुधार अधिनियम 2021 और अधिकरणों का विलय
अधिकरण विशेषज्ञ और तेज़ न्याय के लिए बने थे, पर उनकी संख्या बढ़ती गई, और बाद में कई अधिकरण दूसरों में मिला दिए गए: प्रतिस्पर्धा अपील अधिकरण राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण में, और हवाई अड्डा आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अपील अधिकरण तथा साइबर अपील अधिकरण दूरसंचार विवाद निपटान और अपील अधिकरण में।
2021 का अध्यादेश, जो बाद में अधिकरण सुधार अधिनियम 2021 बना, और आगे गया। इसने फ़िल्म प्रमाणन अपील अधिकरण सहित दस अपीलीय निकाय समाप्त किए और उनका काम उच्च न्यायालयों तथा अन्य न्यायिक निकायों को सौंप दिया; 2021 के अधिनियम ने अध्यक्षों के पदनाम एकरूप किए और नियुक्तियाँ एक खोज-सह-चयन समिति को सौंपीं। आलोचना यह थी कि पहले से बोझ से दबे न्यायालयों पर और मामले आ गए, जबकि नियुक्ति, कार्यकाल और हटाने पर कार्यपालिका का नियंत्रण बना रहा।
2026 के अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय अधिकरण आयोग
आयोग की संरचना, नियुक्ति और कार्यकाल
नई दिल्ली में मुख्यालय वाले आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य हैं। अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति रहे हों; दो न्यायिक सदस्य किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या न्यायाधीश रहे हों; दो तकनीकी सदस्यों के पास लोक प्रशासन, वित्त, विधि, लेखा, बैंकिंग, प्रबंधन या प्रौद्योगिकी में कम से कम 25 वर्ष का अनुभव हो।
- नियुक्ति: केंद्र सरकार भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के बाद अध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति करती है।
- आयोग का कार्यकाल: अध्यक्ष और सदस्य पाँच वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, पद पर रहते हैं।
- अधिकरण सदस्यों का कार्यकाल: पाँच वर्ष या 67 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति संभव है, जिसमें पिछली सेवा और प्रदर्शन देखे जाते हैं।
कार्य, डेटा ग्रिड और भारत में आयोग के अधीन अधिकरणों की सूची
- चयन: आयोग खोज-सह-चयन समितियों के माध्यम से अधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों का चयन करता है।
- प्रदर्शन समीक्षा: यह अधिकरणों के प्रदर्शन की निगरानी करता है और केंद्र सरकार को वार्षिक रिपोर्ट भेजता है।
- शिकायतें: यह अधिकरण सदस्यों के विरुद्ध शिकायतों की जाँच की देखरेख करता है।
- राष्ट्रीय अधिकरण डेटा ग्रिड: यह इस पोर्टल को बनाता और चलाता है, जिसमें सभी 16 अधिकरणों के मामलों की जानकारी रहती है।
भारत सरकार के एक सचिव की अध्यक्षता वाला सचिवालय आयोग की सहायता करता है, संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों का पैनल बनाता है और वार्षिक रिपोर्ट तैयार करता है। धन के मामले में, हर अधिकरण अपनी निधि, कर्मचारियों और परिसर की ज़रूरतें बताता है, सचिवालय उन्हें एक साथ रखता है और आयोग एक वस्तुनिष्ठ ढाँचे पर उनका आकलन करता है; संसद के अनुदान स्वीकृत करने के बाद धन केंद्र ही देता है, और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक आयोग का लेखा परीक्षण करता है, जिसकी रिपोर्ट दोनों सदनों में रखी जाती है। कुल मिलाकर भारत में 16 अधिकरण इस आयोग के अधीन आते हैं।
| समूह | अधिनियम के अधीन अधिकरण |
|---|---|
| सेवा और प्रशासन | केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण; राज्य प्रशासनिक अधिकरण; सशस्त्र बल अधिकरण |
| कर और सीमा-शुल्क | सीमा-शुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण; आयकर अपील अधिकरण; SAFEMA, 1976 के अंतर्गत अपील अधिकरण |
| वित्त और कंपनियाँ | प्रतिभूति अपील अधिकरण; ऋण वसूली अधिकरण; ऋण वसूली अपील अधिकरण; राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण |
| क्षेत्रवार और अन्य | दूरसंचार विवाद निपटान और अपील अधिकरण; विद्युत् अपील अधिकरण; राष्ट्रीय हरित अधिकरण; राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग; रेल दावा अधिकरण; औद्योगिक संबंध संहिता के अंतर्गत औद्योगिक अधिकरण |
खोज-सह-चयन समितियाँ और समय-सीमाएँ
धारा 13 बताती है कि चयन कौन करेगा। अधिकरण के अध्यक्ष के चयन के लिए समिति की अध्यक्षता आयोग का अध्यक्ष करता है; उसमें एक तकनीकी सदस्य, आयोग अध्यक्ष द्वारा नामित उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायमूर्ति, भारत सरकार का एक सचिव (राज्य प्रशासनिक अधिकरण के लिए उस राज्य का मुख्य सचिव), उम्मीदवारों का आकलन करने वाले दो पैनलबद्ध विशेषज्ञ, और सदस्य सचिव के रूप में आयोग का सचिव होते हैं। अधिकरण सदस्य के चयन में आयोग का एक न्यायिक सदस्य अध्यक्षता करता है, और सेवानिवृत्त न्यायाधीश उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होता है।
- मतदान: समिति के अध्यक्ष के पास निर्णायक मत है; सदस्य सचिव और विशेषज्ञ मत नहीं देते।
- हर पद पर एक नाम: समिति हर रिक्ति के लिए एक उम्मीदवार और प्रतीक्षा सूची के लिए एक नाम सुझाती है, नामों का पैनल नहीं।
- समय-सीमाएँ: सचिवालय तीन दिन में सिफ़ारिश केंद्र को भेजता है, और केंद्र को तीन महीने में नियुक्ति करनी होती है।
अधिकरणों की स्वतंत्रता: 2026 के अधिनियम के लाभ और चिंताएँ
लाभ और चिंताएँ: प्रत्यायोजित नियम, मंत्रालय की छानबीन, कार्यपालिका नियंत्रण
अधिनियम न्यायालय की कई आपत्तियों का उत्तर देता है। यह अधिकरण सदस्यों का पाँच वर्ष का कार्यकाल बहाल करता है, एकरूप सेवा शर्तें लाता है, राष्ट्रीय अधिकरण डेटा ग्रिड बनाता है और पहले से लंबित नियुक्तियों को नहीं रोकता। आयोग में न्यायिक बहुमत है, उसकी चयन समितियों की अध्यक्षता न्यायिक सदस्य करते हैं, और हर पद पर एक ही सिफ़ारिश सरकार की चुनने की गुंजाइश घटाती है।
- प्रत्यायोजन: धारा 14 अधिकरण सदस्यों की अर्हता, चयन, वेतन और सेवा शर्तें कार्यपालिका के नियमों पर छोड़ती है, जबकि रोजर मैथ्यू में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने माना था कि न्यायिक शक्ति का प्रयोग कौन कर सकता है, यह तय करना एक आवश्यक विधायी कार्य है।
- मंत्रालय की छानबीन: धारा 16 के अंतर्गत शिकायत आयोग तक पहुँचने से पहले एक मंत्रालय उसकी छानबीन करता है।
- आयोग में नियुक्तियाँ: आयोग के सदस्यों की नियुक्ति केंद्र करता है, और भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श केवल अध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों के लिए होता है।
- धन और हटाया जाना: आयोग के वित्त और प्रशासन पर केंद्र का पर्याप्त प्रभाव बना रहता है, और आलोचक चाहते हैं कि सदस्यों को मनमर्ज़ी से नियुक्त करने या हटाने की शक्ति समाप्त हो।
विशेषज्ञों ने धारा 3 की अस्पष्ट भाषा पर भी ध्यान दिलाया है। अधिनियम की कसौटी यह होगी कि 30 सितंबर के नियम और पहली नियुक्तियाँ आयोग को उन मंत्रालयों से दूर रखती हैं या नहीं, जिनके निर्णयों की समीक्षा अधिकरण करते हैं।
UPSC के लिए अधिकरण सुधार: सामान्य अध्ययन II
UPSC पाठ्यक्रम में अधिकरणों का स्थान
अधिकरण सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में आते हैं, न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली के अंतर्गत, और सांविधिक, विनियामक तथा विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकायों के अंतर्गत। सूत्र न्यायपालिका की स्वतंत्रता है: न्यायाधीशों को बिना भय या पक्षपात के काम कर पाना चाहिए, और संविधान इस स्वतंत्रता की रक्षा आंशिक रूप से नियुक्तियों को दलगत राजनीति से दूर रखकर करता है; राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ भी यही अनुच्छेद और मामले पूछती हैं।
- प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: भाग 14क 42वें संशोधन (1976) से जुड़ा, 3 जनवरी 1977 से लागू; अनुच्छेद 323क पर केवल संसद, 323ख पर संसद और राज्य; CAT 1985 में बना; एल. चंद्र कुमार (1997); NTC: अध्यक्ष और चार सदस्य, कार्यकाल पाँच वर्ष या 70 वर्ष आयु; अधिकरण सदस्य पाँच वर्ष या 67 वर्ष आयु; 16 अधिकरण।
- मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: अधिकरण बनाम सामान्य न्यायालय, शक्तियों का पृथक्करण, निर्णयों और पुनः अधिनियमन का क्रम, स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही।
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IIन्यायालय पद्धति की तुलना में प्रशासनिक अधिकरणों की आवश्यकता पर टिप्पणी कीजिए। 2021 में अधिकरणों के बुद्धिपरक पुनर्गठन द्वारा किए गए नूतन अधिकरण सुधारों के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अधिकरणों को भाग 14क (अनुच्छेद 323क और 323ख) के अंतर्गत अर्ध-न्यायिक निकायों के रूप में परिभाषित करें, जिसे 1976 के 42वें संशोधन ने जोड़ा।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- आवश्यकता: विशेषज्ञता, गति, कम लागत, और सेवा, कर तथा विनियामक विवादों में न्यायालयों पर बोझ कम करना।
- 2021 के सुधार: फ़िल्म प्रमाणन अपील अधिकरण सहित दस निकाय समाप्त, काम उच्च न्यायालयों को; एकरूप पदनाम; खोज-सह-चयन समिति।
- प्रभाव: उच्च न्यायालयों पर अधिक बोझ; पुराने निर्णयों के बावजूद चार वर्ष का कार्यकाल और न्यूनतम 50 वर्ष आयु; मद्रास बार एसोसिएशन (2025) में उपबंध रद्द।
- सुधार: 2026 का अधिनियम और राष्ट्रीय अधिकरण आयोग, पाँच वर्ष का कार्यकाल, डेटा ग्रिड।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अधिकरण आवश्यक हैं, पर न्यायालयों का बोझ केवल स्वतंत्र अधिकरण ही घटाते हैं; 2026 का आयोग इसी स्वतंत्रता की कसौटी है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-IIआप इस मत से कहाँ तक सहमत हैं कि अधिकरण सामान्य न्यायालयों की अधिकारिता को कम करते हैं? उपर्युक्त को दृष्टिगत रखते हुए भारत में अधिकरणों की संवैधानिक वैधता तथा सक्षमता की विवेचना कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: अधिकरणों को भाग 14क के अंतर्गत न्यायालयों का बोझ घटाने के लिए बने विशेष न्याय-निर्णायक निकायों के रूप में प्रस्तुत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- अधिकारिता में कमी: अनुच्छेद 323क(2)(घ) और 323ख का मिलता खंड अनुच्छेद 136 के अतिरिक्त सभी न्यायालयों को बाहर रखने देता था।
- सीमाएँ: एल. चंद्र कुमार (1997) ने यह अपवर्जन रद्द किया; CAT के विरुद्ध अपील पहले उच्च न्यायालय की खंडपीठ में; अधिकरण न्यायालयों के पूरक हैं, विकल्प नहीं।
- वैधता: एस.पी. संपत कुमार (1987), रोजर मैथ्यू (2019) और मद्रास बार एसोसिएशन (2025) में नियुक्ति और कार्यकाल की स्वतंत्रता।
- सक्षमता: तकनीकी सदस्यों की विशेषज्ञता बनाम कार्यपालिका नियंत्रण की चिंता; उत्तर के रूप में 2026 का राष्ट्रीय अधिकरण आयोग।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि अधिकरण तभी तक संवैधानिक रूप से वैध हैं, जब तक वे स्वतंत्र और न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन रहें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-II“केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण जिसकी स्थापना केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों द्वारा या उनके विरुद्ध शिकायतों एवं परिवादों के निवारण हेतु की गई थी, आजकल एक स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण के रूप में अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रहा है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: बताएँ कि CAT 1985 में अनुच्छेद 323क के अंतर्गत केंद्र सरकार के कर्मचारियों के सेवा विवादों के लिए बना।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- न्यायिक स्वरूप: न्यायिक और प्रशासनिक धाराओं से सदस्य; नैसर्गिक न्याय पर आधारित न्याय-निर्णय; भर्ती और सेवा मामलों पर अधिकार।
- स्वतंत्रता: एल. चंद्र कुमार ने इसे उच्च न्यायालय के पुनर्विलोकन के अधीन रखा; 2026 का अधिनियम सदस्यों को पाँच वर्ष का कार्यकाल और न्यायपालिका के नेतृत्व वाला चयन देता है।
- सीमाएँ: मुख्य वादी सरकार ही है; सेवा शर्तें कार्यपालिका के नियमों पर छोड़ी गईं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि CAT न्यायालय जैसा निकाय बन चुका है, जिसकी स्वतंत्रता अब राष्ट्रीय अधिकरण आयोग पर टिकी है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2009 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की स्थापना लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई थी।
- CAT के सदस्य न्यायिक और प्रशासनिक, दोनों धाराओं से लिए जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व में स्थापना: गलत, क्योंकि CAT 1985 में बना, जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे (1984-1989); शास्त्री 1964 से 1966 तक प्रधानमंत्री रहे। चरण 2: कथन 2, न्यायिक और प्रशासनिक धाराओं से सदस्य: सही। अतः केवल 2।
इस भ्रम से बचें: कथन 1 का निर्णय वर्ष से होता है; 1985 को उस समय के प्रधानमंत्री से मिलाएँ।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 1 गलत है, क्योंकि CAT 1985 में बना।
- (b) केवल 2: सही। केवल न्यायिक और प्रशासनिक मिश्रित सदस्यता वाला कथन सही है।
- (c) 1 और 2 दोनों: गलत। कथन 1 गलत है।
- (d) न तो 1, न ही 2: गलत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल कथन 2 सही है: विकल्प (b), आधिकारिक उत्तर।
स्रोत
- PIB: Reforming India's Tribunal System, Tribunal Reforms Bill, 2026 (backgrounder, 12 August 2026)
- Legislative Department: The Constitution of India (2024 edition), Part XIVA, Articles 323A and 323B
- NCERT: Indian Constitution at Work (Class XI), Chapter 6, Judiciary
- The Hindu, Delhi, 11 August 2026: Tribunals Reforms Bill passed amid din in LS
- The Hindu, Delhi, 12 August 2026: In the way (editorial); RS passes Tribunals Reforms Bill amid Opposition walkout
- The Hindu, Delhi, 3 October 2026: rules for the National Tribunals Commission notified
- Wikipedia: Tribunals Reforms Act, 2021
- Wikipedia: Tribunals in India
- Wikipedia: Film Certification Appellate Tribunal
- UPSC: Civil Services Examination question papers
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