परिचय

समसामयिकी
राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था – सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II और III

MMDR संशोधन अधिनियम 2026
भारत के खनिजों पर कर कौन लगाए
9D राज्य उद्ग्रहण सीमित करने वाली नई धारा43.49% खनिज मूल्य में ओडिशा का हिस्सा~90% खनन राजस्व राज्यों को
एक नज़र में
संशोधनMMDR अधिनियम, 1957
पारितलोक सभा 12 अगस्त, राज्य सभा 13 अगस्त 2026
मुख्य बदलावराज्यों के खनिज कर पर केंद्र की सीमा
पृष्ठभूमिसर्वोच्च न्यायालय, 2024: रॉयल्टी कर नहीं
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MMDR संशोधन अधिनियम 2026 खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन करके यह व्यवस्था करता है कि राज्य खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र की तय शर्तों के बाहर कोई नया कर, उपकर या उद्ग्रहण न लगा सकें, और अब तक न वसूले गए राज्य उद्ग्रहण रद्द कर देता है। संसद ने 13 अगस्त 2026 को इसे पारित किया, उस निर्णय के दो वर्ष बाद जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि रॉयल्टी कर नहीं है और खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति राज्यों की है।

MMDR संशोधन अधिनियम 2026: संसद ने अगस्त में क्या बदला

MMDR संशोधन अधिनियम 2026 क्या है: धारा 9D की व्याख्या

बदलाव का केंद्र धारा 9D है। यह खनिजों पर नए उद्ग्रहण लगाने की राज्यों की वह स्वतंत्रता छीन लेती है जिसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में की थी, और यह तय करने का काम केंद्र पर छोड़ती है कि ऐसा कोई उद्ग्रहण किन शर्तों पर लगे। केंद्र इसे खनन के लिए एक समान और संतुलित राजकोषीय ढाँचा कहता है, जबकि खनिज-सम्पन्न राज्य इसे अपनी कर लगाने की शक्ति पर आघात मानते हैं।

  • नई धारा 9D: कोई राज्य खनिज अधिकारों (mineral rights) या खनिज-युक्त भूमि (mineral-bearing land) पर कोई कर, उपकर या अन्य उद्ग्रहण, किसी भी नाम से, नहीं लगा सकता, चाहे उसका आधार खनिज की मात्रा हो, खनिज का मूल्य, रॉयल्टी या कुछ और; ऐसा उद्ग्रहण केवल केंद्र की तय की गई शर्तों के भीतर ही लग सकता है।
  • धारा 2 का विस्तार: “खानों का विनियमन” के बाद “और खनिज-युक्त भूमि” शब्द जोड़े गए हैं, जिससे संघ का नियंत्रण केवल खानों तक नहीं, खनिज वाली भूमि तक भी फैल जाता है।
  • पुराने उद्ग्रहण: संशोधन लागू होने से पहले जो राज्य उद्ग्रहण चुकाया या वसूला नहीं गया, वह अवैध माना जाएगा, किंतु जो राशि पहले ही जमा या वसूल हो चुकी है, वह लौटाई नहीं जाएगी।
  • धारा 13 के अंतर्गत नियम: केंद्र सरकार को यह तय करने वाले नियम बनाने की शक्ति मिली है कि राज्य किन शर्तों पर ऐसे उद्ग्रहण लगा सकते हैं।

क्या MMDR विधेयक पारित हुआ? बिना बहस पारित और राष्ट्रपति की अनुमति

हाँ, MMDR विधेयक पारित होकर अब विधि बन चुका है। खान मंत्रालय ने 1 जनवरी 2026 को इसके प्रस्ताव सार्वजनिक परामर्श के लिए रखे। मानसून सत्र में कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने इसे पेश करते हुए कहा कि राज्यों के अलग-अलग उद्ग्रहणों से अनिश्चितता बनी है, जिससे लागत बढ़ सकती है, आयात को बढ़ावा मिल सकता है और घरेलू आपूर्ति शृंखलाएँ कमज़ोर हो सकती हैं। RSP सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने इसे संघवाद के विरुद्ध बताते हुए इसके पेश किए जाने का विरोध किया।

  • लोक सभा, 12 अगस्त: विपक्ष के विरोध के बीच बिना बहस पारित; पीठासीन थे जगदंबिका पाल।
  • राज्य सभा, 13 अगस्त: संसदीय स्थायी समिति को भेजने की विपक्ष की माँग नहीं मानी गई और सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने विधेयक को अस्वीकार करने की सूचना ठुकरा दी, जिसके बाद यह पारित हुआ।
  • अनुमति: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की अनुमति मिलने पर विधेयक अधिनियम बन गया।

खनिजों पर कर कौन लगाए: सातवीं अनुसूची और न्यायालय

संघ सूची की प्रविष्टि 54 और राज्य सूची की प्रविष्टियाँ 23, 49 और 50

खनन संघ सूची और राज्य सूची, दोनों में आता है, इसीलिए उस पर कर कौन लगाए, यह प्रश्न बार-बार न्यायालयों तक पहुँचता है। खानों का विनियमन और खनिज विकास सूची I की प्रविष्टि 54 और सूची II की प्रविष्टि 23 में है, और राज्य की प्रविष्टि संघ की प्रविष्टि के अधीन है। संसद ने आवश्यक घोषणा MMDR अधिनियम की धारा 2 में की है: लोकहित में यह समीचीन है कि खानों का विनियमन और खनिजों का विकास संघ अपने नियंत्रण में ले।

MMDR विवाद के पीछे सातवीं अनुसूची की चार प्रविष्टियाँ
प्रविष्टि सूची विषय किसके अधिकार में
प्रविष्टि 54 सूची I (संघ) खानों का विनियमन और खनिज विकास, उस सीमा तक जितनी संसद घोषित करे संसद: MMDR अधिनियम, 1957
प्रविष्टि 23 सूची II (राज्य) खानों का विनियमन और खनिज विकास, सूची I की प्रविष्टि 54 के अधीन राज्य विधानमंडल, MMDR अधिनियम की पहुँच से बाहर
प्रविष्टि 50 सूची II (राज्य) खनिज अधिकारों पर कर, खनिज विकास से संबंधित विधि द्वारा संसद की लगाई सीमाओं के अधीन कर राज्य लगाते हैं; सीमा संसद लगा सकती है
प्रविष्टि 49 सूची II (राज्य) भूमि और भवनों पर कर, खनिज-युक्त भूमि सहित कर राज्य लगाते हैं
आरेख: संघ सूची की प्रविष्टि 54 खानों के विनियमन और खनिज विकास से संबंधित है, जिसके अंतर्गत संसद ने MMDR अधिनियम, 1957 बनाया। राज्य सूची में प्रविष्टि 23 खान और खनिज से संबंधित है, जो प्रविष्टि 54 के अधीन है; प्रविष्टि 50 खनिज अधिकारों पर कर से संबंधित है, जिस पर संसद सीमा लगा सकती है और 2026 का अधिनियम धारा 9D के माध्यम से यही करता है; प्रविष्टि 49 भूमि पर कर से संबंधित है, जिसमें खनिज-युक्त भूमि भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में कहा कि प्रविष्टि 50 की सीमाएँ प्रविष्टि 49 पर लागू नहीं होतीं; 2026 का अधिनियम खनिज अधिकार और खनिज-युक्त भूमि दोनों को छूता है।

क्या रॉयल्टी कर है? जुलाई 2024 का नौ न्यायाधीशों वाला MADA निर्णय

रॉयल्टी कर नहीं है। खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकरण बनाम भारतीय इस्पात प्राधिकरण (Mineral Area Development Authority v. Steel Authority of India) में 25 जुलाई 2024 को नौ न्यायाधीशों की पीठ का यही केंद्रीय निष्कर्ष था: रॉयल्टी वह संविदात्मक प्रतिफल है जो खनन पट्टाधारी खनिज अधिकारों के उपभोग के लिए पट्टाकर्ता को देता है। इस निर्णय ने इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य का निर्णय पलट दिया, जिसमें सात न्यायाधीशों की पीठ ने रॉयल्टी को कर मानकर राज्यों से खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति छीन ली थी।

  • कर की शक्ति राज्यों की: खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति राज्य विधानमंडलों में निहित है; संसद प्रविष्टि 54 के अंतर्गत, जो एक सामान्य प्रविष्टि है, खनिज अधिकारों पर कर नहीं लगा सकती।
  • संसद सीमा लगा सकती है: प्रविष्टि 50 के अंतर्गत संसद “कोई भी सीमाएँ” लगा सकती है, जिनमें प्रतिबंध, शर्तें, सिद्धांत और निषेध तक शामिल हैं, किंतु उस समय के MMDR अधिनियम में ऐसी कोई सीमा नहीं थी।
  • भूमि अलग विषय: राज्य प्रविष्टि 49 के अंतर्गत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं, और माप के रूप में उत्पादित खनिज की मात्रा या रॉयल्टी ले सकते हैं; प्रविष्टि 50 के अंतर्गत लगी सीमाएँ प्रविष्टि 49 पर लागू नहीं होतीं।

अगस्त 2024 का आदेश: 2005 से बकाया, बारह वर्ष की किस्तों में

जुलाई के निर्णय के बाद केंद्र और खनन कंपनियों ने न्यायालय से कहा कि इसे केवल भविष्य के लिए लागू किया जाए, क्योंकि इंडिया सीमेंट का निर्णय पैंतीस वर्ष तक प्रभावी रहा था। 14 अगस्त 2024 को न्यायालय ने उसे भावी प्रभाव देने से इनकार किया, किंतु अतीत पर उसका असर नरम कर दिया।

  1. राज्य प्रविष्टि 49 और 50 के अंतर्गत कर की माँग कर सकते थे या उसे नया कर सकते थे, किंतु 1 अप्रैल 2005 से पहले के लेन-देन पर नहीं।
  2. माँग की राशि 1 अप्रैल 2026 से आरंभ होकर बारह वर्ष की किस्तों में चुकाई जानी थी।
  3. 25 जुलाई 2024 से पहले की अवधि की माँगों पर ब्याज और शास्ति सभी करदाताओं के लिए माफ़ कर दी गई।

यही तारीखें 2026 के अधिनियम का समय समझाती हैं। पहली किस्तें 1 अप्रैल 2026 से वसूली जा सकती थीं, और अब अधिनियम हर उस उद्ग्रहण को अवैध मानता है जो उसके लागू होने से पहले वसूल नहीं हुआ।

समयरेखा: 1957 में MMDR अधिनियम खानों के विनियमन को संघ के नियंत्रण में रखता है; 2004 में ओडिशा खननकर्ताओं पर कर के लिए ORISED अधिनियम बनाता है; 2015 में नीलामी और जिला खनिज प्रतिष्ठान; 2023 में केंद्र महत्त्वपूर्ण खनिजों के ब्लॉकों की नीलामी करता है; जुलाई 2024 में सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि रॉयल्टी कर नहीं है; अगस्त 2024 में वह 2005 से बकाया की वसूली बारह वर्ष की किस्तों में मानता है; जनवरी 2026 में खान मंत्रालय संशोधन पर परामर्श करता है; अगस्त 2026 में संशोधन खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों के उद्ग्रहण सीमित करता है।

MADA मामले में परिसंघीय सर्वोच्चता और समरस अर्थान्वयन

विधायी शक्ति के टकराव सुलझाने के लिए न्यायालय जिन दो सिद्धांतों का प्रयोग करते हैं, वे इस मामले में दिखते हैं। परिसंघीय सर्वोच्चता का सिद्धान्त (principle of federal supremacy) अनुच्छेद 246 से आता है: अपरिहार्य टकराव में सूची I के विषय पर संसद की शक्ति सूची II के विषय पर राज्य की शक्ति पर भारी पड़ती है। किंतु इसका सहारा तभी लिया जा सकता है जब प्रविष्टियों में सीधा और असमाधेय टकराव हो।

समरस अर्थान्वयन (harmonious construction) का अर्थ है एक-दूसरे पर चढ़ती प्रविष्टियों को इस तरह पढ़ना कि दोनों लागू रहें और कोई भी निरर्थक न हो जाए। MADA में बहुमत का तर्क इन दोनों को दर्शाता है: उसने प्रविष्टि 49 और 50 को अलग-अलग क्षेत्र माना, कहा कि संसद किसी विनियामक प्रविष्टि की आड़ में राज्यों की कर की शक्ति अपने हाथ में नहीं ले सकती, और यह भी कि जहाँ सीधा टकराव नहीं है वहाँ परिसंघीय सर्वोच्चता लागू नहीं होती।

MMDR अधिनियम का राज्यों के राजस्व पर असर

रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, DMF और खनन पर अन्य उद्ग्रहण

खनन से मिलने वाली अधिकांश राशि राज्य पहले से ही वसूलते हैं। केंद्र के अनुसार राज्य खनन पर लगभग 14 कर, प्रभार और शुल्क लगाते हैं, जिनमें रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डेड रेंट (dead rent), जिला खनिज प्रतिष्ठान को भुगतान, GST और पारगमन शुल्क शामिल हैं; कुछ राज्यों ने खनिज-युक्त भूमि पर भी 20 प्रतिशत तक की दर से कर लगाना शुरू कर दिया था।

  • हिस्सेदारी: खनन क्षेत्र के राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को जाता है।
  • प्रमुख खनिज राज्य: 2015-16 से 2025-26 के बीच इन्हें 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक मिले, जबकि केंद्र को लगभग 82,000 करोड़ रुपये।
  • नीलामी प्रीमियम: 2015 की नीलामी व्यवस्था से बना नया स्रोत; 2020-21 से 2025-26 के बीच प्रमुख खनन राज्यों ने इससे 96,000 करोड़ रुपये से अधिक वसूले।
  • एक खेप का हिसाब: लौह अयस्क की औसत बिक्री कीमत 3,000 रुपये प्रति टन होने पर खनन कंपनी 3,150 रुपये चुकाती है, जिसमें से 3,016 रुपये राज्य को जाते हैं।

ये आँकड़े केंद्र के इस तर्क का आधार हैं कि राज्यों का नुकसान कम है। राज्यों का उत्तर है कि अधिनियम वह स्रोत छीन लेता है जिसकी पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय ने अभी-अभी की थी, और उसके साथ बकाया राशि भी।

गौण खनिज और जिला खनिज प्रतिष्ठान राज्यों के पास ही

गौण खनिज (minor minerals) हैं: भवन-निर्माण के पत्थर, बजरी, साधारण मिट्टी, विहित प्रयोजनों में लगने वाली रेत को छोड़कर साधारण रेत, और ऐसा कोई भी अन्य खनिज जिसे केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा गौण खनिज घोषित करे (धारा 3(e))। सूची बढ़ाने का अधिकार केंद्र का है, विनियमन का अधिकार राज्यों का।

  • गौण खनिजों के नियम: धारा 15 के अंतर्गत गौण खनिजों के उत्खनन पट्टों, खनन पट्टों और अन्य रियायतों के नियम राज्य सरकारें बनाती हैं, और धारा 5 से 13 उन पर लागू नहीं होतीं।
  • 2026 के अधिनियम से अप्रभावित: लगभग 50 गौण खनिज, जिनमें रेत, बजरी, मिट्टी, सिलिका, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम और लैटेराइट शामिल हैं, पूरी तरह राज्यों के नियंत्रण में बने रहते हैं।
  • जिला खनिज प्रतिष्ठान: धारा 9B के अंतर्गत राज्य सरकार खनन से प्रभावित हर जिले में यह गैर-लाभकारी न्यास बनाती है, जिसका उद्देश्य खनन से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित और लाभ के लिए काम करना है।

राज्यों का खनिज राजस्व: खनन कौन करता है और वसूली किसकी

खनिज संपदा कुछ ही राज्यों में केंद्रित है, इसलिए अधिनियम का भार भी उन्हीं पर पड़ता है। 2024-25 में खनिज उत्पादन के मूल्य (परमाणु, ईंधन और गौण खनिजों को छोड़कर) का लगभग 97.70% आठ राज्यों से आया।

स्तंभ चार्ट: 2024-25 में खनिज उत्पादन के मूल्य में हिस्सेदारी, परमाणु, ईंधन और गौण खनिजों को छोड़कर: ओडिशा 43.49%, राजस्थान 16.26%, छत्तीसगढ़ 13.69%, कर्नाटक 12.42%, महाराष्ट्र 4.76%, झारखंड 3.26%, मध्य प्रदेश 2.78%, आंध्र प्रदेश 1.04%, अन्य सभी राज्य 2.30%।

ओडिशा ने 67,955.89 करोड़ रुपये मूल्य के खनिजों का उत्पादन किया, जो किसी भी राज्य से अधिक है, और 2026-27 में उसके अनुमानित राजस्व का 37.59% खनन से आता है। देश के कुल खनिजों का लगभग 40% झारखंड में है। दोनों राज्य अधिनियम को चुनौती देने वालों में आगे हैं।

नीलामी के साथ राज्यों का राजस्व बढ़ा है। 2014 से खनिज उत्पादन से राज्यों का राजस्व 354 प्रतिशत बढ़ा है, और कोयला सहित उन्हें 7 लाख करोड़ रुपये से अधिक मिले हैं। प्रमुख खनिज राज्यों को 2013-14 में 13,586.16 करोड़ रुपये और 2025-26 में 82,366.19 करोड़ रुपये मिले; कोयले में राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 2014-15 के 55.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 89.5 प्रतिशत हो गई।

MMDR अधिनियम पर बहस: समान खनिज कराधान बनाम राजकोषीय संघवाद

केंद्र का पक्ष: एकरूपता, आयात और महत्त्वपूर्ण खनिज

केंद्र का तर्क है कि खनिज संपदा कुछ राज्यों में है, पर उससे पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था चलती है, इसलिए उस पर कर राष्ट्रीय प्रश्न है। उसके अनुसार राज्यों के असमान उद्ग्रहण भारतीय खनिजों को आयातित खनिजों से महँगा बना देते हैं।

  • आयात: 2025-26 में भारत ने 10,12,529 करोड़ रुपये के खनिज आयात किए, और देशी खनिज महँगे होने पर इस्पात उद्योग आयात की ओर मुड़ता है।
  • सामरिक खनिज: उद्ग्रहण ग्रेफाइट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों और यूरेनियम जैसे परमाणु खनिजों तक पहुँचते हैं, जिससे उनका खनन अलाभकारी हो सकता है।
  • एक राष्ट्रीय बाज़ार: राज्यों के बहुत अलग उद्ग्रहण बाज़ार को बाँटते हैं और परिवहन व लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ाते हैं; खान पर लगा उद्ग्रहण इस्पात, सीमेंट और बिजली से होता हुआ घरों तक पहुँचता है।
  • रोज़गार और निवेश: कोयला क्षेत्र में 5 लाख से अधिक और गैर-कोयला क्षेत्र में 1 करोड़ से अधिक लोग काम करते हैं, और निवेशक स्थिर कर-व्यवस्था में ही पूँजी लगाते हैं।

उद्योग भी सहमत है। FICCI की खनन समिति के अध्यक्ष, जो NMDC के प्रमुख भी हैं, ने कहा कि अधिनियम उद्ग्रहण व्यवस्था में एकरूपता और पूर्वानुमेयता लाएगा।

राज्यों का पक्ष: ओडिशा, झारखंड और केरल

  • ओडिशा: एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के अनुसार राज्य का 2005 से 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया बनता था, जो 1 अप्रैल 2026 से वसूला जा सकता था, और इसके अलावा उपकर से हर वर्ष 50,000 करोड़ रुपये; राज्य ने स्वयं कोई आधिकारिक अनुमान नहीं दिया है। 2021-22 में अधिक खनन के लिए खननकर्ताओं पर लगी 22,000 करोड़ रुपये की शास्ति में से 16,000 करोड़ रुपये वसूले जा चुके थे; शेष अब पहुँच से बाहर है।
  • झारखंड: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे राज्यों को विश्वास में लिए बिना पारित “काला विधेयक” कहा; राज्य अपना राजस्व नुकसान लगभग 14,000 करोड़ रुपये आँकता है और सर्वोच्च न्यायालय जाएगा।
  • केरल: मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने आपत्ति की कि अधिनियम भूमि को, जो राज्य सूची की प्रविष्टि 18 है, केंद्र के दायरे में ले आता है, और कोल्लम के चवरा तटीय क्षेत्र की इल्मेनाइट, रूटाइल, गार्नेट और मोनाज़ाइट वाली खनिज रेत का उल्लेख किया।
दो स्तंभ। केंद्र का पक्ष: खनन पर अभी लगभग 14 उद्ग्रहण; देशी खनिज महँगे होने पर आयात; उद्ग्रहण से ग्रेफाइट और यूरेनियम का खनन अलाभकारी; एक राष्ट्रीय खनिज बाज़ार; खनन राजस्व का लगभग 90% अब भी राज्यों को; गौण खनिज अप्रभावित। राज्यों का पक्ष: सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी कर की शक्ति मानी; 2005 से बकाया अवैध कर दिया गया; भूमि राज्य का विषय है; ओडिशा और झारखंड को सबसे अधिक हानि; विधेयक बिना बहस पारित; खनन की क्षति का भार किस पर। झारखंड ने कहा है कि वह अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देगा।

ओडिशा का विवाद दो दशक पुराना है। 2004 में उसने खननकर्ताओं पर कर लगाने के लिए ओडिशा ग्रामीण अवसंरचना और सामाजिक-आर्थिक विकास (ORISED) अधिनियम बनाया; उड़ीसा उच्च न्यायालय ने उसे रद्द कर दिया और राज्य ने अपील की। आलोचक यह भी पूछते हैं कि सुकिंदा घाटी के क्रोमाइट प्रदूषण से लेकर विस्थापन तक खनन की क्षति का उत्तरदायित्व किसका होगा, जब राज्य की कर लगाने की शक्ति ही चली जाए।

राजकोषीय संघवाद और सर्वोच्च न्यायालय में आने वाली चुनौती

राजकोषीय संघवाद (fiscal federalism) का अर्थ है संघ और राज्यों के बीच कर लगाने और व्यय करने की शक्तियों का बँटवारा। MMDR अधिनियम में पहली बार राज्यों के खनिज अधिकार करों पर प्रविष्टि 50 के अंतर्गत सीमा आई है, वही रास्ता जिसे MADA ने खुला बताया था।

यह विवाद एक पुराने क्रम का हिस्सा है। संविधान आर्थिक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करता है, जबकि राज्यों पर उत्तरदायित्व बहुत हैं और राजस्व के स्रोत बहुत कम; राज्य स्वायत्तता की माँगों में लंबे समय से राजस्व के स्वतंत्र स्रोत और संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की माँग रही है, जिसे वित्तीय स्वायत्तता कहा जाता है। खनिज राज्यों के लिए खनिजों पर कर ऐसा ही एक स्रोत था।

कठिन प्रश्न भूमि का है। MADA ने कहा था कि प्रविष्टि 50 की सीमाएँ प्रविष्टि 49 के अंतर्गत भूमि पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति तक नहीं पहुँचतीं, जबकि 2026 का अधिनियम खनिज अधिकारों के साथ खनिज-युक्त भूमि को भी छूता है। न्यायालय से यह भी पूछा जाएगा कि क्या कोई विधि उन बकाया माँगों को अवैध कर सकती है जिनकी अनुमति सर्वोच्च न्यायालय ने दी थी।

MMDR अधिनियम 1957: नीलामी, DMF और महत्त्वपूर्ण खनिज

MMDR अधिनियम 1957 और उसके 2015 तथा 2023 के संशोधन

खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 पूर्वेक्षण और खनन की केंद्रीय विधि है: यह तय करता है कि खनिज रियायत कौन ले सकता है, कितने समय के लिए और किन भुगतानों पर। अधिकांश रियायतें राज्य देते हैं और इसी के अंतर्गत राजस्व वसूलते हैं।

  • 2015 का संशोधन: खनन रियायतें नीलामी से दी जाने लगीं और विवेकाधीन आवंटन समाप्त हुआ; जिला खनिज प्रतिष्ठान और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास बने; पट्टे 30 के स्थान पर 50 वर्ष के हुए।
  • तब से नीलामी: 17 राज्यों में 723 प्रमुख खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई है, और 2025-26 सबसे अच्छा वर्ष रहा, जिसमें रिकॉर्ड 212 ब्लॉक नीलाम हुए।
  • 2023 का संशोधन: प्रथम अनुसूची के भाग D में सूचीबद्ध महत्त्वपूर्ण खनिजों के खनन पट्टे या संयुक्त अनुज्ञप्ति की नीलामी केंद्र सरकार करती है (धारा 11D), किंतु रॉयल्टी और नीलामी की राशि राज्य को ही मिलती है; अन्वेषण अनुज्ञप्ति भी शुरू हुई।
  • राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन: 29 जनवरी 2025 को स्वीकृत, 2030-31 तक 16,300 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ।

UPSC के लिए MMDR अधिनियम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II और III

पाठ्यक्रम में खनिज कर विवाद कहाँ आता है

MMDR अधिनियम सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में संघीय ढाँचे, संघ और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण और राजकोषीय संघवाद के प्रश्नों के अंतर्गत, और प्रश्नपत्र III में खनिज संसाधनों और अवसंरचना के अंतर्गत आता है। राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ भी यही विषय पूछती हैं।

  1. प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: सूची I की प्रविष्टि 54; सूची II की प्रविष्टियाँ 23, 49 और 50; MADA, 25 जुलाई 2024, रॉयल्टी कर नहीं; 1 अप्रैल 2005 से बकाया, 1 अप्रैल 2026 से बारह वर्ष की किस्तों में; धारा 9D; धारा 15 के अंतर्गत गौण खनिज; धारा 9B के अंतर्गत जिला खनिज प्रतिष्ठान।
  2. मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: परिसंघीय सर्वोच्चता और समरस अर्थान्वयन; समान कराधान बनाम राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता; खनिज-सम्पन्न राज्यों का राजस्व; खनन से प्रभावित लोगों के अधिकार।

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-II (हिंदी रूपांतर)न्यायालयों द्वारा विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित विवादास्पद मुद्दों के समाधान से 'परिसंघीय सर्वोच्चता का सिद्धान्त' और 'समरस अर्थान्वयन' उभरे हैं। स्पष्ट कीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: स्पष्ट कीजिए · दृष्टिकोण: हर सिद्धांत की परिभाषा दें, बताएँ कि वह संविधान और न्यायिक निर्णयों में कहाँ से आता है, और दोनों को सातवीं अनुसूची के एक विवाद से समझाएँ; खनन और खनिज कराधान इसका सबसे स्पष्ट हाल का उदाहरण है।

    भूमिका: आरंभ में सातवीं अनुसूची की तीन सूचियों का उल्लेख करें और बताएँ कि प्रविष्टियाँ एक-दूसरे पर चढ़ें तो न्यायालयों को तय करना पड़ता है कि किसकी विधि मान्य होगी।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • परिसंघीय सर्वोच्चता: अनुच्छेद 246 से, जहाँ खंड (1) खंड (2) और (3) पर भारी है; सूची I की शक्ति सूची II की शक्ति पर भारी पड़ती है, पर केवल सीधे और असमाधेय टकराव में।
    • समरस अर्थान्वयन: प्रविष्टियों को साथ पढ़ा जाता है ताकि कोई निरर्थक न हो; सर्वोच्चता से पहले यही रास्ता अपनाया जाता है।
    • उदाहरण: MADA (2024) में सूची I की विनियामक प्रविष्टि 54 खनिज अधिकारों (प्रविष्टि 50) और भूमि (प्रविष्टि 49) पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति को नहीं निगल सकी, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्र माना गया; संसद केवल प्रविष्टि 50 पर सीमा लगा सकती है, जो अब MMDR संशोधन अधिनियम 2026 करता है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में कहें कि दोनों सिद्धांत मिलकर संघ की प्रधानता बनाए रखते हैं और राज्यों की प्रविष्टियों को खोखला नहीं होने देते; इसी से संविधान सशक्त केंद्र और संघवाद में संतुलन बनाता है।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2025निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. कथन I: भारत में राज्य सरकारों के पास गौण खनिजों के निष्कर्षण के बारे में रियायत देने के लिए नियम बनाने की कोई शक्ति नहीं है, भले ही ऐसे खनिज उनके अपने भूभाग में अवस्थित हों।
    2. कथन II: भारत में केन्द्र सरकार के पास प्रासंगिक विधि के अधीन गौण खनिजों को अधिसूचित करने की शक्ति है।

    उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?

    1. a कथन I और कथन II दोनों सही हैं तथा कथन II, कथन I की व्याख्या करता है
    2. b कथन I और कथन II दोनों सही हैं किन्तु कथन II, कथन I की व्याख्या नहीं करता है
    3. c कथन I सही है किन्तु कथन II सही नहीं है
    4. d कथन I सही नहीं है किन्तु कथन II सही है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: कथन I और कथन II

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन I कहता है कि गौण खनिजों की रियायत के नियम बनाने की शक्ति राज्यों के पास नहीं है: गलत, क्योंकि धारा 15 राज्य सरकारों को ठीक यही शक्ति देती है। चरण 2: कथन II कहता है कि केंद्र गौण खनिजों को अधिसूचित कर सकता है: सही, क्योंकि धारा 3(e) केंद्र सरकार को अधिसूचना द्वारा किसी अन्य खनिज को गौण खनिज घोषित करने देती है। चरण 3: कथन I गलत, कथन II सही, अतः विकल्प (d)।

    इस भ्रम से बचें: गौण खनिज की अधिसूचना कौन देता है (केंद्र) और उसकी रियायत के नियम कौन बनाता है (राज्य), ये दो अलग बातें हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) दोनों सही, कथन II कथन I की व्याख्या: गलत। कथन I गलत है; धारा 15 के अंतर्गत नियम राज्य बनाते हैं।
    • (b) दोनों सही, व्याख्या नहीं: गलत। कथन I गलत है।
    • (c) कथन I सही, कथन II गलत: गलत। स्थिति ठीक उलटी है।
    • (d) कथन I गलत, कथन II सही: सही। नियम राज्य बनाते हैं; गौण खनिज की अधिसूचना केंद्र देता है।

    उत्तर: कथन I गलत, कथन II सही: विकल्प (d), जो आधिकारिक उत्तर है।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2016 (हिंदी रूपांतर)भारत में 'जिला खनिज प्रतिष्ठानों' का/के क्या उद्देश्य है/हैं?
    1. खनिज-सम्पन्न जिलों में खनिज-खोज संबंधी क्रियाकलापों को बढ़ावा देना
    2. खनिज-कार्य से प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा करना
    3. राज्य सरकारों को खनिज-खोज के लिए अनुज्ञप्ति जारी करने के लिए प्राधिकृत करना

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

    1. a केवल 1 और 2
    2. b केवल 2
    3. c केवल 1 और 3
    4. d 1, 2 और 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, खनिज-खोज को बढ़ावा देना: गलत, प्रतिष्ठान का उद्देश्य खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों का कल्याण है; खोज के लिए अलग न्यास है। चरण 2: कथन 2, खनिज-कार्य से प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा: सही, यही धारा 9B में प्रतिष्ठान का घोषित उद्देश्य है। चरण 3: कथन 3, राज्यों को खोज की अनुज्ञप्ति देने के लिए प्राधिकृत करना: गलत, अनुज्ञप्तियाँ अधिनियम के रियायत संबंधी उपबंधों से मिलती हैं, प्रतिष्ठान से नहीं। अतः केवल 2।

    इस भ्रम से बचें: खोज को बढ़ावा राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास देता है; जिला खनिज प्रतिष्ठान खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के लिए है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1 और 2: गलत। खोज को बढ़ावा देना प्रतिष्ठान का उद्देश्य नहीं है।
    • (b) केवल 2: सही। इसका उद्देश्य खनन से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों का हित और लाभ है।
    • (c) केवल 1 और 3: गलत। न खोज, न अनुज्ञप्ति देना इसका उद्देश्य है।
    • (d) 1, 2 और 3: गलत। केवल कथन 2 प्रतिष्ठान का उद्देश्य है।

    उत्तर: केवल 2: विकल्प (b), जो आधिकारिक उत्तर है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख अधिनियम, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, NCERT, PIB के दस्तावेज़ों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।