परिचय
2026 का नौ न्यायाधीशों का निर्णय
उद्योग की परिभाषा तय करती है कि भारत के औद्योगिक विवाद विधि का सहारा कौन-से कर्मकार ले सकते हैं। 20 अगस्त 2026 को उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि 1978 की व्यापक व्याख्या, अर्थात् बैंगलोर वाटर सप्लाई मामले का त्रि-परीक्षण, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p) में उद्योग का अर्थ तय नहीं करेगा, हालाँकि निरसित 1947 के अधिनियम के लंबित मामलों पर वही लागू रहेगा।
उद्योग पर नौ न्यायाधीशों की पीठ का 20 अगस्त 2026 का निर्णय
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह में उच्चतम न्यायालय ने क्या कहा
नौ न्यायाधीशों को भेजा गया निर्देश (reference) उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह मामले से आया था और प्रश्न यह था कि बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा के 1978 के निर्णय ने उद्योग की परिभाषा ठीक दी थी या नहीं। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा लिखे उस सात न्यायाधीशों के निर्णय ने 1947 के अधिनियम की धारा 2(j) को इतना व्यापक पढ़ा कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थाएँ और नगरपालिकाएँ भी उसमें आ गईं, और केवल न्यायपालिका, विधि व्यवस्था और रक्षा जैसे मूल संप्रभु कार्य बाहर रहे।
48 वर्षों तक इसी व्याख्या के सहारे अनेक तरह के कामों में लगे कर्मकार नियोक्ताओं को श्रम न्यायालयों तक ले जा सके और अनुचित श्रम व्यवहारों के विरुद्ध सामूहिक सौदेबाज़ी कर सके। नया निर्णय लंबित मामलों से यह सुरक्षा नहीं छीनता, पर पुराने पूर्व-निर्णय और नई संहिता का संबंध तोड़ देता है, इसलिए संहिता में उद्योग का अर्थ अब नए सिरे से तय होगा।
नौ न्यायाधीशों तक निर्देश: जय बीर सिंह (2005) और चार प्रश्न
1978 की कसौटी पर संदेह दो दशक पुराना है। 2005 में जय बीर सिंह मामले में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने बैंगलोर वाटर सप्लाई निर्णय पर प्रश्न उठाकर उसे पुनर्विचार के लिए भेजा; सात न्यायाधीशों की पीठ ने 2 जनवरी 2017 के आदेश से मामला नौ न्यायाधीशों को सौंपा। 16 फ़रवरी 2026 को नौ न्यायाधीशों की पीठ ने चार प्रश्न तय किए।
- क्या 1978 के निर्णय में दी गई कसौटी सही है।
- 1982 के संशोधन और औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का परिभाषा पर क्या प्रभाव है।
- क्या सरकार के कल्याणकारी कार्य औद्योगिक गतिविधियाँ हैं।
- धारा 2(j) के अंतर्गत संप्रभु कार्यों का दायरा क्या है।
प्रश्न तय होने तक औद्योगिक संबंध संहिता 21 नवंबर 2025 को लागू होकर 1947 के अधिनियम का निरसन कर चुकी थी। इसलिए कई न्यायाधीशों ने माना कि निर्देश का औचित्य समाप्त हो गया था: निरसित अधिनियम के अंतर्गत आगे कोई मामला नहीं आ सकता, और संहिता की धारा 2(p) की व्याख्या स्वयं न्यायालय के सामने थी ही नहीं।
बैंगलोर वाटर सप्लाई मामला और श्रम विधि में त्रि-परीक्षण
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(j) और 1978 का त्रि-परीक्षण
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, 11 मार्च 1947 को बना और 1 अप्रैल 1947 से लागू हुआ, ताकि औद्योगिक विवाद सुलह, माध्यस्थम् और न्यायनिर्णयन से सुलझाए जा सकें। श्रम न्यायालय तक मामला ले जाने से लेकर छँटनी के नियमों तक, इसकी हर सुरक्षा इस पर टिकी थी कि नियोक्ता उद्योग चलाता है या नहीं, इसलिए धारा 2(j) की परिभाषा तय करती थी कि सुरक्षा किसे मिलेगी।
1978 के निर्णय ने इस परिभाषा को त्रि-परीक्षण (triple test) का रूप दिया। कोई गतिविधि तब उद्योग है, जब ये तीनों शर्तें एक साथ पूरी हों:
- सुव्यवस्थित गतिविधि: काम सुव्यवस्थित या संगठित हो।
- सहयोग: काम नियोक्ता और कर्मकारों के सहयोग से चलता हो।
- मानवीय आवश्यकताएँ: गतिविधि मानवीय आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए वस्तुएँ या सेवाएँ बनाती या बाँटती हो, विशुद्ध धार्मिक या आध्यात्मिक आवश्यकताओं को छोड़कर।
लाभ के उद्देश्य को अप्रासंगिक माना गया: निर्णायक था गतिविधि का स्वरूप, न कि उसे कौन और क्यों चलाता है। जो संस्था एक साथ कई काम करती हो, उसके लिए निर्णय ने प्रमुख स्वरूप की कसौटी (dominant nature test) अपनाई, जिसमें मुख्य गतिविधि तय करती है कि पूरी संस्था उद्योग है या नहीं।
औद्योगिक संबंध संहिता 2020: धारा 2(p) और उससे आए बदलाव
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 तीन अधिनियमों को समेकित करती है: ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947। संसद ने इसे सितंबर 2020 में पारित किया, लोकसभा ने 22 और राज्यसभा ने 23 सितंबर को; राष्ट्रपति ने 28 सितंबर 2020 को स्वीकृति दी, और यह 21 नवंबर 2025 से लागू हुई। यह दूसरे राष्ट्रीय श्रम आयोग की सिफ़ारिशों पर आधारित है।
संहिता की धारा 2(p) उद्योग को नियोक्ता और कर्मकार के सहयोग से चलने वाली कोई भी सुव्यवस्थित गतिविधि मानती है, चाहे उसमें पूँजी लगी हो या नहीं और लाभ का उद्देश्य हो या नहीं; इससे गैर-लाभकारी और कम पूँजी वाली गतिविधियाँ भी इसमें आ जाती हैं। संहिता संप्रभु कार्यों और धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी संस्थाओं को बाहर रखती है। उदाहरण के लिए, अंतरिक्ष विभाग के कर्मचारी इस परिभाषा से बाहर हैं और श्रमिक संघ (ट्रेड यूनियन) नहीं बना सकते; वे केंद्रीय सिविल सेवा (सेवा संघों की मान्यता) नियम, 1993 के अंतर्गत सेवा संघों में संगठित होते हैं।
| विशेषता | औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 | औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 |
|---|---|---|
| उद्योग की परिभाषा | धारा 2(j), 1978 के त्रि-परीक्षण के माध्यम से | धारा 2(p): नियोक्ता-कर्मकार सहयोग से सुव्यवस्थित गतिविधि; पूँजी और लाभ अप्रासंगिक |
| कर्मकार | संकरी परिभाषा | धारा 2(zr) में बिक्री संवर्धन कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार और 18,000 रुपये प्रति माह तक कमाने वाले पर्यवेक्षक भी शामिल |
| कामबंदी, छँटनी, समापन | 100 से अधिक कर्मकारों पर सरकार की पूर्व अनुमति | 300 से अधिक कर्मकारों पर पूर्व अनुमति |
| न्यायनिर्णयन | सरकार द्वारा निर्देश | दो सदस्यीय औद्योगिक अधिकरण, एक न्यायिक और एक प्रशासनिक सदस्य |
संहिता हर प्रतिष्ठान में हड़ताल से पहले 14 दिन की सूचना अनिवार्य करती है, और किसी दिन आधे से अधिक कर्मकारों के सामूहिक आकस्मिक अवकाश को भी हड़ताल मानती है। इसने नियमों की संख्या 105 से घटाकर 51 और प्रपत्रों की 37 से 18 की, नियत अवधि रोजगार शुरू किया, और 51 प्रतिशत सदस्यता वाले श्रमिक संघ को सामूहिक सौदेबाज़ी के लिए वार्ताकार संघ का दर्जा दिया। धारा 2(p) में त्रि-परीक्षण का सार काफ़ी हद तक बना हुआ है, इसलिए असल प्रश्न यह था कि संहिता के शब्द 1978 के निर्णय के सहारे पढ़े जाएँ या नए सिरे से; नौ न्यायाधीशों ने नए सिरे से पढ़ने का रास्ता चुना।
चार श्रम संहिताएँ: 29 केंद्रीय विधियों का समेकन और अब तक की प्रगति
औद्योगिक संबंध संहिता उन चार श्रम संहिताओं में से एक है, जो मिलकर 29 केंद्रीय श्रम विधियों को समेकित करती हैं। चारों को 21 नवंबर 2025 से लागू घोषित किया गया; दिसंबर 2025 में प्रारूप नियम प्रकाशित करने के बाद केंद्र सरकार ने मई 2026 में 30 से अधिक राजपत्र अधिसूचनाओं के ज़रिए नियम जारी कर इन्हें पूरी तरह क्रियाशील किया।
- मजदूरी: मजदूरी संहिता, 2019 मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 की जगह लेती है, और न्यूनतम मजदूरी तथा समय पर भुगतान को सभी कामगारों के लिए सार्वभौमिक बनाती है।
- औद्योगिक संबंध: औद्योगिक संबंध संहिता श्रमिक संघों, स्थायी आदेशों और औद्योगिक विवादों से जुड़ी है।
- सामाजिक सुरक्षा: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 असंगठित क्षेत्र और गिग तथा प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाती है।
- सुरक्षा और कार्य दशाएँ: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता, 2020 13 केंद्रीय श्रम विधियों की जगह लेती है।
संहिताओं के पक्ष में सरल अनुपालन, कर्मकार और उद्योग की व्यापक परिभाषा, और उन कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा है, जो पुरानी विधियों से छूट गए थे। विरोध श्रमिक संघों की ओर से है: नियम प्रकाशित होने पर दस केंद्रीय श्रमिक संघों ने प्रदर्शन किया, और विपक्षी दलों ने इन्हें कामगारों के अधिकारों पर सीधा प्रहार कहा। औद्योगिक संबंध संहिता हड़ताल पर अधिक शर्तें लगाती है और कामबंदी की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर्मकार करती है, जिससे नियोक्ता सरकार की अनुमति के बिना भर्ती और छँटनी अधिक आसानी से कर सकते हैं।
श्रम समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए संहिताएँ तभी पूरी तरह काम करेंगी जब हर राज्य अपने नियम अधिसूचित करे; गुजरात चारों संहिताओं के नियम अधिसूचित कर चुका है, जबकि दूसरे औद्योगिक राज्य अपने नियमों को अंतिम रूप दे रहे हैं।
नौ न्यायाधीशों के मत: बहुमत, पृथक और असहमति वाले निर्णय
मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत का बहुमत मत और पुनर्रचित कसौटी
मुख्य मत मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने लिखा, जिससे न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली सहमत रहे; न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और जॉयमाल्य बागची ने अपने पृथक मतों में सहमति जताई कि 1978 का निर्णय धारा 2(p) का आधार-स्तंभ नहीं होगा। मत के अनुसार संहिता एक स्वतंत्र विधायी अधिनियम है, जिसे उसके पाठ, योजना और उद्देश्य को ध्यान में रखकर उसकी अपनी शर्तों पर पढ़ा जाना चाहिए।
मत ने माना कि 1978 की कसौटी के मूल सिद्धांत समय की परीक्षा में खरे उतरे हैं, पर उसके तत्त्व अलग ढंग से कहे जा सकते थे, और उसने त्रि-परीक्षण का एक पुनर्रचित रूप रखा। इसे केवल "विचारित मत" कहा गया और यह केवल भावी प्रभाव से लागू है: यह लंबित कार्यवाहियों को नहीं छेड़ता, न निर्णीत मामलों को फिर खोलता है, और 1947 का अधिनियम निरसित हो जाने से इसके लिए आगे कोई मामला बचा भी नहीं। न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने जोड़ा कि संहिता लागू होने के बाद धारा 2(j) की प्राधिकृत व्याख्या की तात्कालिकता समाप्त हो गई।
| न्यायाधीश | क्या निर्देश आवश्यक था? | 2020 की संहिता के लिए 1978 की कसौटी |
|---|---|---|
| मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति शर्मा, अराधे और पंचोली | उत्तर दिया, पर पुनर्रचित कसौटी को काल्पनिक और केवल भावी कहा | आधार-स्तंभ नहीं; संहिता अपने पाठ से पढ़ी जाएगी |
| न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा | निर्देश के समय आवश्यक था, निरसन के बाद अनावश्यक | सहमत: आधार-स्तंभ नहीं |
| न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची | निर्देश का समर्थन किया, पर कसौटी को दोबारा गढ़ने से इनकार | सहमत: आधार-स्तंभ नहीं |
| न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भुइयाँ | अनुचित; निर्देश का उत्तर देना आवश्यक नहीं | 1978 की व्याख्या छेड़ने से संहिता पर भी असर पड़ेगा |
न्यायमूर्ति नागरत्ना की असहमति और न्यायमूर्ति बागची का पृथक मत
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने निर्देश को अनुचित और पूरी कवायद को केवल अकादमिक माना; न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयाँ के साथ साझा मत में कहा कि निर्देश का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं, और संस्था की विश्वसनीयता अंतिमता का सम्मान करने पर टिकी है। न्यायमूर्ति नागरत्ना का तर्क था कि समावेशी परिभाषा 1978 से भी अधिक आज आवश्यक है, क्योंकि 1991 के बाद उदारीकरण और निजीकरण से बहुत से कर्मकार सुरक्षित सरकारी रोजगार से निजी नियोक्ताओं के पास चले गए।
- औद्योगिक शांति: लगभग 50 वर्षों से टिकी परिभाषा से छेड़छाड़ संहिता की व्याख्या पर भी छाया डालेगी और अनिश्चितता पैदा करेगी।
- राज्य की भूमिका: किसी गतिविधि में राज्य के शामिल होने भर से वह संप्रभु कार्य नहीं बन जाती।
- प्रमुख स्वरूप की कसौटी: कई गतिविधियों वाली संस्थाओं में प्रमुख गतिविधि ही निर्णायक रहनी चाहिए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने निर्देश का समर्थन किया, पर कसौटी को दोबारा गढ़ने से मना किया और न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के सूत्र को फिर से लिखना अविवेकपूर्ण बताया। उनके अनुसार यह आशंका निराधार थी कि इस कसौटी ने हर संगठित गतिविधि को उद्योग बना दिया; राज्य ऐसे कार्य भी कर सकता है जो संप्रभु नहीं हैं, संप्रभुता की धारणा समय के साथ बदली है, और लाभ का उद्देश्य न होने से कोई गतिविधि उद्योग से बाहर नहीं होती।
कर्मकारों और श्रम विधि पर प्रभाव: निर्णय की आलोचना और पक्ष
श्रमिक संघों की आलोचना और त्रि-परीक्षण के पक्ष में तर्क
श्रमिक संघों ने निर्णय को प्रबंधन की ओर झुकाव के रूप में देखा। अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने कहा कि बहुमत ने अहम प्रश्न भावी मुक़दमों पर छोड़ दिए, और संहिता में संप्रभु कार्यों तथा धर्मार्थ, सामाजिक या परोपकारी संस्थाओं के अपवादों को कठोरता से पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि सरकारी गतिविधि अपने-आप संप्रभु कार्य नहीं होती; सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस ने कहा कि विधायिका और न्यायपालिका दोनों कामगारों के अधिकारों की रक्षा में विफल रहीं।
कांग्रेस का तर्क था कि बहुमत की पुनर्रचित कसौटी व्यापार या कारोबार जैसे "स्पष्ट वाणिज्यिक स्वरूप" की माँग करती है और संप्रभु कार्य के अपवाद को विस्तृत करती है, और ऐसी परिकल्पना को अभिलेख पर छोड़ना श्रम न्यायालयों और औद्योगिक अधिकरणों में मुक़दमेबाज़ी को न्योता है। बहुमत का अपना उत्तर यह है कि पुनर्रचित कसौटी किसी लंबित या निर्णीत मामले पर बाध्यकारी नहीं, और नई विधि को अपनी अलग व्याख्या मिलनी चाहिए।
दाँव इसलिए भी बड़ा है कि श्रम विधि कार्यबल के केवल एक हिस्से तक पहुँचती है। श्रम विधियाँ औपचारिक या संगठित क्षेत्र के कर्मकारों की रक्षा करती हैं, अर्थात् सभी सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान और 10 या अधिक भाड़े के कर्मकारों वाले निजी प्रतिष्ठान; यही कर्मकार श्रमिक संघ बनाते हैं और बेहतर मजदूरी तथा सामाजिक सुरक्षा के लिए नियोक्ताओं से मोलभाव करते हैं। खेतिहर मज़दूरों से लेकर निर्माण कामगारों तक, बाक़ी अधिकतर कामगार अनौपचारिक क्षेत्र में हैं।
नियोक्ताओं के लिए नए सिरे से व्याख्या का अर्थ है कि संहिता के अपवादों पर बहस उनके अपने शब्दों पर होगी; अस्पतालों, स्कूलों, नगर निकायों और धर्मार्थ संस्थाओं के कर्मकारों के लिए इसका अर्थ है कि 1978 की व्याख्या में जो सुरक्षा अपने-आप मिलती थी, वह अब इस पर निर्भर करेगी कि श्रम न्यायालय धारा 2(p) को कैसे पढ़ते हैं।
UPSC के लिए उद्योग पर निर्णय और श्रम संहिताएँ: सामान्य अध्ययन II और III
श्रम बाजार सुधार, श्रम ब्यूरो और पाठ्यक्रम से जुड़ाव
यह निर्णय पाठ्यक्रम के दो हिस्सों में आता है: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में उच्चतम न्यायालय और शक्तियों का पृथक्करण, और प्रश्नपत्र III में भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतर्गत श्रम बाजार सुधार। औद्योगिक विवादों, समापन, छँटनी और कामबंदी के आँकड़े श्रम ब्यूरो से आते हैं, जो चंडीगढ़ स्थित श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का संलग्न कार्यालय है और इन्हें इंडियन लेबर जर्नल और पॉकेट बुक ऑफ़ लेबर स्टैटिस्टिक्स में प्रकाशित करता है।
- प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, धारा 2(j); बैंगलोर वाटर सप्लाई (1978), सात न्यायाधीश, न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर, त्रि-परीक्षण; जय बीर सिंह (2005); औद्योगिक संबंध संहिता 2020, धारा 2(p), 21 नवंबर 2025 से लागू; 20 अगस्त 2026 का नौ न्यायाधीशों का निर्णय; श्रम ब्यूरो, चंडीगढ़।
- मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: कर्मकारों की सुरक्षा बनाम नियोक्ताओं का लचीलापन, चार श्रम संहिताएँ और राज्यों के नियम, निरसित विधि की न्यायिक व्याख्या, और पूर्व-निर्णय की अंतिमता।
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2024, सामान्य अध्ययन-IIIभारत में श्रम बाजार सुधारों के संदर्भ में, चार ‘श्रम संहिताओं’ के गुण व दोषों की विवेचना कीजिये। इस संबंध में, अभी तक क्या प्रगति हुई है?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: 29 केंद्रीय श्रम विधियों के चार संहिताओं में समेकन से शुरू करें, जो 21 नवंबर 2025 से लागू हैं।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- गुण: नियम 105 से घटकर 51 और प्रपत्र 37 से 18; मजदूरी संहिता में न्यूनतम मजदूरी सबके लिए; गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा; कर्मकार और उद्योग की व्यापक परिभाषा (धारा 2(p), पूँजी और लाभ अप्रासंगिक)।
- दोष: कामबंदी की सीमा 100 से 300 कर्मकार; हर हड़ताल से पहले 14 दिन की सूचना; श्रमिक संघों का विरोध; 20 अगस्त 2026 के निर्णय के बाद यह अनिश्चितता कि उद्योग में कौन आता है।
- प्रगति: दिसंबर 2025 में प्रारूप नियम; मई 2026 में 30 से अधिक राजपत्र अधिसूचनाओं से केंद्रीय नियम; श्रम समवर्ती सूची में, इसलिए राज्यों को नियम अधिसूचित करने होंगे (गुजरात कर चुका, अन्य अंतिम रूप दे रहे)।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि संहिताएँ नियोक्ताओं के लचीलेपन और कर्मकारों की सुरक्षा में संतुलन तभी बना पाएँगी, जब राज्यों के नियम और नई परिभाषाओं की न्यायिक व्याख्या साथ-साथ आगे बढ़ें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2022 (हिंदी रूपांतर)भारत में निम्नलिखित में से कौन-सा एक, कामगारों को नियोजित करने वाले कारखानों में औद्योगिक विवादों, समापन, छँटनी और कामबंदी से संबंधित सूचनाओं को संकलित करता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: पूछे गए आँकड़े (विवाद, समापन, छँटनी, कामबंदी) श्रम से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें संकलित करने वाली संस्था श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन होगी। चरण 2: उसका संलग्न कार्यालय श्रम ब्यूरो, चंडीगढ़, औद्योगिक विवादों के आँकड़े इंडियन लेबर जर्नल और पॉकेट बुक ऑफ़ लेबर स्टैटिस्टिक्स में प्रकाशित करता है। चरण 3: बाक़ी तीन में से कोई भी श्रम मंत्रालय का सांख्यिकी कार्यालय नहीं है।
इस भ्रम से बचें: "औद्योगिक" शब्द उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग की ओर खींचता है, पर प्रश्न श्रम के आँकड़ों का है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय: गलत। औद्योगिक विवादों, समापन और कामबंदी के विवरण श्रम मंत्रालय का अपना कार्यालय संकलित करता है, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय नहीं।
- (b) उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग: गलत। यह वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन है, जबकि ये आँकड़े श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के हैं।
- (c) श्रम ब्यूरो: सही। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का यह संलग्न कार्यालय औद्योगिक विवादों, समापन, छँटनी और कामबंदी के आँकड़े संकलित और प्रकाशित करता है।
- (d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली: गलत। जैसा नाम बताता है, यह तकनीकी जनशक्ति की सूचना प्रणाली है; औद्योगिक विवादों और कामबंदी के विवरण श्रम ब्यूरो का काम हैं।
उत्तर: ये आँकड़े श्रम ब्यूरो संकलित करता है, इसलिए उत्तर विकल्प (c) है।
स्रोत
- PIB: Industrial Relations Code, 2020: Promoting Harmony and Ease of Doing Business (23 November 2025)
- Labour Bureau, Ministry of Labour and Employment: About Us
- Labour Bureau: Publications
- NCERT: Indian Economic Development (Class XI), Chapter 7, Employment: Growth, Informalisation and Other Issues
- The Hindu, Delhi, 21 August 2026: 1978 'industry' definition void under new code: SC; Justice Nagarathna differs
- The Hindu, Delhi, 22 August 2026: Trade unions sound the alarm over Supreme Court judgment on the definition of industry
- The Hindu, Delhi, 23 August 2026: Cong. flags concerns over SC's ruling on 'industry' definition
- The Hindu, Delhi, 24 August 2026: Triple test, adrift (editorial)
- The Hindu, Delhi, 25 August 2026: lead article on the reference; How the SC ruling redefined 'industry' (explainer)
- The Hindu, Delhi, 7 September 2026: ISRO's role is by no means diminishing
- The Hindu, Delhi, 10 May 2026: Centre operationalises Labour Codes, publishes Rules
- The Hindu, Delhi, 9 October 2026: investment, courts and the labour codes (lead article)
- Wikipedia: Industrial Disputes Act, 1947
- Wikipedia: Industrial Relations Code, 2020
- Wikipedia: Code on Wages, 2019
- Wikipedia: Code on Social Security, 2020
- Wikipedia: Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख औद्योगिक संबंध संहिता पर PIB की टिप्पणी, श्रम ब्यूरो और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
