परिचय

जीन चिकित्सा रोगी की कोशिकाओं में जीन पहुँचाकर रोग का उपचार करती है, प्रायः दोषपूर्ण जीन की जगह उसकी सामान्य प्रति, किसी अहानिकारक विषाणु या जीन-संपादन उपकरण के माध्यम से। यह चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग का अंग है, जो जीवाणुओं में मानव इंसुलिन बनाती है, प्रतिरक्षा कोशिकाओं को कैंसर के विरुद्ध तैयार करती है, आरएनए से जीन शांत करती है और रोग को उसके अणुओं से पहचानती है।

चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी: पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ

पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ: इंजीनियरी कोशिकाओं से बनी दवाएँ

जैव प्रौद्योगिकी चिकित्सा में पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी के रास्ते आई, अर्थात् मानव जीन को काटकर संवाहक से जोड़ने और किसी सूक्ष्मजीव या संवर्धित कोशिका से उस जीन का प्रोटीन बनवाने की विधि से। ऐसी दवाएँ पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ (recombinant therapeutics) कहलाती हैं। ये बड़ी मात्रा में बन सकती हैं, और मानव प्रोटीन जैसी ही होने के कारण वे अवांछित प्रतिरक्षा अनुक्रियाएँ नहीं करतीं, जो जंतुओं से लिए गए ऐसे ही उत्पाद करते हैं।

  • विश्व में स्वीकृत: लगभग 30 पुनर्योगज चिकित्सीय औषधियाँ मनुष्य के उपयोग के लिए स्वीकृत हैं, और उनमें से 12 भारत में बिकती हैं।
  • जंतु-उत्पादों से सुरक्षित: इनमें किसी अमानवीय स्रोत से संक्रमण का जोखिम नहीं होता, और ये मानव अणु से पूरी तरह मेल खाती हैं।
  • जैव-भेषज (biopharmaceutical): जैव-भेषज, या जैविक औषधि, वह दवा है जो जैविक स्रोतों में बनी हो, उनसे निकाली गई हो या आंशिक रूप से उनसे बनी हो; सीमित अर्थ में यह पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी से बनी दवा है।

इन दवाओं के पीछे के उपकरण, प्रतिबंधन एंजाइम, संवाहक, पीसीआर और जीन संपादन, पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी वाले लेख में समझाए गए हैं। यह लेख बताता है कि उन उपकरणों ने स्वास्थ्य के लिए क्या किया: जीवाणुओं में बने हार्मोन, दोषपूर्ण जीनों का सुधार, इंजीनियरी प्रतिरक्षा कोशिकाएँ, जीन को शांत करने वाला आरएनए, और रोग का शीघ्र पता लगाने वाले परीक्षण।

आनुवंशिकतः निर्मित इंसुलिन: जीवाणुओं से मानव इंसुलिन

रक्त शर्करा नियंत्रित करने वाला हार्मोन इंसुलिन एक पेप्टाइड है, जो दो छोटी पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं, शृंखला A और शृंखला B, से बना है; ये डाईसल्फाइड बंधों से जुड़ी रहती हैं। इंसुलिन की आवश्यकता वाले मधुमेह रोगियों को पहले यह मारे गए मवेशियों और सूअरों के अग्न्याशय से मिलता था, और कुछ रोगियों में इस बाहरी प्रोटीन से प्रत्यूर्जता (एलर्जी) या दूसरी प्रतिक्रियाएँ होती थीं।

जीवाणुओं में मानव इंसुलिन बनाने में एक कठिनाई थी। शरीर इंसुलिन को पहले एक प्राक्-हार्मोन के रूप में बनाता है, जिसमें पेप्टाइड 'सी' नाम का एक अतिरिक्त भाग होता है; हार्मोन के परिपक्व होते समय यह भाग अलग हो जाता है, पर जीवाणु यह नहीं कर पाता। 1983 में अमेरिकी कंपनी एली लिली ने इसका हल निकाला: उसने शृंखला A और शृंखला B के लिए दो अलग डीएनए अनुक्रम बनाए, दोनों को ई. कोलाई के प्लास्मिडों में डाला, दोनों शृंखलाएँ अलग-अलग बनवाईं और डाईसल्फाइड बंध बनाकर उन्हें जोड़ा। परिणाम शरीर के अपने इंसुलिन जैसा ही है।

जैव-भेषज और जैव-समरूप: भारत का बायोफ़ार्मा उद्योग

किसी मूल जैविक औषधि का पेटेंट समाप्त होने पर दूसरी कंपनियाँ उसकी आधिकारिक रूप से स्वीकृत, लगभग समान प्रति बना सकती हैं। ऐसी प्रति जैव-समरूप (biosimilar) कहलाती है: मूल उत्पाद के लगभग समान, पर किसी दूसरी कंपनी द्वारा बनाई गई। साधारण जेनेरिक दवा के विपरीत, जैव-समरूप एक बड़ा और जटिल अणु है, जो बनाने की विधि के छोटे-छोटे बदलावों से भी प्रभावित होता है; इसीलिए उसे समान नहीं, समरूप कहा जाता है।

भारत का औषधि उद्योग जेनेरिक-केंद्रित ढाँचे से जैव-भेषजों और जैव-समरूपों की ओर बढ़ा है। भारत विश्व के प्रमुख टीका उत्पादकों में है और उसने विश्व का पहला डीएनए कोविड-19 टीका विकसित किया। इस गतिविधि के पीछे कई कार्यक्रम हैं:

  • राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन: जैव प्रौद्योगिकी विभाग के नेतृत्व में और BIRAC द्वारा संचालित इस मिशन का बजट 25 करोड़ डॉलर है, जिसका आधा विश्व बैंक देता है; यह जैव-भेषज, टीके, जैव-समरूप, चिकित्सा उपकरण और निदान की 101 परियोजनाओं को सहायता देता है और इसने परीक्षण तथा विनिर्माण की 11 साझा सुविधाएँ बनाई हैं।
  • BIRAC: जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 2012 में स्थापित जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद, बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट जैसी योजनाओं से स्टार्ट-अप को 50 लाख रुपये तक देती है।
  • BioE3 नीति: 24 अगस्त 2024 को स्वीकृत इस नीति के क्षेत्रों में सटीक जैव-चिकित्सा (precision biotherapeutics) शामिल है, जिसके अंतर्गत हीमोफीलिया A की जीन चिकित्सा और थैलेसीमिया के जीन संपादन की परियोजनाएँ हैं।
  • क्षेत्र का आकार: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 के 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 अरब डॉलर हो गई।

टीके और मोनोक्लोनल प्रतिपिंड, जैविक औषधियों का दूसरा बड़ा वर्ग, प्रतिरक्षा तंत्र वाले अलग लेख के विषय हैं।

जीन चिकित्सा: दोषपूर्ण जीनों का सुधार

जीन चिकित्सा क्या है: कायिक और जनन-लाइन जीन चिकित्सा

जीन चिकित्सा (gene therapy) उन विधियों का समूह है, जो किसी बच्चे या भ्रूण में पहचाने गए जीन-दोष को ठीक करती हैं। व्यक्ति की कोशिकाओं में सामान्य जीन पहुँचाया जाता है, जो निष्क्रिय जीन का काम सँभाल लेता है। विषाणु, जो स्वभाव से अपने जीन संक्रमित कोशिकाओं में पहुँचाते हैं, सामान्य वाहक या संवाहक (vectors) हैं, और पहले उन्हें अहानिकारक बनाया जाता है ताकि वे रोग न करें।

पहली नैदानिक जीन चिकित्सा 1990 में एडीनोसीन डिएमीनेज (एडीए) की कमी से पीड़ित चार वर्ष की एक बालिका को दी गई। एडीए वह एंजाइम है, जिसकी प्रतिरक्षा तंत्र को आवश्यकता होती है, और यह विकार उसके जीन के लोप से होता है। चिकित्सकों ने बालिका के रक्त के लसीकाणुओं को शरीर से बाहर संवर्धित किया, पश्च विषाणु संवाहक से उनमें एडीए का कार्यशील जीन डाला और उन्हें वापस शरीर में पहुँचाया। लसीकाणु सदा जीवित नहीं रहते, इसलिए उपचार दोहराना पड़ता था; भ्रूण की आरंभिक अवस्था में कोशिकाओं में डाला गया जीन, सिद्धांत रूप में, रोग को स्थायी रूप से ठीक कर सकता है।

कायिक और जनन-लाइन जीन चिकित्सा की तुलना।
प्रकार बदली जाने वाली कोशिकाएँ क्या परिवर्तन वंशागत है?
कायिक जीन चिकित्सा (somatic) देह कोशिकाएँ, अंडाणु या शुक्राणु नहीं नहीं, केवल रोगी प्रभावित होता है
जनन-लाइन जीन चिकित्सा (germline) शुक्राणु, अंडाणु या आरंभिक भ्रूण हाँ, बच्चे की हर कोशिका में होता है

कायिक जीन चिकित्सा ही शोध और उपचार की मुख्य धारा है। जनन-लाइन जीन चिकित्सा परिवर्तन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएगी, इसीलिए भारत में इस पर रोक है: स्टेम कोशिका दिशानिर्देश जनन-लाइन कोशिकाओं और मानव भ्रूणों के संपादन को प्रयोगशाला अध्ययनों तक सीमित रखते हैं। जुलाई 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मानव जीनोम संपादन पर पहली वैश्विक अनुशंसाएँ जारी कीं, जो कायिक, जनन-लाइन और वंशागत संपादन, तीनों को समेटती हैं।

जीन चिकित्सा के प्रकार: इन विवो, एक्स विवो और जीन संपादन

तीन-तीन चरणों की दो पंक्तियाँ। इन विवो: जीन लिए संवाहक, प्रायः एडेनो-संबद्ध विषाणु, सीधे शरीर में डाला जाता है, और रोगी की कोशिकाएँ नए जीन से प्रोटीन बनाती हैं। एक्स विवो: रोगी की रक्त स्टेम कोशिकाएँ या टी कोशिकाएँ बाहर निकाली जाती हैं, प्रयोगशाला में प्रायः लेंटीविषाणु संवाहक से जीन डाला जाता है, और बदली हुई कोशिकाएँ शरीर में लौटाई जाती हैं। टिप्पणी: सीएमसी वेल्लोर का हीमोफीलिया A परीक्षण और कार-टी चिकित्सा, दोनों एक्स विवो विधि से होते हैं।
  • इन विवो जीन चिकित्सा (in vivo): जीन लिए संवाहक सीधे रोगी के शरीर में डाला जाता है। यहाँ प्रायः एडेनो-संबद्ध विषाणु (adeno-associated viruses, AAV) संवाहक होते हैं; ये कम प्रतिरक्षा अनुक्रिया करते हैं, विभाजित और अविभाजित, दोनों तरह की कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं, और लंबे समय तक अभिव्यक्ति देते हैं।
  • एक्स विवो जीन चिकित्सा (ex vivo): रोगी की कोशिकाएँ बाहर निकालकर प्रयोगशाला में बदली जाती हैं और फिर वापस डाली जाती हैं। यहाँ प्रायः लेंटीविषाणु (lentiviruses), जो पश्च विषाणुओं का एक प्रकार है, संवाहक होते हैं; भारत का हीमोफीलिया परीक्षण और कार-टी चिकित्साएँ इसी तरह काम करती हैं।
  • जीन संपादन चिकित्सा: जीन जोड़ने के स्थान पर क्रिस्पर-कैस9 जैसा उपकरण कोशिकाओं में रोगी के अपने जीन को ठीक करता है या निष्क्रिय करता है।

जीन चिकित्सा धीरे-धीरे लाइसेंस प्राप्त दवा बनी। पहली स्वीकृति 2003 में मिली, और बाद में अनेक मिलीं। नवंबर 2023 में यूनाइटेड किंगडम ने सिकल सेल रोग और आधान-निर्भर बीटा थैलेसीमिया के लिए कैसजेवी (Casgevy, एक्सागैमग्लोजीन ऑटोटेमसेल) को स्वीकृति दी; दिसंबर 2023 में यह अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) से स्वीकृत होने वाली क्रिस्पर-कैस9 पर आधारित पहली कोशिका-आधारित जीन चिकित्सा बनी।

भारत में सिकल सेल रोग और हीमोफीलिया की जीन चिकित्सा

भारत पर आनुवंशिक रोगों का बड़ा भार है, जो जीन चिकित्सा का मुख्य लक्ष्य हैं। भारत में लगभग 7 करोड़ लोग दुर्लभ रोगों से पीड़ित हैं, जिनमें 80 प्रतिशत आनुवंशिक हैं। हीमोफीलिया, थक्का बनाने वाले प्रोटीनों, कारक VIII या कारक IX, की कमी से होने वाला रक्तस्राव विकार, रक्त को जमने नहीं देता, और भारत पर इसका विश्व में दूसरा सबसे बड़ा भार है, लगभग 1,36,000 मामले।

  • हीमोफीलिया A का परीक्षण: जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सहायता से BRIC-inStem की इकाई, सीएमसी वेल्लोर के स्टेम कोशिका अनुसंधान केंद्र में, पाँच रोगियों को उनकी अपनी रक्त स्टेम कोशिकाएँ दी गईं, जिनमें लेंटीविषाणु संवाहक से कारक VIII का जीन डाला गया था। कुल 81 महीनों के अनुवर्तन में पाँचों में रक्तस्राव की वार्षिक दर शून्य रही, जिससे थक्का-कारक के बार-बार के इंजेक्शन की आवश्यकता समाप्त हुई; परिणाम न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित हुए।
  • सिकल सेल रोग के लिए बिरसा 101: 19 नवंबर 2025 को CSIR-IGIB द्वारा शुरू की गई यह भारत की पहली स्वदेशी क्रिस्पर-आधारित जीन चिकित्सा है। सिकल सेल रोग सबसे अधिक मध्य और पूर्वी भारत के जनजातीय समुदायों पर भारी है, और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को सौंपी गई यह चिकित्सा विदेश में 20 से 25 करोड़ रुपये के उपचार के मूल्य के एक अंश पर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती है।
  • परीक्षणों के नियम: जीन चिकित्सा उत्पाद ICMR, CDSCO और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जारी जीन चिकित्सा उत्पाद विकास और नैदानिक परीक्षण के राष्ट्रीय दिशानिर्देश, 2019 का पालन करते हैं; परीक्षणों के लिए संस्थागत नैतिकता समिति चाहिए, और विपणन की स्वीकृति CDSCO नई औषधि और नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 के अंतर्गत देता है।

कोशिका, आरएनए और सूत्रकणिका आधारित चिकित्साएँ

कार-टी कोशिका चिकित्सा और नेक्सकार19

कार-टी कोशिका चिकित्सा (CAR-T cell therapy) रोगी की अपनी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को कैंसर का उपचार बना देती है। रोगी के रक्त से टी कोशिकाएँ ली जाती हैं, और उनमें प्रायः लेंटीविषाणु संवाहक से काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (chimeric antigen receptor, CAR) का जीन डाला जाता है; यह ग्राही कैंसर कोशिकाओं की सतह के एक चुने हुए अणु को पहचानता है। रोगी के शरीर में वापस डाली गई ये कोशिकाएँ गुणित होकर अर्बुद पर आक्रमण करती हैं, और एक ‘जीवित दवा’ की तरह काम करती हैं।

चार चरण। 1, संग्रह: रोगी के रक्त से टी कोशिकाएँ ली जाती हैं। 2, इंजीनियरी: लेंटीविषाणु संवाहक से काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर का जीन डाला जाता है। 3, गुणन: कार-टी कोशिकाएँ बड़ी संख्या में बढ़ाई जाती हैं। 4, वापसी: कोशिकाएँ रोगी में लौटकर कैंसर कोशिकाएँ खोजती और मारती हैं। टिप्पणी: ग्राही कैंसर कोशिकाओं पर एक अणु पहचानता है; एंटी-CD19 कार-टी कुछ रक्त कैंसरों पर काम करती है।
  • भारत में पहली बार: 4 जून 2021 को भारत की पहली कार-टी कोशिका चिकित्सा मुंबई के टाटा मेमोरियल केंद्र के ACTREC में दी गई; कोशिकाएँ आईआईटी बॉम्बे में अभिकल्पित और निर्मित हुई थीं।
  • नेक्सकार19 (NexCAR19): 4 अप्रैल 2024 को राष्ट्रपति द्वारा शुरू की गई यह भारत की पहली स्वदेशी कार-टी चिकित्सा है, जिसे आईआईटी बॉम्बे और टाटा मेमोरियल केंद्र ने कंपनी इम्यूनोएक्ट के साथ विकसित किया; इसे विश्व की सबसे सस्ती कार-टी चिकित्सा बताया गया है।
  • कार-टी चिकित्सा की लागत: आयातित कार-टी चिकित्सा का मूल्य प्रति रोगी 3 से 4 करोड़ रुपये था, मुख्यतः क्योंकि इसे बनाना जटिल है। BIRAC ने दो एंटी-CD19 कार-टी उत्पादों, नेक्सकार19 और कार्टेमी (Qartemi), के विकास और परीक्षणों में सहायता दी, जो अब कुछ रक्त कैंसरों के उपचार में प्रयुक्त हैं।

आरएनए अंतरक्षेप: जीन अनभिव्यक्तिकरण रोगोपचार

आरएनए अंतरक्षेप (RNA interference, RNAi) सभी यूकैरियोटों में होने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें एक द्वि-लड़ीय आरएनए अपने मेल वाले दूत आरएनए (mRNA) से जुड़कर उसका स्थानांतरण (translation) रोक देता है, और जीन शांत (silenced) हो जाता है। यह आरएनए जीनोम वाले विषाणुओं और गतिशील आनुवंशिक तत्वों के विरुद्ध कोशिका की सुरक्षा है। 1998 में सूत्रकृमि कैनोरैब्डाइटिस एलिगेंस में इसका वर्णन करने वाले एंड्रयू फ़ायर और क्रेग मेलो को 2006 का शरीरक्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला।

  • जीन अनभिव्यक्तिकरण दवाएँ: लघु व्यतिकारी आरएनए (small interfering RNA, siRNA) किसी रोगकारी जीन को बंद करने के लिए बनाए जाते हैं। 2018 में स्वीकृत पैटिसिरन (patisiran) पहली ऐसी दवा थी; 2025 तक ऐसी सात दवाएँ स्वीकृत हो चुकी थीं, सभी यकृत से शुरू होने वाले रोगों के लिए।
  • कैंसर अनुसंधान: कैंसर कोशिकाओं में खोए हुए अर्बुद-रोधी माइक्रोआरएनए वापस डाले जा रहे हैं; प्रयोगशाला प्रतिरूपों में इन्होंने अर्बुदों के विरुद्ध सक्रियता दिखाई है और प्रतिरोधी कैंसर कोशिकाओं को फिर से उपचार के प्रति संवेदनशील बनाया है।
  • फ़सल सुरक्षा: सूत्रकृमि का जीन लिए तंबाकू के पौधे अर्थ और प्रति-अर्थ, दोनों आरएनए बनाते हैं, परजीवी के अपने जीन को शांत कर देते हैं और उससे सुरक्षित रहते हैं। पपीता रिंगस्पॉट विषाणु के जीन का एक अंश लिए पारजीवी पपीता उस विषाणु का प्रतिरोध करता है; यह सुरक्षा संभवतः आरएनए अंतरक्षेप से काम करती है।

सूत्रकणिका प्रतिस्थापन चिकित्सा: तीन जनकों वाले शिशु

सूत्रकणिकाओं (mitochondria) का अपना छोटा डीएनए होता है, और बच्चे को सूत्रकणिकाएँ केवल माता से मिलती हैं: एक अंडाणु में सूत्रकणिका डीएनए की लगभग 2,00,000 प्रतियाँ होती हैं, और निषेचन के बाद शुक्राणु की सूत्रकणिकाएँ सामान्यतः नष्ट हो जाती हैं। इसलिए दोषपूर्ण सूत्रकणिकाओं वाली माता हर बच्चे को सूत्रकणिका रोग दे सकती है। सूत्रकणिका प्रतिस्थापन चिकित्सा (mitochondrial replacement therapy, MRT) भ्रूण को दाता अंडाणु की स्वस्थ सूत्रकणिकाएँ देकर इसे रोकती है, जिससे बच्चे में तीन व्यक्तियों का डीएनए होता है।

  • मातृ तर्कु स्थानांतरण (maternal spindle transfer): निषेचन से पहले माता के अंडाणु के गुणसूत्र एक ऐसे दाता अंडाणु में डाले जाते हैं, जिसका अपना केंद्रक निकाल दिया गया हो; फिर उस अंडाणु का निषेचन होता है।
  • प्राक्केन्द्रिक स्थानान्तरण (pronuclear transfer): निषेचन के बाद माता के निषेचित अंडाणु के दोनों प्राक्केन्द्रक एक ऐसे निषेचित दाता अंडाणु में डाले जाते हैं, जिसके अपने प्राक्केन्द्रक निकाल दिए गए हों।
  • कहाँ अनुमति है: यूनाइटेड किंगडम ने 2015 में इन दोनों विधियों को स्वीकृति दी, और जुलाई 2025 तक वहाँ MRT से आठ शिशु जन्मे थे; ऑस्ट्रेलिया भी इसकी अनुमति देता है।
दो स्तंभ। मातृ तर्कु स्थानांतरण: निषेचन से पहले माता के गुणसूत्र ऐसे दाता अंडाणु में डाले जाते हैं जिसका केंद्रक निकाल दिया गया हो, और फिर अंडाणु का निषेचन होता है। प्राक्केन्द्रिक स्थानान्तरण: माता का अंडाणु और दाता अंडाणु, दोनों एक ही पिता से निषेचित होते हैं, और माता-पिता के प्राक्केन्द्रक दाता युग्मनज में डाले जाते हैं। टिप्पणी: दोनों विधियों में बच्चे की सूत्रकणिकाएँ दाता की होती हैं, इसलिए उसमें तीन व्यक्तियों का डीएनए होता है।

आणविक निदान और सटीक चिकित्सा

आणविक निदान: पीसीआर, RT-PCR, संपरीक्षित्र और एलाइजा

सीरम और मूत्र के पारंपरिक परीक्षण संक्रमण का पता तभी लगाते हैं, जब रोगजनक इतना बढ़ चुका हो कि लक्षण दिखने लगें। आणविक विधियाँ बहुत कम मात्रा पर काम करती हैं, इसीलिए वे शीघ्र निदान संभव बनाती हैं:

  • पीसीआर: बहुत कम सांद्रता में उपस्थित जीवाणु या विषाणु के न्यूक्लिक अम्ल का प्रवर्धन करती है। संदिग्ध एड्स रोगियों में एचआईवी और संदिग्ध कैंसर रोगियों में जीन उत्परिवर्तनों का पता लगाने में इसका नियमित उपयोग होता है।
  • RT-PCR (reverse transcription PCR): पहले उत्क्रम अनुलेखन से आरएनए को पूरक डीएनए में बदला जाता है, जिसे पीसीआर बढ़ाती है; इस तरह यह किसी विशेष आरएनए को मापती है, और आरएनए विषाणुओं का पता इसी से लगता है।
  • संपरीक्षित्र (probe): रेडियोधर्मी अणु से चिह्नित एकल-लड़ी डीएनए या आरएनए अपने मेल वाले डीएनए से जुड़ता है और स्वविकिरणी चित्रण से दिखता है; उत्परिवर्तित जीन संपरीक्षित्र से नहीं जुड़ता, इसलिए दिखाई नहीं देता।
  • एलाइजा (ELISA): एंजाइम सहलग्न प्रतिरक्षा शोषक आमापन प्रतिजन-प्रतिपिंड पारस्परिक क्रिया के सिद्धांत पर काम करता है। यह संक्रमण का पता या तो रोगजनक के प्रतिजनों से लगाता है, या उसके विरुद्ध शरीर में बने प्रतिपिंडों से।

चिकित्सा और औषध परीक्षण में पारजीवी जंतु

पारजीवी जंतु (transgenic animals) वे जंतु हैं, जिनके डीएनए में एक अतिरिक्त, बाहरी जीन जोड़ा गया हो, जो अपना लक्षण व्यक्त करता है। चूहे, खरगोश, सूअर, भेड़, गाय और मछलियाँ पारजीवी बनाई जा चुकी हैं, पर सभी पारजीवी जंतुओं में 95 प्रतिशत से अधिक चूहे हैं। ये चिकित्सा के पाँच काम आते हैं:

  • सामान्य शरीर-क्रिया: ये दिखाते हैं कि जीनों का नियंत्रण कैसे होता है और वे वृद्धि को कैसे आकार देते हैं, उदाहरण के लिए इंसुलिन जैसे वृद्धि कारक के माध्यम से।
  • रोगों के प्रतिरूप: कैंसर, पुटीय रेशामयता, रूमेटाइड संधिशोथ और अल्ज़ाइमर के पारजीवी प्रतिरूप उपलब्ध हैं, जिन पर नए उपचार परखे जा सकते हैं।
  • जैविक उत्पाद: जंतुओं से मानव प्रोटीन बनवाए जा सकते हैं, जैसे एम्फ़िसीमा के उपचार में प्रयुक्त α-1-एंटीट्रिप्सिन। 1997 में पहली पारजीवी गाय, रोज़ी, ने मानव अल्फ़ा-लैक्टएल्बुमिन से समृद्ध दूध दिया, 2.4 ग्राम प्रति लीटर, जो मानव शिशुओं के लिए अधिक संतुलित था।
  • टीका सुरक्षा: पोलियो टीके के बैचों की सुरक्षा परखने के लिए पारजीवी चूहों का उपयोग हो रहा है, जो बंदरों के उपयोग की जगह ले सकता है।
  • रासायनिक सुरक्षा: विषैले पदार्थों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाए गए जंतु कम समय में विषाक्तता के परिणाम देते हैं।

सटीक चिकित्सा: भेषज-जीनोमिकी और जीनोम इंडिया

भेषज-जीनोमिकी (pharmacogenomics) यह अध्ययन करती है कि किसी व्यक्ति के जीन दवाओं के प्रति उसकी अनुक्रिया को कैसे प्रभावित करते हैं, ताकि दवा और उसकी मात्रा व्यक्ति की आनुवंशिक रचना के अनुसार चुनी जा सके। उदाहरण के लिए, G6PD की कमी वाले लोगों में कुछ दवाएँ देने पर लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने का जोखिम अधिक होता है।

ऐसी सटीक चिकित्सा के लिए जनसंख्या की अपनी आनुवंशिक विविधता का संदर्भ चाहिए। जीनोम इंडिया परियोजना ने 83 समष्टियों के 10,074 स्वस्थ भारतीयों के पूरे जीनोम अनुक्रमित किए, और भारतीय जैविक आँकड़ा केंद्र में रखे ये आँकड़े स्वदेशी निदान चिप, निदान और उपचार के लिए हैं। जीनोम कैसे पढ़े जाते हैं, यह पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी वाले लेख में समझाया गया है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2019'RNA अंतर्क्षेप [RNA इंटरफेरेंस (RNAi)]' प्रौद्योगिकी ने पिछले कुछ वर्षों में लोकप्रियता हासिल कर ली है। क्यों?
    1. यह जीन अनभिव्यक्तिकरण (जीन साइलेंसिंग) रोगोपचारों के विकास में प्रयुक्त होता है।
    2. इसे कैंसर की चिकित्सा में रोगोपचार विकसित करने हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।
    3. इसे हॉर्मोन प्रतिस्थापन रोगोपचार विकसित करने हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।
    4. इसे ऐसी फसल पादपों को उगाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है, जो विषाणु रोगजनकों के लिए प्रतिरोधी हों।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

    1. a 1, 2 और 4
    2. b 2 और 3
    3. c 1 और 3
    4. d केवल 1 और 4
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन प्रश्न

    हल करने की विधि: आरएनए अंतरक्षेप किसी जीन के दूत आरएनए को नष्ट करके उसे बंद कर देता है। कथन 1: पैटिसिरन जैसी siRNA दवाएँ, अर्थात् जीन अनभिव्यक्तिकरण रोगोपचार, इसका सीधा उपयोग हैं। सही। कथन 2: कैंसर कोशिकाओं में खोए माइक्रोआरएनए अर्बुदों से लड़ने के लिए वापस डाले जा रहे हैं। सही। कथन 3: हार्मोन प्रतिस्थापन कमी वाले हार्मोन की पूर्ति करता है; किसी जीन को शांत करने से हार्मोन नहीं जुड़ सकता। गलत। कथन 4: विषाणु के जीन का अंश लिए फ़सलें उस विषाणु का प्रतिरोध करती हैं, एक सुरक्षा जो संभवतः आरएनए अंतरक्षेप से काम करती है। सही।

    इस भ्रम से बचें: कथन 3: आरएनए अंतरक्षेप जीन का उत्पाद हटाता है; वह कोई हार्मोन नहीं देता।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 1, 2 और 4: सही। आरएनए अंतरक्षेप से जीन अनभिव्यक्तिकरण दवाएँ, कैंसर उपचार और विषाणु-प्रतिरोधी फ़सलें मिलती हैं।
    • (b) 2 और 3: गलत। कथन 3 गलत है, और कथन 1 तथा 4 सही हैं।
    • (c) 1 और 3: गलत। आरएनए अंतरक्षेप कमी वाले हार्मोन की पूर्ति नहीं कर सकता।
    • (d) केवल 1 और 4: गलत। आरएनए अंतरक्षेप कैंसर के विरुद्ध भी विकसित किया जा रहा है।

    उत्तर: 1, 2 और 4: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021आनुवंशिक रोगों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
    1. अंडों के अंतःपात्र (इन विट्रो) निषेचन से या तो पहले या बाद में सूत्रकणिका प्रतिस्थापन (माइटोकॉन्ड्रिअल रिप्लेसमेंट) चिकित्सा द्वारा सूत्रकणिका रोगों (माइटोकॉन्ड्रिअल डिजीज़) को माता-पिता से संतान में जाने से रोका जा सकता है।
    2. किसी संतान में सूत्रकणिका रोग आनुवंशिक रूप से पूर्णतः माता से जाता है न कि पिता से।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2
    3. c 1 और 2 दोनों
    4. d न तो 1 और न ही 2
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन प्रश्न

    हल करने की विधि: कथन 1: सूत्रकणिका प्रतिस्थापन चिकित्सा भ्रूण को दाता की स्वस्थ सूत्रकणिकाएँ देती है, या तो निषेचन से पहले (मातृ तर्कु स्थानांतरण) या बाद में (प्राक्केन्द्रिक स्थानान्तरण), इसलिए रोग आगे नहीं जाता। सही। कथन 2: अंडाणु सूत्रकणिका डीएनए की लगभग 2,00,000 प्रतियाँ लाता है और निषेचन के बाद शुक्राणु की सूत्रकणिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, इसलिए सूत्रकणिका रोग माता से आते हैं। सही।

    इस भ्रम से बचें: कथन 1 के 'पहले या बाद में' पर संदेह करना: एक विधि अनिषेचित अंडाणु पर काम करती है और दूसरी निषेचित अंडाणु पर।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: गलत। कथन 2 भी सही है: सूत्रकणिकाएँ माता से आती हैं।
    • (b) केवल 2: गलत। सूत्रकणिका प्रतिस्थापन निषेचन से पहले या बाद में किया जा सकता है।
    • (c) 1 और 2 दोनों: सही। प्रतिस्थापन रोग को आगे जाने से रोकता है, और रोग माता से वंशागत होता है।
    • (d) न तो 1 और न ही 2: गलत। दोनों कथन सही हैं।

    उत्तर: 1 और 2 दोनों: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2020मानव प्रजनन तकनीकी में अभिनव प्रगति के संदर्भ में, “प्राक्केन्द्रिक स्थानान्तरण” (Pronuclear Transfer) का प्रयोग किस लिए होता है?
    1. a इन विट्रो अंड के निषेचन के लिए दाता शुक्राणु का उपयोग
    2. b शुक्राणु उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं का आनुवंशिक रूपान्तरण
    3. c स्टेम (Stem) कोशिकाओं का कार्यात्मक भ्रूणों में विकास
    4. d संतान में सूत्रकणिका वाले रोगों का निरोध
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: प्राक्केन्द्रिक स्थानान्तरण में माता का अंडाणु और एक दाता अंडाणु, दोनों निषेचित किए जाते हैं, और माता-पिता के प्राक्केन्द्रक उस दाता युग्मनज में डाले जाते हैं जिसके अपने प्राक्केन्द्रक निकाल दिए गए हों। बच्चे को माता-पिता का केंद्रकीय डीएनए मिलता है, पर सूत्रकणिकाएँ दाता की स्वस्थ होती हैं, जिससे सूत्रकणिका रोग रुकता है।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (a): निषेचन तो सामान्य पात्रे निषेचन है; स्थानांतरण प्राक्केन्द्रकों का होता है, शुक्राणु का नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) दाता शुक्राणु से अंडाणु का निषेचन: गलत। दोनों अंडाणु एक ही पिता से निषेचित होते हैं, किसी दाता से नहीं।
    • (b) शुक्राणु बनाने वाली कोशिकाओं का आनुवंशिक रूपांतरण: गलत। कोई जीन नहीं बदला जाता; केंद्रक युग्मनजों के बीच स्थानांतरित होते हैं।
    • (c) स्टेम कोशिकाओं का भ्रूणों में विकास: गलत। यह विधि स्टेम कोशिकाओं से नहीं, निषेचित अंडाणुओं से शुरू होती है।
    • (d) संतान में सूत्रकणिका रोगों का निरोध: सही। बच्चे को दाता की स्वस्थ सूत्रकणिकाएँ मिलती हैं।

    उत्तर: संतान में सूत्रकणिका वाले रोगों का निरोध: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1998 (हिंदी रूपांतर)हीमोफीलिया एक आनुवंशिक विकार है, जिससे होता है
    1. a हीमोग्लोबिन के स्तर में कमी
    2. b आमवाती हृदय रोग
    3. c श्वेत रक्त कोशिकाओं में कमी
    4. d रक्त का न जमना
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: हीमोफीलिया थक्का बनाने वाले प्रोटीनों, कारक VIII या कारक IX, की कमी से होता है। इनके बिना रक्त का थक्का नहीं बनता, इसलिए रक्तस्राव चलता रहता है; इसीलिए जीन चिकित्सा का लक्ष्य शरीर से स्वयं कारक VIII बनवाना है।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (a): दोनों शब्दों में 'हीमो' का अर्थ रक्त है, पर हीमोफीलिया थक्का-कारकों से जुड़ा है, हीमोग्लोबिन से नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) हीमोग्लोबिन में कमी: गलत। हीमोफीलिया थक्का-कारकों की कमी है, हीमोग्लोबिन की नहीं।
    • (b) आमवाती हृदय रोग: गलत। हीमोफीलिया रक्तस्राव विकार है, हृदय का रोग नहीं।
    • (c) श्वेत रक्त कोशिकाओं में कमी: गलत। हीमोफीलिया थक्का-कारकों को प्रभावित करता है, श्वेत कोशिकाओं को नहीं।
    • (d) रक्त का न जमना: सही। थक्का-कारक की कमी से रक्त नहीं जमता।

    उत्तर: रक्त का न जमना: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  5. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2004 (हिंदी रूपांतर)हार्मोन इंसुलिन एक
    1. a ग्लाइकोलिपिड है
    2. b वसा अम्ल है
    3. c पेप्टाइड है
    4. d स्टेरॉल है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: इंसुलिन डाईसल्फाइड बंधों से जुड़ी दो छोटी पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं से बना है। इसलिए यह पेप्टाइड हार्मोन है, और इसी कारण जीवाणुओं से इसकी शृंखलाएँ बनवाई जा सकती हैं।

    इस भ्रम से बचें: विकल्प (d): हर हार्मोन को स्टेरॉल मान लेना; पॉलीपेप्टाइड शृंखलाएँ इंसुलिन को पेप्टाइड बनाती हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) ग्लाइकोलिपिड: गलत। इंसुलिन पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं से बना है, ग्लाइकोलिपिड नहीं।
    • (b) वसा अम्ल: गलत। इंसुलिन पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं से बना है, वसा अम्ल नहीं।
    • (c) पेप्टाइड: सही। इंसुलिन डाईसल्फाइड बंधों से जुड़ी दो पॉलीपेप्टाइड शृंखलाएँ है।
    • (d) स्टेरॉल: गलत। इंसुलिन पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं से बना है, स्टेरॉल नहीं।

    उत्तर: पेप्टाइड: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।

  6. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-III (हिंदी रूपांतर)हमारे देश में जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इतनी अधिक गतिविधि क्यों है? इस गतिविधि से बायोफ़ार्मा के क्षेत्र को कैसे लाभ हुआ है?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: कारण बताइए; लाभ स्पष्ट कीजिए · दृष्टिकोण: भारत में जैव प्रौद्योगिकी की वृद्धि के कारण बताएँ, फिर उदाहरणों के साथ बायोफ़ार्मा को मिले लाभ दिखाएँ।

    भूमिका: जैव प्रौद्योगिकी जीवित कोशिकाओं में दवाएँ बनाती है; भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 के 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 अरब डॉलर हो गई।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • गतिविधि के कारण: 1986 से जैव प्रौद्योगिकी विभाग; 2012 से BIRAC और उसके अनुदान; विश्व बैंक के साथ राष्ट्रीय बायोफ़ार्मा मिशन; 2024 की BioE3 नीति; दवाओं और टीकों का बड़ा विनिर्माण आधार।
    • बायोफ़ार्मा को लाभ: जेनेरिक से जैव-भेषजों और जैव-समरूपों की ओर बदलाव; भारत प्रमुख टीका उत्पादकों में और पहले डीएनए कोविड-19 टीके का निर्माता; परीक्षण और विनिर्माण की 11 साझा सुविधाएँ।
    • नए क्षेत्र: नेक्सकार19, सीएमसी वेल्लोर की हीमोफीलिया A जीन चिकित्सा, बिरसा 101; आदर्श उत्पाद के रूप में पुनर्योगज इंसुलिन।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष रखें कि जटिल जैविक औषधियों का कम लागत पर विनिर्माण भारत की शक्ति है, बशर्ते विनियमन और गुणवत्ता साथ-साथ चलें।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।