परिचय
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारत के हर नागरिक को किसी भी लोक प्राधिकारी से उसके पास रखी सूचना माँगने और 30 दिन के भीतर उत्तर पाने का वैधानिक अधिकार देता है। इसने सरकारी गोपनीयता की संस्कृति की जगह खुलेपन को नियम बनाया: लोक निकायों को सूचना स्वयं प्रकट करनी होती है, वे केवल अधिनियम में दिए आधारों पर ही इनकार कर सकते हैं, और उन्हें स्वतंत्र सूचना आयोगों के प्रति उत्तरदायी रहना होता है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005: अर्थ और संवैधानिक आधार
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 क्या है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का अधिनियम संख्यांक 22) संसद की वह विधि है जो नागरिकों को लोक प्राधिकारियों के पास रखी सूचना पाने की व्यावहारिक व्यवस्था देती है। अधिनियम पर 15 जून 2005 की तिथि अंकित है, जिस दिन यह अधिनियमित हुआ, और यह अक्टूबर 2005 में लागू हुआ। इसने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 की जगह ली। अधिनियम के उपबंधों के अधीन सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार है।
- सूचना: किसी भी रूप में रखी कोई भी सामग्री, जैसे अभिलेख, दस्तावेज़, ई-मेल, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, अनुबंध, रिपोर्ट, नमूने, मॉडल और इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखे आँकड़े।
- सूचना के अधिकार में क्या शामिल है: कार्य, दस्तावेज़ और अभिलेखों का निरीक्षण; नोट, उद्धरण या प्रमाणित प्रतियाँ लेना; सामग्री के प्रमाणित नमूने लेना; और सूचना इलेक्ट्रॉनिक रूप में या प्रिंटआउट के रूप में पाना।
- लोक प्राधिकारी: संविधान के द्वारा या उसके अधीन, संसद या राज्य विधान-मंडल की विधि से, या सरकारी अधिसूचना से बना कोई भी निकाय, और सरकार के स्वामित्व वाले, उसके नियंत्रण वाले या उससे पर्याप्त वित्त पाने वाले निकाय, जिनमें सरकार से पर्याप्त धन पाने वाले गैर-सरकारी संगठन भी आते हैं।
संविधान में सूचना का अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(क) और जानने का अधिकार
सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों की सूची में नाम से नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 19(1)(क) में पढ़ा है: वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जिन अधिकारों को न्यायालय ने उस स्वतंत्रता का अंग माना है, उनमें सरकार के कामकाज के बारे में जानने का अधिकार भी है। यह अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भी रक्षा करता है। आरटीआई अधिनियम इस निहित अधिकार को लागू करने की व्यवस्था देता है: अधिकारी, समय-सीमाएँ, अपीलें और दंड।
इस अधिकार का आधार सुशासन है। सुशासन के चार तत्त्व हैं: पारदर्शिता, जवाबदेही, पूर्वानुमेयता और भागीदारी। पारदर्शिता का अर्थ है कि सूचना आम जनता को उपलब्ध हो और सरकारी संस्थाओं का कामकाज स्पष्ट दिखे। सूचना के बिना नागरिक न तो सत्ता से हिसाब माँग सकते हैं, न निर्णयों में भाग ले सकते हैं।
आरटीआई अधिनियम का उद्भव: शासकीय गोपनीयता से खुलेपन तक
आरटीआई आंदोलन: मज़दूर किसान शक्ति संगठन, ब्यावर और 2005 तक की राह
दशकों तक भारत में सूचना औपनिवेशिक शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 के पीछे बंद रही। यह अधिनियम जनता को सूचना न देने का सुविधाजनक आवरण बन गया था, और सरकारी कामकाज परंपरा से गोपनीयता में ढका रहता था। खुलेपन की माँग ज़मीनी स्तर से उठी, सबसे बढ़कर राजस्थान के मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) से, जिसकी सूचना के अधिकार की माँग मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी की माँग से निकली थी।
- जन सुनवाइयाँ: जन सुनवाइयों की एक शृंखला ने पूरे राजस्थान में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार उजागर किया, और आंदोलनकारियों ने स्थानीय व्यय के अभिलेख माँगे।
- ब्यावर, 1996: 6 अप्रैल 1996 को MKSS ने अजमेर ज़िले के ब्यावर में चालीस दिन का धरना शुरू किया, जिसे डेढ़ सौ से अधिक गाँवों का समर्थन मिला; नई बात यह थी कि गरीब भोजन या आवास नहीं, सूचना माँग रहे थे।
- नारा: ‘हम जानेंगे, हम जिएँगे’ शीर्षक वाले एक समाचार-पत्र के संपादकीय ने आंदोलन को उसका नारा दिया: जानने का अधिकार जीने का अधिकार है।
- विधि की ओर: सूचना के अधिकार और पारदर्शिता पर एच. डी. शौरी की अध्यक्षता वाले कार्य-समूह ने 1997 में रिपोर्ट दी; फिर सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 आया, और 2005 के आरटीआई अधिनियम ने उसकी जगह ली।
आरटीआई अधिनियम, 2005 के प्रमुख उपबंध
लोक प्राधिकारी, लोक सूचना अधिकारी और स्वप्रेरणा से प्रकटन
हर लोक प्राधिकारी पर धारा 4 के अंतर्गत कुछ कर्तव्य हैं। उसे अपने सभी अभिलेख इस तरह सूचीबद्ध और अनुक्रमित रखने होते हैं कि सूचना का अधिकार आसानी से उपयोग हो सके, और जहाँ उचित हो, अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण करना होता है। अधिनियम बनने के 120 दिन के भीतर उसे अपने बारे में कुछ ब्योरे प्रकाशित करने थे, जैसे अपने कार्य, अधिकारी, बजट और निर्णय, और उसे प्रभावित व्यक्तियों को अपने प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के कारण बताने होते हैं।
- स्वप्रेरणा से प्रकटन: धारा 4(2) हर लोक प्राधिकारी से अपेक्षा करती है कि वह इंटरनेट सहित जितनी हो सके उतनी सूचना स्वयं प्रकाशित करे, ताकि जनता को औपचारिक आवेदन का सहारा कम से कम लेना पड़े।
- लोक सूचना अधिकारी: हर लोक प्राधिकारी केंद्रीय या राज्य लोक सूचना अधिकारी नामित करता है, और उप-मंडल स्तर पर सहायक लोक सूचना अधिकारी, जो आवेदन लेकर आगे भेजते हैं।
- तीसरे पक्ष की सूचना: यदि माँगी गई सूचना किसी तीसरे पक्ष ने दी हो और गोपनीय मानी गई हो, तो लोक सूचना अधिकारी को उस पक्ष को सुनवाई का अवसर देना होता है (धारा 11)।
विभाग का स्वयं सूचना प्रकट करना अधिनियम की बनावट का केंद्र है। विभाग स्वयं जितना अधिक प्रकाशित करता है, उसके पास उतने ही कम आवेदन आते हैं, और देरी या मनमानी की गुंजाइश उतनी ही घटती है।
आरटीआई अधिनियम का दायरा: न्यायपालिका, निजी निकाय और राजनीतिक दल
अधिनियम पूरे भारत पर लागू है। यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक प्राधिकारियों पर लागू होता है, और विधि या अधिसूचना से बने निकायों तथा सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण या पर्याप्त वित्त वाले निकायों पर भी। निजी निकाय सीधे इसके दायरे में नहीं आते, किन्तु किसी निजी निकाय की जो सूचना कोई लोक प्राधिकारी किसी अन्य विधि के अंतर्गत पा सकता है, वह धारा 2(च) के अंतर्गत सूचना मानी जाती है।
- निजीकृत जनोपयोगी सेवाएँ: सरबजीत रॉय बनाम दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग मामले में केंद्रीय सूचना आयोग ने फिर कहा कि निजीकृत सार्वजनिक उपयोगिता कंपनियाँ आरटीआई अधिनियम के दायरे में आती हैं।
- सहायता पाने वाले निकाय: सरकार से पर्याप्त वित्त पाने वाली निजी संस्थाएँ और गैर-सरकारी संगठन अधिनियम के अधीन आते हैं।
- राजनीतिक दल: केंद्रीय सूचना आयोग ने माना कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल, जिन्हें केंद्र सरकार से परोक्ष रूप से पर्याप्त धन मिलता है और जो सार्वजनिक कार्य करते हैं, लोक प्राधिकारी हैं; अगस्त 2013 में सरकार ने उन्हें विधि के दायरे से बाहर करने के लिए एक विधेयक पेश किया, और आज कोई भी दल अधिनियम के अधीन नहीं है, जबकि उन्हें इसमें लाने का एक मामला लंबित है।
- न्यायपालिका: अधिनियम न्यायालयों को लोक प्राधिकारी मानकर उन पर लागू होता है, और भारत के मुख्य न्यायमूर्ति का कार्यालय भी इसके दायरे में है।
आरटीआई आवेदन कैसे करें: शुल्क, समय-सीमा और अपील
आरटीआई आवेदन करना जान-बूझकर सरल रखा गया है। धारा 6 के अंतर्गत आवेदन लिखित रूप में या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, अंग्रेज़ी, हिंदी या उस क्षेत्र की राजभाषा में, लोक प्राधिकारी के लोक सूचना अधिकारी को दिया जाता है, साथ में निर्धारित शुल्क: केंद्रीय लोक प्राधिकारियों के लिए 10 रुपये, और प्रतियों के लिए 2 रुपये प्रति पृष्ठ; राज्य अपना शुल्क स्वयं तय करते हैं। जो व्यक्ति लिख नहीं सकता, उसका आवेदन लिखवाने में लोक सूचना अधिकारी को सहायता करनी होती है। आवेदक को सूचना माँगने का कोई कारण नहीं बताना पड़ता।
- उत्तर (धारा 7): आवेदन के 30 दिन के भीतर; यदि सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी हो तो 48 घंटे के भीतर।
- मानित इनकार: लोक सूचना अधिकारी समय-सीमा में निर्णय न दे, तो आवेदन अस्वीकार किया गया माना जाता है।
- प्रथम अपील: 30 दिन के भीतर, उसी लोक प्राधिकारी में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी को।
- द्वितीय अपील: 90 दिन के भीतर, केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को, जिसका निर्णय बाध्यकारी है।
- दंड: बिना उचित कारण सूचना देने से मना करने या देरी करने वाले लोक सूचना अधिकारी पर 250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये, का दंड लग सकता है और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफ़ारिश हो सकती है।
- न्यायालयों पर रोक: अधिनियम के अंतर्गत दिए गए आदेश के विरुद्ध कोई न्यायालय वाद नहीं सुन सकता; उपाय अधिनियम के भीतर अपील ही है।
आरटीआई अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत छूट
खुलापन नियम है, और इनकार अधिनियम में दिए किसी आधार पर ही हो सकता है। धारा 8(1) उन सूचनाओं की सूची देती है जो किसी भी नागरिक को देना आवश्यक नहीं:
| खंड | प्रकटन से छूट वाली सूचना |
|---|---|
| 8(1)(क) | भारत की संप्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों, विदेशी राज्यों से संबंधों पर प्रभाव डालने वाली, या अपराध को उकसाने वाली |
| 8(1)(ख) | जिसके प्रकाशन पर किसी न्यायालय या अधिकरण ने स्पष्ट रोक लगाई हो, या जिससे न्यायालय की अवमानना हो |
| 8(1)(ग) | जिससे संसद या राज्य विधान-मंडल के विशेषाधिकार का भंग हो |
| 8(1)(घ) | वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार रहस्य या बौद्धिक संपदा, जिससे किसी तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धी स्थिति को हानि हो |
| 8(1)(ङ) | न्यासीय संबंध में रखी गई |
| 8(1)(च) | किसी विदेशी सरकार से विश्वास में मिली |
| 8(1)(छ) | जिससे किसी व्यक्ति के जीवन या सुरक्षा को ख़तरा हो, या किसी गोपनीय स्रोत का पता चले |
| 8(1)(ज) | जिससे अपराधियों की जाँच, गिरफ़्तारी या अभियोजन में बाधा पड़े |
| 8(1)(झ) | मंत्रिमंडल के कागज़, यद्यपि मामला पूरा होने पर निर्णय और उनके कारण सार्वजनिक किए जाते हैं |
| 8(1)(ञ) | ऐसी व्यक्तिगत सूचना जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंध न हो, या जो निजता में अनुचित हस्तक्षेप हो |
- संसद की कसौटी: जो सूचना संसद या राज्य विधान-मंडल को देने से मना नहीं की जा सकती, वह किसी भी व्यक्ति को देने से मना नहीं की जा सकती।
- बीस वर्ष का नियम: धारा 8(3) के अंतर्गत आवेदन से बीस वर्ष पहले हुई किसी घटना से जुड़ी सूचना देनी होती है, खंड (क), (ग) और (झ) को छोड़कर।
- धारा 24: दूसरी अनुसूची में दर्ज खुफिया और सुरक्षा संगठन अधिनियम से बाहर हैं, किन्तु भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से जुड़ी सूचना पर यह छूट लागू नहीं होती; यह अनुसूची चार बार संशोधित हो चुकी है।
शासकीय गुप्त बात अधिनियम और आरटीआई अधिनियम: अधिभावी प्रभाव
औपनिवेशिक काल में बना शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 सरकार की गोपनीयता को नियंत्रित करता है और मुख्यतः सुरक्षा से जुड़ा है। आरटीआई अधिनियम इस टकराव को दो स्थानों पर अपने पक्ष में सुलझाता है। धारा 8(2) के अनुसार, यदि प्रकटन में लोकहित संरक्षित हितों को होने वाली हानि से अधिक हो, तो लोक प्राधिकारी सूचना दे सकता है, भले ही शासकीय गुप्त बात अधिनियम या धारा 8(1) की कोई छूट लागू होती हो। धारा 22 आरटीआई अधिनियम को शासकीय गुप्त बात अधिनियम या किसी अन्य विधि की असंगत बातों के होते हुए भी प्रभावी बनाती है।
अतः जिस प्रकटन की अनुमति आरटीआई अधिनियम देता है, उसके रास्ते में शासकीय गुप्त बात अधिनियम नहीं आता। कठिनाई उसकी सर्वग्राही धारा 5 में है, जो सरकारी रहस्यों के अनधिकृत प्रकटन को दंडनीय बनाती है, किन्तु यह परिभाषित नहीं करती कि रहस्य क्या है; इससे अधिकारियों में गोपनीयता की आदत बनी रहती है।
- शौरी समिति (1997): धारा 5 को इस तरह संशोधित करने की सिफ़ारिश की कि उसके दंड केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले उल्लंघनों पर लगें।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2006): सिफ़ारिश की कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम निरस्त करके राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में सरकारी रहस्यों पर एक अध्याय जोड़ा जाए।
केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग
केंद्रीय सूचना आयोग: संरचना, नियुक्ति और शक्तियाँ
केंद्रीय सूचना आयोग 2005 में आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत राजपत्र अधिसूचना से बना, इसलिए यह सांविधिक निकाय है, संवैधानिक नहीं। यह केंद्रीय लोक प्राधिकारियों से जुड़ी शिकायतें और द्वितीय अपीलें सुनता है। इसमें एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सिफ़ारिश पर करते हैं: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष के नेता, और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
- पात्रता: विधि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार या प्रशासन का ज्ञान रखने वाले, सार्वजनिक जीवन के प्रतिष्ठित व्यक्ति; वे विधायक नहीं हो सकते, और न कोई लाभ का पद या दलीय संबंध रख सकते हैं।
- पद से हटाना: राष्ट्रपति उन्हें दिवालियापन या नैतिक अधमता वाले अपराध में दोषसिद्धि जैसे आधारों पर हटा सकते हैं, और उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद सिद्ध कदाचार या असमर्थता पर भी।
- आयोग की शक्तियाँ: यह इनकार, देरी, अनुचित शुल्क और भ्रामक उत्तर सहित शिकायतों की जाँच करता है, और जाँच के दौरान इसके पास व्यक्तियों को बुलाने और दस्तावेज़ मँगाने के लिए सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होती हैं।
- अनुपालन और रिपोर्ट: यह लोक प्राधिकारियों को लोक सूचना अधिकारी नियुक्त करने, सूचना प्रकाशित करने और आवेदकों को क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दे सकता है, और इसकी वार्षिक रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों के सामने रखी जाती है।
- राज्य सूचना आयोग: हर राज्य में एक राज्य सूचना आयोग है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री, विधान सभा में विपक्ष के नेता और राज्य के एक कैबिनेट मंत्री की समिति की सिफ़ारिश पर करते हैं।
आरटीआई संशोधन: 2019 का अधिनियम, आयोगों की स्वतंत्रता और डीपीडीपी 2023
सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 को लोक सभा ने 22 जुलाई और राज्य सभा ने 25 जुलाई 2019 को पारित किया; इसने धारा 13, 16 और 27 में संशोधन किया। मूल अधिनियम में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त पाँच वर्ष के लिए या 65 वर्ष की आयु तक पद पर रहते थे, और उनका वेतन तथा सेवा-शर्तें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों जैसी थीं। संशोधन के बाद उनका कार्यकाल, वेतन और सेवा-शर्तें वैसी होंगी जैसी केंद्र सरकार निर्धारित करे, और इसके लिए 2019 में नियम बनाए गए।
- सरकार का पक्ष: निर्वाचन आयोग संवैधानिक निकाय है जबकि सूचना आयोग सांविधिक, इसलिए दोनों के अधिदेश और सेवा-शर्तें एक जैसी होना आवश्यक नहीं; नियम नागरिकों के अधिकारों या आयोगों की शक्तियों को प्रभावित नहीं करते।
- आलोचकों का पक्ष: जिन अधिकारियों के निर्णय सरकार के विरुद्ध जाते हैं, उनका कार्यकाल और वेतन तय करने का अधिकार सरकार को देना आयोगों की स्वतंत्रता को कमज़ोर करना माना गया है।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(ञ), अर्थात् व्यक्तिगत सूचना वाली छूट, में संशोधन किया। मूल रूप में यह खंड व्यक्तिगत सूचना के प्रकटन की अनुमति देता था, यदि व्यापक लोकहित उसका औचित्य सिद्ध करे। सरकार का कहना है कि यह संशोधन निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार में संतुलन बिठाता है; निजता के अधिकार की पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में की थी। सरकार के अनुसार संशोधन न्यायिक तर्क को संहिताबद्ध करता है और व्यक्तिगत सूचना के प्रकटन को सीमित नहीं करता।
जो मुख्य सुरक्षा बची है, वह धारा 8(2) है: यदि प्रकटन में लोकहित संरक्षित हितों की हानि से अधिक हो, तो लोक प्राधिकारी अब भी सूचना दे सकता है। यह संतुलन हर मामले में कैसे साधा जाता है, इसी से तय होगा कि लोक सेवकों के बारे में पारदर्शिता बची रहती है या नहीं।
आरटीआई अधिनियम का महत्त्व, चुनौतियाँ और सुधार
आरटीआई और जवाबदेही: सुशासन के लिए अधिनियम क्यों महत्त्वपूर्ण है
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सूचना के अधिकार को सुशासन की कुंजी कहा। यह समाज के कमज़ोर वर्गों को सार्वजनिक नीतियों और कार्यों के बारे में सूचना माँगने और पाने का साधन देता है। आयोग के अनुसार इसका प्रभावी क्रियान्वयन राज्य के कामकाज में तीन बदलावों पर निर्भर है:
- गोपनीयता की प्रचलित संस्कृति से खुलेपन की नई संस्कृति की ओर।
- व्यक्तिगत निरंकुशता से जवाबदेही से जुड़े अधिकार की ओर।
- एकपक्षीय निर्णय से सहभागी शासन की ओर।
अधिनियम का उपयोग बहुत बड़े पैमाने पर होता है: औसतन हर दिन 4,800 से अधिक आवेदन आते हैं, और इसके पहले दस वर्षों में 17,500,000 से अधिक आवेदन दिए गए। इसकी पहुँच भी बढ़ी है: 13 नवंबर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बनाए रखा जिसने भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के कार्यालय को अधिनियम के दायरे में लाया था। अधिनियम केवल नागरिकों को सशक्त नहीं करता; यह जवाबदेही को नए सिरे से परिभाषित करता है, क्योंकि अब सरकारी निर्णयों को केवल वरिष्ठ अधिकारी नहीं, कोई भी नागरिक परख सकता है।
आरटीआई की चुनौतियाँ: दुरुपयोग, आवेदकों पर हमले और उपाय
अधिनियम के खुलेपन का दुरुपयोग भी हो सकता है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने ऐसे आवेदन दर्ज किए जो स्पष्ट रूप से तुच्छ या परेशान करने वाले थे, और ऐसे लोक सेवकों के मामले भी, जो गंभीर अनुशासनात्मक आरोपों का सामना करते हुए अधिनियम का उपयोग अपने वरिष्ठों को डराने या परेशान करने के लिए कर रहे थे। आयोग ने तीन ख़तरों की चेतावनी दी:
- तुच्छ या परेशान करने वाले आवेदन व्यवस्था पर बोझ बनकर अधिनियम का उद्देश्य ही विफल कर सकते हैं।
- प्रशासन की सामान्य गति रुक सकती है, जिससे सेवाओं की आपूर्ति प्रभावित हो।
- आरोपों का सामना कर रहे लोक सेवक दूसरों के माध्यम से अधिनियम का उपयोग करें, तो अनुशासन टूट सकता है।
आयोग का प्रस्तावित उपाय था: तुच्छ और दुर्भावनापूर्ण आवेदनों के विरुद्ध सुरक्षा उपाय, किन्तु सद्भाव से सूचना माँगने वाले नागरिकों पर कोई बंधन नहीं, क्योंकि अधिनियम जान-बूझकर कोई कारण नहीं पूछता। धारा 4 के अंतर्गत स्वप्रेरणा से अधिक प्रकटन आवेदनों की आवश्यकता घटाता है, और बेहतर अभिलेख प्रबंधन से अधिकारी जल्दी उत्तर दे पाते हैं।
- आरटीआई उपयोगकर्ताओं पर हमले: कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के आँकड़े ऐसे 310 से अधिक मामलों की ओर संकेत करते हैं जिनमें माँगी गई सूचना के कारण लोगों पर हमला हुआ, उन्हें परेशान किया गया या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया, और इनमें 50 से अधिक कथित हत्याएँ शामिल हैं।
- आवेदकों पर रोक: कुछ राज्य सूचना आयोगों ने अधिकारियों को परेशान करने के आधार पर कुछ व्यक्तियों के आवेदन देने पर रोक लगाई है, और इसकी आलोचना हुई है, क्योंकि अधिनियम में ऐसी कोई शक्ति नहीं है।
- व्यावहारिक बाधाएँ: आवेदन लिखने के औपचारिक नियम उच्च शिक्षा से वंचित लोगों के लिए इस अधिकार का उपयोग कठिन बनाते हैं, और बहुत से नागरिक आवेदन के लिए गैर-सरकारी संगठनों, कार्यकर्ताओं या वकीलों का सहारा लेते हैं।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2020, सामान्य अध्ययन-II“सूचना का अधिकार अधिनियम में किये गये हालिया संशोधन सूचना आयोग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर गम्भीर प्रभाव डालेंगे”। विवेचना कीजिए ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: 2019 के संशोधन ने सूचना आयुक्तों का कार्यकाल और वेतन अधिनियम से हटाकर सरकार के नियमों में रख दिया, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- पहले: पाँच वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक कार्यकाल; दर्जा और वेतन निर्वाचन आयोग जैसा, विधि में ही तय।
- बाद में: कार्यकाल, वेतन और सेवा-शर्तें केंद्र सरकार के निर्धारण से; 2019 के नियम।
- प्रभाव: कार्यकाल की सुरक्षा अब उसी कार्यपालिका पर निर्भर, जिसके अभिलेख माँगे जाते हैं; सरकार का तर्क कि आयोगों की शक्तियाँ अछूती हैं।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि आयोगों की शक्तियाँ बनी हुई हैं, किन्तु स्वतंत्रता कार्यकाल की सुरक्षा पर टिकी है, जिसे संशोधन ने कमज़ोर किया।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2018, सामान्य अध्ययन-IV“सूचना का अधिकार अधिनियम केवल नागरिकों के सशक्तिकरण के बारे में ही नहीं है, अपितु यह आवश्यक रूप से जवाबदेही की संकल्पना को पुन:परिभाषित करता है ।” विवेचना कीजिए ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आरटीआई अधिनियम नागरिकों को सशक्त करता है, किन्तु इसका गहरा प्रभाव इस पर है कि अधिकारी अपने निर्णयों का उत्तर कैसे देते हैं, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- सशक्तिकरण: कोई भी नागरिक, कोई कारण नहीं, 30 दिन, कम शुल्क।
- जवाबदेही: निर्णयों के कारण बताना, स्वप्रेरणा से प्रकटन, लोक सूचना अधिकारियों पर दंड, हर नागरिक के प्रति उत्तरदायित्व।
- शासन: पारदर्शिता, जवाबदेही, पूर्वानुमेयता और भागीदारी।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि जवाबदेही प्रशासनिक पदानुक्रम के भीतर से निकलकर जनता के सामने आ गई है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2019, सामान्य अध्ययन-IVएक विचार यह है कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में एक बाधा है । क्या आप इस विचार से सहमत हैं ? विवेचना कीजिए ।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: 1923 का शासकीय गुप्त बात अधिनियम और 2005 का आरटीआई अधिनियम दो विपरीत आरंभ-बिंदु दिखाते हैं: गोपनीयता और खुलापन, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- विधि में आरटीआई अधिनियम प्रभावी है: धारा 22 का अधिभावी प्रभाव; धारा 8(2) में लोकहित।
- व्यवहार में शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा 5 रहस्य को परिभाषित नहीं करती और गोपनीयता की आदत बनाए रखती है।
- सुधार: शौरी समिति का संशोधन का सुझाव; उस अधिनियम को निरस्त कर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में एक अध्याय जोड़ने की द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफ़ारिश।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि यह अधिनियम विधिक से अधिक सांस्कृतिक बाधा है, जिसे सुधार से हटाया जाना चाहिए।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2017, सामान्य अध्ययन-IVआप एक सरकारी विभाग में सार्वजनिक जनसूचना अधिकारी (पी.आई.ओ.) हैं । आप जानते हैं कि 2005 का आर.टी.आई. अधिनियम प्रशासनिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की परिकल्पना करता है । अधिनियम आमतौर पर कदाचित मनमाना प्रशासनिक व्यवहार एवं कार्यों पर रोक लगाने में कार्यरत है । किन्तु एक पी.आई.ओ. के स्वरूप में आपने देखा है कि कुछ ऐसे नागरिक हैं जो अपने लिए याचिका फाइल करने के बजाय दूसरे हितधारकों के लिए याचिका फाइल करते हैं और इसके द्वारा अपने स्वार्थ को आगे करते हैं । साथ-साथ ऐसे आर.टी.आई. भरने वाले कुछ लोग भी हैं जो नियमित रूप से आर.टी.आई. याचिकाएँ भरते रहते हैं और निर्णयकर्ताओं से पैसा निकलवाने का प्रयास करते हैं । इस प्रकार की आर.टी.आई. गतिविधियों ने प्रशासन के कार्यकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है और सम्भवत: विशुद्ध याचिकाओं को जोखिम में डाल दिया है जिनका लक्ष्य न्याय प्राप्त करना है ।
वास्तविक और अवास्तविक याचिकाओं को अलग करने के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे ? अपने सुझावों के गुणों और दोषों का वर्णन कीजिए ।उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आरटीआई अधिनियम कोई कारण नहीं पूछता; इससे वास्तविक आवेदकों की रक्षा होती है, किन्तु दुरुपयोग का रास्ता भी खुलता है, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- उपाय: स्वप्रेरणा से अधिक प्रकटन; मानक प्रारूप; द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के सुझाए अनुसार परेशान करने वाले आवेदनों के विरुद्ध सुरक्षा उपाय।
- गुण: कार्यालयों पर बोझ कम; पैसा निकलवाने के प्रयास घटें।
- दोष: कोई भी छलनी वास्तविक आवेदकों को रोक सकती है; अधिनियम कारण माँगने की मनाही करता है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि दुरुपयोग का सबसे सुरक्षित उपचार प्रतिबंध नहीं, प्रकटन है।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-IVहाल में हुई कुछ प्रगतियाँ, जैसे कि सूचना का अधिकार (आर० टी० आइ०) अधिनियम, मीडिया और न्यायिक सक्रियता इत्यादि, सरकार के कार्यों में पहले से अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही लाने में सहायक साबित हो रही हैं। फिर भी, यह भी देखा जा रहा है कि कभी-कभार इन साधनों का दुरुपयोग किया जाता है। एक अन्य नकारात्मक प्रभाव यह है कि अधिकारीगण अब शीघ्र निर्णय लेने से डरते हैं।
इस स्थिति का विस्तारपूर्वक विश्लेषण कीजिए और सुझाइए कि इस द्विभाजन का हल किस प्रकार निकाला जा सकता है। सुझाइए कि इन नकारात्मक प्रभावों को किस प्रकार न्यूनतमीकृत किया जा सकता है।उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आरटीआई ने सरकार को अधिक पारदर्शी बनाया है, किन्तु इसका दुरुपयोग अधिकारियों को अति-सतर्क बना सकता है, इससे शुरुआत करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- लाभ: जवाबदेही और भागीदारी।
- समस्याएँ: परेशान करने वाले आवेदन, वरिष्ठों को परेशान करना, निर्णयों में देरी।
- उपाय: स्वप्रेरणा से प्रकटन, अभिलेख प्रबंधन, परेशान करने वाले आवेदनों के विरुद्ध सुरक्षा उपाय, ईमानदार निर्णयों का संरक्षण।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि स्पष्ट नियम और खुले अभिलेख ईमानदार अधिकारियों की रक्षा करते हैं।
स्रोत
- Central Information Commission: The Right to Information Act, 2005 (text of the Act)
- DARPG: Reports of the Second Administrative Reforms Commission (First Report, Right to Information: Master Key to Good Governance, 2006)
- NCERT: Indian Society (Class XII Sociology), Chapter 6, Box 6.10 on the Right to Information Act
- PIB: Rajya Sabha passes RTI Amendment Bill, 2019 (25 July 2019)
- PIB: New Rules under RTI (11 December 2019)
- PIB: DPDP Act, 2023 upholds privacy while preserving transparency under RTI (20 August 2025)
- The Hindu (Delhi): How has the BCCI resisted RTI scrutiny?, 24 May 2026
- The Hindu (Delhi): Is data protection law crippling RTI, asks SC, 8 August 2026
- The Hindu (Delhi): Light on truth (editorial), 29 September 2026
- Wikipedia: Right to Information Act, 2005
- Wikipedia: Mazdoor Kisan Shakti Sangathan
- UPSC: Previous year question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख सूचना का अधिकार अधिनियम को अधिनियम के पाठ, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट, न्यायालयों और सूचना आयोग के निर्णयों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है। यह विधिक सलाह नहीं है।
