परिचय

सरकारिया आयोग (1983-88) और पुंछी आयोग (2007-10) वे दो राष्ट्रीय आयोग थे जिन्होंने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा की। दोनों ने संवैधानिक ढाँचा बनाए रखा, किन्तु केंद्र की शक्तियों के प्रयोग में संयम, सक्रिय अंतर-राज्य परिषद् और निकट परामर्श की माँग की, जिसे आज सहकारी संघवाद कहा जाता है।

केंद्र-राज्य संबंधों पर आयोग: इनकी आवश्यकता क्यों पड़ी

1967 के बाद केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव के क्षेत्र

1967 तक केंद्र-राज्य संबंध प्रायः सहज रहे, क्योंकि केंद्र में और अधिकांश राज्यों में एक ही दल की सरकार थी। 1967 के चुनावों में कांग्रेस नौ राज्यों में सत्ता से बाहर हो गई। वहाँ बनी गैर-कांग्रेसी सरकारों ने बढ़ते केन्द्रीयकरण का विरोध किया और अधिक शक्तियों तथा संसाधनों की माँग उठाई। विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय बँटवारे का पूरा ढाँचा सातवीं अनुसूची वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में समझाया गया है।

  • राज्यपाल का पद: नियुक्ति और पद से हटाने का ढंग, तथा दलगत भूमिका।
  • आपात उपबंध: दलगत हितों के लिए लगाया गया राष्ट्रपति शासन, और राज्यों में केंद्रीय बलों की तैनाती।
  • राज्य के विधेयक और राज्य सूची: राज्य के विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना, और राज्य सूची के विषयों में अतिक्रमण।
  • धन और योजना: वित्तीय आवंटन में भेदभाव, और राज्यों की परियोजनाओं को स्वीकृति देने में योजना आयोग की भूमिका।
  • अखिल भारतीय सेवाएँ: इनका प्रबंधन और नियंत्रण।

ये प्रश्न बाद के हर आयोग की रिपोर्ट में दिखते हैं। चूँकि ये जितने विधिक हैं उतने ही राजनीतिक भी, इसलिए राज्य-स्वायत्तता की माँगें केवल न्यायालय में नहीं, बातचीत से सुलझानी पड़ती हैं।

राजमन्नार समिति और राज्य-स्वायत्तता की माँग

पहली समीक्षा संघ की ओर से हुई। 1966 के प्रशासनिक सुधार आयोग ने एम. सी. सीतलवाड़ की अध्यक्षता वाले एक अध्ययन दल के माध्यम से 1969 में 22 सिफ़ारिशें दीं, जिनमें अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद् का गठन भी था। इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, और तब राज्यों ने अपने प्रस्ताव रखे।

तालिका 1. सरकारिया आयोग से पहले राज्यों के स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव।
प्रस्ताव वर्ष मुख्य माँगें
राजमन्नार समिति (तमिलनाडु) 1969, रिपोर्ट 1971 तुरंत अंतर-राज्य परिषद्; स्थायी वित्त आयोग; योजना आयोग की जगह सांविधिक निकाय; अनुच्छेद 356, 357 और 365 हटाए जाएँ; अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों को; अखिल भारतीय सेवाएँ समाप्त
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (अकाली दल) 1973 केंद्र केवल रक्षा, विदेश मामले, संचार और मुद्रा तक सीमित; सभी अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों को
पश्चिम बंगाल का ज्ञापन 1977 'संघ' के स्थान पर 'परिसंघ' शब्द; अनुच्छेद 356, 357 और 360 निरस्त; केंद्र के राजस्व का 75 प्रतिशत राज्यों को; राज्य सभा को लोक सभा के समान शक्ति

तमिलनाडु सरकार ने डॉ. पी. वी. राजमन्नार की अध्यक्षता में तीन सदस्यों वाली राजमन्नार समिति नियुक्त की थी। समिति ने केन्द्रीयकरण के चार कारण बताए: केंद्र की विशेष संवैधानिक शक्तियाँ, एक दल का शासन, राज्यों की वित्तीय निर्भरता और केंद्रीय नियोजन। संघ ने इसकी सिफ़ारिशों पर ध्यान नहीं दिया, और पश्चिम बंगाल की माँगें भी स्वीकार नहीं कीं।

1965 से 2026 तक पैमाने के अनुसार समय-रेखा। 1966: प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन। 1969: तमिलनाडु ने राजमन्नार समिति नियुक्त की। 1973: आनंदपुर साहिब प्रस्ताव। 1977: पश्चिम बंगाल का ज्ञापन। 1983: सरकारिया आयोग, रिपोर्ट जनवरी 1988। 1990: अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद्। 2007: पुंछी आयोग, रिपोर्ट मार्च 2010। 2016: अंतर-राज्य परिषद् की अंतिम बैठक, जुलाई में। 2024: अंतर-राज्य परिषद् पुनर्गठित।

सरकारिया आयोग (1983-88)

सरकारिया आयोग: गठन, विचारार्थ विषय और दृष्टिकोण

गृह मंत्रालय ने 9 जून 1983 को सरकारिया आयोग का गठन किया। इसके अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया थे, और बी. शिवरामन तथा डॉ. एस. आर. सेन इसके सदस्य थे। आयोग को सभी क्षेत्रों में संघ और राज्यों के बीच की व्यवस्थाओं के कामकाज की जाँच करनी थी, और ऐसा करते हुए एकता और अखंडता के संवैधानिक ढाँचे का ध्यान रखना था। पहले इसे एक वर्ष दिया गया, किन्तु इसका कार्यकाल चार बार बढ़ाया गया।

आयोग की 1,600 पृष्ठों की रिपोर्ट जनवरी 1988 में सौंपी गई, जिसके 19 अध्यायों में 247 सिफ़ारिशें थीं। आयोग ढाँचागत बदलाव के पक्ष में नहीं था। उसने संवैधानिक व्यवस्था को मूलतः ठीक माना और कहा कि बदलाव शक्ति के प्रयोग के ढंग में होना चाहिए। एकता के लिए सशक्त केंद्र आवश्यक है, किन्तु सशक्त केंद्र का अर्थ केन्द्रीयकरण नहीं है; आयोग के अनुसार केन्द्रीयकरण से "केंद्र में उच्च रक्तचाप और परिधि पर रक्ताल्पता" होती है।

केंद्र-राज्य संबंधों पर सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशें

  • अंतर-सरकारी परिषद्: अनुच्छेद 263 के अंतर्गत एक स्थायी अंतर-राज्य परिषद्, जिसे अंतर-सरकारी परिषद् कहा जाए, और मंत्रिमंडल सचिवालय के ढंग पर उसका स्थायी सचिवालय।
  • अनुच्छेद 356: इसका प्रयोग बहुत कम, केवल चरम स्थिति में और अंतिम उपाय के रूप में हो।
  • राज्यपाल: नियुक्ति पर मुख्यमंत्री से परामर्श; पाँच वर्ष का कार्यकाल, जिसे ठोस कारण के बिना न बदला जाए; बहुमत वाली मंत्रि-परिषद् को बर्खास्त न किया जाए।
  • विधायन: समवर्ती सूची के विषय पर विधि बनाने से पहले केंद्र राज्यों से परामर्श करे; राष्ट्रपति किसी राज्य विधेयक पर अनुमति रोकें तो कारण बताएँ; कराधान को छोड़कर अवशिष्ट शक्तियाँ समवर्ती सूची में जाएँ।
  • अन्य निकाय: क्षेत्रीय परिषदों को फिर से सक्रिय किया जाए; राष्ट्रीय विकास परिषद् का नाम राष्ट्रीय आर्थिक और विकास परिषद् हो; अखिल भारतीय सेवाएँ और बनाई जाएँ।

अन्य सिफ़ारिशें धन, सुरक्षा और भाषा से जुड़ी थीं। केंद्र राज्य की सहमति के बिना भी अपने सशस्त्र बल तैनात कर सकता है, यद्यपि राज्य से परामर्श वांछनीय है; निगम कर की शुद्ध आय को बाँटने योग्य बनाया जा सकता है; आय कर पर अधिभार केवल किसी विशेष प्रयोजन और सीमित अवधि के लिए हो; और त्रि-भाषा सूत्र को उसकी सच्ची भावना से लागू किया जाए।

रिपोर्ट के बड़े हिस्से पर अमल हुआ। 1990 में बनी अंतर-राज्य परिषद् ने अपनी आरंभिक बैठकें इसी रिपोर्ट पर कीं, और अपनी उप-समिति द्वारा जाँची गई 179 सिफ़ारिशों पर 1996 में सहमति दी। दिसंबर 2011 तक संघ 247 में से 180 सिफ़ारिशें लागू कर चुका था।

पुंछी आयोग (2007-10)

पुंछी आयोग: गठन और विचारार्थ विषय

सरकारिया आयोग के दो दशक बाद उभरे नए प्रश्नों की जाँच के लिए केंद्र-राज्य संबंधों पर दूसरा आयोग 27 अप्रैल 2007 को गठित हुआ। इसके अध्यक्ष भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी थे। धीरेंद्र सिंह, विनोद कुमार दुग्गल और डॉ. एन. आर. माधव मेनन इसके सदस्य थे, और विजय शंकर सदस्य सचिव।

  • दायरा: विधायी और प्रशासनिक संबंध, राज्यपालों की भूमिका, आपात उपबंध, वित्तीय संबंध, नियोजन, पंचायती राज, और संसाधनों का बँटवारा, जिसमें अंतर-राज्यीय नदी जल भी शामिल है।
  • नए प्रश्न: लंबी चलने वाली सांप्रदायिक या जातिगत हिंसा में केंद्र की भूमिका, नदियों को जोड़ने जैसी बड़ी परियोजनाएँ, अंतर-राज्यीय प्रभाव वाले अपराधों के लिए केंद्रीय एजेंसी, और केंद्रीय बलों की तैनाती के लिए अनुच्छेद 355 के अंतर्गत विधि।

आयोग ने 30 मार्च 2010 को सात खंडों की रिपोर्ट सौंपी, जिसमें 273 सिफ़ारिशें थीं; कुछ पुस्तकों में यह संख्या अलग गिनी गई है। आयोग ने सरकारिया रिपोर्ट, संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का सहारा लिया, फिर भी कई क्षेत्रों में सरकारिया से अलग राय दी। उसका केंद्रीय निष्कर्ष यह था कि भारत की एकता, अखंडता और विकास की कुंजी सहकारी संघवाद होगा।

पुंछी आयोग की सिफ़ारिशें (2010)

  • राज्यपाल का कार्यकाल और पद से हटाना: चयन सरकारिया के मानदंडों से; पाँच वर्ष का नियत कार्यकाल, जिसे केंद्र अपनी इच्छा से न बदले; हटाने की प्रक्रिया राष्ट्रपति पर महाभियोग जैसी; विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति का पद नहीं।
  • विधेयकों पर अनुमति: राज्यपाल छह महीने के भीतर निर्णय करें, और आरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति भी छह महीने के भीतर।
  • आपात स्थिति: अनुच्छेद 356 केवल संवैधानिक तंत्र के वास्तविक विफल होने पर, और बोम्मई दिशानिर्देश संविधान में लिखे जाएँ; अनुच्छेद 355 के अंतर्गत “स्थानीय आपात” का ढाँचा।
  • समवर्ती सूची: विधि बनाने से पहले राज्यों से व्यापक सहमति; राज्य के विषयों पर संसद की सर्वोच्चता जताने में संयम।
  • संस्थाएँ: अधिक सशक्त अंतर-राज्य परिषद्, जिसकी वर्ष में कम से कम तीन बैठकें हों; क्षेत्रीय परिषदों की वर्ष में कम से कम दो बैठकें।

राज्यपाल के विवेक पर आयोग का मत था कि अनुच्छेद 163 राज्यपाल को मंत्रि-परिषद् के विरुद्ध कार्य करने की कोई सामान्य शक्ति नहीं देता। विवेक का क्षेत्र सीमित है, और उसका प्रयोग तर्क और सद्भाव से होना चाहिए। आयोग ने त्रिशंकु विधान सभा और राज्यपाल के अन्य कठिन निर्णयों के लिए दिशानिर्देश भी दिए।

  • सरकार का गठन: सबसे व्यापक समर्थन वाले दल या गठबंधन को आमंत्रित किया जाए, और चुनाव पूर्व गठबंधन को एक दल माना जाए। त्रिशंकु विधान सभा में वरीयता का क्रम, जो पहले सरकारिया ने रखा था, यह है: पहले चुनाव पूर्व गठबंधन, फिर दूसरों के समर्थन वाला सबसे बड़ा दल, फिर ऐसा चुनाव बाद गठबंधन जिसके सभी साझेदार सरकार में हों, और अंत में ऐसा चुनाव बाद गठबंधन जिसके कुछ साझेदार बाहर से समर्थन दें।
  • मुख्यमंत्री को हटाना: निश्चित समय-सीमा में सदन में शक्ति परीक्षण पर ज़ोर।
  • मंत्री पर अभियोजन: यदि ठोस सामग्री के बावजूद मंत्रिमंडल का निर्णय पक्षपाती लगे, तो राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह के विरुद्ध भी अभियोजन की स्वीकृति दे सकते हैं।

सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग में अंतर

दोनों आयोग मूल बातों पर सहमत थे, पर उनकी पद्धति अलग थी। सरकारिया ने मुख्यतः संयम माँगा: विधि बनाने से पहले राज्यों से परामर्श हो, राज्यपाल का पद दलगत राजनीति से ऊपर रहे और अनुच्छेद 356 केवल अंतिम उपाय बने। दो दशक बाद पुंछी ने अधिक ठोस नियम चाहे: राज्यपालों का नियत कार्यकाल और महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया, विधेयकों पर अनुमति के लिए छह महीने की सीमा, और अनुच्छेद 355 के अंतर्गत स्थानीय आपात का ढाँचा।

तालिका 2. दोनों राष्ट्रीय आयोगों की तुलना।
बिंदु सरकारिया आयोग पुंछी आयोग
गठन 9 जून 1983 27 अप्रैल 2007
रिपोर्ट जनवरी 1988, 247 सिफ़ारिशें 30 मार्च 2010, 273 सिफ़ारिशें
दृष्टिकोण व्यवस्था ठीक; शक्ति के प्रयोग का ढंग बदले सहकारी संघवाद ही कुंजी
राज्यपाल मुख्यमंत्री से परामर्श; स्थिर पाँच वर्ष का कार्यकाल नियत कार्यकाल; महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया; कुलाधिपति की भूमिका नहीं
अंतर-राज्य परिषद् अनुच्छेद 263 के अंतर्गत स्थायी परिषद् अधिक सशक्त, वर्ष में तीन बैठकें, अनुवर्ती कार्रवाई की शक्ति

सहकारी संघवाद और उसकी संस्थाएँ

सहकारी संघवाद और प्रतिस्पर्धी संघवाद

संविधान में 'परिसंघ' (federation) शब्द कहीं नहीं है। अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है। इसका अर्थ है कि यह परिसंघ राज्यों के किसी समझौते से नहीं बना, और कोई राज्य इससे अलग नहीं हो सकता। राज्य सभा में भी राज्य बराबर नहीं हैं, क्योंकि वहाँ सीटें जनसंख्या के आधार पर बाँटी गई हैं। विद्वानों ने इस व्यवस्था को अर्ध-परिसंघीय (के. सी. व्हीयर), सौदेबाज़ी वाला संघवाद (मॉरिस जोन्स) और सहकारी संघवाद (ग्रेनविल ऑस्टिन) कहा है।

सहकारी संघवाद में संघ और राज्य साझा मंचों के माध्यम से साझेदार की तरह काम करते हैं; यूपीएससी ने इसे 'सहकारी परिसंघवाद' भी लिखा है। प्रतिस्पर्धी संघवाद का अर्थ है कि केंद्र और राज्य, और राज्य आपस में भी, राष्ट्रीय विकास के साझा लक्ष्य के लिए प्रतिस्पर्धा करें। 2015 में योजना आयोग का स्थान लेने वाले नीति आयोग का उद्देश्य दोनों को बढ़ावा देना था, ताकि ऊपर से नीचे के बजाय नीचे से ऊपर का दृष्टिकोण अपनाया जाए; इसकी शासी परिषद् में मुख्यमंत्री होते हैं।

क्षेत्रीय परिषद् क्या है: पाँच क्षेत्रीय परिषदें और पूर्वोत्तर परिषद्

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III ने पाँच क्षेत्रों में से हर एक के लिए एक क्षेत्रीय परिषद् बनाई। हर परिषद् एक सलाहकारी निकाय है, जो अपने राज्यों के, या संघ और उन राज्यों के, साझा हित के किसी भी विषय पर चर्चा कर सकती है, जैसे आर्थिक और सामाजिक नियोजन, सीमा विवाद, भाषाई अल्पसंख्यक और अंतर-राज्यीय परिवहन। इनके अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं, और उस क्षेत्र के मुख्यमंत्री सदस्य।

क्षेत्रीय परिषदों के अनुसार रंगा भारत का मानचित्र। उत्तरी: हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़ और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख; पाकिस्तान के कब्ज़े वाले क्षेत्र धारीदार। मध्य: छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश। पूर्वी: बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल। पश्चिमी: गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र और दादरा नगर हवेली तथा दमन दीव। दक्षिणी: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और पुडुचेरी। आठ पूर्वोत्तर राज्य, 2002 से सिक्किम सहित, पूर्वोत्तर परिषद् के अंतर्गत हैं। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्षद्वीप किसी क्षेत्र की सूची में नहीं हैं।

पूर्वोत्तर राज्य क्षेत्रीय परिषदों से बाहर हैं। उनकी साझा समस्याएँ पूर्वोत्तर परिषद् देखती है, जो 1971 में संसद के एक अधिनियम से बनी, और 2002 में सिक्किम भी इसमें जुड़ा। इसके अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री हैं, और आठों राज्यों के राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री इसके सदस्य हैं।

मंच के रूप में अंतर-राज्य परिषद्, जीएसटी परिषद् और नीति आयोग

सहकारी संघवाद उन मंचों पर टिका है जहाँ सरकारें मिलती हैं। हर मंच का विधिक आधार अलग है, और उसका वज़न भी।

पाँच मंच: अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद्, 1990 में गठित, अध्यक्ष प्रधानमंत्री, ग्यारह बैठकें; अनुच्छेद 279क के अंतर्गत जीएसटी परिषद्, 2016, अध्यक्ष वित्त मंत्री, भारित मतदान; नीति आयोग, जिसने 2015 में योजना आयोग का स्थान लिया, मुख्यमंत्रियों की शासी परिषद् सहित; राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत क्षेत्रीय परिषदें, पाँच क्षेत्र, सलाहकारी, अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री; और 1971 के अधिनियम के अंतर्गत पूर्वोत्तर परिषद्, राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की, अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री। पहले दो संवैधानिक हैं; क्षेत्रीय परिषदें और पूर्वोत्तर परिषद् सांविधिक।
  • अंतर-राज्य परिषद्: अनुच्छेद 263 के अंतर्गत संवैधानिक, किन्तु केवल सिफ़ारिश करने वाली; 1990 से ग्यारह बैठकें, अंतिम 2016 में। इसका विवरण प्रशासनिक संबंधों वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में है।
  • जीएसटी परिषद्: अनुच्छेद 279क के अंतर्गत संवैधानिक; निर्णय भारित मतदान से, जिसमें संघ और राज्य दोनों की आवश्यकता होती है।
  • नीति आयोग: 2015 में योजना आयोग का स्थान लिया; इसकी शासी परिषद् में मुख्यमंत्री साथ बैठते हैं, और प्रादेशिक परिषदें (Regional Councils) राज्यों के समूहों के साझा प्रश्न उठाती हैं।
  • क्षेत्रीय परिषदें और पूर्वोत्तर परिषद्: सांविधिक और सलाहकारी; पुंछी आयोग ने क्षेत्रीय परिषदों की वर्ष में कम से कम दो बैठकें चाही थीं।

पुराने नियोजन निकायों से अंतर साफ़ दिखता है। मार्च 1950 का योजना आयोग और अगस्त 1952 की राष्ट्रीय विकास परिषद् कार्यपालिका के संकल्प से बने थे, न संवैधानिक थे न सांविधिक; फिर भी योजना आयोग की सलाह पर दिए गए अनुदान राज्यों को मिलने वाले केंद्रीय अनुदानों का बड़ा हिस्सा थे। राजमन्नार समिति इसकी जगह सांविधिक निकाय चाहती थी, जबकि सरकारिया आयोग ने वित्त आयोग के साथ इसके काम के बँटवारे को उचित माना।

केंद्र-राज्य संबंधों में विश्वास की कमी और आगे की राह

हाल के वर्षों में सहयोग भी गहरा हुआ है और विवाद भी तीखे हुए हैं। सहयोग की ओर देखें तो 2017 से जीएसटी परिषद् के माध्यम से संघ और राज्यों की कराधान शक्तियाँ एक साथ आईं, और चौदहवें वित्त आयोग ने संघ के करों में राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 42 प्रतिशत किया। वित्त का पूरा ढाँचा वित्त आयोग वाले लेख (अंग्रेज़ी में) में समझाया गया है।

  • दबाव के बिंदु: कई राज्यों द्वारा सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस लेना, राज्य विधेयकों पर अनुमति में देरी, और राज्यपालों की भूमिका।
  • न्यायालय में विधेयकों पर अनुमति: राष्ट्रपति अनुच्छेद 155 के अंतर्गत राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं, और अनुच्छेद 200 के अंतर्गत किसी राज्य विधेयक पर राज्यपाल के पास चार विकल्प हैं: अनुमति देना, अनुमति रोकना, धन विधेयक न हो तो पुनर्विचार के लिए लौटाना, या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना। अनुच्छेद कोई समय-सीमा नहीं देता। अप्रैल 2025 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमाएँ तय कीं और लंबित विधेयकों को अनुमति प्राप्त मान लिया। राष्ट्रपति के निर्देश (reference) पर संविधान पीठ ने नवंबर 2025 में राय दी कि न्यायालय ऐसी समय-सीमाएँ तय न करें, और न्यायालय द्वारा मानी गई अनुमति एक अन्य संवैधानिक प्राधिकारी की भूमिका अपने हाथ में लेना है। पीठ ने राज्यपाल के विवेक पर पुंछी आयोग की व्याख्या को संविधान के अनुरूप पाया, जैसा न्यायालय नबाम रेबिया (2016) में भी कर चुका था।
  • संस्थागत कमियाँ: अंतर-राज्य परिषद् की बैठक 2016 के बाद नहीं हुई, यद्यपि नवंबर 2024 में इसका पुनर्गठन हुआ।
  • आगे की राह: पुंछी आयोग की सलाह कि शासन के प्रश्न लंबे मुकदमों के बजाय राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रिया से सुलझें, और अंतर-राज्य परिषद् इसका मुख्य मंच बने।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2024, सामान्य अध्ययन-IIकेन्द्र सरकार ने केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के क्षेत्र में हाल ही में क्या बदलाव किये हैं ? संघवाद को मजबूत करने के लिए तथा केन्द्र और राज्यों के बीच विश्वास पैदा करने के लिए उपाय सुझाइए ।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: उपाय सुझाइए · दृष्टिकोण: पहले हाल के बदलाव गिनाएँ, फिर उनसे उपजे टकराव, और अंत में विश्वास बढ़ाने के उपाय।

    भूमिका: साझा कराधान, अधिक हस्तांतरण और नए मंचों ने केंद्र-राज्य संबंधों को नया रूप दिया है, किन्तु विवाद भी तीखे हुए हैं, इस बात से शुरुआत करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • बदलाव: जीएसटी और जीएसटी परिषद्; चौदहवें वित्त आयोग का 42 प्रतिशत; योजना आयोग की जगह नीति आयोग।
    • टकराव: राज्यपाल और विधेयकों पर अनुमति, सीबीआई की सहमति, अनुच्छेद 356 का इतिहास।
    • उपाय: राज्यपालों पर पुंछी आयोग के प्रस्ताव, अनुमति की समय-सीमा, अधिक सशक्त अंतर-राज्य परिषद्, क्षेत्रीय परिषदों की वर्ष में दो बैठकें।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि विश्वास तात्कालिक सौदेबाज़ी से नहीं, नियमित संस्थागत परामर्श से बनता है।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-IIहाल के वर्षों में सहकारी परिसंघवाद की संकल्पना पर अधिकाधिक बल दिया जाता रहा है। विद्यमान संरचना में असुविधाओं और सहकारी परिसंघवाद किस सीमा तक इन असुविधाओं का हल निकाल लेगा, इस पर प्रकाश डालिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: प्रकाश डालिए · दृष्टिकोण: पहले संरचना की असुविधाएँ बताएँ, फिर दिखाएँ कि सहकारी संघवाद उनमें से क्या सुलझा सकता है और क्या नहीं।

    भूमिका: सहकारी संघवाद का अर्थ है साझा मंचों के माध्यम से संघ और राज्यों का साझेदार की तरह काम करना।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • असुविधाएँ: राज्यपाल, अनुच्छेद 356, वित्तीय निर्भरता, निष्क्रिय अंतर-राज्य परिषद्।
    • हल: जीएसटी परिषद् के साझा निर्णय, नीति आयोग की शासी परिषद्, क्षेत्रीय परिषदें।
    • सीमाएँ: जीएसटी परिषद् को छोड़ अन्य मंच सलाहकारी हैं; विश्वास की कमी बनी हुई है।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि सहकारी संघवाद वहीं सफल होता है जहाँ संस्थाएँ दोनों पक्षों को वास्तविक आवाज़ देती हैं।

  3. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2014, सामान्य अध्ययन-IIयद्यपि परिसंघीय सिद्धांत हमारे संविधान में प्रबल है और वह सिद्धांत संविधान के आधारिक अभिलक्षणों में से एक है, परंतु यह भी इतना ही सत्य है कि भारतीय संविधान के अधीन परिसंघवाद (फैडरलिज्म) सशक्त केन्द्र के पक्ष में झुका हुआ है। यह एक ऐसा लक्षण है जो प्रबल परिसंघवाद की संकल्पना के विरोध में है। चर्चा कीजिये।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: चर्चा कीजिये · दृष्टिकोण: पहले संविधान का केंद्र की ओर झुकाव दिखाएँ, फिर सरकारिया के तर्क से बताएँ कि इससे संघवाद कमज़ोर होना ज़रूरी नहीं।

    भूमिका: संघवाद मूल ढाँचे का भाग है, फिर भी संविधान सशक्त केंद्र की ओर झुका है, इससे शुरुआत करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • झुकाव: राज्यों का संघ, आपात शक्तियाँ, संघ सूची की प्रधानता, अखिल भारतीय सेवाएँ।
    • सरकारिया: व्यवस्था मूलतः ठीक; सशक्त केंद्र का अर्थ केन्द्रीयकरण नहीं; 'केंद्र में उच्च रक्तचाप और परिधि पर रक्ताल्पता'।
    • संतुलन: समवर्ती सूची पर परामर्श, अंतर-राज्य परिषद्, अनुच्छेद 356 पर संयम।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि शक्ति का प्रयोग संयम से हो तो सशक्त केंद्र और सशक्त राज्य साथ चल सकते हैं।

  4. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2026, सामान्य अध्ययन-IIभारत की संघीय राज-व्यवस्था में राज्यपाल की स्थिति की विवेचना कीजिए। राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयक पर अनुमति देते समय उसकी शक्ति की प्रकृति कैसी है? क्या वह अपने सभी कार्यों में अपनी मंत्रिपरिषद की सहायता व सलाह से बाध्य है?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: विवेचना कीजिए · दृष्टिकोण: पहले संघीय ढाँचे में राज्यपाल का स्थान बताएँ, फिर अनुच्छेद 200 के अंतर्गत अनुमति, और अंत में अनुच्छेद 163 के अंतर्गत विवेक की सीमाएँ।

    भूमिका: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और राज्य तथा संघ के बीच की कड़ी भी, इससे शुरुआत करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • स्थिति: राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति (अनुच्छेद 155); सामान्यतः मंत्रि-परिषद् की सलाह से बँधे नाममात्र के प्रमुख; आयोगों की यह चिंता कि राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि की तरह काम करते हैं।
    • अनुमति: अनुच्छेद 200 के विकल्प, राष्ट्रपति के लिए आरक्षण, अप्रैल 2025 की समय-सीमाएँ और नवंबर 2025 की यह राय कि न्यायालय समय-सीमा तय न करें और अनुमति को प्राप्त न मानें।
    • सहायता और सलाह: अनुच्छेद 163 कोई सामान्य विवेक नहीं देता; पुंछी का सीमित विवेक, जो तर्क और सद्भाव से प्रयुक्त हो, नबाम रेबिया में और 2025 में स्वीकार।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि यह पद तभी ठीक चलता है जब उसका विवेक संकीर्ण, तर्कसंगत और सद्भावपूर्ण हो, जैसा दोनों आयोगों ने चाहा।

  5. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2025भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित पर विचार कीजिए :
    1. I. अंतर-राज्य परिषद्
    2. II. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद्
    3. III. क्षेत्रीय परिषदें

    उपर्युक्त में से कितनी भारत के संविधान के उपबंधों के अनुसार स्थापित हुईं?

    1. a केवल एक
    2. b केवल दो
    3. c सभी तीन
    4. d कोई भी नहीं
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: कितने सही: तीन परिषदों का विधिक आधार

    हल करने की विधि: हर परिषद् के लिए पूछें कि वह कहाँ से आती है। I, अंतर-राज्य परिषद्: अनुच्छेद 263 इसका उपबंध करता है, और 1990 का राष्ट्रपति आदेश इसी अनुच्छेद के अंतर्गत जारी हुआ, इसलिए यह गिनी जाएगी। II, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद्: इसे नवंबर 1998 में कार्यपालिका ने बनाया, और कोई अनुच्छेद इसका उपबंध नहीं करता, इसलिए यह नहीं गिनी जाएगी। III, क्षेत्रीय परिषदें: सांविधिक, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III से बनीं, इसलिए ये भी नहीं गिनी जाएँगी। केवल एक परिषद् गिनी जाती है।

    इस भ्रम से बचें: अंतर-राज्य परिषद् 1990 में राष्ट्रपति के आदेश से बनी, इसलिए यह कार्यपालिका की रचना लग सकती है; किन्तु वह आदेश अनुच्छेद 263 के अंतर्गत था।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल एक: सही। केवल अंतर-राज्य परिषद् संविधान पर, अनुच्छेद 263 के अंतर्गत, आधारित है।
    • (b) केवल दो: गलत। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् कार्यपालिका ने और क्षेत्रीय परिषदें एक अधिनियम ने बनाईं।
    • (c) सभी तीन: गलत। तीन में से दो का कोई संवैधानिक आधार नहीं है।
    • (d) कोई भी नहीं: गलत। अनुच्छेद 263 अंतर-राज्य परिषद् का उपबंध करता है, यद्यपि राष्ट्रपति ने इसे 1990 में आदेश से बनाया।

    उत्तर: केवल एक: विकल्प (a), क्योंकि संविधान केवल अंतर-राज्य परिषद् का उपबंध करता है।

  6. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय संघवाद का लक्षण नहीं है?
    1. a भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है।
    2. b केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है।
    3. c संघटक इकाइयों को राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व दिया गया है।
    4. d यह संघटक इकाइयों के बीच एक समझौते का परिणाम है।
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर: 'लक्षण नहीं है'

    हल करने की विधि: हर विकल्प को संविधान पर परखें। स्वतंत्र न्यायपालिका, सातवीं अनुसूची में शक्तियों का विभाजन, और जनसंख्या के आधार पर बँटी राज्य सभा की सीटें, ये सब भारतीय परिसंघ के लक्षण हैं। अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है: यह परिसंघ राज्यों के जुड़ने के समझौते से नहीं बना, और कोई राज्य इससे अलग नहीं हो सकता। इसलिए समझौते वाला कथन ही मेल नहीं खाता।

    इस भ्रम से बचें: राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व परिसंघ-विरोधी लग सकता है, किन्तु भारतीय परिसंघ की रचना ही ऐसी है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) स्वतंत्र न्यायपालिका: उत्तर के रूप में गलत। यह लक्षण है; न्यायालय संघ और राज्यों के विवाद सुलझाते हैं।
    • (b) शक्तियों का स्पष्ट विभाजन: उत्तर के रूप में गलत। सातवीं अनुसूची तीन सूचियों से शक्तियाँ बाँटती है।
    • (c) राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व: उत्तर के रूप में गलत। राज्यों को सीटें जनसंख्या के आधार पर मिलती हैं, और यह भारतीय ढाँचे का लक्षण है।
    • (d) इकाइयों के समझौते का परिणाम: सही। अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ बनाता है, समझौते से बना परिसंघ नहीं।

    उत्तर: विकल्प (d): भारतीय परिसंघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख केंद्र-राज्य संबंधों पर बने आयोगों को अंतर-राज्य परिषद् सचिवालय के अभिलेखों, आयोगों की रिपोर्टों और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।