परिचय
नवपाषाण काल, अर्थात् नया पाषाण युग, भारतीय प्रागैतिहास का वह काल है जो लगभग 10,000 वर्ष पहले शुरू हुआ। इसमें लोग पत्थर के औज़ारों को घिसकर चमकाने लगे, खेती और पशुपालन अपनाया, बर्तन बनाए और गाँवों में बस गए। यह उत्तर-पश्चिम में मेहरगढ़ से शुरू हुआ और कश्मीर, दक्षिण, गंगा के मैदान तथा उत्तर-पूर्व में बहुत बाद में पहुँचा।
नवपाषाण काल: भारत में नवपाषाण युग
नवपाषाण काल क्या है? नया पाषाण युग
नाम यूनानी भाषा से आया है: नियोस (नया) और लिथोस (पत्थर)। 'नियोलिथिक' शब्द जॉन लुबॉक ने 1865 में गढ़ा था। इस युग की पहचान घिसा या चमकाया हुआ पत्थर का औज़ार है, जबकि पुरापाषाण काल में पत्थर को केवल टुकड़े उतारकर गढ़ा जाता था। नाम औज़ारों से पड़ा, पर असली बदलाव इस बात में था कि लोग भोजन कैसे पाते थे।
शिकारी और संग्राहक वही लेते थे जो प्रकृति देती थी; नवपाषाण लोगों ने भोजन पैदा करना शुरू किया। वे फ़सल बोते और काटते थे, पशुओं के झुंड रखते थे, अनाज जमा करते थे और एक जगह टिककर रहते थे। एक बार शुरू होने के बाद जीवन का यह ढंग कई हज़ार वर्षों में धीरे-धीरे पूरे उपमहाद्वीप में फैला।
भारत में नवपाषाण काल की अवधि: खेती कब शुरू हुई
उपमहाद्वीप में यह युग हर जगह एक साथ शुरू नहीं हुआ। सबसे पहले कृषक गाँव उत्तर-पश्चिम में दिखते हैं, और कश्मीर, दक्षिण भारत, गंगा के मैदान और उत्तर-पूर्व में खेती बहुत बाद में पहुँची।
- उत्तर-पश्चिम: बोलन दर्रे के पास मेहरगढ़, जहाँ लगभग 8,000 वर्ष पहले बसावट शुरू हुई; दक्षिण एशिया में स्थायी जीवन की शुरुआत यहीं, बलूचिस्तान में हुई।
- कश्मीर: बुर्ज़होम, जिसके चरण 3000 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच के हैं।
- दक्षिण भारत: लगभग 3000 ई.पू. से, और आंध्र-कर्नाटक क्षेत्र में 2500 ई.पू. से राख के टीले।
- गंगा का मैदान: तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. के मध्य के बाद स्पष्ट कृषक गाँव, और मुख्यतः 2000 ई.पू. के बाद।
- उत्तर-पूर्व: असम का दाओजली हाडिंग, जिसकी तिथि आज से लगभग 2,700 वर्ष पहले की है।
नवपाषाण क्रांति: अर्थ और पौधों-पशुओं का पालतूकरण
शिकार और संग्रहण से खेती और स्थायी जीवन की ओर हुए बदलाव को नवपाषाण क्रांति कहा जाता है; इसे पहली कृषि क्रांति भी कहते हैं। लोगों ने देखा था कि खाने योग्य पौधे कहाँ उगते हैं और गिरे हुए बीज कैसे अंकुरित होते हैं। वे बीज पकने तक पौधों को पक्षियों और जानवरों से बचाने लगे, और इस तरह किसान बन गए।
पशुओं को भी इसी तरह पालतू बनाया गया। सबसे पहले कुत्ते के जंगली पूर्वज को पालतू बनाया गया। बाद में लोगों ने भेड़, बकरी, मवेशी और सूअर जैसे शांत पशुओं को, जो झुंड में रहते थे और अधिकतर घास खाते थे, अपने डेरों के पास आने दिया और जंगली जानवरों से उनकी रक्षा की। इस तरह वे पशुपालक बने।
जिस प्रक्रिया में लोग पौधे उगाते और पशुओं की देखभाल करते हैं, उसे पालतूकरण (domestication) कहते हैं। लोगों ने ऐसे पौधे चुने जिन पर रोग कम लगते थे, दाने बड़े होते थे और डंठल मज़बूत; पशुओं में शांत स्वभाव वालों को पाला। समय के साथ पालतू पौधे और पशु जंगली पौधों-पशुओं से अलग हो गए; जंगली पशुओं के दाँत और सींग प्रायः कहीं बड़े होते हैं। पालतूकरण लगभग 12,000 वर्ष पहले शुरू हुआ। गेहूँ और जौ सबसे पहली फ़सलों में थे, और भेड़ तथा बकरी सबसे पहले पाले गए पशुओं में।
मध्यपाषाण और नवपाषाण काल में अंतर
दोनों युगों में सबसे बड़ा अंतर भोजन पाने के तरीके में है। मध्यपाषाण लोग शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे; वे सूक्ष्म-पाषाण (microliths), अर्थात् मूठों में लगाए जाने वाले पत्थर के बहुत छोटे ब्लेड, बनाते थे और पशुपालन की शुरुआत ही कर रहे थे। नवपाषाण लोग फ़सल उगाते, पशु पालते और गाँवों में रहते थे, यद्यपि पुराने औज़ार और शिकार पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। पहले के युग पर भारत में मध्यपाषाण काल (अंग्रेज़ी में) लेख में चर्चा है।
| आधार | मध्यपाषाण | नवपाषाण |
|---|---|---|
| काल | 12,000 से 10,000 वर्ष पहले | लगभग 10,000 वर्ष पहले से |
| औज़ार | मूठों में लगे सूक्ष्म-पाषाण | घिसी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, ओखली-मूसल |
| भोजन | शिकार, मछली पकड़ना, संग्रहण | खेती और पशुपालन, कुछ शिकार भी |
| बसावट | डेरे, कुछ लंबे ठहराव | घरों वाले गाँव |
| मृद्भांड | कुछ बाद के स्थलों पर | आम, भंडारण और भोजन पकाने के लिए |
नवपाषाण काल के औज़ार, मृद्भांड और घर
नवपाषाण काल के औज़ार: घिसी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, सेल्ट, ओखली और मूसल
नवपाषाण काल के बहुत से औज़ार पहले के पुरापाषाण औज़ारों से अलग हैं, और इसी कारण इस युग को यह नाम मिला। इनमें धार तेज़ करने के लिए घिसे गए औज़ार हैं, और अनाज तथा दूसरी वनस्पति पीसने के लिए ओखली और मूसल। ओखली-मूसल तो कई हज़ार वर्ष बाद आज भी अनाज पीसने में काम आते हैं। पुरापाषाण ढंग के औज़ार भी बनते रहे, और कुछ औज़ार हड्डी के भी बने।
- सेल्ट (celts): बसूले, कुदाल या कुल्हाड़ी जैसे लंबे, पतले पत्थर के औज़ार; बिहार के चिरांद में कुल्हाड़ियाँ क्वार्टज़ाइट, बेसाल्ट और ग्रेनाइट की हैं, और कर्नाटक के ब्रह्मगिरि में डोलेराइट की।
- पीसने के औज़ार: असम के दाओजली हाडिंग जैसे स्थलों पर मिले ओखली-मूसल बताते हैं कि लोग अनाज उगाते और उससे भोजन बनाते थे।
- हड्डी और सींग: कश्मीर के बुर्ज़होम में घिसे हुए हड्डी के औज़ार मिले हैं, और हिरण के शाखादार सींगों तथा दूसरे पशुओं के सींगों से बने औज़ार भी।
- बाद के औज़ार: बुर्ज़होम में उत्तर नवपाषाण चरण में हँसिये, सेल्ट, तकली के चक्र, भालाग्र और ताँबे के बाणाग्र आते हैं।
- सूक्ष्म-पाषाण: अब भी बनते थे; चिरांद में इनके नौ प्रकार मिले हैं।
घिसी हुई पत्थर की कुल्हाड़ी सबसे महत्वपूर्ण औज़ार थी। इसी से बड़े पैमाने पर जंगल साफ़ किए जा सके, और बसूले के साथ इसने घरों और दूसरी संरचनाओं के लिए लकड़ी गढ़ी, जिससे नई ज़मीन खेती में आ सकी।
नवपाषाण काल के मृद्भांड: हाथ से बने धूसर बर्तनों से डोरी-छाप बर्तनों तक
नवपाषाण स्थलों से तरह-तरह के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। कुछ पर सजावट है, और इनका उपयोग चीज़ें रखने और भोजन पकाने में होता था, विशेषकर चावल, गेहूँ और दालों जैसे अनाज, जो अब भोजन का महत्वपूर्ण भाग बन गए थे। अनाज टोकरियों में और ज़मीन में खोदे गए गड्ढों में भी रखा जाता था।
- बुर्ज़होम, कश्मीर: हाथ से बने मोटे खुरदरे धूसर बर्तन, महीन धूसर बर्तन और रेतीले फीके लाल बर्तन; गोल घड़े और कटोरे, कुछ पर चटाई की छाप; बाद में चमकाए हुए धूसर बर्तन आते हैं।
- चिरांद, बिहार: अधिकतर हाथ से बने; आधे लाल और आधे काले-लाल बर्तन।
- संगनकल्लू, कर्नाटक: प्रायः फीके भूरे या काले, मोटी मिट्टी से हाथ से बने।
- दाओजली हाडिंग, असम: डोरी-छाप बर्तन, जो भारतीय नवपाषाण में दुर्लभ हैं और पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया से संपर्क का संकेत देते हैं।
नवपाषाण काल के घर: गर्त-आवास, कच्ची ईंटों के कमरे और झोपड़ियाँ
स्थायी जीवन घरों के अवशेषों में दिखता है। कश्मीर में लोग ज़मीन में खोदे गए गर्त-आवास बनाते थे, जिनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं; ठंड के मौसम में ये आश्रय देते रहे होंगे। झोपड़ियों के भीतर और बाहर, दोनों जगह चूल्हे मिले हैं, जिससे लगता है कि मौसम के अनुसार भोजन भीतर या बाहर पकाया जाता था।
- बुर्ज़होम: आवास-गड्ढे अधिकतर गोल या आयताकार, कुछ अंडाकार, करेवा मिट्टी में खोदे गए; बाद में छतें ज़मीन से ऊपर उठा दी गईं, और खंभों के गड्ढे लकड़ी के भरपूर उपयोग को दिखाते हैं।
- मेहरगढ़: कच्ची ईंटों के चौकोर या आयताकार घर, हर एक में चार या अधिक खाने, जिनमें से कुछ शायद भंडारण के लिए थे।
- चिरांद: मिट्टी और सरकंडों से बनी गोल झोपड़ियाँ; पहले के फ़र्श ज़मीन के तल से नीचे थे और बाद के ज़मीन के तल पर।
- हल्लूर और संगनकल्लू, कर्नाटक: बाँस और मिट्टी की दीवारों वाले गोल घर; हल्लूर में दीवारें शंकु के आकार की छप्पर वाली छत को थामती थीं।
भारत के नवपाषाण स्थल
मेहरगढ़: भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना नवपाषाण स्थल
मेहरगढ़ बोलन दर्रे के पास एक उपजाऊ मैदान में है, और यह दर्रा ईरान जाने के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक है। संभवतः यही वह जगह थी जहाँ इस क्षेत्र में लोगों ने पहली बार जौ और गेहूँ उगाना और भेड़-बकरियाँ पालना सीखा, और यह सबसे पुराने ज्ञात गाँवों में से एक है। 1974 में ज्यां-फ़्रांस्वा जारिज और कैथरीन जारिज के नेतृत्व में एक फ़्रांसीसी दल ने इस स्थल की खोज की।
- पशुओं की हड्डियाँ: सबसे नीचे की परतों में हिरण और सूअर जैसे जंगली पशुओं की हड्डियाँ हैं; ऊपर की परतों में भेड़-बकरी अधिक हैं, और उससे भी ऊपर अधिकतर मवेशी।
- शवाधान: एक कब्र में मृतक के साथ बकरियाँ दफ़नाई गई थीं, शायद परलोक में भोजन के लिए।
- घिसी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ: मेहरगढ़ की ऐसी कुल्हाड़ियाँ दक्षिण एशिया में स्तरीकृत संदर्भ से मिली सबसे पुरानी हैं।
- छेदे गए दाँत: जीवित व्यक्ति की दाढ़ों में किए गए छेद, इस प्रथा का सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण।
बुर्ज़होम और गुफ़कराल: कश्मीर के उत्तरी नवपाषाण स्थल
बुर्ज़होम श्रीनगर से 16 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है और भारत का सबसे उत्तरी उत्खनित नवपाषाण स्थल है। इसका नाम कश्मीरी शब्द बुर्ज़ से बना है, जिसका अर्थ भोजपत्र (बर्च) का पेड़ है। 1935 में एच. डी टेरा और टी. टी. पैटरसन ने इसकी खोज की, और 1960 से 1971 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के टी. एन. खजांची के नेतृत्व में इसकी खुदाई हुई। इसकी विशिष्ट संस्कृति को उत्तरी नवपाषाण संस्कृति कहा जाता है।
- पहला चरण, बिना बर्तनों का: ज़मीन के नीचे आवास-गड्ढे, घिसे हुए हड्डी और पत्थर के औज़ार, और भोजन-संग्रह तथा अनाज की खेती, दोनों पर टिका जीवन।
- दूसरा चरण: हाथ से बने बर्तन; कुत्ता, भेड़ और बकरी पालतू; अधिक गड्ढे, जो बढ़ती जनसंख्या का संकेत हैं।
- उत्तर नवपाषाण: हँसिये, तकली के चक्र और ताँबे के बाणाग्र; मनके और लटकन जो पाकिस्तान के क्षेत्रों और तिब्बती पठार से संपर्क दिखाते हैं।
- शवाधान और फ़सलें: मनुष्यों के साथ कुत्ते और सींगों वाले हिरण दफ़नाए गए, कुछ खोपड़ियों में छेद किए गए; गेहूँ, जौ और मसूर उगाए जाते थे।
- महापाषाण चरण: मेनहिर कहलाने वाले खड़े पत्थर, जबकि जीवन का बाकी ढंग वही रहा।
पुलवामा ज़िले में त्राल के पास गुफ़कराल एक संबंधित स्थल है। इसके नाम का अर्थ है कुम्हार की गुफा: गुफ़ अर्थात् गुफा और कराल अर्थात् कुम्हार। 1981 में ए. के. शर्मा के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक दल ने इसकी खुदाई की और बिना बर्तनों वाले नवपाषाण से लेकर महापाषाण तक पाँच काल पाए; यहाँ गेहूँ और मसूर उगाए जाते थे।
बुर्ज़होम एक संरक्षित धरोहर स्थल भी है। यह 15 अप्रैल 2014 से यूनेस्को विश्व धरोहर की भारत की संभावित (टेंटेटिव) सूची में है, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (2010 में संशोधित) के अंतर्गत संरक्षित रखता है।
चिरांद, कोल्डिहवा और महगड़ा: गंगा के मैदान के नवपाषाण स्थल
बिहार के सारण ज़िले में गंगा के उत्तरी तट पर स्थित चिरांद में नवपाषाण परत की तिथि लगभग 2500 से 1345 ई.पू. है। बिहार राज्य पुरातत्व निदेशालय ने 1962-63 और 1970-71 में इसकी खुदाई की। यहाँ गेहूँ, मूँग और जौ, भैंस और बैल की हड्डियाँ, बर्तनों पर धान की भूसी की छाप, और कूबड़ वाले बैलों, पक्षियों और साँपों की मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं।
- कोल्डिहवा, उत्तर प्रदेश: प्रयागराज में देवघाट के पास बेलन घाटी में; चावल और पशुओं की टूटी हड्डियाँ; 1972 से 1976 तक खुदाई।
- महगड़ा, उत्तर प्रदेश: बेलन के दूसरे किनारे पर; चावल, और मिट्टी की सतह पर मवेशियों के खुरों के निशान, जो एक पशुबाड़े का संकेत देते हैं।
- लहुरादेवा, उत्तर प्रदेश: संत कबीर नगर ज़िले में; चावल के बहुत पुराने दाने, जिनके बारे में अब भी बहस है कि वे उगाए गए थे या जंगल से बटोरे गए।
गंगा के मैदान में चावल की जो पुरानी तिथियाँ कभी बताई गई थीं, वे अब विवादित हैं। कोल्डिहवा की नई तिथि-गणना के अनुसार यहाँ स्पष्ट बसावट केवल उत्तर नवपाषाण काल से, लगभग 1900 ई.पू. के बाद, मिलती है। अतः इस क्षेत्र में स्पष्ट कृषक गाँव मुख्यतः 2000 ई.पू. के बाद के हैं, और लहुरादेवा का आरंभिक चावल शायद जंगल से बटोरा गया था।
दक्षिण भारत के नवपाषाण स्थल: संगनकल्लू, पिकलीहल, हल्लूर और ब्रह्मगिरि
दक्षिण भारत का नवपाषाण काल लगभग 3000 ई.पू. में शुरू हुआ, और इसकी विशेष पहचान राख के टीले (ash mounds) हैं, जो लकड़ी, गोबर और पशु-अवशेषों को अनुष्ठानपूर्वक जलाने से बने। यहाँ के लोग मवेशी, भेड़ और बकरियाँ पालते थे और मोटे अनाज तथा दालें उगाते थे।
- संगनकल्लू, कर्नाटक: बल्लारी के पास; एक कारखाना स्थल, जहाँ भारी संख्या में बर्तन, पत्थर की कुल्हाड़ियाँ और औज़ार मिले; छोटे मोटे अनाज और दालें, भेड़ और मवेशी, और गोबर फेंकने की जगहें।
- पिकलीहल, कर्नाटक: रायचूर ज़िले में, 1952 में एफ़. रेमंड ऑल्चिन ने खुदाई की; पशुपालक जो खंभों और खूँटों से बने बाड़ों वाले मौसमी डेरे लगाते थे।
- हल्लूर, कर्नाटक: हावेरी ज़िले में तुंगभद्रा पर; ब्राउनटॉप मिलेट नाम का मोटा अनाज, उड़द और कुलथी, और दक्षिण भारत में अफ़्रीकी मूल की सबसे पुरानी फ़सलों में से सेम और बाजरा।
- पैयमपल्ली, तमिलनाडु: तिरुपत्तूर ज़िले में, 1964-65 और 1967-68 में एस. आर. राव ने खुदाई की; उड़द और मोटा अनाज।
- ब्रह्मगिरि, कर्नाटक: चित्रदुर्ग ज़िले में, 1947 में मॉर्टिमर व्हीलर ने खुदाई की; डोलेराइट की घिसी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, और कलशों में दफ़नाए गए शिशु।
- तेक्कलकोटा, कर्नाटक: बल्लारी ज़िले में; सोने के बारीक कर्णाभूषण।
दाओजली हाडिंग: उत्तर-पूर्व भारत का नवपाषाण स्थल
दाओजली हाडिंग असम के दीमा हसाओ ज़िले में एक छोटे टीले पर है, ब्रह्मपुत्र घाटी के पास की पहाड़ियों में और चीन तथा म्यांमार जाने वाले रास्तों के निकट। 1961-63 में एम. सी. गोस्वामी और टी. सी. शर्मा के नेतृत्व में इसकी खुदाई हुई। यह उत्तर-पूर्व भारत में मिला पहला स्तरीकृत नवपाषाण स्थल है।
- कंधेदार सेल्ट: इस स्थल की विशेषता, जो इसके दूसरे घिसे पत्थर के औज़ारों के साथ मिलते हैं।
- डोरी-छाप बर्तन: भारतीय नवपाषाण में अन्यत्र दुर्लभ।
- ओखली और मूसल: इस बात के संकेत कि अनाज उगाया और तैयार किया जाता था।
- जेडाइट और जीवाश्म लकड़ी: जेडाइट, एक पत्थर जो शायद चीन से आया, और जीवाश्म लकड़ी के औज़ार; जीवाश्म लकड़ी वह प्राचीन लकड़ी है जो कठोर होकर पत्थर बन गई।
यहाँ की खोजें पश्चिम की बजाय पूर्व की ओर संकेत करती हैं। डोरी-छाप बर्तन और कंधेदार सेल्ट पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया से संबंध बताते हैं, और इस स्थल की तिथि आज से लगभग 2,700 वर्ष पहले की है, मेहरगढ़ से बहुत बाद की।
नवपाषाण काल में जीवन
नवपाषाण काल की कृषि और पशुओं का पालतूकरण
वैज्ञानिक नवपाषाण फ़सलों की पहचान स्थलों पर मिले जले हुए अनाज और पशुओं की हड्डियों से करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग फ़सलें उगीं: चावल को गेहूँ और जौ से अधिक पानी चाहिए, और सूखे, पहाड़ी इलाक़ों में भेड़-बकरी मवेशियों की तुलना में अधिक आसानी से जी लेती हैं। तालिका कुछ स्थलों के अनाज और हड्डियाँ दिखाती है।
| स्थल (आज का राज्य) | अनाज | पशु |
|---|---|---|
| मेहरगढ़ (पाकिस्तान) | गेहूँ, जौ | भेड़, बकरी, मवेशी |
| बुर्ज़होम (कश्मीर) | गेहूँ, मसूर | कुत्ता, मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस |
| चिरांद (बिहार) | गेहूँ, मूँग, जौ | भैंस, बैल |
| कोल्डिहवा (उत्तर प्रदेश) | चावल | टूटी हड्डियाँ |
| महगड़ा (उत्तर प्रदेश) | चावल | मवेशी (खुरों के निशान) |
| हल्लूर (कर्नाटक) | मोटा अनाज | मवेशी, भेड़, बकरी, सूअर |
| पैयमपल्ली (तमिलनाडु) | उड़द, मोटा अनाज | मवेशी, भेड़, सूअर |
पशु भोजन का भंडार थे: वे अपने-आप बढ़ते थे, और देखभाल करने पर दूध और ज़रूरत पड़ने पर मांस देते थे। अनाज को भोजन और बीज, दोनों के लिए बचाकर रखना पड़ता था, इसलिए लोगों ने मिट्टी के बड़े बर्तन बनाए, टोकरियाँ बुनीं और गड्ढे खोदे। उन्होंने कपास से कपड़ा बुनना भी शुरू किया, क्योंकि अब कपास उगाई जा सकती थी।
नवपाषाण काल की विशेषताएँ: गाँव, जनजातियाँ और शवाधान
- घिसे औज़ार: घिसी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, ओखली-मूसल, साथ में पुराने औज़ार और हड्डी के औज़ार।
- खेती और पशुपालन: कई क्षेत्रों में शिकार और संग्रहण भी साथ-साथ चलते रहे।
- स्थायी गाँव: घर, जिनमें रहने वाले अधिकतर लोग अपना भोजन स्वयं पैदा करते थे।
- शिल्प: भंडारण और भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तन, और सूती कपड़े की बुनाई।
- मृतकों के प्रति सम्मान: मेहरगढ़ में कब्र में बकरियाँ, बुर्ज़होम में कुत्ते, और ब्रह्मगिरि में शिशुओं के लिए कलश।
पुरातत्व रीति-रिवाज़ों को सीधे नहीं दिखाता, इसलिए विद्वान आज के किसानों और पशुपालकों का अध्ययन करते हैं, जिनमें से बहुत से जनजातियों में रहते हैं। प्रायः दो-तीन पीढ़ियाँ साथ रहती हैं; खेती का अधिकांश काम स्त्रियाँ करती हैं, पुरुष बड़े झुंडों को चराने ले जाते हैं, और भूमि, जंगल, घास के मैदान तथा पानी पूरी जनजाति की साझा संपत्ति माने जाते हैं; अमीर और गरीब के बीच कोई तीखा अंतर नहीं होता।
उत्तर-पश्चिम में नवपाषाण गाँवों की कृषक संस्कृति आरंभिक हड़प्पा चरण और सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी में) के नगरों तक चलती रही। इससे पहले के पत्थर के औज़ारों की कहानी भारत में पुरापाषाण काल (अंग्रेज़ी में) लेख में है, और पत्थर के साथ ताँबे के उपयोग का विवरण भारत में ताम्रपाषाण काल लेख में।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-I"भारत की प्राचीन सभ्यता, मिस्र, मीसोपोटामिया और ग्रीस की सभ्यताओं से, इस बात में भिन्न है कि भारतीय उपमहाद्वीप की परंपराएं आज तक भंग हुए बिना परिरक्षित की गई हैं।" टिप्पणी कीजिये।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: इस दावे से शुरुआत करें कि भारतीय संस्कृति बिना टूटे चलती रही है, और उसकी जड़ें नवपाषाण कृषक गाँवों तक ले जाएँ।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- भौतिक निरंतरता: अनाज पीसने के लिए आज भी ओखली-मूसल; भंडारण और भोजन पकाने के बर्तन; सूती कपड़े की बुनाई।
- भोजन: गेहूँ, जौ, चावल, मोटे अनाज और दालें मेहरगढ़, चिरांद, कोल्डिहवा और हल्लूर में पहली बार उगाई गईं; आज का लगभग सारा भोजन पालतूकरण का परिणाम है।
- बसावट: मेहरगढ़ की कृषक संस्कृति आरंभिक हड़प्पा चरण तक चलती है; बुर्ज़होम के महापाषाण लोग नवपाषाण जीवन-शैली बनाए रखते हैं।
- सीमाएँ: गंगा के मैदान की विवादित तिथियाँ; निरंतरता हर क्षेत्र में अलग ढंग की।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि पहले गाँवों से चली आ रही निरंतरता वास्तविक और दिखाई देने वाली है, पर यह एक अटूट रेखा न होकर क्षेत्रीय और क्रमिक कहानी है।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2021निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: (ऐतिहासिक स्थान) : (ख्याति का कारण)
- बुर्ज़होम : शैलकृत देव मंदिर
- चंद्रकेतुगढ़ : टेराकोटा कला
- गणेश्वर : ताम्र कलाकृतियाँ
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/कौन-से सही सुमेलित है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: हर युग्म को उस बात से मिलाएँ जिसके लिए स्थल प्रसिद्ध है। चरण 2: कश्मीर का बुर्ज़होम गर्त-आवासों, घिसे हड्डी के औज़ारों और बाद में मेनहिरों वाला नवपाषाण स्थल है; वहाँ शैलकृत देव मंदिर नहीं हैं, अतः युग्म 1 गलत है। चरण 3: पश्चिम बंगाल के 24 परगना का चंद्रकेतुगढ़ टेराकोटा कला से समृद्ध है, अतः युग्म 2 सही है। चरण 4: खेतड़ी ताम्र पट्टी के पास सीकर ज़िले के गणेश्वर से ताँबे के बाणाग्र, भालाग्र, मछली के काँटे और चूड़ियाँ मिलीं और यहाँ से हड़प्पा को आपूर्ति होती थी, अतः युग्म 3 सही है। केवल युग्म 2 और 3 सही हैं।
इस भ्रम से बचें: बुर्ज़होम गर्त-आवासों और मेनहिरों वाला नवपाषाण स्थल है; शैलकृत मंदिर बहुत बाद के काल के हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। बुर्ज़होम गर्त-आवासों के लिए जाना जाता है, शैलकृत देव मंदिरों के लिए नहीं।
- (b) 1 और 2: गलत। इसमें बुर्ज़होम वाला गलत युग्म है, और गणेश्वर छूट गया है।
- (c) केवल 3: गलत। गणेश्वर सही है, पर टेराकोटा कला से सही जुड़ा चंद्रकेतुगढ़ छूट गया है।
- (d) 2 और 3: सही। चंद्रकेतुगढ़ टेराकोटा कला के लिए और गणेश्वर ताम्र कलाकृतियों के लिए जाना जाता है।
उत्तर: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर: चंद्रकेतुगढ़ और टेराकोटा कला, तथा गणेश्वर और ताम्र कलाकृतियाँ।
स्रोत
- NCERT: Our Pasts I (Class VI), From Gathering to Growing Food
- Archaeological Survey of India: Excavations at Burzahom (1960-1971)
- UNESCO World Heritage Centre: The Neolithic Settlement of Burzahom (Tentative List)
- PIB: India, properties on the UNESCO Tentative List (2023)
- Wikipedia: Neolithic
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- Wikipedia: Ganeshwar
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है। प्रागैतिहासिक स्थलों की तिथियाँ नई विधियों के साथ संशोधित होती रहती हैं।
