परिचय

समसामयिकी
अंतरराष्ट्रीय संबंध – सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II और III

भारत-चीन सीमा विवाद
विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की वार्ता
25वाँ विशेष प्रतिनिधि वार्ता का दौर8 सूत्री परिणाम5 सीमा कार्मिक बैठक स्थल
एक नज़र में
भारतराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल
चीनविदेश मंत्री वांग यी
नया निकायसीमा परिसीमन पर विशेषज्ञ समूह
आधार2005 का राजनीतिक मापदंड समझौता
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भारत-चीन सीमा विवाद इस अनसुलझे प्रश्न का नाम है कि दोनों देशों के बीच हिमालयी सीमा कहाँ है, लद्दाख के अक्साई चिन से अरुणाचल प्रदेश की मैकमोहन रेखा तक। 25 अगस्त 2026 को भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधि, अजीत डोभाल और वांग यी, 25वीं बार मिले और सीमा परिसीमन के "शीघ्र और ठोस परिणाम" (अर्ली हार्वेस्ट) की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमत हुए।

विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की वार्ता 2026: बीजिंग में क्या तय हुआ

बीजिंग में डोभाल और वांग यी, 25 अगस्त 2026

भारत और चीन सीमा के प्रश्न पर मुख्य रूप से विशेष प्रतिनिधियों (Special Representatives) के माध्यम से वार्ता करते हैं। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार विशेष प्रतिनिधि होते हैं, जबकि चीन की ओर से वांग यी, जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य और केंद्रीय विदेश मामलों के आयोग के कार्यालय के निदेशक हैं। यह तंत्र 2003 में सीमा समाधान की रूपरेखा खोजने के लिए बना था। 23वाँ दौर 18 दिसंबर 2024 को बीजिंग में हुआ और 24वाँ 19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में, जब वांग यी भारत आए थे।

25वें दौर का समय महत्वपूर्ण था। यह वार्ता 12 सितंबर 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कुछ सप्ताह पहले हुई, जिसकी मेज़बानी भारत ने की और जिसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात वर्ष बाद पहली बार भारत आए। डोभाल ने कहा कि संबंध "धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहे हैं" और दोनों देशों के नेताओं ने उन्हें "स्पष्ट और सकारात्मक दिशा" दी है। वांग यी ने कहा कि दोनों पक्षों को "इतिहास से सीख लेनी चाहिए" और सीमा प्रश्न को द्विपक्षीय संबंधों में "उचित स्थान" पर रखना चाहिए।

आठ सूत्री परिणाम दस्तावेज़: परिसीमन, हॉटलाइन और नदियाँ

मुख्य बातें 26 अगस्त को जारी परिणाम दस्तावेज़ में हैं। इसके सूत्र दो वर्गों में बँटते हैं: कुछ सीमा के समाधान से जुड़े हैं, और कुछ इस बात से कि वार्ता चलते रहने तक सीमा पर शांति कैसे बनी रहे।

  • परिसीमन: सीमा परिसीमन पर विशेषज्ञ समूह और सीमा प्रबन्धन पर कार्य समूह, दोनों परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (WMCC) के अधीन, सीमा परिसीमन और सीमा प्रबन्धन के “शीघ्र और ठोस परिणाम” (Early and Substantial Harvest) पर चर्चा आगे बढ़ाएँगे। उनका पहला काम अपने विचारार्थ विषय (terms of reference) तय करना है।
  • 2005 का समझौता: दोनों पक्षों ने 2005 के राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौते के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि वे विशेष प्रतिनिधि तंत्र से “उचित, तर्कसंगत और परस्पर स्वीकार्य पैकेज समाधान” खोजेंगे।
  • ज़मीनी स्थिति: ज़मीन पर कोई भी स्थिति बने, उसे WMCC और स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकों सहित राजनयिक और सैन्य माध्यमों से तुरंत सुलझाया जाएगा, ताकि LAC पर “गलतफ़हमी और गलत आकलन” न हो। दोनों ने “उपयुक्त क्षेत्रों में LAC की समझ बेहतर करने” पर भी चर्चा की।
  • सैन्य संपर्क: पूर्वी और मध्य क्षेत्र में जनरल स्तर की बैठकों के लिए दो नए बैठक स्थल और दो नई सैन्य हॉटलाइन।
  • सीमा-पार नदियाँ: सीमा-पार नदियों पर विशेषज्ञ स्तर का तंत्र, जो बाढ़ के मौसम के जल-वैज्ञानिक आँकड़ों और आपात प्रबंधन पर बात करने के लिए 2006 में बना था, सितंबर में मिलेगा; भारत इसी की माँग कर रहा था। इसकी 16वीं बैठक अप्रैल 2025 में नई दिल्ली में हुई थी।
  • व्यापार और तीर्थयात्रा: दोनों ने तीन सीमा व्यापार स्थलों के फिर खुलने और कैलाश मानसरोवर यात्रा के अधिक जत्थों का उल्लेख किया, और सीमा व्यापार तथा तीर्थयात्रा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति दी।
दो स्तंभ। मार्ग 1, सीमा का समाधान: 2005 के समझौते के प्रति प्रतिबद्धता; उचित, तर्कसंगत और परस्पर स्वीकार्य पैकेज समाधान; विशेषज्ञ समूह सीमा परिसीमन के शीघ्र और ठोस परिणाम (अर्ली हार्वेस्ट) पर चर्चा आगे बढ़ाएगा; उसका पहला काम अपने विचारार्थ विषय तय करना है। मार्ग 2, सीमा का प्रबन्धन: जनरल स्तर की बैठकों के लिए दो नए स्थल; पूर्वी और मध्य क्षेत्र में दो हॉटलाइन; उपयुक्त क्षेत्रों में LAC की बेहतर समझ; सीमा-पार नदियों पर विशेषज्ञ स्तर का तंत्र सितंबर में मिलेगा; सीमा व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा। दोनों विशेष प्रतिनिधियों और WMCC से चलते हैं; रेखा केवल पहले से बदल सकती है।

दोनों नए बैठक स्थलों के नाम घोषित नहीं हुए। एक पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सेना की 3 कोर के अधीन होगा और दूसरा केंद्रीय, अर्थात् मध्य क्षेत्र में; जोशीमठ इनमें नहीं है। पिछले एक वर्ष में स्थानीय कमांडर अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग ज़िले के केपांग ला में कम से कम दो बार मिल चुके हैं। यह स्थान दोनों ओर के लोगों के लिए धार्मिक महत्व रखता है, और चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने ही इसे बैठक स्थल बनाने का सुझाव दिया था।

भारत-चीन सीमा विवाद: क्षेत्र, दावे और वास्तविक नियंत्रण रेखा

विवाद की जड़ें: तिब्बत, पंचशील और 1962 का युद्ध

स्वतंत्र भारत ने चीन से संबंध मित्रता के साथ शुरू किए। 1949 की क्रांति के बाद साम्यवादी सरकार को मान्यता देने वाले पहले देशों में भारत था, और 29 अप्रैल 1954 को जवाहरलाल नेहरू और झोउ एनलाई ने मिलकर पंचशील, अर्थात् शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत, घोषित किए। तनाव की जड़ तिब्बत था। चीन ने 1950 में तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया, और 1954 के समझौते में एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के सम्मान वाले उपबंध से भारत ने तिब्बत पर चीन का दावा मान लिया। जब 1959 में दलाई लामा भारत आए और उन्हें शरण दी गई, तो चीन ने कड़ा विरोध किया।

चीन के साथ सीमा विवाद 1960 में उभरे। 1962 में दोनों देशों के बीच मुख्यतः अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर प्रतिस्पर्धी दावों को लेकर सीमा युद्ध हुआ, जिसमें भारत को सैन्य असफलता मिली। इसके बाद 1976 तक राजनयिक संबंध घटे हुए स्तर पर रहे। 1970 के दशक के मध्य के बाद चीन की नीति अधिक व्यावहारिक हुई, और सीमा मुद्दा सुलझाने की वार्ता 1981 में शुरू हुई।

सीमा के चार क्षेत्र: अक्साई चिन से मैकमोहन रेखा तक

सीमा पर चर्चा क्षेत्रवार होती है, क्योंकि हर क्षेत्र का इतिहास अलग है। जड़ औपनिवेशिक काल में है: पूर्व में मैकमोहन रेखा 1914 में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच शिमला सम्मेलन में खींची गई थी, जिसे चीन ने कभी स्वीकार नहीं किया।

भारत-चीन सीमा के चार क्षेत्र
क्षेत्र भारतीय भाग विवाद किस पर है
पश्चिमी लद्दाख अक्साई चिन, जो ऐतिहासिक रूप से जम्मू और कश्मीर से जुड़ा था; इस पर भारत का दावा है और 1962 के युद्ध के बाद से इसका प्रशासन चीन के पास है; भारत की रेखा कुनलुन पर्वतों के साथ जॉनसन रेखा का अनुसरण करती है
मध्य हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जल-विभाजक के दक्षिण के छोटे क्षेत्र, जैसे बाराहोती, नीलांग-जाधंग और लपथल, जिन पर कुल लगभग 2,450 वर्ग किमी का चीनी दावा है
सिक्किम सिक्किम संरेखण 1890 के आंग्ल-चीनी अभिसमय पर आधारित है; भूटान के साथ त्रि-संधि बिंदु (trijunction) विवादित है (भारत और भूटान के लिए बतांग ला, चीन के लिए गिपमोची)
पूर्वी अरुणाचल प्रदेश चीन मैकमोहन रेखा को नहीं मानता और उसके दक्षिण के क्षेत्र पर दावा करता है; वह तवांग को किसी भी समझौते के लिए अनिवार्य बता चुका है
भारत की आधिकारिक सीमा पर बना चीन से लगे उत्तरी सीमांत का मानचित्र। पश्चिमी क्षेत्र में लद्दाख है, जिसमें अक्साई चिन भी है, जिस पर भारत का दावा है और जिसका प्रशासन चीन करता है। मध्य क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड हैं, सिक्किम क्षेत्र 1890 के अभिसमय पर आधारित है, और पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा के साथ अरुणाचल प्रदेश है। पाँच सीमा कार्मिक बैठक स्थल दिखाए गए हैं: लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी और चुशुल, सिक्किम में नाथू ला, अरुणाचल प्रदेश में बुम ला और किबिथू। तीन सीमा व्यापार दर्रे दिखाए गए हैं: उत्तराखंड में लिपुलेख (1992), हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला (1994) और सिक्किम में नाथू ला (2006)। नेपाल और भूटान इन क्षेत्रों के बीच हैं।

चीन ने कभी एक "पैकेज" भी रखा था: 1960 में, और फिर 1980 से 1985 के बीच, उसने कहा कि यदि भारत पश्चिम में अक्साई चिन छोड़ दे, तो वह पूर्व में मोटे तौर पर मैकमोहन रेखा के अनुसार संरेखण मान लेगा। 1985 में उसने प्रस्ताव बदला और पश्चिम में अनिर्दिष्ट रियायतों के बदले पूर्व में भारत से "महत्वपूर्ण और सार्थक रियायतें" माँगीं।

वास्तविक नियंत्रण रेखा: अलग-अलग धारणाएँ तनाव क्यों बनती हैं

दोनों पक्ष मानते हैं कि पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्र में तनाव का बड़ा कारण LAC की अलग-अलग धारणाएँ हैं। 1996 के विश्वास बहाली उपायों के समझौते में "LAC के संरेखण की साझा समझ" बनाने की आवश्यकता दर्ज थी। 2015 में प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली चीन यात्रा में नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से LAC को स्पष्ट करने की प्रक्रिया फिर शुरू करने की बात कही। ऐसा नहीं हुआ: चीनी अधिकारियों का कहना था कि संरेखण स्पष्ट करने से सीमा विवाद सुलझाने के प्रयास और उलझेंगे।

अप्रैल 2020 से पूर्वी लद्दाख के गतिरोध ने इसकी कीमत दिखा दी। इस वर्ष का परिणाम दस्तावेज़ "स्पष्टीकरण" शब्द से बचता है, किंतु "उपयुक्त क्षेत्रों में LAC की समझ" बेहतर करने का राजनीतिक समर्थन देता है। इससे पुरानी प्रक्रिया दोबारा खोले बिना दोनों पक्ष एक-दूसरे की धारणा समझ सकते हैं।

सीमा पर वार्ता कैसे होती है: विशेष प्रतिनिधि, WMCC और सैन्य माध्यम

1981 से 2013 तक सीमा वार्ता और समझौते

आधिकारिक सीमा वार्ता दिसंबर 1981 में शुरू हुई और 1987 तक इसके आठ दौर हुए। 1988 में एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति से यह सीमा प्रश्न पर भारत-चीन संयुक्त कार्य समूह बनी, जिसकी 15 बैठकें हुईं और अंतिम बैठक 2005 में हुई। वार्ता के साथ-साथ कई समझौतों ने ऐसी सीमा पर शांति बनाए रखी जिसकी कोई सहमत रेखा नहीं थी।

  • 1993 और 1996 के शांति समझौते: सीमा शांति और सौहार्द समझौता तथा सैन्य विश्वास बहाली उपायों का समझौता अंतिम समाधान होने तक के लिए किए गए।
  • 2003 की संबंधों और व्यापक सहयोग के सिद्धांतों की घोषणा: इसी से विशेष प्रतिनिधि तंत्र बना; पहला दौर 26 अक्टूबर 2003 को हुआ।
  • 2005 का राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौता: वर्तमान वार्ता का आधार, जिसकी चर्चा अगले खंड में है।
  • 2012 का WMCC समझौता: इससे राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों का एक स्थायी कार्य निकाय बना; इसके बाद 2013 का सीमा रक्षा सहयोग समझौता हुआ।
दो पंक्तियों की समयरेखा। समझौते: 1993 सीमा शांति और सौहार्द समझौता; 1996 सैन्य विश्वास बहाली उपायों का समझौता; 2005 राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौता; 2013 सीमा रक्षा सहयोग समझौता; 2020 की गलवान झड़पों के बाद 2024 की गश्त व्यवस्था। वार्ता निकाय: 1981 आधिकारिक वार्ता, 1987 तक आठ दौर; 1988 संयुक्त कार्य समूह; 2003 विशेष प्रतिनिधि तंत्र; 2012 परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र, जिसमें राजनयिक और सैन्य अधिकारी हैं; 2026 बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की वार्ता।

WMCC: परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र

WMCC (भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र) जनवरी 2012 के एक समझौते से बना। चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने 2010 में इसका प्रस्ताव रखा था और विशेष प्रतिनिधियों के 15वें दौर में इसे अंतिम रूप मिला। इसका नेतृत्व भारत के विदेश मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव और चीन के विदेश मंत्रालय के एक महानिदेशक करते हैं, और दोनों ओर से राजनयिक तथा सैन्य अधिकारी इसमें रहते हैं।

अपने स्थापना समझौते के अनुसार WMCC सीमा प्रश्न के समाधान पर चर्चा नहीं करता और विशेष प्रतिनिधि तंत्र को प्रभावित नहीं करता। इसका काम सीमा का प्रबन्धन है: यह LAC पर स्थिति की समीक्षा करता है और आगे की वार्ता की ज़मीन तैयार करता है। 6 अगस्त 2026 की इसकी 36वीं बैठक में परिसीमन, सीमा प्रबन्धन, तंत्र-निर्माण और सीमा-पार सहयोग पर "विस्तृत आदान-प्रदान" हुआ, और परिसीमन तथा सीमा प्रबन्धन के दोनों नए समूह अब इसी के अधीन हैं। विशेष प्रतिनिधि वार्ता और WMCC मिलकर वह दोहरा मार्ग बनाते हैं जिसने 2024 से सीमा को सामान्यतः स्थिर रखा है।

सीमा कार्मिक बैठकें, हॉटलाइन और कोर कमांडर वार्ता

ज़मीन पर संपर्क सैन्य माध्यमों से होता है, जिनमें बात आगे बढ़ाने का एक तय क्रम है। पाँच सीमा कार्मिक बैठक (Border Personnel Meeting, BPM) स्थल हैं: लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी और चुशुल, सिक्किम में नाथू ला, और अरुणाचल प्रदेश में किबिथू तथा बुम ला। बात कर्नलों से ब्रिगेडियरों और फिर मेजर जनरलों तक जाती है। रक्षा मंत्रालय ने BPM तंत्र को ऐसा मंच बताया है जहाँ स्थानीय मुद्दे उठते और सुलझते हैं।

  • हॉटलाइन: सैन्य संचालन महानिदेशकों के बीच हॉटलाइन 2014 में बनी; 31 जुलाई 2021 तक कमांडरों के बीच छह हॉटलाइन थीं, दो-दो लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में। 2026 के परिणाम से पूर्वी और मध्य क्षेत्र में दो और जुड़ेंगी।
  • जनरल स्तर के तंत्र: 2025 में दोनों पक्ष पश्चिमी क्षेत्र के मौजूदा तंत्र के अलावा पूर्वी और मध्य क्षेत्र में भी जनरल स्तर के तंत्र बनाने पर सहमत हुए।
  • कोर कमांडर बैठकें: 2020 से 2022 के गतिरोध में नौ से बारह घंटे से भी अधिक चली इन बैठकों ने संवाद बनाए रखा; भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी इनमें रहे।

अर्ली हार्वेस्ट और 2005 का समझौता: सीमा परिसीमन पर बहस

2005 के समझौते में समाधान के तीन चरण

2005 के राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौते से विवाद सुलझाने के तीन चरणों में से पहला पूरा हुआ। दूसरा चरण समाधान की सहमत रूपरेखा है, जिस पर विशेष प्रतिनिधि तब से वार्ता कर रहे हैं। तीसरे चरण में सीमा का मानचित्रों पर परिसीमन और ज़मीन पर सीमांकन होगा।

  • अनुच्छेद III: सीमा के सभी क्षेत्रों को समेटने वाला पैकेज समाधान, क्योंकि क्षेत्र आपस में जुड़े हैं और उनके बीच लेन-देन आवश्यक है।
  • अनुच्छेद X: विशेष प्रतिनिधियों को एक सहमत रूपरेखा तक पहुँचना है, जो रेखांकन और सीमांकन का आधार बनेगी।
प्रक्रिया चित्र। चरण 1, सिद्धांत: 2005 का राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत समझौता, पूरा। चरण 2, रूपरेखा: पैकेज समाधान की सहमत रूपरेखा, जिस पर विशेष प्रतिनिधि अभी वार्ता कर रहे हैं। चरण 3, रेखा: रेखा का रेखांकन और भूमि पर सीमांकन, शुरू नहीं हुआ। अर्ली हार्वेस्ट रूपरेखा तय होने से पहले सिक्किम और मध्य क्षेत्र जैसे कुछ क्षेत्रों का परिसीमन करेगा। 2005 के समझौते का अनुच्छेद III सभी क्षेत्रों को समेटने वाले पैकेज समाधान की बात करता है; अनुच्छेद X रूपरेखा को रेखांकन और सीमांकन का आधार बनाता है।

शीघ्र और ठोस परिणाम में क्या शामिल होगा

अर्ली हार्वेस्ट (early harvest) का अर्थ है पूरी रूपरेखा तय होने से पहले कुछ क्षेत्रों में सीमा तय कर लेना। अगस्त 2025 के 24वें दौर में WMCC के अधीन "सीमा परिसीमन में अर्ली हार्वेस्ट खोजने" के लिए एक विशेषज्ञ समूह बना। 2026 के दस्तावेज़ का वाक्यांश "Early and Substantial Harvest" भारत का अपना गढ़ा हुआ है: चीन ने पहले केवल सिक्किम क्षेत्र तय करने का प्रस्ताव रखा था, और 2019 के आसपास भारत ने जवाबी प्रस्ताव दिया, जिसमें सिक्किम के साथ पूरा मध्य क्षेत्र था और सीमा जल-विभाजक के साथ रखी गई थी।

चीन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और बाद में, बताया जाता है, केवल सिक्किम और मध्य क्षेत्र के कुछ अविवादित हिस्से शामिल करने पर राज़ी हुआ, जो भारत को स्वीकार नहीं था। भारत की शर्तें मानने का अर्थ होगा कि चीन मध्य क्षेत्र में लगभग 2,450 वर्ग किमी पर अपना दावा छोड़े। अधिकारियों को उम्मीद है कि विशेषज्ञ समूह उन क्षेत्रों पर ध्यान देगा जहाँ दोनों संरेखणों में अंतर कम है।

चिंताएँ: पारदर्शिता, पैकेज उपबंध और भूटान का त्रि-संधि बिंदु

  • टुकड़ों में या पैकेज में: आंशिक परिसीमन अनुच्छेद III से मेल नहीं खाता। केवल उन हिस्सों तक सीमित समझौता, जहाँ दावे पहले से मिलते हैं, पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्र को अछूता छोड़ देगा, जहाँ चीन का रुख कठोर है।
  • रूपरेखा अभी नहीं: अनुच्छेद X के अनुसार रेखांकन सहमत रूपरेखा के बाद आता है, और 2005 के समझौते में “परिसीमन” (delimitation) शब्द है ही नहीं।
  • सिक्किम सरल नहीं: 1890 के अभिसमय का अनुच्छेद I जल-विभाजक को सीमा बनाता है, पर आरंभ बिंदु माउंट गिपमोची बताता है। 1890 के पाठ पर हुए सिक्किम समझौते को त्रि-संधि बिंदु दक्षिण में, जम्फेरी रिज की ओर खिसकाने की स्वीकृति माना जा सकता है, जहाँ से सिलीगुड़ी गलियारे पर नज़र रखी जा सकती है, जो पूर्वोत्तर राज्यों तक भारत का एकमात्र स्थल मार्ग है।
  • पारदर्शिता: किसी पक्ष ने नहीं बताया कि सीमा के किन हिस्सों का परिसीमन होना है। जनता की जानकारी के बिना हुए समझौते संदेह जगा सकते हैं, इसलिए दोनों सरकारों को अपनी जनता को साथ लेना होगा।

गलवान से 2026 तक भारत-चीन संबंध: सामान्यीकरण की राह

गलवान 2020 और 2024 का गश्त समझौता

अप्रैल 2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुआ गतिरोध जून 2020 में गलवान में घातक हो गया। वहाँ हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिक मारे गए, जिनमें 16 बिहार रेजिमेंट के कर्नल संतोष बाबू भी थे; दोनों पक्षों के सैनिक हताहत हुए। इसके बाद चार वर्ष सैन्य और राजनयिक वार्ता चली। अक्टूबर 2024 में भारत ने LAC पर गश्त व्यवस्था के समझौते की घोषणा की, जिससे 2020 के सभी टकराव बिंदुओं से सेनाएँ पीछे हटीं।

23 अक्टूबर 2024 को रूस के कज़ान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी ने लगभग पाँच वर्ष में पहली बार पूर्ण प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता की। दोनों पक्ष इसी बैठक को क्रमिक सामान्यीकरण की शुरुआत मानते हैं। 31 अगस्त 2025 को तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के समय दोनों फिर मिले और सहमत हुए कि दोनों देश "विकास के साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं" और मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिए। फिर आदान-प्रदान बढ़ा: कैलाश मानसरोवर यात्रा लगभग पाँच वर्ष बाद 2025 में लिपुलेख और नाथू ला से फिर शुरू हुई, और अक्टूबर 2025 में सीधी उड़ानें लौटीं।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए शी जिनपिंग की यात्रा, सितंबर 2026

12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अवसर पर शी और मोदी की वार्ता हुई; लगातार तीसरे वर्ष दोनों नेता मिले। मोदी ने कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति और सौहार्द संबंधों के विकास का अनिवार्य आधार बना हुआ है, और दोनों पक्ष मौजूदा समझौतों का पालन करें। शी ने कहा कि दोनों को द्विपक्षीय संबंधों और सीमा प्रश्न, दोनों पर "समानांतर और परस्पर सहायक प्रगति" करनी चाहिए।

दोनों के रुख में ज़ोर का अंतर है। भारत सीमा पर शांति को आदान-प्रदान फिर शुरू करने की शर्त मानता है, जबकि चीन चाहता है कि भारत सीमा प्रश्न को "उचित स्थान" पर रखे और उसे पूरे संबंध की पहचान न बनने दे। बाद में वांग यी ने कहा कि दोनों देश संबंधों को "ठहराव या पीछे हटे बिना" आगे बढ़ाएँ।

चीन सीमा पर सीमा प्रबन्धन: चुनौतियाँ और रणनीतियाँ

चुनौतियाँ: भू-भाग, अनिर्धारित LAC और अवसंरचना का अंतर

  • भू-भाग: सीमा ऊँचे हिमालय से गुज़रती है; व्यापार के दर्रे 4,310 मीटर (नाथू ला) और 5,110 मीटर (लिपुलेख) की ऊँचाई पर हैं।
  • अनिर्धारित रेखा: सहमत LAC न होने से सामान्य गश्त भी आमना-सामना बन सकती है, जैसे 2020 में पूर्वी लद्दाख में और अगस्त 2026 में अरुणाचल प्रदेश में।
  • शत्रुतापूर्ण संबंध: 1962 से चला अविश्वास, तिब्बत का प्रश्न और 2020 की झड़पें हर स्थानीय घटना को राजनयिक घटना बना देती हैं।
  • अवसंरचना का अंतर: सीमा के दोनों ओर सड़कें, रेलमार्ग और हवाई पट्टियाँ लंबे समय से असमान रही हैं, और यह अंतर बना हुआ है।
  • पलायन और नदियाँ: दूरस्थ गाँवों से पलायन सीमा को कमज़ोर करता है, और तिब्बत से निकलने वाली नदियाँ निचले क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम लाती हैं।

रणनीतियाँ: सीमा अवसंरचना और प्रबंधन, वाइब्रेंट विलेजेज़ और विश्वास बहाली

भारत की नीति में कूटनीति, सैन्य विश्वास बहाली और स्वयं सीमा क्षेत्रों का विकास, तीनों शामिल हैं।

  • सीमा अवसंरचना और प्रबंधन (BIM): गृह मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्र की यह छत्र योजना 2021-22 से 2025-26 तक 13,020 करोड़ रुपये के व्यय से जारी रखी गई। इससे सीमा पर बाड़, फ्लडलाइट, तकनीकी समाधान, सीमा सड़कें और सीमा चौकियाँ बनती हैं, और यह भारत-चीन सीमा सहित सभी छह स्थल सीमाओं पर लागू है।
  • वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम: फ़रवरी 2023 में 2022-23 से 2025-26 के लिए 4,800 करोड़ रुपये से स्वीकृत; उत्तरी स्थल सीमा के 19 ज़िलों के 46 सीमावर्ती ब्लॉकों के गाँवों के लिए, पहले चरण में 663 गाँव, ताकि पलायन रुके; इसमें से 2,500 करोड़ रुपये सड़कों के लिए हैं। अप्रैल 2025 में 6,839 करोड़ रुपये से स्वीकृत इसका दूसरा चरण अन्य स्थल सीमाओं तक जाता है। विस्तार से हमारे वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम लेख (अंग्रेज़ी) में।
  • सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP): 1980 के दशक में पाकिस्तान से लगी पश्चिमी सीमा पर शुरू हुआ और 1998 में भारत-चीन सीमा तक बढ़ाया गया; यह सीमा से 10 किमी के भीतर सड़कों, विद्यालयों, स्वास्थ्य और अन्य कार्यों के लिए धन देता है। वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम इस तरह बनाया गया है कि इसका BADP से दोहराव न हो।
  • विश्वास बहाली: विशेष प्रतिनिधि और WMCC, BPM स्थल और हॉटलाइन, फिर खुले व्यापार दर्रे और कैलाश मानसरोवर यात्रा, दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने का कारण देते हैं।

इन संपर्कों में सीमा व्यापार सबसे पुराना है। उत्तराखंड का लिपुलेख चीन के साथ व्यापार के लिए खुलने वाली पहली भारतीय सीमा चौकी थी, 1992 में; उसके बाद 1994 में हिमाचल प्रदेश का शिपकी ला, और दशकों बंद रहने के बाद 6 जुलाई 2006 को सिक्किम का नाथू ला आधिकारिक रूप से खुला। इसके विपरीत चांग ला लद्दाख के भीतर लेह से पैंगोंग झील की सड़क पर पड़ने वाला दर्रा है, चीन जाने वाला व्यापार मार्ग नहीं।

UPSC के लिए भारत-चीन सीमा विवाद: सामान्य अध्ययन II और III

पाठ्यक्रम में सीमा प्रश्न कहाँ आता है

यह वार्ता सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में भारत और उसके पड़ोसी देशों के संबंध तथा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय समझौतों के अंतर्गत आती है, और सीमा प्रबन्धन वाला भाग प्रश्नपत्र III में सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियों और उनके प्रबन्धन के अंतर्गत। राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ भी यही विषय पूछती हैं।

  1. प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: विशेष प्रतिनिधि तंत्र 2003 में बना; 25वाँ दौर 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में; WMCC 2012 में बना, नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव का; पाँच BPM स्थल (दौलत बेग ओल्डी, चुशुल, नाथू ला, किबिथू, बुम ला); व्यापार दर्रे लिपुलेख (1992), शिपकी ला (1994), नाथू ला (2006); मैकमोहन रेखा 1914 के शिमला सम्मेलन में खींची गई।
  2. मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: पैकेज समाधान बनाम अर्ली हार्वेस्ट, विशेष प्रतिनिधि वार्ता और WMCC का दोहरा मार्ग, विवादित सीमा पर सीमा प्रबन्धन, और सीमा पर शांति तथा पूरे संबंध के बीच का संबंध।

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2016, सामान्य अध्ययन-III (हिंदी रूपांतर)दुर्गम भू-भाग और कुछ देशों के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधों के कारण सीमा प्रबन्धन एक जटिल कार्य है। प्रभावी सीमा प्रबन्धन की चुनौतियों और रणनीतियों को स्पष्ट कीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: स्पष्ट कीजिए · दृष्टिकोण: प्रश्न की तरह दो भाग: पहले चुनौतियाँ, हर एक को भू-भाग या शत्रुतापूर्ण संबंधों से जोड़ते हुए; फिर रणनीतियाँ, राजनयिक, सैन्य, अवसंरचना और जन-केंद्रित वर्गों में। पूरे उत्तर में चीन सीमा का उदाहरण लें और 2026 के परिणामों पर समाप्त करें।

    भूमिका: आरंभ इस कारण से करें कि सीमा प्रबन्धन कठिन क्यों है: भारत की स्थल सीमाएँ ऊँचे हिमालय से गुज़रती हैं, और चीन के साथ सीमा की कोई सहमत रेखा नहीं है।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • भू-भाग: ऊँचे हिमालयी दर्रे (नाथू ला 4,310 मीटर, लिपुलेख 5,110 मीटर), दूरस्थ गाँव, और पलायन, जिसे रोकने के लिए वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम बना।
    • शत्रुतापूर्ण संबंध: अलग-अलग धारणाओं वाली अनिर्धारित LAC, 1962 का युद्ध, जून 2020 का गलवान जिसमें 20 भारतीय सैनिक मारे गए, अगस्त 2026 में अरुणाचल प्रदेश में तनाव।
    • राजनयिक और सैन्य रणनीति: 2003 से विशेष प्रतिनिधि, 2012 से WMCC, पाँच BPM स्थल, हॉटलाइन (2021 तक छह, 2026 में दो और), 2024 का गश्त समझौता।
    • विकास की रणनीति: सीमा अवसंरचना और प्रबंधन (2021-26 में 13,020 करोड़ रुपये) से बाड़, सड़कें और सीमा चौकियाँ; वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम (पहले चरण में 663 गाँव; दूसरा चरण 6,839 करोड़ रुपये); सीमा से 10 किमी के भीतर सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम; लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला से व्यापार।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि विवादित सीमा के प्रबन्धन को दोनों मार्ग चाहिए: राजनीतिक समाधान, जिसका प्रयास 2026 की अर्ली हार्वेस्ट वार्ता कर रही है, और ऐसी बसी हुई, जुड़ी हुई सीमा जो उस समाधान पर निर्भर न हो।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2007 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित हिमालयी दर्रों में से कौन-सा एक, भारत और चीन के बीच व्यापार को सुगम बनाने के लिए वर्ष 2006 के मध्य में फिर से खोला गया?
    1. a चांग ला
    2. b जारा ला
    3. c नाथू ला
    4. d शिपकी ला
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एकल विकल्प

    हल करने की विधि: चरण 1: भारत-चीन सीमा व्यापार के लिए केवल तीन दर्रे खुले हैं: 1992 में लिपुलेख, 1994 में शिपकी ला और 2006 में नाथू ला। चरण 2: प्रश्न 2006 के मध्य में फिर खुलने वाले दर्रे का है; नाथू ला दशकों बंद रहने के बाद 6 जुलाई 2006 को आधिकारिक रूप से खुला। चरण 3: शिपकी ला 1994 से ही खुला था, और बाक़ी दो व्यापार दर्रे नहीं हैं।

    इस भ्रम से बचें: शिपकी ला सच में भारत-चीन व्यापार का दर्रा है, इसलिए सही लगता है; पर उसका वर्ष 1994 उसे बाहर कर देता है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) चांग ला: गलत। यह लद्दाख के भीतर लेह से पैंगोंग झील की सड़क पर पड़ने वाला दर्रा है, चीन जाने वाला व्यापार मार्ग नहीं।
    • (b) जारा ला: गलत। यह भारत-चीन सीमा व्यापार के लिए खुले तीन दर्रों (लिपुलेख, शिपकी ला, नाथू ला) में नहीं है।
    • (c) नाथू ला: सही। सिक्किम का यह दर्रा 6 जुलाई 2006 को दशकों बाद व्यापार के लिए आधिकारिक रूप से खुला।
    • (d) शिपकी ला: गलत। हिमाचल प्रदेश का यह दर्रा व्यापार मार्ग है, पर यह 1994 में खुला था, 2006 में नहीं।

    उत्तर: नाथू ला 6 जुलाई 2006 को व्यापार के लिए फिर खुला, इसलिए उत्तर विकल्प (c) है।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख PIB की विज्ञप्तियों, विदेश मंत्रालय के संक्षिप्त विवरण, NCERT और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।