परिचय
उच्चतम न्यायालय का 29 जुलाई 2026 का निर्णय
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की 2006 की अधिसूचना किसी परियोजना पर काम शुरू होने से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति माँगती है; कार्योत्तर स्वीकृति वह है जो बिना इस पूर्व स्वीकृति के काम शुरू हो जाने के बाद दी जाए। 29 जुलाई 2026 को उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय का 2021 का वह कार्यालय ज्ञापन रद्द किया जिसने ऐसी स्वीकृतियों को स्थायी रास्ता बना दिया था, और केवल उचित अधिसूचना से सीमित, समयबद्ध क्षमादान की गुंजाइश छोड़ी।
कार्योत्तर पर्यावरणीय स्वीकृति: 29 जुलाई 2026 का उच्चतम न्यायालय का निर्णय
वनशक्ति निर्णय 2026: उच्चतम न्यायालय ने क्या तय किया
मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पर्यावरण संगठन वनशक्ति की अगुआई वाली रिट याचिकाएँ सुनीं। न्यायमूर्ति बागची के लिखे 80 पृष्ठों के निर्णय में न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय का 7 जुलाई 2021 का कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) रद्द कर दिया, जो पूर्व स्वीकृति के बिना शुरू हुई परियोजनाओं को स्वीकृति देने की प्रक्रिया तय करता था।
- पूर्व स्वीकृति अनिवार्य: 2006 की अधिसूचना किसी भी निर्माण या भूमि की तैयारी से पहले स्वीकृति माँगती है, और उसके बिना शुरू हुआ काम ऐसा उल्लंघन है जिसे बाद का दंड ठीक नहीं करता।
- कार्यालय आदेश से क्षमादान नहीं: प्रशासनिक निर्देश प्रत्यायोजित विधान की जगह नहीं ले सकता, अतः 2021 का कार्यालय ज्ञापन अधिकारातीत था और अनुच्छेद 14 तथा 21 का उल्लंघन करता था।
- क्षमादान केवल अधिसूचना से: केंद्र अब भी पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के अंतर्गत सीमित और समयबद्ध क्षमादान अधिसूचना जारी कर सकता है, उन परियोजनाओं के लिए जिनका बने रहना किसी सर्वोपरि लोकहित से जुड़ा हो।
- 2017 की अधिसूचना बची रही: 2017 की एकबारगी छूट को वैध प्रत्यायोजित विधान माना गया।
- अनुच्छेद 142 अछूता: उच्चतम न्यायालय स्वयं किसी मामले में पूर्ण न्याय के लिए कार्योत्तर स्वीकृति दे सकता है।
भावी प्रभाव: दी जा चुकी स्वीकृतियाँ, लंबित आवेदन और सार्वजनिक परियोजनाएँ
न्यायालय ने अनुच्छेद 142 की शक्तियों से कार्यालय ज्ञापन को भावी प्रभाव से रद्द किया, दो कारणों से: वर्षों के परस्पर विरोधी आदेशों ने विधि को अनिश्चित बना दिया था, और कई सार्वजनिक परियोजनाएँ उसके भरोसे आगे बढ़ चुकी थीं। न्यायालय ने ओडिशा में AIIMS मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भवन, तमिलनाडु में कैंसर रोगों का उत्कृष्टता केंद्र, कर्नाटक में विजयपुरा हवाई अड्डा, मेडिकल कॉलेज, झुग्गी पुनर्वास परियोजनाएँ और सूखा-प्रवण क्षेत्रों की सिंचाई परियोजनाएँ गिनाईं।
- दी जा चुकी स्वीकृतियाँ: 2017 की अधिसूचना या 2021 के कार्यालय ज्ञापन के अंतर्गत दी गई स्वीकृतियाँ तब तक वैध रहेंगी, जब तक उन्हें अलग-अलग चुनौती न दी जाए।
- लंबित आवेदन: इनका निपटारा विधि के अनुसार होगा, और जो आवेदन केवल 2 जनवरी 2024 की रोक या 2025 के निर्णय के कारण अस्वीकृत हुए थे, उन पर फिर विचार हो सकता है।
- नए आवेदन नहीं: किसी भी साधन के अंतर्गत नया आवेदन नहीं होगा, और सरकार ऐसे प्रशासनिक आदेश फिर जारी नहीं कर सकती।
EIA अधिसूचना 2006: पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति और उसके चार चरण
विधिक आधार, श्रेणियाँ और स्वीकृति कौन देता है
भारत में पर्यावरणीय स्वीकृति पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 पर टिकी है, जो केंद्र को पर्यावरण की रक्षा के लिए उद्योगों और परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति देती है। 27 जनवरी 1994 की EIA अधिसूचना ने पहली बार सूचीबद्ध परियोजनाओं के लिए स्वीकृति अनिवार्य की; उसकी जगह आई 2006 की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना जगह-जगह "पूर्व" शब्द का प्रयोग करती है।
| श्रेणी | स्वीकृति कौन देता है | मूल्यांकन कौन करता है |
|---|---|---|
| A (अधिक संभावित प्रभाव) | केंद्र सरकार, पर्यावरण मंत्रालय में | विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति |
| B (अनुसूची की सीमा के अनुसार कम प्रभाव) | राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) | राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति |
| B2, पाँच हेक्टेयर तक के गौण खनिज खनन | ज़िला पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण | ज़िला स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति |
केंद्र हर SEIAA का गठन 1986 के अधिनियम की धारा 3(3) के अंतर्गत करता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) सितंबर 1974 में जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम के अंतर्गत गठित एक सांविधिक संगठन है, कोई कार्यपालक रचना नहीं; उसका काम राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में नदियों और कुओं की स्वच्छता को बढ़ावा देना और 1981 के वायु अधिनियम के अंतर्गत वायु की गुणवत्ता सुधारना है। राज्य बोर्डों के साथ वह 507 केंद्रों पर जल की गुणवत्ता की निगरानी करता है, फिर भी जल अधिनियम और 1986 का अधिनियम लंबे समय से प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुए।
विवाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण तक पहुँचते हैं, जो पर्यावरण से जुड़े मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटारे के लिए 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के अंतर्गत बना। पर्यावरण मामलों का इसका विशेष क्षेत्राधिकार शीघ्र पर्यावरणीय न्याय देने और उच्चतर न्यायालयों में मुक़दमों का भार घटाने के लिए है, और यह छह महीने में मामले निपटाने का प्रयास करता है। अधिकरण के 2021 के आदेश से ही वह कार्यालय ज्ञापन बना जिसे न्यायालय ने अब रद्द किया है।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के चरण: छानबीन, कार्यक्षेत्र निर्धारण, सुनवाई और मूल्यांकन
किसी नई परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की प्रक्रिया में अधिकतम चार चरण होते हैं, और सभी स्थल पर काम शुरू होने से पहले।
- छानबीन (screening): केवल श्रेणी B के लिए; राज्य समिति तय करती है कि परियोजना को पूरा EIA अध्ययन चाहिए या नहीं।
- कार्यक्षेत्र निर्धारण (scoping): समिति वे संदर्भ की शर्तें तय करती है जिनका उत्तर EIA रिपोर्ट को देना है।
- लोक परामर्श: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कम से कम 30 दिन की सूचना देकर लोक सुनवाई करता है, ताकि प्रभावित होने वाले लोग अपने परिवेश के बदलने से पहले सुने जाएँ।
- मूल्यांकन (appraisal): समिति प्रभावों, आपत्तियों और प्रस्तावित उपायों को तौलकर विनियामक प्राधिकरण को निर्णय की संस्तुति करती है।
हर चरण काम से पहले आता है, क्योंकि हर चरण ऐसी हानि पर निर्णय है जिसे अभी रोका जा सकता है; न्यायालय ने अधिसूचना के इस दर्शन को मोटे तौर पर "कूदने से पहले देखो" कहा। स्वीकृति के बाद परियोजना को 1 जून और 1 दिसंबर को अर्धवार्षिक अनुपालन रिपोर्ट देनी होती है, और ये रिपोर्टें सार्वजनिक दस्तावेज़ हैं।
न्यायालयों में भूतलक्षी स्वीकृतियाँ, 2017 से 2026 तक
कॉमन कॉज़, अलेम्बिक और 2017 की एकबारगी छूट
कॉमन कॉज़ (2 अगस्त 2017) और अलेम्बिक फ़ार्मास्युटिकल्स बनाम रोहित प्रजापति (1 अप्रैल 2020) में उच्चतम न्यायालय ने भूतलक्षी स्वीकृति को पर्यावरण विधिशास्त्र से परे बताया था। 2026 का निर्णय इन शब्दों को उस समय की विधि के संदर्भ में पढ़ता है, जिसमें क्षमादान का कोई उपबंध था ही नहीं।
इस बीच मंत्रालय ने 14 मार्च 2017 को एक अधिसूचना जारी की थी, जिससे पहले से उल्लंघन कर रही परियोजनाएँ क्षति के आकलन, उपचार और सामुदायिक संसाधनों की वृद्धि के बाद छह महीने में स्वीकृति के लिए आवेदन कर सकीं। चुनौती मिलने पर केंद्र ने मद्रास उच्च न्यायालय में वचन दिया कि यह एकबारगी उपाय है, और यह अवधि बाद में केवल एक बार, 13 अप्रैल 2018 तक, बढ़ाई गई।
2021 का कार्यालय ज्ञापन, वनशक्ति 2025 और पुनर्विलोकन
24 मई 2021 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने तानाजी बी. गंभीरे मामले में मंत्रालय को उल्लंघन के मामलों की मानक प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया, और 7 जुलाई 2021 का कार्यालय ज्ञापन आया। जो परियोजना स्वीकृति योग्य नहीं थी, उसे गिराया या बंद किया जाना था; स्वीकृति योग्य परियोजना क्षति आकलन और उपचार योजना के बाद स्वीकृति मिलने तक बंद रहनी थी। क्षतिपूर्ति परियोजना लागत का 1% और उल्लंघन अवधि के कारोबार का 0.25% तय की गई, स्वयं सूचना देने पर आधी, और कोई अंतिम तिथि नहीं थी।
- 2 जनवरी 2024: उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने कार्यालय ज्ञापन पर रोक लगाई।
- 30 अगस्त 2024: मद्रास उच्च न्यायालय ने उसे भावी प्रभाव से रद्द किया।
- 16 मई 2025: वनशक्ति I में न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्ज्वल भुइयाँ ने 2017 की अधिसूचना और 2021 का कार्यालय ज्ञापन, दोनों रद्द किए और ऐसी स्वीकृतियों को घोर अवैधता बताया।
- 18 नवंबर 2025: कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ़ इंडिया (CREDAI) की पुनर्विलोकन याचिका पर तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 से वह निर्णय वापस लिया, यह कहते हुए कि हज़ारों करोड़ रुपये की सार्वजनिक परियोजनाओं पर इसका विनाशकारी असर होगा; न्यायमूर्ति भुइयाँ असहमत रहे।
- 29 जुलाई 2026: पुनर्स्थापित याचिकाओं का निर्णय मुख्य न्यायमूर्ति की अगुआई वाली पीठ ने किया।
न्यायालय ने अधिसूचना और कार्यालय ज्ञापन के बीच रेखा क्यों खींची
प्रत्यायोजित विधान, अनुच्छेद 14 और जन विश्वास के दंड
धारा 3 के अंतर्गत अधिसूचना प्रत्यायोजित विधान है: संसद के अधिनियम से मिली शक्ति के अंतर्गत कार्यपालिका का बनाया हुआ विधि-बल वाला नियम। कार्यालय ज्ञापन एक कार्यपालक निर्देश है; वह नियमों की कमी भर सकता है, उन्हें बदल नहीं सकता। 2021 के आदेश ने 2006 की अधिसूचना के अंतर्गत जाँच का स्वरूप और स्वीकृति के मानदंड बदलकर ठीक यही किया।
| विशेषता | 2017 की अधिसूचना | 2021 का कार्यालय ज्ञापन |
|---|---|---|
| विधिक रूप | धारा 3 के अंतर्गत अधिसूचना (प्रत्यायोजित विधान) | कार्यालय ज्ञापन (कार्यपालक निर्देश) |
| कौन आवेदन कर सकता था | 14 मार्च 2017 को उल्लंघन वाली परियोजनाएँ | कोई भी स्वीकृति योग्य परियोजना, कभी भी |
| अवधि | छह महीने, एक बार 13 अप्रैल 2018 तक बढ़ी | कोई अंतिम तिथि नहीं |
| मूल्यांकन | केंद्रीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति, श्रेणी B के लिए भी | नए प्रस्ताव की तरह मूल्यांकन |
| क्षति और उपचार | मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से आकलन; क्षतिपूर्ति की कोई सीमा नहीं | परियोजना लागत का 1% और कारोबार का 0.25%; स्वयं सूचना पर आधा |
| 2026 का निर्णय | वैध | भावी प्रभाव से रद्द |
न्यायालय ने 2021 के आदेश को हर स्वीकृति योग्य परियोजना के लिए एक स्थायी क्षमादान पाया। उसने परियोजनाएँ चुनने का ऐसा कोई बोधगम्य अंतर नहीं रखा जिसका लोकहित से तर्कसंगत संबंध हो, इसलिए वह अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत युक्तियुक्तता और आनुपातिकता की कसौटी पर विफल रहा। न्यायालय ने कहा कि वह संधारणीय विकास के बजाय "पहले प्रदूषण करो, फिर भुगतान करो" के सिद्धांत के आगे झुक गया था।
जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 से पहले पूर्व स्वीकृति के बिना परियोजना शुरू करना 1986 के अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत अपराध था, जिसके लिए पाँच वर्ष तक का कारावास, 1 लाख रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते थे। 1 अप्रैल 2024 से अभियोजन की जगह 10,000 रुपये से 15 लाख रुपये तक के सिविल दंड आ गए।
न्यायालय ने इससे दो निष्कर्ष निकाले। अपराधमुक्ति से पता चलता है कि संसद ने केंद्र को परियोजनाओं की श्रेणियों के लिए क्षमादान अधिसूचनाएँ बनाने की गुंजाइश दी है; पर दंड चुकाने से उल्लंघन ठीक नहीं होता, क्योंकि पूर्व स्वीकृति की शर्त कभी हटाई ही नहीं गई।
निर्णय के बाद की बहस और EIA अधिसूचना प्रारूप 2020
दिखावटी आड़ या पक्की रेखा? अधिसूचना वाले रास्ते पर चिंताएँ
- खुला दरवाज़ा: आलोचकों का कहना है कि कार्यालय आदेश और अधिसूचना का अंतर केवल प्रक्रियागत बारीकी है, क्योंकि केंद्र अब अधिसूचना से उल्लंघनों को वैध कर सकता है।
- देर से पकड़: जब राज्य के मूल्यांकन निकाय और प्रदूषण बोर्ड राजमार्ग, बंदरगाह या इस्पात संयंत्र बन जाने के बाद ही उल्लंघन पकड़ते हैं, तो कार्योत्तर स्वीकृति अपवाद न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
- कारोबार की लागत: कारावास हटने के बाद एक धनी परियोजना प्रस्तावक दंड को अपने बजट में जोड़ सकता है।
- अप्रतिगमन: 2025 की अपनी असहमति में न्यायमूर्ति भुइयाँ ने कहा था कि अप्रतिगमन (non-regression) का सिद्धांत पर्यावरण संरक्षण के मौजूदा स्तर को पीछे ले जाने से रोकता है।
निर्णय का उत्तर है कि वैध क्षमादान एक दुर्लभ अपवाद होना चाहिए, समय में सीमित और अपनी श्रेणी तक बँधा हुआ, और राजमार्गों, हवाई अड्डों, रियल एस्टेट और खनन में पूर्व स्वीकृति की व्यवस्था अनिवार्य बनी रहती है।
EIA अधिसूचना प्रारूप 2020 की 2006 की अधिसूचना से तुलना
यही प्रश्न 2020 के EIA अधिसूचना प्रारूप में भी था, जो 2006 की अधिसूचना का स्थान लेने के लिए जारी हुआ था। उसकी प्रस्तावना में 2017 की छूट का उल्लेख था और तर्क था कि उल्लंघन आगे भी सामने आते रहेंगे, इसलिए एक स्थायी प्रक्रिया चाहिए।
| विशेषता | EIA अधिसूचना 2006 | EIA अधिसूचना प्रारूप 2020 |
|---|---|---|
| बिना स्वीकृति शुरू परियोजनाएँ | कोई स्थायी प्रक्रिया नहीं; केवल 2017 की एकबारगी छूट | खंड 22: उल्लंघन के मामलों की स्थायी प्रक्रिया, प्रस्तावक के अपने आवेदन या किसी प्राधिकरण की सूचना पर |
| लोक सुनवाई की सूचना | कम से कम 30 दिन | कम से कम 20 दिन |
| अनुपालन रिपोर्ट | अर्धवार्षिक, 1 जून और 1 दिसंबर को | वार्षिक, 30 जून तक |
| छोटी परियोजनाएँ | श्रेणी B, राज्य समिति द्वारा छानबीन | श्रेणी B2 अलग, जिसकी कुछ परियोजनाओं को बिना मूल्यांकन के केवल पूर्व पर्यावरण अनुमति चाहिए |
उल्लंघन वाला खंड सबसे विवादित बदलाव था, क्योंकि वह 2017 की एकबारगी छूट को स्थायी रास्ता बना देता, जिसमें काम शुरू हो जाने के बाद प्रस्तावक के अपने आवेदन पर भी मामला उठाया जा सकता। 2026 का निर्णय अब तय करता है कि ऐसा रास्ता कार्यालय आदेश से कभी नहीं खुल सकता, केवल सीमित अधिसूचना से।
UPSC के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III से जुड़ाव
UPSC और PCS पाठ्यक्रम में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III के पाठ्यक्रम में संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण के साथ पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का नाम लेकर उल्लेख है, और राज्य PCS परीक्षाएँ भी यही विधि पूछती हैं।
- प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: स्वीकृति का आधार पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3; पहली EIA अधिसूचना 1994, वर्तमान 2006; श्रेणी A केंद्र, श्रेणी B SEIAA; चार चरण, छानबीन केवल श्रेणी B के लिए; राष्ट्रीय हरित अधिकरण 2010 में बना; CPCB 1974 के जल अधिनियम के अंतर्गत।
- मुख्य परीक्षा के विश्लेषण: एहतियात बनाम नियमितीकरण, अधिसूचना बनाम कार्यालय आदेश, अपराधमुक्ति और निवारण, सार्वजनिक परियोजनाएँ और जन भागीदारी, और EIA विधि को आकार देने में वनशक्ति और कॉमन कॉज़ जैसे याचिकाकर्ताओं की भूमिका।
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2020, सामान्य अध्ययन-III (हिंदी रूपांतर)पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना प्रारूप, 2020 विद्यमान EIA अधिसूचना, 2006 से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आरंभ में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के अंतर्गत EIA अधिसूचना 2006 और उसका स्थान लेने के लिए जारी 2020 के प्रारूप का उल्लेख करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- उल्लंघन के मामले: प्रारूप का खंड 22 स्थायी प्रक्रिया बनाता है, जो प्रस्तावक के अपने आवेदन या किसी प्राधिकरण की सूचना पर शुरू होती है; 2006 में 2017 की एकबारगी छूट के अलावा ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं।
- जन भागीदारी: लोक सुनवाई की सूचना कम से कम 30 दिन से घटकर कम से कम 20 दिन।
- निगरानी: अनुपालन रिपोर्ट 1 जून और 1 दिसंबर के अर्धवार्षिक क्रम के बजाय वार्षिक, 30 जून तक।
- श्रेणीकरण: नई श्रेणी B2, जिसकी कुछ परियोजनाओं को बिना मूल्यांकन केवल पूर्व पर्यावरण अनुमति चाहिए।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में कहें कि प्रारूप ने प्रक्रिया आसान की, पर उसका स्थायी कार्योत्तर रास्ता एहतियाती सिद्धांत के विरुद्ध जाता था, और यही बिंदु उच्चतम न्यायालय ने 2026 में तय किया।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2018 (हिंदी रूपांतर)राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से किस प्रकार भिन्न है?
- NGT का गठन एक अधिनियम द्वारा हुआ है, जबकि CPCB का सृजन सरकार के कार्यपालक आदेश से हुआ है।
- NGT पर्यावरणीय न्याय देता है और उच्चतर न्यायालयों में मुक़दमों का भार घटाने में सहायता करता है, जबकि CPCB नदियों और कुओं की स्वच्छता को बढ़ावा देता है और देश में वायु की गुणवत्ता सुधारने का लक्ष्य रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, CPCB कार्यपालक आदेश से बना: गलत, क्योंकि CPCB सितंबर 1974 में जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, एक संविधि, के अंतर्गत गठित हुआ; केवल पहला भाग (NGT अधिनियम से बना) सही है। चरण 2: कथन 2: सही, क्योंकि NGT का विशेष क्षेत्राधिकार शीघ्र पर्यावरणीय न्याय देता है और उच्चतर न्यायालयों में मुक़दमों का भार घटाता है, और जल तथा वायु अधिनियमों के अंतर्गत CPCB का काम नदियों और कुओं की स्वच्छता बढ़ाना और वायु की गुणवत्ता सुधारना है। अतः केवल 2।
इस भ्रम से बचें: दोनों निकाय सांविधिक हैं; CPCB वाला कथन उसकी उत्पत्ति पर गलत होता है, NGT पर नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1: गलत। कथन 1 गलत है, क्योंकि CPCB 1974 के जल अधिनियम के अंतर्गत बना सांविधिक निकाय है।
- (b) केवल 2: सही। कथन 2 दोनों निकायों की भूमिका ठीक बताता है।
- (c) 1 और 2 दोनों: गलत। कथन 1 गलत है।
- (d) न तो 1, न ही 2: गलत। कथन 2 सही है।
उत्तर: केवल कथन 2 सही: विकल्प (b), जो आधिकारिक उत्तर है।
स्रोत
- Supreme Court of India: Vanashakti v. Union of India, W.P.(C) No. 1394 of 2023, judgment of 29 July 2026
- Ministry of Environment, Forest and Climate Change: EIA Notification, 2006 and its amendments (consolidated text to March 2025)
- Ministry of Environment, Forest and Climate Change: Draft EIA Notification, 2020
- Central Pollution Control Board: Introduction and functions
- National Green Tribunal: About the Tribunal
- NCERT: India: People and Economy (Class XII), Chapter 6, Water Resources
- Wikipedia: National Green Tribunal
- The Hindu, Delhi, 30 July 2026: SC restricts 'retrospective' environmental clearances; Supreme Court restricts 'retrospective' approvals
- The Hindu, Delhi, 31 July 2026: Clearance in reverse (editorial)
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख उच्चतम न्यायालय के निर्णय, EIA अधिसूचनाओं और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
