परिचय
अनुच्छेद 315 के अंतर्गत लोक सेवा आयोग वे स्वतंत्र निकाय हैं जो योग्यता के आधार पर लोक सेवकों की भरती करते हैं: संघ के लिए संघ लोक सेवा आयोग और हर राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग, जिन पर अनुच्छेद 315 से 323 लागू होते हैं।
संघ लोक सेवा आयोग: अनुच्छेद 315 और इसका इतिहास
संघ लोक सेवा आयोग क्या है: अनुच्छेद 315 और भाग XIV
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) भारत की केंद्रीय भरती संस्था है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है: संविधान के भाग XIV के अध्याय 2 में अनुच्छेद 315 से 323 इसकी संरचना, सदस्यों की नियुक्ति और पद से हटाने, इसकी स्वतंत्रता तथा इसकी शक्तियों और कार्यों का उपबंध करते हैं। यह अखिल भारतीय सेवाओं और समूह क तथा समूह ख की केंद्रीय सेवाओं के लिए अधिकारियों की भरती करता है।
अनुच्छेद 315 कहता है कि संघ के लिए एक लोक सेवा आयोग होगा और हर राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग। साझा आयोग के दो रास्ते हैं। दो या अधिक राज्य एक आयोग रखने पर सहमत हो सकते हैं; हर राज्य का विधान-मंडल संकल्प पारित करे तो संसद विधि बनाकर संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग का उपबंध कर सकती है। दूसरा रास्ता यह है कि किसी राज्य के राज्यपाल के अनुरोध पर और राष्ट्रपति के अनुमोदन से संघ लोक सेवा आयोग उस राज्य की सभी या कुछ आवश्यकताएँ पूरी करने को सहमत हो जाए।
संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना: 1926 से 1950 तक
आयोग संविधान से पुराना है। भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने लोक सेवा आयोग का उपबंध किया था। लॉर्ड ली ऑफ़ फ़ेरहम की अध्यक्षता में 1923 में बने भारत में उच्च लोक सेवाओं पर शाही आयोग में भारतीय और ब्रिटिश सदस्य बराबर संख्या में थे, और उसने 1924 के अपने प्रतिवेदन में लोक सेवा आयोग बनाने की सिफ़ारिश की। ली आयोग ने यह भी प्रस्ताव किया कि आगे के प्रवेशकों में 40 प्रतिशत ब्रिटिश हों, 40 प्रतिशत सीधे भरती किए गए भारतीय, और 20 प्रतिशत प्रांतीय सेवाओं से पदोन्नत भारतीय। इस प्रतिवेदन से दो वर्ष पहले, 1922 में, भारतीय उम्मीदवारों को दिल्ली में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा देने की अनुमति मिली थी।
पहला लोक सेवा आयोग 1 अक्टूबर 1926 को सर रॉस बार्कर की अध्यक्षता में बना, और उसे केवल सीमित सलाहकारी भूमिका मिली। भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने उसे संघीय लोक सेवा आयोग के रूप में पुनर्गठित किया और प्रांतीय आयोगों तथा दो या अधिक प्रांतों के लिए संयुक्त आयोगों का भी उपबंध किया। स्वतंत्रता के बाद संघीय आयोग संघ लोक सेवा आयोग बना, और 26 जनवरी 1950 को उसे संवैधानिक दर्जा मिला। इसका मुख्यालय नई दिल्ली का धौलपुर हाउस है।
संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य: नियुक्ति, पद से हटाना और स्वतंत्रता
संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष: अनुच्छेद 316 के अंतर्गत नियुक्ति और कार्यकाल
संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं (अनुच्छेद 316)। संविधान उनकी संख्या तय नहीं करता; अनुच्छेद 318 राष्ट्रपति को संख्या और सेवा की शर्तें तय करने देता है, और आयोग में प्रायः अध्यक्ष सहित नौ से ग्यारह सदस्य होते हैं। एकमात्र अर्हता यह है कि यथासंभव आधे सदस्य ऐसे हों जिन्होंने भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष पद धारण किया हो।
- कार्यकाल: छह वर्ष, या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो; राज्य आयोग या संयुक्त आयोग के लिए आयु-सीमा 62 वर्ष है, जिसे 1976 के 41वें संशोधन ने 60 से बढ़ाया।
- कार्यवाहक अध्यक्ष: अध्यक्ष का पद रिक्त हो या अध्यक्ष कार्य न कर सकें, तो राष्ट्रपति किसी सदस्य को उनके कर्तव्य निभाने के लिए नियुक्त करते हैं (अनुच्छेद 316(1क), 1963 के 15वें संशोधन से जोड़ा गया)।
- त्यागपत्र: सदस्य राष्ट्रपति को लिखकर कभी भी पद छोड़ सकता है।
- दूसरा कार्यकाल नहीं: कार्यकाल पूरा होने पर सदस्य उसी पद पर फिर से नियुक्ति के योग्य नहीं रहता (अनुच्छेद 316(3))।
अनुच्छेद 317 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों को पद से हटाना
लोक सेवा आयोग के सदस्य को केवल अनुच्छेद 317 में बताए तरीकों से और केवल राष्ट्रपति हटा सकते हैं। कदाचार के आधार पर हटाने से पहले राष्ट्रपति को मामला उच्चतम न्यायालय को भेजना होता है, जो अनुच्छेद 145 के अंतर्गत तय प्रक्रिया से जाँच करता है; न्यायालय प्रतिवेदन दे कि सदस्य को हटाया जाना चाहिए, तभी राष्ट्रपति उसे हटा सकते हैं। मामला न्यायालय में लंबित रहने तक राष्ट्रपति सदस्य को निलंबित कर सकते हैं।
अनुच्छेद 317(3) तीन आधारों पर उच्चतम न्यायालय की जाँच के बिना, राष्ट्रपति के आदेश मात्र से हटाने की अनुमति देता है: सदस्य दिवालिया न्यायनिर्णीत हो, पद के कर्तव्यों से बाहर कोई सवेतन नियोजन करे, या राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण पद पर बने रहने के योग्य न हो। अनुच्छेद 317(4) कदाचार का एक रूप परिभाषित करता है: संघ या किसी राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार में हित रखना, या उसके लाभ में भाग लेना, सिवाय किसी निगमित कंपनी के साधारण सदस्य के रूप में।
संघ लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता: संवैधानिक सुरक्षा-उपाय और अनुच्छेद 319
कई उपबंध आयोग को उस सरकार के दबाव से बचाते हैं जिसकी भरती पर वह नज़र रखता है। सदस्यों का कार्यकाल सुरक्षित है, क्योंकि उन्हें केवल अनुच्छेद 317 के अनुसार हटाया जा सकता है। सेवा की शर्तें राष्ट्रपति तय करते हैं, पर नियुक्ति के बाद उन्हें सदस्य के लिए अलाभकारी रूप में नहीं बदला जा सकता (अनुच्छेद 318)। सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और पेंशन सहित आयोग का पूरा व्यय भारत की संचित निधि पर भारित है (अनुच्छेद 322), इसलिए उस पर संसद में मतदान नहीं होता।
अनुच्छेद 319 पद छोड़ने के बाद पुरस्कार का रास्ता बंद करता है। संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष संघ या किसी राज्य के अधीन आगे कोई नियोजन नहीं ले सकते। आयोग का सदस्य संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है, और राज्य आयोगों के अध्यक्ष तथा सदस्य संघ लोक सेवा आयोग में या किसी राज्य आयोग के अध्यक्ष पद पर जा सकते हैं, पर इनमें से कोई भी सरकार के अधीन अन्य कोई नियोजन नहीं ले सकता।
संघ लोक सेवा आयोग कैसे काम करता है: अनुच्छेद 320 से 323
अनुच्छेद 320 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग के कार्य
अनुच्छेद 320 आयोगों को भरती और सलाह, दोनों की ज़िम्मेदारी देता है। संघ लोक सेवा आयोग संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएँ कराता है, और दो या अधिक राज्य अनुरोध करें तो विशेष अर्हता वाली सेवाओं के लिए संयुक्त भरती की योजनाएँ बनाने और चलाने में उनकी सहायता करता है। सरकार को अनुच्छेद 320(3) में गिनाए विषयों पर आयोग से परामर्श करना होता है।
- लोक सेवाओं और सिविल पदों में भरती की पद्धतियाँ।
- नियुक्ति, पदोन्नति और एक सेवा से दूसरी सेवा में स्थानांतरण के सिद्धांत, और इनके लिए उम्मीदवारों की उपयुक्तता।
- संघ या किसी राज्य की असैनिक हैसियत में सेवा कर रहे व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी अनुशासनिक विषय, उनसे जुड़े ज्ञापनों और अर्जियों सहित।
- कर्तव्य-पालन में किए गए कार्यों पर चली विधिक कार्यवाही में बचाव के खर्च के लिए किसी लोक सेवक के दावे।
- सेवा के दौरान लगी चोट के लिए पेंशन के दावे, और उसकी राशि।
राष्ट्रपति जो अन्य विषय भेजें, उन पर भी आयोग सलाह देता है। अनुच्छेद 321 के अंतर्गत संसद विधि बनाकर आयोग को अतिरिक्त कार्य दे सकती है, जिनमें किसी स्थानीय प्राधिकारी, विधि द्वारा गठित निगमित निकाय या लोक संस्था की सेवाएँ भी शामिल हैं। आयोग हर वर्ष अपने काम का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को देता है, जो उसे एक ज्ञापन के साथ संसद के दोनों सदनों के सामने रखते हैं; ज्ञापन हर उस मामले को और उसके कारण को बताता है जिसमें आयोग की सलाह नहीं मानी गई (अनुच्छेद 323)। सलाह न मानने के मामलों को मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति का अनुमोदन चाहिए; कोई अकेला मंत्रालय आयोग की सलाह को अस्वीकार नहीं कर सकता।
संघ लोक सेवा आयोग की सलाहकारी भूमिका और परामर्श की सीमाएँ
संघ लोक सेवा आयोग सलाह देता है, निर्णय नहीं करता। उसकी सिफ़ारिशें बाध्यकर नहीं हैं, और सरकार पर एकमात्र अंकुश यह है कि उनसे हटने के लिए उसे संसद को उत्तर देना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकार आयोग से परामर्श न करे, तो भी उसका निर्णय अमान्य नहीं होता और पीड़ित लोक सेवक के पास न्यायालय में कोई उपचार नहीं है; अर्थात् परामर्श का कर्तव्य निदेशात्मक है, आज्ञापक नहीं। आयोग द्वारा चयन से उम्मीदवार को पद पर कोई अधिकार भी नहीं मिलता, हालाँकि सरकार को निष्पक्ष और बिना मनमानी के काम करना होता है।
- आरक्षण: अनुच्छेद 320(4) कहता है कि अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था पर, या अनुच्छेद 335 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावों को लागू करने पर, आयोग से परामर्श आवश्यक नहीं है।
- बाहर रखे गए पद: आयोगों और अधिकरणों की अध्यक्षता या सदस्यता, सर्वोच्च राजनयिक पद, समूह ग और समूह घ के अधिकांश पद, और एक वर्ष से कम की अस्थायी नियुक्तियाँ आयोग के दायरे से बाहर हैं।
- छूट के विनियम: राष्ट्रपति ऐसे विषयों की सूची के विनियम बना सकते हैं जिन पर परामर्श आवश्यक नहीं; ये हर सदन के सामने कम से कम चौदह दिन रखे जाते हैं, और संसद इन्हें संशोधित या निरस्त कर सकती है।
संघ लोक सेवा आयोग भरती करने वाली संस्था है, सरकार की कार्मिक संस्था नहीं। सेवाओं का वर्गीकरण, वेतन, संवर्ग प्रबंधन और प्रशिक्षण कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के पास हैं।
अनुशासनिक मामले केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के पास भी जाते हैं, जो संथानम समिति की सिफ़ारिश पर 11 फ़रवरी 1964 के सरकारी संकल्प से बना; उसके पहले आयुक्त, निट्टूर श्रीनिवास राव, ने 19 फ़रवरी 1964 को पद संभाला। विनीत नारायण बनाम भारत संघ में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 ने इसे सांविधिक दर्जा दिया। किसी लोक सेवक पर कार्रवाई से पहले सरकार दोनों से परामर्श करती है, इसलिए उनकी सलाह टकरा सकती है; संवैधानिक निकाय होने के कारण संघ लोक सेवा आयोग की बात का वज़न अधिक होता है।
राज्य लोक सेवा आयोग और संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग
राज्य लोक सेवा आयोग: राज्यपाल नियुक्त करते हैं, राष्ट्रपति हटाते हैं
हर राज्य में इन्हीं अनुच्छेदों 315 से 323 के अंतर्गत एक राज्य लोक सेवा आयोग होता है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, जो इसकी संख्या और सेवा की शर्तें भी तय करते हैं; आधे सदस्यों के पास दस वर्ष की सरकारी सेवा होनी चाहिए। वे छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं, और राज्यपाल को लिखकर त्यागपत्र दे सकते हैं।
राज्यपाल नियुक्त करते हैं, पर हटा केवल राष्ट्रपति सकते हैं, उन्हीं आधारों पर और उसी रीति से जैसे संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों को। उच्चतम न्यायालय में मामला लंबित रहने तक राज्यपाल सदस्य को निलंबित कर सकते हैं। राज्य आयोग हर वर्ष राज्यपाल को प्रतिवेदन देता है, जो उसे न मानी गई सलाह पर ज्ञापन के साथ राज्य विधान-मंडल के सामने रखते हैं। जिला न्यायाधीशों के अलावा राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्ति के नियम बनाते समय राज्यपाल उच्च न्यायालय के साथ इस आयोग से भी परामर्श करते हैं।
| विशेषता | संघ लोक सेवा आयोग | राज्य लोक सेवा आयोग | संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग |
|---|---|---|---|
| किसने बनाया | संविधान (अनुच्छेद 315) | संविधान (अनुच्छेद 315) | राज्यों के संकल्प पर संसद का अधिनियम |
| नियुक्ति | राष्ट्रपति | राज्यपाल | राष्ट्रपति |
| आयु-सीमा | 65 | 62 | 62 |
| पद से हटाना | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति |
| वार्षिक प्रतिवेदन | राष्ट्रपति को | राज्यपाल को | हर राज्य के राज्यपाल को |
संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग: एक सांविधिक निकाय
संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग दो या अधिक राज्यों की सेवा करता है। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य आयोग संविधान से बनते हैं, जबकि संयुक्त आयोग संबंधित राज्य विधान-मंडलों के अनुरोध पर संसद के अधिनियम से बनता है, इसलिए यह संवैधानिक नहीं, सांविधिक निकाय है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, जो उनकी संख्या और सेवा की शर्तें भी तय करते हैं; वे छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहते हैं, और उन्हें केवल राष्ट्रपति निलंबित कर या हटा सकते हैं।
संयुक्त आयोग अपनी सेवा पाने वाले हर राज्य के राज्यपाल को प्रतिवेदन देता है, और हर राज्यपाल उसे राज्य विधान-मंडल के सामने रखते हैं। 1966 में पंजाब से हरियाणा बनने के बाद कुछ समय तक दोनों राज्यों का एक संयुक्त आयोग था। साझा आयोग का दूसरा रास्ता यह है कि राज्यपाल के अनुरोध पर और राष्ट्रपति के अनुमोदन से संघ लोक सेवा आयोग स्वयं किसी राज्य की सेवा करे।
स्रोत
- Legislative Department, Ministry of Law and Justice: The Constitution of India
- Union Public Service Commission: news on the home page (Chairman's oath, 15 May 2025; 99th Foundation Day and the Centenary Year, 1 October 2025)
- NCERT: Indian Constitution at Work, Class 11, Chapter 4, Executive
- Second Administrative Reforms Commission, Fourth Report: Ethics in Governance (January 2007)
- The Hindu (Delhi): UPSC releases provisional answer key of Prelims exam, 28 May 2026
- Wikipedia: Union Public Service Commission
- Wikipedia: Indian Civil Service
- Wikipedia: Central Vigilance Commission
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख लोक सेवा आयोगों को संविधान के पाठ और सूची में दिए अन्य स्रोतों के आधार पर समझाता है।
