परिचय
पुरापाषाण काल, अर्थात् पुराना पाषाण युग, भारत में मानव अतीत का सबसे आरंभिक और सबसे लंबा काल है, जो लगभग बीस लाख वर्ष पहले से लगभग 12,000 वर्ष पहले तक चला। इसके लोग शिकारी-संग्राहक थे और पत्थर के औज़ार बनाते थे; उनके औज़ारों के आधार पर इसे निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण में बाँटा जाता है: पहले हस्तकुठार और खंडक, फिर शल्क, फिर फलक।
पाषाण काल क्या है: भारत का प्रागैतिहासिक काल और पुराना पाषाण युग
पुरापाषाण काल क्या है? पुराने पाषाण युग का अर्थ
लेखन से पहले के समय को प्रागैतिहासिक काल कहते हैं। तब न किताबें थीं, न लिखित दस्तावेज़, इसलिए इस समय के बारे में जो कुछ ज्ञात है, वह लोगों की बनाई और छोड़ी गई वस्तुओं से आता है। इनमें पत्थर के औज़ार सबसे अच्छी तरह बचे रहे हैं, और पाषाण युग के तीनों कालों के नाम इन्हीं पर पड़े हैं।
ये नाम यूनानी भाषा से आए हैं: पैलियो (पुराना), मीसो (मध्य), नियो (नया) और लिथोस (पत्थर)। पुरापाषाण के बाद लगभग 12,000 से 10,000 वर्ष पहले तक मध्यपाषाण काल आता है और लगभग 10,000 वर्ष पहले से नवपाषाण काल। ये काल तकनीक के मोटे चरण हैं, कोई तीखी सीमाएँ नहीं; नए औज़ार आने के बाद भी पुराने प्रकार के औज़ार काम में आते रहे।
पैमाने पर बनाने से लंबाई का अंतर साफ़ दिखता है। पुरापाषाण काल मानव इतिहास का 99 प्रतिशत है, और उसका अकेला निम्न चरण इस अवधि का अधिकांश भाग घेरता है; मध्यपाषाण और नवपाषाण मिलकर भी उसके अंत में एक पतली पट्टी भर हैं।
भारत में पुरापाषाण काल की अवधि और प्लीस्टोसीन युग
भारत में पुरापाषाण काल लगभग बीस लाख वर्ष पहले से लगभग 12,000 वर्ष पहले तक फैला है। लोगों के बनाए औज़ारों के प्रकार के आधार पर इसे निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण में बाँटा जाता है। हर चरण की अवधि मोटी है और क्षेत्र के साथ बदलती है।
| चरण | अवधि | औज़ार |
|---|---|---|
| निम्न पुरापाषाण | लगभग 3,00,000 वर्ष पहले तक | हस्तकुठार, विदारणी, खंडक |
| मध्य पुरापाषाण | लगभग 3,00,000 से 50,000 वर्ष पहले | तैयार क्रोड से निकले शल्क |
| उच्च पुरापाषाण | लगभग 50,000 से 12,000 वर्ष पहले | फलक, तक्षणियाँ |
पुराना पाषाण युग जिस भूवैज्ञानिक युग में पड़ता है, उसे प्लीस्टोसीन (Pleistocene) कहते हैं। यह लगभग 25.8 लाख वर्ष पहले से 11,700 वर्ष पहले तक चला, और इसमें बार-बार ठंडे हिमनदीय दौर आए। पुरापाषाण काल का अंत प्रायः हिमयुग के अंत से जोड़ा जाता है, जब पृथ्वी की जलवायु गर्म हुई; यह बदलाव लगभग 12,000 वर्ष पहले आया और यहीं से मध्यपाषाण काल शुरू होता है।
प्रागैतिहासिक अतीत का अध्ययन: औज़ार और पुरातात्विक स्थल
पुराने पाषाण युग के लोग पत्थर, लकड़ी और हड्डी के औज़ार बनाते थे, पर अच्छी तरह केवल पत्थर के औज़ार बचे हैं, इसलिए वही मुख्य प्रमाण हैं। पुरातत्वविद् इन्हें स्थलों पर खोजते हैं। स्थल वे जगहें हैं जहाँ लोगों की बनाई और बरती गई चीज़ों के अवशेष मिलते हैं: ज़मीन की सतह पर, धरती के नीचे दबे, या कभी-कभी पानी के नीचे भी।
- आवास स्थल: जहाँ लोग रहते थे, जैसे गुफाएँ और शैलाश्रय, जो बारिश, गर्मी और हवा से बचाते थे।
- कारखाना स्थल: जहाँ अच्छा पत्थर मिलता था और औज़ार बनते थे; इनकी पहचान पत्थर के टुकड़ों, फेंके गए औज़ारों और बची हुई छीलन से होती है।
- आवास-सह-कारखाना स्थल: जहाँ लोग औज़ार भी बनाते थे और लंबे समय तक रहते भी थे।
इतनी पुरानी सामग्री की तिथि तय करने के लिए विशेष विधियाँ लगती हैं। चेन्नई के पास अत्तिरमपक्कम में औज़ारों की तिथि कॉस्मिक किरण अनावरण विधि से निकाली गई, जो किसी भारतीय स्थल पर इसका पहला प्रयोग था, और साथ में संदीप्ति (luminescence) विधि से; शिवालिक के मसोल स्थल पर जीवाश्म वाली परत की तिथि पुराचुंबकत्व से तय हुई। ऐसी तिथियाँ तस्वीर बदलती रहती हैं: अब ज्ञात है कि भारत के सबसे पुराने एश्यूलियन औज़ार अफ़्रीका और मध्य एशिया के औज़ारों जितने पुराने हैं।
पुरापाषाण काल के चरण: निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण
निम्न पुरापाषाण काल: हस्तकुठार, विदारणी और खंडक
सबसे पुराना और सबसे लंबा चरण अपने औज़ार दो परंपराओं में बनाता था। एश्यूलियन (Acheulian) परंपरा दोनों सतहों पर गढ़े हस्तकुठार और विदारणियाँ बनाती थी, जबकि सिंधु की सहायक सोहन नदी के नाम पर बनी सोहन परंपरा (Soanian) क्वार्टज़ाइट के कंकड़ों पर खंडक (chopper) और दूसरे औज़ार बनाती थी।
- अत्तिरमपक्कम, तमिलनाडु: लगभग 15 लाख वर्ष पुराने एश्यूलियन हस्तकुठार और विदारणियाँ, जो दुनिया में कहीं भी मिले सबसे पुराने औज़ारों में हैं।
- इसामपुर, कर्नाटक: लगभग 12.7 लाख वर्ष पुरानी एक खदान, हुँसगी और बैचबल घाटियों के लगभग 200 एश्यूलियन स्थलों में से एक, जहाँ 15,000 से अधिक वस्तुएँ चूना पत्थर की सिल्लियों से औज़ार बनाने का हर चरण दिखाती हैं।
- डीडवाना, राजस्थान: मध्य प्लीस्टोसीन के, लगभग 4,00,000 वर्ष पुराने हस्तकुठार।
ये औज़ार किसने बनाए, यह जीवाश्मों से ज्ञात नहीं है। दूसरी जगहों पर एश्यूलियन औज़ार होमो इरेक्टस जैसे आरंभिक मानव बनाते थे, इसलिए भारत में उनकी उपस्थिति औज़ारों से अनुमानित की जाती है। एश्यूलियन स्थल तमिलनाडु की कोर्टलैयार घाटी और महाराष्ट्र के चिरकी-नेवासा से लेकर डीडवाना और भीमबेटका की पहाड़ियों तक फैले हैं।
कुछ निशान एश्यूलियन से भी पुराने हैं। शिवालिक के मसोल में कटे निशानों वाली हड्डियाँ लगभग 26 लाख वर्ष पुरानी हैं, और पाकिस्तान के रिवात तथा पब्बी पहाड़ियों के औज़ार एश्यूलियन और सोहन, दोनों से अलग तकनीक के हैं; उत्तर-पश्चिम के इन स्थलों का वर्णन आगे स्थलों वाले खंड में है।
मध्य पुरापाषाण काल: शल्क औज़ार और लेवालुआ तकनीक
मध्य चरण में ज़ोर बड़े द्विमुखी औज़ारों से हटकर शल्कों पर बने औज़ारों पर आ गया, जिनमें अधिक योजना लगती थी। औज़ार बनाने वाला पहले क्रोड (core) को गढ़ता था, ताकि उससे निकलने वाले शल्क का आकार पहले से तय रहे। एश्यूलियन से अधिक विकसित इस तैयार-क्रोड विधि को लेवालुआ तकनीक (Levallois technique) कहते हैं।
- अत्तिरमपक्कम: 7,000 से अधिक वस्तुएँ लगभग 3,85,000 वर्ष पुरानी लेवालुआ तकनीक दिखाती हैं, जो अफ़्रीका के बाहर सबसे पुरानी में है; इन्हें आरंभिक आधुनिक मानवों ने बनाया या किसी पुरानी प्रजाति ने, यह अभी अनसुलझा है।
- ज्वालापुरम, आंध्र प्रदेश: लगभग 74,000 वर्ष पहले के टोबा महाविस्फोट की राख के नीचे और ऊपर, दोनों जगह औज़ार मिले हैं; इस क्षेत्र के लोग उस घटना के बाद भी बचे रहे।
- नर्मदा घाटी: भारत का सबसे पुराना मानव जीवाश्म, एक कपाल-खोल, जिसे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अरुण सोनाकिया ने 1982 में हथनौरा के पास खोजा।
इस जीवाश्म को नर्मदा मानव कहते हैं, और इस पर बहस अब भी जारी है। पहले इसे होमो इरेक्टस नर्मदेंसिस माना गया; बाद के अध्ययनों ने इसे पुरातन होमो सेपियंस के अधिक निकट रखा, और इसकी आयु लगभग 50,000 से 1,60,000 वर्ष के बीच कहीं आँकी जाती है। इसी घाटी की हँसली की हड्डियाँ बताती हैं कि लगभग 2,50,000 से 70,000 वर्ष पहले यहाँ एक बड़े शरीर वाली आबादी के साथ एक छोटी और गठीली आबादी भी रहती थी।
उच्च पुरापाषाण काल: फलक, तक्षणी और आधुनिक मानव
पुराने पाषाण युग का अंतिम चरण आधुनिक मानव, होमो सेपियंस, का युग है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के प्रमाण के अनुसार वे 75,000 से 50,000 वर्ष पहले के बीच उपमहाद्वीप में पहुँचे। अब औज़ार लंबे, पतले फलकों पर बनने लगे, और छेनी जैसी धार वाला पत्थर का औज़ार, तक्षणी (burin), हड्डी, सींग और खाल पर काम करने में बरता गया।
- आरंभिक सूक्ष्मपाषाण: पश्चिम बंगाल के महादेबेड़ा और काना के छोटे औज़ार 42,000 से 25,000 वर्ष पुराने हैं; यह पहले सोचे गए समय से पहले है।
- बेलन घाटी, उत्तर प्रदेश: रेडियोकार्बन तिथियाँ 18,000 से 17,000 वर्ष।
- पटने, महाराष्ट्र: शुतुरमुर्ग के अंडों के ढेरों छिलके, कुछ पर उकेरे गए आकार, और उनसे बने मनके; तब भारत में शुतुरमुर्ग पाए जाते थे।
- हुँसगी, कर्नाटक: पुराने पाषाण युग के अंतिम चरण का स्थल, जहाँ लाल-भूरे चर्ट के लंबे फलक मिले।
एक पैमाने पर रखने से दिखता है कि औज़ार कितनी धीरे बदले। अत्तिरमपक्कम और इसामपुर के हस्तकुठार मध्य चरण के सोचे-समझे शल्कों से दस लाख वर्ष से भी अधिक पहले के हैं, और अंतिम चरण के फलक तथा सूक्ष्मपाषाण उन अंतिम 50,000 वर्षों में सिमट जाते हैं जिनके बाद लगभग 12,000 वर्ष पहले पुराना पाषाण युग समाप्त हुआ।
पुरापाषाण काल के औज़ार: पुराने पाषाण युग के औज़ार कैसे बने और बरते गए
पुरापाषाण काल के औज़ार: पत्थर के औज़ार बनाने की तकनीकें
पुरापाषाण काल के औज़ार लगभग बीस लाख वर्षों में धीरे-धीरे बदले। दिशा दोनों सतहों पर गढ़े बड़े, भारी औज़ारों से छोटे, पतले और अधिक विशिष्ट शल्कों और फलकों की ओर रही। अच्छे पत्थर का इतना महत्त्व था कि लोग ऐसी जगहें खोजते थे जहाँ वह आसानी से मिल जाए। पत्थर को गढ़ने के दो तरीके चलते थे।
- पत्थर पर पत्थर: जिस कंकड़ से औज़ार बनना था, उसे क्रोड कहते हैं; उसे एक हाथ में पकड़कर दूसरे हाथ के हथौड़ा पत्थर से मारा जाता था, और सही आकार आने तक शल्क उतारे जाते थे।
- दाब शल्कन: क्रोड को ठोस सतह पर रखा जाता था, उस पर हड्डी या पत्थर का टुकड़ा रखकर हथौड़ा पत्थर से मारा जाता था, और ऐसे शल्क निकलते थे जिन्हें औज़ारों का रूप दिया जा सके।
लेवालुआ तकनीक ने इन विधियों में योजना जोड़ी। कंकड़ को तब तक छाँटते रहने के बजाय कि कोई औज़ार निकल आए, कारीगर पहले क्रोड तैयार करता था और फिर एक ऐसा शल्क उतारता था जिसका आकार पहले से तय था। इससे पतला, धारदार औज़ार मिलता था और अच्छा पत्थर कम बर्बाद होता था।
पुराने पाषाण युग के औज़ारों का कच्चा माल और उपयोग
कौन-सा पत्थर चुना गया, यह इस पर निर्भर था कि क्षेत्र में क्या मिलता है। अत्तिरमपक्कम और शिवालिक में क्वार्टज़ाइट गढ़ा गया, हुँसगी और इसामपुर में स्थानीय चूना पत्थर, और बाद के चरणों के फलकों तथा छोटे औज़ारों के लिए चर्ट और जैस्पर जैसे महीन पत्थर।
| पदार्थ | कहाँ प्रयुक्त | औज़ार |
|---|---|---|
| क्वार्टज़ाइट | अत्तिरमपक्कम, शिवालिक | हस्तकुठार, खंडक |
| चूना पत्थर | हुँसगी, इसामपुर | द्विमुखी औज़ार, विदारणी |
| चर्ट, जैस्पर | उच्च पुरापाषाण स्थल | फलक, छोटे औज़ार |
इन औज़ारों के उपयोग उनके आकार से पढ़े जा सकते हैं। कुछ से मांस और हड्डी काटी जाती थी, पेड़ों की छाल और पशुओं की खाल खुरची जाती थी, या फल और जड़ें काटी जाती थीं; कुछ को हड्डी या लकड़ी के हत्थों में लगाकर शिकार के भाले और तीर बनते थे। दूसरे औज़ारों से ईंधन, झोपड़ियों और नए औज़ारों के लिए लकड़ी काटी जाती थी, खाने योग्य जड़ें खोदी जाती थीं या पशुओं की खाल के कपड़े सिले जाते थे।
भारत के पुरापाषाण स्थल
दक्षिण भारत के पुरापाषाण स्थल: अत्तिरमपक्कम, हुँसगी और कुर्नूल
सबसे पुराने और सबसे अच्छी तरह अध्ययन किए गए कुछ स्थल दक्षिण भारत में हैं। चेन्नई से लगभग 60 किलोमीटर दूर कोर्टलैयार नदी के पास के गाँव अत्तिरमपक्कम में औज़ार बनाने का क्रम आरंभिक एश्यूलियन से मध्य पुरापाषाण तक चलता है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के रॉबर्ट ब्रूस फ़ूट को 1863 में यहाँ पहले औज़ार मिले, और चेन्नई के पास के पल्लावरम के साथ यह मद्रासी संस्कृति (Madrasian culture) का प्रारूप स्थल बना; यह नाम कभी इस क्षेत्र के एश्यूलियन के लिए प्रयुक्त होता था।
- हुँसगी, कर्नाटक: कई आरंभिक पुरापाषाण स्थल; बड़े स्थल, जहाँ हर तरह के काम के औज़ार मिले, आवास-सह-कारखाना स्थल थे, और कुछ छोटे स्थल केवल औज़ार बनाने की जगहें; कई स्थल झरनों के पास थे, और अधिकतर औज़ार स्थानीय चूना पत्थर के थे।
- कुर्नूल गुफाएँ, आंध्र प्रदेश: राख के निशान बताते हैं कि लोग आग का उपयोग जानते थे, जिससे रोशनी मिल सकती थी, मांस पक सकता था और जानवर भगाए जा सकते थे।
- ज्वालापुरम, आंध्र प्रदेश: सुमात्रा के ज्वालामुखी टोबा की राख के ऊपर और नीचे दबे औज़ार; यह राख की परत भारतीय प्रागैतिहास की तिथि तय करने का एक चिह्न बन गई है।
मध्य भारत के पुरापाषाण स्थल: भीमबेटका और नर्मदा घाटी
मध्य भारत की पहाड़ियाँ पाषाण युग के लोगों का स्वाभाविक घर थीं। मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले में, भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दूर, भीमबेटका विंध्य की तलहटी में है; इसके कुछ शैलाश्रयों में 1,00,000 वर्ष से भी पहले लोग रहते थे। यहाँ एश्यूलियन काल से आगे का मानव जीवन दिखता है। इसके नाम का अर्थ महाभारत के पांडव भीम का विश्राम-स्थल माना जाता है।
- खोज और दर्जा: पुरातत्वविद् वी. एस. वाकणकर ने 1957 में यह परिसर खोजा, और भीमबेटका के शैलाश्रय 2003 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बने, क्योंकि यहाँ पुरापाषाण से मध्यकाल तक चली एक परंपरा दिखती है।
- विस्तार: लगभग 10 किलोमीटर में फैली सात पहाड़ियाँ और 750 से अधिक शैलाश्रय।
- प्यालेनुमा गड्ढे (cupules): इसके ऑडिटोरियम शैलाश्रय के छोर पर बने छोटे कटोरीनुमा गड्ढे, जिनकी आयु लगभग 1,00,000 वर्ष आँकी गई है।
- आदमगढ़ पहाड़ियाँ, नर्मदापुरम: निम्न पुरापाषाण और मध्यपाषाण औज़ारों वाले शैलाश्रय।
प्राकृतिक गुफाएँ और शैलाश्रय विंध्य और दक्कन के पठार में आम हैं, और इनमें से कई नर्मदा घाटी के पास हैं, जहाँ नर्मदा मानव मिला था। लोगों ने इन्हें इसलिए चुना क्योंकि ये बारिश, गर्मी और हवा से बचाते थे और पानी तथा अच्छे पत्थर के पास थे; इसी कारण प्रागैतिहासिक स्थल नदियों और पहाड़ियों के किनारे जुटे मिलते हैं।
उत्तर-पश्चिम के पुरापाषाण स्थल: सोहन घाटी, शिवालिक और डीडवाना
दक्षिण एशिया में आरंभिक मानवों के सबसे पुराने निशान शिवालिक की तलहटी में हैं। सोहन औज़ार आज के भारत, नेपाल और पाकिस्तान में शिवालिक के साथ-साथ मिलते हैं; इनमें खंडक, चक्राकार औज़ार, खुरचनियाँ, क्रोड और शल्क हैं, जो अधिकतर क्वार्टज़ाइट के कंकड़ों और गोल पत्थरों पर बने हैं।
- मसोल: चंडीगढ़ के उत्तर में, पुराचुंबकत्व से 26 लाख वर्ष पुरानी आँकी गई परत की जीवाश्म हड्डियों पर कटे निशान, जिन्हें शोधकर्ता क्वार्टज़ाइट की धार से काम करते आरंभिक मानवों का काम मानते हैं।
- रिवात और पब्बी पहाड़ियाँ, पाकिस्तान: पोठोहार पठार पर रिवात के औज़ार लगभग 25 लाख वर्ष पुराने आँके गए हैं, और पब्बी पहाड़ियों के सादे औज़ार 22 से 9 लाख वर्ष पुराने।
- डीडवाना, राजस्थान: हस्तकुठार, जिनके आकार और माप एश्यूलियन को उसके आरंभिक से बहुत बाद के चरण तक दिखाते हैं।
सोहन परंपरा की तिथि तय करना कठिन है, क्योंकि इसके औज़ार अधिकतर सतह पर मिलते हैं, तिथि-योग्य परतों में नहीं। एक मत इसे मध्य प्लीस्टोसीन में रखकर होमो इरेक्टस से जोड़ता है; दूसरा इसे बहुत बाद का, हड़प्पा सभ्यता से निकले लोगों का काम मानता है। इसके औज़ार प्रायः उसी उप-हिमालयी क्षेत्र में एश्यूलियन औज़ारों के पास मिलते हैं।
पुरापाषाण काल में जीवन: शिकारी-संग्राहक, कला और जलवायु
पुरापाषाण काल के शिकारी-संग्राहक जगह-जगह क्यों घूमते थे
पुरापाषाण काल के लोग एक जगह लंबे समय तक नहीं टिकते थे। मनुष्य से तेज़ और ताकतवर जानवरों के शिकार के लिए सतर्कता और कौशल चाहिए था, और संग्रहण के लिए यह जानना ज़रूरी था कि कौन-से पौधे खाने योग्य हैं और फल कब पकते हैं। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में पौधों की भारी विविधता के कारण संग्रहण भोजन का बहुत महत्त्वपूर्ण साधन था।
- भोजन का खत्म होना: एक जगह लंबे समय तक रहने से आसपास के पौधे और जानवर खत्म हो जाते।
- जानवरों का चलना: हिरण और जंगली मवेशी घास और पत्तियों की खोज में चलते थे, और उनके शिकारी उनके पीछे।
- ऋतुओं का बदलना: अलग-अलग पौधे अलग-अलग ऋतुओं में फल देते हैं।
- मौसमी पानी: कई नदियाँ और झीलें मौसमी होती हैं, इसलिए सूखे महीनों में लोग आगे बढ़ जाते थे।
कौन-सा काम कौन करता था, यह ज्ञात नहीं है। हो सकता है स्त्री-पुरुष कई काम साथ करते हों, या कुछ काम केवल स्त्रियाँ और कुछ केवल पुरुष करते हों, और यह चलन क्षेत्र-क्षेत्र में अलग रहा हो। लोग अपने मित्रों और संबंधियों से मिलने भी जाते थे, और हमेशा पैदल।
पुरापाषाण कला: उकेरे गए छिलके, प्यालेनुमा गड्ढे और पहले चित्र
पुराने पाषाण युग में कला देर से दिखती है। भारत के सबसे पुराने चित्र उच्च पुरापाषाण काल के बताए जाते हैं। भीमबेटका के सबसे पुराने समूह में हरे और गहरे लाल रंग में रेखीय आकृतियों के रूप में विशाल बाइसन, हाथी, बाघ, गैंडे और सूअर हैं, साथ में छड़ी जैसी मानव आकृतियाँ; हरे चित्र नर्तकों के हैं और लाल चित्र शिकारियों के।
- उकेरे गए शुतुरमुर्ग के छिलके: महाराष्ट्र के पटने में शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलकों पर आकृतियाँ उकेरी गईं, और उनसे मनके बनाए गए।
- शैलाश्रय के गड्ढे: भीमबेटका के ऑडिटोरियम शैलाश्रय के कटोरीनुमा गड्ढे, लगभग 1,00,000 वर्ष पुराने।
- पहली खोज: भारत में शैलचित्र पहली बार 1867-68 में पुरातत्वविद् आर्चीबाल्ड कार्लाइल ने खोजे, स्पेन की अल्तामीरा गुफा की खोज से बारह वर्ष पहले।
इसी युग में दूसरी जगहों पर भी गुफा चित्र बने। फ़्रांस में 20,000 से 10,000 वर्ष पहले के बीच बने चित्रों में जंगली घोड़े, बाइसन, रेनडियर और भालू हैं, जिनके रंग गेरू या लौह अयस्क जैसे खनिजों और लकड़ी के कोयले से बने थे; शायद ये शिकार से पहले की रस्मों के लिए बनाए गए। भारतीय शैलचित्रों की पूरी कहानी अगले युग की है, जो भारत में मध्यपाषाण काल वाले लेख में है।
पुरापाषाण काल का अंत: 12,000 वर्ष पहले गर्म होती जलवायु
पुरापाषाण काल विश्व की जलवायु में आए बदलाव के साथ समाप्त हुआ। लगभग 12,000 वर्ष पहले परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत गर्म हुईं और कई क्षेत्रों में घास के मैदान फैले; घास पर जीने वाले हिरण, मृग, बकरी, भेड़ और मवेशी जैसे पशुओं की संख्या बढ़ी।
- इन झुंडों के पीछे चलने वाले शिकारियों ने उनकी खान-पान की आदतें और प्रजनन के मौसम जाने, जिससे उन्हें स्वयं इन पशुओं को पालने का विचार आया होगा।
- मछली पकड़ना महत्त्वपूर्ण हो गया।
- उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में गेहूँ, जौ और धान जंगली रूप में उगते थे; जो लोग इनका दाना बटोरते थे, उन्होंने जाना कि ये कहाँ उगते हैं और कब पकते हैं, और इसी से उन्हें स्वयं पौधे उगाने का विचार आया होगा।
इन बदलावों से अगला युग खुलता है, जिसका वर्णन भारत में मध्यपाषाण काल में है। खेती, बर्तन और गाँव भारत में नवपाषाण काल में आते हैं, और पहले नगरों की कहानी सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी में) वाले लेख में है।
पुरापाषाण काल की विशेषताएँ और बाद के कालों से अंतर
- जीवन-शैली: शिकार, मछली पकड़ना और संग्रहण; न खेती, न पशुपालन।
- पत्थर के औज़ार: साथ में लकड़ी और हड्डी के औज़ार; हस्तकुठार से शल्क और फिर फलक की ओर बदलाव।
- आश्रय: पानी और अच्छे पत्थर के पास गुफाएँ, शैलाश्रय और खुले डेरे, और बार-बार स्थान-परिवर्तन।
- आग: कुर्नूल की गुफाओं में मिले राख के निशान इसके उपयोग को दिखाते हैं।
- शैल कला और उत्कीर्णन: कटोरीनुमा गड्ढे, उकेरे गए शुतुरमुर्ग के छिलके और, अंत में, पहले चित्र।
- जलवायु: ठंडा और बदलता प्लीस्टोसीन, जिसका अंत 12,000 वर्ष पहले की गर्म परिस्थितियों में हुआ।
| विशेषता | पुरापाषाण | मध्यपाषाण | नवपाषाण |
|---|---|---|---|
| काल | 20 लाख से 12,000 वर्ष पहले | 12,000 से 10,000 वर्ष पहले | लगभग 10,000 वर्ष पहले से |
| औज़ार | हस्तकुठार, शल्क, फलक | सूक्ष्मपाषाण | घिसे पत्थर के औज़ार |
| भोजन | शिकार, संग्रहण | शिकार, मछली, संग्रहण | खेती और पशुपालन |
| बसावट | गुफाएँ, शैलाश्रय, डेरे | डेरे, कुछ लंबे ठहराव | घरों वाले गाँव |
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2023, सामान्य अध्ययन-Iप्राचीन भारत के विकास की दिशा में भौगोलिक कारकों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: भूगोल को वह पृष्ठभूमि बताते हुए शुरुआत करें जिसने तय किया कि सबसे आरंभिक भारतीय कहाँ रहे और भोजन कैसे पाया।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- पत्थर और पानी: नदियों, झरनों और अच्छे पत्थर के पास पुरापाषाण स्थल, जैसे कोर्टलैयार पर अत्तिरमपक्कम और झरनों तथा चूना पत्थर वाला हुँसगी।
- उच्चावच: विंध्य और दक्कन के शैलाश्रय, विशेषकर भीमबेटका, बारिश, गर्मी और हवा से आश्रय देते थे।
- जलवायु: लगभग 12,000 वर्ष पहले की गर्म परिस्थितियों ने घास के मैदान और जंगली अनाज फैलाए, जिससे पशुपालन और खेती की राह खुली।
- बाद के चरण: कृषक गाँवों और नगरों के लिए उपजाऊ नदी घाटियाँ; बाधा और मार्ग के रूप में पर्वत और समुद्र।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि भूगोल ने हर कदम का मंच तैयार किया, जबकि परिणाम लोगों के चुनावों से तय हुआ।
स्रोत
- NCERT: Our Pasts I (Class VI), On the Trail of the Earliest People
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part I (Class XI), Prehistoric Rock Paintings
- PIB: Bhimbetka Rock Shelters in Madhya Pradesh declared World Heritage (4 July 2003)
- PIB: India, World Heritage Properties (list)
- Ministry of Culture: Rock Shelters of Bhimbetka
- IGNCA (Ministry of Culture): The Art on Rocks
- Wikipedia: South Asian Stone Age
- Wikipedia: Paleolithic
- Wikipedia: Lower Paleolithic
- Wikipedia: Middle Paleolithic
- Wikipedia: Upper Paleolithic
- Wikipedia: Acheulean
- Wikipedia: Soanian
- Wikipedia: Madrasian culture
- Wikipedia: Attirampakkam
- Wikipedia: Hunsgi
- Wikipedia: Bhimbetka rock shelters
- Wikipedia: Narmada Human
- Wikipedia: Jwalapuram
- Wikipedia: Didwana
- Wikipedia: Adamgarh Hills
- Wikipedia: Hand axe
- Wikipedia: Hunter-gatherer
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है। प्रागैतिहासिक स्थलों की तिथियाँ नई विधियों के साथ संशोधित होती रहती हैं।
