परिचय
विशेष गहन पुनरीक्षण वैध
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) निर्वाचक नामावली का वह नया, घर-घर सत्यापन है जिसका आदेश निर्वाचन आयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत दे सकता है। 27 मई 2026 को उच्चतम न्यायालय ने बिहार के SIR को वैध ठहराया और कहा कि आयोग नामावली के लिए नागरिकता की सीमित जाँच कर सकता है, पर किसी की नागरिकता तय नहीं कर सकता।
विशेष गहन पुनरीक्षण: 27 मई 2026 का उच्चतम न्यायालय का निर्णय
SIR पर निर्णय: चार प्रश्न और न्यायालय के उत्तर
27 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बिहार की निर्वाचक नामावली के निर्वाचन आयोग द्वारा कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision, SIR) को वैध ठहराया। 124 पृष्ठों का यह निर्णय मुख्य न्यायमूर्ति ने लिखा। मुख्य याचिका एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने भारत के निर्वाचन आयोग के विरुद्ध दायर की थी, और उसके साथ अठारह अन्य रिट याचिकाएँ सुनी गईं।
न्यायालय ने चार प्रश्न तय किए और हर एक का उत्तर आयोग के पक्ष में दिया, पर सबसे संवेदनशील प्रश्न, नागरिकता, पर शर्तें भी जोड़ीं।
- धारा 21(3) के अंतर्गत शक्ति: SIR का आधार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के साथ पठित संविधान का अनुच्छेद 324 है, और यह न अधिनियम से टकराता है, न निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 से।
- आनुपातिकता: इसका उद्देश्य वैध था, अर्थात् नामावली की शुद्धता, पूर्णता और अखंडता की बहाली, और इसके उपाय स्पष्ट रूप से अत्यधिक नहीं थे।
- प्रक्रिया: नामावली में दर्ज नाम के पक्ष में वैधता की उपधारणा होती है, पर वह खंडनीय है और गहन पुनरीक्षण को नहीं रोकती; नियम 21क के नोटिस और सुनवाई के सुरक्षा उपाय सार रूप में बने रहे; दस्तावेज़ों की सूची बोधगम्य मानदंडों पर टिकी है।
- नागरिकता: आयोग नामावली की पात्रता से संतुष्ट होने के लिए नागरिकता की सीमित जाँच कर सकता है; यह नागरिकता का निर्धारण नहीं है, और इसके परिणाम केवल निर्वाचन तक सीमित हैं।
इसके बाद न्यायालय ने उन लोगों के लिए निर्देश दिए जिनके नाम हट चुके थे। जहाँ आयोग ने 2003 की नामावली से नाम इस मत पर हटाए कि वे नागरिक नहीं हैं, उसे वे मामले चार सप्ताह में नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी को भेजने होंगे, जो नोटिस और सुनवाई के बाद, यथासंभव अगले संसदीय, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले निर्णय देगा; नागरिक पाए गए व्यक्ति का नाम नामावली में लौटेगा। बिहार के अधिवासी जिनके नाम अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित या दोहरे बताकर ग़लत ढंग से हटे, न्यायिक पुनर्विलोकन माँग सकते हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण क्या है: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21
SIR क्या है: सामान्य, गहन और विशेष पुनरीक्षण
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 बताती है कि निर्वाचक नामावली कैसे तैयार और पुनरीक्षित होती है। उपधारा (1) हर निर्वाचन क्षेत्र की नामावली अर्हता तिथि के संदर्भ में तैयार करने की, और उपधारा (2) उसे विहित रीति से पुनरीक्षित करने की बात करती है, सामान्यतः हर आम चुनाव और हर उपचुनाव से पहले।
- सामान्य पुनरीक्षण, धारा 21(2): निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के नियम 25 की “विहित रीति” से होता है, या तो गहन रूप से, जिसमें नामावली नए सिरे से बनती है, या संक्षिप्त रूप से, या आंशिक रूप से दोनों।
- विशेष पुनरीक्षण, धारा 21(3): “उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी” आयोग किसी भी समय, लेखबद्ध कारणों से, किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके भाग की नामावली का विशेष पुनरीक्षण “ऐसी रीति से जैसी वह ठीक समझे” करा सकता है; पुनरीक्षण पूरा होने तक पुरानी नामावली लागू रहती है।
धारा 21(3) लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 से आई, जिसने मूल धारा 25 का स्थान लिया। न्यायालय ने इसके हर वाक्यांश को पढ़ा: सर्वोपरि खंड (non-obstante clause) इसे सामान्य व्यवस्था से मुक्त करता है, "किसी भी समय" समय की सीमा हटाता है, "लेखबद्ध कारण" इसे न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन रखते हैं, और "जैसी वह ठीक समझे" आयोग को प्रक्रिया का व्यापक विवेक देता है। धारा 21(2) के लिए बने नियम धारा 21(3) के पुनरीक्षण को नहीं बाँधते, इसलिए अलग नियमों के अभाव में शक्ति समाप्त नहीं होती।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि "किसी निर्वाचन क्षेत्र" से केवल लक्षित पुनरीक्षण की अनुमति है, पूरे राज्य की नहीं। साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 13(2) के साथ पढ़कर न्यायालय ने माना कि "कोई" का अर्थ "अनेक" या "सभी" भी हो सकता है: दो दशक के प्रवासन जैसी समस्या, जो पूरे राज्य में फैली हो, पूरे राज्य के पुनरीक्षण से सुलझाई जा सकती है।
अनुच्छेद 324 और 327: निर्वाचक नामावली पर निर्वाचन आयोग की शक्ति
अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार करने और निर्वाचन कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। अनुच्छेद 327 संसद को नामावली तैयार करने सहित निर्वाचनों पर विधि बनाने देता है, पर "इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए"।
याचिकाकर्ता मोहिंदर सिंह गिल (1978) पर टिके थे, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 324 उन क्षेत्रों में काम करता है जहाँ विधि मौन है। न्यायालय ने उस निर्णय को बीच के मत के रूप में पढ़ा: संसद के विधि बनाने पर भी आयोग की संवैधानिक शक्ति बनी रहती है, पर वह किसी स्पष्ट वैधानिक आदेश को लाँघ नहीं सकती। ए.सी. जोस का मामला, जिसमें आयोग ने मतपत्र माँगने वाले नियमों के विरुद्ध वोटिंग मशीनें लगाई थीं, उसके तथ्यों तक सीमित माना गया, क्योंकि यहाँ स्वयं संसद ने धारा 21(3) में शक्ति दी है।
विशेष गहन पुनरीक्षण 2026: बिहार का अभ्यास और उसके आँकड़े
24 जून 2025 का आदेश: निर्वाचक नामावली 2003, गणना प्रपत्र और ग्यारह दस्तावेज़
आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार के हर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में SIR का आदेश दिया, उस वर्ष बाद में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले, और इसे पूरे देश तक ले जाने का निर्णय किया। उसके लेखबद्ध कारण दो थे: 2003 के पिछले गहन पुनरीक्षण के बाद तेज़ शहरीकरण और प्रवासन से नामावली बहुत बदल गई थी, जिससे दोहरी और त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों का जोखिम बढ़ा; और अनुच्छेद 326 उस पर केवल नागरिकों को नामावली में रखने का दायित्व डालता है।
- संदर्भ नामावली: 1 जनवरी 2003 की अर्हता तिथि वाली 2003 की नामावली को, खंडन न होने तक, पात्रता का प्रमाण माना गया।
- दस्तावेज़: 2003 की नामावली से बाहर के व्यक्ति को ग्यारह सूचीबद्ध दस्तावेज़ों में से एक देना था; बाद में न्यायालय ने आधार को पहचान के बारहवें दस्तावेज़ के रूप में जोड़ा।
- गणना: बूथ स्तरीय अधिकारी पहले से भरे प्रपत्र लेकर हर घर गए, जिन्हें 25 जुलाई 2025 तक, स्वयं या ऑनलाइन, लौटाना था।
- जाँच और अपील: संदिग्ध मामलों में कारण बताओ नोटिस और सकारण आदेश; अपील पहले ज़िला मजिस्ट्रेट को, फिर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन अधिकारी को।
बिहार की निर्वाचक नामावली: 7.89 करोड़ से 7.42 करोड़ निर्वाचक
24 जून 2025 को बिहार की नामावली में लगभग 7.89 करोड़ निर्वाचक थे। 1 अगस्त 2025 की प्रारूप नामावली में लगभग 7.24 करोड़ रहे, अर्थात् प्रपत्र न लौटाने से लगभग 65 लाख लोग बाहर रहे। आयोग के 27 जुलाई के आँकड़ों में लगभग 22 लाख मृत, 36 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित, और 7 लाख एक से अधिक स्थानों पर नामांकित थे। दावों और आपत्तियों के बाद 21.53 लाख पात्र निर्वाचक जुड़े और 3.66 लाख और नाम हटे, और 30 सितंबर 2025 की अंतिम नामावली में 7.42 करोड़ निर्वाचक थे। विधानसभा चुनाव नवंबर में हुए, और परिणाम 14 नवंबर 2025 को घोषित हुए।
मामला लंबित रहते हुए न्यायालय ने अंतरिम आदेशों से प्रक्रिया पर नज़र रखी।
- 10 जुलाई 2025: आयोग से आधार, निर्वाचक फ़ोटो पहचान पत्र और राशन कार्ड को वैध प्रमाण मानने पर विचार करने को कहा।
- 14 अगस्त 2025: बाहर रहे लगभग 65 लाख निर्वाचकों की सूची कारणों सहित प्रकाशित करने का आदेश दिया।
- 22 अगस्त 2025: बारह राजनीतिक दलों को पक्षकार बनाया और उनके बूथ स्तरीय एजेंटों से प्रपत्र भरवाने में मदद करने को कहा।
- 1 सितंबर 2025: विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से पैरा-लीगल स्वयंसेवक लगाए।
- 8 सितंबर 2025: आधार को पहचान के बारहवें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया।
आनुपातिकता, उपधारणा और प्रक्रिया: न्यायालय ने SIR को कैसे परखा
SIR पर आनुपातिकता की चार कसौटियाँ
SIR करोड़ों लोगों के मताधिकार को छू सकता था, इसलिए न्यायालय ने उसे आनुपातिकता की चार कसौटियों पर परखा।
- वैध उद्देश्य: सभी पात्र निर्वाचकों को जोड़ना और अपात्रों को हटाना अनुच्छेद 325 और 326 से निकलता है; आयोग के बताए आधार, मृत्यु, प्रवासन और दोहरा नामांकन, नियम 21क में नाम हटाने के ही आधार हैं।
- तार्किक संबंध: घर-घर गणना और नए प्रपत्र पुरानी प्रविष्टियाँ पकड़ने के लिए ही बने हैं।
- आवश्यकता: विमुद्रीकरण वाले विवेक नारायण शर्मा (2023) निर्णय के अनुसार न्यायालय ने तरीक़े का चुनाव विशेषज्ञ निकाय पर छोड़ा, जब तक वह स्पष्ट रूप से अत्यधिक न हो; व्यवस्थागत समस्या का टुकड़ों में हल संभव नहीं था।
- संतुलन: मताधिकार मूल्यवान है पर विनियमित है; दस्तावेज़ों, पारदर्शिता और मतदाताओं की सहायता पर न्यायालय के अपने हस्तक्षेपों ने बोझ घटाया।
न्यायालय ने पूर्णता की माँग नहीं की: बड़े अभ्यास की त्रुटियाँ उसे असंवैधानिक नहीं बनातीं, और अलग-अलग बहिष्करण दावों, आपत्तियों और अपीलों से सुधारे जा सकते हैं।
वैधता की उपधारणा, नियम 21क और दस्तावेज़ों की व्यवस्था
याचिकाकर्ता लाल बाबू हुसैन (1995) पर टिके थे, जिसमें कहा गया था कि नामावली में पहले से दर्ज नाम को उचित सत्यापन के बाद दर्ज माना जाता है और संदेह बताए बिना हटाया नहीं जा सकता। न्यायालय ने माना कि प्रविष्टि के पक्ष में वैधता की उपधारणा होती है, पर उसे साक्ष्य से जुड़ी, खंडनीय उपधारणा कहा। उसने लाल बाबू हुसैन को अलग-अलग आपत्तियों के न्यायनिर्णयन तक सीमित किया, और व्यवस्थागत, जाँचात्मक पुनरीक्षण को उससे अलग माना, जिसमें आयोग निर्वाचकों से फिर से सामग्री माँग सकता है।
नियम 21क नोटिस और सुनवाई के बिना नाम हटाने से रोकता है। न्यायालय ने पाया कि ये सुरक्षा उपाय SIR के चरणों में बँटे हुए हैं: प्रारूप नामावली में नाम न होना अस्थायी है, और नाम केवल नोटिस, जाँच, सकारण आदेश और अपील के अवसर के बाद हटता है।
न्यायालय ने आयोग के दस्तावेज़ों के चुनाव को भी सही माना, हर दस्तावेज़ को इस पर परखकर कि वह क्या सिद्ध कर सकता है।
| दस्तावेज़ | क्या सिद्ध कर सकता है | न्यायालय का मत |
|---|---|---|
| आधार कार्ड | केवल पहचान (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23(4)); आधार अधिनियम, 2016 के अनुसार नागरिकता या अधिवास का प्रमाण नहीं | बारहवें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार, पर निर्णायक नहीं |
| निर्वाचक फ़ोटो पहचान पत्र | स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं: यह स्वयं नामावली के आधार पर बनता है | बहिष्करण सही: इसका उपयोग चक्रीय होता |
| राशन कार्ड | पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र की तरह नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं | बहिष्करण आयोग के विवेक में |
निर्वाचन आयोग और नागरिकता: न्यायालय द्वारा अनुमत सीमित जाँच
पात्रता पर प्रशासनिक संतुष्टि बनाम नागरिकता का न्यायनिर्णयन
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नागरिकता केवल केंद्र तय कर सकता है; उन्होंने नागरिकता अधिनियम की धारा 9(2) और इस विषय के गृह मंत्रालय को आवंटन का हवाला दिया। न्यायालय ने कहा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 अ-नागरिकों को, और साथ ही सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित व्यक्तियों और भ्रष्ट आचरण के कारण निरर्हत व्यक्तियों को, रजिस्ट्रीकरण से निरर्हत करती है; इसलिए नागरिकता नामांकन की पूर्व शर्त है, और आयोग उस पर संतुष्ट हुए बिना वैध नामावली नहीं रख सकता।
न्यायालय ने दो बातों के बीच रेखा खींची। नागरिकता का न्यायनिर्णयन, अर्थात् प्रस्थिति का निर्णायक निर्धारण, केवल नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी का काम है। आयोग का काम पात्रता पर प्रशासनिक संतुष्टि है: निर्वाचन प्रयोजन के लिए प्रथम दृष्टया और संदर्भगत आकलन, जिसमें पहले से दर्ज लोगों के पक्ष की उपधारणा का ध्यान रहे, और जो न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हो।
- आयोग क्या कर सकता है: सामग्री पर भरोसा न हो तो नामांकन रोक सकता है या नाम हटाने की कार्यवाही शुरू कर सकता है।
- उसके निर्णय का अर्थ: केवल इतना कि वह नामावली के लिए शर्तों के पूरा होने से संतुष्ट नहीं; यह घोषणा नहीं कि व्यक्ति नागरिक नहीं है।
- आगे क्या होना है: मामला केंद्र के सक्षम प्राधिकारी के पास जाता है, जिसे उचित समय में और अगले चुनाव से पहले निर्णय देना है; कोई भी विलोपन उस परिणाम के अधीन रहता है।
भारत में मताधिकार: अनुच्छेद 326 के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार
अनुच्छेद 325 और 326, वयस्क मताधिकार और इकसठवाँ संशोधन
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अर्थ है कि सभी वयस्क नागरिक मत देने के पात्र हैं। अनुच्छेद 325 किसी को धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर नामावली से बाहर करने से रोकता है, और अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन वयस्क मताधिकार पर आधारित करता है। 1989 तक वयस्क का अर्थ 21 वर्ष से अधिक का नागरिक था; संविधान (इकसठवाँ संशोधन) अधिनियम, 1989 ने आयु घटाकर 18 की।
मताधिकार भाग III का मूल अधिकार नहीं है। नागरिकता अधिनियम की धारा 6क वाले मामले (2024) में, जिसे इस निर्णय में उद्धृत किया गया, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायिक व्याख्या से यह अधिकार मात्र वैधानिक अधिकार से उठकर अनुच्छेद 326 के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार बन गया है, राजबाला बनाम हरियाणा राज्य के अनुसरण में। यह निरपेक्ष नहीं है: पहचान, निवास और पात्रता की जाँच ऐसी शर्तें हैं जो मताधिकार को छीनती नहीं, बचाती हैं।
SIR निर्णय की आलोचना और पुनरीक्षण के अगले चरण
चिंताएँ: विलोपन, समय-सीमा और पश्चवर्ती पुष्टि
आलोचकों का तर्क है कि निर्णय तब आया जब यह अभ्यास बिहार में और दूसरे चरण में बारह अन्य राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों में तय तथ्य बन चुका था, इसलिए उसने बाद में जाकर उसे वैधता दी।
- विलोपन का पैमाना: पूरे अभ्यास में नामावलियाँ 10% से अधिक घटीं, लगभग 6.5 करोड़ नाम हटे, और तमिलनाडु को छोड़ अधिकांश राज्यों की नामावलियों में लिंगानुपात बिना स्पष्टीकरण के गिरा।
- व्यवहार नहीं, सिद्धांत पर तर्क: धारा 21(3) एक असाधारण शक्ति है जो “विहित रीति” का सुरक्षा उपाय छोड़ देती है, और दर्ज निर्वाचकों से पहले से प्राप्त अधिकार फिर सिद्ध करवाना उस उपधारणा को कमज़ोर करता है जिसके बने रहने की बात न्यायालय ने कही।
- समय-सीमा: विपक्ष के नेताओं ने समय-सारणी को अत्यधिक संकुचित बताया और विलोपन सूचियों, कारणों और आधार पर न्यायालय के अपने हस्तक्षेपों की ओर इशारा किया।
- अपील में बहाली: पश्चिम बंगाल में अपीलीय अधिकरणों ने 14 मई 2026 तक 6,581 अपीलें निपटाईं और 4,043 निर्वाचकों, लगभग 61%, के नाम बहाल किए, जबकि लगभग 25 लाख अपीलें लंबित बताई गईं।
दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल सहित 12 राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के 51 करोड़ मतदाता आए, और यह निर्णय आगे के दौरों को दिशा देगा। उदाहरण के लिए, दिल्ली में SIR 30 जून 2026 से शुरू होना था, प्रारूप नामावली 5 अगस्त को और अंतिम नामावली 7 अक्टूबर को।
विशेष गहन पुनरीक्षण UPSC: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II
UPSC और PCS पाठ्यक्रम में निर्वाचन, निर्वाचन आयोग और नागरिकता
यह निर्णय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में आता है: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ, संवैधानिक निकायों में नियुक्ति और उनकी शक्तियाँ, और नागरिकता से जुड़े संविधान के उपबंध। राज्य लोक सेवा परीक्षाएँ भी राजव्यवस्था के इन्हीं विषयों पर प्रश्न पूछती हैं।
- प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: निर्णय 27 मई 2026; पीठ मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची; लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के साथ अनुच्छेद 324; बिहार की नामावली पहले 7.89 करोड़ और बाद में 7.42 करोड़; आधार केवल पहचान के दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार; मताधिकार अनुच्छेद 326 के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार।
- मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: आयोग की संवैधानिक शक्ति और संसदीय विधि के बीच संतुलन, आनुपातिकता, दर्ज निर्वाचकों के पक्ष की उपधारणा, और प्रशासनिक संतुष्टि तथा नागरिकता के न्यायनिर्णयन के बीच की रेखा।
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2026, सामान्य अध्ययन-IIक्या मताधिकार एक मौलिक अधिकार है? निर्वाचक नामावली का पुनरीक्षण करते हुए भारत के निर्वाचन आयोग की प्रस्थिति की विवेचना कीजिए। क्या यह निर्वाचकों की नागरिकता के प्रश्न का भी परीक्षण कर सकता है?
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: आरंभ में अनुच्छेद 326 के सार्वभौम वयस्क मताधिकार और आयोग की भूमिका पर नवीनतम मत के रूप में 27 मई 2026 के SIR निर्णय का उल्लेख करें।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- मताधिकार: भाग III का मूल अधिकार नहीं; अनुच्छेद 326 के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार (राजबाला; धारा 6क का मामला, 2024), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम से विनियमित और सत्यापन के अधीन।
- पुनरीक्षण में आयोग: अनुच्छेद 324 के अंतर्गत नामावली का अधीक्षण; धारा 21(3) के अंतर्गत किसी भी समय, लेखबद्ध कारणों से, ठीक समझी रीति से विशेष पुनरीक्षण; स्पष्ट विधि से बँधा (मोहिंदर सिंह गिल; ए.सी. जोस); नियम 21क और धारा 24 के अंतर्गत नोटिस, सुनवाई और अपील के सुरक्षा उपाय।
- नागरिकता: धारा 16 नागरिकता को नामांकन की शर्त बनाती है, इसलिए आयोग सीमित जाँच कर सकता है; वह न्यायनिर्णयन नहीं कर सकता, न किसी को अ-नागरिक घोषित कर सकता है; संदिग्ध मामले सक्षम प्राधिकारी के पास, जो अगले चुनाव से पहले निर्णय दे।
निष्कर्ष: निष्कर्ष में कहें कि मताधिकार सही नामावली और निष्पक्ष प्रक्रिया, दोनों से सुरक्षित रहता है, और आयोग की शक्ति व्यापक है पर सीमित भी।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2017 (हिंदी रूपांतर)भारत में मत देने और निर्वाचित होने का अधिकार एक
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: चरण 1: मताधिकार भाग III में नहीं है, इसलिए यह मूल अधिकार नहीं। चरण 2: अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार पर आधारित निर्वाचनों की गारंटी देता है, और उच्चतम न्यायालय ने मताधिकार को वैधानिक से उठाकर संवैधानिक अधिकार माना है। चरण 3: उत्तर (c)।
इस भ्रम से बचें: पुरानी पुस्तकें इसे केवल वैधानिक या विधिक अधिकार कहती हैं; न्यायालय का बाद का मत इसे संविधान में रखता है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) मूल अधिकार: गलत। मताधिकार भाग III के मूल अधिकारों में नहीं है।
- (b) नैसर्गिक अधिकार: गलत। यह संविधान और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम से बना और विनियमित है, प्रकृति से नहीं।
- (c) संवैधानिक अधिकार: सही। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है, और न्यायालय इसे संवैधानिक अधिकार कहता है।
- (d) विधिक अधिकार: गलत। न्यायालय ने माना कि यह मात्र वैधानिक अधिकार से उठकर संवैधानिक अधिकार बना।
उत्तर: संवैधानिक अधिकार: विकल्प (c), जो आधिकारिक उत्तर है।
स्रोत
- Supreme Court of India: Association for Democratic Reforms v. Election Commission of India, W.P.(C) No. 640 of 2025, judgment of 27 May 2026
- Representation of the People Act, 1950 (as amended)
- NCERT: Indian Constitution at Work (Class XI), Chapter 3, Election and Representation
- Wikipedia: Aadhaar
- Wikipedia: Election Commission of India
- The Hindu, Delhi, 28 May 2026: SC upholds SIR, says it is EC's constitutional duty
- The Hindu, Delhi, 28 May 2026: reactions to the verdict, Delhi's SIR schedule, West Bengal appeals
- The Hindu, Delhi, 29 May 2026: Editorial, Validating flaws
- The Hindu, Delhi, 29 May 2026: What did the court rule on Bihar's SIR of electoral rolls?
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख उच्चतम न्यायालय के निर्णय और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
