परिचय

ध्वनि तरंगें यांत्रिक, अनुदैर्ध्य तरंगें हैं: कंपन करती वस्तु किसी ठोस, द्रव या गैस में संपीडनों और विरलनों की एक शृंखला भेजती है, और ये तरंगें निर्वात को पार नहीं कर सकतीं। आवृत्ति से इनका तारत्व, आयाम से प्रबलता और अधिस्वरकों के मिश्रण से गुणता तय होती है; ध्वनि की चाल माध्यम और उसके ताप पर निर्भर करती है, और परावर्तन, डॉप्लर प्रभाव तथा पराश्रव्य ध्वनि से प्रतिध्वनि, सोनार और चिकित्सा स्कैन संभव होते हैं।

ध्वनि तरंगें: यांत्रिक और अनुदैर्ध्य तरंगें

ध्वनि तरंगों को यांत्रिक तरंगें क्यों कहते हैं

हर ध्वनि किसी कंपन से शुरू होती है, अर्थात् किसी वस्तु की तेज़ी से होने वाली आगे-पीछे की गति से। मनुष्य की आवाज़ कंपन करते वाक्-तंतुओं से निकलती है, और खिंचा हुआ रबड़ का छल्ला छेड़ने पर गुनगुनाता है। कंपन करती वस्तु अपने पास के माध्यम के कणों को गति देती है; हर कण अपने पड़ोसी कण को विस्थापित करके अपनी जगह लौट आता है, इसलिए विक्षोभ आगे बढ़ता जाता है, जबकि कण अपनी जगह पर ही रहते हैं।

तरंगें तीन प्रकार की होती हैं। जल तरंगें, ध्वनि तरंगें और भूकंपीय तरंगें जैसी यांत्रिक तरंगें न्यूटन के गति के नियमों का पालन करती हैं और केवल जल, वायु या चट्टान जैसे किसी द्रव्यात्मक माध्यम में ही बनी रहती हैं। प्रकाश और रेडियो तरंगों जैसी विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, और निर्वात में वे सब एक ही चाल, 299,792,458 मीटर प्रति सेकंड, से चलती हैं। द्रव्य तरंगें गतिमान इलेक्ट्रॉनों, प्रोटॉनों और परमाणुओं की होती हैं, और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी इन्हीं का उपयोग करते हैं।

एक सरल प्रयोग दिखाता है कि ध्वनि को माध्यम चाहिए। वायुरुद्ध काँच के जार के भीतर लटकी बिजली की घंटी की आवाज़ जार से वायु निकालने के साथ धीमी होती जाती है, यद्यपि घंटी में उतनी ही धारा बहती रहती है। बहुत कम वायु बचने पर केवल क्षीण ध्वनि सुनाई देती है: घंटी अब भी कंपन करती है, पर उसकी ध्वनि ले जाने के लिए लगभग कोई वायु नहीं बचती।

अनुदैर्ध्य तरंग: संपीडन और विरलन

अनुदैर्ध्य तरंग (longitudinal wave) वह तरंग है, जिसमें माध्यम के कण तरंग के चलने की दिशा के समांतर आगे-पीछे दोलन करते हैं, जैसे खिंची हुई स्लिंकी के एक सिरे को धकेलने पर उसके कुंडल करते हैं। ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें हैं। अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) में, जैसे डोरी पर भेजे गए स्पंद में, कण तरंग के चलने की दिशा के लंबवत् गति करते हैं।

कंपन करती वस्तु जब आगे बढ़ती है, तो अपने सामने की वायु को धकेलकर दबाती है और अधिक दाब का एक क्षेत्र बनाती है, जिसे संपीडन (compression) कहते हैं। जब वह पीछे लौटती है, तो कम दाब का एक क्षेत्र छोड़ जाती है, जिसे विरलन (rarefaction) कहते हैं। वस्तु के तेज़ी से आगे-पीछे होने पर संपीडनों और विरलनों की एक शृंखला बाहर की ओर चलती है, इसलिए ध्वनि घनत्व और दाब के परिवर्तनों का चलता हुआ पैटर्न है।

ऊपर: वायु की परतें खड़ी रेखाओं के रूप में, जो संपीडनों (सं) पर पास-पास सटी हैं और विरलनों (वि) पर दूर-दूर फैली हैं। नीचे: वही तरंग औसत के ऊपर-नीचे घनत्व के वक्र के रूप में, जिसमें शृंग संपीडनों पर और गर्त विरलनों पर हैं; एक संपीडन से अगले संपीडन तक की दूरी तरंगदैर्ध्य है, और तरंग दाईं ओर चलती है। टिप्पणी: चाल तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति के गुणनफल के बराबर है; कण केवल आगे-पीछे कंपन करते हैं, जबकि विक्षोभ आगे बढ़ता है।
  • अनुदैर्ध्य तरंगों का माध्यम: उन्हें ऐसा माध्यम चाहिए, जो संपीडन का प्रतिरोध करे, इसलिए वे ठोसों, द्रवों और गैसों, तीनों में चलती हैं।
  • अनुप्रस्थ तरंगों का माध्यम: उन्हें ऐसा माध्यम चाहिए, जो अपरूपण का प्रतिरोध करे, इसलिए वे ठोसों में और डोरियों पर चलती हैं, तरलों में नहीं।
  • स्टील की छड़ और चट्टान: ये दोनों प्रकार की तरंगें ले जाती हैं, जबकि वायु केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ले जाती है।
  • प्रकाश तरंगें: ये अनुप्रस्थ हैं, पर यांत्रिक नहीं, क्योंकि उनमें किसी माध्यम के कण कंपन नहीं करते; प्रकाश तरंगों की व्याख्या प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन वाले लेख में है।

ध्वनि के अभिलक्षण: तारत्व, प्रबलता और गुणता

आवृत्ति, तरंगदैर्ध्य और तारत्व

किसी ध्वनि तरंग का वर्णन उसकी आवृत्ति, आयाम और चाल से होता है। दो क्रमागत संपीडनों, या दो क्रमागत विरलनों, के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य (wavelength) है, जिसे मीटर में मापते हैं। एक सेकंड में घनत्व के पूरे दोलनों की संख्या आवृत्ति (frequency) है, जिसे हर्ट्ज़ में मापते हैं, और एक दोलन में लगा समय आवर्तकाल है; इसलिए आवृत्ति एक बटा आवर्तकाल के बराबर होती है।

चाल, तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति आपस में बँधी हैं: चाल = तरंगदैर्ध्य × आवृत्ति। इसलिए 2 किलोहर्ट्ज़ आवृत्ति और 35 सेंटीमीटर तरंगदैर्ध्य वाली तरंग 700 मीटर प्रति सेकंड से चलती है और 1.5 किलोमीटर की दूरी 2.1 सेकंड में तय करती है। किसी एक माध्यम में, समान परिस्थितियों में, ध्वनि की चाल सभी आवृत्तियों के लिए लगभग समान रहती है, इसलिए ऊँचे स्वर की तरंगदैर्ध्य छोटी होती है और नीचे तारत्व वाले स्वर की लंबी।

तारत्व (pitch) वह है, जिस रूप में मस्तिष्क आवृत्ति को ग्रहण करता है। स्रोत जितनी तेज़ी से कंपन करता है, आवृत्ति उतनी अधिक और तारत्व उतना ऊँचा होता है, इसलिए ऊँचे तारत्व की ध्वनि हर सेकंड किसी बिंदु से अधिक संपीडन और विरलन गुज़ारती है। अलग-अलग आकार और दशा की वस्तुएँ अलग-अलग आवृत्तियों पर कंपन करती हैं। आवृत्ति के मात्रक का नाम हाइनरिख रुडोल्फ़ हर्ट्ज़ के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने प्रयोग से मैक्सवेल के विद्युत्चुम्बकीय सिद्धांत की पुष्टि की थी।

आयाम, प्रबलता, तीव्रता और डेसिबेल पैमाना

ध्वनि तरंग का आयाम माध्यम में औसत मान के दोनों ओर होने वाला सबसे बड़ा विक्षोभ है। यह इस पर निर्भर करता है कि वस्तु को कितने ज़ोर से कंपित किया गया: मेज़ पर हल्का आघात कम ऊर्जा की धीमी ध्वनि देता है, और ज़ोर का आघात प्रबल ध्वनि। प्रबलता (loudness) मुख्यतः आयाम से तय होती है। प्रबल ध्वनि अधिक ऊर्जा ले जाती है, इसलिए अधिक दूर तक जाती है, और हर ध्वनि अपने स्रोत से फैलते हुए, आयाम घटने के साथ, धीमी होती जाती है।

  • तीव्रता: इकाई क्षेत्रफल से होकर प्रति सेकंड गुज़रने वाली ध्वनि-ऊर्जा, एक भौतिक राशि।
  • प्रबलता: उस तीव्रता के प्रति कान की अनुक्रिया; समान तीव्रता की दो ध्वनियाँ असमान रूप से प्रबल लग सकती हैं, क्योंकि कान उनमें से एक को बेहतर पकड़ता है।
  • डेसिबेल (dB): बेल का दसवाँ भाग, अलेक्ज़ेंडर ग्राहम बेल के नाम पर एक लघुगणकीय मात्रक; शक्ति में दस गुना वृद्धि स्तर में 10 dB की वृद्धि है।
  • ध्वनि नियमों की इकाई dB(A): भारत के ध्वनि नियम अपनी सीमाएँ इसी रूप में बताते हैं।

गुणता या टिम्बर: स्वर, सुस्वर ध्वनि और गुणावृत्तियाँ

गुणता (timbre या quality) वह अभिलक्षण है, जिससे हम समान तारत्व और प्रबलता की दो ध्वनियों को अलग पहचानते हैं। ऑर्केस्ट्रा में एक साथ बजते वायलिन और बाँसुरी की ध्वनियाँ एक ही वायु से, एक ही चाल से, कान तक पहुँचती हैं, फिर भी अलग सुनाई देती हैं। एक ही आवृत्ति की ध्वनि स्वर (tone) है; कई आवृत्तियों के मिश्रण वाली ध्वनि सुस्वर ध्वनि (note) है, जो सुनने में सुखद लगती है, जबकि शोर कान को अप्रिय लगता है।

वाद्ययंत्रों की गुणता इसलिए अलग होती है कि हर वाद्य अपनी सबसे कम, अर्थात् मूल, आवृत्ति के साथ अधिस्वरकों का अलग मिश्रण उत्पन्न करता है। गुणावृत्तियाँ (harmonics) वे अधिस्वरक हैं, जो मूल आवृत्ति के पूर्ण-संख्या गुणज होते हैं: उसके दो, तीन, चार गुने, और इसी तरह आगे। गुणता को तय करने वाली भौतिक विशेषताएँ ध्वनि का आवृत्ति-स्पेक्ट्रम और उसका आवरण (envelope) हैं, और वायलिन-वादक गज को अलग ढंग से चलाकर या तार के अलग भागों पर बजाकर इसे बदल सकता है।

ठोसों, द्रवों और गैसों में ध्वनि की चाल

वायु, जल और स्टील में ध्वनि की चाल

बिजली की चमक दिखने के कुछ देर बाद गर्जन सुनाई देता है, क्योंकि ध्वनि प्रकाश से बहुत धीमी चलती है। ध्वनि की चाल माध्यम और उसके ताप पर निर्भर करती है: ठोसों से द्रवों और फिर गैसों की ओर जाने पर यह घटती है, और किसी भी माध्यम में ताप बढ़ने के साथ बढ़ती है। ठोस और द्रव गैसों से बहुत अधिक सघन होते हैं, फिर भी उनमें ध्वनि तेज़ चलती है, क्योंकि उन्हें संपीडित करना बहुत कठिन होता है।

25 डिग्री सेल्सियस पर कुछ माध्यमों में ध्वनि की चाल।
माध्यम अवस्था चाल (मीटर प्रति सेकंड)
ऐलुमिनियम ठोस 6,420
स्टील ठोस 5,960
फ्लिंट काँच ठोस 3,980
समुद्री जल द्रव 1,531
आसुत जल द्रव 1,498
हाइड्रोजन गैस 1,284
वायु गैस 346
ऑक्सीजन गैस 316

वायु में मुख्य कारक ताप है। स्थिर ताप पर दाब बदलने से ध्वनि की चाल नहीं बदलती, क्योंकि घनत्व भी उसी अनुपात में बदलता है और दोनों प्रभाव एक-दूसरे को निरस्त कर देते हैं। निश्चित संघटन वाली किसी गैस में चाल केवल ताप पर निर्भर करती है और परम ताप के वर्गमूल के अनुपात में बदलती है, और नम वायु शुष्क वायु से अधिक तेज़ी से ध्वनि ले जाती है।

न्यूटन का सूत्र और ध्वनि की चाल में लाप्लास संशोधन

किसी गैस में ध्वनि की चाल सबसे पहले न्यूटन ने निकाली। उन्होंने माना कि ध्वनि तरंग में दाब के परिवर्तन स्थिर ताप पर, अर्थात् समतापी (isothermal) रूप में, होते हैं। उनके सूत्र से मानक ताप और दाब पर वायु के लिए लगभग 280 मीटर प्रति सेकंड का मान मिला, जो मापे गए 331 मीटर प्रति सेकंड से लगभग 15 प्रतिशत कम है।

लाप्लास ने यह त्रुटि पकड़ी। ध्वनि तरंग के संपीडन और विरलन इतनी तेज़ी से एक के बाद एक आते हैं कि ताप को स्थिर रखने के लिए ऊष्मा के बहने का समय ही नहीं मिलता, इसलिए ये परिवर्तन समतापी नहीं, रुद्धोष्म (adiabatic) होते हैं। सूत्र को वायु की दो विशिष्ट ऊष्माओं के अनुपात, 7/5, से संशोधित करने पर 331.3 मीटर प्रति सेकंड मिलता है, जो मापे गए मान से मेल खाता है; यही लाप्लास संशोधन (Laplace correction) है।

मैक संख्या, पराध्वनिक चाल और ध्वनि बूम

मैक संख्या (Mach number), जिसका नाम ऑस्ट्रिया के भौतिकविद् अर्न्स्ट मैक के नाम पर रखा गया है, किसी वस्तु की चाल और उस स्थान पर ध्वनि की चाल का अनुपात है। मैक 1 पर वस्तु ठीक ध्वनि की चाल से चलती है; मैक 0.65 पर वह उस चाल के 65 प्रतिशत से चलती है, जो अवध्वनिक (subsonic) है, और मैक 1.35 पर उससे 35 प्रतिशत तेज़, जो पराध्वनिक (supersonic) है। गोलियाँ और जेट विमान प्रायः पराध्वनिक चाल से चलते हैं।

उस स्थान पर ध्वनि की चाल ताप पर निर्भर करती है, इसलिए मैक 1 कोई स्थिर चाल नहीं है। 11 किलोमीटर की ऊँचाई तक ताप सामान्यतः ऊँचाई के साथ घटता है, और उसके साथ ध्वनि की चाल भी: समुद्र तल पर 340.3 मीटर प्रति सेकंड, जबकि 11 किलोमीटर पर 295.0 मीटर प्रति सेकंड। ध्वनि की चाल फिर से केवल लगभग 20 किलोमीटर से ऊपर समतापमंडल में बढ़ती है, इसलिए 15 किलोमीटर पर मैक 1 से उड़ता विमान समुद्र तल के पास मैक 1 से उड़ते विमान से धीमा होता है।

ध्वनि से तेज़ चलता स्रोत अपनी ही दाब तरंगों से आगे निकल जाता है, और वे तरंगें जुड़कर प्रघाती तरंगें (shock waves) बनाती हैं, जो बहुत अधिक ऊर्जा ले जाती हैं। इनसे उत्पन्न तीखी, प्रबल आवाज़ को ध्वनि बूम (sonic boom) कहते हैं। यह ध्वनि-अवरोध पार करने के क्षण का एक धमाका भर नहीं है: बूम लगातार बना रहता है, और विमान जिनके ऊपर से गुज़रता है, वे सब इसे सुनते हैं; पराध्वनिक विमान की प्रघाती तरंगें काँच तोड़ सकती हैं और इमारतों को भी हानि पहुँचा सकती हैं। चाबुक की तड़ाक एक छोटा ध्वनि बूम है।

ध्वनि का परावर्तन: प्रतिध्वनि, अनुरणन और अनुनाद

प्रतिध्वनि, अनुरणन और ध्वनि का बहुल परावर्तन

किसी सतह से परावर्तित होकर थोड़ी देर बाद लौटी ध्वनि प्रतिध्वनि (echo) है: किसी ऊँची इमारत या पर्वत के पास दी गई आवाज़ इसी तरह लौटकर सुनाई देती है। ध्वनि का परावर्तन वैसे ही होता है, जैसे रबड़ की गेंद दीवार से टकराकर लौटती है: ध्वनि किसी ठोस या द्रव की सतह से लौटती है और प्रकाश की तरह ही परावर्तन के नियमों का पालन करती है, अर्थात् आपतित और परावर्तित दिशाएँ अभिलंब से बराबर कोण बनाती हैं, और आपतित दिशा, परावर्तित दिशा तथा अभिलंब तीनों एक ही तल में होते हैं। इसके लिए बड़ा अवरोध चाहिए, चिकना हो या खुरदरा।

ध्वनि की संवेदना मस्तिष्क में लगभग 0.1 सेकंड तक बनी रहती है, इसलिए अलग प्रतिध्वनि तभी सुनाई देती है, जब परावर्तित ध्वनि कम से कम 0.1 सेकंड बाद लौटे। 344 मीटर प्रति सेकंड पर ध्वनि को जाने और लौटने में 34.4 मीटर तय करने होते हैं, इसलिए परावर्तक सतह कम से कम 17.2 मीटर दूर होनी चाहिए। बादलों और धरती से बार-बार होने वाले परावर्तन से ही बादलों की गड़गड़ाहट देर तक गूँजती है।

किसी बड़े सभागार में दीवारों से बार-बार परावर्तन के कारण ध्वनि तब तक बनी रहती है, जब तक वह सुनाई देने की सीमा से नीचे न चली जाए; ध्वनि का यह बने रहना अनुरणन (reverberation) है। सभागार में अधिक अनुरणन अवांछनीय है, इसलिए छत और दीवारों पर संपीडित फ़ाइबर बोर्ड, खुरदरा प्लास्टर या पर्दे जैसे ध्वनि-अवशोषक पदार्थ लगाए जाते हैं, और सीटें भी इस आधार पर चुनी जाती हैं कि वे ध्वनि को कितना अवशोषित करती हैं।

  • मेगाफ़ोन, हॉर्न, तुरही और शहनाई: नली के बाद शंक्वाकार मुख ध्वनि को परावर्तित करके श्रोताओं की ओर आगे भेजता है।
  • स्टेथोस्कोप में बहुल परावर्तन: हृदय की धड़कन की ध्वनि बार-बार परावर्तित होकर डॉक्टर के कानों तक पहुँचती है।
  • वक्राकार छत और ध्वनि-पट्ट: ये परावर्तित ध्वनि को संगीत-सभागार या सम्मेलन-कक्ष के हर कोने तक फैलाते हैं।

वाद्ययंत्रों में अनुनाद, अप्रगामी तरंगें और विस्पंद

जब दोनों सिरों पर बँधी डोरी पर कोई तरंग परावर्तित होकर लौटती है, तो जाती और लौटती तरंगें मिलकर अप्रगामी तरंग (standing wave) बनाती हैं, ऐसा पैटर्न जो डोरी पर आगे नहीं बढ़ता। शून्य आयाम वाले बिंदु, जिन्हें निस्पंद (nodes) कहते हैं, आधी तरंगदैर्ध्य की दूरी पर होते हैं। बँधे सिरों के बीच केवल कुछ ही तरंगदैर्ध्य समा सकती हैं, इसलिए डोरी कुछ स्वाभाविक आवृत्तियों पर कंपन करती है, जो सबसे कम आवृत्ति, अर्थात् मूल विधा या प्रथम गुणावृत्ति, की पूर्ण-संख्या गुणज होती हैं।

वायु-स्तंभ भी इसी तरह व्यवहार करता है। दोनों सिरों पर खुले पाइप की स्वाभाविक आवृत्तियाँ ध्वनि की चाल और पाइप की दुगुनी लंबाई के अनुपात की पूर्ण-संख्या गुणज होती हैं; एक सिरे पर बंद पाइप में केवल विषम गुणावृत्तियाँ होती हैं। हर स्वाभाविक आवृत्ति एक अनुनादी आवृत्ति है: उसी आवृत्ति का स्रोत स्तंभ को ज़ोर से कंपित कर देता है, और यही अनुनाद (resonance) है। लंबाई बढ़ने पर आवृत्ति घटती है, इसलिए छोटी बाँसुरी ऊँचा स्वर देती है।

लगभग बराबर आवृत्ति की दो ध्वनियाँ, जैसे 256 और 260 हर्ट्ज़, एक साथ सुनने पर प्रबलता में धीमा चढ़ाव-उतार सुनाई देता है, जिसे विस्पंद (beats) कहते हैं; यह दोनों आवृत्तियों के अंतर की दर से दोहराता है, यहाँ एक सेकंड में 4 बार। संगीतज्ञ अपने वाद्य मिलाने में विस्पंदों का उपयोग करते हैं: किसी मानक आवृत्ति के साथ बजाए जा रहे वाद्य को तब तक मिलाया जाता है, जब तक विस्पंद मिट न जाएँ।

डॉप्लर प्रभाव, अवश्रव्य और पराश्रव्य ध्वनि

डॉप्लर प्रभाव: गुज़रते सायरन का तारत्व क्यों बदलता है

योहान क्रिश्चियन डॉप्लर ने 1842 में यह प्रभाव प्रस्तावित किया, और बाइस बैलट ने 1845 में हॉलैंड में प्रयोग से इसकी जाँच की। गतिमान स्रोत अपने आगे तरंगों को पास-पास सटा देता है और पीछे फैला देता है, इसलिए आगे खड़े श्रोता तक हर सेकंड अधिक तरंगें पहुँचती हैं, अर्थात् अधिक आवृत्ति और ऊँचा तारत्व, और पीछे खड़े श्रोता तक कम। श्रोता स्वयं किसी स्थिर स्रोत की ओर तेज़ी से बढ़े, तो भी तारत्व ऊँचा होता है, और दूर जाए तो नीचा।

दाईं ओर चलता ध्वनि-स्रोत वृत्ताकार तरंगाग्र छोड़ता जाता है, जो उसके आगे पास-पास सटे और पीछे दूर-दूर फैले हैं। आगे खड़ा श्रोता अधिक आवृत्ति और ऊँचा तारत्व सुनता है; पीछे खड़ा श्रोता कम आवृत्ति और नीचा तारत्व। टिप्पणी: इस प्रभाव का उपयोग पुलिस रडार में चाल मापने, चिकित्सा में रक्त-प्रवाह और भ्रूण की धड़कन देखने, और खगोलविज्ञान में तारों और आकाशगंगाओं की चाल मापने में होता है।

यह प्रभाव सभी तरंगों पर लागू होता है, ध्वनि पर भी और विद्युत्चुम्बकीय तरंगों पर भी। किसी गतिमान वस्तु से परावर्तित तरंग की आवृत्ति में आया बदलाव, डॉप्लर विस्थापन (Doppler shift), उस वस्तु की चाल बता देता है, इसीलिए जहाँ भी दूर से चाल मापनी हो, वहाँ इस प्रभाव का उपयोग होता है।

  • पुलिस द्वारा चाल की जाँच: वाहनों से परावर्तित तरंगों के विस्थापन से तेज़ गति से चलते वाहन पकड़े जाते हैं।
  • हवाई अड्डे और रक्षा: इससे विमानों का मार्गदर्शन होता है और शत्रु के विमानों का पता चलता है।
  • चिकित्सा में डॉप्लर सोनोग्राफी: पराश्रव्य डॉप्लर सोनोग्राफी रक्त-प्रवाह, हृदय के वाल्वों की गति और भ्रूण की धड़कन देखती है; हृदय का चित्र इकोकार्डियोग्राम कहलाता है।
  • खगोलविज्ञान में लाल और नीला विस्थापन: प्रकाश के रेडशिफ़्ट और ब्लूशिफ़्ट से पता चलता है कि तारे और आकाशगंगाएँ किस चाल से दूर जा रही हैं या पास आ रही हैं।

श्रव्यता का परास और अवश्रव्य ध्वनि

मनुष्य का कान लगभग 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़ तक सुनता है। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे और कुत्ते जैसे कुछ जंतु 25 किलोहर्ट्ज़ तक सुन सकते हैं, और आयु बढ़ने के साथ कान ऊँची आवृत्तियों के प्रति कम संवेदनशील होते जाते हैं। 20 हर्ट्ज़ से कम आवृत्ति की ध्वनि अवश्रव्य ध्वनि (infrasound) है, और 20 किलोहर्ट्ज़ से अधिक की ध्वनि पराश्रव्य ध्वनि।

तीन भागों में बँटी एक पट्टी। अवश्रव्य ध्वनि, 20 हर्ट्ज़ से कम: गैंडे 5 हर्ट्ज़ तक की ध्वनि से संवाद करते हैं, व्हेल और हाथी इसे उत्पन्न करते हैं, और भूकंप इसे छोड़ते हैं। मनुष्य के लिए श्रव्य, 20 हर्ट्ज़ से 20,000 हर्ट्ज़: मनुष्य की वाणी और संगीत; बच्चे और कुत्ते 25 किलोहर्ट्ज़ तक सुनते हैं। पराश्रव्य ध्वनि, 20,000 हर्ट्ज़ से अधिक: चमगादड़, डॉल्फ़िन और पॉरपॉइज़ इसका उपयोग करते हैं, और चिकित्सा स्कैन, सोनार तथा सफ़ाई में भी इसका उपयोग होता है। टिप्पणी: आयु बढ़ने के साथ कान ऊँची आवृत्तियों के प्रति कम संवेदनशील हो जाते हैं।

यदि हम अवश्रव्य ध्वनि सुन पाते, तो झूलता लोलक भी मधुमक्खी के पंखों जितना सुनाई देता। गैंडे 5 हर्ट्ज़ तक की अवश्रव्य ध्वनि से आपस में संवाद करते हैं, और व्हेल तथा हाथी अवश्रव्य परास में ध्वनि उत्पन्न करते हैं। कुछ जंतु भूकंप से पहले बेचैन हो जाते हैं, संभवतः क्योंकि भूकंप मुख्य प्रघाती तरंगों से पहले कम आवृत्ति की अवश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करता है।

  • दूर तक जाने की क्षमता: अवश्रव्य ध्वनि बहुत कम ऊर्जा खोकर अवरोधों के चारों ओर से निकल जाती है।
  • भूकंप और ज्वालामुखी की निगरानी: इसका उपयोग भूकंपों और ज्वालामुखियों पर नज़र रखने और धरती के नीचे की चट्टानों तथा पेट्रोलियम संरचनाओं का मानचित्र बनाने में होता है।
  • परमाणु परीक्षणों की निगरानी: 53 अवश्रव्य स्टेशनों का एक नेटवर्क उस अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली (International Monitoring System) का भाग है, जो व्यापक परमाणु-परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) के पालन की जाँच करती है।

पराश्रव्य ध्वनि के उपयोग और अल्ट्रासोनोग्राफी

ऊँची आवृत्ति के कारण पराश्रव्य ध्वनि अवरोधों के रहते भी सुनिश्चित पथ पर चलती है, और इसी से वह उद्योग और चिकित्सा में उपयोगी है। लंबी तरंगदैर्ध्य की साधारण ध्वनि किसी दोष के कोनों से मुड़कर फिर भी संसूचक तक पहुँच जाती है, इसलिए धातु के गुटके के भीतर छिपा दोष केवल पराश्रव्य ध्वनि ही पकड़ पाती है।

  • कठिन जगहों की सफ़ाई: सर्पिल नलियों और इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों जैसे, कठिनाई से पहुँचने वाले भागों को सफ़ाई-विलयन में रखकर उसमें पराश्रव्य तरंगें भेजी जाती हैं, और धूल, चिकनाई तथा मैल छूट जाते हैं।
  • धातु में दोषों का पता: धातु के गुटके से गुज़ारी गई पराश्रव्य ध्वनि छोटी-सी दरार या छिद्र से भी लौट आती है; बाहर से न दिखने वाले ऐसे दोष किसी पुल, इमारत या मशीन को कमज़ोर कर सकते हैं।
  • गुर्दे की पथरी तोड़ना: पराश्रव्य ध्वनि छोटी पथरियों को बारीक कणों में तोड़ देती है, जो मूत्र के साथ बाहर निकल जाते हैं।

अल्ट्रासोनोग्राफी में पराश्रव्य तरंगें शरीर के ऊतकों से गुज़रती हैं और जहाँ भी ऊतक का घनत्व बदलता है, वहाँ से परावर्तित होती हैं; ये प्रतिध्वनियाँ विद्युत संकेतों में और फिर अंग के प्रतिबिंब में बदली जाती हैं। डॉक्टर पथरी या ट्यूमर खोजने के लिए यकृत, पित्ताशय, गर्भाशय और गुर्दे का प्रतिबिंब लेते हैं, और गर्भावस्था में भ्रूण के दोषों और वृद्धि की समस्याओं की जाँच करते हैं। इकोकार्डियोग्राफी (echocardiography) इसी तरह हृदय का प्रतिबिंब बनाती है। यकृत और गुर्दे जैसे गहरे अंगों का प्रतिबिंब 1 से 6 मेगाहर्ट्ज़ पर, और पेशी तथा थायरॉइड जैसे उथले अंगों का 7 से 18 मेगाहर्ट्ज़ पर लिया जाता है।

सोनार और चमगादड़ों तथा पॉरपॉइज़ में प्रतिध्वनि-निर्धारण

सोनार (SONAR) का पूरा रूप Sound Navigation And Ranging है। जहाज़ पर लगा प्रेषित्र पराश्रव्य तरंगें भेजता है, जो जल में चलकर समुद्र-तल पर किसी वस्तु से टकराती हैं और एक संसूचक तक लौटती हैं, जो उन्हें विद्युत संकेतों में बदलता है। ध्वनि दूरी को दो बार तय करती है, इसलिए गहराई का दुगुना समुद्री जल में ध्वनि की चाल और भेजने तथा पाने के बीच के समय के गुणनफल के बराबर है; इस विधि को प्रतिध्वनि परास-निर्धारण (echo-ranging) कहते हैं।

  • गहराई का हल किया गया उदाहरण: समुद्री जल में 1,531 मीटर प्रति सेकंड पर समुद्र-तल से प्रतिध्वनि 3.42 सेकंड बाद मिले, तो गहराई 2,618 मीटर है।
  • सोनार के उपयोग: समुद्र की गहराई मापना और जल के भीतर की पहाड़ियाँ, घाटियाँ, पनडुब्बियाँ, हिमशैल और डूबे जहाज़ खोजना।
  • ध्वनि ही क्यों: ध्वनि तरंगें जल में रडार और प्रकाश तरंगों से अधिक दूर तक जाती हैं, इसलिए महासागर की खोज और मानचित्रण का साधन सोनार है।

सोनार सक्रिय या निष्क्रिय होता है। सक्रिय सोनार ध्वनि का एक स्पंद भेजता है और उसकी प्रतिध्वनि का समय मापकर किसी वस्तु की दूरी और दिशा निकालता है। निष्क्रिय सोनार (passive sonar) कुछ नहीं भेजता, केवल सुनता है, इसलिए वह उन सैन्य जलयानों के लिए उपयुक्त है, जो पकड़े नहीं जाना चाहते, और व्हेलों को सुनने वाले वैज्ञानिकों के लिए भी। जल के भीतर प्रतिध्वनि परास-निर्धारण करने वाले उपकरण का पहला पेटेंट 1912 में टाइटैनिक के डूबने के एक महीने बाद दायर हुआ, और पनडुब्बियों का सामना करने के लिए प्रथम विश्व युद्ध में सोनार विकसित हुआ।

चमगादड़ रात में शिकार खोजते और उड़ते समय ऊँचे तारत्व की पराश्रव्य चीखें निकालते हैं और अवरोधों तथा शिकार से लौटे उनके परावर्तन पकड़ते हैं; प्रतिध्वनि की प्रकृति चमगादड़ को बताती है कि वस्तु कहाँ है और कैसी है। यह प्रतिध्वनि-निर्धारण (echolocation) एक जैविक सोनार है। डॉल्फ़िन और पॉरपॉइज़ भी पराश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करती हैं, और पॉरपॉइज़ अँधेरे में राह खोजने और भोजन ढूँढ़ने में इसका उपयोग करती हैं; बदले में कुछ पतंगे पास आते चमगादड़ की चीखें समय रहते सुनकर बच निकलते हैं।

मानव कर्ण और ध्वनि प्रदूषण

मानव कर्ण की संरचना: हम कैसे सुनते हैं

कान श्रव्य आवृत्तियों पर वायु के दाब-परिवर्तनों को विद्युत संकेतों में बदलता है, जो श्रवण तंत्रिका (auditory nerve) से होकर मस्तिष्क तक जाते हैं। बाहरी कान, अर्थात् कर्ण-पल्लव (pinna), आसपास से ध्वनि एकत्र करता है, और ध्वनि श्रवण नलिका से होकर उसके सिरे पर तनी एक पतली झिल्ली तक पहुँचती है, जिसे कर्ण पटह (eardrum) कहते हैं।

  1. संपीडन कर्ण पटह को भीतर की ओर धकेलता है और विरलन उसे बाहर की ओर लौटने देता है, इसलिए कर्ण पटह कंपन करता है।
  2. मध्य कर्ण की तीन हड्डियाँ, मुग्दरक, निहाई और वलयक (hammer, anvil, stirrup), इन कंपनों को कई गुना बढ़ा देती हैं।
  3. मध्य कर्ण बढ़े हुए दाब-परिवर्तनों को आंतरिक कर्ण तक पहुँचाता है।
  4. आंतरिक कर्ण का कर्णावर्त (cochlea) उन्हें विद्युत संकेतों में बदलता है, जिन्हें मस्तिष्क ध्वनि के रूप में समझता है।

श्रवण-क्षमता खो चुके लोगों को श्रवण-यंत्र की आवश्यकता हो सकती है, जो बैटरी से चलने वाला एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसका माइक्रोफ़ोन ध्वनि को विद्युत संकेतों में बदलता है, एक प्रवर्धक उन्हें प्रबल करता है, और इसका स्पीकर प्रवर्धित संकेतों को फिर ध्वनि में बदलकर कान में भेजता है।

भारत में ध्वनि प्रदूषण नियम: क्षेत्र, लाउडस्पीकर और शिकायत

उद्योग, निर्माण-कार्य, जनरेटर सेटों, लाउडस्पीकरों, संगीत-प्रणालियों और वाहनों के हॉर्न से बढ़ता शोर मनुष्य के स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण को हानि पहुँचाता है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत बने ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 चार प्रकार के क्षेत्रों के लिए परिवेशी ध्वनि के मानक तय करते हैं: औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और शांत क्षेत्र। राज्य सरकारें हर क्षेत्र को इनमें से किसी एक श्रेणी में रखती हैं और उन्हें शोर को मानकों के भीतर रखना होता है।

  • शांत क्षेत्र की परिधि: अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और न्यायालयों के चारों ओर कम से कम 100 मीटर का क्षेत्र शांत क्षेत्र घोषित किया जा सकता है।
  • लाउडस्पीकर की अनुमति: इसके लिए लिखित अनुमति चाहिए, और रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक इसका उपयोग नहीं किया जा सकता, सिवाय सभागारों, सामुदायिक भवनों और बैंक्वेट हॉल जैसे बंद परिसरों के।
  • त्योहारों पर छूट: राज्य सांस्कृतिक या धार्मिक उत्सवों के अवसर पर, एक कैलेंडर वर्ष में अधिकतम पंद्रह दिनों के लिए, आधी रात तक इनकी अनुमति दे सकता है।
  • शिकायत का अधिकार: जब शोर का स्तर मानक से 10 dB(A) या अधिक ऊपर हो, तो कोई भी व्यक्ति प्राधिकारी से शिकायत कर सकता है।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2007 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. कम लंबाई की बाँसुरी कम आवृत्ति की तरंगें देती है।
    2. चट्टानों में ध्वनि केवल अनुदैर्ध्य प्रत्यास्थ तरंगों के रूप में चलती है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 2
    3. c 1 और 2 दोनों
    4. d न तो 1 और न ही 2
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन प्रश्न

    हल करने की विधि: कथन 1: वायु-स्तंभ की स्वाभाविक आवृत्ति उसकी लंबाई बढ़ने पर घटती है, इसलिए छोटी बाँसुरी कम नहीं, अधिक आवृत्ति देती है; कथन 1 गलत है। कथन 2: चट्टान जैसा ठोस संपीडन के साथ अपरूपण का भी प्रतिरोध करता है, इसलिए वह अनुदैर्ध्य के साथ अनुप्रस्थ तरंगें भी ले जाता है; 'केवल' शब्द कथन 2 को गलत बना देता है। दोनों में से कोई कथन सही नहीं है।

    इस भ्रम से बचें: कथन 2 का 'केवल' शब्द: ठोस अपरूपण तरंगें भी ले जाते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: गलत। छोटा वायु-स्तंभ अधिक आवृत्ति देता है, इसलिए कथन 1 असत्य है।
    • (b) केवल 2: गलत। चट्टान अनुदैर्ध्य के साथ अनुप्रस्थ तरंगें भी ले जाती है, इसलिए कथन 2 असत्य है।
    • (c) 1 और 2 दोनों: गलत। दोनों कथन असत्य हैं।
    • (d) न तो 1 और न ही 2: सही। छोटी बाँसुरी अधिक आवृत्ति देती है, और चट्टान दोनों प्रकार की तरंगें ले जाती है।

    उत्तर: न तो 1 और न ही 2: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2007 (हिंदी रूपांतर)कथन और कारण:
    1. कथन (A): मैक संख्या 1 पर चलता जेट विमान 15 किलोमीटर की ऊँचाई पर, समुद्र तल के पास मैक संख्या 1 पर चलने की तुलना में, अधिक तेज़ चलता है।
    2. कारण (R): ध्वनि का वेग आसपास के माध्यम के ताप पर निर्भर करता है।
    1. a A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है
    2. b A और R दोनों सही हैं, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
    3. c A सही है, पर R गलत है
    4. d A गलत है, पर R सही है
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: कथन और कारण

    हल करने की विधि: पहले कारण को परखिए: वायु में ध्वनि की चाल उसके ताप पर निर्भर करती है, इसलिए R सही है। फिर कथन को: 15 किलोमीटर पर वायु समुद्र तल से ठंडी है, इसलिए वहाँ ध्वनि की चाल, और उसके साथ मैक 1, कम है (11 किलोमीटर पर लगभग 295.0 मीटर प्रति सेकंड, जबकि समुद्र तल पर 340.3)। इसलिए 15 किलोमीटर पर मैक 1 वाला जेट धीमा चलता है, और A गलत है।

    इस भ्रम से बचें: मैक 1 कोई स्थिर चाल नहीं है; ऊँचाई की ठंडी वायु उसे धीमा कर देती है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) A और R सही, R से A की व्याख्या: गलत। A गलत है; 15 किलोमीटर पर मैक 1 समुद्र तल से धीमा है।
    • (b) A और R सही, पर R से A की व्याख्या नहीं: गलत। A गलत है, इसलिए यह विकल्प टिक नहीं सकता।
    • (c) A सही, R गलत: गलत। A गलत है, और R सही है: ध्वनि की चाल ताप पर निर्भर करती है।
    • (d) A गलत, R सही: सही। ऊँचाई की ठंडी वायु में मैक 1 कम चाल है, और ध्वनि की चाल सचमुच ताप पर निर्भर करती है।

    उत्तर: A गलत, R सही: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2006 (हिंदी रूपांतर)निम्नलिखित में से किसमें ध्वनि की चाल अधिकतम होती है?
    1. a 0 °C पर वायु
    2. b 100 °C पर वायु
    3. c जल
    4. d लकड़ी
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: पहले माध्यमों को अवस्था के अनुसार क्रम में रखिए: ध्वनि ठोसों में सबसे तेज़ चलती है, फिर द्रवों में, फिर गैसों में, क्योंकि ठोसों को संपीडित करना बहुत कठिन होता है। उसके बाद ही गैसों के भीतर ताप की तुलना कीजिए। लकड़ी अकेला ठोस है, इसलिए उसमें ध्वनि सबसे तेज़ चलती है।

    इस भ्रम से बचें: गर्म वायु ठंडी वायु से आगे है, पर कोई भी ठोस वायु और जल, दोनों से आगे है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) 0 °C पर वायु: गलत। चारों में यह सबसे धीमी है, 331 मीटर प्रति सेकंड।
    • (b) 100 °C पर वायु: गलत। गर्म वायु ठंडी वायु से तेज़ी से ध्वनि ले जाती है, पर कोई भी गैस द्रव या ठोस से बहुत धीमी है।
    • (c) जल: गलत। लगभग 1,500 मीटर प्रति सेकंड वायु से तेज़ है, पर ठोस इससे भी तेज़ है।
    • (d) लकड़ी: सही। सूची में यह अकेला ठोस है, और ठोसों में ध्वनि सबसे तेज़ चलती है।

    उत्तर: लकड़ी, अकेला ठोस: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)जब सितार और बाँसुरी पर एक ही स्वर बजाया जाता है, तो उत्पन्न ध्वनियों को एक-दूसरे से जिस अंतर के कारण अलग पहचाना जा सकता है, वह है
    1. a तारत्व, प्रबलता और गुणता
    2. b तारत्व और प्रबलता
    3. c केवल गुणता
    4. d केवल प्रबलता
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एक सही उत्तर

    हल करने की विधि: पहले यह तय कीजिए कि 'एक ही स्वर' क्या बराबर कर देता है: एक ही स्वर का तारत्व एक ही होता है। प्रबलता धीमे या ज़ोर से बजाकर बराबर की जा सकती है। जो बचता है, वह गुणता है, जो हर वाद्य के अधिस्वरकों के मिश्रण से तय होती है।

    इस भ्रम से बचें: एक ही स्वर का अर्थ है एक ही तारत्व, इसलिए तारत्व वाले विकल्प हट जाते हैं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) तारत्व, प्रबलता और गुणता: गलत। एक ही स्वर का तारत्व एक ही है, इसलिए तारत्व से दोनों अलग नहीं पहचाने जा सकते।
    • (b) तारत्व और प्रबलता: गलत। तारत्व एक ही है, और प्रबलता बराबर की जा सकती है।
    • (c) केवल गुणता: सही। हर वाद्य अधिस्वरकों का अपना मिश्रण जोड़ता है, जिससे हर एक की अपनी गुणता बनती है।
    • (d) केवल प्रबलता: गलत। समान प्रबलता पर भी दो वाद्य अपनी गुणता से अलग पहचाने जा सकते हैं।

    उत्तर: केवल गुणता: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।