परिचय
प्रकाश का परावर्तन और अपवर्तन वे दो तरीके हैं, जिनसे किसी पृष्ठ पर प्रकाश अपनी दिशा बदलता है: परावर्तन में प्रकाश परावर्तन के नियमों के अनुसार उसी माध्यम में लौट आता है, और अपवर्तन में चाल बदलने से वह स्नेल के नियम के अनुसार मुड़कर नए माध्यम में चला जाता है। पूर्ण आंतरिक परावर्तन, वर्ण विक्षेपण और प्रकीर्णन के साथ मिलकर ये दर्पण, लेंस, प्रकाशिक तंतु, इंद्रधनुष, नीले आकाश और मानव नेत्र के काम करने की व्याख्या करते हैं।
प्रकाश का परावर्तन: समतल, अवतल और उत्तल दर्पण
प्रकाश की प्रकृति और परावर्तन के नियम
प्रकाश सीधी रेखा में चलता प्रतीत होता है: छोटा प्रकाश-स्रोत किसी अपारदर्शी वस्तु की स्पष्ट छाया बनाता है, और प्रकाश के इस सीधे पथ को किरण के रूप में दिखाया जाता है। जब अवरोध बहुत छोटा हो, तो प्रकाश उसके किनारों से मुड़ जाता है; इसे विवर्तन कहते हैं, और तब प्रकाश को तरंग माना जाता है। कभी-कभी प्रकाश कणों की धारा की तरह भी व्यवहार करता है, और आधुनिक क्वांटम सिद्धांत इन दोनों रूपों को जोड़ता है।
कोई वस्तु हमें इसलिए दिखती है कि वह अपने ऊपर पड़ने वाले प्रकाश को हमारी आँखों की ओर लौटा देती है। दर्पण जैसा अच्छी पॉलिश वाला पृष्ठ अपने ऊपर पड़ने वाले अधिकांश प्रकाश को लौटा देता है, और प्रकाश का इस तरह उसी माध्यम में लौटना प्रकाश का परावर्तन है। परावर्तन के नियम दो हैं: आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर होता है, और आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण, तीनों एक ही तल में होते हैं। ये नियम हर परावर्तक पृष्ठ पर लागू होते हैं, वक्रित पृष्ठों पर भी।
- आभासी और सीधा: समतल दर्पण का प्रतिबिंब पर्दे पर नहीं लिया जा सकता और सीधा खड़ा रहता है।
- समान आकार: प्रतिबिंब बिंब के बराबर बड़ा होता है।
- समान दूरी: प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, जितनी दूरी पर बिंब दर्पण के सामने है।
- पार्श्व परिवर्तन: प्रतिबिंब में बायाँ और दायाँ आपस में बदल जाते हैं।
गोलीय दर्पण: अवतल दर्पण से प्रतिबिंब का बनना और उपयोग
जिस दर्पण का परावर्तक पृष्ठ किसी गोले के पृष्ठ का भाग हो, वह गोलीय दर्पण है। यदि पृष्ठ भीतर की ओर, अर्थात् गोले के केंद्र की ओर, वक्रित हो, तो वह अवतल दर्पण है; यदि बाहर की ओर उभरा हो, तो उत्तल दर्पण। दर्पण के पृष्ठ का केंद्र उसका ध्रुव P है, गोले का केंद्र उसका वक्रता केंद्र C है, और इन दोनों से होकर जाने वाली रेखा मुख्य अक्ष है।
मुख्य अक्ष के समांतर चलने वाली किरणें अवतल दर्पण से परावर्तन के बाद एक बिंदु पर मिलती हैं, जिसे मुख्य फोकस F कहते हैं; ध्रुव से F तक की दूरी फोकस दूरी है। छोटे द्वारक वाले दर्पणों में वक्रता त्रिज्या फोकस दूरी की दोगुनी होती है, इसलिए F ठीक P और C के बीच में होता है। अवतल दर्पण को सूर्य की ओर करने पर एकत्र हुआ प्रकाश कागज़ की शीट को जला सकता है।
| बिंब की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब की प्रकृति |
|---|---|---|
| अनंत पर | फोकस F पर | वास्तविक, उलटा, बिंदु के आकार का |
| C से परे | F और C के बीच | वास्तविक, उलटा, छोटा |
| C पर | C पर | वास्तविक, उलटा, समान आकार का |
| C और F के बीच | C से परे | वास्तविक, उलटा, बड़ा |
| F पर | अनंत पर | वास्तविक, उलटा, अत्यधिक बड़ा |
| P और F के बीच | दर्पण के पीछे | आभासी, सीधा, बड़ा |
- समांतर किरण-पुंज: टॉर्च, सर्चलाइट और वाहनों की हेडलाइट।
- बड़ा प्रतिबिंब: दाढ़ी बनाने के दर्पण, और दाँतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए दंत-चिकित्सकों के दर्पण।
- सौर भट्ठियाँ: बड़े अवतल दर्पण सूर्य के प्रकाश को एकत्र करके ऊष्मा पैदा करते हैं।
उत्तल दर्पण, दर्पण सूत्र और आवर्धन
बिंब कहीं भी रखा हो, उत्तल दर्पण हमेशा दर्पण के पीछे, ध्रुव और फोकस के बीच, आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिंब बनाता है। बाहर की ओर उभरा होने से इसका दृष्टि-क्षेत्र बड़ा होता है, इसलिए वाहनों में पीछे देखने के दर्पण उत्तल होते हैं। एक छोटा उत्तल दर्पण किसी ऊँचे भवन का पूरा प्रतिबिंब दिखा सकता है, और ऐसा एक दर्पण आगरा के किले की एक दीवार में लगा है।
दूरियाँ नई कार्तीय चिह्न परिपाटी के अनुसार ध्रुव से मापी जाती हैं: बिंब बाईं ओर रखा जाता है, ध्रुव के दाईं ओर की दूरियाँ धनात्मक और बाईं ओर की ऋणात्मक होती हैं। दर्पण सूत्र बिंब-दूरी u, प्रतिबिंब-दूरी v और फोकस दूरी f को जोड़ता है: 1/v और 1/u का योग 1/f के बराबर होता है। आवर्धन प्रतिबिंब की ऊँचाई और बिंब की ऊँचाई का अनुपात है, जो −v/u के बराबर भी होता है।
- ऋणात्मक आवर्धन: प्रतिबिंब वास्तविक और उलटा है।
- धनात्मक आवर्धन: प्रतिबिंब आभासी और सीधा है।
- हल किया गया उदाहरण: 3.00 m वक्रता त्रिज्या वाला उत्तल दर्पण 5.00 m दूर खड़ी बस का प्रतिबिंब दर्पण के 1.15 m पीछे बनाता है, जो आभासी, सीधा और 0.23 गुना आकार का होता है।
प्रकाश का अपवर्तन और लेंस
अपवर्तन के नियम, स्नेल का नियम और अपवर्तनांक
तालाब की तली ऊपर उठी हुई दिखती है, पानी में डूबी पेंसिल सतह पर मुड़ी हुई लगती है, और पानी के गिलास में रखा नींबू बगल से बड़ा दिखता है। हर बार प्रकाश एक माध्यम से दूसरे में तिरछा जाते समय अपनी दिशा बदलता है। यही प्रकाश का अपवर्तन है, और इसका कारण यह है कि एक माध्यम से दूसरे में जाने पर प्रकाश की चाल बदल जाती है।
अपवर्तन के दो नियम हैं। आपतित किरण, अपवर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलंब एक ही तल में होते हैं; और किसी एक रंग के प्रकाश तथा माध्यमों के किसी एक युग्म के लिए आपतन कोण की ज्या (sine) और अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात स्थिर रहता है। दूसरा नियम स्नेल का नियम है, और यह स्थिरांक पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक है।
अपवर्तनांक दो माध्यमों में प्रकाश की चालों का अनुपात है। प्रकाश निर्वात में सबसे तेज़ चलता है, 3 × 108 मीटर प्रति सेकंड, और किसी माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक यह चाल उस माध्यम में प्रकाश की चाल से भाग देकर मिलता है: जल का 1.33, क्राउन काँच का 1.52 और हीरे का 2.42। प्रकाशतः सघन माध्यम में जाती किरण धीमी होकर अभिलंब की ओर मुड़ती है; विरल माध्यम में जाती किरण तेज़ होकर अभिलंब से दूर मुड़ती है।
काँच के आयताकार स्लैब से गुज़रती किरण दोनों फलकों पर बराबर और विपरीत मात्रा में मुड़ती है, इसलिए निर्गत किरण आपतित किरण के समांतर निकलती है, बस थोड़ा पार्श्विक विस्थापन होता है। ठीक ऊपर से देखने पर पानी की टंकी अपनी वास्तविक गहराई से उथली दिखती है: आभासी गहराई वास्तविक गहराई को जल के अपवर्तनांक से भाग देकर मिलती है।
उत्तल लेंस, अवतल लेंस और लेंस की क्षमता
दो पृष्ठों से घिरा पारदर्शी पदार्थ, जिसका कम से कम एक पृष्ठ गोलीय हो, लेंस कहलाता है। उत्तल लेंस बीच में किनारों से मोटा होता है और प्रकाश को एक बिंदु पर एकत्र करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस कहते हैं; अवतल लेंस किनारों पर मोटा होता है और प्रकाश को फैला देता है, इसलिए वह अपसारी लेंस है। मुख्य अक्ष के समांतर किरणें उत्तल लेंस के मुख्य फोकस पर मिलती हैं, और प्रकाशिक केंद्र से गुज़रने वाली किरण बिना विचलन के सीधी निकल जाती है।
- बिंब 2F1 से परे: प्रतिबिंब F2 और 2F2 के बीच, वास्तविक, उलटा और छोटा।
- बिंब 2F1 पर: प्रतिबिंब 2F2 पर, वास्तविक, उलटा और समान आकार का।
- बिंब F1 और 2F1 के बीच: प्रतिबिंब 2F2 से परे, वास्तविक, उलटा और बड़ा।
- बिंब F1 और प्रकाशिक केंद्र के बीच: प्रतिबिंब उसी ओर, आभासी, सीधा और बड़ा; आवर्धक लेंस इसी तरह काम करता है।
- अवतल लेंस: बिंब कहीं भी हो, प्रतिबिंब हमेशा आभासी, सीधा और छोटा।
लेंस सूत्र 1/v − 1/u = 1/f है, और लेंस का आवर्धन v/u है। लेंस की क्षमता मीटर में व्यक्त उसकी फोकस दूरी का व्युत्क्रम है, जिसका मात्रक डाइऑप्टर है: उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक और अवतल लेंस की ऋणात्मक होती है। +2.0 D क्षमता का लेंस 0.50 m फोकस दूरी वाला उत्तल लेंस है, और −2.5 D का लेंस 0.40 m फोकस दूरी वाला अवतल लेंस।
प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन में अंतर
परावर्तन और अपवर्तन प्रायः एक ही पृष्ठ पर साथ-साथ होते हैं, क्योंकि प्रकाश का कुछ भाग लौट आता है और कुछ दूसरे माध्यम में चला जाता है। दोनों में अंतर इस बात का है कि प्रकाश कहाँ जाता है, किस नियम का पालन करता है और किन उपकरणों में काम आता है, जैसा तालिका में दिया गया है।
| आधार | परावर्तन | अपवर्तन |
|---|---|---|
| प्रकाश कहाँ जाता है | उसी माध्यम में लौट आता है | दूसरे माध्यम में चला जाता है |
| नियम | आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर | स्नेल का नियम: sin i / sin r स्थिर |
| कारण | प्रकाश किसी परावर्तक पृष्ठ से टकराता है | माध्यम बदलने पर प्रकाश की चाल बदलती है |
| उपकरण | समतल और गोलीय दर्पण | लेंस, काँच के स्लैब और प्रिज़्म |
| रोज़मर्रा का उदाहरण | दर्पण में प्रतिबिंब | पानी में मुड़ी दिखती पेंसिल |
पूर्ण आंतरिक परावर्तन और उसके अनुप्रयोग
क्रांतिक कोण और पूर्ण आंतरिक परावर्तन
जल से वायु में जाता प्रकाश अभिलंब से दूर मुड़ता है, इसलिए अपवर्तन कोण आपतन कोण से बड़ा होता है। आपतन कोण बढ़ने पर अपवर्तित किरण और मुड़ती जाती है, और एक कोण पर वह अभिलंब से 90 डिग्री बनाती हुई सतह को छूकर चलने लगती है। आपतन के इस कोण को क्रांतिक कोण कहते हैं; इससे आगे अपवर्तन असंभव है और प्रकाश पूरी तरह परावर्तित हो जाता है।
साधारण परावर्तन में कुछ प्रकाश सदा पार निकल जाता है, इसलिए पृष्ठ कितना भी चिकना हो, परावर्तित किरण आपतित किरण से कमज़ोर होती है। पूर्ण आंतरिक परावर्तन में कोई प्रकाश पार नहीं जाता। क्रांतिक कोण माध्यमों के युग्म पर निर्भर करता है: विरल माध्यम के सापेक्ष सघन माध्यम का अपवर्तनांक क्रांतिक कोण की ज्या का व्युत्क्रम होता है, इसलिए अपवर्तनांक जितना अधिक, क्रांतिक कोण उतना छोटा।
- जल से वायु: जल का अपवर्तनांक 1.33, क्रांतिक कोण 48.75 डिग्री।
- क्राउन काँच से वायु: अपवर्तनांक 1.52, क्रांतिक कोण 41.14 डिग्री।
- सघन फ्लिंट काँच से वायु: अपवर्तनांक 1.62, क्रांतिक कोण 37.31 डिग्री।
- हीरे से वायु: अपवर्तनांक 2.42, क्रांतिक कोण 24.41 डिग्री।
प्रकाशिक तंतु और उसके उपयोग
प्रकाशिक तंतु ऐसे बनाए जाते हैं कि क्रोड की एक दीवार से परावर्तित प्रकाश दूसरी दीवार पर क्रांतिक कोण से बड़े कोण पर पड़े। हर बार पूर्ण परावर्तन होने से प्रकाश की तीव्रता में उल्लेखनीय हानि नहीं होती, और तंतु प्रकाश की नली की तरह काम करता है। तंतु बनाने की मुख्य कठिनाई लंबी दूरी तक अवशोषण को बहुत कम रखना है; शुद्ध किए गए सिलिका काँच के तंतु 1 km की लंबाई में 95 प्रतिशत से अधिक प्रकाश आगे पहुँचा देते हैं।
- संचार: प्रकाश में बदले गए ध्वनि और वीडियो संकेत लंबी दूरी तक भेजे जाते हैं।
- चिकित्सा: तंतुओं के गुच्छे प्रकाश की नली बनकर ग्रासनली, आमाशय और आँतों जैसे भीतरी अंगों को देखने में काम आते हैं।
- सजावट: बारीक प्लास्टिक तंतुओं के फव्वारे वाले लैंप हर सिरे पर चमकते हैं।
मरीचिका, हीरे की चमक और पूर्ण परावर्तक प्रिज़्म
गर्म दिन में धरती के पास की वायु ऊपर की वायु से अधिक गर्म, कम सघन और कम अपवर्तनांक वाली होती है। किसी ऊँचे पेड़ से नीचे आता प्रकाश इन परतों से गुज़रते हुए अभिलंब से लगातार और दूर मुड़ता जाता है, और यदि धरती के पास उसका आपतन कोण क्रांतिक कोण से बड़ा हो जाए, तो वह पूरी तरह ऊपर की ओर परावर्तित हो जाता है। दूर खड़े प्रेक्षक को पानी के ताल में बने जैसा उलटा प्रतिबिंब दिखता है: यही मरीचिका है, जो गर्म मरुस्थलों में आम है और गर्म राजमार्ग पर गीले धब्बे जैसी दिखती है।
हीरे मुख्यतः पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण चमकते हैं। हीरे और वायु की सीमा पर क्रांतिक कोण केवल लगभग 24.4 डिग्री है, इसलिए हीरे में गए प्रकाश के उसके भीतर ही पूर्ण परावर्तित होने की संभावना बहुत अधिक होती है। प्राकृतिक हीरों में यह चमक कम ही दिखती है; तराशने वाले का कौशल फलकों को ऐसा आकार देता है कि प्रकाश बाहर निकलने से पहले कई बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन से गुज़रे।
प्रकाश को 90 या 180 डिग्री मोड़ने, या प्रतिबिंब का आकार बदले बिना उसे उलटने के लिए बनाए गए प्रिज़्म भी पूर्ण आंतरिक परावर्तन का उपयोग करते हैं। इसके लिए प्रिज़्म के पदार्थ का क्रांतिक कोण 45 डिग्री से कम होना चाहिए, जो क्राउन काँच और सघन फ्लिंट काँच में होता है।
प्रकाश का वर्ण विक्षेपण और प्रकीर्णन
प्रिज़्म द्वारा प्रकाश का वर्ण विक्षेपण
काँच के त्रिभुजाकार प्रिज़्म में दो त्रिभुजाकार आधार और तीन आयताकार फलक होते हैं, जो एक-दूसरे पर झुके रहते हैं; उसके दो अपवर्तक फलकों के बीच का कोण प्रिज़्म कोण है। काँच के स्लैब के विपरीत, प्रिज़्म से निकलने वाली किरण आपतित किरण से एक कोण बनाती है, जिसे विचलन कोण कहते हैं। श्वेत प्रकाश की किरण बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल के क्रम में रंगों की पट्टी बनकर निकलती है, जिसे अंग्रेज़ी में VIBGYOR से याद रखा जाता है।
वर्ण विक्षेपण इसलिए होता है कि काँच का अपवर्तनांक हर रंग के लिए अलग है। स्पेक्ट्रम के लंबी तरंगदैर्घ्य वाले सिरे पर, लगभग 700 नैनोमीटर का लाल प्रकाश सबसे कम मुड़ता है और काँच में सबसे तेज़ चलता है; लगभग 400 नैनोमीटर का बैंगनी सबसे अधिक मुड़ता है। आइज़क न्यूटन ने सबसे पहले प्रिज़्म से सूर्य के प्रकाश का स्पेक्ट्रम प्राप्त किया। उलटकर रखे दूसरे समान प्रिज़्म ने रंगों को फिर श्वेत प्रकाश में मिला दिया, जिससे सिद्ध हुआ कि सूर्य का प्रकाश इन्हीं रंगों से बना है और प्रिज़्म केवल उन्हें अलग करता है।
इंद्रधनुष का बनना: प्राथमिक और द्वितीयक इंद्रधनुष
इंद्रधनुष वर्षा के बाद आकाश में दिखने वाला प्राकृतिक स्पेक्ट्रम है, जो पानी की नन्ही बूँदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के वर्ण विक्षेपण से बनता है। यह सदा सूर्य की विपरीत दिशा में बनता है, इसलिए आकाश के एक भाग में धूप और दूसरे में वर्षा होनी चाहिए; सूर्य को पीछे रखकर झरने या फव्वारे के बीच से भी इंद्रधनुष दिख सकता है। हर बूँद छोटे प्रिज़्म की तरह काम करती है: वायु से सघन जल में जाते समय प्रकाश धीमा होता है, और इसलिए मुड़ता है।
- वर्षा की बूँद में जाते समय सूर्य का प्रकाश अपवर्तित होता है, और रंग अलग हो जाते हैं।
- बूँद के पिछले भाग में भीतरी पृष्ठ से रंग परावर्तित होते हैं।
- बूँद से निकलते समय रंग फिर अपवर्तित होते हैं: आने वाले प्रकाश से बैंगनी 40 डिग्री पर और लाल 42 डिग्री पर निकलता है।
ऊँची बूँदों से लाल और नीची बूँदों से बैंगनी प्रकाश आँख तक पहुँचता है, इसलिए प्राथमिक इंद्रधनुष में ऊपर लाल और नीचे बैंगनी होता है। बूँदों के भीतर दो बार परावर्तन होने पर द्वितीयक इंद्रधनुष बनता है; दूसरे परावर्तन में प्रकाश घटने से यह फीका होता है, और इसमें रंगों का क्रम उलटा होता है।
प्रकाश का प्रकीर्णन: आकाश नीला क्यों है, और टिंडल प्रभाव
पृथ्वी के वायुमंडल में धुएँ, धूल और जल के बारीक कण तथा वायु के अणु होते हैं। प्रकाश की किरण ऐसे कणों से टकराती है तो उसका पथ दिखने लगता है, जैसे धुएँ से भरे कमरे में छोटे छेद से आती धूप में, या घने जंगल की धुंध भरी छतरी से गुज़रती धूप में। कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश का यह प्रकीर्णन टिंडल प्रभाव है, और प्रकीर्णित प्रकाश का रंग कणों के आकार पर निर्भर करता है।
तरंगदैर्घ्य से बहुत छोटे कणों से होने वाला प्रकीर्णन तरंगदैर्घ्य की चौथी घात के व्युत्क्रमानुपाती होता है; यह रैले प्रकीर्णन है। लाल प्रकाश की तरंगदैर्घ्य नीले की लगभग 1.8 गुना है। बैंगनी नीले से भी अधिक बिखरता है, पर हमारी आँखें नीले के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, इसलिए आकाश नीला दिखता है। वायुमंडल न हो तो प्रकीर्णन नहीं होगा और आकाश काला दिखेगा, जैसा बहुत ऊँचाई पर उड़ते यात्रियों को दिखता है। क्षितिज के पास आकाश हल्का नीला या सफ़ेद पड़ जाता है, क्योंकि नीचे से आने वाला प्रकाश अधिक वायु से गुज़रता है और बार-बार का प्रकीर्णन रंगों को फिर मिला देता है।
- सफ़ेद बादल: तरंगदैर्घ्य से बहुत बड़ी जल की बूँदें सभी रंगों को लगभग बराबर प्रकीर्णित करती हैं।
- लाल ख़तरे के संकेत: कोहरे या धुएँ में लाल रंग सबसे कम बिखरता है, इसलिए दूर से भी वह उसी रंग में दिखता है।
- सूर्योदय और सूर्यास्त पर लाल सूर्य: क्षितिज के पास से आता सूर्य का प्रकाश बहुत अधिक वायु से गुज़रता है, और हम तक पहुँचने से पहले अधिकांश नीला बिखर जाता है; दोपहर में सूर्य सफ़ेद दिखता है।
वायुमंडलीय अपवर्तन: तारों का टिमटिमाना, अग्रिम सूर्योदय और प्रभामंडल
आग के ऊपर उठती गर्म वायु के पार देखी गई वस्तुएँ हिलती-सी लगती हैं, क्योंकि गर्म वायु का अपवर्तनांक थोड़ा कम होता है और परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं। वायुमंडल में आता तारों का प्रकाश भी इसी तरह लगातार अपवर्तित होता है, इसलिए क्षितिज के पास कोई तारा अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊँचा दिखता है, और उसकी आभासी स्थिति तथा चमक बदलती रहती है। तारे इतने दूर हैं कि वे बिंदु-स्रोत हैं, और इस झिलमिलाहट को टिमटिमाना कहते हैं।
ग्रह तारों की तुलना में बहुत निकट हैं और विस्तृत स्रोत की तरह दिखते हैं, जो बहुत-से बिंदु-स्रोतों का समूह है और जिनके उतार-चढ़ाव आपस में बराबर हो जाते हैं; इसलिए ग्रह नहीं टिमटिमाते। वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनट पहले और वास्तविक सूर्यास्त के लगभग 2 मिनट बाद तक दिखता है: वायु का अपवर्तनांक 1.00029 है, जो सूर्य की आभासी दिशा को लगभग आधा डिग्री खिसका देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त पर सूर्य की चक्रिका का चपटा दिखना भी इसी कारण है।
सूर्य या चंद्रमा के चारों ओर वायुमंडल के हिम-क्रिस्टलों से बना प्रकाश का वलय प्रभामंडल कहलाता है। सबसे आम प्रभामंडलों में से एक, 22 डिग्री का प्रभामंडल, तब बनता है जब सूर्य या चंद्रमा का प्रकाश लाखों षट्कोणीय हिम-क्रिस्टलों से अपवर्तित होता है, जो प्रायः क्षोभमंडल में बहुत ऊँचे, पतले पक्षाभ (सिरस) या पक्षाभ-स्तरी मेघों में होते हैं।
मानव नेत्र, दृष्टि दोष और लेसिक
मानव नेत्र की संरचना और समंजन क्षमता
मानव नेत्र कैमरे की तरह काम करता है: इसका लेंस-तंत्र प्रकाश-संवेदी पर्दे, दृष्टिपटल (रेटिना), पर प्रतिबिंब बनाता है। प्रकाश कॉर्निया से भीतर आता है, जो लगभग 2.3 cm व्यास वाले नेत्र गोलक के सामने का पतला पारदर्शी उभार है, और अधिकांश अपवर्तन कॉर्निया के बाहरी पृष्ठ पर ही होता है। परितारिका (आइरिस), एक गहरी पेशीय झिल्ली, पुतली का आकार और इस तरह भीतर आने वाले प्रकाश को नियंत्रित करती है; फिर अभिनेत्र लेंस दृष्टिपटल पर वास्तविक और उलटा प्रतिबिंब बनाता है।
दृष्टिपटल की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ, तीव्रता के लिए शलाकाएँ और रंग के लिए शंकु, दृक्-तंत्रिका के रास्ते मस्तिष्क को विद्युत संकेत भेजती हैं। पक्ष्माभी पेशियाँ जेली जैसे अभिनेत्र लेंस की वक्रता बदलती हैं: शिथिल होने पर लेंस पतला होता है और दूर की वस्तुओं पर फोकस करता है; सिकुड़ने पर वह मोटा होकर पास की वस्तुओं पर फोकस करता है। फोकस दूरी को इस तरह समायोजित करने की क्षमता समंजन क्षमता है।
- निकट-बिंदु: स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी, युवा वयस्क के लिए लगभग 25 cm; दस वर्ष की आयु में लगभग 7 से 8 cm, और साठ की आयु में 200 cm तक।
- दूर-बिंदु: सामान्य नेत्र के लिए अनंत।
- दो आँखें: एक आँख के 150 डिग्री की तुलना में लगभग 180 डिग्री का दृष्टि-क्षेत्र, और गहराई का बोध।
निकट-दृष्टि दोष, दीर्घ-दृष्टि दोष, जरा-दूरदृष्टिता और अबिंदुकता
जब नेत्र किसी प्रतिबिंब को दृष्टिपटल पर फोकस नहीं कर पाता, तो अपवर्तन दोष दृष्टि को धुँधला कर देते हैं, और उपयुक्त लेंस उन्हें ठीक करते हैं। निकट-दृष्टि दोष वाला नेत्र आवश्यकता से अधिक फोकस करता है, दीर्घ-दृष्टि दोष वाला कम, और बढ़ती आयु का नेत्र अपनी समंजन क्षमता खो देता है; संशोधक लेंस उतनी ही फोकस-क्षमता जोड़ता या घटाता है, जितनी नेत्र में कम या अधिक है।
| दोष | कारण और संशोधन |
|---|---|
| निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया) | दूर की वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल के सामने बनता है, क्योंकि लेंस अधिक वक्रित है या नेत्र गोलक लंबा है। अवतल लेंस से संशोधन। |
| दीर्घ-दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) | पास की वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनता है, क्योंकि फोकस दूरी अधिक है या नेत्र गोलक छोटा है। उत्तल लेंस से संशोधन। |
| जरा-दूरदृष्टिता (प्रेस्बायोपिया) | आयु के साथ पक्ष्माभी पेशियाँ कमज़ोर और लेंस कठोर होने से निकट-बिंदु दूर खिसक जाता है। उत्तल लेंस से संशोधन, या नेत्र में निकट-दृष्टि दोष भी हो तो द्विफोकसी लेंस। |
| अबिंदुकता (एस्टिग्मैटिज़्म) | कॉर्निया गोलीय नहीं होता, इसलिए किसी एक दिशा की रेखाएँ धुँधली दिखती हैं। बेलनाकार लेंस से संशोधन। |
| मोतियाबिंद | बुढ़ापे में अभिनेत्र लेंस दूधिया और धुँधला हो जाता है। मोतियाबिंद की शल्य-चिकित्सा से दृष्टि लौटती है। |
आम द्विफोकसी लेंस का ऊपरी भाग दूर देखने के लिए अवतल और निचला भाग पढ़ने के लिए उत्तल होता है। जिस निकट-दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का दूर-बिंदु 80 cm है, उसे 80 cm फोकस दूरी, अर्थात् −1.25 डाइऑप्टर क्षमता, का अवतल लेंस चाहिए। यह लेंस दूर की वस्तुओं को बड़ा नहीं करता; वह उनका प्रतिबिंब नेत्र के दूर-बिंदु पर बनाता है, जहाँ नेत्र उसे फोकस कर सकता है।
लेज़र और लेसिक शल्य-चिकित्सा
लेज़र विकिरण के उद्दीपित उत्सर्जन पर आधारित प्रकाशिक प्रवर्धन से प्रकाश उत्सर्जित करता है, और यह शब्द अंग्रेज़ी के light amplification by stimulated emission of radiation का संक्षिप्त रूप है। थियोडोर मेमन ने 1960 में पहला लेज़र बनाया। लेज़र का प्रकाश कलासंबद्ध (कोहेरेंट) होता है, इसलिए उसे एक छोटे बिंदु पर फोकस किया जा सकता है और वह लंबी दूरी तक पतला बना रहता है; लेज़र का उपयोग प्रकाशिक तंतु संचार, बारकोड स्कैनर, कटाई और वेल्डिंग, तथा शल्य-चिकित्सा में होता है।
लेसिक (LASIK, laser-assisted in situ keratomileusis) निकट-दृष्टि दोष, दीर्घ-दृष्टि दोष और अबिंदुकता की अपवर्तक शल्य-चिकित्सा है। फ़ेम्टोसेकंड लेज़र या ब्लेड वाला उपकरण कॉर्निया में एक पतली परत (फ़्लैप) काटता है, एक्साइमर लेज़र उसके नीचे के ऊतक को नया आकार देता है, और परत वापस रख दी जाती है। यह प्रक्रिया कॉर्निया का आकार स्थायी रूप से बदल देती है, फिर भी कुछ रोगियों को बाद में चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की आवश्यकता रहती है।
- आयु: संयुक्त राज्य अमेरिका में इसकी स्वीकृति 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए है, और नेत्र-विशेषज्ञ 21 वर्ष तक रुकने की सलाह देते हैं, क्योंकि तब तक दृष्टि को स्थिर होना होता है।
- स्थिर चश्मे का नंबर: शल्य-चिकित्सा से पहले कम से कम एक वर्ष तक नंबर स्थिर रहना चाहिए।
- सूखी आँखें: अधिकांश रोगी बाद में इसकी शिकायत करते हैं, यद्यपि यह प्रायः अस्थायी होती है।
सुनना भी तरंगों को मस्तिष्क के लिए संकेतों में बदलता है; कान की संरचना के साथ इसकी व्याख्या ध्वनि तरंगों वाले लेख में है।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2013 (हिंदी रूपांतर)सूर्य का प्रकाश वर्षा की बूँदों पर पड़ने से इंद्रधनुष बनता है। इसके लिए निम्नलिखित में से कौन-सी भौतिक परिघटनाएँ उत्तरदायी हैं?
- वर्ण विक्षेपण
- अपवर्तन
- आंतरिक परावर्तन
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: सूर्य के प्रकाश की एक किरण को वर्षा की बूँद में चलते हुए देखिए। बूँद में जाते समय वह अपवर्तित होती है, और हर रंग अलग मात्रा में मुड़ने से विक्षेपित भी होती है। बूँद के पिछले भाग में उसका आंतरिक परावर्तन होता है। निकलते समय वह फिर अपवर्तित होती है। तीनों प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं, इसलिए कथन 1, 2 और 3 तीनों सही हैं।
इस भ्रम से बचें: आंतरिक परावर्तन को छोड़ देना: उसके बिना प्रकाश प्रेक्षक की ओर लौटता ही नहीं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) केवल 1 और 2: गलत। बूँद के पिछले भाग में आंतरिक परावर्तन के बिना प्रकाश प्रेक्षक की ओर नहीं लौटता।
- (b) केवल 2 और 3: गलत। वर्ण विक्षेपण के बिना प्रकाश श्वेत ही लौटता; रंग इसलिए अलग होते हैं कि हर रंग अलग मात्रा में मुड़ता है।
- (c) केवल 1 और 3: गलत। वर्ण विक्षेपण अपवर्तन से ही होता है, बूँद में जाते और निकलते समय, इसलिए अपवर्तन को छोड़ा नहीं जा सकता।
- (d) 1, 2 और 3: सही। प्रवेश पर अपवर्तन और वर्ण विक्षेपण, पिछले भाग में आंतरिक परावर्तन और निकलते समय अपवर्तन मिलकर इंद्रधनुष बनाते हैं।
उत्तर: 1, 2 और 3: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1995 (हिंदी रूपांतर)प्रकाशिक तंतु (ऑप्टिकल फ़ाइबर) किस सिद्धांत पर काम करता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: सोचिए कि तंतु के मुड़ने पर भी प्रकाश उसके भीतर कैसे बना रहता है। क्रोड का अपवर्तनांक आवरण से अधिक है, और भीतर का प्रकाश दीवार पर क्रांतिक कोण से बड़े कोण पर पड़ता है, इसलिए हर बार वह पूरी तरह परावर्तित होकर आगे बढ़ता है।
इस भ्रम से बचें: प्रवेश के समय अपवर्तन होता है, पर प्रकाश को आगे ले जाने वाली प्रक्रिया वह नहीं है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) पूर्ण आंतरिक परावर्तन: सही। प्रकाश क्रोड की दीवार पर क्रांतिक कोण से बड़े कोण पर पड़ता है और तंतु में बार-बार परावर्तित होता हुआ आगे बढ़ता है।
- (b) अपवर्तन: गलत। तंतु में जाते समय प्रकाश अपवर्तित होता है, पर दीवार से बाहर अपवर्तन हो तो प्रकाश खो जाएगा; प्रकाश को आगे ले जाने वाली प्रक्रिया अपवर्तन नहीं है।
- (c) प्रकीर्णन: गलत। अशुद्धियों से होने वाला प्रकीर्णन तंतु में हानि है, इसीलिए उसका काँच बहुत शुद्ध किया जाता है।
- (d) व्यतिकरण: गलत। व्यतिकरण तरंगों का आपस में मिलना है; तंतु में प्रकाश को आगे ले जाने में इसकी कोई भूमिका नहीं है।
उत्तर: पूर्ण आंतरिक परावर्तन: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 1996 (हिंदी रूपांतर)पूर्ण आंतरिक परावर्तन तब हो सकता है, जब प्रकाश जाता है
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पूर्ण आंतरिक परावर्तन के लिए प्रकाश को प्रकाशतः सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए। हर विकल्प के अपवर्तनांकों की तुलना कीजिए (हीरा 2.42, क्राउन काँच 1.52, जल 1.33, वायु लगभग 1), और केवल वह युग्म रखिए, जिसमें पहले माध्यम का अपवर्तनांक बड़ा है।
इस भ्रम से बचें: वायु से जल या वायु से काँच विरल से सघन की ओर है, जहाँ पूर्ण आंतरिक परावर्तन नहीं हो सकता।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) हीरे से काँच में: सही। हीरे का अपवर्तनांक 2.42 काँच के 1.52 से अधिक है, इसलिए प्रकाश सघन से विरल में जाता है।
- (b) जल से काँच में: गलत। 1.33 वाला जल 1.52 वाले काँच से प्रकाशतः विरल है, इसलिए प्रकाश अभिलंब की ओर मुड़ता है और पूर्ण परावर्तित नहीं हो सकता।
- (c) वायु से जल में: गलत। वायु जल से विरल है; विरल से सघन में जाते समय पूर्ण आंतरिक परावर्तन नहीं हो सकता।
- (d) वायु से काँच में: गलत। वायु काँच से विरल है, इसलिए यह भी विरल से सघन की ओर है।
उत्तर: हीरे से काँच में: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2001 (हिंदी रूपांतर)कथन और कारण:
- कथन (A): पानी में एक छड़ी तिरछी डुबोई गई है। बगल से देखने पर छड़ी पानी की सतह पर छोटी और मुड़ी हुई दिखती है।
- कारण (R): छड़ी से आने वाला प्रकाश पानी के अणुओं से प्रकीर्णित होता है, जिससे छड़ी छोटी और मुड़ी हुई दिखती है।
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: पहले कथन को परखिए, फिर कारण को। पानी में तिरछी डुबोई छड़ी सचमुच छोटी और मुड़ी दिखती है, इसलिए A सही है। इसका कारण सतह पर अपवर्तन है: डूबे भाग से आता प्रकाश पानी से निकलते समय दिशा बदलता है, इसलिए वह भाग वास्तविकता से ऊपर दिखता है। प्रकीर्णन केवल किरण का पथ दिखाता है, इसलिए R गलत है।
इस भ्रम से बचें: प्रकीर्णन किरण का पथ दिखाई देने योग्य बनाता है; वह छड़ी के प्रतिबिंब को नहीं मोड़ता।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) A और R सही, R से A की व्याख्या: गलत। R गलत है; प्रकीर्णन छड़ी के प्रतिबिंब को नहीं मोड़ता।
- (b) A और R सही, पर R से A की व्याख्या नहीं: गलत। R सही है ही नहीं, इसलिए यह विकल्प टिक नहीं सकता।
- (c) A सही, R गलत: सही। छड़ी सचमुच छोटी और मुड़ी दिखती है, और इसका कारण अपवर्तन है, प्रकीर्णन नहीं।
- (d) A गलत, R सही: गलत। मुड़ा हुआ दिखना वास्तविक प्रेक्षण है, वही प्रभाव जिससे तालाब अपनी गहराई से उथला दिखता है।
उत्तर: A सही, R गलत: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2002 (हिंदी रूपांतर)सूर्य का प्रभामंडल किसमें प्रकाश के अपवर्तन से बनता है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: प्रभामंडल प्रकाश का वह वलय है, जो षट्कोणीय हिम-क्रिस्टलों से सूर्य के प्रकाश के अपवर्तन से बनता है। पहले उन विकल्पों को हटाइए, जिनमें हिम-क्रिस्टल नहीं हैं, फिर क्रिस्टलों को उन पतले, ऊँचे पक्षाभ मेघों से मिलाइए, जिनमें वे होते हैं।
इस भ्रम से बचें: जलवाष्प और धूल प्रभामंडल नहीं बनाते; हिम-क्रिस्टल बनाते हैं।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) स्तरी मेघों में जलवाष्प: गलत। प्रभामंडल हिम-क्रिस्टलों से बनता है, जलवाष्प से नहीं।
- (b) पक्षाभ-कपासी मेघों में हिम-क्रिस्टल: गलत। प्रभामंडल पतले, परदे जैसे पक्षाभ और पक्षाभ-स्तरी मेघों में बनता है, और आधिकारिक उत्तर इन्हें पक्षाभ मेघ कहता है।
- (c) पक्षाभ मेघों में हिम-क्रिस्टल: सही। पक्षाभ मेघों के षट्कोणीय हिम-क्रिस्टलों से अपवर्तित सूर्य का प्रकाश 22 डिग्री का प्रभामंडल बनाता है।
- (d) स्तरी मेघों में धूल के कण: गलत। धूल प्रकाश को प्रकीर्णित करती है; वह उसे अपवर्तित करके वलय नहीं बनाती।
उत्तर: पक्षाभ मेघों में हिम-क्रिस्टल: विकल्प (c), आधिकारिक उत्तर।
- यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2010 (हिंदी रूपांतर)दृष्टि-सुधार के लिए लेसिक (LASIK, Laser Assisted In-Situ Keratomileusis) प्रक्रिया हाल में लोकप्रिय हो रही है। इस संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
इस प्रश्न को कैसे हल करें
हल करने की विधि: प्रश्न वह कथन माँगता है, जो सही नहीं है। लेसिक लेज़र से कॉर्निया को नया आकार देकर अपवर्तन दोष स्थायी रूप से ठीक करती है और चश्मे पर निर्भरता घटाती है। इसकी स्वीकृति केवल वयस्कों के लिए है, संयुक्त राज्य अमेरिका में 18 वर्ष से, और नंबर एक वर्ष तक स्थिर होना चाहिए, इसलिए यह किसी भी आयु में नहीं की जा सकती।
इस भ्रम से बचें: प्रश्न उस कथन को माँगता है, जो सही नहीं है।
विकल्पवार व्याख्या:
- (a) अपवर्तन दोष ठीक करती है: सही कथन, इसलिए उत्तर नहीं। लेसिक निकट-दृष्टि दोष, दीर्घ-दृष्टि दोष और अबिंदुकता का उपचार करती है।
- (b) कॉर्निया का आकार स्थायी रूप से बदलती है: सही कथन, इसलिए उत्तर नहीं। एक्साइमर लेज़र कॉर्निया की ऊपरी परत के नीचे के ऊतक को नया आकार देता है।
- (c) चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस पर निर्भरता घटाती है: सही कथन, इसलिए उत्तर नहीं, यद्यपि कुछ रोगियों को बाद में भी उनकी आवश्यकता रहती है।
- (d) किसी भी आयु में की जा सकती है: सही नहीं, इसलिए यही उत्तर है। इसकी स्वीकृति 18 वर्ष से है, और डॉक्टर दृष्टि स्थिर होने के लिए 21 वर्ष तक रुकने की सलाह देते हैं।
उत्तर: किसी भी आयु में: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।
स्रोत
- NCERT: Science (Class X), Light: Reflection and Refraction
- NCERT: Science (Class X), The Human Eye and the Colourful World
- NCERT: Physics Part II (Class XII), Ray Optics and Optical Instruments
- NASA Space Place: Why Is the Sky Blue?
- NOAA NESDIS: What Causes a Rainbow?
- PIB: 41st National Eye Donation Fortnight (25 August 2026)
- PIB: Update on National Programme for Control of Blindness and Visual Impairment (1 August 2023)
- Wikipedia: Total internal reflection
- Wikipedia: Optical fiber
- Wikipedia: Rainbow
- Wikipedia: Halo (optical phenomenon)
- Wikipedia: 22° halo
- Wikipedia: Laser
- Wikipedia: LASIK
- Wikipedia: Visible light communication
- Wikipedia: Li-Fi
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।
