परिचय
मध्यपाषाण काल अर्थात् मध्य पाषाण युग भारतीय प्रागितिहास का लगभग 12,000 से 10,000 वर्ष पूर्व का समय है, जो पुरापाषाण और नवपाषाण काल के बीच आता है। यह गर्म होती जलवायु के साथ शुरू हुआ। इस काल के लोग अब भी शिकार और संग्रह पर जीते थे; वे हत्थों में जड़े पत्थर के बहुत छोटे औज़ार, अर्थात् सूक्ष्मपाषाण, प्रयोग करते थे और उन्होंने भारत के प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों का सबसे बड़ा भाग बनाया, विशेषकर भीमबेटका में।
मध्यपाषाण काल: भारत का मध्य पाषाण युग
मध्यपाषाण काल का समय और अर्थ
यह नाम यूनानी भाषा से आया है: मेसोस का अर्थ है मध्य और लिथोस का अर्थ है पत्थर। यह युग पुरापाषाण (पुराना पाषाण युग) और नवपाषाण (नया पाषाण युग) के बीच आता है, इसलिए इसे मध्य पाषाण युग कहते हैं। इन दोनों के बीच की अवस्था के रूप में यह शब्द 1866 में हॉडर वेस्ट्रॉप ने जोड़ा था। कुछ विद्वान इसी अवस्था के लिए उत्तर-पुरापाषाण (Epipalaeolithic) शब्द का प्रयोग करते हैं। इस युग के मुख्य औज़ार सूक्ष्मपाषाण थे, इसलिए इसे सूक्ष्मपाषाण युग भी कहा जाता है।
इस युग की शुरुआत जलवायु में आए बदलाव से हुई। लगभग 12,000 वर्ष पूर्व दुनिया अपेक्षाकृत गर्म हो गई और घास के मैदान फैल गए। घास खाने वाले जानवरों, जैसे हिरन, मृग, बकरी, भेड़ और मवेशियों की संख्या बढ़ी। अब लोग समूह में बड़े जानवरों का शिकार करने के बजाय शिकार, मछली पकड़ने और भोजन-संग्रह को मिलाकर जीने लगे, और इसके लिए उन्हें छोटे और पैने औज़ारों की ज़रूरत पड़ी।
अलग-अलग क्षेत्रों में इस युग का समय अलग रहा है। यूरोप में मध्यपाषाण काल मोटे तौर पर 15,000 से 5,000 वर्ष पूर्व तक माना जाता है, जबकि पश्चिम एशिया में, जहाँ इसे उत्तर-पुरापाषाण कहते हैं, लगभग 20,000 से 10,000 वर्ष पूर्व तक। भारत का 12,000 से 10,000 वर्ष पूर्व का समय उसी विश्वव्यापी बदलाव का हिस्सा है, जो अंतिम हिमयुग की समाप्ति के बाद आया।
पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल में अंतर
तीनों युगों का सबसे बड़ा अंतर उनके औज़ारों, भोजन और एक जगह टिककर रहने की अवधि में दिखता है। पुरापाषाण काल में हाथ की कुल्हाड़ियाँ, शल्क और फलक जैसे बड़े औज़ार थे और लोग लगातार एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे। मध्यपाषाण काल में हत्थों में जड़े सूक्ष्मपाषाण आए, भोजन के स्रोत बढ़े और सबसे अधिक शैल-चित्र बने। नवपाषाण काल ने घिसकर चमकाए गए औज़ार, खेती और गाँव दिए। पहले का इतिहास भारत में पुरापाषाण काल (अंग्रेज़ी में) में और बाद का भारत में नवपाषाण काल (अंग्रेज़ी में) में पढ़ें।
| विशेषता | पुरापाषाण | मध्यपाषाण | नवपाषाण |
|---|---|---|---|
| समय | 20 लाख से 12,000 वर्ष पूर्व | 12,000 से 10,000 वर्ष पूर्व | लगभग 10,000 वर्ष पूर्व से |
| औज़ार | हाथ की कुल्हाड़ी, शल्क, फलक | हत्थों में जड़े सूक्ष्मपाषाण | घिसे हुए औज़ार, ओखली और मूसल |
| भोजन | बड़े जानवरों का शिकार, संग्रह | शिकार, मछली पकड़ना, संग्रह | गेहूँ और जौ जैसी फसलें |
| पशु | शिकार किए जाते थे | शिकार; पशुपालन के पहले संकेत | भेड़, बकरी और मवेशी पाले गए |
| बसावट | लगातार घूमते रहना | कुछ लंबे ठहराव, शवाधान | गाँव |
| कला | कम चित्र (भीमबेटका काल I) | सबसे अधिक चित्र (काल II) | ग्रेनाइट चट्टानों पर चित्र |
सूक्ष्मपाषाण: मध्यपाषाण काल के उपकरण
सूक्ष्मपाषाण क्या हैं: आकार और प्रकार
पत्थर के क्रोड से एक छोटा फलक तोड़कर और उसे छाँटकर पैना आकार देकर सूक्ष्मपाषाण (microlith) बनाया जाता था। इस छँटाई से एक खास तरह का टुकड़ा बचता था, जिसे माइक्रोब्यूरिन (microburin) कहते हैं। पुरातत्त्वविद इन औज़ारों को दो वर्गों में बाँटते हैं: फलक जैसे, थोड़े बड़े सूक्ष्मपाषाण; और त्रिभुज, समलंब या अर्धचंद्र के आकार वाले ज्यामितीय सूक्ष्मपाषाण, जो मध्यपाषाण और नवपाषाण दोनों कालों की पहचान हैं।
उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में लेखहिया के शैलाश्रयों की परतें बताती हैं कि ये आकार किस क्रम में आए:
- पहले के रूप: समानांतर किनारों वाले फलक, पृष्ठित फलक, नुकीले औज़ार, अर्धचंद्राकार औज़ार और खुरचनी।
- फिर त्रिभुज: त्रिभुजाकार औज़ार आते हैं, पर समलंबाकार औज़ार अभी नहीं हैं और मिट्टी के बर्तन भी नहीं।
- फिर दोनों: ज्यामितीय और गैर-ज्यामितीय औज़ार साथ मिलते हैं, और मिट्टी के बर्तन ज्यामितीय औज़ारों के बाद ही प्रयोग में आते हैं।
सूक्ष्मपाषाण स्वयं मध्यपाषाण काल से पुराने हैं। भारत में ये पश्चिम बंगाल के महादेबेरा और काना में उत्तर पुरापाषाण काल में, 42,000 से 25,000 वर्ष पूर्व के बीच मिलते हैं। मध्यपाषाण काल में ये आम औज़ार बन गए: इस काल के पत्थर के औज़ार प्रायः बहुत छोटे होते हैं।
हत्थों में जड़े मिश्रित उपकरण: सूक्ष्मपाषाण का उपयोग
एक अकेला सूक्ष्मपाषाण इतना छोटा होता है कि उससे सीधे काम नहीं लिया जा सकता। इसलिए इन्हें राल और रेशे की मदद से हड्डी या लकड़ी के हत्थों पर चिपकाया जाता था। इस तरह मिश्रित उपकरण (composite tools) बनते थे: आरी और हँसिया, तथा भाले, हार्पून और तीर की नोक और काँटे।
- एक हथियार में कई: एक भाले या हार्पून में छह से अठारह सूक्ष्मपाषाण लग सकते थे, जबकि एक तीर में केवल एक या दो।
- आसान मरम्मत: घिसा या टूटा सूक्ष्मपाषाण बदलना आसान था, जबकि नया हत्था बनाने में अधिक मेहनत लगती थी।
- पुराने औज़ार भी: सूक्ष्मपाषाण के साथ पुराने प्रकार के औज़ार भी प्रयोग में बने रहे।
शैल-चित्र इन औज़ारों को काम करते हुए दिखाते हैं। भीमबेटका के चित्रों में शिकारी समूह बनाकर काँटेदार भालों, नोकदार डंडों और तीर-कमान से शिकार करते दिखते हैं, और कुछ चित्रों में वे जानवरों को पकड़ने के लिए जाल और फंदे लिए हुए हैं।
मध्यपाषाण काल के प्रमुख स्थल
बागोर, तिलवाड़ा और लंघनाज: पश्चिमी भारत के मध्यपाषाण स्थल
पश्चिमी भारत में मध्यपाषाण काल के कुछ सबसे अच्छी तरह अध्ययन किए गए स्थल हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले में कोठारी नदी के बाएँ तट पर स्थित बागोर भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाण स्थल है। यहाँ क्षैतिज उत्खनन हुआ है, अर्थात् एक संकरी खाई के बजाय एक बड़े क्षेत्र को खोला गया है। इस स्थल के तीन सांस्कृतिक चरण हैं।
- बागोर, राजस्थान: योजनाबद्ध ढंग से दफ़नाए गए पाँच मानव कंकाल, और आग तथा पशुओं को पालतू बनाने के सबसे पुराने साक्ष्य।
- तिलवाड़ा, राजस्थान: लूनी नदी के तट पर बसा गाँव, जहाँ मध्यपाषाण संस्कृति के साक्ष्य उत्खनन में मिले हैं।
- लंघनाज, गुजरात: मेहसाणा ज़िले में; गैंडा, जंगली सूअर, चीतल, नीलगाय और काला हिरन सहित जंगली जानवरों की हड्डियाँ, सात मानव कंकाल और बड़ी संख्या में सूक्ष्मपाषाण, लगभग 10,000 से 8,000 ईसा पूर्व के।
लंघनाज की जानवरों की हड्डियाँ मध्यपाषाण जीवन का परिवेश दिखाती हैं। यहाँ सवाना और जंगल के बीच-बीच में आर्द्रभूमियाँ थीं, जिनसे शिकार और भोजन-संग्रह दोनों संभव थे। यहाँ 1944 से 1963 तक लंदन विश्वविद्यालय और पुणे के डेक्कन कॉलेज ने उत्खनन किया।
विंध्य क्षेत्र और गंगा घाटी के मध्यपाषाण स्थल
मध्यपाषाण स्थलों का दूसरा बड़ा समूह विंध्य की पहाड़ियों और गंगा घाटी में है। मध्य प्रदेश में नर्मदापुरम के पास आदमगढ़ की पहाड़ियों में चित्रों वाले शैलाश्रय हैं, और वहाँ निम्न पुरापाषाण तथा मध्यपाषाण काल के औज़ार उत्खनन में मिले हैं। चित्र 3 में हर स्थल की जगह और उसकी पहचान दिखाई गई है।
- लेखहिया, मिर्ज़ापुर: एक शैलाश्रय से मानव कंकालों के अवशेष, सूक्ष्मपाषाण से भी पुरानी कुछ वस्तुएँ, और औज़ारों के आकारों का परत-दर-परत क्रम।
- चोपानी मांडो, प्रयागराज: बेलन नदी पर, जी. आर. शर्मा ने 1967 और 1977 में इसका उत्खनन किया; इसके तीन चरण पुरापाषाण से मध्यपाषाण होते हुए नवपाषाण तक जाते हैं।
- चोपानी मांडो की खोजें: चूल्हों वाली गोल और अंडाकार झोपड़ियाँ, हाथ से बने रस्सी-छाप बर्तन, सूक्ष्मपाषाण और चावल के अवशेष।
- सराय नाहर राय, प्रतापगढ़: सूक्ष्मपाषाण युग की बस्ती, जिसकी खोजें शिकार, मछली पकड़ने और शवाधान की आरंभिक प्रथाओं की ओर संकेत करती हैं।
- महदहा, प्रतापगढ़: गंगा घाटी की एक मध्यपाषाण बस्ती, जिसका उत्खनन 1977 और 1978 में हुआ।
चोपानी मांडो भोजन-संग्रह से भोजन-उत्पादन की ओर बढ़ने का संकेत देता है। फिर भी बेलन घाटी और मध्य गंगा मैदान में चावल की जो आरंभिक तिथियाँ प्रस्तावित की गई थीं, वे विवादित हैं: पास के कोल्डिहवा और लहुरादेव जैसे स्थलों के नए अध्ययन स्पष्ट खेती को काफ़ी बाद का बताते हैं। इसलिए यहाँ का चावल पूरी खेती का नहीं, बल्कि बदलाव का संकेत माना जाना चाहिए।
मध्यपाषाण शैल-चित्र: भीमबेटका और अन्य स्थल
भीमबेटका कहाँ है: खोज, शैलाश्रय और विश्व धरोहर
भारत के सबसे समृद्ध शैल-चित्र मध्य प्रदेश की विंध्य पर्वत-श्रृंखला और उत्तर प्रदेश में फैली उसकी शाखाओं में मिले हैं। ये पहाड़ियाँ पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल के अवशेषों से भरी हैं। इनमें सबसे बड़ा और दर्शनीय स्थल भीमबेटका के शैलाश्रय हैं: रातापानी वन्यजीव अभयारण्य के भीतर बलुआ पत्थर की विशाल चट्टानों में बने प्राकृतिक आश्रय, जिनकी संख्या लगभग 800 है और इनमें से 500 में चित्र हैं।
- खोज: 1957-58 में पुरातत्त्वविद वी. एस. वाकणकर ने इनकी खोज की, जिन्होंने वर्षों तक इन दुर्गम पहाड़ियों का सर्वेक्षण किया।
- पाँच समूह: प्राकृतिक शैलाश्रयों के पाँच समूह, जिनके चित्र मध्यपाषाण काल से ऐतिहासिक काल तक के हैं।
- विश्व धरोहर: 2003 में यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल घोषित।
- जीवित परंपरा: आसपास के इक्कीस आदिवासी गाँवों की परंपराएँ आज भी इन चित्रों में दिखाई गई परंपराओं से मिलती हैं।
भीमबेटका केवल चित्रों का स्थल नहीं है। यहाँ के शैलाश्रयों में पाषाण युग से ही लोग रहते आए, इसलिए औज़ार, बसावट की परतें और चित्र एक साथ मिलते हैं। इसी कारण इन चित्रों को उन्हें बनाने वाले लोगों के जीवन के साथ रखकर पढ़ा जा सकता है।
भीमबेटका की गुफाओं के चित्र: उत्तर पुरापाषाण से ताम्रपाषाण काल तक
भीमबेटका के चित्रों को शैली, तकनीक और एक के ऊपर एक बनी परतों के आधार पर सात कालों में बाँटा गया है। पहले तीन काल हैं: काल I, उत्तर पुरापाषाण; काल II, मध्यपाषाण; और काल III, ताम्रपाषाण। इनके बाद चार और काल आते हैं। चित्र 2 दिखाता है कि ये तीनों एक ही चट्टान पर एक के ऊपर एक कैसे बने हैं।
- काल I, उत्तर पुरापाषाण: हरी और गहरी लाल रेखाओं से बने भैंसों, हाथियों, बाघों, गैंडों और सूअरों जैसे बड़े-बड़े जानवर, साथ में छड़ी जैसी पतली मानव आकृतियाँ; हरे चित्र नर्तकों के और लाल चित्र शिकारियों के हैं।
- काल II, मध्यपाषाण: चित्रों की संख्या सबसे अधिक; विषय कई गुना बढ़े, पर चित्रों का आकार छोटा हो गया, और शिकार के दृश्य प्रमुख हो गए।
- काल III, ताम्रपाषाण: यहाँ के गुफावासियों का मालवा के मैदानों के बसे हुए कृषक समुदायों से संपर्क; मिट्टी के बर्तन और धातु के औज़ार दिखाए गए हैं, और आड़ी-तिरछी रेखाओं वाले वर्ग तथा जाली जैसे अभिप्राय इन चित्रों और ताम्रपाषाण बर्तनों दोनों पर मिलते हैं।
काल III के चित्रों में पहले के कालों जैसी सजीवता और ऊर्जा नहीं रह जाती। मध्यपाषाण काल के कुछ दृश्यों को अपने पशु-गणचिह्नों से पहचानी जाने वाली तीन जनजातियों के युद्ध के रूप में पढ़ा जाता है; अन्य दृश्यों में वाद्य यंत्र, माँ और बच्चे, मरे हुए जानवरों को ले जाते पुरुष, मद्यपान और शवाधान दिखते हैं।
मध्यपाषाण शैल-चित्रों के विषय, रंग और शैली
मध्यपाषाण काल के कलाकार जानवरों को चित्रित करना अधिक पसंद करते थे। हाथी, जंगली भैंसा, बाघ, सूअर, हिरन, मृग, तेंदुआ, गैंडा, मछली, मेढक, छिपकली, गिलहरी और पक्षी, सब इन चित्रों में हैं। कहीं जानवर मनुष्यों का पीछा करते दिखते हैं, तो कहीं मनुष्य उनका शिकार करते हैं; कुछ दृश्यों में जानवरों का डर झलकता है और कुछ में उनके प्रति स्नेह। भीमबेटका के जानवरों के एक विस्तृत अध्ययन में स्लॉथ भालू, भेड़िया, लकड़बग्घा, खरगोश, बंदर, कछुआ और मोर भी पहचाने गए हैं। हिरन और मृग सबसे अधिक हैं, और एक पालतू कुत्ता भी है।
- मानव आकृतियाँ: जानवर प्राकृतिक रूप में और मनुष्य शैलीबद्ध रूप में बने हैं; स्त्रियाँ, बूढ़े और जवान सभी हैं, और बच्चे दौड़ते, उछलते और खेलते दिखते हैं।
- दैनिक जीवन: सामूहिक नृत्य, पेड़ों से फल या शहद इकट्ठा करना, स्त्रियों का अनाज पीसना और खाना बनाना, और ऐसे दृश्य जो पारिवारिक जीवन जैसे लगते हैं।
- छाप: हाथ और मुट्ठी की छाप, और उँगलियों के सिरों से बने बिंदु।
- रंग: सफ़ेद, पीला, नारंगी, गेरुआ लाल, बैंगनी, भूरा, हरा और काला; इनमें सफ़ेद और लाल सबसे प्रिय थे।
ये रंग चट्टानों और खनिजों को कूट-पीसकर बनाए जाते थे। लाल रंग हिरमच से बनता था, जिसे गेरू भी कहते हैं; हरा रंग कैल्सेडोनी नामक पत्थर की हरी किस्म से; और सफ़ेद रंग संभवतः चूना पत्थर से। इस चूर्ण में पानी के साथ जानवरों की चर्बी, गोंद या राल जैसा गाढ़ा पदार्थ मिलाया जाता था, और पौधों के रेशों से बने ब्रश से चित्र बनाए जाते थे। माना जाता है कि चट्टान की सतह पर मौजूद ऑक्साइड के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण ये रंग हज़ारों वर्षों बाद भी बने हुए हैं।
मध्यपाषाण मानव ने शैल-चित्र क्यों बनाए
इन चित्रों का उद्देश्य केवल अनुमान से समझा जा सकता है, पर उनकी जगह कुछ संकेत देती है। कुछ चित्र उन शैलाश्रयों में हैं जहाँ लोग रहते थे; कुछ ऐसी जगहों पर हैं जहाँ शायद लोग कभी रहे ही नहीं, और संभव है कि इन जगहों का कोई धार्मिक महत्त्व रहा हो। कुछ सबसे सुंदर चित्र बहुत ऊँचाई पर, शैलाश्रय की छत के पास बने हैं, शायद ताकि वे दूर से दिखाई दें।
- जानवरों पर अधिकार का भाव: शिकार और मरते हुए जानवरों के चित्र शायद लोगों को खुले में मिलने वाले जानवरों पर अधिकार का भाव देते थे।
- अनुष्ठान: आज भी कई समुदाय जन्म, मृत्यु, युवावस्था और विवाह के अनुष्ठानों में चट्टानों पर चित्र बनाते या उकेरते हैं, और शिकार के अनुष्ठानों में मुखौटे पहनकर नाचते हैं।
- जीवन का अभिलेख: ये चित्र आरंभिक मनुष्यों की जीवन-शैली, खान-पान, दैनिक गतिविधियाँ और, सबसे बढ़कर, उनके सोचने का ढंग बताते हैं।
इन चित्रों का कौशल साफ़ दिखता है। कलाकारों ने जानवरों में अनुपात और रंगत दोनों को बनाए रखा, शिकार और नृत्य के नाटकीय दृश्यों में कहानी कही, और जानवरों को शायद वास्तविकता से अधिक तगड़ा और रौबदार दिखाया। ये शैल-चित्र उस युग के मनुष्यों की सबसे बड़ी धरोहर हैं।
अन्य शैल-कला स्थल: लखुडियार, पहाड़गढ़, अनंगपुर और कर्नाटक
शैल-चित्र मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और बिहार में, तथा उत्तराखंड की कुमाऊँ पहाड़ियों में मिले हैं। भारत में शैल-चित्रों की पहली खोज 1867-68 में पुरातत्त्वविद आर्किबोल्ड कार्लाइल ने की, और भारतीय शैल-चित्रों पर पहला वैज्ञानिक लेख जे. कॉकबर्न ने 1883 में प्रकाशित किया।
- लखुडियार, उत्तराखंड: अल्मोड़ा से लगभग बीस किलोमीटर दूर सुयाल नदी के किनारे के शैलाश्रय, जिनके नाम का अर्थ है एक लाख गुफाएँ; सफ़ेद, काले और गेरुआ लाल रंग में मनुष्य, जानवर और ज्यामितीय आकृतियाँ, और हाथ पकड़कर नाचती मानव आकृतियाँ।
- पहाड़गढ़ की गुफाएँ, मध्य प्रदेश: मुरैना के पास, लाल और सफ़ेद गेरू से बने मनुष्यों, जानवरों और अमूर्त आकृतियों के 600 से अधिक चित्र।
- अनंगपुर और मांगर बणी, दिल्ली एनसीआर: गुफा-चित्रों और औज़ारों वाले मध्यपाषाण स्थल।
- कुपगल्लू, पिकलीहाल और टेक्कलकोटा, कर्नाटक: ग्रेनाइट चट्टानों पर बने चित्र, जो अधिकतर नवपाषाण और बाद के कालों के हैं।
लखुडियार की परतें रंगों का क्रम बताती हैं: सबसे पुराने चित्र काले रंग में हैं, उनके ऊपर गेरुआ लाल रंग के चित्र हैं, और सबसे बाद का समूह सफ़ेद रंग का है। भीमबेटका की तरह यहाँ भी परतों का यही क्रम हर स्थल की कला का समय तय करने में मदद करता है।
मध्यपाषाण काल का जीवन: शिकार, शवाधान और पशुपालन की शुरुआत
मिट्टी के बर्तन और लंबे ठहराव: मध्यपाषाण काल का उत्तरार्ध
अपने अंतिम चरण में मध्यपाषाण काल स्थायी जीवन के पहले संकेत देता है। मध्यपाषाण माने जाने वाले कुछ स्थलों पर मिट्टी के बर्तनों और वस्त्रों का प्रयोग दिखता है, और अधिक स्थायी बस्तियाँ झीलों, नदियों या समुद्र के पास थीं, जहाँ भोजन लगातार मिलता रहता था।
- लेखहिया: परतें दिखाती हैं कि मिट्टी के बर्तन ज्यामितीय सूक्ष्मपाषाण के बाद ही प्रयोग में आए।
- चोपानी मांडो: चूल्हों वाली गोल और अंडाकार झोपड़ियाँ, हाथ से बने रस्सी-छाप बर्तन, और साथ में कैल्सेडोनी के सूक्ष्मपाषाण।
- बागोर: एक ही स्थान पर तीन सांस्कृतिक चरण और शवाधान, जो बताते हैं कि लोग इस स्थल पर लौटकर आते और ठहरते थे।
मध्यपाषाण काल का भोजन, शवाधान और पशुपालन की शुरुआत
मध्यपाषाण काल में भोजन कई स्रोतों से आता था। शिकारी घास चरने वाले जानवरों के झुंडों के पीछे चलते थे और उनके भोजन तथा प्रजनन के समय के बारे में जानने लगे। शायद इसी से उन्हें इन जानवरों को स्वयं पालने का विचार आया। मछली पकड़ना महत्त्वपूर्ण हो गया, और उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में जंगली गेहूँ, जौ और धान इकट्ठा किए जाते थे।
- पशुपालन: बागोर में पशुओं को पालतू बनाने के साक्ष्य हैं, जो पशुपालन की ओर पहला कदम था।
- शवाधान: बागोर में पाँच योजनाबद्ध शवाधान, लंघनाज में सात कंकाल, लेखहिया में कंकालों के अवशेष और सराय नाहर राय में शवाधान की प्रथाएँ मृतकों के प्रति देखभाल दिखाती हैं; मध्यपाषाण काल के शवाधान सरल थे।
खेती और स्थायी गाँवों के फैलने के साथ मध्यपाषाण काल समाप्त होता है; यह कहानी भारत में नवपाषाण काल (अंग्रेज़ी में) में है। उन गाँवों के नगर बनने की कहानी सिंधु घाटी सभ्यता (अंग्रेज़ी में) में पढ़ें।
यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के विगत वर्षों के प्रश्न
विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।
- यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2015, सामान्य अध्ययन-I'भारत की मध्यपाषाण शिला-कला न केवल उस काल के सांस्कृतिक जीवन को, बल्कि आधुनिक चित्र-कला से तुलनीय परिष्कृत सौंदर्य-बोध को भी, प्रतिबिंबित करती है।' इस टिप्पणी का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।
उत्तर-लेखन रूपरेखा
प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।
भूमिका: मध्य भारत के मध्यपाषाण शैल-चित्रों से, विशेषकर भीमबेटका के काल II से शुरुआत करें, जो भारत में प्रागैतिहासिक चित्रों का सबसे बड़ा समूह है (लगभग 12,000 से 10,000 वर्ष पूर्व)।
मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):
- सांस्कृतिक जीवन: काँटेदार भालों, तीर-कमान, जाल और फंदों से समूह में शिकार; सामूहिक नृत्य, शहद इकट्ठा करना, स्त्रियों का अनाज पीसना, बच्चों का खेलना; शवाधान और पारिवारिक दृश्य।
- सौंदर्य-बोध: अनुपात और रंगत के साथ प्राकृतिक रूप में बने जानवर, शिकार की नाटकीय कहानियाँ, वास्तविकता से अधिक तगड़े और रौबदार दिखाए गए जानवर।
- तकनीक: हिरमच (गेरू) से लाल, कैल्सेडोनी से हरा, संभवतः चूना पत्थर से सफ़ेद रंग; चर्बी, गोंद या राल मिलाकर पौधों के रेशों के ब्रश से चित्रण; परतों का अध्यारोपण।
- जहाँ सावधानी चाहिए: ये प्राकृतिक शैलाश्रयों में बने चित्र हैं, शैलकृत स्थापत्य नहीं; मनुष्य केवल शैलीबद्ध रूप में हैं; कई परतों का काल-निर्धारण उनके क्रम पर टिका है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष दें कि ये चित्र प्रागैतिहासिक जीवन और कौशल का समृद्ध अभिलेख हैं, जबकि आधुनिक चित्रकला से इनकी तुलना सावधानी से करनी चाहिए।
स्रोत
- NCERT: भारतीय कला का परिचय, भाग 1 (कक्षा 11), अध्याय 1, प्रागैतिहासिक शैल-चित्र
- NCERT: Our Pasts I (Class VI), On the Trail of the Earliest People and From Gathering to Growing Food
- NCERT: An Introduction to Indian Art, Part I (Class XI), Prehistoric Rock Paintings
- PIB: Bhimbetka Rock Shelters in Madhya Pradesh declared World Heritage (4 July 2003)
- PIB: World Heritage Day explainer (Ministry of Culture, 2022)
- Ministry of Culture: Rock Shelters of Bhimbetka
- IGNCA (Ministry of Culture): The Art on Rocks
- Wikipedia: Mesolithic
- Wikipedia: Microlith
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- Wikipedia: Tilwara
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- Wikipedia: Rock art
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- Wikipedia: G. R. Sharma
- Wikipedia: Kana, West Bengal
- UPSC: Civil Services Examination question papers
संपादकीय अस्वीकरण
यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तकों और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है। प्रागैतिहासिक स्थलों की तिथियाँ नई विधियों के साथ संशोधित होती रहती हैं।
