परिचय

समसामयिकी
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III

EOS-05 और GSLV-F17
भारत का पहला भूतुल्यकाली इमेजिंग उपग्रह
2,367 किग्रा GSLV का सबसे भारी उपग्रह5 मिनट चुने हुए क्षेत्र का दोबारा चित्र30 मिनट पूरे भारत का चित्र
एक नज़र में
दूसरा नामGISAT-1A, 2021 में नष्ट हुए EOS-03 का स्थान लेने वाला
कक्षाइंजन के तीन दहनों के बाद लगभग 34,903 x 35,884 किमी
कक्षीय स्थान85.5 डिग्री पूर्व
संवेदक42 मीटर पर 6 बहुस्पेक्ट्रमी चैनल; 158 और 256 अतिस्पेक्ट्रमी
digitallylearn.comUPSC-CSE समसामयिकी

EOS-05, जिसे GISAT-1A भी कहते हैं, भारत का पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है, जिसे 4 सितंबर 2026 को GSLV-F17 से प्रमोचित किया गया। यह भारत का पहला ऐसा इमेजिंग उपग्रह है जो लगभग 36,000 किमी ऊँची भूतुल्यकाली कक्षा से पृथ्वी को देखने के लिए बना है; वहाँ से यह किसी चुने हुए क्षेत्र का चित्र हर पाँच मिनट में और पूरे भारत का चित्र हर 30 मिनट में ले सकता है।

GSLV-F17 से EOS-05 का प्रमोचन: यह चर्चा में क्यों है

मिशन का ब्योरा: तिथि, समय, उपग्रह का भार और स्थानांतरण कक्षा

रॉकेट ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे प्रमोचन पैड से उड़ान भरी, और लगभग 18 मिनट बाद 2,367 किग्रा के उपग्रह को निर्धारित कक्षा में छोड़ दिया। यह भूतुल्यकाली उपग्रह प्रमोचन यान (GSLV) की 19वीं उड़ान थी और श्रीहरिकोटा से 107वाँ प्रमोचन। EOS-05 अब तक GSLV द्वारा ले जाया गया सबसे भारी उपग्रह भी है। पहले GSLV, D1, ने 1,536 किग्रा का भार उठाया था; इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने इस बढ़त का श्रेय हल्की संरचना और बेहतर प्रणोदन को दिया।

रॉकेट उपग्रह को उसकी कार्य-कक्षा तक नहीं ले गया। उसने EOS-05 को एक उप-भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा (sub-GTO) में छोड़ा। यह एक लंबा दीर्घवृत्त है, जिसका निकटतम बिंदु पृथ्वी से केवल लगभग 171 किमी ऊपर था और दूरस्थ बिंदु भूतुल्यकाली वलय की ओर बहुत दूर तक जाता था। आगे की चढ़ाई उपग्रह को स्वयं पूरी करनी थी। कक्षा से आए पहले आँकड़ों में उसके वाल्व ठीक काम करते और सौर पैनल खुले हुए दिखे।

कक्षा उन्नयन: द्रव एपोजी मोटर के तीन दहन और भूतुल्यकाली कक्षा

उपग्रह अपनी कक्षा अपने ही इंजन से ऊपर उठाता है; EOS-05 में यह इंजन द्रव एपोजी मोटर (Liquid Apogee Motor, LAM) है। हर दहन दीर्घवृत्त के दूसरे छोर को ऊपर उठाता है, इसलिए उपग्रह एक बार में नहीं, सीढ़ी की तरह चरणों में चढ़ता है।

  1. पहला दहन, 5 सितंबर: LAM 5,406.4 सेकंड, अर्थात् लगभग 90 मिनट चला और रात 8.19 बजे रुका। इससे कक्षा लगभग 20,000 किमी x 31,129 किमी हो गई।
  2. दूसरा दहन, 6 सितंबर: लगभग पाँच मिनट के छोटे दहन ने कक्षा को और ऊपर, लगभग 35,786 किमी की तुल्यकाली ऊँचाई की ओर उठाया।
  3. तीसरा दहन, 7 सितंबर: LAM 1,247 सेकंड चला, और EOS-05 लगभग 34,903 किमी x 35,884 किमी की कक्षा में पहुँच गया। इसके बाद कुछ दिन उपग्रह की जाँच होनी थी, फिर इमेजिंग प्रणालियाँ चालू की जानी थीं।
EOS-05 की कक्षा का परास-आरेख। 4 सितंबर 2026 के प्रमोचन के बाद इसका निम्नतम बिंदु लगभग 171 किमी था। 5 सितंबर को द्रव एपोजी मोटर के 5,406.4 सेकंड के पहले दहन से कक्षा लगभग 20,000 x 31,129 किमी हुई। 6 सितंबर के छोटे दूसरे दहन से कक्षा और ऊपर गई, और 7 सितंबर के 1,247 सेकंड के तीसरे दहन ने इसे लगभग 34,903 x 35,884 किमी पर, तुल्यकाली ऊँचाई 35,786 किमी के आसपास पहुँचा दिया।

इसरो का लक्ष्य 85.5 डिग्री पूर्व का कक्षीय स्थान है, जो भूमध्य रेखा पर बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में पड़ता है और जहाँ से पूरा भारत दृष्टि में रहता है। कक्षा के ये दहन प्रमोचन जितने ही महत्त्वपूर्ण थे। जनवरी 2025 में नौवहन उपग्रह NVS-02 सुरक्षित रूप से स्थानांतरण कक्षा तक तो पहुँचा, पर वहीं अटक गया, क्योंकि उसके मुख्य इंजन में ऑक्सीकारक पहुँचाने वाले वाल्व खुले ही नहीं।

प्रमोचन का महत्त्व: PSLV की विफलताओं के बाद पहली सफलता

12 जनवरी 2026 के बाद इसरो ने कोई प्रमोचन नहीं किया था। उस दिन PSLV-C62 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-N1 को ले जाते हुए विफल हुआ था, और यह इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट की लगातार दूसरी विफलता थी। इससे पहले 18 मई 2025 को PSLV-C61 EOS-09 के साथ विफल हुआ था; दोनों विफलताओं का कारण तीसरे चरण की गड़बड़ी पाई गई। सावधानी बरतते हुए इसरो ने 2026 की पहली तिमाही के लिए तय सात मिशन रोक दिए, जिनमें EOS-05 भी था।

इस प्रमोचन ने एक पुराना अध्याय भी पूरा किया। EOS-03 (GISAT-1) 12 अगस्त 2021 को तब नष्ट हो गया था, जब GSLV-F10 का क्रायोजेनिक तीसरा चरण प्रज्वलित नहीं हुआ; EOS-05 उसी का स्थान लेने वाला उपग्रह है। जिस प्रकार के ऊपरी चरण ने पहला प्रयास विफल किया, उसी ने दूसरे प्रयास को कक्षा तक पहुँचाया; इसीलिए इस सफलता को क्रायोजेनिक चरण पर भरोसे की पुष्टि माना गया।

यह विराम केवल इसरो का था: स्काईरूट एयरोस्पेस का निजी रूप से बना विक्रम-1 रॉकेट 18 जुलाई 2026 को सफलतापूर्वक प्रमोचित हुआ। फिर भी PSLV की लगातार दो विफलताएँ बताती हैं कि भरोसेमंद होने का पुराना रिकॉर्ड कोई गारंटी नहीं है। किसी अंतरिक्ष एजेंसी को अंततः इसी से परखा जाता है कि वह कितनी बार उड़ान भरती है और उसके उपग्रह कितने उपयोगी हैं।

समय-रेखा: अगस्त 2021 में GSLV-F10 के साथ EOS-03 नष्ट हुआ; जनवरी 2025 में GSLV-F15 से प्रक्षेपित NVS-02 स्थानांतरण कक्षा में अटक गया; मई 2025 में PSLV-C61 के साथ EOS-09 नष्ट हुआ; जुलाई 2025 में GSLV-F16 ने NISAR को कक्षा में पहुँचाया; जनवरी 2026 में PSLV-C62 के साथ EOS-N1 नष्ट हुआ; जुलाई 2026 में निजी रॉकेट विक्रम-1 का प्रमोचन हुआ; और सितंबर 2026 में GSLV-F17 ने EOS-05 को कक्षा में पहुँचाया।

EOS-05 (GISAT-1A) में क्या है: दूरबीन, संवेदक और दोबारा देखने का अंतराल

I-2K बस और 700 मिमी की रिची-क्रेटियन दूरबीन

EOS-05 इसरो की I-2K उपग्रह बस पर बना है, जो पहले से परखा हुआ ढाँचा है; इसलिए इस मिशन में नया उसका कैमरा है। यह कैमरा 700 मिमी की रिची-क्रेटियन दूरबीन है, जिसकी रूपरेखा कार्टोसैट-2A में प्रयुक्त डिज़ाइन पर आधारित है। इसमें दृश्य और निकट-अवरक्त, तथा लघु-तरंग अवरक्त क्षेत्र के संसूचक लगे हैं।

दूरबीन लक्ष्य से जितनी दूर होगी, उतना कम ब्योरा दिखाएगी। 36,000 किमी से वही दर्पण कुछ सौ किमी की ऊँचाई की तुलना में ज़मीन का कहीं बड़ा टुकड़ा देखता है, इसलिए भूतुल्यकाली कक्षा से ज़मीनी ब्योरे की सीमा दर्पण का आकार तय करता है।

बहुस्पेक्ट्रमी और अतिस्पेक्ट्रमी इमेजिंग: 6, 158 और 256 चैनल

साधारण कैमरे से अलग, ये संवेदक मापते हैं कि ज़मीन अलग-अलग तरंगदैर्ध्यों पर प्रकाश को कितना परावर्तित करती है। वनस्पति, जल और भूमि के दूसरे आवरण प्रकाश को अपने-अपने ढंग से परावर्तित करते हैं, इसलिए प्रकाश को पट्टियों में बाँटने से ही चित्र में इन्हें अलग पहचाना जा सकता है।

EOS-05 के तीन संवेदक समूह
संवेदक समूह चैनल तरंगदैर्ध्य परास ज़मीनी विभेदन
बहुस्पेक्ट्रमी, दृश्य और निकट-अवरक्त 6 0.45 से 0.875 माइक्रोमीटर 42 मीटर
अतिस्पेक्ट्रमी, दृश्य और निकट-अवरक्त 158 0.375 से 1.0 माइक्रोमीटर 318 मीटर
अतिस्पेक्ट्रमी, लघु-तरंग अवरक्त 256 0.9 से 2.5 माइक्रोमीटर 191 मीटर
EOS-05 के संवेदकों का स्पेक्ट्रम-आरेख। बहुस्पेक्ट्रमी समूह में 0.45 से 0.875 माइक्रोमीटर तक 6 चैनल हैं, 42 मीटर विभेदन पर। दृश्य और निकट-अवरक्त अतिस्पेक्ट्रमी समूह में 0.375 से 1.0 माइक्रोमीटर तक 158 चैनल हैं, 318 मीटर पर। लघु-तरंग अवरक्त अतिस्पेक्ट्रमी समूह में 0.9 से 2.5 माइक्रोमीटर तक 256 चैनल हैं, 191 मीटर पर।

संवेदक दो तरह के होते हैं। बहुस्पेक्ट्रमी (multispectral) संवेदक कुछ चौड़ी पट्टियाँ दर्ज करता है, जबकि अतिस्पेक्ट्रमी (hyperspectral) संवेदक सैकड़ों संकरी पट्टियाँ। जो पदार्थ किसी चौड़ी पट्टी में एक जैसे दिखते हैं, वे संकरी पट्टियों में अलग हो जाते हैं, क्योंकि हर पदार्थ अपनी विशिष्ट तरंगदैर्ध्यों पर प्रकाश अवशोषित करता है। इसी से संवेदक वनस्पति, जल और भूमि के दूसरे आवरणों में भेद कर पाते हैं, और आगे बताए गए सभी उपयोग इसी पर टिके हैं।

दोबारा देखने का अंतराल: चुना क्षेत्र हर पाँच मिनट, भारत हर तीस मिनट

मिशन की रूपरेखा ऐसी है कि यह किसी चुने हुए क्षेत्र का चित्र लगभग हर पाँच मिनट में और पूरे भारतीय भूभाग का चित्र लगभग हर 30 मिनट में, 42 मीटर विभेदन पर, ले सके। यही दो आँकड़े इस उपग्रह के होने का कारण हैं।

निम्न कक्षा का उपग्रह गुज़रते समय एक पट्टी का चित्र लेता है, आगे बढ़ जाता है, और उसी जगह कई दिन बाद लौटता है। उस समय बादल हों, तो अगला साफ़ चित्र कई दिन दूर हो सकता है, और इतने में चक्रवात, बाढ़ की लहर या आग का मोर्चा पूरी तरह बदल सकता है। हर आधे घंटे में देखने वाला उपग्रह चित्र लेने को सर्वेक्षण से निगरानी में बदल देता है।

भूस्थिर उपग्रह और भूतुल्यकाली कक्षा: अंतर सरल भाषा में

भूतुल्यकाली और तुल्यकाली कक्षा: अर्थ और ऊँचाई

भूतुल्यकाली कक्षा (geosynchronous orbit) वह कोई भी कक्षा है, जिसका आवर्तकाल पृथ्वी के एक घूर्णन, अर्थात् एक नाक्षत्र दिवस के बराबर हो। ऐसी कक्षा में उपग्रह हर दिन उसी समय आकाश में उसी स्थान पर लौट आता है, पर कक्षा भूमध्य रेखा से झुकी हुई या थोड़ी अंडाकार भी हो सकती है।

भूतुल्यकाली कक्षा का एक विशेष रूप तुल्यकाली कक्षा (भूस्थिर या जियोस्टेशनरी कक्षा) है, जो वृत्ताकार हो और भूमध्य रेखा के तल में स्थित हो। केवल तभी उपग्रह ज़मीन के एक ही बिंदु के ऊपर स्थिर दिखता है। इसकी ऊँचाई लगभग 35,786 किमी है, जो 22,236 मील के बराबर है और जिसे प्रायः 36,000 किमी कहा जाता है; पृथ्वी के केंद्र से इसकी त्रिज्या 42,164 किमी है।

  • हर तुल्यकाली कक्षा भूतुल्यकाली होती है: उसका आवर्तकाल एक दिन का होता है।
  • हर भूतुल्यकाली कक्षा तुल्यकाली नहीं होती: झुकी हुई या अंडाकार एक-दिवसीय कक्षा में उपग्रह स्थिर रहने के बजाय हर दिन आकाश में एक छोटा पथ बनाता है।
  • तीन शर्तें कक्षा को तुल्यकाली बनाती हैं: एक दिन का आवर्तकाल, वृत्ताकार आकार, और भूमध्य रेखा के तल में स्थिति।

इसरो EOS-05 को भूतुल्यकाली इमेजिंग उपग्रह कहता है। तीसरे दहन के बाद इसकी कक्षा, लगभग 34,903 किमी x 35,884 किमी, तुल्यकाली वलय के बहुत पास थी, पर ठीक उस पर नहीं। UPSC ऊपर दी गई शर्तों पर एक से अधिक बार प्रश्न पूछ चुका है। प्रश्नों को व्याख्या सहित विगत वर्षों के प्रश्न खंड में पूरी तरह हल किया गया है।

भूतुल्यकाली उपग्रह और निम्न कक्षा उपग्रह: विभेदन और दोबारा देखने का अंतराल

अधिकांश इमेजिंग उपग्रह कुछ सौ किमी ऊँची निम्न कक्षाओं में उड़ते हैं, और उनमें से कई सूर्य-तुल्यकाली कक्षा में होते हैं। ऐसी कक्षा हर स्थान के ऊपर से एक ही स्थानीय समय पर गुज़रती है, ताकि लगातार चित्रों में रोशनी एक जैसी रहे। 500 से 800 किमी ऊँचा ध्रुवीय उपग्रह एक चक्कर लगभग 100 मिनट में पूरा करता है, इसलिए वह पृथ्वी को पट्टी-दर-पट्टी, हर चक्कर में एक पट्टी, देखता है।

सूर्य-तुल्यकाली और तुल्यकाली उपग्रहों की तुलना
विशेषता सूर्य-तुल्यकाली (निम्न कक्षा) तुल्यकाली
ऊँचाई लगभग 700 से 900 किमी लगभग 36,000 किमी
व्याप्ति हर चक्कर में एक पट्टी; 81 डिग्री उत्तर से 81 डिग्री दक्षिण एक साथ ग्लोब का लगभग एक-तिहाई
कक्षीय आवर्तकाल दिन में लगभग 14 चक्कर 24 घंटे
विभेदन सूक्ष्म स्थूल
सामान्य उपयोग पृथ्वी के संसाधन दूरसंचार और मौसम
पैमाने पर बना चित्र: पृथ्वी, उसकी सतह से सटी 700 से 900 किमी ऊँची निम्न कक्षा, और उससे बहुत दूर 35,786 किमी ऊँचा तुल्यकाली वलय, जो पृथ्वी के केंद्र से 42,164 किमी पर है।

EOS-05 इस तालिका की अंतिम पंक्ति बदल देता है: यह पृथ्वी के संसाधनों को देखने वाला उपकरण उस कक्षा में ले गया, जो अब तक मौसम और संचार के लिए प्रयुक्त होती थी। इसका 42 मीटर विभेदन निम्न कक्षा के सबसे सूक्ष्म चित्रों की तुलना में स्थूल है, पर मौसम उपग्रहों के किलोमीटर-स्तर के पिक्सेलों से कहीं बारीक है, और यह कुछ ही मिनटों में फिर देख सकता है।

भारत के तुल्यकाली और भूतुल्यकाली उपग्रह: इनसैट और नाविक

भारत दशकों से तुल्यकाली कक्षा से पृथ्वी को देखता आया है, पर मौसम उपग्रहों, INSAT-3D श्रृंखला, और दूरसंचार तथा प्रसारण में काम आने वाले इनसैट संचार उपग्रहों के माध्यम से। उसके समर्पित इमेजिंग उपग्रह, IRS श्रृंखला से लेकर आज तक, निम्न, ध्रुवीय या सूर्य-तुल्यकाली कक्षाओं में ही रहे हैं।

नौवहन प्रणाली नाविक (NavIC), अर्थात् भारतीय क्षेत्रीय-संचालन उपग्रह प्रणाली (IRNSS), बताती है कि कोई कक्षा भूतुल्यकाली होकर भी तुल्यकाली क्यों नहीं होती। इसकी रूपरेखा में तीन उपग्रह तुल्यकाली कक्षा में और चार झुकी हुई भूतुल्यकाली कक्षाओं में हैं। झुके हुए उपग्रह हर दिन भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण की ओर झूलते हैं, जिससे भारत के ऊपर आकाश में उपग्रह फैले रहते हैं और स्थिति-निर्धारण बेहतर होता है। नाविक भारत और उसकी सीमाओं से 1,500 किमी तक के क्षेत्र को सेवा देता है। मार्च 2026 तक केवल तीन नाविक उपग्रह स्थिति-सेवा दे पा रहे थे, जो सटीक स्थिति के लिए आवश्यक चार से कम है; कारण थे परमाणु घड़ियों की विफलता और NVS-02 का अपनी कक्षा तक न पहुँच पाना।

EOS-05 के उपयोग: आपदा, कृषि, पराली की आग और सुरक्षा

चक्रवात, बाढ़, बादल फटना और हिमनद से जुड़े खतरे

इस उपग्रह का पहला उपयोग उन आपदाओं में है, जो कुछ ही घंटों में बदल जाती हैं: चक्रवात, बाढ़, बादल फटना और जंगल की आग। 85.5 डिग्री पूर्व से पूरी बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिमालय का चाप एक साथ दृष्टि में रहते हैं। इसलिए किसी तूफ़ान या उफनती नदी को कभी-कभार के चित्रों से जोड़कर समझने के बजाय पूरे दिन लगातार देखा जा सकता है।

भारत और पड़ोसी देशों का मानचित्र, राज्यों की सीमाओं के साथ। क्रमांकित चिह्न: श्रीहरिकोटा, प्रमोचन स्थल; हैदराबाद के पास शादनगर, जहाँ उपग्रह आँकड़े प्राप्त होते हैं; पंजाब, जहाँ पराली की आग पर नज़र रखी जाती है; और नेपाल की भोटे कोशी घाटी, जहाँ 2026 में बाढ़ आई। बिंदुदार रेखा 85.5 डिग्री पूर्व देशांतर है, जिस पर EOS-05 बहुत दक्षिण में भूमध्य रेखा के ऊपर स्थित है।

प्रमोचन का समय इस बात को स्पष्ट कर गया। 26 अगस्त 2026 को चीन-नेपाल सीमा पर हिमनद और पहाड़ के ढहने से नेपाल में भोटे कोशी की बाढ़ आई, जिसमें 7 सितंबर तक 1,344 लोगों की जान जा चुकी थी। उन्हीं ढलानों के बार-बार लिए गए चित्र भू-आकृतियों में ऐसे बदलाव दिखा सकते हैं, जो हिमनद टूटने और हिमस्खलन से पहले होते हैं; कई दिन बाद लौटने वाला उपग्रह ऐसे संकेत चूक सकता है।

फसल, जल निकाय और पराली जलाने के समय की समस्या

धीरे होने वाले बदलाव भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं: फसलों की स्थिति, वन आवरण, जल निकायों का विस्तार और भूमि उपयोग। मानसून में बादल प्रकाशीय उपग्रहों को रोक देते हैं। हर 30 मिनट में देखने वाले संवेदक के लिए किसी ज़िले के ऊपर साफ़ आकाश का क्षण पकड़ना, कुछ दिन में एक बार गुज़रने वाले उपग्रह की तुलना में कहीं आसान है।

पंजाब में पराली जलाना इस समस्या का सटीक उदाहरण है। आग की गिनती अब तक उन ध्रुवीय कक्षा उपग्रहों से होती रही है, जो दिन में भारत के ऊपर से गुज़रते हैं। इसरो के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के एक अध्ययन में पाया गया कि आग का चरम समय 2020 में दोपहर लगभग 1.30 बजे से खिसककर 2024 में शाम लगभग 5 बजे हो गया, अर्थात् उन उपग्रहों के गुज़र जाने के बाद। 3 सितंबर 2026 को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने बताया कि वह खेतों की आग का बेहतर ज़मीनी सत्यापन करने के लिए इसरो के साथ काम कर रहा है।

समुद्री जागरूकता और निरंतर दृश्य से मिलने वाले सामरिक आँकड़े

इसरो EOS-05 को एक सामरिक उपग्रह कहता है, और यह शब्द सुरक्षा से लेकर मौसम तक फैला है। उत्तरी हिंद महासागर पर निरंतर दृष्टि समुद्र में होने वाली गतिविधि पर ऐसी नज़र रखने में मदद करती है, जो कभी-कभार गुज़रने वाले उपग्रह नहीं रख सकते। किसी बड़े क्षेत्र में कुछ बदला है, यह एक घंटे के भीतर पता चल जाए, तो अधिक सूक्ष्म उपग्रह या गश्ती दल को सही जगह भेजा जा सकता है।

यह सब इस पर निर्भर है कि आँकड़े पर्याप्त विश्लेषकों तक पहुँचें, जो चित्रों को पूर्वानुमान और निर्णय में बदल सकें। भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के अनुसार 5 मीटर या उससे अधिक भू-प्रतिचयन दूरी वाले इसरो के आँकड़े सबके लिए निःशुल्क और मुक्त रूप से उपलब्ध कराए जाने हैं, इसलिए EOS-05 के 42 मीटर वाले चित्र इसी मुक्त श्रेणी में आते हैं। भारत में उपग्रह आँकड़े हैदराबाद के पास शादनगर के भू-केंद्र पर प्राप्त होते हैं, फिर उनकी त्रुटियाँ ठीक करके उन्हें उपयोगकर्ताओं के लिए मानचित्रों और तालिकाओं में बदला जाता है।

भारत के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह और प्रमोचन वाहन

IRS से EOS श्रृंखला तक: कार्टोसैट, रीसैट और ओशनसैट

भारत में पृथ्वी अवलोकन भारतीय सुदूर संवेदन (IRS) उपग्रहों से शुरू हुआ; ध्रुवीय उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने का कार्यक्रम 1980 के दशक के अंत में आरंभ हुआ। बाद की श्रृंखलाएँ अलग-अलग कामों में विशेषज्ञ हैं: कार्टोसैट मानचित्रण के लिए उच्च विभेदन कैमरे ले जाता है, रीसैट सिंथेटिक एपर्चर रडार ले जाता है जो बादलों के पार हर मौसम में चित्र लेता है, और ओशनसैट समुद्र का अवलोकन करता है।

इसरो अब इन सभी श्रृंखलाओं के पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों को एक ही EOS क्रम में नाम देता है, इसलिए नाम से उपकरण का पता नहीं चलता। EOS-01 पहले रीसैट-2BR2 था, EOS-04 रीसैट-1A था और EOS-06 ओशनसैट-3 है; EOS-05 का पुराना नाम GISAT-1A, अर्थात् भू-इमेजिंग उपग्रह, है। पहले की श्रृंखलाओं के IRS क्रमांक भी थे: ओशनसैट-1 IRS-P4 था, कार्टोसैट-1 IRS-P5 और कार्टोसैट-2 IRS-P7।

पीएसएलवी और जीएसएलवी में अंतर: LVM3, चरण और क्रायोजेनिक ऊपरी चरण

भारत के प्रमोचन वाहन कक्षा के अनुसार काम बाँटते हैं। ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (PSLV) पृथ्वी के संसाधनों और सुदूर संवेदन के उपग्रहों को निम्न और सूर्य-तुल्यकाली कक्षाओं में ले जाता रहा है, जबकि GSLV मुख्यतः संचार उपग्रहों को भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा में पहुँचाने के लिए बना था। यह बँटवारा प्रवृत्ति है, नियम नहीं: 30 जुलाई 2025 को GSLV-F16 ने इसरो और नासा के संयुक्त रडार उपग्रह NISAR को सूर्य-तुल्यकाली कक्षा में पहुँचाया।

भारत के प्रमोचन वाहनों की तुलना
प्रमोचन वाहन चरण सामान्य काम
PSLV चार चरण, ठोस और द्रव बारी-बारी से निम्न और सूर्य-तुल्यकाली कक्षाएँ
GSLV तीन चरण, ऊपरी चरण क्रायोजेनिक भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा; निम्न कक्षा के भारी उपग्रह
LVM3 (पहले GSLV Mk III) दो S200 ठोस बूस्टर, L110 द्रव कोर और C25 क्रायोजेनिक ऊपरी चरण भारत के सबसे भारी उपग्रह; शुक्र कक्षित्र मिशन के लिए चुना गया

क्रायोजेनिक चरण द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन जलाता है, जिन्हें अत्यधिक ठंडा रखना पड़ता है, और इसरो के लिए यही चरण साधना सबसे कठिन रहा है। 2021 में GSLV-F10 पर प्रज्वलन के समय हाइड्रोजन टंकी का दाब सामान्य से कम था, जिससे चरण का ईंधन बूस्टर टर्बो पंप गड़बड़ा गया और चरण ठीक से चला ही नहीं।

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के बाद इसरो: सुधार और कर्मचारियों की बहस

इसरो, NSIL, IN-SPACe और अंतरिक्ष विभाग की भूमिकाएँ

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 अंतरिक्ष क्षेत्र का काम चार सार्वजनिक संस्थाओं में बाँटती है और पूरी मूल्य-शृंखला निजी कंपनियों के लिए खोलती है। इसरो के लिए इसका मुख्य निर्देश है कि वह परिचालन प्रणालियों के निर्माण से हटे और परिपक्व प्रणालियाँ उद्योग को सौंप दे।

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 में किसकी क्या भूमिका
संस्था भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 में भूमिका
इसरो नई अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों और अनुप्रयोगों का अनुसंधान और विकास; मानव अंतरिक्ष उड़ान; परिपक्व प्रणालियाँ उद्योग को सौंपना और परिचालन प्रणालियों का निर्माण छोड़ना; सुदूर संवेदन आँकड़ों तक मुक्त पहुँच
NSIL (न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड) अंतरिक्ष विभाग के अधीन सार्वजनिक उपक्रम; सार्वजनिक धन से बनी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों और प्लेटफ़ॉर्मों का व्यावसायीकरण
IN-SPACe स्वायत्त एकल-खिड़की एजेंसी, जो सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा और प्राधिकार देती है
अंतरिक्ष विभाग नीति का नोडल विभाग; निरंतर पृथ्वी अवलोकन क्षमता सुनिश्चित करना और विवाद सुलझाना

EOS-05 जैसे मिशन के लिए यह बँटवारा मायने रखता है। इसरो नई प्रणालियाँ बनाता और परखता है; प्रणाली परिपक्व हो जाए, तो उसका उत्पादन उद्योग के पास जाना है, जिसमें NSIL उसे बेचेगा और IN-SPACe निजी संचालकों को अनुमति देगा। वहीं अंतरिक्ष विभाग पर यह दायित्व रहता है कि देश में पृथ्वी अवलोकन आँकड़ों की कभी कमी न हो।

इसरो कर्मचारी संघों का पत्र और निजीकरण पर बहस

प्रमोचन के दिन, 4 सितंबर को, इसरो के नौ कर्मचारी संघों ने इसरो अध्यक्ष को पत्र लिखकर पूछा कि क्या सरकार एजेंसी का प्रमोचन वाहन और उपग्रह निर्माण निजी कंपनियों को सौंपना चाहती है। उन्होंने IN-SPACe अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका की 21 अगस्त की उस टिप्पणी का उल्लेख किया कि इसरो आगे चलकर प्रमोचन वाहन नहीं बनाएगा। साथ ही उन्होंने स्वीकृत पदों, अगले पाँच से दस वर्षों की भर्ती, और अपरिवर्तनीय निर्णयों से पहले परामर्श के बारे में पूछा।

डॉ. गोयनका ने 6 सितंबर को उत्तर दिया, और उसके बाद इसरो ने विस्तृत स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि इसरो की भूमिका "किसी भी तरह कम नहीं हो रही"; उद्योग परिपक्व रॉकेटों और उपग्रहों का उत्पादन बढ़ाएगा, जबकि इसरो उन्नत अनुसंधान और 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन तथा 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन जैसे अभियानों पर ध्यान देगा। इसरो ने निजीकरण की बात को निराधार बताया, कहा कि महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष अवसंरचना का स्वामित्व सरकार के पास रहेगा, और बताया कि देश में 450 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्ट-अप हैं तथा लगभग 8.4 अरब डॉलर की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 2033 तक 44 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है।

पदों और भर्ती से जुड़ी असली चिंता का उत्तर किसी ने नहीं दिया। अंतरिक्ष विभाग के कर्मचारी ट्रेड यूनियन नहीं बना सकते, क्योंकि वे "उद्योग" की सांविधिक परिभाषा से बाहर हैं; वे केंद्रीय सिविल सेवा (सेवा संघों की मान्यता) नियम, 1993 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सेवा संघों के रूप में संगठित होते हैं।

विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी या प्रतिष्ठा: बड़ा प्रश्न

यह विवाद एक पुराना प्रश्न फिर उठाता है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम किसलिए है। इसकी नींव अंतरिक्ष होड़ में शामिल होने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक विकास के साधन के रूप में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिए रखी गई थी। आपदा चेतावनी से फसल निगरानी तक, EOS-05 के बताए गए उपयोग इसी परंपरा में आते हैं।

यह बदलाव स्पष्ट रूप से नासा से प्रेरित है, और नासा स्वयं 1960 के दशक के बाद सिकुड़ा है: अमेरिकी GDP में उसकी हिस्सेदारी 1966 के 0.7 प्रतिशत से घटकर अब 0.1 प्रतिशत रह गई है, और अपोलो के चरम पर 36,000 सिविल सेवकों से घटकर लगभग 14,000। नासा का 24.4 अरब डॉलर का बजट अंतरिक्ष विभाग के ₹13,705 करोड़ के बजट का 16 गुना है। आरंभिक नासा के विपरीत, इसरो सदा से वालचंदनगर और L&T जैसे निजी निर्माताओं के साथ काम करता आया है।

वैश्विक अंतरिक्ष सहयोग में भारत और EOS-05 की सीमाएँ

पेरिस का अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष शिखर सम्मेलन: ESA, CNES और भारत

प्रमोचन के कुछ ही दिन बाद भारत का अंतरिक्ष नेतृत्व पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष शिखर सम्मेलन में था। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और इसरो के बीच गगनयान को भू-केंद्र सहायता देने के लिए पहले से एक तकनीकी कार्यान्वयन योजना है। गगनयान का लक्ष्य तीन सदस्यों के दल को तीन दिन के लिए 400 किमी की कक्षा में भेजना है। दोनों एजेंसियाँ चंद्र अन्वेषण और शुक्र कक्षित्र मिशन पर भी सहयोग की संभावनाएँ तलाश रही थीं। ₹1,236 करोड़ की लागत से स्वीकृत यह मिशन 29 मार्च 2028 को LVM3 से पृथ्वी से रवाना होगा और 112 दिन की यात्रा के बाद 19 जुलाई 2028 को शुक्र पहुँचेगा।

फ़्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी CNES ने कहा कि PSLV की विफलताओं के बावजूद उसे इसरो पर पूरा भरोसा है; पृथ्वी की सतह के तापमान का मानचित्रण करने वाला संयुक्त उपग्रह TRISHNA अगले वर्ष PSLV से प्रमोचित होना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन में बताया कि 34 देशों के 430 से अधिक उपग्रह भारतीय रॉकेटों से अंतरिक्ष में जा चुके हैं। उन्होंने चंद्रयान-3, आदित्य-L1 और 2025 में एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री की अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यात्रा का उल्लेख किया, और 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन तथा 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय का लक्ष्य दोहराया।

EOS-05 की सीमाएँ: विभेदन, आँकड़ों का उपयोग और प्रमोचन की गति

तुल्यकाली कक्षा से इमेजिंग दुनिया के लिए नई नहीं है। चीन 28 दिसंबर 2015 से गाओफ़ेन 4 चला रहा है, जो तुल्यकाली कक्षा का प्रकाशीय इमेजिंग उपग्रह है और दृश्य प्रकाश में 50 मीटर विभेदन देता है। भारत के लिए नई बात यह है कि उसने वहाँ मौसम संवेदक के बजाय भूमि देखने वाला उपकरण रखा है।

  • स्थूल ब्योरा: 42 मीटर पर कोई इमारत नहीं दिखती और छोटा खेत एक पिक्सेल भर रह जाता है; इसलिए वस्तुओं को पहचानने का काम निम्न कक्षा के उपग्रहों के पास रहेगा, और बादलों के पार देखने का काम रडार के पास।
  • आँकड़ों का उपयोग: हर 30 मिनट में भारत का चित्र तभी काम का है, जब वह संसाधित होकर अगले चित्र से पहले पूर्वानुमानकर्ताओं, आपदा प्रबंधकों और कृषि विभागों तक पहुँच जाए।
  • प्रमोचन की गति: PSLV की दो विफलताओं के बाद GSLV की एक साफ़ उड़ान अपने-आप में बहुत कुछ तय नहीं करती; आने वाले वर्ष की कसौटी यह है कि कितने मिशन उड़ते हैं और अपनी कक्षाओं तक पहुँचते हैं।

UPSC के लिए EOS-05: पाठ्यक्रम और परीक्षा की दृष्टि

UPSC पाठ्यक्रम में EOS-05: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी

EOS-05 सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III के अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता वाले विषय में, और उसी प्रश्नपत्र के आपदा प्रबंधन में आता है। कर्मचारियों की बहस और भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 इसमें शासन का पहलू जोड़ते हैं, और राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ भी प्रमोचन वाहनों और कक्षाओं पर यही तथ्य पूछती हैं।

  1. याद रखने योग्य तथ्य: 4 सितंबर 2026; GSLV-F17, GSLV की 19वीं उड़ान; 2,367 किग्रा; GISAT-1A; 85.5 डिग्री पूर्व का स्थान; 42 मीटर पर छह बहुस्पेक्ट्रमी चैनल; चुना हुआ क्षेत्र हर पाँच मिनट, भारत हर 30 मिनट।
  2. समझाने योग्य अवधारणाएँ: भूतुल्यकाली और तुल्यकाली कक्षा का अंतर, स्थानांतरण कक्षा और कक्षा उन्नयन, बहुस्पेक्ट्रमी और अतिस्पेक्ट्रमी संवेदन, तथा विभेदन बनाम दोबारा देखने का अंतराल।
  3. मुख्य परीक्षा में उपयोग: आपदा प्रबंधन और कृषि में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, पराली की आग के समय की समस्या, और इसरो, NSIL तथा IN-SPACe की भूमिकाएँ।

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2016, सामान्य अध्ययन-IIIअंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों की चर्चा कीजिए। इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक हुआ है?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: चर्चा कीजिए · दृष्टिकोण: प्रश्न के दो भाग हैं: पहले उपलब्धियाँ, फिर सामाजिक-आर्थिक विकास में उनका उपयोग। हर उपलब्धि के साथ एक प्रमाण दें, फिर उसे किसी विशिष्ट विकास-उपयोग से जोड़ें; अंत में उन संस्थाओं की बात करें जो आँकड़ों को निर्णयों में बदलती हैं।

    भूमिका: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के मूल उद्देश्य से शुरुआत करें, अर्थात् प्रतिष्ठा के बजाय सामाजिक विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, और इसके ताज़ा उदाहरण के रूप में EOS-05 (4 सितंबर 2026) का उल्लेख करें।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्रमोचन क्षमता: निम्न और सूर्य-तुल्यकाली कक्षाओं के लिए PSLV; क्रायोजेनिक ऊपरी चरण वाला GSLV भूतुल्यकाली स्थानांतरण कक्षा के लिए (EOS-05, 2,367 किग्रा, उसका सबसे भारी उपग्रह); सबसे भारी के लिए LVM3।
    • उपग्रह: IRS से EOS श्रृंखला (कार्टोसैट मानचित्रण, रीसैट रडार, ओशनसैट समुद्र); इनसैट मौसम और संचार; नाविक नौवहन; हर 30 मिनट में भारत का चित्र लेने वाला EOS-05।
    • अन्वेषण और सहयोग: चंद्रयान-3, आदित्य-L1, गगनयान; भारतीय रॉकेटों से 430 से अधिक विदेशी उपग्रहों का प्रमोचन।
    • विकास में उपयोग: चक्रवात और बाढ़ की चेतावनी, फसल और जल निगरानी, पराली की आग के समय की समस्या, समुद्री जागरूकता; 2023 की नीति में 5 मीटर या उससे अधिक भू-प्रतिचयन दूरी वाले आँकड़े मुक्त।
    • सेवा का तंत्र: अंतरिक्ष नीति 2023 में इसरो, NSIL और IN-SPACe की भूमिकाएँ; 450 से अधिक स्टार्ट-अप; विकास को केंद्र में रखने पर बहस।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने तकनीकी उपलब्धियों को जन-सेवाओं में बदला है, और अब उसका मूल्य उतना ही आँकड़ों को उपयोगकर्ताओं तक पहुँचाने पर निर्भर है, जितना उपग्रह भेजने पर।

  2. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)दूरसंचार रिले के लिए प्रयुक्त उपग्रहों को तुल्यकाली कक्षा में रखा जाता है। कोई उपग्रह ऐसी कक्षा में तब कहा जाता है, जब:
    1. कक्षा भूतुल्यकाली हो।
    2. कक्षा वृत्ताकार हो।
    3. कक्षा पृथ्वी की भूमध्य रेखा के तल में हो।
    4. कक्षा 22,236 किमी की ऊँचाई पर हो।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

    1. a केवल 1, 2 और 3
    2. b केवल 1, 3 और 4
    3. c केवल 2 और 4
    4. d 1, 2, 3 और 4
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, कक्षा भूतुल्यकाली है: सही, क्योंकि तुल्यकाली कक्षा का आवर्तकाल एक दिन का होता है। चरण 2: कथन 2, कक्षा वृत्ताकार है: सही। चरण 3: कथन 3, कक्षा भूमध्य रेखा के तल में है: सही। चरण 4: कथन 4, ऊँचाई 22,236 किमी: गलत, क्योंकि 22,236 ऊँचाई मील में है; किलोमीटर में यह लगभग 35,786 है। अतः केवल 1, 2 और 3 सही हैं।

    इस भ्रम से बचें: 22,236 संख्या सही है, पर उसकी इकाई मील है। किसी ऊँचाई को सही मानने से पहले इकाई पढ़ें।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1, 2 और 3: सही। तुल्यकाली कक्षा भूतुल्यकाली, वृत्ताकार और भूमध्यरेखीय होती है।
    • (b) केवल 1, 3 और 4: गलत। इसमें वृत्ताकार आकार छूट गया है और गलत ऊँचाई शामिल है।
    • (c) केवल 2 और 4: गलत। इसमें दो सही शर्तें छूट गई हैं और गलत ऊँचाई रखी गई है।
    • (d) 1, 2, 3 और 4: गलत। कथन 4 मील वाली ऊँचाई को किलोमीटर बताता है।

    उत्तर: केवल 1, 2 और 3 सही हैं: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2018भारतीय क्षेत्रीय-संचालन उपग्रह प्रणाली (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम / IRNSS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. IRNSS के तुल्यकाली (जियोस्टेशनरी) कक्षाओं में तीन उपग्रह हैं और भूतुल्यकाली (जियोसिंक्रोनस) कक्षाओं में चार उपग्रह हैं।
    2. IRNSS की व्याप्ति सम्पूर्ण भारत पर और इसकी सीमाओं के लगभग 5500 वर्ग किमी बाहर तक है।
    3. 2019 के मध्य तक भारत की, पूर्ण वैश्विक व्याप्ति के साथ अपनी उपग्रह संचालन प्रणाली होगी।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b केवल 1 और 2
    3. c केवल 2 और 3
    4. d कोई नहीं
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, तीन तुल्यकाली और चार भूतुल्यकाली उपग्रह: सही, यही इसकी रूपरेखा है। चरण 2: कथन 2, सीमाओं से लगभग 5500 वर्ग किमी बाहर तक: गलत, क्योंकि सेवा-क्षेत्र सीमाओं से लगभग 1,500 किमी की दूरी तक है। चरण 3: कथन 3, पूर्ण वैश्विक व्याप्ति: गलत, क्योंकि यह प्रणाली अपनी रूपरेखा से ही क्षेत्रीय है। अतः केवल कथन 1 सही है।

    इस भ्रम से बचें: प्रणाली के नाम में "क्षेत्रीय" शब्द ही कथन 3 को गलत कर देता है, और सेवा-क्षेत्र सीमा से दूरी में बताया जाता है, वर्ग किलोमीटर में नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: सही। केवल कक्षाओं का बँटवारा सही है।
    • (b) केवल 1 और 2: गलत। सीमाओं के बाहर व्याप्ति लगभग 1,500 किमी है, 5500 वर्ग किमी नहीं।
    • (c) केवल 2 और 3: गलत। ये दोनों कथन गलत हैं, और सही कथन 1 छूट गया है।
    • (d) कोई नहीं: गलत। कथन 1 सही है।

    उत्तर: केवल कथन 1 सही है: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।

  4. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2018भारत के उपग्रह प्रमोचित करने वाले वाहनों के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
    1. PSLV से वे उपग्रह प्रमोचित किए जाते हैं जो पृथ्वी के संसाधनों के मानीटरन में उपयोगी हैं, जबकि GSLV को मुख्यतः संचार उपग्रहों को प्रमोचित करने के लिए अभिकल्पित किया गया है।
    2. PSLV द्वारा प्रमोचित उपग्रह आकाश में एक ही स्थिति में स्थायी रूप में स्थिर रहते प्रतीत होते हैं जैसा कि पृथ्वी के एक विशिष्ट स्थान से देखा जाता है।
    3. GSLV Mk III, एक चार-स्टेज वाला प्रमोचन वाहन है, जिसमें प्रथम और तृतीय चरणों में ठोस रॉकेट मोटरों का तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में द्रव रॉकेट इंजनों का प्रयोग होता है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. a केवल 1
    2. b 2 और 3
    3. c 1 और 2
    4. d केवल 3
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: बहु-कथन

    हल करने की विधि: चरण 1: कथन 1, PSLV पृथ्वी के संसाधनों के लिए और GSLV मुख्यतः संचार उपग्रहों के लिए: सही। चरण 2: कथन 2, PSLV के उपग्रह आकाश में स्थिर दिखते हैं: गलत, क्योंकि केवल तुल्यकाली उपग्रह स्थिर दिखता है; निम्न कक्षा के उपग्रह कुछ ही मिनटों में आकाश पार कर जाते हैं। चरण 3: कथन 3, GSLV Mk III चार चरणों वाला है: गलत, इसमें दो ठोस बूस्टर, एक द्रव कोर और एक क्रायोजेनिक ऊपरी चरण है। अतः केवल कथन 1 सही है।

    इस भ्रम से बचें: चार चरण PSLV में होते हैं, GSLV Mk III में नहीं; और आकाश में स्थिर दिखना तुल्यकाली कक्षा का गुण है, किसी प्रमोचन वाहन का नहीं।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल 1: सही। केवल काम का बँटवारा सही है।
    • (b) 2 और 3: गलत। PSLV के उपग्रह स्थिर नहीं दिखते, और LVM3 चार चरणों वाला नहीं है।
    • (c) 1 और 2: गलत। कथन 2 गलत है।
    • (d) केवल 3: गलत। कथन 3 गलत है, जबकि कथन 1 सही है।

    उत्तर: केवल कथन 1 सही है: विकल्प (a), आधिकारिक उत्तर।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख इसरो के मिशन पृष्ठों, भारतीय अंतरिक्ष नीति, NCERT और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।