परिचय

समसामयिकी
अर्थव्यवस्था और शासन – सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II और III

VB-G RAM G अधिनियम, 2025
मनरेगा की जगह 125 दिन की गारंटी
125 दिन प्रति वर्ष60:40 केंद्र-राज्य हिस्सा300 रुपये अंतरिम आधार मजदूरी
एक नज़र में
जगह लीमनरेगा, 2005
वित्तपोषणकेंद्र द्वारा तय मानक आवंटन
विरामखेती के व्यस्त मौसम में 60 दिन तक
2026-27केंद्र का हिस्सा 95,692.31 करोड़ रुपये
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विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025, संक्षेप में VB-G RAM G अधिनियम, वह विधि है जिसने 1 जुलाई 2026 को मनरेगा की जगह ली। इसे राज्य जी राम जी योजना के रूप में चलाते हैं: अकुशल शारीरिक श्रम के लिए आगे आने वाले वयस्कों के हर ग्रामीण परिवार को वर्ष में 125 दिन के मजदूरी रोजगार की गारंटी, अधिकांश राज्यों में 60:40 का लागत बँटवारा, और केंद्र द्वारा तय मानक आवंटन से हर राज्य का वित्तपोषण।

मनरेगा का नया नाम: 1 जुलाई 2026 से VB-G RAM G अधिनियम लागू

अधिनियम का आरंभ, राष्ट्रीय शुभारंभ और पहली किस्त

राष्ट्रीय शुभारंभ 2 जुलाई 2026 को आंध्र प्रदेश के तिरुपति ज़िले के मुक्कावरिपल्ली गाँव में हुआ। ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने एक खेत तालाब की आधारशिला रखी, VB-G RAM G पोर्टल शुरू किया और पहले ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड बाँटे, जो नए जॉब कार्ड हैं। जब तक ये कार्ड हर परिवार तक नहीं पहुँचते, तब तक पुरानी योजना के e-KYC सत्यापित जॉब कार्ड मान्य रहेंगे।

पैसा दो चरणों में आया। केंद्र ने 2026-27 के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 95,692.31 करोड़ रुपये का अंतरिम आवंटन किया, जो ग्रामीण रोजगार के लिए अब तक का सबसे बड़ा बजट अनुमान है, और 5 जुलाई को 25,863 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की, जिसे मदर सैंक्शन कहा गया। सबसे अधिक, 3,210.76 करोड़ रुपये, उत्तर प्रदेश को मिले, फिर आंध्र प्रदेश और राजस्थान को। शुभारंभ की पूर्व संध्या तक 24 राज्य अपनी-अपनी VB-G RAM G योजना अधिसूचित कर चुके थे, जैसा अधिनियम हर राज्य से अपेक्षा करता है।

दिसंबर 2025 के विधेयक से 2026 के नियमों तक

संसद ने यह विधेयक दिसंबर 2025 में पारित किया, और 21 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति की स्वीकृति की घोषणा हुई। ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा था कि बदलाव 1 अप्रैल 2026 को होगा, पर नियम तैयार नहीं थे: VB-G RAM G नियमों का प्रारूप सार्वजनिक परामर्श के लिए 22 मई 2026 को ही जारी हुआ, अंतिम नियम जून के अंत में आए, और नई मजदूरी दरें 30 जून को अधिसूचित हुईं। अप्रैल से जून तक पुरानी योजना अपने-आप चलती रही।

राज्यों की राय बँटी रही। पंजाब विधानसभा ने दिसंबर 2025 में अधिनियम के विरुद्ध सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया, फिर भी राज्य ने 26 जून 2026 को अपनी VB-G RAM G योजना अधिसूचित कर दी। सूचना के अधिकार के एक उत्तर से पता चला कि जिन 13 राज्यों की टिप्पणियाँ केंद्र ने साझा कीं, उनमें बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड ने नए वित्तपोषण ढाँचे पर पुनर्विचार माँगा था, पाँच राज्यों ने अधिक मजदूरी माँगी थी और चार ने खेती के व्यस्त मौसम वाले विराम पर आपत्ति की थी।

जी राम जी योजना के प्रमुख उपबंध: VB-G RAM G अधिनियम, 2025

125 दिन की गारंटी, पंद्रह दिन का नियम और बेरोजगारी भत्ता

अधिनियम का केंद्र धारा 5(1) है: अकुशल शारीरिक श्रम के लिए स्वेच्छा से आगे आने वाले वयस्क सदस्यों वाले हर ग्रामीण परिवार को प्रत्येक वित्त वर्ष में कम से कम 125 दिन के मजदूरी रोजगार की सांविधिक गारंटी। यह अधिकार परिवार का है, और 2005 के अधिनियम की तरह इसमें जाति या गरीबी रेखा की कोई शर्त नहीं है।

  • माँगने पर काम: श्रमिक के काम माँगने पर 15 दिन के भीतर काम देना होगा; अन्यथा राज्य को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। अधिनियम उन पुराने आधारों को हटाता है, जिनसे श्रमिक इस भत्ते से वंचित हो सकता था।
  • समय पर मजदूरी: मजदूरी हर सप्ताह, और किसी भी स्थिति में काम के 15 दिन के भीतर देनी होगी (धारा 5(3))। इससे अधिक देरी पर अनुसूची II के अनुसार क्षतिपूर्ति देय है।
  • भुगतान का मार्ग: मजदूरी राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक निधि प्रबंधन प्रणाली (NeFMS) और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से सीधे श्रमिकों के बैंक खातों में जाती है, और एक ऑनलाइन प्रबंधन सूचना प्रणाली पर इसकी निगरानी होती है।
  • मजदूरी दर: अकुशल शारीरिक श्रम की मजदूरी केंद्र तय करता है; नई दरें अधिसूचित होने तक पुरानी दरें लागू रहीं।
प्रवाह आरेख। ग्रामीण परिवार पंजीकरण कराता है और उसके वयस्क सदस्य काम माँगते हैं; विकसित ग्राम पंचायत योजना के कामों से 15 दिन के भीतर काम देना होता है; मजदूरी साप्ताहिक और काम के अधिकतम 15 दिन के भीतर मिलती है; परिसंपत्तियाँ राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक में दर्ज होती हैं। 15 दिन में काम न मिले तो राज्य बेरोजगारी भत्ता देता है; मजदूरी में देरी हो तो अनुसूची II के अनुसार विलंब क्षतिपूर्ति मिलती है। नीचे की पट्टी राज्य द्वारा अधिसूचित बुआई और कटाई के अधिकतम 60 दिनों का विराम दिखाती है।

कामों के चार विषय-क्षेत्र और विकसित ग्राम पंचायत योजना

हर दिन का काम एक टिकाऊ परिसंपत्ति बनाने के लिए है। धारा 4(2), अनुसूची I के साथ पढ़ी जाने पर, चार प्राथमिक क्षेत्र तय करती है, और बनी हर परिसंपत्ति विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक में दर्ज होती है, जो ग्रामीण परिसंपत्तियों का एक राष्ट्रीय अभिलेख है।

  1. जल सुरक्षा: संरक्षण संरचनाएँ, सिंचाई सहायता, भूजल पुनर्भरण, जल निकायों का पुनरुद्धार, जलग्रहण विकास और वनीकरण।
  2. मूल ग्रामीण अवसंरचना: ग्रामीण सड़कें, सार्वजनिक भवन, विद्यालय अवसंरचना, स्वच्छता, नवीकरणीय ऊर्जा सुविधाएँ और केंद्रीय योजनाओं के आवास कार्य।
  3. आजीविका अवसंरचना: कृषि, पशुधन, मत्स्य, भंडारण, बाज़ार, कौशल विकास और चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए परिसंपत्तियाँ।
  4. चरम मौसम के कार्य: आश्रय, तटबंध, बाढ़ प्रबंधन, पुनर्वास कार्य और वनाग्नि प्रबंधन।

काम विकसित ग्राम पंचायत योजना (VGPP) से आते हैं, जिसे ग्राम पंचायत बनाती है और ग्राम सभा स्वीकृत करती है (धारा 4(1) से 4(3))। योजना पंचायत की हर परिसंपत्ति की सूची से शुरू होती है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के GIS आधारित योजना पोर्टल युक्तधारा और पीएम गति शक्ति पर दर्ज किया जाता है, ताकि कमियाँ पहचानी जा सकें; राज्य पंचायतों को श्रेणियों में बाँटकर पिछड़ी पंचायतों को अधिक धन दे सकते हैं। अगस्त 2026 में वनाग्नि पर एक संसदीय समिति ने चीड़ की पत्तियों (पिरूल) के संग्रह को इस अधिनियम में चरम मौसम वाले कार्य के रूप में शामिल करने की सिफ़ारिश की।

कृषि के व्यस्त मौसम में साठ दिन का विराम

धारा 6 नई है। इसके अंतर्गत हर राज्य बुआई और कटाई के व्यस्त मौसम को मिलाकर, एक वित्त वर्ष में कुल 60 दिन तक की अवधि पहले से अधिसूचित कर सकता है, जिसमें इस अधिनियम का कोई काम नहीं होगा। उद्देश्य है कि सबसे व्यस्त समय में खेतों को श्रमिक मिलते रहें; 125 दिन की गारंटी वर्ष के शेष भाग में पूरी की जानी है।

राज्य यह अवधि अपने फ़सल-चक्र के अनुसार तय कर सकते हैं और इसे ज़िलेवार, या प्रखंड और ग्राम पंचायत के स्तर पर भी अधिसूचित कर सकते हैं। समर्थक इसे सार्वजनिक कार्यों और खेती के बीच बेहतर तालमेल मानते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह विराम ठीक तब श्रमिकों की मोलभाव की शक्ति घटाता है, जब खेत-मजदूरी सबसे ऊँची होती है; खेती पर बहुत निर्भर पंजाब उन चार राज्यों में था, जिन्होंने आपत्ति की।

ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदें, सामाजिक अंकेक्षण और प्रौद्योगिकी

अधिनियम क्रियान्वयन की समीक्षा और निगरानी के लिए एक केंद्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद और राज्य परिषदें बनाता है, और मानक आवंटन तथा अभिसरण पर सलाह के लिए दोनों स्तरों पर संचालन समितियाँ। धाराएँ 16 से 19 योजना, क्रियान्वयन और निगरानी की भूमिकाएँ पंचायतों, कार्यक्रम अधिकारियों और ज़िला प्राधिकारियों को देती हैं।

  • सामाजिक अंकेक्षण: धारा 20 ग्राम सभाओं के सामाजिक अंकेक्षण को मज़बूत करती है, जिसमें ग्रामवासी कामों और भुगतानों के अभिलेख सार्वजनिक रूप से जाँचते हैं।
  • प्रौद्योगिकी: धाराएँ 23 और 24 बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, कामों की जियो-टैगिंग और रियल-टाइम डैशबोर्ड की व्यवस्था करती हैं; कार्यस्थल पर श्रमिकों का चेहरा प्रमाणीकरण लागू किया जा रहा है।
  • प्रशासनिक व्यय: प्रशासनिक व्यय की सीमा 6 से बढ़कर 9 प्रतिशत हो गई है, और ग्राम रोजगार सहायकों, मेटों तथा अन्य क्षेत्रीय कर्मचारियों के वेतन के लिए 13,000 करोड़ रुपये से अधिक रखे गए हैं।
  • छूट: प्राकृतिक आपदाओं या असाधारण परिस्थितियों में केंद्र मानकों में अस्थायी छूट दे सकता है।

VB-G RAM G बनाम मनरेगा: रोजगार गारंटी में क्या बदला

माँग-आधारित वित्तपोषण से मानक आवंटन तक

मनरेगा में पैसा काम के पीछे चलता था: श्रमिक जितना काम माँगते, केंद्र अपना हिस्सा उतना देता। नया अधिनियम इसकी जगह मानक आवंटन (normative allocation) लाता है (धाराएँ 4(5) और 22(4)): हर राज्य के लिए हर वर्ष केंद्र द्वारा नियमों में तय वस्तुनिष्ठ मानदंडों पर निर्धारित बजट; प्रारूप नियमों में वे मानदंड प्रस्तावित थे, जिनकी सिफ़ारिश 16वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच करों के बँटवारे के लिए की थी। आवंटन से अधिक जो भी खर्च हो, और बेरोजगारी भत्ता तथा विलंब क्षतिपूर्ति, राज्य के ज़िम्मे हैं।

मनरेगा और VB-G RAM G अधिनियम की तुलना
विशेषता मनरेगा, 2005 VB-G RAM G अधिनियम, 2025
गारंटी के दिन प्रति परिवार प्रति वर्ष 100 प्रति परिवार प्रति वर्ष 125
क्षेत्र सभी ग्रामीण क्षेत्र केंद्र द्वारा अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्र; 1 जुलाई 2026 से सभी अधिसूचित
वित्तपोषण माँग-आधारित केंद्र द्वारा तय मानक आवंटन
लागत का बँटवारा केंद्र: पूरी मजदूरी, सामग्री का 75 प्रतिशत (लगभग 90:10) 60:40; पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में 90:10; विधानमंडल-रहित केंद्र शासित प्रदेशों में पूरा केंद्र
विराम नहीं बुआई और कटाई के व्यस्त मौसम में 60 दिन तक
प्रशासनिक सीमा 6 प्रतिशत 9 प्रतिशत
योजना ग्राम पंचायत योजनाएँ पीएम गति शक्ति से जुड़ी विकसित ग्राम पंचायत योजनाएँ

सरकार का तर्क पूर्वानुमेयता है: ज्ञात बजट, नियम-आधारित आवंटन और संतृप्ति के लिए नियोजित परिसंपत्तियाँ। विपक्षी दलों से लेकर कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों तक, आलोचक कहते हैं कि सीमित बजट माँग-आधारित अधिकार को आपूर्ति-आधारित योजना में बदल देता है, क्योंकि राज्य का पैसा ख़त्म होते ही काम भी ख़त्म हो जाता है।

2005 से पहले और बाद के मजदूरी रोजगार कार्यक्रम

ग्रामीण गरीबों के लिए सार्वजनिक काम किसी भी गारंटी से पुराने हैं। 1960 के दशक के ग्रामीण जनशक्ति कार्यक्रम और 1971 की ग्रामीण रोजगार की क्रैश योजना के बाद 1977-78 में काम के बदले अनाज कार्यक्रम आया। 1980 के दशक में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम और ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम साथ-साथ चले, और 1993 की रोजगार आश्वासन योजना ने खेती के खाली मौसम में काम दिया।

इनमें से किसी ने विधिक अधिकार नहीं दिया। यह पहली बार 1977 के महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम ने दिया, जिसने राज्य के हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को काम का अधिकार दिया। राष्ट्रीय विधि 2005 में आई: राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को 5 सितंबर 2005 को स्वीकृति मिली, यह 2 फ़रवरी 2006 को 200 ज़िलों में लागू हुआ, और इसने 100 दिन के काम का वादा किया, तथा सरकार के काम न दे पाने पर बेरोजगारी भत्ते का।

समयरेखा: 1960 के दशक में ग्रामीण जनशक्ति कार्यक्रम; 1971 में ग्रामीण रोजगार की क्रैश योजना; 1977 में महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम, काम का पहला विधिक अधिकार; 1977-78 में काम के बदले अनाज कार्यक्रम; 1993 में रोजगार आश्वासन योजना; 2 फ़रवरी 2006 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम लागू, 100 दिन; दिसंबर 2025 में VB-G RAM G अधिनियम पारित; 1 जुलाई 2026 से लागू, 125 दिन।

VB-G RAM G का वित्तपोषण: 60:40 लागत, मजदूरी और राज्यों पर भार

60:40 का लागत बँटवारा और राज्यों का खर्च

अधिनियम एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में चलता है: लागत केंद्र और राज्य बाँटते हैं, और हर राज्य अधिनियम के भीतर अपनी योजना अधिसूचित करके चलाता है। 2026-27 के लिए केंद्र का हिस्सा 95,692.31 करोड़ रुपये है; राज्यों के हिस्से को मिलाकर कुल परिव्यय 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है, और केंद्र ने 2.86 लाख ग्राम पंचायतों में पाँच वर्षों में 7.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है।

लागत के हिस्से का स्तंभ चार्ट, प्रतिशत में। मनरेगा, व्यवहार में: केंद्र 90, राज्य 10। VB-G RAM G में अधिकांश राज्य: केंद्र 60, राज्य 40। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य: केंद्र 90, राज्य 10। विधानमंडल-रहित केंद्र शासित प्रदेश: केंद्र 100। नीचे राज्यों का अनुमानित खर्च: 2024-25 में लगभग 7,700 करोड़ रुपये, 2026-27 में कम से कम 51,000 करोड़ रुपये।

अधिकांश राज्यों के लिए बदलाव बड़ा है। मनरेगा में वे लगभग दसवाँ भाग देते थे; अब चार-दसवाँ भाग, और मानक आवंटन से ऊपर का हर खर्च भी। 2024-25 के खर्च पर आधारित एक अनुमान के अनुसार 2026-27 में राज्यों का हिस्सा कम से कम 51,000 करोड़ रुपये होगा, जबकि 2024-25 में यह लगभग 7,700 करोड़ रुपये था। यह लगभग 600 प्रतिशत की वृद्धि है, और उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और बिहार के खर्च में 600 से 800 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। 2025-26 के लिए केंद्र पर राज्यों का 20,422 करोड़ रुपये बकाया भी था।

300 रुपये की अंतरिम आधार मजदूरी और नई मजदूरी दरें

30 जून 2026 की मजदूरी अधिसूचना ने प्रतिदिन 300 रुपये की अंतरिम आधार मजदूरी तय की: कोई भी अधिसूचित मजदूरी इससे कम नहीं हो सकती। इससे पहले सबसे कम अधिसूचित मजदूरी 241 रुपये थी, और 21 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और प्रशासनिक इकाइयों को नए स्तर तक लाया गया। राष्ट्रीय औसत अधिसूचित मजदूरी 298.8 रुपये से बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन हो गई; यह 28.6 रुपये, अर्थात् 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है।

  • सबसे अधिक वृद्धि: अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड, लगभग 24.5 प्रतिशत; उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 48 रुपये, बिहार में 45 रुपये और मध्य प्रदेश में 39 रुपये।
  • 400 रुपये से ऊपर: हरियाणा (409 रुपये), गोवा (406 रुपये), केरल (401 रुपये) और सिक्किम की ऊँचाई वाली ग्राम पंचायतें (450 रुपये)।
  • सबसे कम वृद्धि: पहले से 300 रुपये से ऊपर वाले राज्य; तेलंगाना में केवल 1 रुपये, 307 से 308 रुपये।

मजदूरी पर विवाद बना हुआ है। अनूप सतपथी की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने 2019 में 375 रुपये प्रतिदिन की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी सीमा की सिफ़ारिश की थी, बिहार ने 413 रुपये माँगे, और आलोचक बताते हैं कि आज के 300 रुपये लगभग उतने ही हैं जितने 2009-10 की कीमतों पर मनरेगा के पुराने 100 रुपये के मानक।

VB-G RAM G के पहले महीने: रोजगार, e-KYC और श्रमिकों के अभिलेख

जुलाई और अगस्त 2026 में सृजित व्यक्ति-दिवस

इस योजना में रोजगार का मानक माप व्यक्ति-दिवस (person-day) है, अर्थात् एक व्यक्ति के एक दिन का काम। पहले महीने में नई योजना ने 9.18 करोड़ व्यक्ति-दिवस सृजित किए, जो जुलाई 2025 के 17.65 करोड़ से 48.01 प्रतिशत कम थे। अगस्त बेहतर रहा, 12.12 करोड़ के सामने 11.03 करोड़, जो 9.01 प्रतिशत कम है; दोनों महीनों का कुल योग 29.78 करोड़ से घटकर 20.21 करोड़ रह गया, जो 32.13 प्रतिशत की गिरावट है। अंतर इससे भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में, जहाँ 2022 में पुरानी योजना रोक दी गई थी, 2025 में कोई व्यक्ति-दिवस सृजित नहीं हुआ।

व्यक्ति-दिवसों का समूहित स्तंभ चार्ट, करोड़ में। जुलाई: 2025 में 17.65, 2026 में 9.18, 48.01 प्रतिशत कम। अगस्त: 12.12 और 11.03, 9.01 प्रतिशत कम। जुलाई और अगस्त मिलाकर: 29.78 और 20.21, 32.13 प्रतिशत कम।

अधिकारियों ने कहा कि अभी आकलन जल्दबाज़ी होगी और 60 दिन के विराम से काम घटा। स्वतंत्र अध्येताओं ने गिरावट की जड़ बदलाव की प्रक्रिया में बताई: अप्रैल से जुलाई, जो सामान्यतः सबसे व्यस्त महीने होते हैं, पुरानी और नई योजना ने मिलकर केवल 70 करोड़ व्यक्ति-दिवस सृजित किए, जबकि पिछले दो वर्षों के इन्हीं महीनों में 128 करोड़ और 119 करोड़ थे; गिरावट 43 प्रतिशत की रही। 19 बड़े राज्यों में से 10 में गिरावट 60 से 85 प्रतिशत रही, और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा झारखंड में काम लगभग रुक गया।

e-KYC, चेहरा प्रमाणीकरण और पंजीकृत श्रमिकों में कमी

डिजिटल जाँचों ने तय किया है कि सूची में कौन बना रहे। बदलाव के बाद के पखवाड़े में पंजीकृत श्रमिक 27 करोड़ से घटकर 26.33 करोड़ रह गए, और सक्रिय श्रमिक (पिछले तीन वर्षों में कम से कम एक बार काम करने वाले) 10.84 करोड़ से 10.57 करोड़। मंत्रालय ने इस आकलन को नहीं माना और कहा कि श्रमिकों की संख्या एक गतिशील आँकड़ा है, जो राज्यों के अभिलेख अद्यतन करने के साथ बदलता है। शोधकर्ताओं ने इसे किसी डिजिटल नियम के बाद श्रमिक संख्या की चौथी बड़ी गिरावट माना, 2022-23 के आधार-आधारित भुगतान, 2025 के अनिवार्य e-KYC और 2026 की चेहरा-पहचान उपस्थिति के बाद।

अगस्त के अंत तक 15.89 करोड़ श्रमिकों का e-KYC पूरा हो चुका था, जिनमें 10.84 करोड़ सक्रिय श्रमिकों में से 10.27 करोड़ (लगभग 95 प्रतिशत) शामिल थे; फिर भी लगभग 57 लाख सक्रिय श्रमिक असत्यापित रहे। तब मंत्रालय ने कहा कि मनरेगा का हर पंजीकृत श्रमिक VB-G RAM G में ले आया गया है, लंबित e-KYC किसी को काम माँगने या पाने से नहीं रोकता, और लगभग 2.11 करोड़ श्रमिकों को रोजगार की पेशकश की जा चुकी है।

काम का अधिकार, संघवाद और नए अधिनियम पर बहस

अनुच्छेद 41 में काम का अधिकार और सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई

संविधान का अनुच्छेद 41, जो राज्य की नीति का एक निदेशक तत्त्व है, कहता है कि राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम के अधिकार को सुनिश्चित करने का प्रभावी उपबंध करेगा। संविधान सभा में के.टी. शाह इसे मूल अधिकार बनाना चाहते थे; बी.आर. आंबेडकर का मत था कि इसे तुरंत और सर्वत्र लागू करना वित्तीय और संस्थागत रूप से संभव नहीं है, इसलिए इसे निदेशक तत्त्वों में रखा गया।

यह प्रश्न 21 अगस्त 2026 को फिर उठा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने, मनरेगा में विलंबित मजदूरी और क्षतिपूर्ति पर अरुणा रॉय की याचिका सुनते हुए, निरस्त योजना को अच्छी और प्रभावी बताया, "न मुफ़्त की रेवड़ी, न शोषण"। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि संविधान काम के अधिकार को मूल अधिकार नहीं बनाता, बल्कि इसे भाग IV की एक आकांक्षा मानता है। पीठ ने नए अधिनियम के अंतर्गत इन प्रश्नों की जाँच के लिए नई याचिका माँगी।

VB-G RAM G ढाँचे के पक्ष और विपक्ष में तर्क

  • अधिक दिन और बेहतर परिसंपत्तियाँ: 100 की जगह 125 दिन, चार प्राथमिक क्षेत्रों से बँधे काम और एक राष्ट्रीय परिसंपत्ति स्टैक, तथा ग्राम योजना के माध्यम से दूसरी योजनाओं से अभिसरण।
  • मज़बूत प्रशासन: क्षेत्रीय कर्मचारियों के वेतन के लिए 9 प्रतिशत की सीमा, सामाजिक अंकेक्षण, धोखाधड़ी के विरुद्ध जियो-टैगिंग और बायोमेट्रिक जाँच, और 300 रुपये की आधार मजदूरी।
  • सीमित अधिकार: आलोचकों के अनुसार मानक आवंटन माँग-आधारित वित्तपोषण को समाप्त करता है, जिससे गारंटी दिल्ली में तय बजट पर निर्भर हो जाती है।
  • राज्यों पर भार: राज्य अब 40 प्रतिशत, बेरोजगारी भत्ता और विलंब क्षतिपूर्ति देते हैं, जिसे गरीब राज्य सबसे कम उठा सकते हैं।
  • केंद्रीकृत योजना: कार्यकर्ता GIS-आधारित योजना को ऊपर से नीचे की बताते हैं, और e-KYC तथा चेहरा प्रमाणीकरण जैसी डिजिटल जाँचों को सबसे गरीब श्रमिकों के लिए बाधा।

UPSC के लिए VB-G RAM G अधिनियम: सामान्य अध्ययन II और III

UPSC पाठ्यक्रम में VB-G RAM G अधिनियम का स्थान

यह अधिनियम सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II में आता है, कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाओं और उनके प्रदर्शन के अंतर्गत, और संघीय ढाँचे के मुद्दों के अंतर्गत, यहाँ किसी योजना की लागत के केंद्र और राज्यों के बीच बँटवारे के रूप में। समावेशी विकास और रोजगार के माध्यम से यह सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III तक, और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सत्यनिष्ठा के माध्यम से प्रश्नपत्र IV तक पहुँचता है; राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाएँ भी यही तथ्य पूछती हैं।

  1. प्रारंभिक परीक्षा के तथ्य: 125 दिन; माँग के 15 दिन में काम; 15 दिन में मजदूरी; धारा 6 का 60 दिन का विराम; 60:40 और 90:10 बँटवारा; 300 रुपये की अंतरिम आधार मजदूरी; 1 जुलाई 2026 से लागू; मनरेगा 2 फ़रवरी 2006 से लागू; अनुच्छेद 41।
  2. मुख्य परीक्षा का विश्लेषण: माँग-आधारित बनाम मानक वित्तपोषण, राजकोषीय संघवाद और केंद्र प्रायोजित योजनाएँ, काम का अधिकार, डिजिटल शासन और बहिष्करण, सामाजिक अंकेक्षण।
  3. सामयिक आँकड़े: जुलाई और अगस्त 2026 के व्यक्ति-दिवस, e-KYC की स्थिति, 21 अगस्त 2026 की सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई।

विगत वर्षों के प्रश्न: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा इस लेख को पढ़ने के बाद आप यूपीएससी के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिख सकेंगे। हर प्रश्न के साथ एक खुलने वाली रूपरेखा है, जो बताती है कि परीक्षा में उसे कैसे हल करें।

  1. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2013, सामान्य अध्ययन-II (हिंदी रूपांतर)केंद्र सरकार प्रायः शिकायत करती है कि समाज के कमज़ोर वर्गों की पीड़ा दूर करने में राज्य सरकारों का प्रदर्शन खराब है। कमज़ोर वर्गों की स्थिति सुधारने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में केंद्र प्रायोजित योजनाओं के पुनर्गठन का उद्देश्य राज्यों को बेहतर क्रियान्वयन के लिए लचीलापन देना है। आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए · दृष्टिकोण: इस दावे को तौलें कि पुनर्गठन राज्यों को लचीलापन देता है, और इस प्रमाण को भी कि इससे लागत और जोखिम राज्यों पर जा सकते हैं। 2026 के ग्रामीण रोजगार अधिनियम को उदाहरण के रूप में पूरे उत्तर में रखें।

    भूमिका: केंद्र प्रायोजित योजनाओं को साझा केंद्रीय वित्त से राज्यों द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं के रूप में परिभाषित करें, और केंद्र की यह शिकायत बताएँ कि कमज़ोर वर्गों तक पहुँचने में राज्य पीछे रहते हैं।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • मिला लचीलापन: राज्य अपनी योजनाएँ अधिसूचित करते हैं, फ़सल-चक्र के अनुसार 60 दिन का विराम चुनते हैं, पंचायतों को श्रेणियों में बाँटते हैं, और ग्राम सभा से स्वीकृत ग्राम योजनाओं से काम तय करते हैं।
    • खिसकी लागत: VB-G RAM G अधिनियम अधिकांश राज्यों को लगभग दसवें भाग से 40 प्रतिशत तक ले जाता है, और मानक आवंटन से ऊपर का खर्च, बेरोजगारी भत्ता तथा विलंब क्षतिपूर्ति उन पर डालता है।
    • बना रहा नियंत्रण: हर राज्य का मानक आवंटन केंद्र अपने मानदंडों पर तय करता है, और मजदूरी दर भी वही निर्धारित करता है।
    • प्रमाण: बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड ने वित्तपोषण ढाँचे पर पुनर्विचार माँगा; केंद्र पर लंबित बकाया; जुलाई 2026 में व्यक्ति-दिवसों में गिरावट।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि लचीलापन तभी काम आता है जब धन और समय पर उसकी प्राप्ति उसके अनुरूप हो; अन्यथा पुनर्गठन राज्यों को क्षमता नहीं, केवल भार सौंपता है।

  2. यूपीएससी मुख्य परीक्षा 2025, सामान्य अध्ययन-IVमहात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, एम जी एन आर ई जी ए को पहले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, एन आर ई जी ए के रूप में जाना जाता था। यह एक भारतीय समाज कल्याण कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य संविधान में दिए गए 'काम करने के अधिकार' के प्रावधानों को पूरा करना है। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्रामीण रोजगार क्षेत्र के अंतर्गत 2006 में मनरेगा शुरु किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी देना है जो प्रति परिवार अधिकतम प्रतिवर्ष 100 दिनों की सीमा के अधीन अकुशल शारीरिक श्रम कार्य के लिए तैयार हैं; प्रत्येक ग्रामीण परिवार को इस योजना के अंतर्गत पंजीकरण कराने का अधिकार है; जॉब कार्ड पंजीकृत को जारी किया जाता है; जॉब कार्ड धारक रोजगार की तलाश कर सकता है; राज्य सरकार परिवारों को प्रतिपूरक दैनिक बेरोजगारी भत्ते के रूप में पहले 30 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी का 25% और वर्ष की शेष अवधि के लिए मजदूरी का भुगतान करेगी। विभिन्न ग्राम पंचायतों द्वारा मनरेगा कार्य कराया गया। आपको एक जिले का प्रभारी प्रशासक नियुक्त किया गया है। आपको विभिन्न ग्राम पंचायतों द्वारा किए जा रहे मनरेगा कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। आपको सभी मनरेगा कार्यों की तकनीकी मंजूरी देने का अधिकार भी दिया गया है। आपके अधिकार क्षेत्र में एक पंचायत में आपने देखा कि आपके पूर्ववर्ती ने कार्यक्रम का निम्न प्रकार से कुप्रबंधन किया है: (i) वास्तविक नौकरी चाहने वालों को धन वितरित नहीं किया गया है। (ii) मजदूरों की मस्टर रोल का ठीक से रखरखाव नहीं किया गया है। (iii) किए गए कार्य और किए गए भुगतान के बीच बेमेल है। (iv) फर्जी व्यक्तियों को भुगतान किया गया है। (v) व्यक्ति की आवश्यकता को देखे बिना जॉब कार्ड दिए गए हैं। (vi) निधियों का कुप्रबंधन तथा निधियों की कुछ हद तक हेराफेरी हुई है। (vii) ऐसे स्वीकृत कार्य जो कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। (a) उपरोक्त स्थिति पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है तथा आप इस क्षेत्र में मनरेगा कार्यक्रम के समुचित संचालन को कैसे बहाल करेंगे? (b) ऊपर सूचीबद्ध विभिन्न मुद्दों को हल करने के लिए आप क्या कार्रवाई शुरू करेंगे? (c) आप उपरोक्त स्थिति से कैसे निपटेंगे?
    उत्तर-लेखन रूपरेखा

    प्रश्न की मांग, प्रमुख तर्क, प्रासंगिक उदाहरण और निष्कर्ष की दिशा। यह पूर्ण मॉडल उत्तर नहीं है।

    निर्देशात्मक शब्द: हर भाग का उत्तर दीजिए · दृष्टिकोण: इसे तीन भागों वाले नैतिक केस के रूप में लें: आपकी प्रतिक्रिया और मूल्य, सूची की हर चूक पर सुधारात्मक कार्रवाई, और संबंधित लोगों, जिनमें आपके पूर्ववर्ती भी हैं, से कैसे निपटेंगे।

    भूमिका: दाँव स्पष्ट करें: यह कार्यक्रम ग्रामीण गरीबों का सांविधिक अधिकार है, और ये चूकें उन्हें मजदूरी और परिसंपत्तियों से वंचित करती हैं तथा सार्वजनिक धन बर्बाद करती हैं।

    मुख्य भाग (विकसित किए जाने वाले बिंदु):

    • प्रतिक्रिया: सत्यनिष्ठा, श्रमिकों के प्रति जवाबदेही, मजदूरी से वंचित लोगों के प्रति समानुभूति; पूर्ववर्ती की चूकों पर पर्दा नहीं।
    • अभिलेखों पर कार्रवाई: मस्टर रोल और जॉब कार्ड का सत्यापन, ग्राम सभा के सत्यापन के बाद फ़र्ज़ी नाम हटाना, जियो-टैग किए फ़ोटो से हर काम की ज़मीनी जाँच।
    • धन पर कार्रवाई: मजदूरी केवल सत्यापित खातों में सीधे अंतरण से, हेराफेरी की राशि की वसूली, और दुरुपयोग की सूचना सक्षम प्राधिकारी को।
    • रोकथाम: ग्राम सभा के नियमित सामाजिक अंकेक्षण, अपवाद-मार्ग के साथ बायोमेट्रिक उपस्थिति ताकि वास्तविक श्रमिक बाहर न हों, कामों और भुगतानों का सार्वजनिक प्रदर्शन।

    निष्कर्ष: निष्कर्ष में लिखें कि कार्यक्रम को बहाल करने का अर्थ श्रमिकों का भरोसा लौटाना है, ऐसी पारदर्शिता से जिसे समुदाय देख सके और ऐसे सुधार से जो गरीबों को दंडित न करे।

  3. यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2011 (हिंदी रूपांतर)"महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम" से लाभ पाने के पात्र निम्नलिखित में से कौन हैं?
    1. a केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों के वयस्क सदस्य
    2. b गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों के वयस्क सदस्य
    3. c सभी पिछड़े समुदायों के परिवारों के वयस्क सदस्य
    4. d किसी भी परिवार के वयस्क सदस्य
    इस प्रश्न को कैसे हल करें

    प्रश्न का प्रकार: एकल सही उत्तर

    हल करने की विधि: चरण 1: गारंटी उस हर ग्रामीण परिवार के लिए है जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम के लिए आगे आएँ। चरण 2: जाति, गरीबी रेखा या पिछड़े वर्ग की कोई शर्त नहीं है। अतः किसी भी परिवार के वयस्क सदस्य।

    इस भ्रम से बचें: कई कल्याणकारी योजनाएँ गरीबी रेखा से नीचे के या अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों को लक्षित करती हैं; यह गारंटी किसी सूची से नहीं, अकुशल शारीरिक श्रम की शर्त से स्वयं-लक्षित है।

    विकल्पवार व्याख्या:

    • (a) केवल अनुसूचित जाति और जनजाति परिवारों के वयस्क सदस्य: गलत। अधिनियम में जाति की कोई शर्त नहीं है।
    • (b) गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के वयस्क सदस्य: गलत। गरीबी रेखा से नीचे होना शर्त नहीं है।
    • (c) सभी पिछड़े समुदायों के परिवारों के वयस्क सदस्य: गलत। समुदाय की कोई शर्त लागू नहीं होती।
    • (d) किसी भी परिवार के वयस्क सदस्य: सही। अकुशल शारीरिक श्रम के लिए आगे आने वाले वयस्कों का हर ग्रामीण परिवार इसमें आता है।

    उत्तर: किसी भी परिवार के वयस्क सदस्य: विकल्प (d), आधिकारिक उत्तर।

स्रोत

संपादकीय अस्वीकरण

यह लेख अधिनियम पर PIB की विज्ञप्तियों, PIB की पृष्ठभूमि टिप्पणी और इस पृष्ठ पर दिए गए अन्य स्रोतों पर आधारित है।